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Wednesday, July 11, 2018

जब रिपब्लिक आ जायेगा।

जब रिपब्लिक आ जायेगा।

ना किसी का राज रहेगा, ना कोई दीप जलेगा,
बहुत ही कम बरसेगी बरखा, हर कँवल मुरझायेगा।
जब रिपब्लिक आ जायेगा।

न कोई वाकेगा न कोई टाकेगा,
लुट जायेगी निधि,ना फिर आपको चौबे पकायेगा।
जब रिपब्लिक आ जायेगा।

स्क्रीन पर छायेगा अँधेरा, ग्रहण लगेगा रवीश को,
बढ़ेगा इनटॉलेरेंस, फिर उठेगी उंगली इशरत के तफ्तीश को।
पिटेंगे झा और आशुतोष , लेट मी स्पीक पीरज़ादा चिल्लायेगा।
जब रिपब्लिक आ जायेगा।

नाउ बनेगा देन, टुडे यस्टरडे कहलायेगा,
आई बी अन होगा डेड, एक्स अननोन बन जायेगा।
कर लो मज़े चार दिन की चांदनी में,
अँधेरा वापस तेरे स्टूडियो में छायेगा।
जब रिपब्लिक आ जायेगा।

जब रिपब्लिक आ जायेगा ।

सूचनाओं की जुगाली

कुछ शाकाहारी जीवों में पायी जाने वाली एक अलग और अजीब सी प्रवृति है जुगाली। गाय, बकरी, भैंस जैसे जीव खाते समय अपने भोजन को पूरी तरह नहीं चबाते बल्कि निगल जाते हैं। उनकी शारीरिक संरचना कुछ इस प्रकार की होती है कि यह जानवर भोजन के कुछ देर बाद उसी निगले भोजन को छोटे छोटे टुकड़ों में अपने उदर से वापस मुंह में ले आते हैं। फिर शुरू होता है उस भोजन को चबाने और पचाने का काम। सही में पूछें तो जुगाली करते जानवर बड़े हास्यास्पद से लगते हैं। बैठे हैं पसर के एक तरफ और बस मुंह चला रहे हैं। कभी कभी मुंह से झाग तक गिर रही है और जानवर हैं कि अपने आस पास की दुनिया से बेखबर लगे हुए हैं मुंह चलाने में। बैठ कर जुगाली करते जीव आलसी और नकारा से लगते हैं। लेकिन वास्तविकता में वो जीवन का बहुत ही आवश्यक और अनिवार्य कार्य कर रहे होते हैं। बिना जुगाली के निगले हुए भोजन का सही पाचन और बिना सही पाचन के पशु का सही पोषण और जीवन संभव नहीं है।

क्या जुगाली करने की प्रवृति सिर्फ जानवरों तक सीमित है? क्या और कोई जीव जुगाली नहीं करते या उन्हें जुगाली करने की जरूरत नहीं है? जुगाली शब्द का प्रयोग यहाँ एक चिन्ह स्वरुप किया गया है। जुगाली वास्तव में है क्या? आखिर जुगाली प्रक्रिया का मूल सिद्धांत क्या है? इस प्रक्रिया की आवश्यकता क्यों है और इस प्रक्रिया द्वारा किस उद्देश्य की प्राप्ति होती है ? अगर हम इन प्रश्नों के समुचित उत्तर ढूंढ सकें तो शायद जुगाली के ऊपर से प्रतीत होते कदाचित हास्यास्पद और अनाकर्षक रूप के भीतर छुपे गूढ़ अर्थ को पहचान पायें।

जुगाली को हम सब एक मंथन की एक प्रकिया के रूप में देख सकते हैं । पशु ने ढेर सारा भोजन निगल लिया जल्दी जल्दी में, अब जुगाली के दौरान उसको धीरे धीरे चबा रहा है। चबाने के दौरान भोजन को दांत पीसते हैं, उसमें मुख में मौजूद लार ग्रंथियां लार और अन्य पाचक अवयव मिलाती हैं, और भोजन सुपाच्य होने जाने के बाद वापस शरीर को भेज दिया जाता है ग्रहण करने के लिए। जुगाली के बाद ही निगल हुआ भोजन वास्तव में पशु के शरीर के लिये जीवन दायक और पुष्टिकारक सिद्ध होता है।

अगर जुगाली के इस बाह्य रूप और आवरण के भीतर झांके तो यह आवश्यक रूप से वही प्रक्रिया है जिसे डाटा प्रोसेसिंग भी कह सकते हैं। डाटा प्रोसेसिंग मतलब हज़ारों सूचनाओं, विचारों, सिद्धांतो के समंदर से अपने विवेक का इस्तेमाल कर अपने काम का ज्ञान निकाल लेना। आज के सूचना क्रांति के युग में आप सूचनाओं के बवंडर के बीच खड़े हैं। चौबीसों घंटे ब्रेकिंग न्यूज़ परोसते समाचार चैनल, पल पल समाचारों की नोटिफिकेशन भेजते न्यूज़ एप्प, व्हाट्सएप्प पर मिलती सूचनाएं, हर बात पर हंगामा मचाता ट्विटर, फेसबुक पर हर छोटी बड़ी चीज़ शेयर करते मित्रगण, रास्ते पर बड़े बड़े होर्डिंग्स और एफ एम पर चिल्लाता रेडियो जॉकी सब मिल आपको बस सूचनाएं देते रहते हैं। अनवरत गति से, निर्बाध रूप से आप सूचनाएं पाते रहते हैं, सूचनाओं की मात्रा दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है और इसके कम होने की कोई आशा निकट भविष्य में नज़र नहीं आती।
जल्दबाज़ी , कार्य की बहुतायत, समय का अभाव, निज विचारधारा की वजह से कई बार हम इस सारी सूचनाओं को बस ग्रहण कर लेते है। यह कुछ ऐसा ही है जैसे पशु घास चरते समय मैदान में ढेर सारी घास खा लेते हैं। हम मनुष्यों और पशुओं में फर्क यह है पशु तो निगली हुई सारी घास को जुगाली करने बाद ही वास्तव में ग्रहण करते हैं, हम मनुष्य जैसी सूचनाएं मिली, सत्य मान आत्मसात कर लेते हैं।
कुछ लोग अपने निजी स्वार्थ के लिए मानव की इस प्रवृत्ति का गलत फायदा उठाने का सतत प्रयास करते रहते हैं। किसी ने कह दिया कि भगवान गणेश की मूर्ति दूध पी रही है, सब लोग जा पहुँचे मंदिरों में और करनेे लगे दावा कि उन्होंने भी गणपति बप्पा को अपने हाथों से दूध पिला दिया। किसी राजनेता ने कहा कि देश में असहिष्णुता बढ़ रही है, एक अभिनेता ने हाँ में हाँ मिला दी, कुछ पत्रकार और न्यूज़ चैनल कहने लगे और आप सब मान बैठे कि हाँ भई असहिष्णुता बढ़ गयी है ,भले ही आप इस असहिष्णुता शब्द का अर्थ तक न समझें। दंगे फ़ैलाने के लिए बस सीरिया की वीडियो क्लिप व्हाट्सअप पर फैला दी जाती है कि यह घटना भारत में हुई है और हम हो जाते हैं तैयार मरने मारने को।

आवश्यक है कि जो भी सूचना हम ग्रहण करें, सबको मंथन की प्रक्रिया के गुज़ारना आवश्यक समझें। दूसरे शब्दों में सूचनाओं की जुगाली करनी आवश्यक है। सभी सूचनाओं पर तर्क संगत विमर्श की जरूरत है।इस प्रक्रिया से जिस भी चीज़ को अलग रखा जायेगा और ग्रहण किया जाएगा वह चीज़ पचेगी नहीं, पूरे शरीर और समाज का नुकसान करेगी।
जो भी सूचना आप ग्रहण करें उसकी जुगाली करें। तर्क के दांतों द्वारा उसको चीरें फाड़े, पीसें । विवेक और विचारों की लार उसमें मिलने दें। सिर्फ यह न सुने कि सामने वाला क्या कह रहा है, बल्कि यह भी सोचें कि वह ऐसा क्यों कह रहा है, अभी ही क्यों कह रहा है? आखिर वह कहना क्या चाहता है? ये साधारण से सवाल बड़े से बड़े षड्यंत्र के साथ कहे गये झूठ का नक़ाब उतार फेंकने में सक्षम हैं। यह प्रक्रिया इतनी सरल भी नहीं है। हो सकता है कुछ लोग गुस्सा हो हंगामा करें, आप उसको मुख से गिरती झाग की तरह अनदेखा करें । असत्य और मिथ्या सूचनाएं आपके तर्क के दाँतों का प्रहार नहीं झेल पाएंगी और उनका वास्तविक रूप सामने आ जायेगा। मिट्टी को मिठाई का रूप दे देने से आप जिह्वा रूपी बुद्धि को नहीं ठग सकते। पर आवश्यक है कि आप किसी चीज़ को मिठाई को मानने से पहले और खाने से पहले उसे अपनी जिह्वा से स्पर्श जरूर करवाएं। सिर्फ इसीलिए किसी चीज़ को मिठाई मान न निगल जाएँ क्योंकि लोग कह रहे हैं। सबसे जरूरी बात, यह चीज़ें आराम से करें। कोई जल्दबाज़ी नहीं, आराम से , शांतचित्त हो। किसी भी बात पर उद्वेलित हो फ़ौरन यकीन कर अपनी विचारधारा न बनाएं। एक बात और, जिस चीज़ के बारे में आप स्वयं आश्वस्त नहीं है, दूसरों को उस चीज़ के लिए आश्वस्त न करें। अगर आप नहीं कर सकते और कम से कम करने वालों को न रोकें। तर्क संगत तरीके से सूचनाओं को कसौटी पर कसने वालों पर तंज न कसें। उनको नर्ड, फिलॉस्फर, दार्शनिक आदि की संज्ञा देकर मुख्य धारा से अलग करने की कोशिश न करें। वो पूरी तरह से सामान्य जन हैं जो जनसामान्य के बीच रह जनसामान्य के हित का कार्य कर रहे हैं। जब समाज में कोई सूचनाओं की जुगाली कर रहा हो तो उसको परेशान न करें।

इतनी छोटी सी बात जो में में करने वाली बकरी समझती है तो मैं मैं करने वाला इंसान क्यों नहीं समझ सकता।

मीडिया के अर्धसत्य

मानव इतिहास में सन्देश और सन्देश वाहकों का एक अलग स्थान रहा है। रोमन इतिहास में फिलिपेडस का नाम सर्वदा सम्मान से लिया जाता है जिसने मैराथन के युद्ध में रोमन विजय की सूचना एथेंस तक पहुंचायी थी। विजय का यह शुभ सन्देश पहुँचाने के क्रम में फिलिपेडस वीरगति को प्राप्त हुआ और उसकी इस साहसिक कार्य को हमेशा मैराथन दौड़ के रूप में याद किया जाता है। महाकवि कालिदास के मेघदूत में नायक यक्ष अपनी पत्नी अलका को सन्देश भेजने के लिये बादलों को संदेशवाहक बनाता है। भगवान श्रीकृष्ण भी कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले पाण्डव का मैत्री सन्देश लेकर हस्तिनापुर आते हैं।
मैत्री की राह बताने को सबको सुमार्ग पर लाने को दुर्योधन को समझाने को भीषण विध्वंस बचाने को भगवान हस्तिनापुर आये पाण्डव का संदेशा लाये।
महान अशोक के शांति और प्रेम का सन्देश लेकर उनके पुत्र महेंद्र और तनुजा संघमित्रा श्रीलंका के राजा के पास जाने का वर्णन भारतीय इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। श्रीलंका में भगवान बुद्ध के विचारों को पहुँचाने में संदेशवाहक महेंद्र का योगदान अतुल्य है। संदेश और संदेशवाहक इतने सार्वभौमिक है कि कुछ प्राणी जैसे कबूतर तो संदेशवाहक का पर्याय तक बन गए हैं। कबूतरों ने न जाने कितने प्रेमी युगलों की प्रेम की पाती को उनके प्रिय को पहुँचाया है।
उपर के कुछ उदाहरण यह प्रमाण हैं कि संदेशवाहक न केवल अनादिकाल से महत्वपूर्ण हैं अपितु अपरिहार्य हैं। इस हिसाब से देखा जाए तो संदेशवाहकों का सम्मान किसी से कमतर कर आंकना एक भूल होगी। फिर बार बार यह क्यों सुनने को मिलता है कि संदेशवाहक को मत मारो, दूत को मत मारो, डोंट शूट द मेसेंजर। ख़ासकर वर्तमान समय में इसका प्रयोग काफी होने लगा है। यह दिलचस्प है कि इसका वाक्य का प्रयोग आजकल के संदेशवाहक अर्थात मीडिया वाले सबसे ज्यादा करते हैं।
तो ऐसा क्या हो गया कि महेंद्र, मेघदूत, फिलिपेडस , श्रीकृष्ण के उत्तराधिकारी संदेशवाहकों को ऐसा डर सताने लगा कि कोई उन्हें मार डालेगा। संदेशवाहक मीडिया आजकल अपनी सुरक्षा को लेकर इतना चिंतित क्यों है? आखिर सन्देश पाने वाले भी सन्देश वाहकों से आशंकित क्यों हैं? जिस भूमिका को भगवन श्रीकृष्ण स्वयं खुद निभा चुके हैं उसी भूमिका में लोग अब क्यों कहते हैं कि उनको निशाना न बनाया जाए? फिलिपेडस जैसे शहीद संदेशवाहक के उत्तराधिकारी आज बलि के बकरे की तरह मिमियाते क्यों नज़र आते हैं?
संदेशवाहक का कार्य है सन्देश पहुँचाना। इस वाक्य को फिर से पढ़ें। सन्देश वाहकों का कार्य है सन्देश पहुँचाना। बस इतना सा साधारण काम!! यह आपकी प्रतिक्रिया हो सकती है। लेकिन यह कार्य इतना साधारण नहीं है, क्योंकि संदेशवाहक भी मनुष्य होते हैं, अतएव मानव सुलभ कमजोरियों से परे बिलकुल नहीं हैं। एक बूढी विधवा को पत्र पढ़कर सुनाता डाकिया क्या अपनी भावनाओं पर काबू रख सकता है अगर उसमें उसके पुत्र के सीमा पर मारे जाने की बात लिखी हो? यह स्वाभाविक है कि डाकिया भावुक हो, लेकिन उसका यह कर्तव्य है कि वह अप्रिय ही सही किन्तु वह सन्देश पहुंचाए। बिना अपमान के भय के। पुत्र के नौकरी लगने की खबर भी अगर पत्र में लिखी है तो डाकिये को बिना किसी उपहार की अपेक्षा में वह खबर सुनानी चाहिए।
लेकिन कभी कभी ऐसा हो नहीं पाता है। निजी स्वार्थ, भय, अपमान, द्वेष और घृणा संदेशवाहक के सन्देश पहुँचाने के कार्य में बाधक होते हैं। संदेशवाहक सन्देश को पूरी तरह सत्य रूप में न पहुंचा अर्धसत्य के रूप में पहुंचाता है। और इसके विनाशकारी परिणाम होते हैं। धर्मराज युद्धिष्ठिर का गुरु द्रोण को ' अश्वस्थामा हतो' वाला सन्देश ऐसा ही एक अर्धसत्य था जिसकी परिणीति एक शिष्य द्वारा अपने गुरु की छल पूर्वक हत्या से हुई। आप चाहे ऋषि ही क्यों न हो अगर आप सन्देश पहुँचाने में पूर्ण रूप से ईमानदार नहीं है तो आपकी विश्वसनीयता नारद की तरह ही होगी। फिर चाहे आप हरेक क्षण प्रभु नारायण का जाप ही क्यों न करें।
आज का मीडिया ऐसे ही दुविधा से गुज़र रहा है। सन्देश पहुँचाने का कार्य निज स्वार्थ, प्रलोभन , घृणा और द्वेष से प्रभावित हो रहा है। सत्य नग्न ही सुन्दर रहता है, स्वार्थ का जामा पहना सत्य सत्य न रह अर्ध सत्य बन जाता है। स्वार्थ का जामा कितना भी धोया जाये, षड़यंत्र की गंध उससे जाती नहीं। एक अर्धसत्य बोलने पर अगर धर्मराज का स्वर्ग छिन सकता है तो दिन रात असत्य का प्रचार कर आप सम्मान की आशा नहीं रख सकते।
आवश्यक है कि सन्देश वाहक मीडिया अपने इतिहास का फिर से पुनरीक्षण करे, अपनी गलतियों से सीखे ताकि उसे पुनः वही भरोसा फिर से प्राप्त हो जो एक बुढ़िया को अपने गांव के डाकिए पर होता है। यह मार्ग आसान नहीं है पर संभव है। संभव ही नहीं बल्कि अत्यंत आवश्यक है। मीडिया की पहुँच हर आदमी तक है। यह वह कुआँ है जिससे हर कोई पानी भरता है। इस कुएं में गंदगी गिरेगी तो पूरा समाज बीमार पड़ जाएगा।जब मीडिया की विश्वसनीयता कम होती है तो अफवाहों का दौर शुरू हो जाता है। अफवाह और जंगल की आग एक ही चीज़ है जिसका एक ही परिणाम है .. विनाश।
मीडिया के लिए स्वतंत्र होना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए मीडिया और मीडिया कर्मियों को निश्चय ही कठिनाइयों का मार्ग चुनना पड़ेगा। अब यह हमारी मीडिया पर निर्भर करता है कि वह उस स्वतंत्र जंगली चीते की ज़िन्दगी चुनता है जिसे शायद कई दिनों तक भूखा रहना पड़े पर जिसकी गति और चाल लोगों में धाक जमाती है । या उस परतंत्र कुत्ते की ज़िन्दगी चुनता है जिसे सुबह शाम बैठे बिठाये खाना मिलता है , वातानुकूलित कार की सवारी मिलती है लेकिन गले में एक पट्टा डालना पड़ता है। अगर संदेशवाहक अपने कार्य को ईमानदारी से करें तो शायद डोंट शूट द मेसेंजर कहने की जरूरत कम हो जायेगी। ईमानदार पत्रकार क्लार्क केंट की तरह होता है। सुपर मैन का सौम्य रूप। और दुनिया जानती है कि क्लार्क केंट हो या सुपरमैन, गोलियां दोनों पर असर नहीं करती।