Thursday, June 18, 2026

जब तक स्वप्न है

जानता हूँ—

यह पगडंडी
क्षितिज तक नहीं जाती,
किसी मोड़ पर
अचानक खो जाएगी
और बाकी रह जाएगा
सूखी घास और काँटों से
आच्छादित मैदान जिस पर
चलना संभव नहीं।

जानता हूँ—

यह हाथों में हाथ
सदैव नहीं रहेगा,
समय की नदी
हमारे बीच भी
एक दिन अपना जल भर देगी
और बिठा देगी हमें दो सुदूर किनारों पर
जहाँ से तैर कर आना संभव नहीं।



फिर भी,

क्या इसी कारण
इस स्पर्श की ऊष्मा से
अपने हाथ खींच लूँ?

क्या इस भय से
कि संध्या उतरनी ही है,
मैं प्रभात का स्वागत न करूँ?

प्रेम का अर्थ
अनंत का अधिकार नहीं,
क्षण का संपूर्ण स्वीकार है।

जो फूल
एक ही दिन में झड़ जाता है,
उसकी सुगंध
क्या कम सत्य होती है?

जो तारा
पल भर को टूटता हुआ दिखे,
क्या उसकी चमक
आकाश को जगमग नहीं करती?

एक क्षण का मिलना भी
अपने आप में एक पूर्णता है,
भले ही उसके चारों ओर
विरह की काली रेखाएँ
पहले से खींची जा चुकी हों,
जैसे ग्रहण ग्रस चुका हो सूर्य को—

लेकिन ग्रहण लगा सूर्य भी
सूर्य ही रहता है।

मैं भविष्य के शोक में
वर्तमान का उत्सव
क्यों खो दूँ?

मैं उस दिन के आँसू
आज ही क्यों रो लूँ,
जो अभी आया नहीं?

जीवन भी तो
कुछ ऐसा ही है।

हम सब जानते हैं
कि अंत में
मृत्यु की निस्तब्ध बाँहें
प्रतीक्षा कर रही हैं;

पर क्या इस ज्ञान से
वसंत कम हरा हो जाता है?

क्या बच्चे की हँसी
कम निर्मल हो जाती है?

क्या नदी
समुद्र तक पहुँचने के भय से
बहना छोड़ देती है?

जीवन इसलिए सुंदर नहीं
कि वह शाश्वत है,
वह इसलिए सुंदर है
कि वह क्षणभंगुर है।

यह जानते हुए भी
कि सब कुछ छूट जाएगा,
किसी को
अपने भीतर
इतनी जगह दे देना
कि उसके जाने के बाद भी
वह बना रहे—

शायद यही जीवन है


जीवन स्वयं उस रिक्ति का नाम है
जो आरंभ से ही
अपने अंत को
साथ लेकर चलती है?

मैं नहीं जानता।

मैं अब भी खड़ा हूँ—

एक दोराहे पर।

एक ओर
स्पर्श की ऊष्मा।

एक ओर
वियोग की छाया।

सामने—

अनंत विचारों का सागर।

दूर तक फैला हुआ।

अथाह।

अनिर्णीत।

लहरों पर तैरते
असंख्य प्रश्न।

प्रश्नों के भीतर
और प्रश्न।

और मैं—

न आगे बढ़ता हूँ,

न लौट पाता हूँ।

बस देखता हूँ—

उस धुँधले क्षितिज की ओर

जहाँ शायद कोई उत्तर है,

या शायद

केवल एक और प्रश्न।

Tuesday, June 2, 2026

बगुलों का मानसून



 देखा मैंने अनगिनत बगुलों को
सड़क किनारे खड़े कदंब के वृक्ष पर।
वे चहक रहे थे,
मानो कर रहे हों दिन का स्वागत।

जैसे कह रहे हों—
कितना सुहाना है यह दिन,
आज सूर्य की किरणें कुछ अधिक उजली हैं,
हवा की चाल कुछ अधिक तीव्र,
और उसमें घुली नमी भी कुछ अधिक है।

मानो उन्हें आभास हो
कि मानसून आने वाला है—
प्रणय का वह मधुर काल,
जो भर देगा आकाश को
नवजात विहंगों के कल्लोल से,
और नई पीढ़ी के
नव उन्मेष से।

और उधर मैं बैठा हूँ
चाय की एक दुकान पर,
हाथ में आज का अख़बार लिए।

उसमें छपा है—
शहर का होने वाला है विकास,
सड़क होने वाली है और चौड़ी,
और काटे जाने वाले हैं
सड़क किनारे खड़े
सभी वृक्ष।
बगुले अब भी चहक रहे हैं—
अनजान इस समाचार से,
कि जिन शाखाओं पर बैठकर
वे मानसून के गीत गा रहे हैं,
वे शाखाएँ शायद
अगला मानसून देख ही न सकें।