Friday, April 10, 2026

धुरंधर देखने के बाद की विचार मीमांसा

धुरंधर फिल्म देखने नहीं जाना था। कमबख्त आदित्य धर ने एक तो चार घंटे की फिल्म बना डाली है। उससे अच्छे तो पठान और जवान वाले थे, घंटे की फिल्म बनते थे, इस आदित्य धर ने चार घंटे की बना दी। अब ऑडियंस जिनको घंटे वाली फिल्म की आदत थी, चार घंटे वाली फिल्म देख कर उबर नहीं पा रहे हैं।

मन में तरह तरह के खयाल आ रहे हैं। बेचारी एलीना को क्यों छोड़ दिया। जब जमाली कार में बैठ कर आ ही रहा था, बैठा लेता बगल में। हवाई जहाज में वो भी बैठ जाती, लेकिन नहीं आदित्य धर को तो धुरंधर 3 के लिए प्लॉट बनानी है। अब यही एलीना अपने बच्चे के साथ पाकिस्तानी स्पाई बन के हमजा को खोजने भारत आएगी और यूपी में सचिन नाम के लड़के से ब्याह रचाएगी। खूब समझता हूं यह सब पीक डिटेलिंग।

धुरंधर देखने के बाद नौकरी में मन नहीं लग रहा। तरह तरह के बिजनेस आइडिया दिमाग में आ रहे हैं। पहले तो सोचा कि खानानी भाई जान की तरह एक प्रिंटिंग प्रेस खोल लूं लेकिन फिर उनका अंजाम देख कर डर गया। फिलहाल वो लंबे वाले बलोची चाचा वाला बिजनेस मॉडल जँच रहा है। हथियार की डिलीवरी ऑन टाइम देना है लेकिन नो होम डिलीवरी नो कैश ऑन डिलीवरी। हमारी दुकान पर आइए, हमारे लड़कों का डांस देखिए पैसा चुकाइए और हथियार ले जाइए। हमारे मुहल्ले के आवारा लड़कों को डांस करने का मौका भी मिलेगा और चूंकि कोई महिला नर्तकी रखेंगे नहीं तो बार गर्ल नचवाने और अश्लील डांस जैसे आरोप भी नहीं लगने वाले। ऑलमोस्ट फूल प्रूफ बिजनेस मॉडल है बस थोड़ी फंडिंग मिल जाय तो सोचा जाएगा।

आप सोचेंगे कैसा स्वार्थी इंसान है। सिर्फ अपने बारे में और धंधे के बारे में सोचता है। आपको बता दूं कि उजैर बलोच के बारे में सोच कर कितना परेशान हूं। बेचारे को बिना मतलब के हिंदुस्तानी एजेंट बना दिया और जो दीदी दीदी वाले गाने पर उजैर का वीडियो वायरल होता उसमें भी हमजा घुस गया। नाइंसाफी हुई बेचारे के साथ। और हां रहमान डकैत की मौत के बाद हमारी भाभी किस हाल में होंगी सोच सोच कर रोना आ जाता है। कोई मदद करने वाला नहीं। अब यह मत सोचिएगा कि भाभी हॉट थी इसीलिए मैं याद कर रहा हूं। मैं तो एक एनजीओ बना कर पाकिस्तान में उन सबकी मदद करूं जिनको हमजा की वजह से तकलीफ हुई। एसपी चौधरी असलम की बेवा हो या मेजर इकबाल की पेंटिंग बनाने वाली बच्ची। बेचारी दादा को तो बाप ने ही निपटा दिया था, बाप को हमजा ने निपटा दिया। बेचारी किस हाल में होगी कभी सोचा आपने। और हां आलम भाई के बरेली वाले परिवार का पता लगा कर उनकी मदद भी तो करनी है । आपको क्या !! आपको तो तम्मा तम्मा लोगे वाले गाने पर शरारत वाला डांस करके रील बनाने से फुर्सत कहां है।

एक और प्लान है । वैसे भी सान्याल साब अब रिटायर होने वाले हैं। तो जमाली, रिजवान और बाकी जितने अपने एसेट पाकिस्तान में हैं उनकी सुरक्षा के लिए एक सोचता हूं एक ट्रस्ट बना दूं । उनकी सुरक्षा के लिए चंदा जमा करूं और जरूरत पड़ने पर उनकी मदद करूं। उन्हीं चंदा के थोड़े बहुत पैसे अपने पास भी रख लूंगा। आखिर चंदा मामा तो सबके हैं। बाकी तो सब ठीक ही है। आप भी ट्रस्ट के नाम पर कुछ पैसा मेरे को डायरेक्ट upi कर सकते हैं। धुरंधर देखने के लिए अगर 500 के टिकट और 700 का पॉप कॉर्न खर्च कर सकते हैं तो जमील मामू के लिए 250 रुपए मुझे भेज ही सकते हैं। आखिर जमील मामू के बच्चे तो हम सब हैं ही।



Saturday, April 4, 2026

स्वर्ण स्वप्न

क्यों यह रिक्ति
लग रही लंबी अपनी ही परछाईं से 
जब तुम—
कभी थीं ही नहीं मेरे हिस्से की धूप में?

यह कैसी स्मृति है
जो जन्मी ही नहीं
और फिर भी
तुहिन कणों की तरह सराबोर करती है
मेरे मन मस्तिष्क को सदैव।

भिक्षुक—
जिसने स्वर्ण को छुआ नहीं, देखा नहीं,
जिसकी फैली हथेली पर 
हैं घिसी रेखाएँ 
और उन रेखाओं में भी स्वर्ण के उल्लेख तक नहीं
क्या वह सचमुच दरिद्र है स्वर्ण के अभाव में?
या दरिद्र है
उस कल्पना में
जहाँ स्वर्ण की एक असंभव परिकल्पना
वशीभूत करती है उसकी चेतना को।

स्वप्न—
वे तो आते हैं बिना आमंत्रण,
रचते हैं उजले महल
टूटे हुए बरामदों में।
पर क्या स्वप्न का स्वर्ण
हथेली में तौल सकते हैं हम?
क्या उसकी चमक
वास्तविक है क्षुधा की तरह 
या यह स्वप्न स्वर्ण वास्तव में 
है धतूरे वाला कनक 
जिसे मात्र पाकर मतंग हो चुकी है इच्छाएं।

और फिर—
मन, यह चंचल व्यापारी,
लेन-देन करता है उन वस्तुओं का
जिनका अस्तित्व
केवल संभावना की धुंध में है।

तुम—
न थीं,
न हो सकती हो—
फिर भी 
फिर भी एक रिक्त स्थान
तुम्हारे आकार का
क्यों बना रहता है भीतर?

शायद अभाव
वस्तुओं का नहीं,
आकांक्षाओं का होता है—
और आकांक्षा
वस्तु की दासी नहीं,
अपने ही भ्रम की स्वामिनी है।

तो क्या उचित है—
उस स्वर्ण के लिए तृष्णा
जो कभी था ही नहीं?
या यह कि हम स्वीकार लें—
कुछ रिक्तियाँ
पूर्ण होने की मोहताज नहीं होती
वे होती हैं
हमें हमारे भीतर की अनंतता का
आभास देने के लिए।

और तब—
भिक्षुक
स्वर्ण का नहीं,
अपने ही स्वप्नों का त्यागी हो जाता है।

और मैं—
तुम्हें खोकर नहीं,
तुम्हें कभी न पाकर भी
पूर्ण हो सकता हूँ।