Wednesday, September 21, 2022

राजू भईया के लिए।

गजोधर भैया,
हंसाते हंसाते अचानक से चल दिए। अब कौन सुनाएगा कि बूढ़ा गब्बर का आगे क्या हुआ? क्या सांबा और कालिया अब भी उसको लाफा देते रहते हैं? कौन फिल्म थिएटर में देख कर उसकी कहानी हमको सुनाएगा। बहुत इच्छा थी कि आप लाल सिंह चड्ढा देख कर आते और उसकी कहानी सुनाते। अब यह इच्छा तो पूरी होगी नहीं। जीजा साली वाली कहानी भी आप अधूरी छोड़ गए। जीजू!! एक रसगुल्ला, खाना पड़ेगा!!! कहने वाली साली कहां है आज कल? बहन की शादी करवाने वाले भाई की शादी हुई कि नहीं, यह भी बिना बताए चल दिए। कभी कभी गुस्सा भी आता है कि शायद आप बड़े आदमी बन गए तो हम लोगों की परवाह करना छोड़ दिया। हां कर लो यह पहले, बड़े आदमी हैं करते होंगे। 

राजू भैया, कितनी बातें थी जो तुमसे सुननी थी। कितनी कहानियां थी जो आपको सुनानी थी।

बड़े शौक से सुन रहा था जमाना, तुम ही सो गए दास्तां कहते-कहते।

जहां रहना, हंसते रहना!! हंसाते रहना।।

Tuesday, September 20, 2022

A peaceful natural death

Queen Elizabeth II has died peacefully of natural causes. Of course, she lived an extraordinary life. She was corronated as queen almost seven decades ago. She saw a lot of water flow down the Thames. But more than her life, it's her death that catches my attention. When I read the news about the queen dying peacefully of natural causes, I thought this kind of death is becoming very very rare. How many of us have seen people around us dying peacefully at home due to natural causes after living a full life. Most of the deaths we see are preceded by prolonged illness, medical procedures, and painful medication. Diabetes in kids, heart attacks in thirties and deaths in 40s don't surprise us anymore. Rarely do people die at home; it's either in hospital or on the way to hospital. Heart attacks, diabetes, hypertension, and other lifestyle diseases have denied most of us a natural, peaceful death. The Queen definitely had a privileged life, and she had a privileged death too. Most of us may wish for a life like her; a death like her is equally desirable, if not more. May her soul rest in peace!

अलार्म घड़ी सुलाने के लिए है

अलार्म घड़ी बजनी चाहिए यह बताने के लिए कि सोने का वक्त हो गया। अलार्म घड़ी इसलिए नहीं बनी कि आपको कच्ची नींद से जगाए । अलार्म घड़ी इसलिए बनी है कि आपको कहे कि थोड़ा सो जाओ, थक गए होगे ना कि सुबह सुबह आपको चिल्ला चिल्ला कर जगाए कि उठ जाओ कब तक सोते रहोगे। अलार्म घड़ी आपका खयाल रखने के लिए बनी है, आपकी एक सेविका है जो आपको सही समय याद दिलाती है। हमने उसको अपनी एक क्रूर गुस्सैल मालकिन बना दिया है जिसकी आवाज तक हम सुनना नहीं चाहते, लेकिन जिसकी बात मानना हमारी मजबूरी बन गई है। क्यों ना हम अलार्म घड़ी को ऐसे अपने जीवन में ऐसे अपनाए कि उसकी आवाज सुन कर हमें खुशी हो न कि हर सुबह उसको बार बार खीझ कर हम चुप कराते रहें। 

भला किसको अपनी जिंदगी में हर सुबह चीख चीख कर नींद तोड़ने वाला दोस्त चाहिए!! 

Tuesday, August 23, 2022

उत्थान और पतन

गुरुत्वाकर्षण का बल हमेशा हर किसी को नीचे खींचता रहता है। कोई वस्तु उपर जा रही है तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसपर गुरुत्व के बल ने काम करना बंद कर दिया है, इसका अर्थ यह है कि वस्तु ने गुरुत्वाकर्षण बल के अधिक बल विपरीत दिशा में लगा कर गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव को अस्थाई रूप से प्रभावहीन बना दिया है। लेकिन यह प्रभाव अस्थाई ही है क्योंकि हर उपर जा रही वस्तु पर भी उसे नीचे खींचने वाला बल सतत रूप से लगा रहता है। गुरुत्व का बल को लगातार हराना पड़ता है, हर पल हराना पड़ता है, क्योंकि हर उपर जा रही वस्तु पर नीचे लाने वाले ताकतें हमेशा लगी रहती हैं।

ऊपर ले जाने वाला बल थक जाता है, नीचे खींचने वाला बल कभी नहीं थकता। ऊपर जाना उद्यम है और नीचे गिरना अंतिम नियति।  उत्थान उद्यम है और पतन नियति। उद्यम से नियति को टाल सकते हैं , बदल नहीं सकते। लेकिन नियति से लड़ना ही पुरुषार्थ है, जीवन है, नियति के आगे विवश हो जाना ही तो मृत्यु है, अंतिम पतन है। ऐसा पतन जिसके बाद कोई उठता नहीं। पतन स्वाभाविक प्रक्रिया है, उसके लिए बल नहीं लगाना पड़ता, उत्थान स्वाभाविक नहीं है, उसके लिए बल लगाना पड़ता है। जिस दिन उत्थान का प्रयास कम हो जाता है, पतन की जीत का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। यह नियम सबके लिए शाश्वत है चाहे व्यक्ति हो, वस्तु हो, कोई संस्था हो , या साम्राज्य हो या नैतिक चरित्र, सबके लिए पतन स्वाभाविक है, शाश्वत नियति है । जग में वोही महान रहा है जिसने अपने उद्यम, संयम, प्रयास से पतनकारी शक्तियों को लगातार पराजित किया है। अपने प्रयास , उद्यम, संयम को बनाए रखें, पतन को पराजित करने की कोई और युक्ति नहीं है।

Saturday, August 20, 2022

छोटी छोटी खुशियां और मैं

बार बार जाता हूं
समंदर के किनारे
देखने कि कैसे बच्चे बनाते हैं
रेत के टीले,
और लहरों को देख खुश होते हैं,
कैसे बीनते हैं सीप के टुकड़े,
और अपनी मुठ्ठी में भर 
लेते हैं लहरों की झाग,
छोटी छोटी खुशियों से
भर जाती है उनकी झोली।

और मैं उनके साथ ही खड़ा
महरूम हूं उन सारी खुशियां से,
वक्त और तजुर्बे की मोटी चादर 
जम गई है मेरे चारों ओर
कि जिसके बाहर ही रह जा
रही हैं ये बच्चों की खुशियां
और अंदर मैं कुछ घुट सा रहा हूं।

करता हूं पुरजोर कोशिश 
कि शामिल हो सकूं उनके साथ
उन छोटी छोटी खुशियों में,
पा सकूं एक टुकड़ा अपने हिस्से की
मुस्कुराहट का।
जैसे कोई अंधा बाप दूसरों से 
सुन कर देखने की कोशिश
रहा हो अपने बेटे
की पहली फिल्म
और धीमे धीमे मुस्कुरा रहा हो
देख अपने बेटे को परदे पर
मन की आंखों से।


Saturday, August 13, 2022

हीरक जयंती पर स्वर्ण जयंती की यादें

स्वतंत्रता की पचासवीं सालगिरह वर्ष 1997, मैं नवोदय विद्यालय कटिहार में छात्र हुआ करता था। अच्छी तरह से याद है, स्टेंसिल्स की मदद की हमारे हॉस्टल में हरेक दीवार पर जय हिंद, तिरंगा, सारे जहां से अच्छा , मेरा भारत महान जैसे नारे उकेरे गए थे। अभी पच्चीस साल बाद पीछे मुड़ के देखता हूं कि देश कितना बदल गया है। एक बानगी तो यही कि उस भव्य समारोह की सिर्फ स्मृतियां हैं हमारे पास फोटो एक भी नहीं। आज के ज़माने से बहुत अलग थी वो दुनिया। हमने आजादी की पचासवीं वर्षगांठ तक पिज्जा नहीं खाया था। पिज्जा छोड़िए, राजमा और छोले भटूरे और आइसक्रीम भी नहीं खाई थी। हम लोग लाल बर्फ को ही आइसक्रीम मानते थे। चॉकलेट के नाम पर चीनी की उबली गोलियां जिसको लेमन चूस बोलते थे वोही खाई थी। किस्मी टॉफी बार और मोर्टन ही हमारे लिए चॉकलेट हुआ करते थे। डियोडरेंट और परफ्यूम का अंतर पता नहीं था। हम बस सेंट जानते थे जो शादियों में दूल्हे और हमारे म्यूजिक सर लगाया करते थे।कंप्यूटर देखा नहीं था हमने। पक्के से याद नहीं शायद सुना भी नहीं था। मोबाइल फोन हमने फिल्मों तक में नहीं देखा था। 

कुछ चीज़ें अभी बेतुकी लग सकती हैं लेकिन एक बात का खयाल रखना भी जरुरी है कि यह बिहार के एक गुमनाम से जिले के एक स्कूल छात्र के निजी अनुभव हैं। आज़ादी की स्वर्ण जयंती तक हमने जींस नहीं पहनी थी, ब्रांडेड कपड़े क्या होते हैं हमें पता नहीं था। बिसलेरी वाला पानी पीना अभी बाकी था और सोडा से कपड़े धोना सुना था, सोडा पिया भी जाता है, यह पता नहीं था। एसी में कभी नहीं बैठे थे, एसी डब्बे में सफर नहीं किया था। अपनी कार का सपना तक देखना बाकी था, सायकिल चलाना सीखना भी उधार की साइकिल से हुआ था। 

बर्थडे का पता था लेकिन बर्थडे में केक काटना और केक चेहरे पर लगाना होता है पता ना था। वेस्टर्न टॉयलेट पर नहीं बैठे थे और बाटा जूता समृद्धि की निशानी समझा जाता था। नेपाली घड़ियां जिसमें चाभी की जगह बैटरी लगती थी, कुछ लोगों के पास हुआ करती थी। चाइनीज घड़ियां, रेडियो और कैमरे नेपाल के रास्ते स्मगलर लोग लाया करते थे। बॉबी देओल स्टाइल आइकन हुआ करते थे जिनकी फिल्म गुप्त की चर्चा हर तरफ थी। अमिताभ बच्चन तब तक भी अपने आप को बूढ़ा मानने को तैयार ना थे और मृत्युदाता जैसी फिल्में कर रहे थे। 

गिनती करते करते थक जाऊंगा लेकिन शायद आज के बच्चों को पच्चीस साल पुरानी दुनिया का अहसास नहीं करवा पाऊंगा। यकीन मानिए, हमारा देश बहुत आगे बढ़ा है स्वर्ण और हीरक जयंती के बीच। सफर बहुत बड़ा है। ईश्वर की दया से अगर स्वस्थ रहा और आज़ादी की सौवी वर्षगाठ देखने का अवसर मिला तो एक सेवानिवृत वृद्ध की तरह आजादी की पचासवीं और पचहत्तरवी वर्षगाठ को याद करूंगा। पक्का यकीन है कि जिस तरह आज बैठकर यह अंदाज लगाना तक कठिन है कि 2047 में दुनिया कैसी होगी, 2047 में यह यकीन करना भी मुश्किल होगा कि 2022 में दुनिया ऐसी थी। 

आप सबको आज़ादी के अमृत महोत्सव की बहुत बहुत शुभकामनाएं। जय हिंद।🙏

Tuesday, August 9, 2022

कोउ नृप होउ हमहि का हानी।

करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा॥
कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी॥3॥

रामचरितमानस के अयोध्या काण्ड के इस दोहे का सामान्यतया एक चौथाई ही प्रसिद्ध है और बोल चाल में प्रयुक्त होता है। कोउ नृप होउ हमहि का हानी , सामान्यतया वैसे लोग बोलते हैं जो अपने आप को राजनीतिक रूप से तटस्थ दिखाना चाहते हैं। यह एक विडंबना ही है क्योंकि यह पंक्ति मूल रूप में दासी मंथरा द्वारा रानी कैकेयी को कही गई थी और इसमें अभिधात्मक नहीं वरना व्यंजना भाव प्रमुख है। सर्वविदित है कि मंथरा की कूटनीति ने ही राम के वनवास की नींव रखी।  यह तथाकथित तटस्थ वक्तव्य हमारे इतिहास का सबसे कूटनीतिक वक्तव्य है। राजनीति ऐसी ही होती है, जो दिखता है वो होता नहीं और जो होता है वो दिखता नहीं।

Saturday, August 6, 2022

happy friendship day to all except

Happy friendship day to all my friends except those jisne kaha ki

1. Maine apne aankhon se dekha, section C wali line de rahi tumko..Pink shirt sahi lagti hai tumper..wohi pahan ke aaj class chalna..

2. Chal na Aaj night show dekh aate hain, kal ka assignment ka fikar mat kar.. bhai hai tu mera..main kar dunga Tera assignment..

3. Tujhe nahin pata nahin.. lekin main jaanta hoon.. sachcha pyar karta hai tu usse . Tu jaaker nahin bolega to main jaaker bol dunga.. de uska number abhi baat karta hoon..

4. Abe Mahatma Gandhi ki aulaad. Ek se kuch nahin hota. Aankh band kar aur gatak jaa..

5. Yeh kya Nandan aur Champak padh raha hai.. asli magazine padhega?

6. Main ek jaruri kaam se bahar nikal raha hoon, Teri bhabhi ne bulaya hoon.. us khadoos teacher ki class mein proxy laga dena .

7. Aaj main wallet Lana bhool gaya.. mera contri tu hi kar de.. ma Kasam.. next time main de dunga tere badle ..

And last but not the least .

8. Bhai engineering kar le.. bahut scope hai.. meri baat maan, life set ho jayegi..

Sunday, July 31, 2022

नए कोंपल की जरूरत

कोई पेड़ कितना जिएगा, उसकी आयु कितनी बची है यह इस बात पर उतना निर्भर नहीं करता कि तना कितना मजबूत है। या उसकी जड़ें कितनी गहरी हैं। तना कितना भी मजबूत हो , तनों पर फूल नहीं खिलते। तनों से फल नहीं लगते। फूल खिलते हैं नई पतली टहनियों पर, फूल खिलते हैं नई कोंपलों से। भले जड़ कितनी भी गहरी क्यों ना हो, प्रकाश संश्लेषण का काम नहीं कर सकती जिससे वृक्ष को नई ऊर्जा मिलती है। 

किसी वृक्ष की जीवन आयु इस बार पर निर्भर करती है कि उसमें नए पत्ते आ रहे हैं या नहीं। क्योंकि विकास और वृद्धि नई कोंपलों से ही हो सकती है। भविष्य की संभावनाओं से भरे नए बीज, नई हरी टहनियों से लगे नए फलों के अंदर ही संरक्षित हो सकते हैं।
कोई भी विचारधारा, संस्था तब तक हो जीवन्त बनी रहती है जब तक युवा उसकी ओर आकर्षित हो उसमें शामिल होते रहते हैं। यह युवा ही संस्था में प्राण वायु का संचार करते हैं, विचारधारा के बीजों को संरक्षित करते हैं और दूर दूर तक नई पौध का आधार बनते हैं। हरे पत्तों के बिना मजबूत से मजबूत तना भी ठूंठ बन जाता है और हरे पत्तों के बिना गहरी जड़ें भी बिना श्वास के सूख जाती हैं। 

Friday, July 29, 2022

निंदक को नियरे राखिए, मन में नहीं।

खाना खाना आसान है, बनाना नहीं। फिल्म देखना आसान है , बनाना नहीं। खेल देखना आसान है, खेलना नहीं। परीक्षा की तैयारी के लिए निर्देश देना आसान है, परीक्षा पास करना नहीं।बच्चों को कम अंक आने पर डांटना आसान है, बच्चों को पढ़ाना मुश्किल। इसलिए फूड ब्लॉगर ज्यादा हैं शेफ कम। फिल्म क्रिटिक्स ज्यादा हैं फिल्मकार कम। खिलाड़ी कम हैं कॉमेंटेटर ज्यादा। कोचिंग चलाने वाले ज्यादा हैं , आईएएस अधिकारी कम। डांटने वाले ज्यादा तो शिक्षक कम। 
अगर आप हर क्षेत्र में टिप्पणीकार की भूमिका में हैं तो आवश्यक है कि कम से कम एक क्षेत्र में आप रचनाकार बनें, कर्ता बनें। फिर आप अपनी टिप्पणी को रचनात्मक बना पाएंगे, कर्ता के प्रति सहानुभूति रखेंगे और अपमान करने की प्रवृति से बचेंगे । जिसने लिखा ही नहीं उसकी वर्तनी की गलती तो होगी नहीं ।यह भी संभव है कि आप रचनाकार और कर्ता की भूमिका में हैं और टिप्पणीकारों से परेशान हो गए हों, तो याद रखें कि कबीर दास ने निंदक को नजदीक रखने कहा है न कि अपने मन मस्तिष्क में उनको बसा लेने के लिए। अपने मन मस्तिष्क को अपनी रचनात्मकता के लिए खाली रखिए वहां निंदक को घर बनाने ना दें। निंदक का योगदान जरूरी है लेकिन बस स्वच्छ करने के लिए साबुन की तरह ही। साबुन बाहर लगाया जाता है, खाया नहीं जाता। 

Friday, July 22, 2022

सब्सिडी का खेल

सब्सिडी, जिसे हिंदी में सहायिकी या राज्य सहायता कहा जाता है, की परिभाषा अगर हम देखें तो हमें दो बातें पता चलती हैं। यह जरूरी वस्तुओं और सेवाओं पर जरूरतमंद तबके को सरकार द्वारा दी जाने वाली छूट या सहायता है । यहां सरकार इन वस्तुओं या सेवाओं को उनके उत्पादन मूल्य से कम कीमत पर उपलब्ध करवाती है। भारत जैसे कल्याणकारी राज्य के लिए, जिनके संविधान की प्रस्तावना में ही समाजवादी शब्द प्रयुक्त हुआ है और फिर चाहे नीति निदेशक तत्व हों या अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार हो, इन सबमें एक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा निहित है, हमारी योजनाओं के लिए सब्सिडी एक अत्यंत महत्वपूर्ण उपागम है। 

समस्या उत्पन्न होती है जब राज्य के नीतियां या उनको लागू करने के तरीके से सब्सिडी की मूल परिभाषा से भटकाव होने लगता है। यह भटकाव दो तरीकों से हो सकता है , पहला सरकार इन चीजों पर छूट दे जो गैर जरूरी श्रेणी में आती हों। दूसरा तरीका है कि छूट का लाभ उनको मिले जिनको इसकी आवश्यकता नहीं है। हालिया वर्षों में भारत में सब्सिडी के लिए मुफ्तखोरी, रेवड़ी बांटना जैसे शब्दों का प्रचलन बढ़ा है तो इसके पीछे के कारणों की तहकीकात भी आवश्यक है। 
ओ

भारत में जिन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा सब्सिडी दी जाती है वो 3F से पहचाने जाते हैं फूड, फ्यूल और फर्टिलाइजर। फूड सब्सिडी यानी खाद्य सब्सिडी हमारे यहां सबसे बड़ा मद है खास कर खाद्य सुरक्षा कानून के लागू होने के बाद। 75% ग्रामीण और 50% शहरी जनसंख्या खाद्य सुरक्षा कानून के अंतर्गत नगण्य कीमतों पर खाद्यान्न पाती है। भारत जैसे देश में भूख की समस्या पर काबू पाने के लिए यह कदम आवश्यक है, लेकिन फिर भी यह कहना गलत नहीं होगा कि इस के दायरे में एक बड़ी ऐसी जनसंख्या भी शामिल है जिसको शायद इस छूट का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
सब्सिडी का दूसरा सबसे बड़ा मद है फर्टिलाइजर या उर्वरक। ऊपरी तौर पर देखें तो भारत, जिसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि मानी जाती है, में कृषि को सहायक उर्वरक सब्सिडी सही दिखती है। लेकिन उर्वरकों पर दी जा रही सब्सिडी के पर्यावरणीय दुष्परिणाम हमारे सामने हैं। भूजल प्रदूषण, खाद्य श्रृंखला संकेंद्रण , कैंसर जैसी बीमारियां और घटती जैव विविधता इसके दुष्परिणाम हैं।
पेट्रोलियम उत्पादों पर सब्सिडी भारतीय अर्थव्यवस्था की दुखती रग है। एक तो पेट्रोलियम के आयात का बोझ उपर से जो डीजल सब्सिडी किसानों के लिए लक्षित है उसका प्रयोग महंगी एसयूवी गाड़ियों के द्वारा किया जाना। इनके अलावा कृषि सम्बद्ध अन्य सब्सिडी जैसे न्यूनतम समर्थन मूल्य, कृषि उपकरण सब्सिडी का भी अच्छा खासा योगदान बन पड़ता है।

भारत में बढ़ते सब्सिडी के बोझ और कोरोना काल के दौरान आई इसमें अप्रत्याशित बढ़ोतरी के बीच यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो उठा है कि कल्याणकारी राज्य के नाम पर चलाई जा रही योजनाएं हमारे लक्ष्य के साधक हैं या क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के साधक मात्र बन के राज गए हैं। अगर ऐसा है तो हमारी इस नीति की पुनरीक्षण की आवश्यकता है। हां एक बात यहां साफ कर देना जरूरी है कि हमें बाहरी दवाब में आकर सब्सिडी कम या खत्म करने की आवश्यकता बिलकुल नहीं है। विकसित देश WTO जैसी संस्थाओं के मंच से भारत पर सब्सिडी खत्म करने का जो दवाब बनाया जाता है वो उनके दोहरे चरित्र को उजागर ही करता है। विकसित देश खुद अपने देश में हमारे देश से बीसियों गुना सब्सिडी देते हैं। वर्ष 2018 में भारत जहां अपने किसानों को 49 डालर की सब्सिडी देता था वहीं अमेरिका अपने किसानों को औसतन सत्रह सौ डालर से ऊपर की सब्सिडी देता था। यही हाल कमोबेश यूरोप , ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का है। यह देश भी अपने किसानों, दूध उत्पादक , मुर्गी पालकों और सूअर पालकों को भारत से कहीं अधिक सब्सिडी देते हैं। भारत में सब्सिडी जहां गरीबी उन्मूलन, अंत्योदय जैसे लक्ष्यों से चालित है, इन देशों की सब्सिडी पॉलिसी पूरी तरह से बाजार आधारित और मुनाफा खोरी और भारत जैसे विशाल बाजार पर कब्जा करने की नीति से प्रेरित है।
अब रही बात हमारी सब्सिडी पॉलिसी में सुधार की बात तो शायद इससे ज्वलंत मुद्दा शायद ही कोई हो। बेतहाशा लोकलुभावन वादे और योजनाओं के कारण हमारे कुछ राज्य इस हालत में पहुंच गए हैं जहां उन्हें अपने पिछले कर्ज के सूद को चुकाने के लिए नया कर्ज लेना पड़ रहा है। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। 

सबसे पहले तो हमें अपने लक्षित लाभुकों के पहचान की व्यवस्था को दुरुस्त करना होगा। जिस प्रकार नीम कोटेड यूरिया से यूरिया की कालाबाजारी कम हो गई है उसी प्रकार से नवाचार आधारित उपाय अन्य क्षेत्रों में भी लगाना पड़ेगा। आधार, मोबाइल और जन धन खाता की तिकड़ी के आधार पर सीधे लाभ अंतरण सिस्टम का कड़ाई से शत प्रतिशत अनुपालन करवाना होगा ताकि सब्सिडी का लाभ सिर्फ जरूरतमंदों तक ही पहुंचे। ऐसे क्षेत्रों में सब्सिडी बिलकुल ही सीमित होनी चाहिए जिसके लिए हम आयातित हाइड्रोकार्बन या कोयला पर आधारित हैं। कोयले से उत्पादित बिजली को सस्ती दरों पर बांट कर हम अपनी अर्थव्यवस्था , जलवायु, सतत विकास लक्ष्य और वैश्विक छवि सबके साथ एक साथ गंभीर मजाक कर रहे हैं।

इससे बड़ी ज़रूरत होगी सब्सिडी के राजनैतिक दुरुपयोग को रोकने की। चुनावी रैलियों के मंच से गहन आर्थिक फैसले लेने की प्रवृति पर रोक लगाना आवश्यक है। इससे लिए सम्मिलित राजनैतिक इच्छा शक्ति की आवश्यकता है और अगर आवश्यक हो तो चुनाव आचार संहिता में भी बदलाव लाया जाना चाहिए। इससे देश की विकास और सतत आर्थिक प्रगति की जगह लोक लुभावन नीतियों के द्वारा जनता को रिश्वत देने की प्रवृति रुकेगी। आखिर में जिम्मेदारी हम जनता की भी बनती है, हम सब का दायित्व बनता है कि हम अपने देश को एक परिवार समझें। जिस प्रकार परिवार में किसी बीमार सदस्य के लिए एक गिलास दूध ज्यादा रखा जाता है तो परिवार के अन्य सदस्य कोई आपत्ति नहीं करते और न ही बीमार होने का स्वांग करते हैं कि उन्हें भी दूध मिल जाय। उसी प्रकार सब्सिडी हमारे परिवार के वंचितों के लिए है, उनको ही लेने दिया जाय। बाकी लोगों को संयम और संतोष का अनुशासन पालन करना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो ना ही कभी परिवार का बीमार सदस्य अपनी निर्धारित खुराक पा सकेगा और बाकी सदस्य वंचन के भाव से प्रेरित हो असंतुष्ट ही रहेंगे।

http://m.rashtriyasahara.com/imageview_26318_97306484_4_9_23-07-2022_4_i_1_sf.html

द्रौपदी का नाम

तुम्हारा नाम क्या था द्रौपदी
द्रुपद की बेटी के अलावा क्या 
थी तुम्हारी पहचान?
श्याम वर्ण की थी इसीलिए
शायद कृष्णा कही गई,
पर यह तो तुम्हारे रंग पर
एक कटाक्ष भर ही था
इसीलिए सोचता हूं
कि तुम्हारा नाम क्या था द्रौपदी?

पांचाली नाम सिर्फ इसलिए क्योंकि
तुम पांचाल की थी
क्या बहुओं को उनके मायके के
नाम से बुलाना उस समय से ही है
तुम्हारा कुछ तो नाम तो होगा
अर्जुन , भीष्म , देवव्रत की तरह
क्या तुमने कभी अपना नाम तक जाना
या छुपाती रही जीवन भर।

कहने को सैरंध्री था एक छद्म नाम
लेकिन तुम्हारा तो हर नाम छद्म ही था
किसी नाम ने नहीं बताया 
तुम्हारे बारे में
बताया सिर्फ उन बंधनों के बारे में
जिनमें तुम बंधी रही आजन्म।

तुम आई नहीं थी दुनिया में
एक स्त्री और पुरुष के
 प्रेम मिलन से
बल्कि तुम उत्पन्न हुई दो पुरुषों
के अहंकार और अपमान 
की जलन से
अग्नि की कोख से पली 
पिता के प्रतिशोध की 
आहुति से सींची गई
एक संतान से ज्यादा 
एक अस्त्र थी
अपने पिता के लिए।
इसीलिए शायद एक नाम 
तक ना पा सकी ।
इतिहास के पन्नों में
लिखी गई महाभारत 
भले कहलाए महाकाव्य
कही जाय एक पूर्ण कथा
लेकिन अनुत्तरित रहता है
यह प्रश्न  अब भी कि
तुम्हारा नाम क्या था द्रौपदी।









Wednesday, July 20, 2022

वैशाली का विशाल यश

वैशाली विरुद्धों का सामंजस्य है। एक तरफ यह समस्त सांसारिक विषयों का त्याग कर कैवल्य प्राप्त करने वाले भगवान महावीर की भूमि है तो वहीं पाषाण ह्रदय में भी आसक्ति के बीज पनपा देने वाली वैशाली की नगरवधू आम्रपाली की भूमि भी है। वैशाली विश्व का पहला गणराज्य तो था ही, यही पर पहली बार सौंदर्य के सम्मान दिए गए। मिस वर्ल्ड और मिस इंडिया जैसे सम्मान सदियों पहले वैशाली में नगरवधू के नाम से दिए गए। अंबापालिका या आम्रपाली पहली विश्वसुंदरी कही जा सकती है।

यहीं पर कपिलवस्तु से निकलकर सिद्धार्थ आए और बुद्ध बनने की राह में अपने ब्राह्मण गुरू अलार कलाम से मिले। वैशाली बुद्ध के भी गुरु की भूमि है जहां युवा सिद्धार्थ ने ध्यान और तप की बुनियादी बातें ग्रहण की। बुद्ध बनने के बाद भी वो बहुधा वैशाली आते रहे। बौद्ध विहारों में महिलाओं के प्रवेश को अनुमति वैशाली में ही मिली थी। बुद्ध बनने की राह पर पहला कदम अगर वैशाली में उठाया गया था तो अपने महापरिनिर्वाण की यात्रा में कुशीनगर के लिए बुद्ध यहीं से निकले थे। वैशाली के लोग बुद्ध के साथ चल पड़े, बुद्ध ने उनसे निवेदन किया कि वो लौट जाएं लेकिन वैशाली के गण माने नहीं। भगवान बुद्ध ने उनको अपना भिक्षा पात्र तक दे दिया लेकिन बुद्ध के पीछे आने का वैशाली वालों का हठ दूर ना हुआ। अंततः केसरिया गांव से वैशाली वाले लोग लौटे और बुद्ध अपनी अंतिम यात्रा पर निकल गए। बाद में सम्राट अशोक ने यहां स्तूप का निर्माण कराया जो आज भी संरक्षित है। 

शिषुनाग वंश के सम्राट कालाशोक ने द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन भी वैशाली में ही किया था। यहीं बौद्ध धर्म स्थापित और महासंघिक दो भागों में विभक्त हुआ। अभिषेक पुष्करिणी वो स्थान है जहां वैशाली गणराज्य के नवनिर्वाचित जन प्रतिनिधि जन कल्याण की शपथ लेते थे जिसे आप आजकल शपथ ग्रहण समारोह के रूप में देख सकते हैं। उसी कुंड में खिले सौंदर्य से सने खिले कमल आपका स्वागत करते हैं। यह वोही कमल हैं जिन्हें बाबर ने पहली बार सासाराम में देखा था और जिसका वर्णन उनसे अपनी आत्मकथा में किया है। यही कमल आपको वैशाली में अशोक स्तंभ में भी शेर की प्रतिमा में दिखेगा लेकिन उल्टा। 

वैशाली का इतिहास बुद्ध और जैन काल से भी पुराना है। राजा विशाल जिनके नाम पर वैशाली इश्वाकु वंश के शासक थे , वोही वंश जिससे पुरुषोत्तम भगवान राम थे। राजा विशाल के नाम पर विशालपुरी नाम कालांतर में वैशाली हो गया। यह वैशाली की प्रसिद्धि ही थी फहयान और ह्वेनसांग दोनो यहां आए और यहां का वर्णन अपने यात्रा वृतांत में किया। और हां, वैशाली में अशोक का वो स्तंभ भी है जिसपर शेर की प्रतिमा है। आज भी पूर्णतः सुरक्षित है महान अशोक का शेर और शेर की वो मुस्कान (!!) । कभी बिहार आएं तो वैशाली के विशाल इतिहास को करीब से महसूस करने का मौका न गवाएं।