विचारों का मुक्ताकाश | कुछ अट्टहास और ढेर सारी बकवास ||
What I think? I will let you know here.. Listen to the voices from my heart
Thursday, August 13, 2026
बड़ा होना
Thursday, June 18, 2026
जब तक स्वप्न है
जानता हूँ—
यह पगडंडी
क्षितिज तक नहीं जाती,
किसी मोड़ पर
अचानक खो जाएगी
और बाकी रह जाएगा
सूखी घास और काँटों से
आच्छादित मैदान जिस पर
चलना संभव नहीं।
जानता हूँ—
यह हाथों में हाथ
सदैव नहीं रहेगा,
समय की नदी
हमारे बीच भी
एक दिन अपना जल भर देगी
और बिठा देगी हमें दो सुदूर किनारों पर
जहाँ से तैर कर आना संभव नहीं।
फिर भी,
क्या इसी कारण
इस स्पर्श की ऊष्मा से
अपने हाथ खींच लूँ?
क्या इस भय से
कि संध्या उतरनी ही है,
मैं प्रभात का स्वागत न करूँ?
प्रेम का अर्थ
अनंत का अधिकार नहीं,
क्षण का संपूर्ण स्वीकार है।
जो फूल
एक ही दिन में झड़ जाता है,
उसकी सुगंध
क्या कम सत्य होती है?
जो तारा
पल भर को टूटता हुआ दिखे,
क्या उसकी चमक
आकाश को जगमग नहीं करती?
एक क्षण का मिलना भी
अपने आप में एक पूर्णता है,
भले ही उसके चारों ओर
विरह की काली रेखाएँ
पहले से खींची जा चुकी हों,
जैसे ग्रहण ग्रस चुका हो सूर्य को—
लेकिन ग्रहण लगा सूर्य भी
सूर्य ही रहता है।
मैं भविष्य के शोक में
वर्तमान का उत्सव
क्यों खो दूँ?
मैं उस दिन के आँसू
आज ही क्यों रो लूँ,
जो अभी आया नहीं?
जीवन भी तो
कुछ ऐसा ही है।
हम सब जानते हैं
कि अंत में
मृत्यु की निस्तब्ध बाँहें
प्रतीक्षा कर रही हैं;
पर क्या इस ज्ञान से
वसंत कम हरा हो जाता है?
क्या बच्चे की हँसी
कम निर्मल हो जाती है?
क्या नदी
समुद्र तक पहुँचने के भय से
बहना छोड़ देती है?
जीवन इसलिए सुंदर नहीं
कि वह शाश्वत है,
वह इसलिए सुंदर है
कि वह क्षणभंगुर है।
यह जानते हुए भी
कि सब कुछ छूट जाएगा,
किसी को
अपने भीतर
इतनी जगह दे देना
कि उसके जाने के बाद भी
वह बना रहे—
शायद यही जीवन है
जीवन स्वयं उस रिक्ति का नाम है
जो आरंभ से ही
अपने अंत को
साथ लेकर चलती है?
मैं नहीं जानता।
मैं अब भी खड़ा हूँ—
एक दोराहे पर।
एक ओर
स्पर्श की ऊष्मा।
एक ओर
वियोग की छाया।
सामने—
अनंत विचारों का सागर।
दूर तक फैला हुआ।
अथाह।
अनिर्णीत।
लहरों पर तैरते
असंख्य प्रश्न।
प्रश्नों के भीतर
और प्रश्न।
और मैं—
न आगे बढ़ता हूँ,
न लौट पाता हूँ।
बस देखता हूँ—
उस धुँधले क्षितिज की ओर
जहाँ शायद कोई उत्तर है,
या शायद
केवल एक और प्रश्न।
Tuesday, June 2, 2026
बगुलों का मानसून
Wednesday, May 27, 2026
खाली आदमी की खलिश
Friday, April 10, 2026
धुरंधर देखने के बाद की विचार मीमांसा
धुरंधर फिल्म देखने नहीं जाना था। कमबख्त आदित्य धर ने एक तो चार घंटे की फिल्म बना डाली है। उससे अच्छे तो पठान और जवान वाले थे, घंटे की फिल्म बनते थे, इस आदित्य धर ने चार घंटे की बना दी। अब ऑडियंस जिनको घंटे वाली फिल्म की आदत थी, चार घंटे वाली फिल्म देख कर उबर नहीं पा रहे हैं।
मन में तरह तरह के खयाल आ रहे हैं। बेचारी एलीना को क्यों छोड़ दिया। जब जमाली कार में बैठ कर आ ही रहा था, बैठा लेता बगल में। हवाई जहाज में वो भी बैठ जाती, लेकिन नहीं आदित्य धर को तो धुरंधर 3 के लिए प्लॉट बनानी है। अब यही एलीना अपने बच्चे के साथ पाकिस्तानी स्पाई बन के हमजा को खोजने भारत आएगी और यूपी में सचिन नाम के लड़के से ब्याह रचाएगी। खूब समझता हूं यह सब पीक डिटेलिंग।
धुरंधर देखने के बाद नौकरी में मन नहीं लग रहा। तरह तरह के बिजनेस आइडिया दिमाग में आ रहे हैं। पहले तो सोचा कि खानानी भाई जान की तरह एक प्रिंटिंग प्रेस खोल लूं लेकिन फिर उनका अंजाम देख कर डर गया। फिलहाल वो लंबे वाले बलोची चाचा वाला बिजनेस मॉडल जँच रहा है। हथियार की डिलीवरी ऑन टाइम देना है लेकिन नो होम डिलीवरी नो कैश ऑन डिलीवरी। हमारी दुकान पर आइए, हमारे लड़कों का डांस देखिए पैसा चुकाइए और हथियार ले जाइए। हमारे मुहल्ले के आवारा लड़कों को डांस करने का मौका भी मिलेगा और चूंकि कोई महिला नर्तकी रखेंगे नहीं तो बार गर्ल नचवाने और अश्लील डांस जैसे आरोप भी नहीं लगने वाले। ऑलमोस्ट फूल प्रूफ बिजनेस मॉडल है बस थोड़ी फंडिंग मिल जाय तो सोचा जाएगा।
आप सोचेंगे कैसा स्वार्थी इंसान है। सिर्फ अपने बारे में और धंधे के बारे में सोचता है। आपको बता दूं कि उजैर बलोच के बारे में सोच कर कितना परेशान हूं। बेचारे को बिना मतलब के हिंदुस्तानी एजेंट बना दिया और जो दीदी दीदी वाले गाने पर उजैर का वीडियो वायरल होता उसमें भी हमजा घुस गया। नाइंसाफी हुई बेचारे के साथ। और हां रहमान डकैत की मौत के बाद हमारी भाभी किस हाल में होंगी सोच सोच कर रोना आ जाता है। कोई मदद करने वाला नहीं। अब यह मत सोचिएगा कि भाभी हॉट थी इसीलिए मैं याद कर रहा हूं। मैं तो एक एनजीओ बना कर पाकिस्तान में उन सबकी मदद करूं जिनको हमजा की वजह से तकलीफ हुई। एसपी चौधरी असलम की बेवा हो या मेजर इकबाल की पेंटिंग बनाने वाली बच्ची। बेचारी दादा को तो बाप ने ही निपटा दिया था, बाप को हमजा ने निपटा दिया। बेचारी किस हाल में होगी कभी सोचा आपने। और हां आलम भाई के बरेली वाले परिवार का पता लगा कर उनकी मदद भी तो करनी है । आपको क्या !! आपको तो तम्मा तम्मा लोगे वाले गाने पर शरारत वाला डांस करके रील बनाने से फुर्सत कहां है।
एक और प्लान है । वैसे भी सान्याल साब अब रिटायर होने वाले हैं। तो जमाली, रिजवान और बाकी जितने अपने एसेट पाकिस्तान में हैं उनकी सुरक्षा के लिए एक सोचता हूं एक ट्रस्ट बना दूं । उनकी सुरक्षा के लिए चंदा जमा करूं और जरूरत पड़ने पर उनकी मदद करूं। उन्हीं चंदा के थोड़े बहुत पैसे अपने पास भी रख लूंगा। आखिर चंदा मामा तो सबके हैं। बाकी तो सब ठीक ही है। आप भी ट्रस्ट के नाम पर कुछ पैसा मेरे को डायरेक्ट upi कर सकते हैं। धुरंधर देखने के लिए अगर 500 के टिकट और 700 का पॉप कॉर्न खर्च कर सकते हैं तो जमील मामू के लिए 250 रुपए मुझे भेज ही सकते हैं। आखिर जमील मामू के बच्चे तो हम सब हैं ही।
Saturday, April 4, 2026
स्वर्ण स्वप्न
Friday, February 20, 2026
भला बुरा
Wednesday, December 24, 2025
बीस रूपये का फटा नोट
यह बीस रुपये का फटा नोट
पड़ा है मेरी जेब में कई दिनों से
देखता हूँ कि सारे बड़े नोट
निकल गए धीरे-धीरे
पर यह नोट है
जो लगा हुआ है मेरे साथ
मेरे कर्मों की तरह
बीते समय की तरह
परछाई की तरह
दिलजले आशिक़ की तरह।
पीछा छुड़ाना भी चाहूँ तो कैसे—
सामने वाला हर दूसरा नोट ले लेता है
लेकिन इसे लौटा देता है कि
इसे बदल दो,
बाक़ी सब ले लेंगे
इसे नहीं लेंगे।
और मैं हर बार
हँसकर सिर हिला देता हूँ,
जैसे सच में बदल लूँगा,
पर जानता हूँ
कि बदलना मेरे बस की बात नहीं।
यह बीस का फटा नोट
मेरे ही जैसा है—
मैंने भी तो
हर मोड़ पर
अपने आप को पूरा नहीं पाया,
कहीं थोड़ा घिसा,
कहीं से फटा हुआ।
लोग लेते रहे मुझसे
मेहनत, वक़्त, ईमान,
पर जब बात आई
मुझे अपनाने की,
कह दिया—
ठीक है,
पर बदल कर आओ।
मैं नहीं बदल पाया।
मैंने अपनी दरारें
सिलाने की जगह
उन्हें अपनाना सीख लिया।
मैंने समझ लिया
कि फटा होना
नक़ली होने की निशानी नहीं।
फटा निशानी है कि दुश्वार
डगर का मुसाफिर रहा हूं
खाई है चोट
टूटा हूं
लेकिन अब तक बिखरा नहीं।
अब यह नोट
मेरी जेब में नहीं,
मेरी पहचान में है।
यह याद दिलाता है
कि जो आसानी से चल जाए
वह मैं कभी था ही नहीं।
और अगर इस दुनिया में
मेरी क़ीमत
कभी पूरी नहीं लगती,
तो कोई बात नहीं—
इनकार करता हूँ मैं
खुद को
रद्दी में देने से।