Showing posts with label kavita. Show all posts
Showing posts with label kavita. Show all posts

Saturday, April 23, 2022

पन्नों के बीच का सूखा गुलाब

पुरानी अलमारी में पड़ी आज एक किताब
के पन्नो के बीच मिला सहेज कर
 रखा एक सूखा फूल गुलाब का।
जो गिर गया था तुम्हारे जूड़े से 
लाइब्रेरी की कतार में
और मैंने रख लिया था उसको सहेज कर 
अपनी किताब छुपा पन्नों के दरम्यान।

याद है किताबों में उलझी तुम बैठी तुम
और बगल वाली बेंच पर बैठा मैं।
निहारता तुमको किताबों की ओट से  
आस पास किताबों की भरी आलमारियां 
लेकिन मुझे पढ़नी थी तुम्हारे दिल की किताब।

जो चंद पन्ने पढ़े थे तुम्हारे मैंने चोरी छुप के
लगा जैसे मिल गए हों 
मेरी किताब के चंद फटे पन्ने 
और पूरी हो गई हो मेरी जिंदगी की किताब
चाहता था तुम्हारी मुस्कुराहट की जिल्द 
अपनी जिंदगी की किताब पर ।
लेकिन तुम्हारी नज़र कभी हटी ही नहीं
किताबों से और मेरी तुमसे।

आज भी यह सूखा बदरंग फूल
झांकता किताबों के बीच से
जैसे भर गया हो वापस से 
सारे रंग मेरी जिंदगी में।

और किताब के पन्नों में 
सिमटी इसकी खुशबू
 ले गई है वापस मुझे लाइब्रेरी की कतार में
जहां खड़ा मैं तुम्हारे पीछे
और तुम उलझी किताबों में।

जमाना बदल जाता है
किताबें नहीं बदलती
संजो कर रखती है सब कुछ
और याद दिलाती हैं बीच बीच में
वो सब कुछ।
नहीं जानता मैं कि क्या है यह सब 
लेकिन ए किताब, तुम तो जरूर जानती होगी
इन सब का मतलब।

कभी वो पन्ना भी दिखा जहां लिखा हो
किताबों में कि मुकम्मल इश्क क्या है?
सूखे फूल रखने वाली किताब है 
इश्क की किताब
या कि बस इश्क हो गया है अब इस किताब से
या कि हर पन्ने पर नई इबारत छुपा कर
रखी किताब को ही कहते हैं जिंदगी।

जो भी हो, वापस बंद कर रहा हूं
किताब को और हल्के से चूम कर
 इस सूखे फूल को।
संभाल के रखना इसे मेरी अमानत की तरह
ताकि अगली बार मुझे ऐसे भी मिले 
मेरा छुपा सा गुमनाम इश्क।

गर हो सके तो दिखाना अगली बार 
वो पन्ना मेरी किताब
जहां लिखा हो कि क्या होता है 
वो मुकम्मल इश्क ।

और कैसे अलग है
वो किताबों के पन्नों में छुपे 
महबूब के जूड़े से गिरे गुलाब से। 








Friday, April 22, 2022

बेटी का बाप

अपनी निधि खोने के बाद
 उसे बिलखते देखा है।

रोते हुए उसको अपने सालों सहेजे 
खजाने को सौपते देखा है।

जश्न मनाती दुनिया के बीच खड़े अपने
कलेजे के टुकड़े को दूर जाते देखा है।

कंधे पर बिठाया गोद में उठाया जिसे
अपनी परी को दूर देश उड़ जाते देखा है।

पलकों पर बिठाया जिसको
उसको पलों में दूर जाते देखा है।

भरे अपनी आखों में आंसू अपनी घर की लक्ष्मी से
किसी पराए का घर बस जाते देखा है।

फूल सी अपनी बच्ची को 
दुल्हन के जोड़े में सजते देखा है।

निभाकर क्रूर रीति दुनिया की 
फूट फूट कर रोते देखा है।

कई रातों से जागी थकी आखों को बेटी विदा कर आखिरकार बेटी के बाप को सोते देखा है।

हम सबने सुना है दुल्हन का क्रंदन
क्या पिता का धर्म निभाते 
कभी बाप का हाल देखा है? 


Monday, March 28, 2022

जिंदगी का यह पुल तंग सा

तंग करता है यह 
पुल जिंदगी का तंग सा।

पुल के नीचे पानी सा बेधड़क 
बहता जा रहा वक्त बेरंग सा।

और ऊपर पुल पर ट्रैफिक में 
अटका खड़ा मैं दंग सा।

आस पास खड़ी गाडियां ढेरों लेकिन
लगता नहीं कुछ भी संग सा।

पीछे वाला आगे जाने को उतावला
झुंझलाता हॉर्न बजाता जैसे
 हार रहा हो कोई जंग सा।

आगे खड़ी सुस्त गाडियां की रफ्तार
अलसाया जैसे अजगर भुजंग सा।

जिंदगी चल रही रुक रही ,
दुनिया की शर्तों पे,
भले दिल चाहे खुला आसमान पतंग सा।

स्वीकार्य हो रही यह सच्चाई शनै शनै
मुस्कुराता रहा सुन दुनिया का शोर जैसे मृदंग सा।

दर्द निराशा में मिला दिया दो घूंट उमंग
फिर पी गया जैसे प्याला हो भंग सा।

निभाता रहा हूं साथ तेरा ए जिंदगी,
 दुर्योधन से किया वचन निभाता हो
कर्ण महाराज अंग सा।













Monday, March 21, 2022

harfon ke sabak

मरने से पहले पढ़ लूं
हर्फों के सबक
जान लूं कि कैसे लगती है सही नुक्ता
क्या सही हिज्जे है जिंदगी की
सीख लूं कायदे हैं सही जुबान लिखने के
और दुहरा लूं अलिफ बे ते से फिर से
थोड़ी सुधार लूं अपनी लिखावट
खरीद लूं चंद महंगे वरक 
और एक अदद कीमती सी कलम
ताकि मेरी खुदकुशी के खत में
कोई कमी न रह जाए।

कि जानता हूं मैं
सब निकालेंगे गलतियां 
मेरी लिखावट में
गलत हिज्जे लिखने के
मुझपर तोहमत लगाए जाएंगे
बताएंगे माहिर ए सर्फ ओ नहो
 कि कितना जाहिल था मैं
जो नहीं जानता था जुबान की बुनियादी बातें
आयेंगे मेरे खत के कागज़ को सस्ता बताने वाले
उठाये जाएंगे सवाल मेरी तालीम पर
 मेरी परवरिश पर
 नापी जाएगी मेरी औकात 
मेरे खत की स्याही से ।

कि जानता हूं मैं कि कोई भी
बताएगा नहीं कि मेरी वजह ए खुदकुशी
कोई पकड़ेगा नहीं मेरे गुनहगारों को
सब के सब गलतियां निकालेंगे
 मेरे खत में,
मुझमें और मेरी खुदकुशी में।

इसलिए दुहरा लेता हूं
हर्फो के सबक
मरने से पहले
आखिरी खत लिखने से पहले।



Wednesday, March 16, 2022

मेरे हिस्से की नींद

रोज़ रात को सो जाता हूं
बड़ी थकान के बड़े से बिछावन पर,
अपनी कमाई का छोटा तकिया लेकर,
बिछाता हूं उम्मीदों की बड़ी सी चादर,
और ओढ़ लेता हूं चादर धुंधले सपनों की झीनी सी,
सिराहने रखा है एक हथपंखा 
अपनी छोटी जरूरतों का।

बिस्तर की खाट के नीचे छुपा रखे हैं मैने
अपने टूटे सपनों का ढेर,
कुछ ऐसे बिछाई है उम्मीदों की चादर 
कि दिखने ना पाए लंबी फेहरिस्त 
मेरे टूटे सपनों की।
सोने से पहले मद्धम करता हूं लौ 
 मेरे पसीने से जलते दिए की,
और पीता हूं सुकून के गिलास में 
रखा संतोष वाला ठंडा जल।

फिर बड़ी गहरी नींद आती है
जैसे कड़ी धूप के बाद मिल गई हो पीपल की छांह
और बड़े उजागर से सपने आते हैं
मानो पूरा चांद खिला हो आसमान पर
और सुबह आती है ताजगी लिये
जैसे  मैने पाई हो मेरे हिस्से की नींद बरसों बाद।



Sunday, February 20, 2022

पुरानी बदरंग कमीज


अपनी मुस्कुराहट को
दूर कर दिया है मैंने
अपने आप से,
जैसे सिलाई उधड़ गई हो 
मेरी पसंद की कमीज की
और मैंने रख दिया हो उसे
तह लगाकर पुराने सूटकेस में,
पुरानी कमीजों के नीचे,
संभाल कर सहेज कर
इस इंतजार में कि
कभी कोई आएगा
जो वापस से सिल देगा मेरी फटी 
कमीज सी मुस्कुराहट।

अपनी शोखियों को टांग दिया 
है मैंने पुराने आलने पर
पहनी हुई कमीज के जैसे,
औंधी पड़ी आलने पर कमीज
जिस पर लगे हों 
दाग धूल और पसीने के
और तुडी मुड़ी मटमैली कॉलर 
ताक झांक करती दूर से ही।

शोखियों वाली हँसी को छोड़ दिया 
पहनी कमीज जैसे
सोच कर यह कि कभी वापस से
पहनूंगा इसे धोकर
खुशबू वाले साबुन से
गुनगुनी धूप में सुखा कर।

ज़माने ने फीकी कर दी है मेरी हँसी
जैसे रंग उड़ गया हो
सुर्ख लाल कमीज का
धूप झेलते झेलते 
मार खा खा कर धोबी की
जैसी दी गई हो हजारों पटखनी
इसे घाट के पत्थर पर।
ज़माने की धुलाई ने
निकाल दिए हैं सारे रंग 
मेरी हँसी के।

अब मेरी मुस्कुराहट 
मेरी शोखियां 
और मेरी हंसी
मानो हैं पुरानी कमीज के जैसी
खूंटी पर टंगी
आलने पर बिखरी
बदरंग रंग वाली
उधड़ी सिलाई वाली
दागदार।

मगर फेंका नहीं है 
अपनी कमीज को अब तक
कि इंतजार है कि कोई आएगा रंगरेज
अपनी हँसी के रंग 
वापस भर देगा मेरी हँसी में।

वापस सिल देगा उधड़ी हुई सिलाई
अपनी लंबी लंबी बातों के धागे से,

और उसकी शोखियां धो डालेंगी
दर्द के दाग और 
वापस से चमचमा उठेगी मेरी कमीज
बिलकुल नई सी।

तब तक यूं ही
टंगी रहेगी
औंधी पड़ी रहेगी 
मेरी फटी बदरंग 
हँसी वाली कमीज।


Monday, February 7, 2022

जब होता हूं सड़कों पर

बैठा होगा कोई अपने शीश महल में
अपने झरोखों से झांकते हुए
उसने देखा होगा किसी मुसाफिर को
कंधे पर झोला लटकाए,पैदल चलते
और सोचा होगा कि सामने वाला
दुखी है कितना,
धूल धूप झेल रहा है
बोझा उठाए चल रहा है
तो उसने कहा होगा 
मुहावरा कि फलां सड़क पर आ गया
फिर उसने कहा होगा कि
सड़क पर होने का मतलब
आज से हुआ बरबाद हो जाना।

जब होता हूं सड़कों पर
तो शायद खुश रहता हूं सबसे ज्यादा,
क्योंकि मेरी सारी जरूरतें 
सिमट जाती हैं
मेरे कंधे पर लटके एक थैले में।
एक जोड़ी कपड़े और एक बोतल पानी
और एक कुछ बासी पूरियां एक टिफिन में,
काफी हो जाती है मेरे लिए।
शायद उससे भी ज्यादा हो जाती हैं
क्योंकि जब खड़ा होता हूं सड़कों पर।
तो आ जाता है कोई भूखा
होठों पर प्यास और आखों में आस लिए
एक टुकड़ा रोटी के लिए हाथ फैलाए।
फिर सोचता हूं कि 
यह आया है मेरे पास मांगने एक रोटी
शीश महल में क्यों नहीं जाता 
जहां हैं मेवे के भंडार 
और यह आया है मेरे पास जिसके पास है
एक झोला कंधे पर
और गिनी चुनी चार पूरियां।
क्योंकि पता है उसे भी शायद कि
दे वो ही सकता है जिसकी खुद की
जरूरतें कम हैं ।

जब होता हूं सड़कों पर
कम होती हैं मेरी जरूरतें
कम होता है मेरा बोझा
इसीलिए तेज चल पाता हूं
इसीलिए किसी भूखे के दिल में
आस जगा पाता हूं।
जब होता हूं सड़कों पर 
समझ पाता हूं चीजों की असली अहमियत
इसीलिए संभाल कर बंद करता हूं
पानी की छोटी बोतल का ढक्कन।
जबकि घर पर खुला बहता नल भी 
मुझे परेशान नहीं करता,
इसीलिए हजारों लीटर वाली टंकी भी 
कम पड़ जाती है।

जब होता हूं सड़कों पर
तो गुरूर नहीं होता मेरे पास,
पीछे छूट जाती हैं मेरी डिग्रियां
और ज्ञान का अहंकार।
एक अनपढ़ रिक्शेवाले से भी पूछता हूं 
कि भैया जरा रास्ता बताओगे,
 थोड़ा भटक गया हूं।
एक सड़क किनारे टपरी पर खड़ी बुढिया से
पूछता हूं कि आई! एक कप चाय मिलेगी क्या?
ना मांगने वाले में शर्म, 
ना देने वाले में कोई कोई शिकन
सामने वाला जिसे एक पल
में बना लिया भाई और मां
बताते हैं रास्ता इत्मीनान से
और दे देते हैं दो बिस्किट 
चाय के साथ बिना मांगे।

जब होता हूं सड़कों पर
ज्यादा समझता हूं रिश्तों की अहमियत
याद करता हूं दोस्तों को,
घर वालों को।
एक पल को ठहर सा जाता हूं
जब देखता हूं लिखा कि 
धीरे चलिए, घर पर कोई 
आपका इंतजार कर रहा है।

जब होता हूं सड़कों पर 
तो हो जाता हूं ज्यादा विनम्र
हर छोटे बड़े मंदिर पर शीश झुकाता हूं।
स्वीकार करता हूं लंगर,
 भिक्षुक की तरह हाथ फैलाए।
आगे नहीं निकलता बिना सजदा 
किए किसी पीर को।
निकल जाता हूं बगल से, 
सड़क के बीच बैठी गाय के
बिना उसे उठाए, बिना उसे जगाए।
रुक जाता हूं जब तक खत्म नहीं होता
छोटे कुत्ते के बच्चों का खेल सड़क पर।
इंतजार करता हूं तब तक
जब तक सारे बच्चे बतख के 
पार नहीं कर लेते सड़क।
जब होता हूं सड़क पर
तो हंसता हूं उसपर
 जिसने बरबाद होने को नाम दिया
सड़क पर होने का।
क्योंकि जब होता हूं सड़क पर
तो रत्ती भर ही सही 
शायद होता हूं ज्यादा आबाद।
एक माशा ही सही
शायद होता हूं एक बेहतर इंसान
एक इंच ही सही
शायद होता हूं प्रकृति के नजदीक
एक पल के लिए ही सही 
शायद होता हूं ज्यादा खुश।

जब होता हूं सड़कों पर
जब होता हूं सड़कों पर

Monday, January 17, 2022

दो दूधिया बच्चे

गुनगुनी धूप में खेलते
बकरी के दो दूधिया बच्चे।

रात भर सोए रहे अपनी मां के पास
दुग्ध धारा रही प्रवाहित 
गर्माहट वाले प्रेम का पोषण मिला खास
अब संक्रति की सुबह जब चरने को निकली मां
शिशु द्वय अब भी न लेने देते मां को श्वास।
मां के पीछे उछलते कूदते जुड़वां 
भले कदम हैं कच्चे
गुनगुनी धूप में खेलते
बकरी के दो दूधिया बच्चे।
यह निश्छल रंग है मां का
प्रेम का या मां के दूध का,
जिससे हैं सराबोर बच्चे 
और उनका तिनका तिनका
बाबा नागार्जुन वाला दूधिया वात्सल्य
मानो है हर तरफ छलका
छटकती रोशनी है बताती कि
है चारों तरफ जुड़वां ऊन के गोलों के चर्चे
गुनगुनी धूप में खेलते
बकरी के दो दूधिया बच्चे।

भूखी मां ने खा लिए गुलाब के दो पौधे
बच्चों ने मचाया उत्पात, गमले पड़े औंधे
शोर करता आया माली , जब देखा श्वेत वसना जुड़वे
बस दे पाया गुलाबी सी झिड़की,
उतर गई त्योरियां क्रोध रह गए आधे
जैसे दुनिया हो गलत, मां बच्चे लगे सच्चे
गुनगुनी धूप में खेलते
बकरी के दो दूधिया बच्चे।
गुनगुनी धूप में खेलते
बकरी के दो दूधिया बच्चे।




Friday, December 24, 2021

मेरे गांव की यह सड़क

मेरे गांव को शहर से जोड़ती 
मेरे गांव की यह सड़क।

सुबह को गाडियां 
सिर्फ जाती है शहर की ओर 
भर कर दूध , सब्जी, फल,
शाम में लौटेगी खाली गाडियां,
ले कागज़ के चंद टुकड़े 
कुछ तुड़े मुड़े कुछ कड़क।

पूरे घाटे का सौदा करवाती
मेरे गांव की यह सड़क।
कहते हैं गांव वाले कि
जाते हैं शहर
सपनों की तलाश में,
लेकिन जानते हैं लेकिन नींद 
तो लौट गांव में ही आएगी,
क्योंकि शहर में आंख लगने पर
मिलती मालिक की झिड़क।

ऊंघते झूमतों को वापस घर लाती
मेरे गांव की यह सड़क।

ले जाती हर सुबह
मेरे गांव से युवा ऊर्जा
से भरे चेहरे 
लबालब शरीर मेहनत और स्पन्द से।
शाम में वापस लेकर आती
लौटते भरे धूल से सने बदन
स्वेद से भीगी हर रग
थकी हर हरकत थकी हर धड़क।

थकाने के खेल में कभी न थकती
मेरे गांव की यह सड़क।

मेरे गांव को शहर से जोड़ती 
मेरे गांव की यह सड़क।





Thursday, December 16, 2021

फोन और रिश्ते

रिश्ते पहले होते थे
पुराने मोबाइल फोन की तरह,
जल्दी टूटते नहीं थे।
हाथों से गिर जाए तो
भले ही खुल जाता था,
मोबाइल का कवर
और बिखर जाती थी बैटरी,
निकल जाता था सिम
लेकिन एक क्षण में
वापस से जुड़ भी जाता था।
और फिर से काम करने लगता था फोन
जैसे कुछ हुआ ही ना हो।
जैसे कुछ टूटा ही ना हो।

आज के फोन अगर 
हाथों से गिर जाए
तो तुरंत आ जाती है दरार,
कुछ भी दिखना बंद हो जाता है,
भले ही अंदर बैटरी हो दुरुस्त,
और ना कोई शिकायत न हो सिम में। 
लेकिन अब टूटे फोन का कोई इलाज नहीं,
उसको जोड़ने का कोई उपाय नहीं।
अब नहीं हो पाएगी इससे कोई बात,
कह कर छुड़ा लेते हैं दामन सब।
सब ले लेते हैं एक नया फोन।
एक चोट नहीं सह पाता 
एक बार गिरने के बाद 
उठता नहीं नया फोन।

पुराना फोन नहीं था उतना बातूनी
नहीं रख पाता था याद,
 पचास से ज्यादा लोगों के नाम
ना ही याद रख पाता था ।
पंद्रह से ज्यादा पुराने संदेश।
पिछली यादों और ढेर सारे दोस्तों
का बोझा नहीं था उसके सर।
जीता था वर्तमान में भुलाकर पिछली बातें।
इसलिए शायद भूल जाता था
अपनी चोट को,
अपने गिरने को भुला कर,
वापस से बातें करने लगता था।

नया फोन है बहुत बातूनी,
बना सकता है हजारों दोस्त,
याद रखता है नए पुराने सारे संदेश,
अपने अतीत से बाहर नहीं आ पाता।
हर पुरानी रंजिश याद रहती है इसे।
किसी बड़े से तहखाने में छुपाए रखता है,
सारे गम सारे राज सारे दर्द,
इसीलिए नहीं सह पाता
गिरने का दर्द।
बिना टूटे बिखर जाता है,
बिना बिखरे टूट जाता है,
कुव्वत नहीं बची एक दरार तक सहने की 
नए फोन में।

पुराना फोन करता जब किसी से बातें
 तो करता पूरे दिल से बातें ,
जब अपने पालतू सांप से खेलता
तो पूरा ध्यान अपने सांप पर ही रखता,
नया फोन एक साथ ही कर सकता है 
बातें करना और गेम खेलना।
समझ नहीं आता कि बातें हो रही हैं
या गेम चल रहा है।
पुराना फोन था साधारण
बेवकूफ सा
जो अंदर वो ही बाहर।
नया फोन रख सकता है
एक साथ दो दो सिम ।
बिना सिम के भी चल लेता है! 
पता नहीं चलता फोन देख कर,
कि कौन सा वाला नंबर 
बात कर रहा है।
पुराना फोन हमेशा एक ही
नंबर रखता था अंदर,
दुहराव नहीं था उसके अंदर,
इसीलिए शायद मजबूत था
अंदर से।
झेल सकता था झटके 
चोट और बेतहाशा खरोचों को।

नया फोन शायद
 जानता भी नहीं खुद को
इसीलिए नहीं समेट पाता ।
एक हल्की सी दरार,
और पड़ा पाता है खुद को
कचरे के अंबार में,
जहां उसके साथ पड़े होते हैं
कई और नए फोन।
कुछ तो ऐसे जिनमें दरार तक नहीं,
पर जिन्हें नकार दिया गया
क्योंकि उनसे भी नया फोन 
आ गया था बाजार में।

और पुराने फोन तो चल लेते थे
रबर से बंध कर भी
टूटे शीशे के साथ
घिसे कीपैड के साथ
और मुंह फुलाए फूफा 
जैसे बैटरी के साथ भी।
नए रिश्ते हैं नए फोन सरीखे
डिस्प्ले बड़ा लेकिन बैटरी बैकअप कम है
महंगे हों भले पर कीमती कम है।

शायद पुराना फोन बताता है 
हमें कि हमेशा अच्छी नहीं होती,
ज्यादा बेहतरी और बेहिसाब उपयोगिता।
कुछ चीज़ें पुरानी ही अच्छी हैं,
कम बेहतर होकर ही लाजवाब हैं,
कम उपयोगी होकर भी ज्यादा अजीज हैं।








Thursday, December 2, 2021

आप कतार में हैं

इंतजार करिए कि
 आप कतार में हैं।
करिए अपनी बारी का इंतजार
आप कतार में हैं।
हैं सख्त बड़े कानून उसके
आप जिस कतार में हैं
बस सीधा चलते जाना है 
उनके पीछे जो आपसे आगे
खड़े कतार में हैं।

मचाएगी शोर आपके
 पीछे वाली भीड़,
सर पर उठाएंगे आसमान
 आपके आगे वाले,
अगर तोड़ कर आगे जाने की कोशिश,
समवेत स्वर में आपको
 याद दिलाया जायेगा,
अरे भई, हम भी कतार में हैं
आप कतार में हैं।

झेलनी होगी पीछे वालों के ताने
थोड़ा तेज चलो भाई,
सामने वाले सुनाएंगे झल्ला कर
थोड़ा सब्र करो भाई,
गर एक कदम भी चले
कतार की रफ्तार से अलग ,
याद दिलाएगी दुनिया 
समेट लो अपने डैने कि
आप कतार में हैं।
ना आगे वाले को पता
ना पीछे वाले को पता,
कि क्यों खड़े हैं कतार में।
अकेले में वे बताएंगे कि
देखी भीड़ तो सोचा कि
कुछ अच्छा ही होगा।
तभी तो लगी है भीड़
और लंबी लगी कतार है।
बिन पतवार की नाव जैसे 
जाती उधर ही जिधर की बयार है।
लगा हूं जिसके लिए कतार में
 क्या मिल जायेगी खुशी मिल जाने पर
या हम भुलावे के संसार में हैं,
आप कतार में हैं।

अलग सा सुनसान रास्ता
ना भीड़ और न शोर
उधर न कोई कतार है,
ना आगे कोई जिसके
 पीछे चलना हो,
ना पीछे कोई जिसके आगे 
निकलने से डरना हो,
अलग है और बीहड़ है यह रास्ता
सपाट नहीं बिल्कुल ।
कौन जाने, एक कदम सड़क पर 
अगला कदम दरार में है।
भले इस रास्ते पर मेहनत और
किस्मत तकरार में हैं,
पर अनजान रास्तों में चलते
मुकाबला होता खुद से,
दिल सुकून और करार में हैं।
अकेली राह, अकेला सफर
पर कम से कम यह इत्मीनान कि
अब मेरी मेहनत, मंजिल और मंशा
 एक कतार में हैं।

Friday, April 30, 2021

ऐ कौवे, तू हमेशा कांव कांव नहीं करता।

 हमेशा कांव कांव नहीं करता कौवा 
छुपा होता है कभी 
उसी कांव कांव में 
 किसी नर कौवे का प्रणय निवेदन
उसी कांव कांव में
 होता होगा किसी 
प्रेमातुर मादा का 
सहर्ष आमंत्रण।

कोयल हमेशा कुहू कुहू 
कर नहीं गाती
कभी उस कुहू कुहू में 
छुपा होता होगा
किसी बच्चे को बुलाती 
मां कोयल का आर्तनाद
उसी कुहू कुहू में 
शायद छुपा होता है
मां का इंतजार करते 
बच्चों की पुकार।

लेकिन हम कौवे की
 हर आवाज को
कांव कांव का शोर कहते हैं।
और कहते हैं कोयल की आवाज को
 एक मधुर गीत
जबकि कोई कोयल जीवन भर 
खुशी के गीत गा नहीं सकती।


तो क्या हम 
कभी भी सुन पाते हैं 
कोयल और कौवे की 
असली आवाज ??
अगर सुन पाते तो 
मादा कौवे का सस्वर प्रेम निमंत्रण 
हमें शोर नहीं लगता
और ना ही मां कोयल का आर्तनाद
 हमें मधुर गीत सुनाई देता।

हम सच में उनकी आवाज
तो कभी सुनते ही नहीं
हम तो सुनते हैं अपने विश्वास,
अपनी परंपराओं 
अपनी मान्यताओं, 
अपने दृष्टिकोण, 
अपनी विचारधारा 
और अपनी मनःस्थितियों
 के सम्मिलित शोर 
से दबी हुई
 कोयल और कौवे की आवाज।

हम बहरे हैं 
जो उनकी असली आवाज को 
सुन नहीं सकते।
क्योंकि हम सिर्फ 
सुन सकते हैं वोही 
जो हम सुनना चाहते हैं
जो हम सुनते आए हैं
जो हम खुद सोच रहे हैं
जो हम सोचते हैं 
कि हम सुन रहे हैं।

 हमेशा कांव कांव नहीं करता कौवा
कांव कांव करती
 है हमारी सोच
कांव कांव करते हैं हम
कुहू कुहू का गीत 
भी थोपा हुआ है हमने
कोयल की हर आवाज पर।

काश कि कभी सुन पाता
 कौवे को
कांव कांव से परे।
कभी सुन पाता कोयल को
कुहू कुहू के परे।
लेकिन उसके लिए 
मुझे जाना होगा 
अपने दायरे से परे।
जो मैं कर नहीं पाता।
मैं, मैं का गुलाम हूं 
ऐसा गुलाम जो एक
चिड़िया की आवाज तक
सुन नहीं सकता।

ऐ कौवे, तू हमेशा कांव कांव नहीं करता।  






Saturday, March 13, 2021

दिल्ली ऐसी ही नहीं बसती।

दिल्ली ऐसे ही नहीं बसती

इस शहर के बनते हैं किले
किसी पहाड़ का सीना
चीर कर निकाले गए लाल लाल पत्थरों से,
इसकी इमारतें बनती हैं 
किसी खेत की मिट्टी को भट्ठी में
जला कर बनी ईंटों से,
और इन सब को जोड़ने के लिए,
लगते हैं छोटे शहरों के कारीगर,
दूर गांव के मजदूर,
और उनके बसने के लिए,
बनती हैं गंदी बस्तियां
और फिर साथ ही बनती हैं
बदनाम गलियां।

दिल्ली ऐसी ही नहीं बसती।
इस शहर की प्यास बड़ी है
इसीलिए दूर पहाड़ों में 
उछलती कूदती नदियों
को बांधते हैं गारे से पत्थरों से
फिर उसी बांध के 
पीछे कैद नदी को
लोहे की मोटी पाइपों
से दिल्ली लाया जाता है
ताकि भरे जा सकें स्विमिंग पूल
धोई जा सकें बड़ी बड़ी गाड़ियां
बहाया जा सके मल
और धोए जा सकें लाखों शहरियों
के चमचमाते करोड़ों जोड़ी कपड़े।

दिल्ली ऐसे ही नहीं बसती।
इस शहर को चाहिए चमचमाती सड़कें
सड़कों पर दौड़ती कारें,
और उन सड़कों पर 
काली कोलतार बिछाने के लिए चाहिए
काले गंदले चेहरों वाले सस्ते मजदूर,
उन कारों को चलाने के लिए
उनके दरवाजे खोलने के लिए
चाहिए ड्राइवर जो
 आगे वाली सीट पर बैठ
सीधा सड़क पर देखें
जिनको पता हो लेकिन
 जलन बिल्कुल न हो यह जान 
कि क्या चल रहा है
पिछली सीट पर,
जो सड़क पर की हर आहट सुन लें,
लेकिन पूरी तरह बहरे हों अपने
साहब की गालियों से, उनके राज भरी बातों से
ऐसे ही अनगिनत लोगों के पसीने
खून और आंसुओं से पटी
जमीन पर खिलता है मुगल गार्डेन
और बसती है वो रंगीन शाम।

दिल्ली ऐसे ही नहीं बसती।
सिर्फ गांवो को उजाड़ 
वहां के लोगों को उखाड़
उनका पानी छीन
उनके खेत छीन जब
भर जाता है दिल दिल्ली का,
तो यह खुद को उजाड़ती है।
बार बार कई बार
कहते हैं दिल्ली सात बार उजड़ी
सात बार बनी,
पता नहीं क्या है ज्यादा त्रासद
दिल्ली का उजड़ना
या दिल्ली का बनना ?
दिल्ली के उजड़ने पर 
आंसू बहाने वाले मिल जायेंगे
हजारों दस्तावेज हजारों नज़्म
बीसियों कहानियां,
दिल्ली के बनने पर आंसू 
बहाने वाली एक नज़्म नहीं मिलेगी
यही तो खासियत है दिल्ली की
सबको लूट लुटी सी रहती है
सबको रूला रोती रहती है
सबके घर छीन बेघर रहती है
छीन सबका पानी प्यासी रहती है
जिसका हर कोना भींगा है 
खून से, खून से रंगी है हर दीवार
गजलों में फिर भी इसे कहते
बस इश्क मोहब्बत प्यार।

दिल्ली ऐसे ही नहीं बसती।
कैसा होता अगर कि कभी न बनती दिल्ली
तो शायद बच जाती द्रौपदी की लाज
ना गूंजती निर्भया की चीख
और न जलती कोई तंदूर में
ना मारी जाती प्रियदर्शनी
काश कि एक बार उजड़ फिर ना
बसती दिल्ली
तो बच जाते कई उजड़ने से
लेकिन यह दिल्ली है कि 
सबको उजाड़ उजाड़ बसती रहती है
और खुद उजड़ उजड़ फिर बसती रहती है

यही दास्तां है उजड़ने बसने की
आखिर यह दिल्ली है 
और यह दिल्ली
ऐसे ही नहीं बसती।









Friday, February 26, 2021

समंदर की रेत

छुपी रहती है
कभी पैंट की जेबों में ।
कभी जुराबों के अंदर
रह रह कुरेदती है।
कभी कानों के पीछे
दुबकी सी मिलती है
तो कभी तौलिए के रेशों
से झांकती है चमकती सी।

मैं तो गया था लहरों को देखने 
डूबते सूरज को निहारने ।
ठंडी बयां को अपने 
चेहरे पर महसूस करने।
साफ पानी के नीचे 
से झांकते रंगीन कंकड़ों को देखने।
देखने कि कैसे छुपते हैं
शर्मीले केकड़े अपने बिलों में।
और कैसे नई सुर्ख मेहंदी लगे हाथ
सहलाते हैं अपने साथी के चेहरे।
 देखने समंदर किनारे
 सीपियों और टूटे शंख
बीनते छोटे बच्चों का आह्लाद।
और इंद्रधनुषी पैराशूट से
बंधकर उड़ते बड़े बच्चों का
 उत्साहित उन्माद।

तुम भी थी वहीं
हर जगह बिखरी पड़ी
पर हमने तुम्हें नहीं देखा
एकाध बार तुम पर खीझ 
कर गुस्सा भी हुए 
कि इतना तप क्यों जाती हो तुम

लेकिन अब जब मैं लौट आया हूं
अपने घर
तो देखता हूं कि जिन्हें 
मैं इतने प्यार से देखने 
गया था, जिनसे मिलने की
मेरी ख्वाहिश थी,
वो सारी चीज़ें रह गई पीछे
कोई भी साथ निभाने साथ नहीं आया
आई सिर्फ तुम
हर जगह छुप छुपा के
इसीलिए तुम्हें पाता हूं
कभी जेबों में
कभी जूतों में
कभी अपने बालों में

सच है कि यादें समंदर की
 तुम ही अपने साथ लाई हो
सच में तुम्हारा प्यार ही है सच्चा
जो मेरे साथ
 इतनी दूर तक चली आई हो
मेरे हसीन पलों की यादों की 
आखिरी खेप हो
हां तुम तो
समंदर की रेत हो।


Saturday, November 14, 2020

सांप


देखा एक सांप खड़ा फन फैलाए, पुरानी किवाड़ की जंग लगी सांकल से लिपटा, मानो किवाड़ के पटों को खोलने से रोक रहा हो । दीमक खायी काले काठ की चौखट पर रेंगती वह काली सरसराहट , पसीने से भींग गई पेशानी मेरी भय से निकल गई अधघुटी चीख । तो पाया लेटा हूं अपने मुलायम बिछौने पर । ओह! सांप नहीं सपना था व्यर्थ ही भय से मेरा कांपना था ।
देखा एक सांप जब नहीं था कोई सांप !!

बरामदे पर लटका बल्ब अंधेरे से लड़ता लड़ता आखिर हो गया शहीद , लिए झूलता हुआ टूटा फिलामेंट अब बरामदे पर छाया  है अंधेरा । सोचा बदल दूं बल्ब जैसे ही पहुंचा बरामदे , फिर देखा वही सांप लंबा सी काया श्याम उन्मुक्त । फिर से वही सरसराहट, ऊपर से नीचे गया कांप । फिर किसी ने जलाई टॉर्च और हंसने लगा मुझपर । ओह! सांप नहीं रस्सी थी, जिसे देख मेरी घिग्घी बंधी थी ।
देखा एक सांप जब नहीं था कोई सांप ।

गुजरता जंगलों से मिला एक भील बच्चा , (पांच साल का रहा होगा) अकेला प्रकृति से साकार । मां बाप गए थे जंगलों में, महुआ बीनने लकड़ियां चुनने । अकेला बच्चा अपने मचान पर खड़ा फूस की छत में कुछ ढूंढ रहा था । कुछ बुदबुदाता हुआ हंसता हुआ । पास जाकर देखा तो फिर वही सांप लटकता हुआ । और बच्चा उसके साथ खेलता हुआ । और सांप मानो ऊब गया हो बच्चे की चुहल से । जैसे बूढ़े दादा बचकर निकलना चाहते हों नटखटी पोते से ।




देखा एक सांप हां देखा एक सांप इस बार असली सांप था । वही काली सरसराहट , लेकिन बच्चे को क्यों नहीं दिखा सांप ?
सांप नहीं होने पर भी मुझे दिखता । सांप होने पर भी बच्चे को नहीं दिखता । सांप का यह खेल निराला है । सांप बाहर नहीं मन में बैठा है । वह काली सरसराहट मेरे मन की है, वह सांप का खौफ़ मेरे मन का है। उस नन्हे भील का मन और मेरा मन, एक सांप का ही तो अंतर है।

देखा एक सांप तो एक गुदगुदाया एक थर्राया । मन ही है जिसने दिखाया एक सांप जब नहीं था कोई सांप।

सोचता हूँ अब
क्या वाकई होते हैं सांप
क्योंकि देखा एक सांप

जब नहीं था कोई सांप।

Sunday, October 11, 2020

बागीचा अब बस एक सूखता ठूंठ तना है


पहले जितने ही हैं लोग गिन के बहत्तर

लेकिन लगता है जैसे युगों का हो अंतर

सब एक दूसरे से खिंचे खिंचे से हैं

मानो किसी बात पर रूठे रूठे से हैं

ना इंतजार है प्लास्टिक ट्रे वाली चाय का

ना मिलेगा जायका दातून जैसे ब्रेड स्टिक

के साथ वाले सूप का

पहले खाना था मानो गपशप की

मीठी गर्म चाशनी में सना है

अब मानो है सन्नाटे वाली

चुप सी बर्फ का बना है

जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा

अब बस एक सूखता ठूंठ तना है

पहले जितने ही हैं लोग गिन के बहत्तर

पर लोगों के दरम्यान दूरियां कई गुणा है।


नजर नहीं आते अब

सहेज कर रखे गए लिहाफ

 और वो सलेटी लिफाफे में 

झक्क सफेद चादर का जोड़ा

ना मयस्सर है वह 

खुरदरा छोटा सा तौलिया

जिसको देख शायद एक बार 

हर किसी का दिल 

मचल ही जाता था कि 

साथ के चलें अपने घर

लालच से नहीं बल्कि शायद प्यार से

शायद कुछ यादगार अपने 

साथ रखने की चाह से।

लेकिन अब ना कोई देता दुआएं 

चादर समेटने वक़्त

ना चाय नाश्ते की बख्शीश मांगता 

दिखता कोई जना है

जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा

अब बस एक सूखता ठूंठ तना है

पूछा जब उससे कि हुए क्या है तुझे

कहा उसने मैं तो हूं वैसा ही 

तुम्ही कहते हो कि कोरॉना है।



 




छोटे बच्चे जो दौड़ते थे पूरे डब्बे में

मचाते धमा चौकड़ी 

मानो पुरबा बह रही 

हो अरहर के खेतों से

आज बंधे है अपनी अपनी सीटों से

किसी भी दूसरी सीट पर जाना मना है

बगल की सीट पर बैठे बुजुर्ग 

 गोद में दादा दादा कह 

बैठ जाना मना है

चहचहाते पंछी अब ना बैठते डालियों पर

सारे बैठे ऐसे सहम कर

 जैसे कबूतरों ने किसी अदृश्य चील

के पंखों को फड़फड़ाते सुना है

जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा

अब बस एक सूखता ठूंठ तना है

पहले जितने ही हैं लोग गिन के बहत्तर

पर लोगों के दरम्यान दूरियां कई गुणा है।


सोचा सफर खत्म होते ही 

बदलेंगी ये मायूस सूरतें

लपक कर उतरा स्टेशन पर

पर दिखा कि यह सन्नाटा तो 

स्टेशन पर और भी घना है

दिखे वो भी जो उठाते हैं

सारी दुनिया का बोझ 

एक कोने में खड़े दुबके से

जैसे कठोर मास्टर जी ने

होमवर्क ना करने की सजा दी हो


लाल कपड़े पहनने वालों की

अखें भी अब हो गई है लाल

मानो किसी ने उनके बोझिल

कंधों पर डाला बोझा तिगुना है

खो गई वह सामान को गिन कर

मोलभाव करने की वह अदा है

जो भी हो दे देना साहिब

क्योंकि अब बेगारी भी लगती भली

' ऐ कुली ' की आवाज़ सुनना भी हो

गई दूभर ,

 स्टेशन आज है एक सुनसान गली

कैसे कहूं कई महीनों से घर में ठीक से 

खाना तक नहीं बना है

जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा

अब बस एक सूखता ठूंठ तना है

दुनिया का बोझा उठाना था आसान

अब अपनी ज़िन्दगी का वज़न कई गुणा है।


जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा

अब बस एक सूखता ठूंठ तना है

पूछा जब उससे कि हुए क्या है तुझे

कहा उसने मैं तो हूं वैसा ही 

तुम्ही कहते हो कि कोरॉना है।



Thursday, September 3, 2020

तब जरूरी हो जाता है नंगापन

जब बहुत काटता है
दुनियादारी का वह मोटा लबादा
उसके बनावटी बेलबूटे 
और उसका असहनीय भारीपन, इंसानों का
तब जरूरी हो जाता है नंगापन।

अच्छी लगती तस्वीरों में
म्यान चढ़ी तलवार है 
जीतती है जो जंग वो
नंगी तलवार की धार है
शांति काल में भले लगे अच्छी 
 म्यान चढ़ी तलवार का नजाकतपन
दुश्मन घुस आए घरों में, तलवारों का
तब जरूरी हो जाता है नंगापन।





कांटे भी लगते सुहाने
दस्ताने चढ़े हाथों से
झूठा भी लगता सच्चा
चिकनी चुपड़ी बातों से
जब महसूस करना हो चिकने संगमरमर 
के किनारों का छुपा खुरदुरापन
निकाल फेंको दस्ताने, हाथों का
तब जरूरी हो जाता है नंगापन।

आंखों में चढ़े चश्मे  में दिखती
भूख और मुफलिसी भी रोमानी
नंगी आंखों से ही दिखता कि बड़े
बंगलों की ज़िन्दगी भी 
है कितनी बेमानी
आंखों में सूरमा और आंखों पे चश्मा
सुन्दर भले लगे कविताओं में
वेदना से  बहते आंसू पोछने  को 
हटाना पड़ता है चश्मा, आंखों का
तब जरूरी हो जाता है नंगापन।

नंगा आदमी ही करता सृजन
बुलेट प्रूफ जैकेट पहन तो
मौत बरसाई जाती है
नंगा ही जन्म लेता इंसान
कफ़न ओढ़ तो चिता सजाई जाती है
नंगे  का ज़मीर होता साफ 
ना उसपे रखा कोई वज़न
जब डराना को खुदा को, बंदे का
 तब जरूरी हो जाता है नंगापन।

जब बहुत काटता है
दुनियादारी का वह मोटा लबादा
उसके बनावटी बेलबूटे 
और उसका असहनीय भारीपन, इंसानों का
तब जरूरी हो जाता है नंगापन।

Monday, August 31, 2020

छोटा और बड़ा

छोटी हो रही खुशियां
बड़े हो रहे गम
बड़ा होता जा रहा अंतर्तम
बड़ी हो रही वह खाई विषम
बड़ी लगने लगी ज़िन्दगी
इसके जुल्म औ सितम

मशीनें होती जा रही छोटी
सोच होती जा रही छोटी
परिधि दोस्ती की हो रही छोटी
व्यापक दृष्टि होती जा रही छोटी

बड़ा हो रहा व्यक्तित्व
छोटा हो रहा मानव का सत्व
जिसे होना था बड़ा
वह हो रहा छोटा
जिसे सोचा था मिटा
देंगे सदा के लिए
बड़ा होता जा रहा
जो है खोटा

जब तब है यह आलम
तब तक चलेगा यह खेल
बड़े छोटे का
देखता जमाने के साथ
अपलक खड़ा मैं
अपनी छोटी आंखों से
बड़ा हो रहा छोटा
छोटा हो रहा बड़ा

शायद निकले रास्ता इसी
छोटे बड़े के खेल में
शायद कोई बड़ा ले अवतार
ले जन्म कंस की जेल में
या अपने बीच का ही कोई
छोटा बनेगा बड़ा
वह छोटा जो अभी है
बीज जैसा
अभी भले है
मिट्टी में गड़ा
खाद बनाएगा उस कचरे को
जो है गंदा और सड़ा

सड़े खाद से पोषित
निकलेंगी छोटी कोंपले
वो छोटे से पत्ते
मुंह चिढ़ाते कचरे के बड़े ढेर को




छोटा बीज निगल जाएगा
कचरे को खाद बना
छोटा दीप निगलेगा
बड़े अंधकार को
चलता रहेगा यह खेल
छोटे बड़े का
बड़े के छोटे
और छोटे के बड़े होने का।

Tuesday, August 18, 2020

कभी पैदल गुजर कर देखो तो

गुजरते हो जिन राहों से 
अपनी कार का शीशा  चढ़ाए
अपनी आंखों पर काला चश्मा लगाए
अपने कानो पर हेडफोन लगाए
उन्हीं राहों से कभी पैदल गुजर कर देखो तो।

 जिस पुलिया के नीचे
बारिश से बचने को
हेलमेट उतार कर अपने भीगे रुमाल से
अपना भीगा सर पोछते 
मोटर साइकिल वालों को देखते हो,
उसी पुलिया के एक कोने पर
तुम्हारे गांव का एक परिवार
रहता है चुपचाप
कांच के छोटे गिलास में बेचता है चाय
कभी उसकी दुकान पर फुरसत से
 रुक कर देखो तो।

जिस सड़क के किनारे पेड़ को
देख खीझते हो कि बढ़ गई हैं
कितनी इसकी टहनियां
लगती है खरोंच मेरे कार पर इसकी
बढ़ी बेतरतीब डालियों से
उसी टहनी के उपर मैना ने बनाया है 
एक घोसला, दो चूजे भी हैं
ट्रैफिक के शोर में ना सुनाई देती
कूक भी फैली है उधर
हेडफोन उतार कर मैना परिवार का संवाद 
सुन कर देखो तो।

जिस सब्जी बेचते ठेले वाले से 
कार में बैठे बैठे ही मोल भाव कर,
तुलवा लेते हो ताज़ी हरी सब्जियां
उसी ठेले के नीचे बैठी रहती है,
उसकी छोटी बेटी अपनी स्लेट
पेंसिल के साथ ककहरा सीखते,
बीच बीच में बेटी को पढ़ाता है,
तुम्हारा सब्जी वाला अपनी दुलारी 
का शिक्षक भी तो है,
कभी उसकी दुकान से परे
उसके छोटे स्कूल में
जाकर देखो तो।



खोलता है दौड़कर गेट तुम्हारे लिए
रफू की गई वर्दी पहने सिक्युरिटी गार्ड,
उसकी फटी जेब से झांकता रहता है 
मनीऑर्डर की गंदली रसीदों का बंडल,
एक फूटे स्क्रीन वाले छोटे से 
फोन से किससे बतियाता रहता है,
शायद उसका जन्मदिन हो आज
या बेटा पास हुआ हो मैट्रिक परीक्षा,
शायद पता चल जाय
उसकी मुस्कुराहट का राज,
उसके सलाम का जवाब प्यार से
देकर देखो तो।

कभी कार से उतर कर
धूप धूल की परवाह किए बगैर
गुजरते हो जिन राहों से
उन्हीं राहों से कभी पैदल
 गुजर कर देखो तो।

Wednesday, July 11, 2018

जब रिपब्लिक आ जायेगा।

जब रिपब्लिक आ जायेगा।

ना किसी का राज रहेगा, ना कोई दीप जलेगा,
बहुत ही कम बरसेगी बरखा, हर कँवल मुरझायेगा।
जब रिपब्लिक आ जायेगा।

न कोई वाकेगा न कोई टाकेगा,
लुट जायेगी निधि,ना फिर आपको चौबे पकायेगा।
जब रिपब्लिक आ जायेगा।

स्क्रीन पर छायेगा अँधेरा, ग्रहण लगेगा रवीश को,
बढ़ेगा इनटॉलेरेंस, फिर उठेगी उंगली इशरत के तफ्तीश को।
पिटेंगे झा और आशुतोष , लेट मी स्पीक पीरज़ादा चिल्लायेगा।
जब रिपब्लिक आ जायेगा।

नाउ बनेगा देन, टुडे यस्टरडे कहलायेगा,
आई बी अन होगा डेड, एक्स अननोन बन जायेगा।
कर लो मज़े चार दिन की चांदनी में,
अँधेरा वापस तेरे स्टूडियो में छायेगा।
जब रिपब्लिक आ जायेगा।

जब रिपब्लिक आ जायेगा ।