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Thursday, January 14, 2021

Ramayana Serial : A quick take on its re-telecast

Don't judge Ramayana serial by its poor graphics, loud acting and somewhat slow pace. The soaring popularity and viewership of it only reminds us of following.
1) Honesty and simplicity never goes out of fashion. Ramanand Sagar's serial is nothing but a simple and honest effort to tell an epic everyone loves and knows about. To tell the same story on a entirely new medium is very tough. To tell it simply, is unimaginably tough.
2) Emotions are not overrated. Emotions control everything. People liking Ramayana is like Anton Ego loving Ratatouille dish because it reminded him of his mother's cooking. Once emotions get involved, hardly anything else matters. Hence it is a double edged sword. Once you invoke negative emotions, very tough to turn it around.
3) Content is winner. If writing is good, you don't need actors with chiseled bodies and six packs. You can be a winner with paunched actors with bad makeup. Only thing matters, is that they speak sense. And unlike today's TV, there is more action and reactions.
4) Power of goodness is way beyond imagination. One good act overshadows hundreds of bad acts. Arun Govil and Deepika may not be the greatest actors around, but will always be remembered. So will Ramanand Sagar as a director. It like having Joginder Sharma's last over or Laxman's 281, all your sins are forgotten.



5) Power and influence of Ram is unimaginable. Sometimes I wonder what kind of person in real he was. No other personality has such power and influence in India. You can't claim to know India and Indians without knowing Ram.
6) TV is not the idiots box it has become in recent years. It can still revive. Bring good content and sanitize the viewers affected from Splitsvilla and Bigg Boss. And thats where the magic starts.

Thursday, January 7, 2021

सौंदर्य की उत्पत्ति

सौंदर्य प्रकृति का एक सामान्य सर्वसुलभ लक्षण नहीं है। सामान्यतया प्रकृति अपने साधारण रूप में ही रहती है, सौंदर्य की उत्पत्ति अप्रत्याशित यादृच्छिक घटना है जिसे आप English में unpredictable random event कह सकते हैं। मतलब यह कि कोई ऐसा निश्चित तरीका नहीं है जिससे सौंदर्य की उत्पत्ति सुनिश्चित हो सके।

सौंदर्य की उत्पत्ति और इसके साथ जुड़ा अनिश्चितता के भाव को हम जीवन के हर रूप में देख सकते हैं। साहित्य को ही लें, संत कवि तुलसी दास ने पूरा रामचरितमानस लिखा, राम के जीवन चरित के हर पहलू पर एक से एक दोहे लिखे , छंद लिखे, कोई किसी से कम नहीं। लेकिन को प्रसिद्धि " रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाय पर वचन न जाई" को मिली , किसी और दोहे को नहीं मिली। यही सौंदर्य है, यही इसकी उत्पत्ति है। क्या यह दोहा तुलसी का सर्वश्रेष्ठ दोहा है? शायद नहीं, लेकिन इसमें एक सौंदर्य है कि यह सबकी जुबान पर है। दिनकर का वीर रस पूरित और ओजपूर्ण साहित्य एक तरफ है, और "जब नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता है" वाली पंक्ति एक तरफ। इसीलिए शायद कहते हैं कवि लिखता तो बहुत है, रचना कभी कभी ही बनती है। रचना का बनना ही सौंदर्य की उत्पत्ति है।

मानव क्या ईश्वर भी इस नियम से परे नहीं है। प्रकृति ने खरबों मानवों की निर्माण किया, लेकिन मानव सौंदर्य भी इस नियम से परे नहीं है। वही दो आंखें, एक नाक , दो ओंठ का मेल किसी किसी को सुंदर बना देता है और बाकी साधारण रह जाते हैं। चश्मा दुनिया में अरबों लोग पहनते हैं, लेकिन सौंदर्य रजनीकांत के चश्मा पहनने में दिखता है। भौतिकी में हजारों सूत्र हैं लेकिन e =mc2 वाला सौंदर्य किसी और सूत्र है। आइंस्टीन के इस समीकरण एक खूबसूरत समीकरण माना जाता है।

मतलब यह कि सौंदर्य की उत्पति प्रयास से नहीं हो सकती। कोई भी रचनाकार यह नहीं कह सकता कि मेरी यह कृति सबसे सुंदर होगी। दा विंची को कतई यह पूर्वाभास नहीं रहा होगा कि उसकी तूलिका से उकेरी गई मोनालिसा की मुस्कान का सौन्दर्य उसे और उसकी कृति दोनों को अमर कर देगी।

इसका अर्थ क्या यह है कि चूंकि सौंदर्य की उत्पति का पूर्वानुमान कठिन है, इसका प्रयास ही ना किया जाय। बिल्कुल भी नहीं, सौंदर्य के लिए आवश्यक है साधारण का अनवरत उत्पादन। जब प्रकृति भी हजारों टन कोयला बनाने के बाद एक हीरा बना पाती है, तो मानव मात्र की बात ही क्या है। साधारण कोयले के निर्माण की प्रक्रिया से ही हीरा भी बनता है, इसीलिए आवश्यक है कि कोयला बनाने के लिए जो संयम, दाब और बल प्रकृति लगाती रहती है, उसी प्रकार हम अपना प्रयास करते रहें, और सौंदर्य की उत्पति का काम प्रकृति और नियति पर छोड़ दें।  शायद कर्मण्येाधिकारस्ते का गीता संदेश भी इसी ओर इशारा करता है कि हम सिर्फ कर्म के भागी है, फल किसी और के हाथ में है।

साधारण और सामान्य काम करते रहने का अनवरत प्रयास कभी कभी आर्डिनरी आउटपुट को एक्स्ट्रा आर्डिनरी आउटपुट बना देता है। यह एक्स्ट्रा शायद अथक प्रयासों का एक पुरस्कार है। सचिन तेंदुलकर ने अपने क्रिकेट जीवन में कितने सुंदर शॉट खेले, लेकिन साउथ अफ्रीका में शोएब अख्तर को सक्वेयर कट से थर्ड मैन के उपर लगाया गया छक्का  सौंदर्य उत्पत्ति का उदाहरण है। आवश्यक है कि हम सौंदर्य की प्रत्याशा रखें, प्राप्ति पर विनयता पूर्वक धन्यवाद कहें लेकिन गर्व रहित हो अपने आप को सामान्य और साधारण मान कर अपने सामान्य कार्य में लगे रहें। सौंदर्य और विशेष और यादगार क्षणों की प्राप्ति का मार्ग यही है। 

Tuesday, December 29, 2020

तुम कल पत्थर थे, आज मिट्टी हो

तुम मिट्टी हो। तुम्हें हमेशा आस पास ही पाया है। आस पास क्या, हमेशा तुम्हें अपने पैरों के नीचे ही देखा है। फिर भी, कभी तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनी,  तुम्हें कभी बोलते नहीं सुना। शायद तुम्हें बोलने की इजाज़त लोगों ने कभी दी ही नहीं। तुम हर जगह हो पर मिट्टी को लोग अपने घर आने तक नहीं देते हैं। घर की चौखट के बाहर रखे, उस स्वागतम लिखी चटाई तक ही तुम्हारा स्वागत रुक जाता है, तुम्हारे आगे जाने से घर गन्दा हो जाएगा ना। यह अलग बात है कि वह घर खुद मिट्टी ने बनाया है। 

ऐसा नहीं है कि इन्सानों ने ही  तुम्हारे साथ ऐसा बर्ताव किया हो। बारिश का पानी , जिसका इंतजार कर कर के तुम्हारी छाती फट जाती है। जिस पानी को तुम सूरज की तेज धूप से बचाने के लिए अपने सीने में छुपा लेते हो | अपने अंदर रख कर भी उसको अपने को उससे दूर रखते हो, ताकि वह निर्मल कहला सके | जिसके लिए तुम्हारे पूरे बदन पर दरारें आ जाती है,  वह भी तुमसे मिलने में कतराता है। तुमसे मिलने के बाद उसका रंग मटमैला जो हो जाता है।  हर चीज़ तुम्हीं से निकलती है, पर तुमसे पीछा छुड़ाना चाहती है।

गेहूं , गुलाब, अफीम  या अंगूर सब तुमसे ही निकलते हैं, लेकिन सबसे पहले उन पर लगी मिट्टी धोयी जाती है। तुमसे ही निकले जब तक तुमसे जुदा ना हों, साफ सुथरे नहीं कहलाते। कहते हैं मनुष्य का शरीर भी तुमने ही बनाया है, मिट्टी का तन मिट्टी का मन तो बहुत सुना, यह किसी ने नहीं बताया कि वही मिट्टी अगर शरीर से लग जाय तो मैल कह कर क्यों दुत्कारी जाती है। जिसने अपना सर्वस्व सृजन के लिए न्योछावर हो,  उसका नाम बर्बादी और विनाश से जोड़ कर मिटटी में मिला दूंगा जैसी बातें क्यों की जाती है|  जो मिटटी सोना और हीरा उगलती है उसकी कीमत को माटी के मोल कह कर क्यों नीचे दिखाते हैं | 

शायद दुनिया ऐसी ही है | सुना है कि तुम भी कभी पत्थर थे। वक्त के थपेड़ों ने घिस घिस कर तुम्हें आज मिट्टी बना दिया। पत्थर थे तो शालिग्राम थे, आज मिट्टी बन गए तो मैल, धूल, कीचड़, गन्दगी क्या क्या नहीं कहलाते। फिर सोचता हूं, कि तुम कल पत्थर थे, आज मिट्टी हो | मैं आज इंसान हूं, कल मिट्टी बनूंगा। कल मिट्टी बनूंगा।