देखा मैंने अनगिनत बगुलों को
सड़क किनारे खड़े कदंब के वृक्ष पर।
वे चहक रहे थे,
मानो कर रहे हों दिन का स्वागत।
जैसे कह रहे हों—
कितना सुहाना है यह दिन,
आज सूर्य की किरणें कुछ अधिक उजली हैं,
हवा की चाल कुछ अधिक तीव्र,
और उसमें घुली नमी भी कुछ अधिक है।
मानो उन्हें आभास हो
कि मानसून आने वाला है—
प्रणय का वह मधुर काल,
जो भर देगा आकाश को
नवजात विहंगों के कल्लोल से,
और नई पीढ़ी के
नव उन्मेष से।
और उधर मैं बैठा हूँ
चाय की एक दुकान पर,
हाथ में आज का अख़बार लिए।
उसमें छपा है—
शहर का होने वाला है विकास,
सड़क होने वाली है और चौड़ी,
और काटे जाने वाले हैं
सड़क किनारे खड़े
सभी वृक्ष।
बगुले अब भी चहक रहे हैं—
अनजान इस समाचार से,
कि जिन शाखाओं पर बैठकर
वे मानसून के गीत गा रहे हैं,
वे शाखाएँ शायद
अगला मानसून देख ही न सकें।