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Tuesday, December 29, 2020

तुम कल पत्थर थे, आज मिट्टी हो

तुम मिट्टी हो। तुम्हें हमेशा आस पास ही पाया है। आस पास क्या, हमेशा तुम्हें अपने पैरों के नीचे ही देखा है। फिर भी, कभी तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनी,  तुम्हें कभी बोलते नहीं सुना। शायद तुम्हें बोलने की इजाज़त लोगों ने कभी दी ही नहीं। तुम हर जगह हो पर मिट्टी को लोग अपने घर आने तक नहीं देते हैं। घर की चौखट के बाहर रखे, उस स्वागतम लिखी चटाई तक ही तुम्हारा स्वागत रुक जाता है, तुम्हारे आगे जाने से घर गन्दा हो जाएगा ना। यह अलग बात है कि वह घर खुद मिट्टी ने बनाया है। 

ऐसा नहीं है कि इन्सानों ने ही  तुम्हारे साथ ऐसा बर्ताव किया हो। बारिश का पानी , जिसका इंतजार कर कर के तुम्हारी छाती फट जाती है। जिस पानी को तुम सूरज की तेज धूप से बचाने के लिए अपने सीने में छुपा लेते हो | अपने अंदर रख कर भी उसको अपने को उससे दूर रखते हो, ताकि वह निर्मल कहला सके | जिसके लिए तुम्हारे पूरे बदन पर दरारें आ जाती है,  वह भी तुमसे मिलने में कतराता है। तुमसे मिलने के बाद उसका रंग मटमैला जो हो जाता है।  हर चीज़ तुम्हीं से निकलती है, पर तुमसे पीछा छुड़ाना चाहती है।

गेहूं , गुलाब, अफीम  या अंगूर सब तुमसे ही निकलते हैं, लेकिन सबसे पहले उन पर लगी मिट्टी धोयी जाती है। तुमसे ही निकले जब तक तुमसे जुदा ना हों, साफ सुथरे नहीं कहलाते। कहते हैं मनुष्य का शरीर भी तुमने ही बनाया है, मिट्टी का तन मिट्टी का मन तो बहुत सुना, यह किसी ने नहीं बताया कि वही मिट्टी अगर शरीर से लग जाय तो मैल कह कर क्यों दुत्कारी जाती है। जिसने अपना सर्वस्व सृजन के लिए न्योछावर हो,  उसका नाम बर्बादी और विनाश से जोड़ कर मिटटी में मिला दूंगा जैसी बातें क्यों की जाती है|  जो मिटटी सोना और हीरा उगलती है उसकी कीमत को माटी के मोल कह कर क्यों नीचे दिखाते हैं | 

शायद दुनिया ऐसी ही है | सुना है कि तुम भी कभी पत्थर थे। वक्त के थपेड़ों ने घिस घिस कर तुम्हें आज मिट्टी बना दिया। पत्थर थे तो शालिग्राम थे, आज मिट्टी बन गए तो मैल, धूल, कीचड़, गन्दगी क्या क्या नहीं कहलाते। फिर सोचता हूं, कि तुम कल पत्थर थे, आज मिट्टी हो | मैं आज इंसान हूं, कल मिट्टी बनूंगा। कल मिट्टी बनूंगा। 



Tuesday, July 31, 2018

यह मछली की गंध नही है।

यह मछली की गंध नही है।

यह गंध है उस मौत की जो आपने अपने जाल में फंसा कर उसको बक्शी है। नदी में स्वच्छंद विचरती मछली से बास नहीं आती, बास आती है जब वही स्वच्छन्दता आपकी भूख मिटाने के लिये बिछाये जाल में फंस कर आपके जंग लगे बटखरों के साथ किलो के भाव से बिकने को बाज़ार पहुंच जाती है। यह गंध आपने उसको दी है उसका पानी छीन कर। यह गंध आई है मछली में आपके निष्ठुर हाथों से जब आपके हाथों ने उसके अधमरे गलफड़ों को खोल कर देखा कि मछली की लाश ताज़ी है या बासी हो चली है। नाक पर रुमाल रख कर मछली बाज़ार में घूमने का यह नाटक क्यों जब यह मौत का बाजार आपने ही सजाया है। अगर मछली न मरे तो तुम भूखे मरोगे और यकीन मानो तुम्हारी लाश को कोई दो कौड़ी फी किलो के भाव से भी न खरीदेगा। तुम्हारी कहावतें सुनी थी मैने तुम्हारे जाल में फसने के समय। वो क्या कहते हो तुम कि बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है!! अगर यह मत्स्य न्याय है तो पूरे तालाब को गंदा करने, सारी मछलियों को पकड़ कर खाने और उसी तालाब को मिट्टी भर कर अपने भवन बनाने को क्या आदम न्याय कहना चाहिये।

तुम्हारी गंध जीते जी मरी मछली की गंध से कहीं ज्यादा घृणास्पद है लेकिन वो तुम्हें पता नही चलेगा क्योंकि तुम उसके आदी हो चुके हो। हाँ जब वही गंध तुम्हारे संसर्ग में आने के बाद मछली में आ गयी है तो तुम नाक भौं सिकोड़ रहे हो। अगर मत्स्यगंधा एक गाली है तो मनुष्यगन्धा क्या होगी खुद सोच लो। जब अगली बार मछली बाज़ार की सडांध तुम्हें परेशान करे तो याद रखना कि यह तुम्हारी अपनी गंध है जो तुम्हारी दुनिया में आने पर मुझे मिली है।

यह मछली की गंध नही है।


Wednesday, July 11, 2018

भाषा ही वह वर्जित फल है

कहावत कहती है कि एक चुप सौ को हराता है । कहते हैं कि कुत्ता मनुष्य सबसे अच्छा दोस्त है । संत कवि तिरुवल्लुवर ने कहा था कि वीणा मधुर है और वंशी मधुर है, ऐसा वही कहते हैं जिसने नवजात की किलकारी नहीं सुनी । चलचित्रों में चार्ली चैपलिन का कार्य सर्वोत्तम की श्रेणी में रखा जाता है । अंग्रेजी गायक रोनन कीटिंग के एक गाने की पंक्ति में प्रेमी कहता है कि जब तुम कुछ नहीं कहती तो सब कुछ कह जाती हो।

ऊपर के सारे उद्धरण एक ही दिशा में इंगित करते हैं। शायद चीज़ें बेहतर होती हैं जब आपकी भाषा मौखिक न हो । यह बात गौर करने लायक है कि पूरे जगत में मनुष्य ने ही मौखिक और लिखित भाषा का विकास किया है । और समस्त प्राणी जगत में मनुष्य ही एक प्राणी है जो झूठ बोल सकता है । क्या सच और झूठ की उत्पत्ति भाषा की उत्पत्ति के बाद हुई? क्या बिना भाषा के विकास झूठ बोलना संभव था ? बच्चे भगवान का रूप कहे जाते हैं क्योंकि वह झूठ नहीं बोलते या उन्होंने पूरी तरह भाषा की विद्वता प्राप्त नहीं की होती है । आखिर बच्चों और बड़ों में क्या फर्क आ जाता है कि भगवान का रूप कहे जाने वाले बच्चे बड़े होकर भगवान नहीं कहलाते । क्या भगवान भगवान इसीलिए कहलाते हैं कि वह मंदिरों, मस्जिदों और गिरजाघरों में वह कभी कुछ नहीं बोलते । शायद यही कारण है ईश्वर की लाठी में आवाज़ नहीं होने की बात कही गयी है ।

 

शायद भाषा ही वह वर्जित फल है जिसको चखने के बाद हम इंसान ईश्वर के घर से निकाल दिए गए। हमारे पुरखों ने जरूर इस चीज़ को महसूस किया होगा कि उनकी सारी समस्याओं की जड़ यह भाषा ही है । इसीलिए बचपन से ही सुनते आये कि सोच समझ कर बोला करो । बोलने से पहले यह सोचो कि सुन ने वालों को बुरा तो नहीं लगेगा । सत्य वचन बोलो , असत्य मत बोलो । सत्य बोलने की भी पूर्ण आज़ादी शायद नहीं दी गयी है । सत्य बोलो लेकिन अप्रिय सत्य मत बोलो। बोलने की मात्रा भी निर्धारित की गयी है । ज्यादा मत बोलो । वैसे यह कभी नहीं बताया गया कि कितना बोलना उचित है और कितना बोलना अनुचित । बोलने में थोड़ी कमी रह जाए तो आपको जल्द ही सुनने को मिलेगा कि आप तो कुछ बोलते ही नहीं । कुछ बोलो भी ऊपर वाले ने जुबान नहीं दी क्या ?

विडम्बना देखिये कि भाषा का आविष्कार मनुष्य ने एक दूसरे को समझने के लिए किया लेकिन मनुष्य स्वयं आज तक तक भाषा का समुचित इस्तेमाल करना नहीं समझ पाया । यह कुछ ऐसा ही है जैसा कि कहानियों में किसी वैज्ञानिक का अपना ही बनाया रोबोट उसके नियंत्रण बाहर हो उसके विनाश का कारण बने या भगवान शिव का भक्त भस्मासुर बन जाये ।

एक तर्क यह भी दिया जाता है भाषा ही मानव सभ्यता का आधार है । परंतु यह कैसी सभ्यता है जिसके इतिहास का हर एक पन्ना युद्धों की गाथा है । अगर भाषा नहीं होती तो शायद कोई युद्ध भी नहीं होते। बिना भाषा के क्या किसी का अपमान करना संभव है? क्या शेर अपने से निर्बल जीवों का अपमान करते हैं? घृणा , अपमान , धर्म , मिथ्या जो मानव की समस्त समस्याओं की जड़ हैं , क्या उसके मूल में भाषा नहीं है? प्यार जताने के लिये भाषा की जरूरत नहीं है, हाँ बिना भाषा के आप द्वेष नहीं फैला सकते । काम क्रोध लोभ मोह मदऔर मत्सर्य मानव की कमजोरियां बताई गयी हैं, जिनपर अगर वश कर लिया जाए तो पृथ्वी स्वर्ग बन जाये । परंतु यह सारे अवगुण शेर, हाथी , स्वान सब में विद्यमान नहीं हैं? क्या शेर काम महसूस नहीं करते, या क्रोधित नहीं होते। हाथियों में भी भोजन देख लोभ होता है, अपने बच्चों के लिए मोह तो सर्व सुलभ प्राकृतिक गुण है

लब्बोलुआब ये कि इन सारे सार्वभौमिक अवगुणों के होने के बाद भी समस्त प्राणिमात्र में मनुष्य की समस्याएं सबसे जटिल हैं । इसका अर्थ है कि हममें शायद कोई और अवगुण भी है जो ईश्वर प्रदत्त नहीं है । कोई अवगुण है जो सिर्फ मनुष्यों में है और जिसका विकास शायद मनुष्य ने ही किया है । क्या वह चीज़ भाषा है ?

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चिर आपका ,
शेखर सुमन

तटस्थ रहने का विकल्प

लंकाधीश रावण द्वारा अपनी पत्नी सीता के अपहरण के पश्चात् पत्नी वियोग में रामचंद्र सीते सीते की आवाज़ लगाते वन वन विचरने लगे। वन में भटकते भटकते रामचंद्र किष्किंधा जा पहुंचे। किष्किंधा में रामचंद्र और लक्ष्मण पहले हनुमान और फिर वानर नरेश सुग्रीव से मिले। सुग्रीव ने रामचंद्र को सीता के आभूषण और वस्त्र दिखाये जो सीता ने पुष्पक विमान से नीचे गिराए थे। रामचंद्र को आभूषण देख यह विश्वास हुआ कि सीता की उनकी खोज सही दिशा में जा रही है। इन सारी बातों के बीच रामचंद्र यह जान गए कि किसी चीज़ को लेकर सुग्रीव बहुत चिंतित हैं। कारण पूछने पर सुग्रीव ने बताया कि उसके बड़े भाई बालि ने न सिर्फ उसका समस्त राजपाट छीन लिया है बल्कि उनकी पत्नी को भी अपने राजमहल में रख लिया है। इतना सुनते ही रामचंद्र ने कहा कि सीता को ढूंढने से पहले हमें बालि के अन्याय का अंत करना होगा। फिर रामचंद्र ने बालि-सुग्रीव संग्राम के बीच पेड़ के पीछे से बाण चला कर बालि का वध किया और सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाया।


जीवन में हमारे सामने बहुधा ऐसे अवसर आते हैं जब हमें यह निर्णय लेना होता है कि उस विषय में हम हस्तक्षेप करें या तटस्थ रहें। तटस्थ रहने का विकल्प हमारे पास इसीलिए होता है क्योंकि उपरोक्त मामले से हमारा सम्बन्ध नहीं होता। उस मामले में कुछ भी हो, हमारे जीवन, दिनचर्या पर कोई असर होता प्रतीत नहीं होता। तटस्थ होने के पीछे दूसरा कारण होता है किसी की निजता में दखल न देने की बात। हम बहुत चीज़ों से यह कह कर अपने आप को अलग कर लेते हैं कि यह तो उनका निजी मामला है, हम बीच में क्यूँ पड़ें। तटस्थ होने के पीछे नियमों का हवाला दिया जाता है कि उस मामले में हमारा हस्तक्षेप इन सामजिक और दंडसंहिता का नियमों का उल्लंघन माना जायेगा। कई बार ऐसा होता है कि अंतःमन में यह सोचने के बावजूद कि हमारा हस्तक्षेप अपेक्षित था, हम उपरोक्त कारणों की वजह से अपने आप को तटस्थ रखने का निर्णय लेते हैं।

1971 में भारत के सामने कुछ ऐसी ही स्थिति थी। बांग्लादेश में पाकिस्तान की सेनाएं निहत्थी जनता पर हर तरह के अमानवीय अत्याचार की अति कर रही थी। महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, बच्चों की निर्मम हत्याएं और रिहायशी इलाकों में सैन्य कार्रवाई की खबरें अंतराष्ट्रीय पटल पर आ रही थी। सारे देश इसे पाकिस्तान का अंदरूनी मामला बता, अंतराष्ट्रीय नियमों का हवाला दे कर तटस्थ रहे और हस्तक्षेप से इंकार किया। भारत सरकार और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दूसरे देशों से अलग इस जनसंहार को रोकनेे के लिये सैन्य हस्तक्षेप करने का निर्णय लिया। सैम मानेकशॉ की सेनायें बांग्लादेश घुसी और आगे जो हुआ वह भारत के गौरवशाली इतिहास का एक स्वर्णिम पन्ना है।

अब सोचिये कि क्या होता अगर रामचंद्र बालि सुग्रीव प्रसंग में इसे दो भाइयों का आपसी मामला बता कर तटस्थ रहते और यह सोचते कि अपनी पत्नी को ढूंढना उनका पहला कर्तव्य है, उसे छोड़ बालि सुग्रीव के प्रसंग में क्या पड़ना। क्या होता अगर भारत ने बांग्लादेश में हस्तक्षेप करने का निर्णय नहीं लिया होता तो क्या आम जनता पर हो रहे सैन्य अत्याचार रुकते? सीधा सा उत्तर है कि यह गलत होता। रामचंद्र ने भले ही बालि को छिप कर बाण से मारा जो युद्ध के नियमों का उल्लंघन है, लेकिन बालि वध उचित निर्णय था न कि तटस्थ रहने का फैसला। उसी प्रकार से एक तरीके से देखें तो बांग्लादेश के युद्ध में भारत का हस्तक्षेप पाकिस्तान की संप्रभुता का हनन और अंतराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन था, लेकिन भारतीय सेना का बांग्लादेश प्रवेश न केवल उचित था बल्कि सराहनीय और गौरवशाली भी था।

‌कुछ दिन पहले घरेलू हिंसा को रोकने के लिए एक जागरूकता अभियान चलाया गया था, बेल बजाओ या रिंग द बेल अभियान। इसमें दिखाते थे कि किसी घर से आती घरेलू हिंसा की आवाजों को अनसुना कर तटस्थ न रहें बल्कि जाकर उस घर की कॉल बेल बजा कर दखल दें। यह छोटा सा कदम किसी का जीवन तक बचा सकता है। चाहे आप किसी बाल मजदूरी के शिकार बच्चे को देखें , रिश्वतखोरी का शिकार बनते किसी लाचार को, निर्णय आपको करना है कि द्रौपदी के चीरहरण के दौरान आप धृतराष्ट्र बन तटस्थ रहेंगे या कृष्ण की तरह हस्तक्षेप कर द्रौपदी की लाज बचाएंगे।

रोड एक्सीडेंट और रोड रेज के मामलों में मरने वाले लोगों की संख्या दस गुना कम हो जाए अगर लोग तटस्थ न रह दखल दें। लड़कियों पर एसिड फेंकने वालों को सबसे बड़ी ताकत इसी बात से मिलती है कि वह जानते हैं कि भरे बाज़ार में भी वह ऐसा कर निकल जाएंगे क्योंकि लोग चुप चाप तटस्थ रह सारा कुछ देखेंगे, करेंगे कुछ नहीं।

तटस्थ रहने का एक और तरीका है कि जिस समय कड़े शब्दों और कार्रवाई की जरूरत हो,आप गोल मोल नीति और सौहार्द की बातें करने लगे। आप भले ही उस समय अपने आप को तटस्थ नीति परायण और नीति कुशल मानें पर आप वस्तुतः अन्यायी का साथ दे रहे हैं। जिस समय दंड और भेद की आवश्यकता है उस समय साम की बातें करना तटस्थता नहीं कायरता है। हो सकता है कि आपको दखल देने के लिये कुछ नियम तोड़ने पड़ें, लेकिन अगर घर में आग लगी हो तो सामने पड़े पानी के टैंकर का नल खोलने के लिए आप नगरनिगम की आज्ञा की प्रतीक्षा नहीं कर सकते। अपना दखल दें, अपने विचार रखें, निर्भीक होकर रखें, को नृप होई हमें का हानि वाली मानसिकता से बचें। आप अगर संकट और अन्याय के समय शुतुरमुर्ग वाला व्यवहार जारी रखते है, तो फिर मानवाधिकारों की आशा भी न रखें।

जितनी बातें कहने में मुझे इतने शब्द लगे, दिनकर जी ने दो पंक्तियों में समेट कर कहा है।

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।

अंधकार भी आवश्यक है

आपने कभी बच्चों को जादूगर का कार्यक्रम देखते देखा है? जादूगर का हाथ से सिक्का गायब कर देना, टोपी से कबूतर निकाल कर दिखाना, अपनी छड़ी से फूल को हरा से लाल कर देना, यह सारे बचकाने से करतब भी बच्चों को कौतूहल, विस्मय और आह्लाद के भाव से भर देते हैं। अब आप इन बच्चों के साथ बैठे वयस्कों के चेहरों को देखें। या तो उनके चेहरे पर बोरियत का एक भाव होगा कि कब यह बकवास ख़त्म हो कि वह अपने बच्चों को लेकर घर जा सकें । या अपने बच्चों के साथ घुलने के लिये वह अपने चेहरे पर खुशी का एक नकली नकाब पहन जादूगर के करतबों का आनंद लेने की असफल कोशिश करते दिखते हैं।

किसी ऑपरेशन थिएटर में जाकर देखें, एक मरीज के दिल का इलाज़ चल रहा है। डॉक्टर के एक टीम ने मरीज़ के छाती पर एक बड़ा सा चीरा लगा रखा है। अंदर दीख रहा है लाल खून से सना और उछलता सा दिल और रक्त धमनियां मानो अभी बस फट पड़ेंगी। आप ज्यादा देर देख नहीं पाएंगे। अब आप उस मरीज़ की तरफ देखिये जिसके आधे चीरे शरीर को आप देख तक नहीं पा रहे। मरीज़ शांत बेहोशी की हालत में रहेगा। चेहरे पर दर्द और शिकन का कोई भाव नहीं। शायद आप उसके चेहरे पर मुस्कान की वह लकीर भी देख पाएंगे जो बेहोश होने से पहले उसके चेहरे पर आयी थी जब डॉक्टर ने यह कहा था कि चिंता मत करो, तुम बिलकुल ठीक हो जाओगे।

मानव सभ्यता के प्रारब्ध से अब तक हुए सतत विकास के पीछे मानव की जिज्ञासा का बहुत बड़ा हाथ है। इसी जिज्ञासा ने विज्ञान का विकास किया है, इसी जिज्ञासा ने बुद्ध को जन्म दिया , यही जिज्ञासा अध्यात्म की भी जननी है। परंतु जैसा कि प्रकृति का नियम है हर चीज़ का संतुलन आवश्यक है। जिज्ञासा और ज्ञान का संतुलन भी आवश्यक है। आप सोचेंगे ज्ञान का संतुलन क्या अज्ञानता है? और अगर हाँ तो अज्ञानता अच्छी कैसे ही सकती है। आपको हर चीज़ का ज्ञान हो जाए यह तो किसी की तरह से कोई बुरी बात नहीं ही सकती। अब जरा आप पहले दोनों उदाहरण पर गौर करें? ऐसा क्या अंतर है वयस्कों और बालकों में कि जादूगर का वह मैजिक शो उनमें हर्ष और आनंद का संचार करता है और आपको बोरियत और खीझ के भाव से भर देता है? ऐसा क्या है कि जिस चीरे को आप देख भी नहीं पाते, मरीज़ जिसके शरीर पर वह चीरा पड़ा है वह आराम से पड़ा मुस्कुरा रहा है।

आप जादूगर के करतबों से इसलिए बोर होते हैं क्योंकि आप जानते हैं कि जादूगर ने पहले से ही टोपी में कबूतर छुपा रखा है। आप जानते हैं सिक्का कहीं गायब नहीं हुआ बल्कि जादूगर ने बस उसे अपने लंबी आस्तीनों में छुपा लिया है। आपका यह ज्ञान आपको खीझ दे रहा है और बच्चों की वही अज्ञानता उनको परम आनंद। अगर ज्ञान सदैव अच्छी चीज़ है तो जरा कल्पना करें कि डॉक्टर कि टेबल पर पड़ा वह मरीज़ अपने दर्द को जाने और महसूस कर सके। अगर मरीज़ को अपने छाती पर चलते नश्तर महसूस हों और उनको वह देख सके तो क्या उसका ऑपरेशन संभव होगा? यह मरीज़ का अपने दर्द की अनभिज्ञता ही है जो उसके लिए जीवनदायी सिद्ध हो रहा है।

ईश्वर को सर्वज्ञ कहते हैं। मानव होने का आनंद इसी चीज़ में छुपा है कि हम सर्वज्ञ नहीं है। हमारी अनभिज्ञता कई बार हमें आनंद देती है कई बार दर्द कम करती है। अब अगर कोई ज्ञान मुझे माँ के प्यार का कारण हार्मोन और रासायनिक परिवर्तन बताता है तो मैं ऐसे ज्ञान को त्याग अज्ञानी रहना पसंद करूँगा। सब कुछ जानना बिलकुल जरूरी नहीं है। अंधकार भी आवश्यक है , हमेशा प्रकाश हो तो काम नहीं चलता। आपको आराम की नींद अँधेरे में आती है न कि तेज़ प्रकाश में। अगर बादल देख मोर नाचते हैं और हम छाता खोलते हैं तो शायद इसका एक कारण यह भी है क्योंकि वे वाष्पीकरण और संघनन की प्रक्रिया शायद नहीं समझते। हमारे अंदर का बालक, हमारे मन का वह मोर और दर्द से अनभिज्ञता अगर अज्ञानता से संभव है तो जरूरी है कि हम इसकी भी जरूरत समझें। असतो मा सद्गमय तब तक ही अच्छा है जब तक हम मानव बनें रहे। ईश्वर और सर्वज्ञ बन शायद इतना आनंद न मिले।

पेड़ काट कर वृक्षारोपण

एक आदमी कड़ी धूप में कुल्हाड़ी लिये सड़क किनारे खड़े पेड़ों को काट रहा था। आसपास के लोगों ने उसको पूछा कि भाई यह हरे भरे पेड़ क्यों काट रहे हो। उस आदमी ने कहा कि कल यहाँ पर मंत्री जी आकर पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम के तहत वृक्षारोपण करेंगे , इसीलिये यहाँ पर उसके लिए जगह बना रहा हूँ।

आये दिन आप देखते होंगे मदर्स डे, फादर्स डे, फ़्रेंड शिप डे वाले सन्देश आते रहते हैं। हम भारतीय अगर इन दिनों को मनाना शुरू कर दें तो यह एक विडम्बना ही है। जो सभ्यता माँ और मातृभूमि को स्वर्ग से भी ऊपर मानती है, वहां मदर्स डे मनाने की कोशिश पेड़ काट कर वृक्षारोपण है। फ्रेंडशिप डे पर मुझे व्हाट्सएप्प पर ऐसे मेसेज मिलते हैं कि अगर आपको मेरा यह मैसेज मिला तो मतलब आप मेरे दोस्त हो। आप मुझे यह मैसेज वापस भेजिए तो मैं मानूँगा कि आप भी मुझे दोस्त मानते हो। जहाँ कृष्ण ने सुदामा को राजमहल और दुर्योधन ने कर्ण को राजपाट देने के बाद बदले में कुछ नहीं चाहा, वहां लोग एक फॉरवर्ड वापस ना पाने पर सोचते हैं कि वह तो मेरा दोस्त नहीं।

आखिर यह चीज़ें हमारे यहाँ क्यों हो रही हैं? इसका कारण है कि हम विदेशी परंपराओं को बिना समझे अपना रहे हैं। सिर्फ इसलिए कि हमने विदेशियों ऐसा करते देखा है, हम भी करना चाहते हैं। इन परंपराओं की जरूरत पश्चिमी देशों में ज्यादा है। आपने अगर फ्रेंड्स, हाव आई मेट योर मदर और द बिग बैंग थियोरी जैसे धारावाहिक देखे होंगे तो आपने देखा होगा कि वहाँ पर माँ बाप बच्चों से अलग रहते हैं, बच्चों का माँ बाप के साथ रहना सामान्य नहीं माना जाता। बिग बैंग थ्योरी में तो हॉवर्ड नाम के किरदार का मज़ाक हर एपिसोड में इसलिये उड़ाया जाता है कि वह अपनी माँ के साथ रहता है। मेरा मकसद यह कतई नहीं है कि पाश्चात्य संस्कृति हमसे नीचे है या गलत है। हाँ वह हमसे अलग जरूर है। इसीलिये मदर्स डे मनाना उनको ज्यादा शोभा देता है, शायद उनको ज्यादा जरूरत है। हमको जरूरत है कि हम टाइगर दिवस मनाये क्योंकि टाइगर कम बचे हैं, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी वालों को मदर्स डे मनाने की स्थिति अभी नहीं आयी।

‌अब राजनीतिक परिपेक्ष्य ही लें। पिछले 40 सालों से अगर भारतीय राजनीति किसी एक शब्द के चारों और घूम रही है तो वह शब्द है धर्मनिरपेक्षता। आपको पता होगा कि हमारे संविधान की मूल प्रति या प्रस्तावना में यह शब्द नहीं है। यह शब्द बाद में 1976 में 42वें संविधान संशोधन के तहत जोड़े गये। जिस धर्मनिरपेक्षता को भारत की राजनीति में लाया गया, उसकी अवधारणा मूलतः यूरोपियन है। यूरोप जहाँ का इतिहास चर्च और चर्च के राजनीतिक चरित्र की एक गाथा है। किसी से छुपा नहीं है कि चर्च ने अपने राजनीतिक विरोधियों का दमन किस क्रूरता से किया। चर्च के विरोध का अर्थ था सुनिश्चित और हृदयविदारक मौत। तो जब यूरोप में लोकतंत्र आया तो यह सुनिश्चित करने के लिये कि चर्च और धर्म का हस्तक्षेप राजनीति में न हो, वहां धर्मंनिर्पेक्षता के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इसका मकसद था कि सत्ता और सरकार का कोई धर्म न हो दूसरे शब्दों में कहें तो चर्च को सरकार से दूर रखा जाये। यह धर्मनिरपेक्षता यूरोप की आवश्यता थी और इसने यूरोप में लोकतंत्र स्थापित करने में मदद भी की। लेकिन क्या भारत में इसकी जरूरत थी? क्या भारत के मंदिर चर्च की तरह राजनीतिक केंद्र रहे हैं ? क्या भारत के अशोक और अकबर जैसे शासकों ने जैसे शासन चलाया वह धर्मनिरपेक्ष नहीं था? वसुधैव कुटुम्बकम जैसे सिद्धांत के रहते क्या हमें कहीं और से धर्मनिरपेक्षता सीखने की आवश्यकता है?
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‌यह कुछ ऐसा ही है जैसे किसी स्वस्थ आदमी का ह्रदय निकाल उसको कृत्रिम हृदय प्रत्यारोपित कर दिया जाये। इससे व्यक्ति पहले से बेहतर नहीं हो सकता। ह्रदय प्रत्यारोपण दिल के मरीजों के लिए है, स्वस्थ व्यक्ति के लिए यह जानलेवा तक हो सकता है। मूर्खतापूर्ण और खर्चीला तो यह होगा अलग से । यह किसी से छुपी बात नहीं है कि जब से यह धर्मनिरपेक्षता वाला कृत्रिम ह्रदय हमारे लोकतंत्र को लगाया गया है, हमारे हार्ट अटैक बढ़ ही गये हैं, घटे नहीं। सेकुलरिस्म के नाम पर वह सारी चीज़ें की जा रही हैं जो धर्मनिरपेक्ष कतई नहीं है। अशोक स्वयं बौद्ध थे और अकबर दीन ए इलाही का धर्म चलाते थे। इस हिसाब से इस यूरोपियन धर्मनिरपेक्षता के अनुसार दोनों धर्मांध थे न कि धर्मनिरपेक्ष।
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‌यह बात बहुत आश्चर्यजनक नहीं है कि हमें अपनी चीज़ों और अपनी संस्कृति से पाश्चात्य चीज़ें बेहतर लगती हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने हमपर राजनीतिक और मानसिक रूप से शासन किया है। राजनीतिक शासन तो 1947 में समाप्त हो गया, मानसिक शासन अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। जरूरत है कि हम अपनी चीज़ों के महत्व को समझें और वन काटकर वृक्षारोपण वाला कार्य न करें।

शून्य आपका जीवन सार है

शून्य की एक खास बात है। चाहे कोई भी भाषा हो , कोई भी लिपि हो, शून्य को लिखने का एक ही तरीका है। एक वृताकार आकृति जिसके अंदर खाली है, बाहर खाली है। जिसका कोई ओर छोर नही। संख्या प्रणाली शून्य से शुरू हो बढ़कर अनंत तक जाती है। अनंत का निशान भी दो शून्य से मिलकर बना है। उसका भी कोई ओर छोर नहीं। अगर शून्य और अनंत एक जैसे हैं, तो इसके मायने क्या हैं?

आप किसी चीज़ को उछालो, चीज़ ऊपर जाएगी, फिर नीचे आएगी। आप ज्यादा जोर से उछालोगे तो चीज़ ज्यादा ऊपर जाएगी, पर नीचे आएगी जरूर। उसी रफ्तार से जिस रफ्तार से गई थी। इंसान तप करके ईश्वर बनना चाहता है, ईश्वर अवतार लेकर इंसान बनना चाहता है। कोई भी चीज़ सीधी नही है जिसके सिरे एक दूसरे से अलग हों। सारे सिरे एक दूसरे से मिलते हैं।

‌दुनिया गोल है। यह बात भौगोलिक रूप से और आध्यात्मिक रूप से भी सच है। चीज़ें जहां से शुरू होती हैं, वहीं खत्म होती हैं। यह एक ध्रुव सत्य है। पर मानव इच्छाएं वृताकार नहीं उर्ध्वगामी है। हमेशा सीधी लकीर में ऊंचा से और भी ऊंचा जाना चाहती हैं। गोलाकार दुनिया सीधी मानव आकांक्षाओं को तब तक ही संभाल सकती है जब तक यह उसकी परिधि के परे न जाये। ज्यामिति के अनुसार कोई भी सीधी चीज़ तब तक ही सीधे रूप में एक गोले के अंदर रह सकती है जब तक उसकी लंबाई गोले के व्यास से कम हो। उससे ज्यादा सीधी चीज़ को अगर गोले के अंदर रहना है तो मुड़ना पड़ेगा। मुड़ना पड़ेगा उसी दिशा में जहां से उसकी शुरुआत हुई थी। आपकी प्रगति, इच्छाएं, महत्वाकांक्षाएं एक खास बिंदु से ऊपर जाकर वापस अपने आदि की तरफ लौटेगी। अब यह आप पर निर्भर है कि आप इसको प्रकृति का नैसर्गिक सिद्धांत मान स्वीकार करते हैं या इसके खिलाफ लड़ने का व्यर्थ प्रयास कर विफल और हताश होने का निर्णय लेते हैं। 

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‌संख्या शून्य अपने आप में एक संख्या से कहीं बढ़ कर है। शून्य आपका जीवन सार है। धरती पर खड़े होकर अपनी स्वप्निल आँखों से तारों भरे सुसज्जित आकाश को देख मानव ने उसे अनंत अंतरिक्ष कहा। वो अंतरिक्ष जहां पहुंचना और उसपर आधिपत्य मानव सभ्यता की पराकाष्ठा कही जाए। कालांतर में मानव जाति ने अंतरिक्ष को जानने के बाद उसका एक नाम शून्य ही रखा। अगर उत्पत्ति और पराकाष्ठा दोनों शून्य में ही समाहित हैं तो इसका अर्थ है कि आपकी उर्ध्वगामी सीधी रेखा वाली जीवन की योजनाएं बहुत दूरदर्शी नही है। सिर्फ छोटे समयकाल में आपकी ऐसे योजनाएं तार्किक लगती हैं। ओलिम्पिक में होने वाली दौड़ को ही देखें। 100 मीटर वाली दौड़ सीधी रेखा में होती है और 800 मीटर वाली दौड़ गोलाकार। आप जितनी लंबी दौड़ के धावक होंगे आप जानेंगे कि आपकी शुरुवात और आपकी नियति एक ही जगह होनी है। आप उसी हिसाब से अपनी मानसिकता को ढालेंगे और शून्य से डरेंगे नहीं बल्कि उसे ही सत्य मान स्वीकार करेंगे।

निंदक नियरे राखिए,

एक राजा को महंगे महंगे कपड़े पहनने का बड़ा शौक था। दूर दूर से दर्ज़ी कारीगर आते और अपनी बेशकीमती कपड़े राजा को पहनाते। राजा भी सबको मुंहमांगी कीमत और इनाम दे विदा करता। एक बार दो ठगों ने राजा की इस कमजोरी का फायदा उठाने का सोचा। वो राजा के दरबार पहुंचे और उन्होंने कहा कि वो राजा के लिये सबसे अनूठा लिबास बनायेंगे। उन्होंने राजा से कहा कि उन्हें यह लिबास बनाने में पूरे एक महीने का वक़्त लगेगा। राजा ने दोनों के रुकने की व्यवस्था राजमहल में ही कर दी और उन्हें राजकीय अथिति का सम्मान दे दिया गया। दोनों ठग आराम से ऐशो आराम की ज़िंदगी काटने लगे। लेकिन जो नौकर चाकर उनके कमरे में जाते उन्हें कपड़े के नाम पर लकड़ी पर टंगी सिर्फ दो रंगीन धागे नज़र आते। जब महीना पूरा हुआ तो दोनों ठग वही लकड़ी और दो धागे लेकर राजा के दरबार पहुंचे। उन्होंने कहा कि दुनिया का सबसे अनूठा लिबास तैयार है । यह ऐसा अनूठा लिबास है जो सिर्फ बुद्दिमान जनों को दिखाई देता है। यह देखिये महाराज कपड़े का सुंदर रंग और उसपर की गई कारिगरी। राजा को सिर्फ दो धागे दिखे पर उसने सोचा शायद वो बुद्धिमान नही है इसीलिए उसे लिबास नही दिख रहा। राजा ने प्रधानमंत्री से पूछा कि क्या उन्होंने इतनी अच्छी कारिगरी कभी देखी है। प्रधानमंत्री ने भी अपने आप को बुद्दिमान सिद्ध करने के लिये कह दिया कि वाकई वो लिबास सबसे अनूठा है। फिर क्या सारे दरबार ने हाँ में हाँ मिलाई और लिबास के तारीफ के कसीदे पढ़ने लगे। दोनों ठग ढेर सारा इनाम लेकर निकल पड़े। राजा ने एलान किया कि वो यह अनूठा वस्त्र पहन कर अपनी प्रजा के बीच जायेंगे। इस बीच प्रजा में भी यह बात फैल गई कि राजा एक ऐसा वस्त्र पहन कर प्रजा के बीच आएंगे जो सिर्फ बुद्दिमान को ही दिखाई देगा। राजा दो धागे पहन जब जब अपनी प्रजा के बीच निकला तो सब लोग लिबास को देखने और सराहने का झूठा नाटक करने लगे। पर एक बच्चे ने जब राजा को नग्न देखा तो चिल्ला पड़ा, राजा नंगा है , राजा नंगा है।

हाल में कहीं पढ़ा कि धोनी को हेलीकॉप्टर शॉट सिखाने वाला उनका दोस्त खेल की दुनिया में अपना कोई मुकाम हासिल नही कर पाया। पर धोनी के उसी हेलीकॉप्टर शॉट के मुरीद सारी दुनिया में हैं। भगवान बुद्ध एक हठयोगी बन उपवास कर अपने प्राण त्याग देते अगर सुजाता की खीर और सीख उन्हें न मिली होती। इस तरह से देखें तो एक साधारण गृहिणी सुजाता ने हमें को बुद्ध दिया जो अपने शरीर की वीणा को तोड़ने को तत्पर था । वही वीणा जिससे बाद में ज्ञान का ऐसा मधुर संगीत निकला जिसने सारी मानव जाति को शांति और सन्मार्ग का संदेश दिया।

‌बड़ी बात और काम की बात हमेशा ज्ञानी, प्रबुद्ध तथाकथित जानकार लोग ही कहें ऐसा आवश्यक नही है। निकम्मा से निकम्मा आदमी भी बड़ी से बड़ी बात कह सकता है। जरूरी है कि बात को सुना जाये, बात कहने वाले पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं है। कहावत भी है कि आम खाओ पेड़ मत गिनो।
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‌सोनू निगम ने कोई धर्म के जानकार नही हैं। ना ही उन्होंने धर्म के बारे में कुछ कहा है। मगर जो कहा है वो ज्यादा जरूरी है। हाँ उनके कहने का अंदाज़ गलत हो सकता है पर बात गलत नही कही है। बजाय इसके कि उन्होंने क्या कहा इसपर बात हो, बात यह हो रही है कि सोनू एक फ्लॉप गायक हैं, उनको राज्यसभा सीट चाहिये, वगैरह वगैरह।। ऊपर से बजने वाले भोंपू को धर्म से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। सोनू की हालत उसी बच्चे की तरह है जिसने सिर्फ वो कहा जो हर कोई कहना चाहता था। बस बच्चे ने कहा दिया कि राजा नंगा है । जिसने भी नंगे राजा को नंगा नही कहा वो या तो स्वार्थवश था या भयवश।
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चाहे सुजाता के रूप में वो बुद्ध को मिले, या एक मुहल्ले के खिलाड़ी के रूप में धोनी को, सीख कहीं से भी आ सकती है। व्यक्ति , संस्था या देश की महानता एक आवाज़ों को दबाने या उनका तिरस्कार करने में नही है। आइना तोड़ देने से आपकी सूरत नही सुधर सकती। न ही संदेशवाहक को मार देने से आपका प्रतिद्वंदी पराजित होता है। ऐसा कर आप वस्तुतः अपनी ही खामियों और कमजोरियों को जगजाहिर कर रहे हैं।

कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई बनाय।
ता चढि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय॥
संत कबीर का यह दोहा अगर आपको पसंद नही है तो कम से कम यह दोहा तो जरूर पसंद होगा।

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय।
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।

सोनू पर चर्चा न करें पर उसकी बात पर जरूर गौर करें। अन्यथा एक तो आप सबके सामने उस नंगे राजा की तरह होंगे जिसपर प्रजा मन ही मन हँसेगी और दूसरे आपके खजाने को कोई ठग ले जाएगा।

devil lies in the details

There is a saying that devil lies in the details.. thats why people people hate details.. they want conclusions.. they want one gist.. one face.. one person.. whom they can felicitate, condemn, criticise and worship..

kill the villain in the climax of the movie, be happy that all evil is gone.. clap clap.. you got a person, a face to be blamed.. villain killed.. evil gone..

..india wins world cup.. everyone contributed.. from coaching staff, selectors, groundsmen, net bowlers, ten players and a captain.. felicitating everyone is tough.. thats like going into details.. felicitate the captain.. make him a hero.. thats easy and convenient..why bother analyzing all factors for the victory..

Pilgrims gets killed in Amarnath.. there are many factors responsible for it.. from islamic forces, lapse in security, some cross border planning and local facilitators.. how to solve that.. talking about every factor is like going into details.. thats boring.. find a whipping boy.. sometime it may be local DM, DSP or even home minister.. fire him .. transfer him.. roast him on social media.. does it solve any issue.. may be.. may be not.. but you escaped the boring task of going into details.. you have found a face.. get your frustration out..
You have not solved 'the problem' .. you have solved 'your problem'..

Problem is still lying there in details smiling at us.. fully assured that hardly anyone will bother coming to him.. problem knows that people will take the easier route and always find a face to blame instead of finding him. they will take shortcuts and will be smearing one face..because thats easy and convenient.. may be thats the problem..

आपका निर्वाण युद्ध में ही निहित है।

कुरुक्षेत्र के मैदान में अपने सामने खड़े युद्ध को आतुर परिजन और बंधु बांधवों को देख पार्थ निराश हो गये। समस्त आशंकाओं से बोझिल मानस पटल पर अनिर्णय के घने बादल छा गये। आशंकित मन ने शरीर को निस्तेज कर दिया और सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर के लिये भी गांडीव को धारण करना दुरूह हो गया। जीवन में ध्येय और मार्ग दोनों धूमिल से हो गये। मेरा लक्ष्य क्या है और उसकी प्राप्ति के लिए कौन सा मार्ग उचित है कौन सा अनुचित , ऐसे प्रश्नों के उत्तर न पा अर्जुन अपने आप को असहाय महसूस करने लगे।

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान देकर अर्जुन को इस आशंका से निकाला। क्या भगवान ने अर्जुन को युद्ध में जीत का आश्वासन दिया? क्या श्रीकृष्ण ने पार्थ को युद्ध में सहयोग का वचन दिया? नहीं। उन्होंने पार्थ को सिर्फ उसके कर्म करने की सलाह दी। वासुदेव द्वारा जीत का आश्वासन फल प्राप्ति का पूर्वानुमान होता, और सहयोग का वचन युद्ध नीति के विपरीत । यह अर्जुन का युद्ध था और उसे ही लड़ना था।

बहुधा हम अपने आप को पार्थ जैसी परिस्थितियों में पाते हैं। जीवन युद्ध में आप आशंकाओं से घिरे होने पर या तो फल का पूर्वानुमान करने की कोशिश करते हैं या किंकर्तव्यविमूढ़ हो उचित अनुचित का अत्यधिक विश्लेषण करने लगते हैं। ऐसे में आपको जरूरत होती है एक कृष्ण की जो आपके लिए अस्त्र तो नही उठाता पर आपको अस्त्र उठाने के लिए तैयार जरूर करता है। परिणाम का पूर्वानुमान लगाने की जगह कर्म करने की सलाह देता है।

अगर आप युद्ध में खड़े हैं तो इसका अर्थ है कि युद्ध तो होना है। और अगर युद्ध होना है तो परिणाम भी आना है। आप युद्ध नहीं टाल सकते क्योंकि भले ही आपको लगे कि युद्ध अनुचित है आपकी इच्छा के अनुरूप नही है, लेकिन यह युद्ध भी आपकी पिछले कर्मों का परिणाम है। आपके द्वारा लिए गए निर्णय और किये गये कर्मों की परिणीति आपके सामने युध्द बन खड़ी है। युद्ध आपकी नियति नहीं आपकी सिद्धि है। गांडीव उठा युद्ध करना अपने कर्मों को स्वीकृति प्रदान करना है। युद्ध में हार मान लेना अपने कर्मों की जिम्मेदारी से दूर जाना है। हार जीत की चिंता से परे , अपने संदेहों की घटा से निकल अपने पूर्णमनोबल के साथ वार करना ही आपका अपने प्रति न्याय है। अगर आपके साथ कृष्ण जैसे सहायक हैं तो आपका सौभाग्य है और आपके पूर्व कर्मो का परिणाम है। जीवन वो कथा है जिसकी पटकथा आपने लिखी है और आप ही उसके नायक हैं।

‌अच्छी बात यह है कि पठकथा का अंत अभी भी लिखा जाना बाकी है। अभी चल रहे कथानक के परिपेक्ष्य से पटापेक्ष का अनुमान लगाना व्यर्थ है। घर को छोड़ कर भाग जाने वाले आगे चल बुद्ध बन गए हैं और किन्नर शिखंडी ने महाप्रतापी भीष्म को शरशैय्या पर लिटा दिया है। आप अर्जुन की तरह निराश हों, बुद्ध की तरह पलायनवादी दिख रहे हों या अम्बा की तरह तिरस्कृत हो रहे हों, आपका निर्वाण युद्ध में ही निहित है।

सत्ता और अखरोट



प्रकृति द्वारा प्रदत्त समस्त उपहारों में अखरोट एक अलग ही प्रकार फल है । अंग्रेजी की कहावत नो पेन नो गेन ( बिना दर्द के लाभ नहीं मिलता ) शायद अखरोट फल को खाने की कोशिश के मानव प्रयासों से उपजी है । बाहर काष्ठ का कठोर आवरण जिसे तोडना आसान नहीं है । बचपन में दीवाली के दौरान मिले उपहारों में मिले अखरोट को तोड़ने की जुगत लगाने के सबके अपने अनुभव हैं। दांत से दबाकर तोड़ने की कोशिश असफल होने पर ज़मीन पर रख कर मुक्का मारकर तोड़ने की कोशिश करना । यह भी असफल होने पर पत्थर मारकर अखरोट तोड़ने को कोशिश में खुद अपने उंगलियों में चोट लगाना और फिर माँ की डांट खाना किसी भी बच्चे की कहानी हो सकती है । समस्त चोट और असफलताओं के बावजूद अखरोट के प्रति आकर्षण भी सर्वविदित है |
पिछले दशक एक फिल्म आयी थी आइस ऐज। उस फिल्म में एक गिलहरी के हाथ एक अखरोटनुमा फल लग जाता है और पूरी फिल्म वह उस अखरोट को ढोती रहती है। उस अखरोट को बचाने और सुरक्षित रखने की गिलहरी की कोशिश पूरी फिल्म में जारी रहती है। पूरी फिल्म में गिलहरी अपने जान की परवाह किये बगैर उस अखरोट को बचाने का प्रयास करती रहती है। अखरोट को अपने पास बनाये रखने उसकी कोशिशें दर्शकों के लिए हँसी का स्रोत है। लेकिन उस गिलहरी के लिए पूरी कहानी में सिर्फ संघर्ष था और वह पूरे जतन अपने अखरोट की रक्षा में लगी रहती है। इतनी जतन से आस पास ही हो रही समस्त घटनाओं से गिलहरी को कोई मतलब नहीं चाहे दुनिया में प्रलय भी आ रहा हो गिलहरी को बस अपने अखरोट की पड़ी थी ।
फिल्म में अखरोट का प्रसंग एक हास्य का पुट डालने के लिए ही रखा गया है लेकिन यह भी सच है कि सबसे गंभीर और कठिन सन्देश देने के लिए हास्य से बेहतर माध्यम मिलना सरल नहीं है।
क्या गिलहरी और अखरोट की यह कहानी कोई और गंभीर सन्देश भी दे सकती है ? गिलहरी अखरोट के लिए सारे खतरे मोल लेती है , सारे दुश्मनो से उसे छुपाती और बचाती रहती है । बस अखरोट को खा नहीं पाती , अखरोट को खाने की कोशिश का अर्थ होगा उसकी सुरक्षा में कमी जिसका फायदा मौके की ताक में बैठी दूसरी गिलहरियां उठा सकती हैं । मानव और सत्ता का सम्बन्ध गिलहरी और अखरोट के सम्बन्ध से कुछ ज्यादा अलग नहीं दीखती । कदाचित सत्ता और संपत्ति उस अखरोट की भांति ही है और मानव जाति वो गिलहरी । मानव इतिहास भी एक तरह से गिलहरी और अखरोट की कहानी है।
हर्षवर्धन , पृथ्वी राज , कुतुबुद्दीन ऐबक, रज़िया सुल्तान, बाबर, अकबर, औरंगजेब, बहादुर शाह, लार्ड माउंट बेटन , जवाहरलाल, प्रियदर्शिनी इंदिरा और नरेंद्र मोदी। सारी मानो गिलहरियां हैं और दिल्ली है एक बड़ा सा मुंह चिढ़ाता अखरोट। वैसा का वैसा । अक्षुण्ण। मानो मन ही मन आने वाली गिलहरियों के बारे में सोच रहा हो और सोच रहा हो वह सारी तरकीबें जो आने आने वाली गिलहरियां अपनाएंगी। दिल्ली देखेगी उन सारी तरकीबों को मानो कोई पुरानी फिल्म का रीमेक देख रहा हो। पात्र नए कथानक पुराना।
आगरे का किला और अपना छोटा सा घर देखता हूं तो कदाचित मन में एक ही विचार कौंध उठता है। बड़ी गिलहरी बड़ा अखरोट। छोटी गिलहरी छोटा अखरोट। दोनों मामले में गिलहरी क्षणभंगुर और अखरोट शाश्वत... गिलहरियों की अगली पीढ़ी के लिए। फतेहपुर सीकरी में दीवान - ए -आम को देखने आये हुए लोगों की भीड़ किसी चीटियों का झुंड सा लगता है जो किसी बड़े से अखरोट हो देख अचंभित हो रहा हो।
अखरोट पाने वाला उसका आनंद नहीं ले सकता.. सिर्फ उसकी सुरक्षा में चिंतित रहता है । अगर अखरोट को भोगने का सोचा भी तो समझ लीजिये दूसरी गिलहरियाँ उससे वह अखरोट बस छीनने ही वाली हैं । अखरोट किसके पास कितने देर रहेगी यह गिलहरी पर निर्भर करता है । गिलहरी अगर औरंगज़ेब जैसी हुई जो अखरोट के लिए किसी को भी रास्ते से हटा सकती है तो शायद अखरोट उसके पास कुछ ज्यादा देर रुकेगी । जफ़र जैसी गिलहरी के पास अखरोट को किसी और को सौंपने के सिवा कोई चारा नहीं रहता ।
ऐसा नहीं है हर गिलहरी और अखरोट की कहानी का अंत एक ही हुआ है जिसमे गिलहरी का पूरा जीवन सिर्फ अखरोट को हथियाने और सहेज कर रखने में बीत गया हो। कुछ गिलहरियों के पैने दांत इस अखरोट के कठोर बाह्य आवरण को तोड़ने में सफल भी हुए हैं । जैसे महान अशोक और युवराज गौतम ने देख लिया कि इस सत्ता की अखरोट के अंदर क्या है। यह एक मात्र संयोग नहीं की अखरोट का फल का ढांचा मानव मस्तिष्क से मिलता जुलता है । सत्ता आपके मस्तिष्क को एक एक बाह्य कठोर आवरण में कैद कर लेता है । चंड अशोक से धम्म अशोक का परिवर्तन शायद सत्ता का रहस्य पता चलना ही है । ऐसा ही कुछ परिवर्तन एक देवव्रत को बुद्ध बना देता है।
ऐसा अक्सर होता है कि आप अपनी ही आवाज़ की रिकॉर्डिंग सुन उसे नहीं पहचान पाते और कहते हैं कि यह मेरी आवाज़ नहीं हो सकती । आइस एज फिल्म में गिलहरी की बेवकूफियों और जिद पर हँस रहा मनुष्य शायद अपनी ही कहानी नहीं पहचान उस पर हँस रहा था ।

This is a boring note

This is a boring note.

Please note this note will bore you.

You are still reading this means you are not afraid of getting bored.

So either you are already bored or doing things you consider worse than being bored.

If you are already bored, then this note hardly makes any difference to you.

If you are not, my question is why you want to get bored?

Is your job not capable enough to bore you?

Is your life so exciting that you are almost bored of being excited?

Is it possible to get bored by excitement anyway?

What is thing that differentiates between boredom and excitement?

Why same premises, same situations, same people, same talks, same food, same job oscillates between extremes of being boring and exciting?

To understand boring, let’s try to decipher what is exciting?

Is exciting something which entertains you?

If we consider exciting same as entertaining is loose sense, it poses bigger questions in front of us?


You need entertainment to get rid of boredom. Right?

Now, this means entertainment and boredom both are opposite to each other.

You can’t be entertained while you are getting bored.

You can’t be bored while you are going through phase of entertainment.

Then what explains the concept of intervals between lectures, movies, meetings?

These intervals are supposed to recharge you?

This means these things ( lectures, movies, meetings) are likely to drain you, consume you, and tire you?


This makes these things( lectures, movies, meetings)  inherently boring.


Because if these are entertaining they should not drain you, consume you, tire you.

Things that drain you, consume you and tire you can’t be entertaining or exciting.

So they have to be boring.

So far we have agreed that you need to take a break or an interval to prevent excessive boredom.


So when you say to anyone, I need a break, you mean to say you are bored.



After you go to your bed in the night, you take a break from your life.

In other words, you are bored.

Now everybody on this planet sleeps.

Even those who claim to have very exciting lives.

Which makes us to believe that everyone around is actually bored.

Boredom is the feeling that is constant, permanent.

Phases of life where you seek entertainment and excitement are actually not your real life.

Real life is always boring.

Is life boring? Then what is death?

Life and death are opposite.

If life is boring, death must be exciting and entertaining.

If death is exciting and entertaining, why are we afraid of death?

Death is sad, death is gloomy. But only to the people who are not dead.

We don’t know for sure how death feels to people who are already dead.

Simple logic says it should be opposite to what living feel about death.

So this means, death is exciting and entertaining for those who are dead or dying.

Then phrase REST IN PEACE does not make sense.

Can you remain calm and peaceful when you are excited and entertained?

No..

This makes me utterly confused what is boring and what is exciting?


Are boring and exciting are simple myths?

Things around us are neither exciting nor boring.

Then what are they?

Think..

Bored?

Excited?

Think..

Lets question the line we started with.

Is this a boring note?