Wednesday, May 27, 2026

खाली आदमी की खलिश

कहा गया है — “व्यस्त रहें, मस्त रहें।”
यह वाक्य भारतवर्ष में उतना ही लोकप्रिय है जितना चुनाव के समय “विकास” शब्द और सुन्दर सुशील और गृह कार्य में दक्ष कन्या की खूबियों वाले शादियों वाले विज्ञापन।
परंतु इस महान वाक्य का असली महत्व वही समझ सकता है जिसने जीवन में कभी तीन दिन लगातार खाली बैठने का दुस्साहस किया हो।
खाली आदमी धीरे-धीरे आदमी नहीं रहता — वह विचारों का गोदाम, षड्यंत्रों का कारखाना और पड़ोसियों के जीवन का अनधिकृत ऑडिटर बन जाता है। वो न्यायाधीश नहीं बनता लेकिन दूसरों के जीवन को जज करने का काम उससे ज्यादा बड़े से बड़े जज साहब नहीं कर पाते।
पुराने लोग यूँ ही नहीं कह गए — “खाली दिमाग़ शैतान का घर।”
असल में शैतान ने भी बहुत कोशिश की होगी कि कहीं नौकरी लग जाए, पर जब कुछ नहीं मिला तो उसने खाली दिमाग़ों में फ्रेंचाइज़ी खोल ली।
खाली इंसान की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं होती कि उसके पास काम नहीं है।
त्रासदी यह होती है कि उसके पास समय बहुत होता है — और समय, यदि विवेक के साथ न हो, तो आदमी को फेसबुक और इंस्टाग्राम के कमेंट सेक्शन तक पहुँचा देता है। उसका काम होता है हर पोस्ट पर कमेंट करना और दूसरों की मात बहनों की याद में जयकारा लगाना।

सुबह-सुबह खाली आदमी उठता नहीं, “प्रकट” होता है।
उसका कोई निश्चित उद्देश्य नहीं होता।
वह बालकनी में खड़ा होकर ऐसे नीचे देखता है मानो संयुक्त राष्ट्र ने उसे मोहल्ले की निगरानी का विशेष दायित्व सौंपा हो।
कौन दूध वाला देर से आया, किसकी बहू मायके गई, किसकी बेटी आज किसके पीछे बैठ कर मोटरसाइकिल पर गई, आज कचरा वाला के ठेले पर किस घर से कचरा ज्यादा आया — यह सारी जानकारी उसके पास होती है।
यदि देश की खुफिया एजेंसियाँ ऐसे लोगों को नियुक्त कर लें तो आधे अपराध तो चाय की दुकान पर ही सुलझ जाएँ।

खाली आदमी का मस्तिष्क अद्भुत होता है।
वह एक साधारण “नमस्ते” के पीछे भी चार स्तर की साजिश खोज लेता है।
यदि किसी ने उसे देखकर मुस्कुरा दिया, तो वह तीन दिन तक सोचता रहेगा —
“आख़िर हँसा क्यों?”
और यदि कोई मुस्कुराया नहीं, तो भी चिंतन जारी —
“अब घमंड आ गया है उसे!”
कहा गया है — “बेकार से बेगार भली।”
अर्थात कुछ काम करो, चाहे मुफ़्त का ही क्यों न हो।
हमारे समाज में इसलिए बहुत से लोग बिना बुलाए सलाह देने का पुण्य कार्य करते हैं।
किसी के बच्चे कम नंबर लाएँ — सलाह।
किसी की शादी टूटे — सलाह।
देश की अर्थव्यवस्था गिरे — सलाह।
भारत में सबसे सस्ता और प्रचुर संसाधन यदि कुछ है, तो वह है “फ्री की सलाह”।
खाली आदमी धीरे-धीरे स्वयं को दार्शनिक समझने लगता है।
वह दो यूट्यूब वीडियो देखकर अर्थव्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, आध्यात्म और क्रिकेट चयन समिति — सब पर विशेषज्ञता प्राप्त कर लेता है।
उसकी आँखों में एक अजीब आत्मविश्वास होता है, जैसे संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने व्यक्तिगत रूप से उससे राय माँगी हो।
सबसे खतरनाक अवस्था तब आती है जब खाली आदमी को स्मार्टफोन मिल जाता है।
फिर वह सुबह “गुड मॉर्निंग” के साथ उगते सूरज की ऐसी तस्वीरें भेजता है जिन्हें देखकर असली सूरज भी शर्मिंदा हो जाए।
उसके पास हर बीमारी का घरेलू इलाज, हर राजनीतिक समस्या का समाधान और हर अफ़वाह का “पक्का स्रोत” होता है।
वह व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का गोल्ड मेडलिस्ट बन जाता है।
खाली इंसान रिश्तों के लिए भी चुनौती होता है।
व्यस्त व्यक्ति को झगड़े के लिए समय नहीं मिलता, पर खाली व्यक्ति के पास तर्क भी होते हैं, समय भी और पुरानी चैट्स के स्क्रीनशॉट भी।
वह 2019 की बात 2026 में उठाकर पूछ सकता है —
“उस दिन तुमने ‘ठीक है’ के बाद full stop क्यों लगाया था?” बेचारा अपनी और दूसरों की सालों पुरानी चैट्स की प्रूफ रीडिंग करता रहता है।

पुराने ज़माने में लोग खेतों में काम करते थे, इसलिए स्वस्थ रहते थे।
आज लोग खाली बैठकर “मानसिक शांति” पर रील देखते हैं और फिर कमेंट सेक्शन में लड़ पड़ते हैं। और उसी रील को पूरी दुनिया में भेज कर यह गिनता रहता है कि किसने उसका रील देखकर रिएक्ट किया , नेगलेक्ट किया। किसने उसके भेजे रील नुमा गिफ्ट को रिजेक्ट किया और किसने उसके रील को सेलेक्ट किया।

व्यस्तता शरीर को थकाती है, पर खालीपन आत्मा को खुजली देता है।
इसलिए बुज़ुर्ग सही कहते थे —
“व्यस्त रहें, मस्त रहें।”
क्योंकि इंसान जब काम में लगा रहता है तो उसे दूसरों की जिंदगी संपादित करने का समय नहीं मिलता।
और सच पूछा जाए तो दुनिया की आधी समस्याएँ बेरोज़गार दिमाग़ों और आधे-अधूरे ज्ञान से पैदा होती हैं।

अंततः, खाली आदमी से सावधान रहिए।
वह बाहर से शांत दिख सकता है, पर भीतर ही भीतर वह आपके जीवन पर एक शोध प्रबंध लिख चुका होता है।
और यदि आपको कभी लगे कि जीवन में बहुत खाली समय मिल रहा है, तो तुरंत कोई काम खोज लीजिए —
वरना अगला व्यंग्य आलेख शायद आप ही पर लिखा जाएगा। 

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