What I think? I will let you know here.. Listen to the voices from my heart
Saturday, April 23, 2022
पन्नों के बीच का सूखा गुलाब
Friday, April 22, 2022
बेटी का बाप
Monday, March 28, 2022
जिंदगी का यह पुल तंग सा
Monday, March 21, 2022
harfon ke sabak
Wednesday, March 16, 2022
मेरे हिस्से की नींद
Sunday, February 20, 2022
पुरानी बदरंग कमीज
Monday, February 7, 2022
जब होता हूं सड़कों पर
Monday, January 17, 2022
दो दूधिया बच्चे
Friday, December 24, 2021
मेरे गांव की यह सड़क
Thursday, December 16, 2021
फोन और रिश्ते
Thursday, December 2, 2021
आप कतार में हैं
Friday, April 30, 2021
ऐ कौवे, तू हमेशा कांव कांव नहीं करता।
Saturday, March 13, 2021
दिल्ली ऐसी ही नहीं बसती।
Friday, February 26, 2021
समंदर की रेत
Saturday, November 14, 2020
सांप
Sunday, October 11, 2020
बागीचा अब बस एक सूखता ठूंठ तना है
पहले जितने ही हैं लोग गिन के बहत्तर
लेकिन लगता है जैसे युगों का हो अंतर
सब एक दूसरे से खिंचे खिंचे से हैं
मानो किसी बात पर रूठे रूठे से हैं
ना इंतजार है प्लास्टिक ट्रे वाली चाय का
ना मिलेगा जायका दातून जैसे ब्रेड स्टिक
के साथ वाले सूप का
पहले खाना था मानो गपशप की
मीठी गर्म चाशनी में सना है
अब मानो है सन्नाटे वाली
चुप सी बर्फ का बना है
जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा
अब बस एक सूखता ठूंठ तना है
पहले जितने ही हैं लोग गिन के बहत्तर
पर लोगों के दरम्यान दूरियां कई गुणा है।
नजर नहीं आते अब
सहेज कर रखे गए लिहाफ
और वो सलेटी लिफाफे में
झक्क सफेद चादर का जोड़ा
ना मयस्सर है वह
खुरदरा छोटा सा तौलिया
जिसको देख शायद एक बार
हर किसी का दिल
मचल ही जाता था कि
साथ के चलें अपने घर
लालच से नहीं बल्कि शायद प्यार से
शायद कुछ यादगार अपने
साथ रखने की चाह से।
लेकिन अब ना कोई देता दुआएं
चादर समेटने वक़्त
ना चाय नाश्ते की बख्शीश मांगता
दिखता कोई जना है
जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा
अब बस एक सूखता ठूंठ तना है
पूछा जब उससे कि हुए क्या है तुझे
कहा उसने मैं तो हूं वैसा ही
तुम्ही कहते हो कि कोरॉना है।
छोटे बच्चे जो दौड़ते थे पूरे डब्बे में
मचाते धमा चौकड़ी
मानो पुरबा बह रही
हो अरहर के खेतों से
आज बंधे है अपनी अपनी सीटों से
किसी भी दूसरी सीट पर जाना मना है
बगल की सीट पर बैठे बुजुर्ग
गोद में दादा दादा कह
बैठ जाना मना है
चहचहाते पंछी अब ना बैठते डालियों पर
सारे बैठे ऐसे सहम कर
जैसे कबूतरों ने किसी अदृश्य चील
के पंखों को फड़फड़ाते सुना है
जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा
अब बस एक सूखता ठूंठ तना है
पहले जितने ही हैं लोग गिन के बहत्तर
पर लोगों के दरम्यान दूरियां कई गुणा है।
सोचा सफर खत्म होते ही
बदलेंगी ये मायूस सूरतें
लपक कर उतरा स्टेशन पर
पर दिखा कि यह सन्नाटा तो
स्टेशन पर और भी घना है
दिखे वो भी जो उठाते हैं
सारी दुनिया का बोझ
एक कोने में खड़े दुबके से
जैसे कठोर मास्टर जी ने
होमवर्क ना करने की सजा दी हो
लाल कपड़े पहनने वालों की
अखें भी अब हो गई है लाल
मानो किसी ने उनके बोझिल
कंधों पर डाला बोझा तिगुना है
खो गई वह सामान को गिन कर
मोलभाव करने की वह अदा है
जो भी हो दे देना साहिब
क्योंकि अब बेगारी भी लगती भली
' ऐ कुली ' की आवाज़ सुनना भी हो
गई दूभर ,
स्टेशन आज है एक सुनसान गली
कैसे कहूं कई महीनों से घर में ठीक से
खाना तक नहीं बना है
जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा
अब बस एक सूखता ठूंठ तना है
दुनिया का बोझा उठाना था आसान
अब अपनी ज़िन्दगी का वज़न कई गुणा है।
जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा
अब बस एक सूखता ठूंठ तना है
पूछा जब उससे कि हुए क्या है तुझे
कहा उसने मैं तो हूं वैसा ही
तुम्ही कहते हो कि कोरॉना है।
Thursday, September 3, 2020
तब जरूरी हो जाता है नंगापन
Monday, August 31, 2020
छोटा और बड़ा
छोटी हो रही खुशियां
बड़े हो रहे गम
बड़ा होता जा रहा अंतर्तम
बड़ी हो रही वह खाई विषम
बड़ी लगने लगी ज़िन्दगी
इसके जुल्म औ सितम
मशीनें होती जा रही छोटी
सोच होती जा रही छोटी
परिधि दोस्ती की हो रही छोटी
व्यापक दृष्टि होती जा रही छोटी
बड़ा हो रहा व्यक्तित्व
छोटा हो रहा मानव का सत्व
जिसे होना था बड़ा
वह हो रहा छोटा
जिसे सोचा था मिटा
देंगे सदा के लिए
बड़ा होता जा रहा
जो है खोटा
जब तब है यह आलम
तब तक चलेगा यह खेल
बड़े छोटे का
देखता जमाने के साथ
अपलक खड़ा मैं
अपनी छोटी आंखों से
बड़ा हो रहा छोटा
छोटा हो रहा बड़ा
शायद निकले रास्ता इसी
छोटे बड़े के खेल में
शायद कोई बड़ा ले अवतार
ले जन्म कंस की जेल में
या अपने बीच का ही कोई
छोटा बनेगा बड़ा
वह छोटा जो अभी है
बीज जैसा
अभी भले है
मिट्टी में गड़ा
खाद बनाएगा उस कचरे को
जो है गंदा और सड़ा
सड़े खाद से पोषित
निकलेंगी छोटी कोंपले
वो छोटे से पत्ते
मुंह चिढ़ाते कचरे के बड़े ढेर को
छोटा बीज निगल जाएगा
कचरे को खाद बना
छोटा दीप निगलेगा
बड़े अंधकार को
चलता रहेगा यह खेल
छोटे बड़े का
बड़े के छोटे
और छोटे के बड़े होने का।
Tuesday, August 18, 2020
कभी पैदल गुजर कर देखो तो
Wednesday, July 11, 2018
जब रिपब्लिक आ जायेगा।
ना किसी का राज रहेगा, ना कोई दीप जलेगा,
बहुत ही कम बरसेगी बरखा, हर कँवल मुरझायेगा।
जब रिपब्लिक आ जायेगा।
न कोई वाकेगा न कोई टाकेगा,
लुट जायेगी निधि,ना फिर आपको चौबे पकायेगा।
जब रिपब्लिक आ जायेगा।
स्क्रीन पर छायेगा अँधेरा, ग्रहण लगेगा रवीश को,
बढ़ेगा इनटॉलेरेंस, फिर उठेगी उंगली इशरत के तफ्तीश को।
पिटेंगे झा और आशुतोष , लेट मी स्पीक पीरज़ादा चिल्लायेगा।
जब रिपब्लिक आ जायेगा।
नाउ बनेगा देन, टुडे यस्टरडे कहलायेगा,
आई बी अन होगा डेड, एक्स अननोन बन जायेगा।
कर लो मज़े चार दिन की चांदनी में,
अँधेरा वापस तेरे स्टूडियो में छायेगा।
जब रिपब्लिक आ जायेगा।
जब रिपब्लिक आ जायेगा ।





