विचारों का मुक्ताकाश | कुछ अट्टहास और ढेर सारी बकवास ||
What I think? I will let you know here.. Listen to the voices from my heart
Wednesday, May 27, 2026
खाली आदमी की खलिश
Friday, April 10, 2026
धुरंधर देखने के बाद की विचार मीमांसा
धुरंधर फिल्म देखने नहीं जाना था। कमबख्त आदित्य धर ने एक तो चार घंटे की फिल्म बना डाली है। उससे अच्छे तो पठान और जवान वाले थे, घंटे की फिल्म बनते थे, इस आदित्य धर ने चार घंटे की बना दी। अब ऑडियंस जिनको घंटे वाली फिल्म की आदत थी, चार घंटे वाली फिल्म देख कर उबर नहीं पा रहे हैं।
मन में तरह तरह के खयाल आ रहे हैं। बेचारी एलीना को क्यों छोड़ दिया। जब जमाली कार में बैठ कर आ ही रहा था, बैठा लेता बगल में। हवाई जहाज में वो भी बैठ जाती, लेकिन नहीं आदित्य धर को तो धुरंधर 3 के लिए प्लॉट बनानी है। अब यही एलीना अपने बच्चे के साथ पाकिस्तानी स्पाई बन के हमजा को खोजने भारत आएगी और यूपी में सचिन नाम के लड़के से ब्याह रचाएगी। खूब समझता हूं यह सब पीक डिटेलिंग।
धुरंधर देखने के बाद नौकरी में मन नहीं लग रहा। तरह तरह के बिजनेस आइडिया दिमाग में आ रहे हैं। पहले तो सोचा कि खानानी भाई जान की तरह एक प्रिंटिंग प्रेस खोल लूं लेकिन फिर उनका अंजाम देख कर डर गया। फिलहाल वो लंबे वाले बलोची चाचा वाला बिजनेस मॉडल जँच रहा है। हथियार की डिलीवरी ऑन टाइम देना है लेकिन नो होम डिलीवरी नो कैश ऑन डिलीवरी। हमारी दुकान पर आइए, हमारे लड़कों का डांस देखिए पैसा चुकाइए और हथियार ले जाइए। हमारे मुहल्ले के आवारा लड़कों को डांस करने का मौका भी मिलेगा और चूंकि कोई महिला नर्तकी रखेंगे नहीं तो बार गर्ल नचवाने और अश्लील डांस जैसे आरोप भी नहीं लगने वाले। ऑलमोस्ट फूल प्रूफ बिजनेस मॉडल है बस थोड़ी फंडिंग मिल जाय तो सोचा जाएगा।
आप सोचेंगे कैसा स्वार्थी इंसान है। सिर्फ अपने बारे में और धंधे के बारे में सोचता है। आपको बता दूं कि उजैर बलोच के बारे में सोच कर कितना परेशान हूं। बेचारे को बिना मतलब के हिंदुस्तानी एजेंट बना दिया और जो दीदी दीदी वाले गाने पर उजैर का वीडियो वायरल होता उसमें भी हमजा घुस गया। नाइंसाफी हुई बेचारे के साथ। और हां रहमान डकैत की मौत के बाद हमारी भाभी किस हाल में होंगी सोच सोच कर रोना आ जाता है। कोई मदद करने वाला नहीं। अब यह मत सोचिएगा कि भाभी हॉट थी इसीलिए मैं याद कर रहा हूं। मैं तो एक एनजीओ बना कर पाकिस्तान में उन सबकी मदद करूं जिनको हमजा की वजह से तकलीफ हुई। एसपी चौधरी असलम की बेवा हो या मेजर इकबाल की पेंटिंग बनाने वाली बच्ची। बेचारी दादा को तो बाप ने ही निपटा दिया था, बाप को हमजा ने निपटा दिया। बेचारी किस हाल में होगी कभी सोचा आपने। और हां आलम भाई के बरेली वाले परिवार का पता लगा कर उनकी मदद भी तो करनी है । आपको क्या !! आपको तो तम्मा तम्मा लोगे वाले गाने पर शरारत वाला डांस करके रील बनाने से फुर्सत कहां है।
एक और प्लान है । वैसे भी सान्याल साब अब रिटायर होने वाले हैं। तो जमाली, रिजवान और बाकी जितने अपने एसेट पाकिस्तान में हैं उनकी सुरक्षा के लिए एक सोचता हूं एक ट्रस्ट बना दूं । उनकी सुरक्षा के लिए चंदा जमा करूं और जरूरत पड़ने पर उनकी मदद करूं। उन्हीं चंदा के थोड़े बहुत पैसे अपने पास भी रख लूंगा। आखिर चंदा मामा तो सबके हैं। बाकी तो सब ठीक ही है। आप भी ट्रस्ट के नाम पर कुछ पैसा मेरे को डायरेक्ट upi कर सकते हैं। धुरंधर देखने के लिए अगर 500 के टिकट और 700 का पॉप कॉर्न खर्च कर सकते हैं तो जमील मामू के लिए 250 रुपए मुझे भेज ही सकते हैं। आखिर जमील मामू के बच्चे तो हम सब हैं ही।
Saturday, April 4, 2026
स्वर्ण स्वप्न
Friday, February 20, 2026
भला बुरा
Wednesday, December 24, 2025
बीस रूपये का फटा नोट
यह बीस रुपये का फटा नोट
पड़ा है मेरी जेब में कई दिनों से
देखता हूँ कि सारे बड़े नोट
निकल गए धीरे-धीरे
पर यह नोट है
जो लगा हुआ है मेरे साथ
मेरे कर्मों की तरह
बीते समय की तरह
परछाई की तरह
दिलजले आशिक़ की तरह।
पीछा छुड़ाना भी चाहूँ तो कैसे—
सामने वाला हर दूसरा नोट ले लेता है
लेकिन इसे लौटा देता है कि
इसे बदल दो,
बाक़ी सब ले लेंगे
इसे नहीं लेंगे।
और मैं हर बार
हँसकर सिर हिला देता हूँ,
जैसे सच में बदल लूँगा,
पर जानता हूँ
कि बदलना मेरे बस की बात नहीं।
यह बीस का फटा नोट
मेरे ही जैसा है—
मैंने भी तो
हर मोड़ पर
अपने आप को पूरा नहीं पाया,
कहीं थोड़ा घिसा,
कहीं से फटा हुआ।
लोग लेते रहे मुझसे
मेहनत, वक़्त, ईमान,
पर जब बात आई
मुझे अपनाने की,
कह दिया—
ठीक है,
पर बदल कर आओ।
मैं नहीं बदल पाया।
मैंने अपनी दरारें
सिलाने की जगह
उन्हें अपनाना सीख लिया।
मैंने समझ लिया
कि फटा होना
नक़ली होने की निशानी नहीं।
फटा निशानी है कि दुश्वार
डगर का मुसाफिर रहा हूं
खाई है चोट
टूटा हूं
लेकिन अब तक बिखरा नहीं।
अब यह नोट
मेरी जेब में नहीं,
मेरी पहचान में है।
यह याद दिलाता है
कि जो आसानी से चल जाए
वह मैं कभी था ही नहीं।
और अगर इस दुनिया में
मेरी क़ीमत
कभी पूरी नहीं लगती,
तो कोई बात नहीं—
इनकार करता हूँ मैं
खुद को
रद्दी में देने से।
Friday, December 12, 2025
धुरंधर का अनपेड रिव्यू
Monday, December 8, 2025
होम टाउन
Wednesday, November 26, 2025
प्राकृतिक या कृत्रिम
Saturday, November 15, 2025
लोकतन्त्र के महापर्व का विमर्श
Wednesday, November 12, 2025
जनता जनार्दन और शक्ति का अस्थाई हस्तांतरण
Wednesday, November 5, 2025
दुःख का चरित्र
दुःख युधिष्ठिर के कुत्ते के समान है — जहाँ भी जाओ, यह पीछे-पीछे चलता है, पीछा नहीं छोड़ता। स्वर्ग देखा तो नहीं, पर वहां भी दुःख विद्यमान है। अगर दुःख वहां न होता तो इंद्रराज हर बात पर यूं विचलित न होते।
भाई, बंधु, सखा, हितैषी — सब साथ छोड़ दें, लेकिन दुःख सदा साथ रहता है।
यह आपके जूतों में छिपे उस कंकड़ की तरह है — अपने जूते में हो तो जान निकाल दे, पर किसी और के जूते में हो तो दिखाई भी नहीं देता।
अपना दुःख दिल-दिमाग में बस जाने वाला वह बिना किराया चुकाए रहने वाला ज़िद्दी किरायेदार है, जिसे जितना भी कहो, मकान खाली नहीं करता।
दुःख वह पाठ है जो चाहकर भी भुलाया नहीं जा सकता। कुछ समय के लिए स्मृति से उतर भी जाए, तो भी आस-पास कहीं छिपा रहता है, और अवसर मिलते ही फिर से सामने आ खड़ा होता है।
दुःख वह सूदखोर महाजन है, जिसकी किश्तें हर हाल में चुकानी ही पड़ती हैं — चाहे जैसा भी समय हो।
दुःख जीवन की सामान्य अवस्था है —
जीवन यात्रा का वह सराय है जहाँ से हर सफर शुरू होता है और जहाँ हर सफर का अंत भी होता है। बचपन में खिलौने टूटने का दुःख है, जवानी में सपनों के टूटने का दुःख सालता है तो बुढ़ापा रिश्तों, स्वास्थ्य, उम्मीदें और शरीर गंवाने का दुख लेकर आता है।
हर रिश्ते की डोर का पहला और आख़िरी छोर भी दुःख ही है। दुख ऐसा है कि सर्वव्यापी है, वर्तमान का दुख तो दुःख देता ही है, भूतकाल का दुःख याद करने पर दुःख देता है, और आने वाले दुःख की चिंता दुःख का कारण बनती है।
दुःख वो बेताल है जो आपकी पीठ पर बैठा रहता है, आपको डराता है, आपसे तरह तरह के सवाल पूछा करता है। और दुखों को जवाब देकर भी क्या फायदा। उसे न सही उत्तर में कोई दिलचस्पी है और न गलत उत्तरों की कोई जिज्ञासा। आपकी पीठ पर बैठा बेताल रूपी दुःख आपसे कुछ दूर दूर भी जाने लगे तो आपके अंदर का विक्रम उसके पीछे दौड़ कर खुद पकड़ लेता है।
दुःख जीवन का ध्रुव तारा है, उसे देख कर ही जीवन निरंतर आगे बढ़ता रहता है। सभी सुख प्राप्त हो जाने पर आगे का सफर तय करने की क्या आवश्यकता रह जाएगी।
दुःख का एक दूर का सौतेला भाई है — सुख।
दोनों में कभी बनती नहीं।
सुख का स्वरूप दुख से भले अलग प्रतीत हो , वास्तव में अलग नहीं है। अन्यथा दूसरों का सुख देख कर मनुष्य दुखी क्यों होता और सुख भोगता मनुष्य भी संभावित दुःख को विचार कर दुःखी क्यों होता।
ज्यादा सुख पा रहा व्यक्ति अपने से कम सुख में रह रहे व्यक्ति को दुखी क्यों मानता। और पहले से सुखी व्यक्ति दूसरे का अधिक सुख देख कर दुःखी क्यों हो जाता।
सुख और दुःख जीवन की चाकी के दो पाट हैं —
दुःख नीचे वाला पाट है, जो स्थिर रहता है,
और सुख ऊपर वाला — जो कभी चलता है, कभी ठहर जाता है।
पर दुःख वाला पाट हमेशा वहीं रहता है,
अडिग, अचल, सदा साथ।
और जो जीवन में अटल है, अचल है, उसका दुःख कैसा??