विचारों का मुक्ताकाश | कुछ अट्टहास और ढेर सारी बकवास ||
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Friday, February 20, 2026
भला बुरा
Wednesday, December 24, 2025
बीस रूपये का फटा नोट
यह बीस रुपये का फटा नोट
पड़ा है मेरी जेब में कई दिनों से
देखता हूँ कि सारे बड़े नोट
निकल गए धीरे-धीरे
पर यह नोट है
जो लगा हुआ है मेरे साथ
मेरे कर्मों की तरह
बीते समय की तरह
परछाई की तरह
दिलजले आशिक़ की तरह।
पीछा छुड़ाना भी चाहूँ तो कैसे—
सामने वाला हर दूसरा नोट ले लेता है
लेकिन इसे लौटा देता है कि
इसे बदल दो,
बाक़ी सब ले लेंगे
इसे नहीं लेंगे।
और मैं हर बार
हँसकर सिर हिला देता हूँ,
जैसे सच में बदल लूँगा,
पर जानता हूँ
कि बदलना मेरे बस की बात नहीं।
यह बीस का फटा नोट
मेरे ही जैसा है—
मैंने भी तो
हर मोड़ पर
अपने आप को पूरा नहीं पाया,
कहीं थोड़ा घिसा,
कहीं से फटा हुआ।
लोग लेते रहे मुझसे
मेहनत, वक़्त, ईमान,
पर जब बात आई
मुझे अपनाने की,
कह दिया—
ठीक है,
पर बदल कर आओ।
मैं नहीं बदल पाया।
मैंने अपनी दरारें
सिलाने की जगह
उन्हें अपनाना सीख लिया।
मैंने समझ लिया
कि फटा होना
नक़ली होने की निशानी नहीं।
फटा निशानी है कि दुश्वार
डगर का मुसाफिर रहा हूं
खाई है चोट
टूटा हूं
लेकिन अब तक बिखरा नहीं।
अब यह नोट
मेरी जेब में नहीं,
मेरी पहचान में है।
यह याद दिलाता है
कि जो आसानी से चल जाए
वह मैं कभी था ही नहीं।
और अगर इस दुनिया में
मेरी क़ीमत
कभी पूरी नहीं लगती,
तो कोई बात नहीं—
इनकार करता हूँ मैं
खुद को
रद्दी में देने से।
Friday, December 12, 2025
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दुःख का चरित्र
दुःख युधिष्ठिर के कुत्ते के समान है — जहाँ भी जाओ, यह पीछे-पीछे चलता है, पीछा नहीं छोड़ता। स्वर्ग देखा तो नहीं, पर वहां भी दुःख विद्यमान है। अगर दुःख वहां न होता तो इंद्रराज हर बात पर यूं विचलित न होते।
भाई, बंधु, सखा, हितैषी — सब साथ छोड़ दें, लेकिन दुःख सदा साथ रहता है।
यह आपके जूतों में छिपे उस कंकड़ की तरह है — अपने जूते में हो तो जान निकाल दे, पर किसी और के जूते में हो तो दिखाई भी नहीं देता।
अपना दुःख दिल-दिमाग में बस जाने वाला वह बिना किराया चुकाए रहने वाला ज़िद्दी किरायेदार है, जिसे जितना भी कहो, मकान खाली नहीं करता।
दुःख वह पाठ है जो चाहकर भी भुलाया नहीं जा सकता। कुछ समय के लिए स्मृति से उतर भी जाए, तो भी आस-पास कहीं छिपा रहता है, और अवसर मिलते ही फिर से सामने आ खड़ा होता है।
दुःख वह सूदखोर महाजन है, जिसकी किश्तें हर हाल में चुकानी ही पड़ती हैं — चाहे जैसा भी समय हो।
दुःख जीवन की सामान्य अवस्था है —
जीवन यात्रा का वह सराय है जहाँ से हर सफर शुरू होता है और जहाँ हर सफर का अंत भी होता है। बचपन में खिलौने टूटने का दुःख है, जवानी में सपनों के टूटने का दुःख सालता है तो बुढ़ापा रिश्तों, स्वास्थ्य, उम्मीदें और शरीर गंवाने का दुख लेकर आता है।
हर रिश्ते की डोर का पहला और आख़िरी छोर भी दुःख ही है। दुख ऐसा है कि सर्वव्यापी है, वर्तमान का दुख तो दुःख देता ही है, भूतकाल का दुःख याद करने पर दुःख देता है, और आने वाले दुःख की चिंता दुःख का कारण बनती है।
दुःख वो बेताल है जो आपकी पीठ पर बैठा रहता है, आपको डराता है, आपसे तरह तरह के सवाल पूछा करता है। और दुखों को जवाब देकर भी क्या फायदा। उसे न सही उत्तर में कोई दिलचस्पी है और न गलत उत्तरों की कोई जिज्ञासा। आपकी पीठ पर बैठा बेताल रूपी दुःख आपसे कुछ दूर दूर भी जाने लगे तो आपके अंदर का विक्रम उसके पीछे दौड़ कर खुद पकड़ लेता है।
दुःख जीवन का ध्रुव तारा है, उसे देख कर ही जीवन निरंतर आगे बढ़ता रहता है। सभी सुख प्राप्त हो जाने पर आगे का सफर तय करने की क्या आवश्यकता रह जाएगी।
दुःख का एक दूर का सौतेला भाई है — सुख।
दोनों में कभी बनती नहीं।
सुख का स्वरूप दुख से भले अलग प्रतीत हो , वास्तव में अलग नहीं है। अन्यथा दूसरों का सुख देख कर मनुष्य दुखी क्यों होता और सुख भोगता मनुष्य भी संभावित दुःख को विचार कर दुःखी क्यों होता।
ज्यादा सुख पा रहा व्यक्ति अपने से कम सुख में रह रहे व्यक्ति को दुखी क्यों मानता। और पहले से सुखी व्यक्ति दूसरे का अधिक सुख देख कर दुःखी क्यों हो जाता।
सुख और दुःख जीवन की चाकी के दो पाट हैं —
दुःख नीचे वाला पाट है, जो स्थिर रहता है,
और सुख ऊपर वाला — जो कभी चलता है, कभी ठहर जाता है।
पर दुःख वाला पाट हमेशा वहीं रहता है,
अडिग, अचल, सदा साथ।
और जो जीवन में अटल है, अचल है, उसका दुःख कैसा??