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Wednesday, July 11, 2018

अश्वत्थामा हतो: का चीत्कार

‌कुरुक्षेत्र में महाभारत के युध्द को शुरू हुए चौदह दिन बीत चुके थे। कौरवों की सेना का नेतृत्व अब गुरु द्रोण कर रहे थे। पितामह भीष्म के शरशय्या पर जाने के बाद पांडवों ने युद्ध को आसानी से जीत लेने का जो स्वप्न देखा था, गुरु द्रोण के रहते वो एक दिवास्वप्न से अधिक कुछ नही था। अर्जुन की गांडीव गुरु द्रोण के बाणों के सामने ऐसे निस्तेज थी जैसे सूर्य के सामने दीपक। ऋषि भरद्वाज के पुत्र और परशुराम के शिष्य द्रोण की रणनीति तथा उनकी रचित सेनाओं की अभेद्य व्यूह रचना का पांडव सेनापति धृष्टद्युम्न के पास कोई तोड़ ना था। पांडवों के पास ऐसी कोई विद्या न थी जिससे वह अपने ही गुरु द्रोण को परास्त कर सकें। युध्द कला में पारंगत वो क्रोधित ब्राह्मण महाभारत के युद्ध को मानो एक ही दिन में समाप्त करने का प्रण ले चुका था।
गुरु द्रोण को सीधे नीतिपरक युध्द में हराना असंभव था। परंतु युद्ध सिर्फ अस्त्र शस्त्र और रणकौशल से रणभूमि में नहीं लड़ा जाता। युद्ध लड़ा जाता है बुद्धि और कूटनीति से। युद्ध लड़ा जाता है छल से। पांडवों ने द्रोण को मारने के लिये छल का सहारा लेने का निर्णय लिया। गुरु द्रोण के मन में अपने पुत्र अश्वत्थामा के लिये जो अत्यधिक प्रेम की दुर्बलता थी, उसी दुर्बलता पर वार करने का निर्णय लिया गया। दुष्प्रचार, अर्धसत्य, और कुटिलता में सनी योजना के तहत धर्मराज युद्धिष्ठिर के द्वारा द्रोण को उनके पुत्र के मारे जाने की असत्य सूचना दी गयी । पुत्रवियोग में शोकाकुल और धरती पर पड़े निःशस्त्र पिता को पीछे से वार कर धृष्टद्युम्न द्वारा मार डाला गया।



‌मार्च के महीने में हज़ारों किसान नासिक से मुम्बई नंगे पांव पैदल चल कर पहुंचे। पूरी मीडिया में किसानों के फटे पांवों की बिवावियाँ दिखा दिखा कर खूब सहानुभूति बटोरी गई। जब वे किसान मुम्बई पहुंचे तो उन्हें पता चला कि उनकी सारी मांगे तो पहले ही मानी जा चुकी हैं। अभी सारे भारत में ऐसे माहौल बनाया जा रहा है कि दलितों और अल्पसंख्यकों पर अत्यााचार बढ़ गए हैं। एक बहुत बड़े वर्ग को यह बार बार बताया जा रहा है कि उनका आरक्षण छीन लिया जाएगा और संविधान बदल कर मनुस्मृति लागू कर दी जाएगी। और यह बातें एक खास बुद्धिजीवियों द्वारा निरंतर अखबार, टीवी और मोबाइल के माध्यम से परोसी जा रही है। एक भय और अराजकता का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। कुछ पत्रकार असुरक्षित महसूस होने का दावा कर रहे हैं, कुछ धर्मगुरु लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए प्रार्थना सभाएं आयोजित कर रहे हैं। हर तरफ़ से अश्वत्थामा हतो: सरीखे चीत्कार सुनाई पड़ रहे हैं।
अगर वास्तव में लोकतंत्र खतरे में होता तो यह सारे लोग इतनी खुल कर अपनी बात न रख पाते। अगर आरक्षण वाक़ई छीना जाने वाला होता, तो उसके लिये सरकार किसी शुभ मुहूर्त का इंतज़ार न कर रही होती। दुष्प्रचार और असत्य आज युद्ध के सबसे बड़े शस्त्र हैं। पहले पूरी दुनिया को बताया जाता है कि इराक में जैविक और रासायनिक हथियारों का जखीरा है। जब पूरे विश्व का इसका विश्वास हो जाता है, तो अमरीकी सेनाएँ बग़दाद में घुस सद्दाम हुसैन का तख्त पलट देती है और सद्दाम को फांसी दे दी जाती है। जैविक और रासायनिक हथियार ना वहां कभी थे और ना कभी मिले। वहां पर तेल भरपूर मात्रा में अवश्य था जिसके लिए वास्तविकता में यह युद्ध लड़ा गया था । आये दिन खबरें आती हैं कि महिला को डायन बात कर मार डाला गया। अधिकतर मामलों में अकेली वृद्ध विधवा महिलाओ की संपत्ति हड़पने का यह एक पुराना तरीका है।
‌द्रोण वध की कथा पुरानी अवश्य है लेकिन आज के समय में प्रासंगिक उतनी ही है जितनी पहले थी। जब भी किसी द्रोण को सीधे युध्द में हराना कठिन प्रतीत होता है, उसे हराने के लिए असत्य और दुष्प्रचार का सहारा लिया जाता है। असत्य फैलाने के लिए पहले किसी निर्दोष अश्वस्थामा हाथी को मारा जाता है और फिर उसकी मौत की खबर को असत्य और अर्धसत्य की चाशनी में लपेट कर फैलाया जाता है। द्रोण को उसके पुत्र की मृत्यु का समाचार ऐसे सुनाया गया था जैसे उनके हितैषी उनके दुख में शामिल होना चाहते हों। लक्ष्य तो था गुरु द्रोण को मानसिक रूप से अक्षम करना ताकि वो युद्धभूमि में सही निर्णय न ले सकें और भावुक हो शस्त्र त्याग दें। और उनका वध करना आसान हो जाये।
आसिफा हो या वेमुला, यह सब उस अश्वस्थामा हाथी ही तरह हैं जिन्हें खास राजनीतिक उद्देश्य से मारा गया है और उनकी मृत्यु का अर्धसत्य आपको सुना कर आपको भावुक और निर्बल किया जा रहा है। किसी भी उत्तेजक और भावुक समाचार को सुन तुरंत निर्णय न लें चाहे आपको वो सूचना उस व्यक्ति से मिल रही हो जिसे आप धर्मराज मानते हैं। झूठ फैलाने के लिए धर्मराजों का ही सहारा लिया जाता है। किसी दुष्प्रचार का शिकार होने से बचें। सूचनाओं को सत्य की कसौटी पर कस कर ही आत्मसात करें। जिस दिन आपसे सत्य पहचानने और उचित निर्णय लेने मे भूल हुई, किसी धृष्टद्युम्न की तलवार आपकी गर्दन पर वार करने के लिए उठ चुकी होगी।

सवालों से आहत न हों,

हस्तिनापुर कीे रंगभूमि में कौरव और पांडव राजकुमारों की शस्त्र कला में अर्जित कौशल का प्रदर्शन चल रहा था। राजकुमार भीम जहाँ अपने गदा कौशल से सबको विस्मित किये हुए थे, वहीँ राजकुमार दुर्योधन के गदा कौशल कीे प्रशंसक समस्त हस्तिनापुर की प्रजा हो गयी थी। विशेषतः राजकुमार अर्जुन की धनुर्विद्या के सभी कायल थे। अर्जुन के रणकौशल की एक बानगी भर देख किसी के मन में कोई संदेह न रहा कि कुंती पुत्र अर्जुन विश्व के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हैं। किंतु ये क्या? एक सामान्य सा युवक जिसके कपडे साधारण थे, किन्तु मुख पर दिवाकर का तेज था, जिसकी आँखें विनम्रता का भाव तो दिखलाती थी, परंतु उसके कवच और कुंडल इस बात का प्रमाण थे कि युद्ध में इसे हराना अत्यंत दुरूह होगा। कर्ण नाम का यह युवक अकेला खड़ा रंगभूमि में अर्जुन को ललकार रहा था। उसकी बस एक ही मांग थी कि अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर घोषित करने से पूर्व उसे एक बार अपनी धनुर्विद्या का प्रदर्शन करने दिया जाए। 


गुरु द्रोण और कृपाचार्य की अनुभवी आँखें यह परख चुकी थीं कि कर्ण कोई साधारण योद्धा नहीं बल्कि अर्जुन से भी प्रवीण धनुर्धर है। एक साधारण युवक से कुंतीपुत्र अर्जुन की हार उन्हें कतई स्वीकार्य ना थी। उन्होंने कर्ण को प्रदर्शन से रोकने के लिए एक युक्ति निकाली। उन्होंने कर्ण को पूछा कि युद्ध करने से पूर्व वो अपनी जाति बताये और यह प्रमाणित करे कि वह एक आर्य पुत्र क्षत्रिय है। कर्ण ने आग्रह किया कि उसकी जाति का रण कौशल से क्या लेना देना। सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कौन है इस बात का फैसला धनुष बाण से होना चाहिए ना कि उसकी जाति, कुल, उपनाम से। कर्ण को सूतपुत्र कह रणकौशल के प्रदर्शन से भले ही रोक दिया गया किन्तु रंगभूमि में उपस्थित प्रत्येक हस्तिनापुर वासी यह जान गया कि कदाचित सूर्यपुत्र राधेय कर्ण पाण्डुपुत्र अर्जुन से बड़ा धनुर्धर है। कर्ण को सूतपुत्र कह पुकारने से उसकी धनुर्विद्या कम नहीं हुई बल्कि जनमानस में यह बात फ़ैली कि कर्ण को रोकने के लिये राजगुरुओं ने अनैतिक तरीकों का सहारा लिया।

इस कथा को वर्तमान राजनैतिक और सामजिक परिपेक्ष्य में देखें तो यह कथा अत्यंत ही प्रासंगिक है। बहुधा ऐसा देखा जाता है कि कोई न कोई सूतपुत्र आकर एक व्यवस्था को ललकारता है। कोई राधेय आकर कुछ ऐसे प्रश्न पूछता है जो सत्ता में बैठे लोगों को सहज प्रतीत नहीं होती। कोई कर्ण आ जाता है जिसके तर्क के बाण व्यवस्था के अहंकार और दम्भ की छाती में जा चुभते हैं।
और जब समाज, व्यवस्था उन असहज सवालों से बिफर पड़ता है तो कर्ण को रोकने को कोशिश की जाती है। उसके तर्क को सुने बिना उसे सूत पुत्र कह अपमानित किया जाता है। उसकी धनुर्विद्या नहीं उसकी जाति की चर्चा की जाती है ताकि व्यवस्था के अर्जुन की तथाकथित सर्वश्रेष्ठता बनी रहे।

अमेरिका के इसबार के चुनाव को ही लें, डोनाल्ड ट्रम्प ने व्यवस्था पर कुछ असहज सवाल उठाये। वहां की जनता को भी लगा कि यह सवाल पूछे जाने चाहिए। लेकिन व्यवस्था ने क्या किया, उन सवालों के जवाब देने के बजाय ट्रम्प को अपमानित करना शुरू किया। उसके समर्थकों को निकृष्ट और घिनौने की उपाधि तक दे दी गयी। व्यवस्था ने हर वो कोशिश की जिससे ट्रम्प और उसके समर्थक अपमानित हों लेकिन उनके प्रश्नों का उत्तर देने की कोशिश नहीं की। शायद व्यवस्था के पास उनका कोई जवाब था भी नहीं। एक प्रेसवार्ता के दौरान एक छात्रा द्वारा पूछे गए एक सवाल से ममता बनर्जी इतनी असहज हो गयी कि उस छात्रा को माओवादी, नक्सली और विरोधी पार्टी का बता दिया। किन्तु उसके सवाल का उत्तर नहीं दिया। शायद उस प्रश्न का उत्तर उनके पास नहीं था, इसीलिए सवाल पूछने वाले की प्रामाणिकता पर ही सवाल उठा दिये गए।
आप तुष्टीकरण पर सवाल उठाओ तो हिन्दू धर्मांध कह दिए जाते हो। आप सरकार की नीतियों पर सवाल उठाओ तो राष्ट्रविरोधी कह दिए जाते हो। मुस्लिम हितों के मुद्दे उठाने वाले जिहादी कह दिए जाते हैं और आदिवासियों की बात करने वाले नक्सली।
अगर आप सवाल पूछ रहे हैं और आपको नाम दिए जा रहे हैं तो समझ लीजिए कि आप वह राधेय हैं और व्यवस्था के पास आपके प्रश्नों का जवाब नहीं है। अगर आप किसी के असहज सवालों का उत्तर न देकर उसे अपमानित कर रहे हैं तो आप वह व्यवस्था हैं जो एक कर्ण की चुनौती से घबरा गया है। आप निश्चिन्त रहे कि वह रश्मिरथी आपके तम के साम्राज्य पर भारी पड़ेगा।

हर कोई कभी कर्ण होता है, तो कभी अर्जुन और तो कभी व्यवस्था रुपी द्रोण। अगर आप कर्ण हैं तो अपना संघर्ष जारी रखें। अगर आप अर्जुन और द्रोण हैं तो जानलें कि इतिहास आपकी विजय को पराजय से भी निकृष्ट मानेगी।

यह भी हो सकता है कि आप न तो कर्ण हैं, ना अर्जुन और ना द्रोण। इसका अर्थ है कि आप रंगशाला में बैठी हस्तिनापुर की जनता हैं। आप अगर किसी कर्ण के साथ हुए अपमान को देख चुप हैं, तटस्थ हैं तो समझ लें कि कुरुक्षेत्र के अवश्यम्भावी युद्ध में आपका भी विनाश निकट है। जरूरत है कि आप कर्ण के सवालों से आहत न हों, उसे अपमानित न करें। उसका साथ दें, महाभारत का विनाशकारी युद्ध रोकने का यही एक उपाय है।

एक ठो लभर बॉय रहिन नाम रहे शांतनु

बहुते साल पहले एक ठो लभर बॉय रहिन नाम रहे शांतनु। भाई साब के माथे पर इशक के भूत ए तरीके से छैले रहे कि कोनों भी मौड़ीयन के देख पसर जैहियेण बस। बस कैसो करके कौनो मौड़ी टांका भिराबै खातिर मान जाए तो लाइफे सेट हो जाई, यही सोच डेली डेली नदी किनारे शिकार पर निकल जैहैं। एक दिन का देखें कि एक ठो बहुते जबरदस्त टाइप मौड़ी नदी किनारे खड़ी रहें। फिर का? फिसल गेलै भाई साब बिना बरसात के। जाके लड़किन को बोलें कि हमरे साथ बियाह रचाई लियो तो तुम्हरी लाइफ बना देंगे। पैसा कौड़ी ज़मीन जायदाद हेरा जवाहरात की कौनो कमी तो थी नहीं लौंडे के पास। देखे में शांतनु भी उ दिन मस्त राजकुमार टाइप लग रैलहै थे। बस बिल्ली के भाग से छीका गया टूट। लड़की मान ता गइली लेकिन एक ठो शर्त रख दीहिस। शर्त इ की आप हमको कभियो किसी बात पर टोकेंगे नहीं, रोकेंगे नहीं। जै दिन टोका, वै दिन चल देंगे हम छोड़ छाड़ के और रह जइयो फिर अकेले। शांतनु मन में विचार करिहें कि ऐसी सुन्दर लुगाई को काहेे ला टोकेंगे। इ मान जाये बस। बिना सोचे समझे हाँ कह दिये भाई साब और गंगा भाभी को ले घर को आ गये। 



फिर तो भाई साब के मजे ही मजे। भाई साब की मेहनत लायो रंग और गंगा भाभी के पाँव हो गियो भारी। एक साल के भीतर एक बेटा भी हुओ । इससे पहले कि शांतनु बाबू मुँह मीठा करवाते सबका, गंगा भाभी बचवन को जाके फेंक आयी पानी में। शांतनु बस कसमसा के रह गइनी। का करते..वादा कर चुके थे कि कभियो किसी बात पर न टोकेंगे। कहीं भाभी छोड़ के गयी तो बचवा तो गया ही लुगाई भी चल देगी। लभर बॉय कितने दिन उदास रहते, कुछे दिन दुःख में गुजारे, फिर खो गए भाभी के प्यार में। अगले साल फिर एक बेटा। भाभी एहो बार बचवन के पानी में बहा आयी। उसके बाद फेर तो इ स्कूल के एनुअल फंक्शन हो गइनी। हर साल भाई साब मेहनत करते, भाभी मेहनत पे पानी फेर आती। सात साल ऐसे ही चलयो। आठवें साल फिर से एक बेटा हुआ, और भाभी जी ले के चल दी बचवे को नदी में बहाने। अबकी बार भैया रोक नहीं पाये अपन को और बोले । बहुत हो गया तुम्हार खेला। अबकी बार बचवे की जान न लेने देंगे। लवर बॉय से पूरा एंग्री यंग मैन बन गए रहैं भाई साब। भाभी भी कोई कच्ची खिलाडन थोड़े न थी। बोली अब तुमसे निबाह न हो पायेगा। हमरी शर्त तोड़ी, हम रिश्ता ही तोड़ के जा रहे हैं। चलो इस बेटे को न मारेंगे, लौटा देंगे तुमको इसको पाल पोस के। इ कह के गंगा भाभी चल दिहिस और हमारे लवर बॉय बन गयो देवदास ।

फिर तो भाई साब 15-20 साल हाथ पैर समेट राज काज पर ध्यान देते रहें फिर एक दिन गंगा भाभी आठवें बेटे को लौटाबे खातिर प्रकट भई । बोलीं की इ लो अपना बेटा देवव्रत। भाई साब खूब कोशिस कर लस कि कैसो से भाभी भी रुक जाये, लेकिन उ हो न सका। भाभी शांतनु भैया के दिल फेर से तोड़ के चल दीं।

भाभी को देख भैया भीतरे भीतर फेर जवान हो गइलस। आखिर घास कब तक ज़मीन के भीतर पड़ल रहें, बारिश को दू बूँद पड़े नहीं कि बढ़ जाऐं हरहरा के। फेर से वही नदी किनारे मटरगश्ती वाली आदत शुरू कर देलस। एक दिन का देखे, कि एक सुन्दर मौड़ी खड़ी है नाव लेके। भाई साब उसके नाव पे का बैठे, डूब गए मौड़ीयन के आँखों में। जाके उसके बाप से बोले कि अपनी लड़की सत्यवती का बियाह हमसे कर दो , तुम्हरी और तुम्हरी बेटी दोनों की लाइफ सेट कर देंगे। पहले तो बुढऊ बाप बड़ी माई बाप करलस की हमरे भाग खुल गए और फलाना ढिमका। इससे पहले की अपने लवर बॉय मन में फूटे लड्डू खा पाते, बुढऊ रख दिहिस एक शर्त। शर्त इ की आपका बेटा देवव्रत राजा न बनिहैं, राजा बनिहैं तो हमार नाती। इ शर्त सुन लवर बॉय समझ गये की लड्डू हाथ तो आया पर मुंह न आया। मन में सोचे कि शर्त मानने वाली बात अब न मानेंगे। पर का करें किस्मते लिखी गयी है हमरी गधे की कलम से, बिना शर्त कोई मौड़ी हां ही ना बोलती। बोले इ शर्त हम न मान सकते, और कह के लौट आये।

पर फेर से वही सत्यवती की याद में मुंह लटकाय के घर में बैठे रहें अपने भाई साब। बेटवा भी जवान हो गये रहें, समझ गइनी कि बापू फेर से कहीं फिसल गए हैं। ज्यादा काबिल बनै के चक्कर में पहुच गए अपने ही बाप के लगन लेकर बुढऊ और सत्यवती के पास। बुढऊ समझ गइनी कि लौंडा जवानी के जोश में कुछो दे बैठेगा। बेचारे नए लौंडे से कहलवा लिया कि ऊ ज़िन्दगी भर कुंवारे रहेगा औ कुंआरे ही मरेगा। देवब्रत अपन बाप लवर बॉय के लिए नयी लुगाई ले अइ लस तो बाप भी थोड़ी देर खातिर खूब आशिरबाद वगैरह दिहिस कि खूबे ज़िंदा रहो लेकिन फिर अपनी नयी बीवी के साथे अपने पुराने दिन गुज़ारने लगिस।

ऐ लंबी लवर बॉय कहानी से दू ठो बतवा समझे के हइ । पहला इशक लडैयो लेकिन थोड़ा लिमिट में रह के। इतना जरूर ध्यान रखियो की अपने ही हिस्से का इश्कबाज़ी करे न की बेटवा के हिस्से की इश्कबाज़ी भी खुदे कर जइयो। दूसरा इ की इश्कबाज़ी के चक्कर में लड़की पावे खातिर जो सो बात पर हाँ न कर दियोे। वरना होगा इ की आप तो मस्ती करके निकल लोगे और आपका बेटवा बिना बाप बने ही ज़िंदगी भर पितामह पितामह कहलैतै रहीं। मतलब इ की खाया न पिया गिलास तोडिस दस हज़ार का।सावधानी हटी दुर्घटना घटी। बाकी आप खुदे समझदार हो। हाँ हैप्पी वाला वैलेंटाइन डे तो बोलना भूलिये गये। लगता है बूढ़ा रहे है ससुरा।

आपका निर्वाण युद्ध में ही निहित है।

कुरुक्षेत्र के मैदान में अपने सामने खड़े युद्ध को आतुर परिजन और बंधु बांधवों को देख पार्थ निराश हो गये। समस्त आशंकाओं से बोझिल मानस पटल पर अनिर्णय के घने बादल छा गये। आशंकित मन ने शरीर को निस्तेज कर दिया और सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर के लिये भी गांडीव को धारण करना दुरूह हो गया। जीवन में ध्येय और मार्ग दोनों धूमिल से हो गये। मेरा लक्ष्य क्या है और उसकी प्राप्ति के लिए कौन सा मार्ग उचित है कौन सा अनुचित , ऐसे प्रश्नों के उत्तर न पा अर्जुन अपने आप को असहाय महसूस करने लगे।

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान देकर अर्जुन को इस आशंका से निकाला। क्या भगवान ने अर्जुन को युद्ध में जीत का आश्वासन दिया? क्या श्रीकृष्ण ने पार्थ को युद्ध में सहयोग का वचन दिया? नहीं। उन्होंने पार्थ को सिर्फ उसके कर्म करने की सलाह दी। वासुदेव द्वारा जीत का आश्वासन फल प्राप्ति का पूर्वानुमान होता, और सहयोग का वचन युद्ध नीति के विपरीत । यह अर्जुन का युद्ध था और उसे ही लड़ना था।

बहुधा हम अपने आप को पार्थ जैसी परिस्थितियों में पाते हैं। जीवन युद्ध में आप आशंकाओं से घिरे होने पर या तो फल का पूर्वानुमान करने की कोशिश करते हैं या किंकर्तव्यविमूढ़ हो उचित अनुचित का अत्यधिक विश्लेषण करने लगते हैं। ऐसे में आपको जरूरत होती है एक कृष्ण की जो आपके लिए अस्त्र तो नही उठाता पर आपको अस्त्र उठाने के लिए तैयार जरूर करता है। परिणाम का पूर्वानुमान लगाने की जगह कर्म करने की सलाह देता है।

अगर आप युद्ध में खड़े हैं तो इसका अर्थ है कि युद्ध तो होना है। और अगर युद्ध होना है तो परिणाम भी आना है। आप युद्ध नहीं टाल सकते क्योंकि भले ही आपको लगे कि युद्ध अनुचित है आपकी इच्छा के अनुरूप नही है, लेकिन यह युद्ध भी आपकी पिछले कर्मों का परिणाम है। आपके द्वारा लिए गए निर्णय और किये गये कर्मों की परिणीति आपके सामने युध्द बन खड़ी है। युद्ध आपकी नियति नहीं आपकी सिद्धि है। गांडीव उठा युद्ध करना अपने कर्मों को स्वीकृति प्रदान करना है। युद्ध में हार मान लेना अपने कर्मों की जिम्मेदारी से दूर जाना है। हार जीत की चिंता से परे , अपने संदेहों की घटा से निकल अपने पूर्णमनोबल के साथ वार करना ही आपका अपने प्रति न्याय है। अगर आपके साथ कृष्ण जैसे सहायक हैं तो आपका सौभाग्य है और आपके पूर्व कर्मो का परिणाम है। जीवन वो कथा है जिसकी पटकथा आपने लिखी है और आप ही उसके नायक हैं।

‌अच्छी बात यह है कि पठकथा का अंत अभी भी लिखा जाना बाकी है। अभी चल रहे कथानक के परिपेक्ष्य से पटापेक्ष का अनुमान लगाना व्यर्थ है। घर को छोड़ कर भाग जाने वाले आगे चल बुद्ध बन गए हैं और किन्नर शिखंडी ने महाप्रतापी भीष्म को शरशैय्या पर लिटा दिया है। आप अर्जुन की तरह निराश हों, बुद्ध की तरह पलायनवादी दिख रहे हों या अम्बा की तरह तिरस्कृत हो रहे हों, आपका निर्वाण युद्ध में ही निहित है।

दुष्प्रचार, अर्धसत्य, और कुटिलता

‌कुरुक्षेत्र में महाभारत के युध्द को शुरू हुए चौदह दिन बीत चुके थे। कौरवों की सेना का नेतृत्व अब गुरु द्रोण कर रहे थे। पितामह भीष्म के शरशय्या पर जाने के बाद पांडवों ने युद्ध को आसानी से जीत लेने का जो स्वप्न देखा था, गुरु द्रोण के रहते वो एक दिवास्वप्न से अधिक कुछ नही था। अर्जुन की गांडीव गुरु द्रोण के बाणों के सामने ऐसे निस्तेज थी जैसे सूर्य के सामने दीपक। ऋषि भरद्वाज के पुत्र और परशुराम के शिष्य द्रोण की रणनीति तथा उनकी रचित सेनाओं की अभेद्य व्यूह रचना का पांडव सेनापति धृष्टद्युम्न के पास कोई तोड़ ना था। पांडवों के पास ऐसी कोई विद्या न थी जिससे वह अपने ही गुरु द्रोण को परास्त कर सकें। युध्द कला में पारंगत वो क्रोधित ब्राह्मण महाभारत के युद्ध को मानो एक ही दिन में समाप्त करने का प्रण ले चुका था।

गुरु द्रोण को सीधे नीतिपरक युध्द में हराना असंभव था। परंतु युद्ध सिर्फ अस्त्र शस्त्र और रणकौशल से रणभूमि में नहीं लड़ा जाता। युद्ध लड़ा जाता है बुद्धि और कूटनीति से। युद्ध लड़ा जाता है छल से। पांडवों ने द्रोण को मारने के लिये छल का सहारा लेने का निर्णय लिया। गुरु द्रोण के मन में अपने पुत्र अश्वत्थामा के लिये जो अत्यधिक प्रेम की दुर्बलता थी, उसी दुर्बलता पर वार करने का निर्णय लिया गया। दुष्प्रचार, अर्धसत्य, और कुटिलता में सनी योजना के तहत धर्मराज युद्धिष्ठिर के द्वारा द्रोण को उनके पुत्र के मारे जाने की असत्य सूचना दी गयी । पुत्रवियोग में शोकाकुल और धरती पर पड़े निःशस्त्र पिता को पीछे से वार कर धृष्टद्युम्न द्वारा मार डाला गया।

‌मार्च के महीने में हज़ारों किसान नासिक से मुम्बई नंगे पांव पैदल चल कर पहुंचे। पूरी मीडिया में किसानों के फटे पांवों की बिवावियाँ दिखा दिखा कर खूब सहानुभूति बटोरी गई। जब वे किसान मुम्बई पहुंचे तो उन्हें पता चला कि उनकी सारी मांगे तो पहले ही मानी जा चुकी हैं। अभी सारे भारत में ऐसे माहौल बनाया जा रहा है कि दलितों और अल्पसंख्यकों पर अत्यााचार बढ़ गए हैं। एक बहुत बड़े वर्ग को यह बार बार बताया जा रहा है कि उनका आरक्षण छीन लिया जाएगा और संविधान बदल कर मनुस्मृति लागू कर दी जाएगी। और यह बातें एक खास बुद्धिजीवियों द्वारा निरंतर अखबार, टीवी और मोबाइल के माध्यम से परोसी जा रही है। एक भय और अराजकता का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। कुछ पत्रकार असुरक्षित महसूस होने का दावा कर रहे हैं, कुछ धर्मगुरु लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए प्रार्थना सभाएं आयोजित कर रहे हैं। हर तरफ़ से अश्वत्थामा हतो: सरीखे चीत्कार सुनाई पड़ रहे हैं।

अगर वास्तव में लोकतंत्र खतरे में होता तो यह सारे लोग इतनी खुल कर अपनी बात न रख पाते। अगर आरक्षण वाक़ई छीना जाने वाला होता, तो उसके लिये सरकार किसी शुभ मुहूर्त का इंतज़ार न कर रही होती। दुष्प्रचार और असत्य आज युद्ध के सबसे बड़े शस्त्र हैं। पहले पूरी दुनिया को बताया जाता है कि इराक में जैविक और रासायनिक हथियारों का जखीरा है। जब पूरे विश्व का इसका विश्वास हो जाता है, तो अमरीकी सेनाएँ बग़दाद में घुस सद्दाम हुसैन का तख्त पलट देती है और सद्दाम को फांसी दे दी जाती है। जैविक और रासायनिक हथियार ना वहां कभी थे और ना कभी मिले। वहां पर तेल भरपूर मात्रा में अवश्य था जिसके लिए वास्तविकता में यह युद्ध लड़ा गया था । आये दिन खबरें आती हैं कि महिला को डायन बात कर मार डाला गया। अधिकतर मामलों में अकेली वृद्ध विधवा महिलाओ की संपत्ति हड़पने का यह एक पुराना तरीका है।

‌द्रोण वध की कथा पुरानी अवश्य है लेकिन आज के समय में प्रासंगिक उतनी ही है जितनी पहले थी। जब भी किसी द्रोण को सीधे युध्द में हराना कठिन प्रतीत होता है, उसे हराने के लिए असत्य और दुष्प्रचार का सहारा लिया जाता है। असत्य फैलाने के लिए पहले किसी निर्दोष अश्वस्थामा हाथी को मारा जाता है और फिर उसकी मौत की खबर को असत्य और अर्धसत्य की चाशनी में लपेट कर फैलाया जाता है। द्रोण को उसके पुत्र की मृत्यु का समाचार ऐसे सुनाया गया था जैसे उनके हितैषी उनके दुख में शामिल होना चाहते हों। लक्ष्य तो था गुरु द्रोण को मानसिक रूप से अक्षम करना ताकि वो युद्धभूमि में सही निर्णय न ले सकें और भावुक हो शस्त्र त्याग दें। और उनका वध करना आसान हो जाये।

आसिफा हो या वेमुला, यह सब उस अश्वस्थामा हाथी ही तरह हैं जिन्हें खास राजनीतिक उद्देश्य से मारा गया है और उनकी मृत्यु का अर्धसत्य आपको सुना कर आपको भावुक और निर्बल किया जा रहा है। किसी भी उत्तेजक और भावुक समाचार को सुन तुरंत निर्णय न लें चाहे आपको वो सूचना उस व्यक्ति से मिल रही हो जिसे आप धर्मराज मानते हैं। झूठ फैलाने के लिए धर्मराजों का ही सहारा लिया जाता है। किसी दुष्प्रचार का शिकार होने से बचें। सूचनाओं को सत्य की कसौटी पर कस कर ही आत्मसात करें। जिस दिन आपसे सत्य पहचानने और उचित निर्णय लेने मे भूल हुई, किसी धृष्टद्युम्न की तलवार आपकी गर्दन पर वार करने के लिए उठ चुकी होगी।

मीडिया के अर्धसत्य

मानव इतिहास में सन्देश और सन्देश वाहकों का एक अलग स्थान रहा है। रोमन इतिहास में फिलिपेडस का नाम सर्वदा सम्मान से लिया जाता है जिसने मैराथन के युद्ध में रोमन विजय की सूचना एथेंस तक पहुंचायी थी। विजय का यह शुभ सन्देश पहुँचाने के क्रम में फिलिपेडस वीरगति को प्राप्त हुआ और उसकी इस साहसिक कार्य को हमेशा मैराथन दौड़ के रूप में याद किया जाता है। महाकवि कालिदास के मेघदूत में नायक यक्ष अपनी पत्नी अलका को सन्देश भेजने के लिये बादलों को संदेशवाहक बनाता है। भगवान श्रीकृष्ण भी कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले पाण्डव का मैत्री सन्देश लेकर हस्तिनापुर आते हैं।
मैत्री की राह बताने को सबको सुमार्ग पर लाने को दुर्योधन को समझाने को भीषण विध्वंस बचाने को भगवान हस्तिनापुर आये पाण्डव का संदेशा लाये।
महान अशोक के शांति और प्रेम का सन्देश लेकर उनके पुत्र महेंद्र और तनुजा संघमित्रा श्रीलंका के राजा के पास जाने का वर्णन भारतीय इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। श्रीलंका में भगवान बुद्ध के विचारों को पहुँचाने में संदेशवाहक महेंद्र का योगदान अतुल्य है। संदेश और संदेशवाहक इतने सार्वभौमिक है कि कुछ प्राणी जैसे कबूतर तो संदेशवाहक का पर्याय तक बन गए हैं। कबूतरों ने न जाने कितने प्रेमी युगलों की प्रेम की पाती को उनके प्रिय को पहुँचाया है।
उपर के कुछ उदाहरण यह प्रमाण हैं कि संदेशवाहक न केवल अनादिकाल से महत्वपूर्ण हैं अपितु अपरिहार्य हैं। इस हिसाब से देखा जाए तो संदेशवाहकों का सम्मान किसी से कमतर कर आंकना एक भूल होगी। फिर बार बार यह क्यों सुनने को मिलता है कि संदेशवाहक को मत मारो, दूत को मत मारो, डोंट शूट द मेसेंजर। ख़ासकर वर्तमान समय में इसका प्रयोग काफी होने लगा है। यह दिलचस्प है कि इसका वाक्य का प्रयोग आजकल के संदेशवाहक अर्थात मीडिया वाले सबसे ज्यादा करते हैं।
तो ऐसा क्या हो गया कि महेंद्र, मेघदूत, फिलिपेडस , श्रीकृष्ण के उत्तराधिकारी संदेशवाहकों को ऐसा डर सताने लगा कि कोई उन्हें मार डालेगा। संदेशवाहक मीडिया आजकल अपनी सुरक्षा को लेकर इतना चिंतित क्यों है? आखिर सन्देश पाने वाले भी सन्देश वाहकों से आशंकित क्यों हैं? जिस भूमिका को भगवन श्रीकृष्ण स्वयं खुद निभा चुके हैं उसी भूमिका में लोग अब क्यों कहते हैं कि उनको निशाना न बनाया जाए? फिलिपेडस जैसे शहीद संदेशवाहक के उत्तराधिकारी आज बलि के बकरे की तरह मिमियाते क्यों नज़र आते हैं?
संदेशवाहक का कार्य है सन्देश पहुँचाना। इस वाक्य को फिर से पढ़ें। सन्देश वाहकों का कार्य है सन्देश पहुँचाना। बस इतना सा साधारण काम!! यह आपकी प्रतिक्रिया हो सकती है। लेकिन यह कार्य इतना साधारण नहीं है, क्योंकि संदेशवाहक भी मनुष्य होते हैं, अतएव मानव सुलभ कमजोरियों से परे बिलकुल नहीं हैं। एक बूढी विधवा को पत्र पढ़कर सुनाता डाकिया क्या अपनी भावनाओं पर काबू रख सकता है अगर उसमें उसके पुत्र के सीमा पर मारे जाने की बात लिखी हो? यह स्वाभाविक है कि डाकिया भावुक हो, लेकिन उसका यह कर्तव्य है कि वह अप्रिय ही सही किन्तु वह सन्देश पहुंचाए। बिना अपमान के भय के। पुत्र के नौकरी लगने की खबर भी अगर पत्र में लिखी है तो डाकिये को बिना किसी उपहार की अपेक्षा में वह खबर सुनानी चाहिए।
लेकिन कभी कभी ऐसा हो नहीं पाता है। निजी स्वार्थ, भय, अपमान, द्वेष और घृणा संदेशवाहक के सन्देश पहुँचाने के कार्य में बाधक होते हैं। संदेशवाहक सन्देश को पूरी तरह सत्य रूप में न पहुंचा अर्धसत्य के रूप में पहुंचाता है। और इसके विनाशकारी परिणाम होते हैं। धर्मराज युद्धिष्ठिर का गुरु द्रोण को ' अश्वस्थामा हतो' वाला सन्देश ऐसा ही एक अर्धसत्य था जिसकी परिणीति एक शिष्य द्वारा अपने गुरु की छल पूर्वक हत्या से हुई। आप चाहे ऋषि ही क्यों न हो अगर आप सन्देश पहुँचाने में पूर्ण रूप से ईमानदार नहीं है तो आपकी विश्वसनीयता नारद की तरह ही होगी। फिर चाहे आप हरेक क्षण प्रभु नारायण का जाप ही क्यों न करें।
आज का मीडिया ऐसे ही दुविधा से गुज़र रहा है। सन्देश पहुँचाने का कार्य निज स्वार्थ, प्रलोभन , घृणा और द्वेष से प्रभावित हो रहा है। सत्य नग्न ही सुन्दर रहता है, स्वार्थ का जामा पहना सत्य सत्य न रह अर्ध सत्य बन जाता है। स्वार्थ का जामा कितना भी धोया जाये, षड़यंत्र की गंध उससे जाती नहीं। एक अर्धसत्य बोलने पर अगर धर्मराज का स्वर्ग छिन सकता है तो दिन रात असत्य का प्रचार कर आप सम्मान की आशा नहीं रख सकते।
आवश्यक है कि सन्देश वाहक मीडिया अपने इतिहास का फिर से पुनरीक्षण करे, अपनी गलतियों से सीखे ताकि उसे पुनः वही भरोसा फिर से प्राप्त हो जो एक बुढ़िया को अपने गांव के डाकिए पर होता है। यह मार्ग आसान नहीं है पर संभव है। संभव ही नहीं बल्कि अत्यंत आवश्यक है। मीडिया की पहुँच हर आदमी तक है। यह वह कुआँ है जिससे हर कोई पानी भरता है। इस कुएं में गंदगी गिरेगी तो पूरा समाज बीमार पड़ जाएगा।जब मीडिया की विश्वसनीयता कम होती है तो अफवाहों का दौर शुरू हो जाता है। अफवाह और जंगल की आग एक ही चीज़ है जिसका एक ही परिणाम है .. विनाश।
मीडिया के लिए स्वतंत्र होना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए मीडिया और मीडिया कर्मियों को निश्चय ही कठिनाइयों का मार्ग चुनना पड़ेगा। अब यह हमारी मीडिया पर निर्भर करता है कि वह उस स्वतंत्र जंगली चीते की ज़िन्दगी चुनता है जिसे शायद कई दिनों तक भूखा रहना पड़े पर जिसकी गति और चाल लोगों में धाक जमाती है । या उस परतंत्र कुत्ते की ज़िन्दगी चुनता है जिसे सुबह शाम बैठे बिठाये खाना मिलता है , वातानुकूलित कार की सवारी मिलती है लेकिन गले में एक पट्टा डालना पड़ता है। अगर संदेशवाहक अपने कार्य को ईमानदारी से करें तो शायद डोंट शूट द मेसेंजर कहने की जरूरत कम हो जायेगी। ईमानदार पत्रकार क्लार्क केंट की तरह होता है। सुपर मैन का सौम्य रूप। और दुनिया जानती है कि क्लार्क केंट हो या सुपरमैन, गोलियां दोनों पर असर नहीं करती।