लग रही लंबी अपनी ही परछाईं से
जब तुम—
कभी थीं ही नहीं मेरे हिस्से की धूप में?
यह कैसी स्मृति है
जो जन्मी ही नहीं
और फिर भी
तुहिन कणों की तरह सराबोर करती है
मेरे मन मस्तिष्क को सदैव।
भिक्षुक—
जिसने स्वर्ण को छुआ नहीं, देखा नहीं,
जिसकी फैली हथेली पर
हैं घिसी रेखाएँ
और उन रेखाओं में भी स्वर्ण के उल्लेख तक नहीं
क्या वह सचमुच दरिद्र है स्वर्ण के अभाव में?
या दरिद्र है
उस कल्पना में
जहाँ स्वर्ण की एक असंभव परिकल्पना
वशीभूत करती है उसकी चेतना को।
स्वप्न—
वे तो आते हैं बिना आमंत्रण,
रचते हैं उजले महल
टूटे हुए बरामदों में।
पर क्या स्वप्न का स्वर्ण
हथेली में तौल सकते हैं हम?
क्या उसकी चमक
वास्तविक है क्षुधा की तरह
या यह स्वप्न स्वर्ण वास्तव में
है धतूरे वाला कनक
जिसे मात्र पाकर मतंग हो चुकी है इच्छाएं।
और फिर—
मन, यह चंचल व्यापारी,
लेन-देन करता है उन वस्तुओं का
जिनका अस्तित्व
केवल संभावना की धुंध में है।
तुम—
न थीं,
न हो सकती हो—
फिर भी
फिर भी एक रिक्त स्थान
तुम्हारे आकार का
क्यों बना रहता है भीतर?
शायद अभाव
वस्तुओं का नहीं,
आकांक्षाओं का होता है—
और आकांक्षा
वस्तु की दासी नहीं,
अपने ही भ्रम की स्वामिनी है।
तो क्या उचित है—
उस स्वर्ण के लिए तृष्णा
जो कभी था ही नहीं?
या यह कि हम स्वीकार लें—
कुछ रिक्तियाँ
पूर्ण होने की मोहताज नहीं होती
वे होती हैं
हमें हमारे भीतर की अनंतता का
आभास देने के लिए।
और तब—
भिक्षुक
स्वर्ण का नहीं,
अपने ही स्वप्नों का त्यागी हो जाता है।
और मैं—
तुम्हें खोकर नहीं,
तुम्हें कभी न पाकर भी
पूर्ण हो सकता हूँ।
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