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Sunday, February 7, 2021

आपत्ति का व्यवसाय

हिन्दी अखबारों में मिलने वाले सभी शब्दों में जिस हिंदी शब्द पर मुझे सबसे ज्यादा आपत्ति है, वह शब्द है आपत्तिजनक। हिन्दी अखबारों के पाठक एक शब्द अक्सरहां पढ़ते हैं, 'आपत्तिजनक स्थिति'। सामान्यतः प्रेमी युगल आपत्तिजनक स्थिति में पकड़े जाते हैं। किसी पेड़ के पीछे, सिनेमा हाल में और किसी पार्क की बेंच पर। चूंकि वेलेंटाइन महाकुंभ का सालाना मुहूर्त नजदीक है, तो आप यह शब्द अभी जागरण, भास्कर, प्रभात खबर और पंजाब केसरी के पन्नों पर बिखरा हुआ पा सकते हैं। दूसरा शब्द प्रयोग आजकल फैशन में है आपत्तिजनक पोस्ट। किसी ने नेताजी पर आपत्तिजनक पोस्ट कर दी तो ट्विटर ने किसी के आपत्तिजनक पोस्ट को हटा दिया।

कुछ लोग आपत्ति और शिकायत को एक समझ लेते हैं। लेकिन यह बिल्कुल अलग अलग है। इसको ऐसे समझिए । मान लीजिए आपको बदहजमी की शिकायत है तो वैद्य जी चूरन की पुड़िया आपको थमाएंगे। आपत्ति में इसका उल्टा है। आपको आपत्ति होगी, इलाज किसी और का होगा। और तो और चूरन चटाने वाले वैद्य ही हों कोई जरूरी नहीं, कोई भी उत्साही स्वयंसेवक जिसको आपकी आपत्ति से सहानुभूति हो, वैद्य बन कर दूसरे का इलाज शुरू कर देता है।  

शिकायत और आपत्ति में दूसरा बड़ा अन्तर है इसकी संक्रामकता का। किसी एक व्यक्ति को शादी में मुफ्त की मटन बिरियानी खाने के बाद बदहजमी और खट्टे डकार की शिकायत हो तो यह शिकायत उन्हीं महाशय तक सीमित रहेगी। लेकिन ख़ुदा ना खस्ता किसी को अगर मटन बिरियानी पर  आपत्ति हो गई, तो फिर यह बात उन महाशय तक सीमित नहीं रहेगी। यह आपत्ति उस शादी तक भी सीमित नहीं रहेगी यह बात पहुंचेगी दूर तक। पड़ोसी के किराना से सात समंदर पार रिहाना तक यह आपत्ति फैल सकती है।  भले ही ना ही किराना वाले और ना रिहाना वाले को पता भी हो कि शादी किसकी थी, बिरियानी किसने बनाई, रायता था कि नहीं। आपत्ति होने के लिये यह सब जानना बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है। आपत्ति वह बला है जो बिना रायता बने रायता फैला सकती है। 

और भाई साब, एक बार आपत्ति हो गई, तो समझो विपत्ति हो गई। बात बिरियानी तक नहीं रुकेगी। जिस बकरे को काट कर बिरियानी बनी, उसके नानी के चरित्र प्रमाण पत्र तक खंगाल दिए जाएंगे। जिसने बिरियानी परोसी, उसकी तो खैर नहीं। वह लड़की जो उसके साथ नर्सरी क्लास तक ही पढ़ी थी, वह तक टीवी चैनल पर आकर उसके चरित्र पर टिप्पणी  करेगी कि किस तरह उसने नर्सरी क्लास में पेंसिल छीनने के बहाने उसको गलत तरीके से छुआ था। 

ऐसा भी नहीं है कि आपत्ति में सब कुछ ग़लत ही है। आपत्ति करना एक व्यवसाय है। आप इसके बिज़नेस मॉडल को एक मुहावरे से समझ सकते है। मुहावरा है हर्रे लगे न फिटकरी पर रंग चोखा आए। आपत्ति का व्यापार भी कुछ ऐसा ही है। आपको करना कुछ नहीं है, बस आपत्ति करनी है। कोई जरूरी नहीं कि मटन बिरियानी आपको नापसंद हो तभी आप उस पर आपत्ति करें । बिरियानी नापसंद होना तो दूर, आपके पास उस शादी का निमंत्रण होना भी जरूरी नहीं है। आप बस किसी के पोस्ट "Loved biriyani at a wedding" पर भी आपत्ति करके अपना व्यवसाय शुरू कर सकते हैं। हिम्मते मर्दा तो मददे ख़ुदा की तरह फिर आपकी मदद के लिए मोमबत्ती वाले, change.Org वाले, फेसबुक ग्रुप वाले, ह्यूमन राइट्स वाले और मीडिया वाले ऐसे चक्कर लगाएंगे जैसे ईख से भरे ट्रैक्टर के पीछे गांव के बच्चे दौड़ते हैं। बस आपत्ति होनी चाहिए बढ़िया वाली। 

तो फिर सोच क्या रहे हैं, कुछ ढूंढ निकालिए आपत्तिजनक और शुरू हो जाइए। क्या कहा? अभी नहीं ? 14 फरवरी के बाद। समझ गया, अभी भाईसाब खुद कुछ आपत्तिजनक करने के मूड में हैं। कोई बात नहीं, जब आपको समय मिले, मुझे कोई आपत्ति नहीं है। 

Friday, January 22, 2021

फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी?

कैसे बनी ? कैसे बनी? फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी?

यह वाक्य भूतकाल में है अगर एक खड़ी बोली बोलने वाला व्यक्ति बोल रहा है। वही भोजपुरी बोलने वाले के लिए यही वाक्य भविष्य काल में है। गौर से देखें तो भोजपुरी व्यक्ति यह मानने को तैयार नहीं कि फुलौरी के बिना चटनी बन सकती है, जबकि खड़ी बोली वाला व्यक्ति यह मान कर कि चटनी बन चुकी है, थोड़ा आश्चर्यचकित हो मानो सिर्फ रेसिपी पूछ रहा है।

एक और बात, भोजपुरी बोलने वाला खाने वाली चटनी की बात ही नहीं कर रहा । और फूलौरी शब्द में फूल समान प्रेमिका की व्यंजना हुई है। जबकि खड़ी बोली वाला इसको अभिधात्मक रूप में बोल रहा है। भोजपुरिया जनता फुलौरी और चटनी के बंहाने कुछ और ही बोल रही है, वहीं गाजियाबाद वाला व्यक्ति शायद समोसे के साथ वाली हरी चटनी और मोमो के साथ वाली लाल चटनी की बात सोच रहा है।

और तो और, पूरे भारत के लोग यह सोच भी नहीं सकते, कि यह वाक्य किसी अंग्रेज़ी गाने का मुखड़ा हो सकता है, ऐसा काम सिर्फ भोजपुरिया जनता ही कर सकती है। लंबार्गीनी और मर्सिडीज कार खरीद के लड़की का प्यार पाने की कोशिश कौन से बड़ी बात है, लड़की के बाप से थप्पड़ खा के भी खुद पर हसते हुए गाना गा कर रिंकी का प्यार पाने वाला ही असली भोजपुरी हो सकता है।

बाक़ी जो है ऊ त हइए है। 

Thursday, January 7, 2021

सौंदर्य की उत्पत्ति

सौंदर्य प्रकृति का एक सामान्य सर्वसुलभ लक्षण नहीं है। सामान्यतया प्रकृति अपने साधारण रूप में ही रहती है, सौंदर्य की उत्पत्ति अप्रत्याशित यादृच्छिक घटना है जिसे आप English में unpredictable random event कह सकते हैं। मतलब यह कि कोई ऐसा निश्चित तरीका नहीं है जिससे सौंदर्य की उत्पत्ति सुनिश्चित हो सके।

सौंदर्य की उत्पत्ति और इसके साथ जुड़ा अनिश्चितता के भाव को हम जीवन के हर रूप में देख सकते हैं। साहित्य को ही लें, संत कवि तुलसी दास ने पूरा रामचरितमानस लिखा, राम के जीवन चरित के हर पहलू पर एक से एक दोहे लिखे , छंद लिखे, कोई किसी से कम नहीं। लेकिन को प्रसिद्धि " रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाय पर वचन न जाई" को मिली , किसी और दोहे को नहीं मिली। यही सौंदर्य है, यही इसकी उत्पत्ति है। क्या यह दोहा तुलसी का सर्वश्रेष्ठ दोहा है? शायद नहीं, लेकिन इसमें एक सौंदर्य है कि यह सबकी जुबान पर है। दिनकर का वीर रस पूरित और ओजपूर्ण साहित्य एक तरफ है, और "जब नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता है" वाली पंक्ति एक तरफ। इसीलिए शायद कहते हैं कवि लिखता तो बहुत है, रचना कभी कभी ही बनती है। रचना का बनना ही सौंदर्य की उत्पत्ति है।

मानव क्या ईश्वर भी इस नियम से परे नहीं है। प्रकृति ने खरबों मानवों की निर्माण किया, लेकिन मानव सौंदर्य भी इस नियम से परे नहीं है। वही दो आंखें, एक नाक , दो ओंठ का मेल किसी किसी को सुंदर बना देता है और बाकी साधारण रह जाते हैं। चश्मा दुनिया में अरबों लोग पहनते हैं, लेकिन सौंदर्य रजनीकांत के चश्मा पहनने में दिखता है। भौतिकी में हजारों सूत्र हैं लेकिन e =mc2 वाला सौंदर्य किसी और सूत्र है। आइंस्टीन के इस समीकरण एक खूबसूरत समीकरण माना जाता है।

मतलब यह कि सौंदर्य की उत्पति प्रयास से नहीं हो सकती। कोई भी रचनाकार यह नहीं कह सकता कि मेरी यह कृति सबसे सुंदर होगी। दा विंची को कतई यह पूर्वाभास नहीं रहा होगा कि उसकी तूलिका से उकेरी गई मोनालिसा की मुस्कान का सौन्दर्य उसे और उसकी कृति दोनों को अमर कर देगी।

इसका अर्थ क्या यह है कि चूंकि सौंदर्य की उत्पति का पूर्वानुमान कठिन है, इसका प्रयास ही ना किया जाय। बिल्कुल भी नहीं, सौंदर्य के लिए आवश्यक है साधारण का अनवरत उत्पादन। जब प्रकृति भी हजारों टन कोयला बनाने के बाद एक हीरा बना पाती है, तो मानव मात्र की बात ही क्या है। साधारण कोयले के निर्माण की प्रक्रिया से ही हीरा भी बनता है, इसीलिए आवश्यक है कि कोयला बनाने के लिए जो संयम, दाब और बल प्रकृति लगाती रहती है, उसी प्रकार हम अपना प्रयास करते रहें, और सौंदर्य की उत्पति का काम प्रकृति और नियति पर छोड़ दें।  शायद कर्मण्येाधिकारस्ते का गीता संदेश भी इसी ओर इशारा करता है कि हम सिर्फ कर्म के भागी है, फल किसी और के हाथ में है।

साधारण और सामान्य काम करते रहने का अनवरत प्रयास कभी कभी आर्डिनरी आउटपुट को एक्स्ट्रा आर्डिनरी आउटपुट बना देता है। यह एक्स्ट्रा शायद अथक प्रयासों का एक पुरस्कार है। सचिन तेंदुलकर ने अपने क्रिकेट जीवन में कितने सुंदर शॉट खेले, लेकिन साउथ अफ्रीका में शोएब अख्तर को सक्वेयर कट से थर्ड मैन के उपर लगाया गया छक्का  सौंदर्य उत्पत्ति का उदाहरण है। आवश्यक है कि हम सौंदर्य की प्रत्याशा रखें, प्राप्ति पर विनयता पूर्वक धन्यवाद कहें लेकिन गर्व रहित हो अपने आप को सामान्य और साधारण मान कर अपने सामान्य कार्य में लगे रहें। सौंदर्य और विशेष और यादगार क्षणों की प्राप्ति का मार्ग यही है। 

Tuesday, December 29, 2020

तुम कल पत्थर थे, आज मिट्टी हो

तुम मिट्टी हो। तुम्हें हमेशा आस पास ही पाया है। आस पास क्या, हमेशा तुम्हें अपने पैरों के नीचे ही देखा है। फिर भी, कभी तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनी,  तुम्हें कभी बोलते नहीं सुना। शायद तुम्हें बोलने की इजाज़त लोगों ने कभी दी ही नहीं। तुम हर जगह हो पर मिट्टी को लोग अपने घर आने तक नहीं देते हैं। घर की चौखट के बाहर रखे, उस स्वागतम लिखी चटाई तक ही तुम्हारा स्वागत रुक जाता है, तुम्हारे आगे जाने से घर गन्दा हो जाएगा ना। यह अलग बात है कि वह घर खुद मिट्टी ने बनाया है। 

ऐसा नहीं है कि इन्सानों ने ही  तुम्हारे साथ ऐसा बर्ताव किया हो। बारिश का पानी , जिसका इंतजार कर कर के तुम्हारी छाती फट जाती है। जिस पानी को तुम सूरज की तेज धूप से बचाने के लिए अपने सीने में छुपा लेते हो | अपने अंदर रख कर भी उसको अपने को उससे दूर रखते हो, ताकि वह निर्मल कहला सके | जिसके लिए तुम्हारे पूरे बदन पर दरारें आ जाती है,  वह भी तुमसे मिलने में कतराता है। तुमसे मिलने के बाद उसका रंग मटमैला जो हो जाता है।  हर चीज़ तुम्हीं से निकलती है, पर तुमसे पीछा छुड़ाना चाहती है।

गेहूं , गुलाब, अफीम  या अंगूर सब तुमसे ही निकलते हैं, लेकिन सबसे पहले उन पर लगी मिट्टी धोयी जाती है। तुमसे ही निकले जब तक तुमसे जुदा ना हों, साफ सुथरे नहीं कहलाते। कहते हैं मनुष्य का शरीर भी तुमने ही बनाया है, मिट्टी का तन मिट्टी का मन तो बहुत सुना, यह किसी ने नहीं बताया कि वही मिट्टी अगर शरीर से लग जाय तो मैल कह कर क्यों दुत्कारी जाती है। जिसने अपना सर्वस्व सृजन के लिए न्योछावर हो,  उसका नाम बर्बादी और विनाश से जोड़ कर मिटटी में मिला दूंगा जैसी बातें क्यों की जाती है|  जो मिटटी सोना और हीरा उगलती है उसकी कीमत को माटी के मोल कह कर क्यों नीचे दिखाते हैं | 

शायद दुनिया ऐसी ही है | सुना है कि तुम भी कभी पत्थर थे। वक्त के थपेड़ों ने घिस घिस कर तुम्हें आज मिट्टी बना दिया। पत्थर थे तो शालिग्राम थे, आज मिट्टी बन गए तो मैल, धूल, कीचड़, गन्दगी क्या क्या नहीं कहलाते। फिर सोचता हूं, कि तुम कल पत्थर थे, आज मिट्टी हो | मैं आज इंसान हूं, कल मिट्टी बनूंगा। कल मिट्टी बनूंगा। 



Saturday, December 7, 2019

आक्रोश का नियंत्रण

भारत विविधतापूर्ण संस्कृति है। यहां की मिट्टी में बुद्ध आए तो अंगुलिमाल भी। पृथ्वीराज हमारे अपने हैं तो जयचंद भी पराया नहीं था। भगवान राम को अगर कौशल्या ने गोद उठाया होगा तो संभव है कि मंथरा ने  भी एक बार ही सही उन्हें लाड़ जरूर किया होगा। इसीलिए भारतीय घटनाओं और पात्रों का मूल्यांकन करते वक़्त इसका ध्यान अवश्य रखें कि मात्रा के परिमाण में विसरण काफी ज्यादा हो सकता है । अपने विचार को रखते वक़्त माध्यमिक प्रवृति और विसरण दोनों के परिमाणों को तौल कर देखें। हैदराबाद की घटना के बाद आपका मूल्यांकन कोई आवश्यक नहीं कि आपके मित्रजनों से मेल खाता हो। कल  अगर घटना से जुड़े नए तथ्य प्रकाश में आ जायें तो अपने विचारों में उनको समाहित करने की जगह बचा कर रखें। इससे ही विचारों में संतुलन और नियंत्रण आता है।
 
हैदराबाद में आरोपियों का एनकाउंटर होना उचित नहीं था पर इसका अर्थ यह नहीं है कि आप आरोपियों को सीधे राजगुरु सुखदेव और भगत सिंह बना कर घटना को देखें। हमारी पुलिस की कार्यशैली में हजारों कमियां हो सकती हैं लेकिन उन्हें जनरल डायर घोषित करने से पहले एक पल का चिंतन आवश्यक है। बलात्कार की भर्त्सना जरूर करें, जम कर करें लेकिन आवेश में आकर पूरे भारत को रेपीस्तान कहना भी उचित नहीं है। समाज में कमियां हैं, उनको दूर करने के लिए जनभागीदारी और सर्ववर्ग का सहयोग लगेगा। हमने सती प्रथा को समाप्त किया है लेकिन उसके लिए राजा राम मोहन राय ने कभी भारतीय समाज को नारी हंता नहीं कहा। अस्पृशयता को हमने जीत लिया है, लेकिन उसके लिए ब्राह्मणों और सामंती प्रतिनिधियों का एनकाउंटर नहीं किया। शनै शनै और नियंत्रित जन आंदोलन ही दीर्घकालिक  और स्थायित्व पूर्ण समाधान दे सकता है। 

हमने इतिहास में पढ़ा है कि मानव की आग की खोज की और मानव विकास का चक्र वहीं से प्रारंभ हुआ। सच कहें तो हमने आग की खोज नहीं की। आग तो प्रकृति में हमेशा से थी। मानव ने खोज की थी सिर्फ उसको नियंत्रण करने की कला का। आग की खोज वस्तुतः उसके नियंत्रण की खोज थी।  नियंत्रित आग ही मानव के विकास का आधार बना। जन आक्रोश भी अग्नि की तरह है। उसकी उपयोगिता तब तक ही है जब तक वह नियंत्रित रहे। 

सबको यह बात समझाना संभव भले ही ना हो, हम स्वयं को तो यह अवश्य समझा सकते हैं। बस आगे अपने आक्रोश को चाहे वह समाज की तरफ हो, या व्यवस्था की तरफ या फिर आपराधिक तत्वों की तरफ, उसके उद्घाटन से पहले सुनिश्चित कर लें कि आपने आक्रोश की अग्नि  को नियंत्रित करने का प्रबंध कर रखा है। आप कार चलाना नहीं सीखते, आप कार को रोकना सीखते हैं। कार की गति का रोमांच तब तक ही है जब तक आपको यह पता है कि कार आपके रोकने से इच्छानुसार रुक जाएगी। अगर नहीं तो
 आपकी   गति की मंजिल अस्पताल या शमशान है, आपका इच्छित गंतव्य नहीं। 

अपने विचारों की अग्नि को नियंत्रण में रखें। जिस प्रकार बिना कार को पूरी तरह नियंत्रण में रखने की कला सीखे बगैर आप वाहन लेकर नेशनल हाईवे पर नहीं निकलते, बिना अपने आक्रोश को नियंत्रित किये, उनका प्रचार क्यूं करने लगते हैं।

Wednesday, January 9, 2019

गरीब रथ जैसे शब्द ना बनाइये

साब। अगर बिरियानी है तो वेज बिरियानी कह कर वेज और बिरियानी दोनों का मज़ाक मत बनाइये। रथ है तो सिर्फ रथ कहिये , गरीब रथ जैसे शब्द ना बनाइये।  अगर कोई भाई साब लेफ्टिस्ट हैं तो फिर लेफ्टिस्ट शब्द को लिबरल प्रत्यय का जामा न पहनाइए। आतंकवाद को आतंकवाद ही रहने दीजिए, साथ में अच्छा और बुरा शब्द न लगाइये। रामभक्ति को भक्ति ही रहने दीजिये , उसके साथ दक्षिणपंथ का विशेषण न लगाइये। आप पत्रकार हैं तो पत्रकार ही रहिये, उसके साथ तटस्थ शब्द लगा अपनी सीरत ना छुपाइये । सदियों से जो सनातनी हिन्दू रहा है उसको सेकुलर हिन्दू ना बनाइये।

बातें तो बहुत हैं लेकिन एक बात और।

गरीब है तो गरीब ही कहिये ,उसे सवर्ण  गरीब और अगड़ा गरीब कह कर जख़्मों को लवण का लेप ना लगाइये।

Saturday, September 15, 2018

सिन्धु घाटी की सभ्यता

जब कभी भी सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में पढ़ता हूँ, गौरवान्वित महसूस करता हूँ। क्या हुआ होता अगर यह सभ्यता विलुप्त न होती। मानव सभ्यता आज कम से कम 1000 साल आगे होती। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के नगर नष्ट होने से और वापस महाजनपदों के शहर जैसे पाटलिपुत्र और राजगृह के बसने के बीच करीब 2000 साल का अंतराल है। मोहन जोदड़ो जैसे शहरी व्यवस्था को खोने के बाद मानव को बीस शताब्दी लग गए वैसे नगर दुबारा बसाने में। आपको अचरज होगा कि जल निकास की व्यवस्था में मोहनजोदड़ो का शहर गुडगांव और मुम्बई जैसे आधुनिक शहरों से बेहतर प्रतीत होता है। इन शहरों का भवन निर्माण पकी हुई ईंटों से हुआ है और हम 50 दशकों बाद 2022 तक सबको पक्के मकान देने के लक्ष्य से जूझ रहे हैं। इन शहर का निर्माणकाल गीज़ा के पिरामिडों के समकालीन है। अर्थात ईसा से 3 हज़ार वर्ष पूर्व शहर निर्माण और अभियांत्रिकी का इतना उन्नत विकास हो चुका था पर दुर्भाग्य से यह ज्ञान आने वाली पीढ़ियों को न मिल सका। उनका यह ज्ञान आज भी एक अबूझ भाषा में लिपिबद्ध है। 10 सेंटीमीटर लंबी कांसे की नर्तकी की प्रतिमा को देखिये। खड़े होने की भंगिमा, चेहरे के भाव, शरीर पर आभूषण और विभिन्न अंगों का समानुपातिक गढ़ाव। हमारे पूर्वज धातुओं की उपयोगिता से एक कदम आगे निकल कला और सौंदर्य तक पहुंचे थे। जितने भी साक्ष्य मिले है, प्रतीत होता है कि समाज मातृ सत्तात्मक था। एक स्त्री के गर्भ से निकलती पौधे का चित्र प्राप्त हुआ है जिसे उर्वरता की देवी कहा जा रहा है। शायद स्त्री के सम्मान और उनके अधिकारों को देने में भी हमारा आधुनिक समाज आज भी पीछे है।अगर खेल के मैदान और वृहद स्नानागार मिले हैं, तो लिपिस्टिक और मनके के कारखाने का भी अस्तित्व मिला है। वो जल संरक्षण के भी ज्ञाता थे और व्यापार के लिए पत्तन भी बना सकते थे। जनतंत्र, दाशमिक प्रणाली, गणित, मौसम विज्ञान और नाप तौल जैसे आधुनिक सिद्धांत वो खोज चुके थे और उनका प्रयोग कर रहे थे। जरूर उन्होंने अपने शहर के नाम कुछ सोच कर अच्छे ही रखे होंगे। काश उनकी लिपि हम पढ़ पाते तो शायद ऐसे भव्य शहरों को मुर्दों के टीले (मोहनजोदड़ो) ना कहते।


निश्चय ही उनकी सभ्यता कहीं ज्यादा विकसित रही होगी क्योंकि उनके बारे में हमारा ज्ञान तो सिर्फ साक्ष्यों पर और उनको समझ सकने की हमारी क्षमता पर आधारित है। आज़ादी के बाद हुए बंटवारे में अगर सबसे बड़ा नुकसान हुआ तो यह कि मानवता की यह अमूल्य धरोहर पाकिस्तान में चली गई। एक ऐसे देश में जो मुहम्मद बिन कासिम से पहले के अपने इतिहास को स्वीकारने में शर्म महसूस करता है। वहां इन धरोहरों की क्या देखभाल हो रही होगी, यह सोचना भी व्यर्थ है। डरता हूँ कि कहीं इनका हाल भी बामियान की तरह ना हो। हमें चाहिये कि हम अपने बच्चों को सिर्फ इतिहास के नीरस अध्याय की तरह यह चीज़े ना बतायें बल्कि उसे आधुनिक काल से जोड़ कर सुनाए।

Monday, September 3, 2018

जन्माष्टमी के अवसर पर

क्रूर राजा के आठ बंद दरवाजों वाले कारावास में जन्म,  जन्म से पहले ही हत्या के पूरा प्रबंध, पूतना और कालिया द्वारा हत्या के प्रयास के बावजूद एक ग्वाले का दत्तक पुत्र अगर आगे चल कर भगवान बन सकता है, तो कोई वजह नहीं है कि आप अपनी क्षमताओं और संभावनाओं पर एक पल भी संदेह करें। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन एक संदेश है कि आपकी शुरुआत और वर्तमान परिस्थितियों से आपके भविष्य का कोई भी अनुमान लगा कर निराश होने का कोई कारण नहीं है। अगर कृष्ण विषधर नाग के फन पर खड़े होकर भी वंशी बजा सकते है तो निश्चय ही आपके क्रंदन करने की वजह मामूली है। काले रंग के चरवाहे हो कर भी आप प्रियदर्शी और सर्वप्रिय हो सकते हैं। सार्वजनिक रूप से शिशुपाल द्वारा सौ बार अपमानित होने के बाद भी आपका आत्मसम्मान बना रहना चाहिये। निराशा और विपरीत परिस्थितियों के बीच भी अगर साहस और ज्ञान आपके साथ है तो संख्या बल में बीस गुना ज्यादा शत्रु पर भी आपकी विजय संभव है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं।। जय श्री कृष्ण।।


Friday, August 17, 2018

अटल जी को समर्पित

‌एक कवि का कोमल हृदय रखने वाला जो पोखरण जैसे कठोर निर्णय भी ले सकता है। राजनीति में अजातशत्रु कहलाने वाला एक नेता जो करगिल में घुस आए दुश्मनों को पराजित करने वाला सेनापति बन सकता है। कंधार में पीठ पर घोंपे गए खंजर के बावजूद जो मैत्री का संदेश लेकर लाहौर जा सकता है। चार दशक विपक्ष में बैठने के बाद मिली सत्ता को छल द्वारा एक वोट से छीने जाने पर भी जो बिना चेहरे पर शिकन के झेल सकता है। संयुक्त राष्ट्र में अपनी मातृभाषा में बोलने पर गर्व का अनुभव करने वाला जो दिल्ली मेट्रो की परिकल्पना भी कर सकता है। दो सीट वाली सूक्ष्म पार्टी से शुरुआत करने वाला जो स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी दीर्घकालीन और दूरदर्शी परियोजनाओं को धरातल पर उतारने का कार्य कर सकता है। दलगत राजनीति के दौर में भी जो सच में राष्ट्र नेता कहला सकता है। विराम लेकर बोलने वाला जो अपने संगठन और दल के लिये सात दशकों तक अविराम श्रम कर सकता है। धीमी चाल से चलने वाला जो देश को तीव्र आर्थिक विकास दर से आगे ले जा सकता है।
‌
‌वो जो भी हो वो भारत का अनमोल रत्न है जिसकी कीर्ति ध्रुव तारे की तरह अप्रतिम है, अटल है। अश्रुपूरित श्रद्दांजलि।


Wednesday, August 15, 2018

गांव वाला पन्द्रह अगस्त

सुबह के छह बजे सारे बच्चे स्कूल प्रांगण में जमा हैं। सबके कपडे भले ही पुराने हों, झंडा तिरंगा सबका नया है। विद्यालय प्रांगण भी बिल्कुल अलग सा दिख रहा है,सजा संवारा सा। खड़ी और पड़ी ईंटो के डिजाइन से घेरा गया है झंडोतोलन का स्थान । सजावट के लिये प्रयुक्त ये ईंट पास के ज़मीन्दार के अर्धनिर्मित बैठक और बनिये की चहारदीवारी के लिए रखे गए ईंट के ढेर से नज़र बचा कर लाये गए हैं। अगर देश के लिए मरना शहादत और मारना वीरता कहलाती है तो देश के लिए चोरी करना क्या कहलायेगा, इस पचड़े में बच्चे नहीं पड़ते। उन्हें तो बस पंद्रह अगस्त मनाना है। उसके लिए जो करना पड़े, वो करेंगे। अब उस बांस को ही देख लीजिये जो शान से सर उठाये झंडोतोलन के लिए तैयार सावधान मुद्रा में बीच प्रांगण में खड़ा है, इतनी आसानी से नहीं मिला। कल शाम में कम से कम बारह बच्चों की वानर सेना ने इसको तलाशने के लिये खेत खलिहानो में धमाचौकड़ी  मचायी । बीसियों बांसों को देखने के बाद उस बांस की बल्ली को चुना गया जिसपर तिरंगा को आसमान की ऊंचाई तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।

बांस को चुन लेना तो बस उतना ही काम है जितना कि गांधी जी ने कह दिया कि अंग्रेजों भारत छोड़ो। असली लड़ाई तो उसके बाद लड़ी गयी। बांस काँटना भी कुछ वैसा ही है। बांस की झाड़ियां एक दूसरे से वैसे उलझी होती हैं जैसे बोफोर्स और अगुस्ता की डील। बांस को झाड़ियों कर खींच कर निकालने में एकता का जो परिचय बच्चे देते हैं वो परिचय अगर नेहरू और बोस ने दिया होता तो शायद आजादी 5 साल पहले मिल गयी होती। उसके बाद बांस को हंसूए से छील कर साफ और चिकना किया जाता है। आज़ादी सत्य अंहिंसा के बल पर बिना खून बहाये शायद मिली हो, बांस को छीलने में बच्चों का खून जरूर कुर्बान होता है। पर पंद्रह अगस्त के समय पर इसकी परवाह कैसी।परवाह तो है कि जल्दी से यह बांस स्कूल पहुंचे और बाकी की तैयारियां  पूरी की जा सकें।


स्कूल तक पहुंचने का रास्ता कच्चा है इसीलिये पानी और कीचड़ को हटा कर उसमें बालू और मिट्टी डाली गई है जहां पानी ज्यादा है वहां ईंटें लगा दी गईं है बच्चों द्वारा। कभी कभी लगता है आज़ादी दिलाने में मानसून का सहयोग आज तक किसी ने नही माना। अगर फिरंगियों के मन में रहा भी होगा कि अभी आज़ादी दें या कुछ दिन रुक कर जाएं तो सारा शुबहा मॉनसून की बारिश देख कर ही दूर हो गया होगा। इसीलिए अंग्रेज़ बीच बरसात में भारत छोड़ कर भाग गए। स्कूल प्रांगण की सारी घास साफ कर दी गयी है और बाहर डाल दी गई है। बकरियों का एक झुंड कटी घास पर नेवतें उड़ा रहा है।

कुछ बच्चे विद्यालय प्रांगण में बैठे नारियल की रस्सी में आम के पत्ते फंस कर वल्लरी बना रहे हैं जिससे झंडोतोलन वाले बांस को बाकी के प्राँगण को सजाया जाएगा। कुछ बच्चे कागज की तिकोने छोटे छोटे झंडे गोंद से रस्सी में  चिपका कर रहे हैं। इससे  विद्यालय का तोरणद्वार बनाया जाएगा। झंडोत्तोलन के समय जो फूल झंडा खुलने के बाद बरसने हैं, उन्हें भी बच्चे ले आएं हैं। लेकिन इन फूलों को झंडे के कपड़े में बाँधने की जो कला है वो अद्वितीय है। फूल  ऐसे बाँधे जाने चाहिए कि फहराने के समय रस्सियों के एक झटके से खुल जायें सिर्फ रस्सियों के झटके से ही खुलें । अब यह कला तो सिर्फ स्कूल के चपरासी चाचा को आती है। दो बच्चे उनको सुबह सुबह उनके घर उठा ले आये हैं ताकि झंडे में फूल बांध झंडोतोलन की बाकी तैयारियां पूरी की जा सके।

स्कूल सरस्वती पूजा के बाद फिर से सजा संवारा दिख रहा है। अब ऐसी सजावट अगर गाँव वाले न देखें तो फिर क्या मज़ा? इसलिये पंद्रह अगस्त को बच्चे सवेरे सवेरे पूरे गांव में प्रभातफेरी कर आये हैं। इन्कलाब ज़िंदाबाद और महात्मा गांधी अमर रहें का नारा लगाने वालों बच्चों को शायद इसके मायने भी नही पता , लेकिन गांव वालों के लिये इसका एक ही मतलब है। बच्चे हम गांव वालों को न्योता देने आए हैं कि हमारे स्कूल आओ और देखो हमने क्या सजावट की हैं। ज़मीन्दार के बेटे की बारात का निमंत्रण ठुकराया जा सकता है लेकिन इन मासूमों का निमंत्रण ठुकराने वाली कठोरता अभी गांव वालों में नहीं आई।
कै बजे फहरेगा झंडा?? साढ़े आठ बजे ।
पांच बच्चे एक साथ जवाब देते हैं।
ठीक है हम लोग आ जाएंगे। हो गया आमंत्रण स्वीकार।

सवा आठ बजे सारे बच्चे , सारे शिक्षक और सारी शिक्षिकाएं स्कूल पहुंच गए हैं। गणित वाली मैडम भी जिसको देख कर की आधे बच्चों का हलक सूख जाता है आज कितनी प्यारी दिख रही हैं। इतिहास वाले मास्टर साब जिनकी मुस्कान दिखना सिंधु घाटी की भाषा पढ़ने जैसा कठिन है, आज कितना मुस्कुरा रहे हैं। सारे बच्चे कक्षा के हिसाब से कतार में लग गये हैं, और हेडमास्टर साब भी झंडोतोलन के लिए आ चुके हैं। 9वी कक्षा का एक छात्र चिल्लाता है सावधान। आधे बच्चे सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाये हैं, जिनको सावधान की मुद्रा का पता नही बस ठिठक कर खड़े हो जाते हैं।

जिस तरह हेडमास्टर साब का खादी वाला परिधान 15 अगस्त को पहनना पक्का है, झंडा उनसे न खुलना भी पक्का है। चपरासी चाचा आगे बढ़ते है और बताते हैं कि रस्सी के किस सिरे को पकड़ना है और किस सिरे को खींचना है। कितना भी बताओ, हेडमास्टर साब को क्या समझ में आना। चपरासी चाचा आगे बढ़ कर अपने हाथों से रस्सी को झटका देते हैं और वो गाँठ खुलती है जिससे उन्होनें खुद बांधी थी। ऊपर से पुष्वर्षा होती है और राष्ट्रगान शुरू हो जाता है। कभी कभी लगता है कि चपरासी चाचा जान बूझ कर ऐसे गांठ लगाते थे कि झंडा उनकी मदद के बिना फहर ही न सके।

भाषण के बाद शुरू होता है जलेबी , बूंदी और सेव बंटने का दौर। एक चीज़ समझ में नहीं आती, कि भी कुछ देर पहले  सारे जिन बच्चों को देश का भविष्य और नेता बताया जा रहा था को कहा जा रहा था कि राष्ट्र निर्माण की सारी जिम्मेदारी उनपर हैं उन्हें  मिठाई  बांटने जैसी छोटी जिम्मेदारी निभाने लायक भी नही समझा गया । देश बनाना की जिम्मेदारी भले ही बच्चों की हो पर मिठाई तो खंडूस मास्टर साब ही बांटेंगे। खैर जो भी हो, मिठाई कोई भी बांटे, स्वाद तो वही रहेगा। अप्रतिम और अमूल्य। पांच सितारा होटल के कॉन्टिनेंटल डेसर्ट्स में भी वो स्वाद अब मयस्सर नहीं। स्वतंत्रता सेनानियों को आज़ादी पाकर कितनी खुशी मिली होगी इसका अंदाज़ा बच्चों को जलेबी और सेव पाकर मिली खुशी से लगाया जा सकता है। स्कूल आकर भी कक्षा में पढ़ाई नही करनी, मिठाई खा कर चाहो तो दिन भर कबड्डी, खोखो खेलते रहो। कोई रोकने वाला नहीं, कोई टोकने वाला नहीं। आज़ादी और स्वतंत्रता शायद इसको ही कहते हैं।

अब जब 15 अगस्त के मतलब लांग वीकेंड और ड्राई डे हो गया है, याद आता है बचपन वाला गांव का 15 अगस्त। आजकल हर कोई बताता है कि हैप्पी इंडिपेंडेंस डे पर इंडिपेंडेंस का पता नही चलता । पहले कोई बताता नही था पर आजादी का पता चलता था।

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं। जय हिंद।।

Tuesday, July 31, 2018

यह मछली की गंध नही है।

यह मछली की गंध नही है।

यह गंध है उस मौत की जो आपने अपने जाल में फंसा कर उसको बक्शी है। नदी में स्वच्छंद विचरती मछली से बास नहीं आती, बास आती है जब वही स्वच्छन्दता आपकी भूख मिटाने के लिये बिछाये जाल में फंस कर आपके जंग लगे बटखरों के साथ किलो के भाव से बिकने को बाज़ार पहुंच जाती है। यह गंध आपने उसको दी है उसका पानी छीन कर। यह गंध आई है मछली में आपके निष्ठुर हाथों से जब आपके हाथों ने उसके अधमरे गलफड़ों को खोल कर देखा कि मछली की लाश ताज़ी है या बासी हो चली है। नाक पर रुमाल रख कर मछली बाज़ार में घूमने का यह नाटक क्यों जब यह मौत का बाजार आपने ही सजाया है। अगर मछली न मरे तो तुम भूखे मरोगे और यकीन मानो तुम्हारी लाश को कोई दो कौड़ी फी किलो के भाव से भी न खरीदेगा। तुम्हारी कहावतें सुनी थी मैने तुम्हारे जाल में फसने के समय। वो क्या कहते हो तुम कि बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है!! अगर यह मत्स्य न्याय है तो पूरे तालाब को गंदा करने, सारी मछलियों को पकड़ कर खाने और उसी तालाब को मिट्टी भर कर अपने भवन बनाने को क्या आदम न्याय कहना चाहिये।

तुम्हारी गंध जीते जी मरी मछली की गंध से कहीं ज्यादा घृणास्पद है लेकिन वो तुम्हें पता नही चलेगा क्योंकि तुम उसके आदी हो चुके हो। हाँ जब वही गंध तुम्हारे संसर्ग में आने के बाद मछली में आ गयी है तो तुम नाक भौं सिकोड़ रहे हो। अगर मत्स्यगंधा एक गाली है तो मनुष्यगन्धा क्या होगी खुद सोच लो। जब अगली बार मछली बाज़ार की सडांध तुम्हें परेशान करे तो याद रखना कि यह तुम्हारी अपनी गंध है जो तुम्हारी दुनिया में आने पर मुझे मिली है।

यह मछली की गंध नही है।


Friday, July 20, 2018

मैं हिन्दू हूँ।।

मैं हिन्दू हूँ।

उपकृत हूँ मैं प्रकृति का। उसके हर रूप की उपासना की है मैंने। नदियों को माँ कह उसके गोद में खेला हूँ तो उसकी आँचल समान किनारों पर मैंने सनातन सभ्यता बसाई है। सूर्य और चंद्र ही नहीं, समस्त नवग्रह की विशालता और ऐश्वर्य को नमस्कार किया है। सूदूर तारों को सप्तर्षि कह सम्मानित किया है मैंने। और असंख्य तारों अपने बिछड़े पूर्वज और प्रियजन मान कर प्यार से निहारा है। पर्वत को अपने इष्ट का निवास कैलाश मान कर पूजनीय बनाया है तो हिमालय को माता गौरी का पिता कहा है। तुलसी और बरगद मेरे लिए कल्पतरु हैं। हमेशा चरणों के नीचे रहने वाली दूब जब तक मेरी पूजा में ना हो , मेरी पूजा अधूरी रहती है।

समस्त प्राणीजगत मेरे लिए प्रकृति और मेरे पूजा स्थल का एक अनिवार्य भाग है और मेरे लिए सम्मान का पात्र है।
एक बैल मेरे इष्ट का वाहन बन कर मेरा आराध्य है।  जिसके विषदंतो से मेरे प्राण चले जाएं, उसे भी मैंने अपने इष्ट के कंधों पर स्थान दिया है। मेरे फसलों को चुरा कर नष्ट करने वाले मूषक भी मेरे आंगन में मोदक पाते है और गणपति के साथ मेरी प्रथम पूजा में सम्मिलित हैं। नभ में विचरने वाले विशाल गरुड़ मेरी माँ की अस्मिता बचाने वाले रक्षक के रूप में जाने गए हैं तो एक वानर ने संजीवनी बूटी लाकर मेरे इष्ट के प्राण बचाये हैं। वानर भक्त को मैंने भगवान से ऊपर माना है। गौ को मैंने समस्त देवताओं का निवास स्थान माना है तो श्वान मेरे लिए धर्मराज के साथ सशरीर स्वर्ग जाने वाला एक मात्र जीव है। गौ को अगर मैंने माँ कहा है तो बिल्ली को मौसी कह पुकारा है। एक क्रोंच पक्षी युगल को रोते देख मेरे भावुक हृदय ने रामायण की रचना कर डाली है। शेर मेरे लिए शक्ति का वाहन है तो गजराज ऐश्वर्य का। समस्त प्रकृति मेरे लिए सम्मान का पात्र है ना कि भय और घृणा का। वसुधा पर निवास करने वाला हर वासी मेरे लिये परिवार है,सम्मानित है और मैं उसके बिना अपूर्ण हूँ।


सिर्फ प्रियदर्शी प्राणिजगत ही मेरे हृदय में वास करता हो, ऐसा नही है। मेरे हृदय में डरावने और कुरूप भूत पिशाचों के लिए भी स्थान है। उन्हें शिव का गण होने का गौरव प्राप्त है जो बनने के लिए हजारों सालों की तपस्या भी विफल जाती है। आठ अंगों से टेढ़े अष्टावक्र अपने ज्ञान के लिए हमारे पूजनीय हैं तो कुरूप वेद व्यास को महाभारत लिखने का अवसर मैने दिया है।

तुलसी, सूर और रैदास की छन्दों की चाशनी में डूबी मेरी वाणी है। मेरे  तानसेन और बैजू बावरा के राग और रागनियों में गुंजायमान है सरस्वती की वीणा। कृष्ण की सम्मोहण वाली बाँसुरी से लेकर कोकिला लता सब मुझमें ही समाहित है। मैं आर्यभट्ट का शून्य हूँ, तो मैं विंष्णुगुप्त का अर्थशास्त्र भी हूँ। सुश्रुत का चिकित्सा ज्ञान और विश्वकर्मा की अभियांत्रिकी मुझसे निकले हैं। वात्स्यायन का कामसूत्र भी जानता हूँ और रमण की तरह भौतिकी भी ज्ञात है मुझे। तिरुवल्लुवर की कविता हूँ, मण्डन का ज्ञान हूँ, शंकराचार्य की दूरदृष्टि हूँ, शुक्राचार्य की युद्धनीति हूँ और विवेकानंद का ओज हूँ। सुभाष की चपलता हूँ तो गांधी का गाम्भीर्य भी।

उर्मिला की विरह वेदना और भरत मिलाप का उल्लास दोनो मैं हूँ। सावित्री का सतीत्व हूँ तो अनुसूया का पातिव्रत्य भी। कर्ण और दधीचि का दान हूँ तो श्रवण की सेवा भी मैं ही हूँ। परशुराम का क्रोध हूँ तो यशोदा का वात्सल्य भी हूँ। अशोक का साम्राज्य हूँ तो चोल वंश का गौरव भी। बीरबल का हास्य हूँ। गोनू और तेनाली की प्रत्युत्पन्नमति हूँ। हिंदी की सरलता और व्यापकता हूँ, तो बंगाली की मिठास हूँ। तमिल के पद हूँ तो मलयालम के गीत। तेलगु की प्रार्थना हूँ तो गुजराती की रास। गुरमुखी में लिखी पंजाबी का थिरकता भांगड़ा हूँ तो असमिया की बाउल धुन। प्रेमचंद की लेखनी हूँ तो रवींद्र की बहुमुखी प्रतिभा भी।

मैं वो हूँ जो  बुद्ध और महावीर को भी अपने इष्ट का रूप मान कर पूजता है। मैं वो हूँ जो शिव और साईं दोनो के दरबार में नतमस्तक है। मैं अपने पवित्र त्रिवेणी संगम और प्रयागराज को भी अल्लाहाबाद कह पुकारता हूँ। मैं वो हूँ जो सूदूर देश से आई एक नन को मदर मानता है। गुरुद्वारे में सेवा करने में लगे सेवादारों की कतार में सर पर रूमाल बांधे में आपको दिखूंगा तो पुष्कर में ब्रह्म की उपासना के बाद अजमेर में  हर साल चादर चढ़ाने भी जरूर पहुंचता हूँ। मुझे न जानने वाले जब मुझे धर्मनिरपेक्षता की संकीर्ण परिभाषा समझाते हैं तो मन ही मन उन पर मंद मंद मुस्कुराता भी हूँ।

 मैं वो हूँ जो जिसने गौरी, तैमूर और औरंगज़ेब को जज़िया दिया पर अपना धर्म नहीं। मैं अगर मीरा का समर्पण हूँ तो कलिंग का प्रतिरोध भी हूँ। पराजय में भी सहेजा हुआ आत्मसम्मान पुरु हूँ मैं। मैं वो हूँ जो जयचंद की वजह से अगर पराजित  हुआ है तो शिवाजी की शौर्य गाथा का उत्तराधिकारी भी है। मैं सबमें समाहित हूँ,सबसे मिल कर रहा हूँ। रति और मोहिनी का सौंदर्य और लावण्य हूँ तो काली की रक्त से सनी जिह्वा भी हूँ। मैं शिव का डमरू हूँ और तीसरा नेत्र भी हूँ। तांडव भी ज्ञात है मुझे। शिमला की शांतिवार्ता हूँ तो पोखरण की ज्वाला भी मैं ही हूँ। भाई भाई सुन कर अक्साईचिन गंवाने वाला मैं हूँ तो 1971 में ढाका की वीरगाथा भी मैं ही हूँ।

मैं चिर सनातन हूँ । मैं हूँ तो यह धरा और भी सुंदर है।मैं कुछ शब्दों  में परिभाषित नहीं हो सकता। मैं अनन्त हूँ, मेरी कथायें अनन्त है। इस अनंत गौरवशाली कथा का एक पन्ना हूँ मैं। हिमालय से हिन्द तक मैं ही हूँ। मैं वो हूँ जिसका लहू गंगा, कालिंदी, कावेरी और नर्मदा के जल से बना है। मेरी अस्थियां हिमालय के पाषाण की तरह कठोर हैं। गीता और वेद मेरी दो आँखें हैं जो मुझे ज्ञान का मार्ग दिखाती हैं।

मैं वो हूँ जो हिन्दुस्तान का वासी है।

मैं हिन्दू हूँ।

Wednesday, July 11, 2018

अश्वत्थामा हतो: का चीत्कार

‌कुरुक्षेत्र में महाभारत के युध्द को शुरू हुए चौदह दिन बीत चुके थे। कौरवों की सेना का नेतृत्व अब गुरु द्रोण कर रहे थे। पितामह भीष्म के शरशय्या पर जाने के बाद पांडवों ने युद्ध को आसानी से जीत लेने का जो स्वप्न देखा था, गुरु द्रोण के रहते वो एक दिवास्वप्न से अधिक कुछ नही था। अर्जुन की गांडीव गुरु द्रोण के बाणों के सामने ऐसे निस्तेज थी जैसे सूर्य के सामने दीपक। ऋषि भरद्वाज के पुत्र और परशुराम के शिष्य द्रोण की रणनीति तथा उनकी रचित सेनाओं की अभेद्य व्यूह रचना का पांडव सेनापति धृष्टद्युम्न के पास कोई तोड़ ना था। पांडवों के पास ऐसी कोई विद्या न थी जिससे वह अपने ही गुरु द्रोण को परास्त कर सकें। युध्द कला में पारंगत वो क्रोधित ब्राह्मण महाभारत के युद्ध को मानो एक ही दिन में समाप्त करने का प्रण ले चुका था।
गुरु द्रोण को सीधे नीतिपरक युध्द में हराना असंभव था। परंतु युद्ध सिर्फ अस्त्र शस्त्र और रणकौशल से रणभूमि में नहीं लड़ा जाता। युद्ध लड़ा जाता है बुद्धि और कूटनीति से। युद्ध लड़ा जाता है छल से। पांडवों ने द्रोण को मारने के लिये छल का सहारा लेने का निर्णय लिया। गुरु द्रोण के मन में अपने पुत्र अश्वत्थामा के लिये जो अत्यधिक प्रेम की दुर्बलता थी, उसी दुर्बलता पर वार करने का निर्णय लिया गया। दुष्प्रचार, अर्धसत्य, और कुटिलता में सनी योजना के तहत धर्मराज युद्धिष्ठिर के द्वारा द्रोण को उनके पुत्र के मारे जाने की असत्य सूचना दी गयी । पुत्रवियोग में शोकाकुल और धरती पर पड़े निःशस्त्र पिता को पीछे से वार कर धृष्टद्युम्न द्वारा मार डाला गया।


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‌मार्च के महीने में हज़ारों किसान नासिक से मुम्बई नंगे पांव पैदल चल कर पहुंचे। पूरी मीडिया में किसानों के फटे पांवों की बिवावियाँ दिखा दिखा कर खूब सहानुभूति बटोरी गई। जब वे किसान मुम्बई पहुंचे तो उन्हें पता चला कि उनकी सारी मांगे तो पहले ही मानी जा चुकी हैं। अभी सारे भारत में ऐसे माहौल बनाया जा रहा है कि दलितों और अल्पसंख्यकों पर अत्यााचार बढ़ गए हैं। एक बहुत बड़े वर्ग को यह बार बार बताया जा रहा है कि उनका आरक्षण छीन लिया जाएगा और संविधान बदल कर मनुस्मृति लागू कर दी जाएगी। और यह बातें एक खास बुद्धिजीवियों द्वारा निरंतर अखबार, टीवी और मोबाइल के माध्यम से परोसी जा रही है। एक भय और अराजकता का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। कुछ पत्रकार असुरक्षित महसूस होने का दावा कर रहे हैं, कुछ धर्मगुरु लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए प्रार्थना सभाएं आयोजित कर रहे हैं। हर तरफ़ से अश्वत्थामा हतो: सरीखे चीत्कार सुनाई पड़ रहे हैं।
अगर वास्तव में लोकतंत्र खतरे में होता तो यह सारे लोग इतनी खुल कर अपनी बात न रख पाते। अगर आरक्षण वाक़ई छीना जाने वाला होता, तो उसके लिये सरकार किसी शुभ मुहूर्त का इंतज़ार न कर रही होती। दुष्प्रचार और असत्य आज युद्ध के सबसे बड़े शस्त्र हैं। पहले पूरी दुनिया को बताया जाता है कि इराक में जैविक और रासायनिक हथियारों का जखीरा है। जब पूरे विश्व का इसका विश्वास हो जाता है, तो अमरीकी सेनाएँ बग़दाद में घुस सद्दाम हुसैन का तख्त पलट देती है और सद्दाम को फांसी दे दी जाती है। जैविक और रासायनिक हथियार ना वहां कभी थे और ना कभी मिले। वहां पर तेल भरपूर मात्रा में अवश्य था जिसके लिए वास्तविकता में यह युद्ध लड़ा गया था । आये दिन खबरें आती हैं कि महिला को डायन बात कर मार डाला गया। अधिकतर मामलों में अकेली वृद्ध विधवा महिलाओ की संपत्ति हड़पने का यह एक पुराना तरीका है।
‌द्रोण वध की कथा पुरानी अवश्य है लेकिन आज के समय में प्रासंगिक उतनी ही है जितनी पहले थी। जब भी किसी द्रोण को सीधे युध्द में हराना कठिन प्रतीत होता है, उसे हराने के लिए असत्य और दुष्प्रचार का सहारा लिया जाता है। असत्य फैलाने के लिए पहले किसी निर्दोष अश्वस्थामा हाथी को मारा जाता है और फिर उसकी मौत की खबर को असत्य और अर्धसत्य की चाशनी में लपेट कर फैलाया जाता है। द्रोण को उसके पुत्र की मृत्यु का समाचार ऐसे सुनाया गया था जैसे उनके हितैषी उनके दुख में शामिल होना चाहते हों। लक्ष्य तो था गुरु द्रोण को मानसिक रूप से अक्षम करना ताकि वो युद्धभूमि में सही निर्णय न ले सकें और भावुक हो शस्त्र त्याग दें। और उनका वध करना आसान हो जाये।
आसिफा हो या वेमुला, यह सब उस अश्वस्थामा हाथी ही तरह हैं जिन्हें खास राजनीतिक उद्देश्य से मारा गया है और उनकी मृत्यु का अर्धसत्य आपको सुना कर आपको भावुक और निर्बल किया जा रहा है। किसी भी उत्तेजक और भावुक समाचार को सुन तुरंत निर्णय न लें चाहे आपको वो सूचना उस व्यक्ति से मिल रही हो जिसे आप धर्मराज मानते हैं। झूठ फैलाने के लिए धर्मराजों का ही सहारा लिया जाता है। किसी दुष्प्रचार का शिकार होने से बचें। सूचनाओं को सत्य की कसौटी पर कस कर ही आत्मसात करें। जिस दिन आपसे सत्य पहचानने और उचित निर्णय लेने मे भूल हुई, किसी धृष्टद्युम्न की तलवार आपकी गर्दन पर वार करने के लिए उठ चुकी होगी।

मुखिया मेरी बीवी को क्यों नही मना रहा

एक आदमी था। बड़ा ही सनकी और गुस्सैल। हमेशा बीवी को धमकियां देता और ताने मारता। चाय लाने में दो मिनट देर हुई नही की गालियॉ देना शुरू। तेरे लक्षण ठीक नहीं है, तेरा गांव के मुखिया से चक्कर है। एक दिन गुस्से में आकर उसने बीवी को थप्पड़ जड़ दिया। बीवी ने हड़ताल कर दी। माफी मांगो तभी घर का चूल्हा जलेगा। 2-3 दिन तो चला, फिर आदमी की अकल ठिकाने आयी। बीवी की हड़ताल खत्म करने के लिये गांव के मुखिया के यहां डेरा डाल दिया।
आने जाने वाले लोगों को कहता मुखिया मेरी बीवी को क्यों नही मना रहा, और अगर मेरा घर एक अलग गांव होता तो मैं उसका मुखिया होता और बीवी की हड़ताल खत्म करवा देता। दो चार दूर के पड़ोसी भी जमा हुए जिनका मुखिया से थोड़ा मनमुटाव था। कहने लगे रूठी बीवी को मनाना मुखिया का धर्म है, मुखिया अधर्मी हो अपने कर्त्तव्य से विमुख है।
हम चाहते हैं कि मुखिया इस भले आदमी की दो मांगे अभी मान ले। उसकी बीवी की हड़ताल अभी खत्म करवाये और उसके घर को अलग गांव घोषित करे। गांव वाले परेशान थे, मुखिया के दरवाज़े जाएँ तो तमाशबीनों का मेला लगा रहता। उन्होंने मन बना लिया कि अपनी ही बीवी को थप्पड़ मार कर यह सारा तमाशा करने वाले इस आदमी को गांव से जरूर निकाल फेकेंगे। बस वो अगले मौके का इंतजार कर रहे थे।

जलालत मिली वो भी मोल लेकर

हवाई जहाज में बीच वाली सीट पर बैठा आदमी दुनिया के सबसे बदनसीब प्राणियों में शुमार होता है। वो कहते हैं ना कि हाथ को आया पर मुंह को ना आया। बेचारा पैसे सबके बराबर या जहाँ तक हो सबसे ज्यादा ही भरता है। अगर आपके पास आइल सीट या विंडो वाली सीट है तो इसका मतलब है कि आपने टिकट बहुत पहले कटाई थी जब किराये कम थे। बीच वाले बदनसीब लोगों ने बाद में टिकट ली जब सारी किनारे वाली सीट खत्म हो गई और दाम भी बढ़ गए। मतलब कि जलालत मिली वो भी मोल लेकर।


भाई, हवाई जहाज में इतने पैसे करके के सफर कर रहे हैं पर किस्मत ने ऐसी सीट दी है जिसे यह में नही पता चलता कि हाथ रखने के लिए उनका वाला बाजू कौन सा है। विंडों और आइल वाले अपना हाथ हटाएँ तो इन बीच वालों को हाथ रखने के लिए जगह मिलती है। विंडों वालों का क्या है जब तक मन हुआ खिड़की के बाहर नज़ारे देखे , जब मन हुआ खिड़की बन्द की और सर खिड़की से लगा कर सो गये। आइल सीट वालों के लिए तो आइल एक फ़ैशन रैंप की तरह होता है और वो उसके फ्रंट सीट वाले वीआईपी । एयरहोस्टेस की कैटवाक का नज़ारा देखते रहो सफर का लुफ्त लेते रहो। बेचारे बीच सीट वाले क्या करें। न नज़ारे नसीब में हैं ना नींद!! कैसे सोएं। विंडों सीट वाले साहबजादे ने तीन बोतल तो पानी पी रखी है एयरहोस्टेस से मांग मांग कर। अब पक्का यह उठकर बाथरूम जाएगा। साहबजादे बाथरूम जाना चाहते हैं, बीच सीट वाले खड़े होकर इस्तक़बाल फरमाएं वरना हुज़ूर की तौहीन समझी जाएगी। जलालत यहीं खत्म हो तो कोई बात नही, साहबजादे जब निपट कर वापस आएंगे तो फिर उनके इस्तक़बाल में खड़े हो जाना है। जब तक हुज़ूर बैठ नहीं जाते, बीच सीट वाले बैठ नही सकते। ऐसी बेइज़्ज़ती झेल कर आँखों में आंसू भले आ जाएं, नींद कतई नही आ सकती।
चाय नाश्ते के वक़्त पर होने वाली बेइज़्ज़ती और भी नागवार गुजरती है। विंडो सीट वाले साहब तक एयरहोस्टेस मोहतरमा के हाथ नही पहुंच सकते। बेचारी विंडो सीट वाले को नाश्ता का डब्बा देने के लिए आइल सीट वाले खुशनसीब के इतना करीब आ गयी है मानो यह साथ हवाई जहाज के सफर नही बल्कि कई मुद्दत तक चलेगा। विंडों सीट वाले साहबजादे मुस्कुरा कर नाश्ता के ट्रे पकड़ रहे हैं, आएल सीट वाले मना रहे हैं कि यह पल बस यहीं थम जाए और बीच सीट वाले परेशान हैं कि अभी हवाई जहाज हिला और गरम चाय की प्याली मेरे सर पर गिरेगी। आखिर कोई कैसे जिये ऐसी हालत में।
भगवान बुद्ध ने मध्यम मार्ग अपनाने को कहा था क्योंकि मध्यम सीट पर बैठ कर खुश रहना बिना बुद्ध बने संभव नही है। अपने बगल बैठे खुशनसीबों की विलासिता देख बिना क्रोधित हुए एक संत का जीवन जीने वाले यह मिडिल सीट वाले आज के बुद्ध से कम नहीं हैं।

स्लीपर और वातानुकूलित

रेलवे के स्लीपर क्लास में सबके पास अपने अपने रंगीन कंबल और चद्दर होते हैं. रात में स्लीपर क्लास में सोते लोग ऐसे दिखते हैं मानो पहाड़ों के नीचे घाटियों में रंग बिरंगे फूल खिले हों. चारों ओर जीवन ही जीवन. लोहे की पटरियों पर दौड़ती रेल का अविरल कलरव और हवाओं का शोर मानो जीवमात्र की सांसो की ध्वनि आ रही हो |

वहीं उच्च वातानुकूलित डब्बों में सारे लोग सफेद चादर ओढ़ सोए रहते हैं, जैसे पहाड़ की चोटियों पर बर्फ ही बर्फ बिछी हो | ना पटरियों का कलरव ना हवाओं का गुदगुदाता शोर| सुनाई देती है तो सिर्फ़ ख़र्राटों की आवाज़ मानो मशीनो का घर्घर नाद सुन रहे हों | जीवन की तरंग नहीं कृत्रिमता का एक हताश कर देने वाला माहौल | आप रेल में बैठे हैं पर रेल की आवाज़ महसूस नही कर सकते । रेल सरसों के पीले पीले फूलों वालों खेतों से गुज़र रही है, पर आप उसकी खुशबू से मरहूम हैं । शायद आपने परदे भी गिरा रखें हैं ताकि आप अपने मोबाइल की स्क्रीन आराम से देख सकें । गाडी स्टेशन पर पहुँचती है तो चाय वाले, फल वाले , खोमचे वाले सारे स्लीपर क्लास की और दौड़ते हैं, जैसे कि मधुमक्खियाँ और तितलियां भी फूलों के बागीचे की तरफ ही उड़ते है। वातानुकूलित डब्बे उन तितलियों के लिए किसी उजाड़ चमन से कम नहीं । आप इलाहाबाद से गुज़रेंगे पर वहां के अमरुद आप तक नहीं पहुंचेंगे , ना ही आप तक पहुचेगी पटना स्टेशन पर मिलने वाली लिट्टी चोखे की सुगंध , हावड़ा पहुँच कर भी झाल मूढ़ी की तेज झांस से आप वंचित रहेंगे ।


स्लीपर में आप अपने सहयात्रियों के जीवन अनुभवों का रसास्वादन भी करेंगे क्योंकि समय काटने का उससे बेहतर कोई तरीका वहां नहीं है। वातानुकूलित डब्बे में हर सीट पर बिजली की व्यवस्था है , इसलिए आप अपने लैपटॉप पर लगे रहेंगे । आपके सहयात्री आपके लिए एक सीट नंबर से ज्यादा कुछ नहीं ।

आपका सफर वातानुकूलित डब्बे में एक यात्रा होगी और स्लीपर क्लास में एक अनुभव । #अबे_सुन_बे_गुलाब #CommunistThoughts #LifeAtTheBottomOfPyramid

भाषा ही वह वर्जित फल है

कहावत कहती है कि एक चुप सौ को हराता है । कहते हैं कि कुत्ता मनुष्य सबसे अच्छा दोस्त है । संत कवि तिरुवल्लुवर ने कहा था कि वीणा मधुर है और वंशी मधुर है, ऐसा वही कहते हैं जिसने नवजात की किलकारी नहीं सुनी । चलचित्रों में चार्ली चैपलिन का कार्य सर्वोत्तम की श्रेणी में रखा जाता है । अंग्रेजी गायक रोनन कीटिंग के एक गाने की पंक्ति में प्रेमी कहता है कि जब तुम कुछ नहीं कहती तो सब कुछ कह जाती हो।

ऊपर के सारे उद्धरण एक ही दिशा में इंगित करते हैं। शायद चीज़ें बेहतर होती हैं जब आपकी भाषा मौखिक न हो । यह बात गौर करने लायक है कि पूरे जगत में मनुष्य ने ही मौखिक और लिखित भाषा का विकास किया है । और समस्त प्राणी जगत में मनुष्य ही एक प्राणी है जो झूठ बोल सकता है । क्या सच और झूठ की उत्पत्ति भाषा की उत्पत्ति के बाद हुई? क्या बिना भाषा के विकास झूठ बोलना संभव था ? बच्चे भगवान का रूप कहे जाते हैं क्योंकि वह झूठ नहीं बोलते या उन्होंने पूरी तरह भाषा की विद्वता प्राप्त नहीं की होती है । आखिर बच्चों और बड़ों में क्या फर्क आ जाता है कि भगवान का रूप कहे जाने वाले बच्चे बड़े होकर भगवान नहीं कहलाते । क्या भगवान भगवान इसीलिए कहलाते हैं कि वह मंदिरों, मस्जिदों और गिरजाघरों में वह कभी कुछ नहीं बोलते । शायद यही कारण है ईश्वर की लाठी में आवाज़ नहीं होने की बात कही गयी है ।

 

शायद भाषा ही वह वर्जित फल है जिसको चखने के बाद हम इंसान ईश्वर के घर से निकाल दिए गए। हमारे पुरखों ने जरूर इस चीज़ को महसूस किया होगा कि उनकी सारी समस्याओं की जड़ यह भाषा ही है । इसीलिए बचपन से ही सुनते आये कि सोच समझ कर बोला करो । बोलने से पहले यह सोचो कि सुन ने वालों को बुरा तो नहीं लगेगा । सत्य वचन बोलो , असत्य मत बोलो । सत्य बोलने की भी पूर्ण आज़ादी शायद नहीं दी गयी है । सत्य बोलो लेकिन अप्रिय सत्य मत बोलो। बोलने की मात्रा भी निर्धारित की गयी है । ज्यादा मत बोलो । वैसे यह कभी नहीं बताया गया कि कितना बोलना उचित है और कितना बोलना अनुचित । बोलने में थोड़ी कमी रह जाए तो आपको जल्द ही सुनने को मिलेगा कि आप तो कुछ बोलते ही नहीं । कुछ बोलो भी ऊपर वाले ने जुबान नहीं दी क्या ?

विडम्बना देखिये कि भाषा का आविष्कार मनुष्य ने एक दूसरे को समझने के लिए किया लेकिन मनुष्य स्वयं आज तक तक भाषा का समुचित इस्तेमाल करना नहीं समझ पाया । यह कुछ ऐसा ही है जैसा कि कहानियों में किसी वैज्ञानिक का अपना ही बनाया रोबोट उसके नियंत्रण बाहर हो उसके विनाश का कारण बने या भगवान शिव का भक्त भस्मासुर बन जाये ।

एक तर्क यह भी दिया जाता है भाषा ही मानव सभ्यता का आधार है । परंतु यह कैसी सभ्यता है जिसके इतिहास का हर एक पन्ना युद्धों की गाथा है । अगर भाषा नहीं होती तो शायद कोई युद्ध भी नहीं होते। बिना भाषा के क्या किसी का अपमान करना संभव है? क्या शेर अपने से निर्बल जीवों का अपमान करते हैं? घृणा , अपमान , धर्म , मिथ्या जो मानव की समस्त समस्याओं की जड़ हैं , क्या उसके मूल में भाषा नहीं है? प्यार जताने के लिये भाषा की जरूरत नहीं है, हाँ बिना भाषा के आप द्वेष नहीं फैला सकते । काम क्रोध लोभ मोह मदऔर मत्सर्य मानव की कमजोरियां बताई गयी हैं, जिनपर अगर वश कर लिया जाए तो पृथ्वी स्वर्ग बन जाये । परंतु यह सारे अवगुण शेर, हाथी , स्वान सब में विद्यमान नहीं हैं? क्या शेर काम महसूस नहीं करते, या क्रोधित नहीं होते। हाथियों में भी भोजन देख लोभ होता है, अपने बच्चों के लिए मोह तो सर्व सुलभ प्राकृतिक गुण है

लब्बोलुआब ये कि इन सारे सार्वभौमिक अवगुणों के होने के बाद भी समस्त प्राणिमात्र में मनुष्य की समस्याएं सबसे जटिल हैं । इसका अर्थ है कि हममें शायद कोई और अवगुण भी है जो ईश्वर प्रदत्त नहीं है । कोई अवगुण है जो सिर्फ मनुष्यों में है और जिसका विकास शायद मनुष्य ने ही किया है । क्या वह चीज़ भाषा है ?

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चिर आपका ,
शेखर सुमन

सवालों से आहत न हों,

हस्तिनापुर कीे रंगभूमि में कौरव और पांडव राजकुमारों की शस्त्र कला में अर्जित कौशल का प्रदर्शन चल रहा था। राजकुमार भीम जहाँ अपने गदा कौशल से सबको विस्मित किये हुए थे, वहीँ राजकुमार दुर्योधन के गदा कौशल कीे प्रशंसक समस्त हस्तिनापुर की प्रजा हो गयी थी। विशेषतः राजकुमार अर्जुन की धनुर्विद्या के सभी कायल थे। अर्जुन के रणकौशल की एक बानगी भर देख किसी के मन में कोई संदेह न रहा कि कुंती पुत्र अर्जुन विश्व के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हैं। किंतु ये क्या? एक सामान्य सा युवक जिसके कपडे साधारण थे, किन्तु मुख पर दिवाकर का तेज था, जिसकी आँखें विनम्रता का भाव तो दिखलाती थी, परंतु उसके कवच और कुंडल इस बात का प्रमाण थे कि युद्ध में इसे हराना अत्यंत दुरूह होगा। कर्ण नाम का यह युवक अकेला खड़ा रंगभूमि में अर्जुन को ललकार रहा था। उसकी बस एक ही मांग थी कि अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर घोषित करने से पूर्व उसे एक बार अपनी धनुर्विद्या का प्रदर्शन करने दिया जाए। 


गुरु द्रोण और कृपाचार्य की अनुभवी आँखें यह परख चुकी थीं कि कर्ण कोई साधारण योद्धा नहीं बल्कि अर्जुन से भी प्रवीण धनुर्धर है। एक साधारण युवक से कुंतीपुत्र अर्जुन की हार उन्हें कतई स्वीकार्य ना थी। उन्होंने कर्ण को प्रदर्शन से रोकने के लिए एक युक्ति निकाली। उन्होंने कर्ण को पूछा कि युद्ध करने से पूर्व वो अपनी जाति बताये और यह प्रमाणित करे कि वह एक आर्य पुत्र क्षत्रिय है। कर्ण ने आग्रह किया कि उसकी जाति का रण कौशल से क्या लेना देना। सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कौन है इस बात का फैसला धनुष बाण से होना चाहिए ना कि उसकी जाति, कुल, उपनाम से। कर्ण को सूतपुत्र कह रणकौशल के प्रदर्शन से भले ही रोक दिया गया किन्तु रंगभूमि में उपस्थित प्रत्येक हस्तिनापुर वासी यह जान गया कि कदाचित सूर्यपुत्र राधेय कर्ण पाण्डुपुत्र अर्जुन से बड़ा धनुर्धर है। कर्ण को सूतपुत्र कह पुकारने से उसकी धनुर्विद्या कम नहीं हुई बल्कि जनमानस में यह बात फ़ैली कि कर्ण को रोकने के लिये राजगुरुओं ने अनैतिक तरीकों का सहारा लिया।

इस कथा को वर्तमान राजनैतिक और सामजिक परिपेक्ष्य में देखें तो यह कथा अत्यंत ही प्रासंगिक है। बहुधा ऐसा देखा जाता है कि कोई न कोई सूतपुत्र आकर एक व्यवस्था को ललकारता है। कोई राधेय आकर कुछ ऐसे प्रश्न पूछता है जो सत्ता में बैठे लोगों को सहज प्रतीत नहीं होती। कोई कर्ण आ जाता है जिसके तर्क के बाण व्यवस्था के अहंकार और दम्भ की छाती में जा चुभते हैं।
और जब समाज, व्यवस्था उन असहज सवालों से बिफर पड़ता है तो कर्ण को रोकने को कोशिश की जाती है। उसके तर्क को सुने बिना उसे सूत पुत्र कह अपमानित किया जाता है। उसकी धनुर्विद्या नहीं उसकी जाति की चर्चा की जाती है ताकि व्यवस्था के अर्जुन की तथाकथित सर्वश्रेष्ठता बनी रहे।

अमेरिका के इसबार के चुनाव को ही लें, डोनाल्ड ट्रम्प ने व्यवस्था पर कुछ असहज सवाल उठाये। वहां की जनता को भी लगा कि यह सवाल पूछे जाने चाहिए। लेकिन व्यवस्था ने क्या किया, उन सवालों के जवाब देने के बजाय ट्रम्प को अपमानित करना शुरू किया। उसके समर्थकों को निकृष्ट और घिनौने की उपाधि तक दे दी गयी। व्यवस्था ने हर वो कोशिश की जिससे ट्रम्प और उसके समर्थक अपमानित हों लेकिन उनके प्रश्नों का उत्तर देने की कोशिश नहीं की। शायद व्यवस्था के पास उनका कोई जवाब था भी नहीं। एक प्रेसवार्ता के दौरान एक छात्रा द्वारा पूछे गए एक सवाल से ममता बनर्जी इतनी असहज हो गयी कि उस छात्रा को माओवादी, नक्सली और विरोधी पार्टी का बता दिया। किन्तु उसके सवाल का उत्तर नहीं दिया। शायद उस प्रश्न का उत्तर उनके पास नहीं था, इसीलिए सवाल पूछने वाले की प्रामाणिकता पर ही सवाल उठा दिये गए।
आप तुष्टीकरण पर सवाल उठाओ तो हिन्दू धर्मांध कह दिए जाते हो। आप सरकार की नीतियों पर सवाल उठाओ तो राष्ट्रविरोधी कह दिए जाते हो। मुस्लिम हितों के मुद्दे उठाने वाले जिहादी कह दिए जाते हैं और आदिवासियों की बात करने वाले नक्सली।
अगर आप सवाल पूछ रहे हैं और आपको नाम दिए जा रहे हैं तो समझ लीजिए कि आप वह राधेय हैं और व्यवस्था के पास आपके प्रश्नों का जवाब नहीं है। अगर आप किसी के असहज सवालों का उत्तर न देकर उसे अपमानित कर रहे हैं तो आप वह व्यवस्था हैं जो एक कर्ण की चुनौती से घबरा गया है। आप निश्चिन्त रहे कि वह रश्मिरथी आपके तम के साम्राज्य पर भारी पड़ेगा।

हर कोई कभी कर्ण होता है, तो कभी अर्जुन और तो कभी व्यवस्था रुपी द्रोण। अगर आप कर्ण हैं तो अपना संघर्ष जारी रखें। अगर आप अर्जुन और द्रोण हैं तो जानलें कि इतिहास आपकी विजय को पराजय से भी निकृष्ट मानेगी।

यह भी हो सकता है कि आप न तो कर्ण हैं, ना अर्जुन और ना द्रोण। इसका अर्थ है कि आप रंगशाला में बैठी हस्तिनापुर की जनता हैं। आप अगर किसी कर्ण के साथ हुए अपमान को देख चुप हैं, तटस्थ हैं तो समझ लें कि कुरुक्षेत्र के अवश्यम्भावी युद्ध में आपका भी विनाश निकट है। जरूरत है कि आप कर्ण के सवालों से आहत न हों, उसे अपमानित न करें। उसका साथ दें, महाभारत का विनाशकारी युद्ध रोकने का यही एक उपाय है।

गांव के अँधेरे थिएटर में प्रवेश

गांव आकर यह एहसास होता है शहर के चहल पहल और चमक दमक में आप बहुत सारी चीज़ें पीछे छोड़ आये हैं। रात को ही लें, रात का मतलब शहर में नाईट लाइफ और डीजे का तेज संगीत से आप लेते हैं। गांव की नाईट लाइफ का मतलब है घुप्प अँधेरा। शहर में इतना ज्यादा कृत्रिम प्रकाश है कि घुप्प अंधकार शहर में मिलना शायद नामुमकिन ही है। गांव आते ही आप शुरू में अन्धकार से शायद कुछ डरते हैं, आपके मन में यह भाव उठता है कि कहाँ आकर फंस गया। लेकिन जल्द ही यह अंधकार काले जादू सा आपको अपने वश में करने लगता है। जैसे तेज प्रकाश से आप सिनेमाहाल में प्रवेश करते ही शुरू में आप थोड़े असहज होते हैं पर जल्द ही परदे पर चल रहा प्रकाश और संगीत आपको सब कुछ भुला देता है। गांव के अँधेरे थिएटर में प्रवेश करने के कुछ समय के बाद जब आपकी आंखें अँधेरे में अभ्यस्त होती है तो सबसे पहले आपकी नज़र पड़ती है दुनिया के सबसे बड़े परदे आसमान पर। आसमान और उसपर जगमगाते तारों ने जाने कितने वैज्ञानिको, दार्शनिको, साहित्यकारों और प्रेमी युगलों को क्यों प्रभावित किया है इसका अहसास आप गांव से दिखने वाले आसमान को देख कर ही कर सकते हैं। आपके ऊपर का तारों से सुसज्जित आकाश किसी प्रेमी को प्रेमिका के आँचल सा तो किसी वैज्ञानिक को किसी सुदूर ग्रह से आती अन्य सभ्यता की लौ का अहसास कराती है। गांव वालों के लिए यह आकाश दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद सुकून से सोने के लिए बनी एक बड़ी सी चादर है जिसे मानो माँ प्रकृति अपने सोये सारे बच्चों को एक साथ ओढा देती है।


जैसे सोने में सुगंध आ जाये वैसे ही इस अनुपम दृश्य में प्रकृति और भी रंग डालती है। तारों के आसामान के नीचे बैठे आप एक दैविक शांति का अनुभव करते हैं, पर आप इस शांति को सन्नाटा न समझें। सन्नाटा तो जीवन रहित भय का संकेत है। गांव में भय कैसा और जीवन की ध्वनि गांव के रेशे रेशे से आती रहती है। गांव की शांति में आप दूर से आते किसी वृद्ध के संध्या आरती के भजन की मधुर ध्वनि सुन सकते हैं। साथ में सुनायी देता है झींगुरों का कलरव, मानो जीवमात्र रात्रि की देवी की उपासना में लगा हो। इस उपासना के समारोह में पेड़ पौधे शामिल न हों ऐसा कैसे हो सकता है। रात्रि में खिलने वाले खुशबू दार फूलों वाले पेड़ों, मंजर से लदे आम के बागानों से जब बहकर हवा आती है तो ऐसा लगता है कि पूजा में अगरबत्तियों की सुगंध फ़ैल गयी है।

‌खेतों में फलों और फसलों की रखवाली करने गये किसान अपने आप को गर्म रखने के लिए अलाव जला बैठे रहते हैं। अलाव के पास बैठे किसान और बागान के रखवालों को देख अपने घर के फायर प्लेस के सामने बैठे अंग्रेजों की याद आ जाती है। अलाव के सामने बैठ चिलम फूंकते अपने फलों से लदे बागान देख जो सुकून एक किसान को मिलता है वह शायद क्यूबन सिगार पीते साहबों को न मिलता हो। गांव की रात्रि में पेड़ों के बीच अलाव जलाये किसान माँ प्रकृति की गोद में बैठे बच्चों की तरह लगते है जिनके साथ प्रकृति के दूसरे बच्चे भी बाल क्रीड़ा आ मिलते हैं। कुत्तों का समूह भी अपने दिन के सारे मतभेद भुला उस अलाव के पास आ जाता है जैसे युद्ध विराम के बाद सारे सैनिक अपनी संगीनों को परे रख हंसी मजाक कर रहे हों। जैसे सैनिक भले ही रात में आराम कर लें जासूसों का काम रात में भी नहीं रुकता। उसी तरह चमगादड़ों का समूह रात में भी फलों के बागान में अपने भोजन की तलाश में घूमता रहता है। दूर से आती सियारों की आवाज़ ऐसे लगती है जैसे दुश्मन का खेमा अगले आक्रमण की योजना बना रहा हो। गांव में बैठ कर रात को दूर तक देखें तो कहाँ आकाश ख़त्म हुआ और कहाँ धरती शुरू हुई पता नहीं चलता। आखिर जुगनुओं का टिमटिमाता सामूहिक सौंदर्य तारों के रूप से किसी रूप में कमतर थोड़े ही है।
‌लेकिन यह रात्रि उत्सव उषाकाल से कहीं पूर्व समाप्ति की ओर बढ़ जाता है। सूर्य के आगमन के लिए स्वागत गान गाते पंछी , जलाशय की ओर जाता भैंसों का समूह के कदमताल की आवाज़, दूध की आस में अपनी माँ को पुकारते गाय के बछड़ों की पुकार सब मिल आपको जगाते हैं कि उठो दिवस प्रारम्भ होने को है। अलाव की राख की गर्म चादर में सोये गांव के पहरेदार कुत्ते अब भी अलसाये से पड़े रहते हैं और एक खीझ वाला भाव जताते हैं कि सुबह इतनी जल्दी क्यों आ गयी। गांव वाले भी अपने अलसाये आँखों को मलते उठते हैं और जीवन चक्र फिर वैसे ही द्रुत गति से चल पड़ता है अपने अगले रैन बसेरे की तलाश में।

‌मैं शहर हूँ

मैं शहर हूँ। कोई मुझे विलासी कहता है, कहते हैं कि मैं अपनी जड़ों को भूल बैठा हूँ, खो गया हूँ अपनी रंगीनियों में, पसंद आने लगी हैं मुझे चमक दमक और दिखावा। जरूरत से ज्यादा खर्चता हूँ, जरूरत से कम बचाता हूँ। जी चाहता है कि कभी फुर्सत में इन बातों के जवाब दूं, लेकिन शायद जवाब देना मेरी फितरत में नहीं है। वक्त भी नहीं मिलता कि इन बातों का जवाब दे सकूँ। मोहनजोदारो से लेकर गुडगाँव तक, दमिश्क से लेकर काशी तक आज तक के सफर में सांस लेने की फुर्सत तक नहीं मिली। सोचा अगर वक़्त इन सवालों के जवाब देने के लिए रुका, तो उन हज़ारों सपनों के गट्ठर को उतार वास्तविकता के कठोर धरातल पर रखना होगा, जिन्हें मिलाकर ही मैं शहर बना हूँ। बच्चों के सुनहरे भविष्य का सपना, एक घर का सपना, दुनिया का बादशाह बनने का सपना, ऐसे हज़ारों सपनो को अपने साथ सहेज कर चलता हूँ। उन सपनो को ठेस न लगे, सारा वक्त उनको पूरा करने में ही लगे इसीलिए तो अनवरत चला जाता हूँ। हर रोज़ कुछ सपने पूरे होते हैं तो इससे पहले कि मुस्कुरा सकूँ, देखता हूँ हज़ारों नए सपने अपने सर पर उम्मीद की पोटली लिए मेरे दरवाज़े पर खड़े हैं। फिर उन सपनो भरी आँखों में उम्मीद की एक किरण जलाने के लिए खुद को जलाता हूँ पर शायद ही किसी को वापस भेजता हूँ।



‌गांव की धरती अपनी छाती फाड़कर अन्न उपजाती है तो उसका गुणगान करने वाले बहुतेरे हैं। पर अपने सीने पर सपनो से भी ऊंची ऊंची अट्टालिकाओं को उठाये मैं भी चल रहा हूँ पर मैंने कभी उफ़ तक नहीं की, न ही किसी से धन्यवाद की अपेक्षा की। चाहता तो गांव की तरह ताज़ी हवा में घूम सकता था, पर सपनो की ऊंची उड़ान के लिए जरूरी इन ऊंची चिमनियों के साये में जीने का फैसला किया। परिवार के बच्चे अगर आँगन में खेल पा रहे हैं तो यह भी तय है कि कोई रसोई की गरमी और धुएँ में बैठा कोई खाना पका रहा है। मेरा भी जी करता है कि गांव के बड़े से चौबारे और आसमान से बड़े आँगन में खेलूं लेकिन फिर भी वन बी एच के के बंद दायरे में आपने आप को समेट रखा है ताकि गांव के चौबारे के बच्चों के लिए कुछ खिलौने भेज सकूँ। किसका जी नहीं चाहता कि रसोई में बैठ तवे से उतरी गरमागरम फुल्के साग के साथ खाऊं, फिर भी अख़बार में लपेटी बासी पूरी और सब्जी खाकर खुश हूं ताकि घर का चूल्हा ठंढा न पड़े।
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‌मैं शहर हूँ । सब कहते हैं कि तेरे पास दिल नहीं है, पत्थर दिल हो गया हूँ मैं , कैसे कहूँ कि मैं उस सैनिक सा हूँ जो सीने पर गोलियां खा कर आह नहीं करता पर गांव से आयी एक प्यार की पाती पढ़ कर रो पड़ता है। एक सैनिक की तरह मैं जागता हूँ चौबीसों घंटे। हर रात की ये तेज़ रोशनियां कोई दीवाली नहीं बल्कि हवन कुंड की वह लौ है जिसको अखंड और अक्षुण्ण रखने के लिए मैंने खुद को झोंक रखा है। मेरे सीने पर रेंगती दौड़ती यह हज़ारों गाड़ियां जिन्हें हमेशा कहीं पहुँचने की जल्दी होती है, देर होने पर झुंझलाती है, चिल्लाती हैं, मुझे कोसती हैं पर फिर भी इनके नखरों का बोझ उठाता हूँ। आखिर जीवन की राह पर तेज दौड़ने का सपना भी तो मैंने ही दिखाया था। यह सारी गाड़ियां भी मैंने ही दिलायी थी उन्हें कुछ छोटे सपने पूरे होने पर ताकि वो अपने बड़े सपनों की तरफ और तेज़ी से दौड़ सकें।

‌मेरी कहानी तब शुरू होती है जब मानव ने जन्म भोजन मैथुन और मृत्यु के चक्र को तोड़ कुछ अलग करने की कोशिश शुरू की। दुनिया की कहानी वास्तव में मेरी ही कहानी तो है। जब जब मानव ने कुछ अलग करने की कोशिश की, मैं किसी न किसी रूप में मानव का साथ दिया। मानव क्या भगवन कृष्ण भी जब मथुरा को छोड़ चले तो मैंने ही द्वारका बन उनका स्वागत किया। द्यूतक्रीड़ा में पराजित पांडव जब हस्तिनापुर से निकाले गए तो इंद्रप्रस्थ बन मैं ही उनकी राजधानी बना। अगर मैंने पाटलिपुत्र के रूप में मगध साम्राज्य का चरम ऐश्वर्य देखा है तो मैंने ही हिरोशिमा और नागासाकी के रूप में दुनिया की सबसे बड़ी तबाही का मंज़र भी देखा है । लखनऊ के रूप में अगर मैंने नवाब वाजिद अली शाह की विलासिता और सुख देखे हैं, तो लखनऊ छोड़ जाते उसका 'बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए' वाला क्रंदन सुन उसके साथ रोया भी हूँ। कराची के रूप में जब मुझे छोड़ लोग अंदरूनी मुल्क ईद मनाने को जा रहे थे, तब मेरे चेहरे पर अगर एक मुस्कान आयी तो बंटवारे की विभीषिका में लाहौर की तरह जला भी हूँ।

सारी मुसीबतों को सह कर सारी विपरीत परिस्थितियों पर इंसान के शह की दास्ताँ हूँ मैं, इसलिए शहर हूँ मैं।