Monday, June 27, 2022

बिना फिकर अंजामों का

बाजारों से गुजरते पता चला
कि आया है मौसम आमों का
वरना इस बेमुरव्वत दौड़ में
पता ना चलता सुबह ओ शामों का

जिंदगी कट रही थी बेतकल्लुफ सी
कि वक्त आ गया झूठे एहतरामों का
जिंदगी की महफिल से गायब है साकी
और न ठिकाना है सुकून भरे जामों का।

तेरी यादों के सहारे ज़माना ए यारी
बोझा उठा रखा है इन फालतू कामों का
मिलेंगे तो बांटेंगे राज दिल के ए दोस्त
कुछ लम्हें कटेंगे बिना फिकर अंजामों का।

Friday, June 24, 2022

नालंदा के सबक

नालंदा के खंडहर केवल हमारा समृद्ध इतिहास याद नहीं दिलाते। नालंदा के खंडहर याद दिलाते हैं कि आध्यात्मिक ज्ञान, साहित्यिक ज्ञान, सभ्यता के साथ साथ बाहुबल और सैन्य शक्ति कितनी आवश्यक है। बिना बाहुबल के ज्ञान नीचे लटके पके आम की तरह है, कोई बच्चा तक तोड़ लेता है। बिना सैन्य बल के समृद्धि उतनी ही क्षण भंगुर है जितना पराजित बंदी बनाए सैनिक का आत्मसम्मान। 

खिलजी की नंगी तलवार के आगे हमारा सैकड़ों सालों का आध्यात्मिक ज्ञान बेबस हो गया और नालंदा का ज्ञान केंद्र खंडहर बन कर रह गया। काश हमारे बौद्ध भिक्षु बुद्ध, संघ, और धम्म की शरण में जाने के साथ साथ शक्ति की शरण में भी गए होते तो कदाचित खिलजी की तलवार का प्रतिरोध किया जा सकता था। वर्षों की समृद्ध रोमन सभ्यता बर्बर गोथों का एक वार नहीं झेल पाई और जमींदोज हो गई। आध्यात्मिक बल और नैतिक बल व्यर्थ है अगर वो बाह्य पाशविक बलों से अपनी रक्षा ना कर सके। 

आत्मो रक्षितो धर्मः। नालंदा के प्राचीन खंडहर जीते जागते सबक हैं कि राजा धर्म का पालन करे , यह उचित है लेकिन राजा धर्मगुरु बन कर प्रवचन करने लगे यह आने वाले संकट का द्योतक है। धम्म को आत्मसात करते सम्राट अशोक भले ही इतिहास के पन्नों में महान बन के दर्ज हों, यह भी सच है कि भविष्य में भारतवर्ष पर आक्रांताओं के निरंतर आक्रमण और विनाश के बीज उन्होंने ही बोए थे। विष्णु के एक हाथ में कमल तो दूसरे में चक्र यूं ही नहीं रहता। 

Thursday, June 23, 2022

सिराज: एक त्रासद हीरो

मेरे गांव का नाम नवाबगंज है। कारण यह कि नवाब सिराजुदौल्ला की सेना की एक टुकड़ी हमारे गांव में रहती थी। वो ही नवाब सिराजुदौला जिसको हरा कर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल पर कब्जा किया। जिसकी लाश पर क्लाइव, जाफर, मीरान और जगत सेठ जैसों ने तांडव किया। हम नहीं जानते कि अगर प्लासी की लड़ाई में नवाब सिराजुद्दौला नहीं हारते तो हिंदुस्तान की तस्वीर और तकदीर क्या होती। सिराज बहुत कुशल प्रशासक नहीं माने जाते, लेकिन फिर भी अगर सिराज बने रहते तो बंगाल सबसे समृद्ध राज्य से दुर्भिक्ष का केंद्र शायद ना बनता। सिराज हीरो नहीं थे लेकिन जाफर ने उनको दगा देखकर ट्रैजिक हीरो अवश्य बना दिया। इसीलिए आज से 265 साल पहले जब सिराज क्लाइव के छल से प्लासी में पराजित होकर भी इतिहास में हमेशा हमेशा के लिए दर्ज हो गए। जब सिराज मार दिए गए तो सिर्फ पच्चीस साल के थे। उनके बाद उनकी सारी पत्नियों सहित उनके नाना अलीवर्दी खान के खानदान की सारी औरतें मीर जाफर के बेटे मीरान के आदेश पर मार दी गई। नवाब जाफर के बेटे मीरान के कहने पर करीब 70 मासूम बेग़मों को एक नाव में बैठा कर हुगली नदी के बीचो-बीच ले जाया गया और वहीं नाव डुबो दी गई. सिराजुद्दौला ख़ानदान की बाकी औरतों को ज़हर दे कर मार दिया गया। 

बस सिराज की सबसे पसंदीदा बेगम लुफ्त उन निसा को जिंदा रखा गया। उन्हें जाफर और उसके बेटे दोनो ने निकाह का पैगाम भेजा। बेगम ने निकाह ठुकराते हुए वापस पैगाम भेजा कि मैं पहले हाथी की सवारी कर चुकी मैं अब गधे की सवारी नहीं करूंगी। you either die a hero aur you live long enough to be the villain. नवाब सिराजुदौल्ला एक नायक की मौत मरे और उनकी बेगम ने भी जाफर के सामने सर नहीं झुकाया। आज की तारीख ले जाती है वापस प्लासी के मैदान पर जहां भारत की तकदीर लुट रही थी और सिराज उन खुशकिस्मतों में से थे जिन्होंने ब्रिटिश लूट का नंगा नाच देखने के पहले ही अपनी आंखें मूंद ली। फिर भी जब भी अपने गांव का नाम पढ़ता हूं एक बार नवाब सिराजुद्दौला और प्लासी के मैदान तक ध्यान चला ही जाता है। 

Monday, June 13, 2022

टाई को बोलो बाय।।

भारत जैसे गर्म और आर्द्र देश में टाई बांधने को लेकर जो जुनून दिखता है वो समझ के परे है। भारत में खास कर गर्मियों में परिधान ऐसा होना चाहिए जो पसीने को सोखे और हवा का पारगमन संभव रखे। इसीलिए भारतीय परंपरा में पुरुषों के लिए धोती और महिलाओं के लिए साड़ी जैसे परिधान विकसित हुए। चुस्त कमीज जिसे गले तक बंद रखना पड़े, ऊपर से उसपर एक टाई बांधनी पड़े और सबके ऊपर से एक मोटा सा कोट पहनना पड़े, भारतीय गर्मी के मौसम के लिए बिल्कुल अनुपयुक्त ही है। 

लेकिन स्कूलों में नर्सरी के बच्चे हों, या कॉलेज में नौकरी के लिए साक्षात्कार देते युवा हों, शादी के लिए तैयार दूल्हे हो या जरूरी कानूनी मुकदमे में गवाही देने जाता वरिष्ठ नौकरशाह, बिना टाई के अपूर्ण माने जाते हैं। यह हास्यास्पद तो है ही , कॉमन सेंस पर औपनिवेशिक गुलामी वाली सोच के हावी होने से ज्यादा कुछ नहीं है। वक्त आ गया है कि हम अपने परिधानों पर शर्मिंदा होना और टाई ना पहनने वालों को शर्मसार करना बंद कर दें। गले की फांस की तरह गले से झूलता वो फालतू सा कपड़े का टुकड़ा कम से कम हमारे किसी काम का नहीं है। हां एक काम है उसका, यह याद दिलाना कि 1757 की प्लासी की हार से शुरू हुआ सिलसिला 1947 में बंद नहीं हुआ, 2022 में भी बदस्तूर जारी है। 

Monday, June 6, 2022

पहली बारिश की बूंदें

पहली बारिश की बूंदें
झर झर।

लगती हैं ऐसे जैसे 
शरारती तुमने सुबह सुबह जगाने
की कोशिश की हो पानी छिड़क कर
आसमान के छाए हों काले बादल 
मानो मेरा चेहरा छू रहे हों 
जैसे तुम्हारे खुले गीले बाल
और रिस रही हो उनसे बूंदें
अंजुली भर ।
पहली बारिश की बूंदें
झर झर।

काले बादलों के बीच चमकती
बिजली लगती है जैसे
बीच बीच में दिखता हो 
सफेद तौलिया जो बमुश्किल बांधे हुए है 
तुम्हारी भीगी केशराशि को।

है फैली चारों तरफ
पहली बारिश की महक 
जैसे अभी अभी तुम 
बाहर निकली हो गुसलखाने से
और महक उठा हो कमरा तुम्हारे
संदली साबुन की खुशबू से।
और मैं निहारता तुम्हें
जी भर।
पहली बारिश की बूंदें
झर झर।

बिस्तर पर अलसाया पड़ा मैं 
गर्मी से बेजान हो रहे पत्ते की तरह
और बारिश की बूंदें पड़कर
धुलने लगी हो पत्ते पर जमी
धूल की परत
और दुबारा दिखने लगी हो 
पत्ते की छुपी हरियाली 
पाकर ठंडक भरी दुपहरी में
खुशी में झूम सा गया हो 
शीतल बूंदें की गुलाबी चोट 
से कांप रहा हो
थर थर ।
पहली बारिश की बूंदें
झर झर।

पहली बारिश की बूंदें
जगा जाती हैं पहले प्यार की
 सोचता हूं कि कब सिखाई
तुमने बारिश को अपनी शरारतें
और कैसे है बादलों में 
तुम्हारी अदाओं का 
 जैसा असर
जब भी देखता हूं
पहली बारिश की बूंदें
झर झर।




Sunday, June 5, 2022

कुरुक्षेत्र में मान सम्मान के लिए लड़ता पक्ष

द्रौपदी के पांच पति थे, पांचों वीर थे, ज्ञानी थे, क्षात्र धर्म के अनुपालक थे लेकिन उन्होंने द्रौपदी को दांव पर लगाने से परहेज़ नहीं किया। आधा राज्य पाने के लिए उन्होंने ऐसा किया। युद्ध भी हस्तिनापुर के सिंहासन के लिए हुआ था, द्रौपदी के मान सम्मान के लिए नहीं। पांडव पांच गांव पाकर सब भूलने को तैयार थे। धन्यवाद करना चाहिए दुर्योधन का जिसने बिना युद्ध के सूई की नोंक के बराबर भूमि देने से मना कर दिया और भीम की दुःशासन की छाती फाड़ने वाली प्रतिज्ञा की लाज रह गई। हां दुर्योधन अवश्य अपने पिता को अंधा कहने वालों को क्षमा करने को तैयार कभी नहीं हुआ। अपने पिता के सम्मान के लिए वो अवश्य लड़ा। कुरुक्षेत्र के रण में सिर्फ एक पक्ष मान सम्मान के लिए लड़ रहा था और वो पक्ष पांडवों का नहीं था। जहां पांडव अपनी पत्नी तक के चीरहरण के मूक दर्शक बने रहे , दुर्योधन ने कभी भी अपने मित्र कर्ण को सूत पुत्र तक कहना सहन नहीं किया।

Wednesday, June 1, 2022

परहित भाव की महत्ता

समस्त सृष्टि में मनुष्य ही है जो कवि है, प्रेमी है , चित्रकार है, लोकहित में कार्य करने वाला प्रशासक है, अधिकारों के लिए लड़ने वाला मजदूर संघ का नेता है, गरीब वंचितों की सेवा करने वाला डाक्टर है। बाकी सब जीव तो जीवन, मृत्यु, भोजन और वंशवृद्धि के चक्र से आगे नहीं जा सकते। मनुष्य और अन्य जीवों में यह मूल अंतर इसीलिए है कि मानव अपने निज आवश्यकताओं पूर्ति के परे सोच सकता है। कल्पना करिए, क्या कोई कवि हो सकता है अगर कोई सुनने वाला कविता पढ़ने वाला न हो। प्रेम तो वैसे भी दूसरे मनुष्य से ही किया जा सकता है। कहा भी गया है कि वियोगी होगा पहला कवि। बिना दूसरों के वियोग भी संभव नहीं और संयोग भी नहीं। पहली चित्रकारी भी दूसरों को देख कर दूसरों के देखने के लिए बनी होगी। 
दूसरों के अधिकारों के लिए लड़ने वाला नेल्सन मंडेला भी अगर विश्व में अकेला होता तो मंडेला नहीं बनता। अगर दूसरे ना हों तो कोई डाक्टर भी नहीं होगा । सेवा भी दूसरों की ही की जा सकती है। 

कोई भी व्यापार , कोई भी मानवीय गतिविधि इस मूल तथ्य पर आधारित है कि करने वाला अपने सिवा दूसरों के लिए भी कर रहा है। मनुष्य के सामाजिक संबंधों की नींव पर ही मानव सभ्यता का निर्माण हुआ है। चूंकि अन्य जीव अपने सिवा कुछ खास कर नहीं पाते उनके विकास का स्तर निज आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उद्यम तक सीमित है। कोई शेर अगर जान भी जाय कि जंगल के खास क्षेत्र में शिकारी जाल बिछा कर बैठे हैं और जाल से कैसे बचा जा सकता है, वो शेर अपने इस ज्ञान को दूसरों के साथ साझा नहीं करता । परिणाम यह कि सैकड़ों सालों से वोही जाल शेरों का शिकार कर पाने में सक्षम हैं क्योंकि शेर अपने पूर्वजों से कुछ नहीं सीख सकते, क्योंकि जो शेर शिकार से बचना भी जानते हैं वो दूसरों को नहीं बताते।

मानव अपने अर्जित ज्ञान को दूसरों तक पहुंचाता है, इससे मानवता अपने पूर्वजों के संचित ज्ञान से आगे का सोचती है और उसका उत्तरोत्तर विकास होता है। इन सबके पीछे परहित का मूल भाव समाहित है। बिना दूसरों की उपस्थिति और बिना दूसरों के हित के भाव के मानव सभ्यता का अस्तित्व संभव नहीं। अकेला चना सचमुच कोई भाड़ नहीं फोड़ता। 

Wednesday, May 25, 2022

जॉनी डेप और एम्बर हर्ड वाद के निहितार्थ

‌पुरुष हमेशा महिला को एक सुखदायक छवि के रूप में देखता है। चाहे उसपर वात्सल्य की वर्षा करने वाली माता हो या स्नेह सिंचित कर देने वाली बहन। नवयुवक के रूप में एक पुरुष की प्रेयसी वाली समस्त कल्पनाएं प्रणय की गुलाबी क्षणों की और आनंददायक सान्निध्य की अजस्त्र धारा मात्रा होती है। गार्हस्थ्य जीवन में भी अंधांगिनी के रूप में प्रेम और विश्वास जड़ित सहयोग के बल पर ही पुरुष अपने स्वप्न नीड़ का निर्माण करता है। उसकी आने वाली पीढ़ियों के लालन पालन में भले ही वो अपने आप को संग्राहक और अर्जक के रूप में देखता है लेकिन अपने द्वारा अर्जित आय से अपने बच्चों की भौतिक आवश्यकताओं की सफल पूर्ति के लिए अपनी पत्नी को ही वाहक मानता है। वो जानता है कि चाहे वो कितना भी अर्जन करे, एक स्त्री, जो उसकी अर्धांगिनी और उसके बच्चों की मां है, बच्चों का उचित लालन पालन मां के बिना अधूरा ही है। जीवन की संध्या बेला में भी पुरुष एक स्त्री संगिनी के सहारे ही अपने पल काटने की कल्पना करता है। 

‌पुरुष की रचना ही ऐसे हुई है कि वो स्त्री के वात्सल्यमयी, स्नेहसिंचित, प्रेमपूर्ण और सुखद संगिनी रूप के अलावा किसी और रूप में सोच नहीं पाता। इसीलिए जब भी पुरुष स्त्री को इनके अलावा किसी और रूप में पाता है तो अत्यंत ही दयनीय हो जाता है। एक बालक जिसकी माता की असमय मृत्यु हो गई हो , पहली बार अपनी सौतेली मां को भी मां के रूप में देखता है और उससे मातृवत व्यवहार की आशा रखता है। सौतेली मां का रुख व्यवहार बालक के अबोध मन को समझ नहीं आते क्योंकि उसका मन स्त्री को क्रूर रूप में देखने के लिए बना ही नहीं होता। एक युवक भी अपनी पत्नी की समस्त कल्पनाओं से परे जब किसी अपनी जीवन संगिनी के हाथों प्रेम और निष्ठा के सिवा कोई और भाव पाकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है। पत्नी के हाथों क्रूरता झेलता पुरुष नितांत अकेला सा पड़ जाता है। बाह्य दुनिया उसकी बातों का विश्वास नहीं करती क्योंकि उसकी सच्चाई के उलट दुनिया स्त्री को एक ममतामयी रूप में तथा पुरुष को एक आक्रामक चरित्र के रूप में देखता है। 

‌यह सच है कि घरेलू हिंसा के अधिकतर मामलों में स्त्री ही पीड़ित होती है लेकिन घरेलू हिंसा के शिकार पुरुषों की संख्या भी कम नहीं है। यह संख्या अपनी वास्तविकता से कम दिखती है क्योंकि पीड़ित पुरुष बहुधा यह सोच कर अपना दर्द नहीं बताता कि पहला कोई उसका विश्वास नहीं करेगा दूसरा उसकी कहानी पुरुषों की "मर्द को दर्द नहीं होता" वाली छवि से मेल नहीं खाती। सौतली मां के हाथों प्रताड़ना झेलता बालक हो या पत्नी द्वारा झूठे दहेज मामले में अदालत के चक्कर लगाता पुरुष या अपनी बहू के हाथों अपमान का दंश सहता एक वृद्ध ससुर। सबकी कहानी अक्सर छुप जाती है या उजागर होने पर भी झुठला दी जाती है , मखौल का विषय बनती हैं।   

अमरीकी अभिनेता जॉनी डेप और उनकी तलाकशुदा पत्नी एम्बर हर्ड के चल रहे मुकदमे के दौरान बाहर आ रही जानकरियों ने इस बात को पुख्ता तौर से सामने रखा है कि पीड़ित पुरुषों की समस्या कोई अपवाद या कोई छोटी मोटी घटना नहीं है। महिला उत्पीडन की समस्या सर्वविदित है और उसके लिए पर्याप्त ना सही लेकिन कदम उठाए जा रहे हैं। उसके प्रति जागरूकता भी है। घरेलू हिंसा के पीड़ित पुरुषों के बारे में ऐसा कुछ भी नहीं है। यहां न जागरूकता है और न ही इस दिशा में कोई भी कदम उठाए गए हैं । इसे झूठी मर्दानगी के जोड़ दिया जाता है जहां पीड़ित पुरुष को शर्मिंदगी का अहसास कराया जाता है । परिवार,समाज , न्याय व्यवस्था, पुलिस थाने में पुरुष को अविश्वास की दृष्टि से देखा जाता है। घरेलू हिंसा से जुड़े कानूनों का महिला के पक्ष में अत्यधिक झुका होना भी न्याय के प्राकृतिक सिद्धांत की अवहेलना करता दिखता है।

अभिनेता जॉनी डेप ने अपनी कहानी दुनिया के सामने रख कर एक बहुत साहस का काम किया है। आशा है कि हम इस पूरे प्रकरण को एक मसालेदार पेज थ्री गॉसिप के रूप में देखने से ऊपर उठकर इसमें निहित संदेश को भी ग्रहण करेंगे और एक बेहतर समानता आधारित समाज की ओर बढ़ेंगे। 

Sunday, May 22, 2022

डॉक्टर गलत मरीज सही

एक महिला ने डॉक्टर को फोन किया। डॉक्टर साब, मेरे पति की तबियत ठीक नहीं है। डॉक्टर साब अपना आला, अपना बैग सब लेकर आए। पेसेंट को अच्छे से चेक किया और कहा , आई एम सॉरी। आपके पति अब नहीं रहे। महिला के पति ने कहा अबे यह क्या बात हुई मैं तो जिंदा हूं। महिला ने अपने पति को डांटते हुए कहा कि चुप रहो जी। तुम डॉक्टर हो या ये। तुमसे ज्यादा जानते हैं ये। ऐसे ही डॉक्टर थोड़े बने हैं।
कहने के लिए यह चुटकुला मैंने बचपन में सुना था और  शायद सुन कर हँसा भी था। लेकिन मन में यह भाव भी था कि ऐसा थोड़े ही हो सकता है। ऐसा कैसे हो सकता है कि सामने वाला बोले कि मैं जिंदा हूं और कोई डॉक्टर की बात मान के उसको मुर्दा मान ले। लेकिन जब से टीवी और आजकल यूट्यूब चैनल वालों को देखता हूं चुनाव परिणामों को समीक्षा करते हुए तो यही जोक याद आता है। जनता बोल चुकी है जो उसको बोलना था, और ये चुनावी पंडित अपने "सर्वे और अपने जमीनी अनुभव" का हवाला दे दे कर जनता को गलत साबित करने में लगे हुए हैं। भैया अब तो मान लो कि तुम्हारी डायग्नोसिस गलत थी। लेकिन नहीं, गले में चोंगा टांग रखा है तो हो गए डॉक्टर। और डॉक्टर तो हमेशा मरीज से ज्यादा ही जानता है!! 
तो उसी प्रकार से सामने एक माइक रख लेने और नाम के आगे वरिष्ठ पत्रकार, और चुनाव विशेषज्ञ लगा लेने के बावजूद भी जनता की आवाज के सामने तुम्हारी बात सही नहीं हो जाती। 

अगर आप अभी भी चुनावी विश्लेषण में लगे हुए हैं तो आप वोही डॉक्टर हैं जो जिंदा मरीज को मुर्दा और मुर्दा को जिंदा बता रहे हैं क्योंकि आपकी रिपोर्ट ऐसा कहती है। अगर आप उन लोगों में से हैं जो अभी तक उनको सुन रहे हैं और डॉक्टर को सही मानते हैं तो आप वो महिला हैं। मैडम, मरीज की सुनिए, डॉक्टर की नहीं। मरीज का हाल सबसे बेहतर मरीज ही बता सकता है। और अगर आप डॉक्टर और महिला दोनो नहीं हैं तो फिर आप जनता हैं। आप अच्छे से जिंदा हैं, किसी के कहने से आप और लोकतंत्र मर नहीं जाते, चाहे वो कहने वाला कोई भी हो। पंजाब हो या गोवा हो या हो उत्तर प्रदेश, जनता की आवाज में जनार्दन बोलते हैं। तो डॉक्टर साब, प्लीज अपना आला समेटिए, और निकल लीजिए पतली गली से। अगली बार किसी को दस्त की शिकायत हुई तो आपको फिर से आपको याद करेंगे !! 

पंचायत का अखंड कीर्तन

एकता कपूर के पास पैसा है, राइटर्स की जमात है ,मेकअप आर्टिस्ट की फौज है, VFX करने वाले टेक्नीशियन हैं, तो मैडम नागिन और गंदी बात का सीजन पर सीजन निकाल रही हैं। सलमान खान  के पास स्टारडम है, बॉलीवुड का सारा रिजेक्टेड कचरा है तो उसको रिसाइकल करके बिगबॉस बना बना के पैसे कमा रहे हैं।  टीवीएफ वालों के पास आइडिया है , कंटेंट है और इंटेंट है इसीलिए वो पंचायत बना रहे हैं । चाहे एकता कपूर और सलमान खान वाला कोई औकात नहीं है उनके पास। 

पंचायत का दूसरा सीजन देख के लगा जैसे मेनस्ट्रीम प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स मानो उस पूरा गांव के जैसे है जहां सबके पास शौचालय है लेकिन सब शौकिया खुले में कर रहे हैं । सीना तान के खुले में कर रहे हैं। और कुछ लोग हैं बिनोद जैसे , जो चाहते हैं कि कुछ भी हो बाहर हगने का सिस्टम बंद होना चाहिए। चाहे उसके लिए नंगी क्रांति तक क्यों नहीं करनी पड़े।

बाकी प्रधान जी मतलब रघुबीर यादव जी तो अभिनय के खेल के मंझे हुए खिलाड़ी हैं , और सचिव जी उर्फ जीतू भैया भी अब जाना पहचाना नाम हैं लेकिन इन सबके बीच बाजी मारी है सहायक सचिव और उप प्रधान जी ने। जासूस वही तो जासूस ना लगे और एक्टर वही जो एक्टिंग करता हुआ न दिखे। लगे कि बस कर रहा है, जी रहा है अपने किरदार को। सहायक सचिव उर्फ चंदन रॉय अपने रोल में घुस गया है। उसको देख के आप भी कहिएगा कि आपमें बहुत प्रतिभा है सर। पंचायत में गाना सब भी सही है, मुझे सिचुएशन के मुताबिक ही लगा। जहां जरूरत पड़ी बैकग्राउंड म्यूजिक भी बढ़िए दिया है। 

बाकी बचा मैन ऑफ द मैच। तो वो ट्रॉफी बहुत महीन अंतर से ही सही लेकिन उप प्रधान जी यानि हमारे फैसल मालिक को जाता है। आखिरी एपिसोड में फैसल पूरी सीरीज को अपने कंधे पर उठा लेते हैं और उस ऊंचाई पर ले जाते हैं जहां पंचायत को जाना ही चाहिए। अगर पंचायत का अगला सीजन आएगा तो लोग यह जानने में ज्यादा इंटरेस्टेड होंगे कि प्रह्लाद चचा कैसे हैं न कि सचिव जी का कैट क्लियर हुआ कि नहीं। 

बाकी सब कुछ अपनी जगह ठीक है। ठीक क्या बहुते बम पिलाट बना के धर दिया है अरुणाभ और दीपक जी ने। वैसे जब विद्यार्थी नब्बे से ज्यादए नंबर लाने लगता है तब टीचर खराब हैंडराइटिंग का भी नंबर काटने लगता है। उसी हिसाब से कुछ गलती अगर निकालनी ही है तो हम कहेंगे कि भाषा का टोन बलिया वाला नहीं है । यह टोन है पूर्णिया खगड़िया और बेगूसराय वाला। बाकी किसको पता फरक पड़ता है । सलमान खान और प्रियंका चोपड़ा का फेक एक्सेंट और कपिल शर्मा शो पर नकली लड़की बने लोगों को जब झेल ले रहे हैं तो इधर तो बस थोड़ा टोन ही गड़बड़ है। वैसे भी लड़का लड़की बन के नाचे तो फकौली वाले माफ करने वाले नहीं हैं तो फकौली बाजार में कपिल शर्मा नहीं चलने वाले। 

मौका लगे तो पंचायत का नबका सीजन देख मारिये, बहुत लोग तो अखंड कीर्तन की तरह एके बार में देख गए हैं जिसको अंग्रेजी में बिंज वाचिंग भी कहते हैं। और आप भी पंचायत का अखंड कीर्तन शुरू कर दीजिए। बिरयानी, पिज्जा और  सुशी और मोमो खा के अगर पक गए हैं तो प्रधान जी के बगीचे का लौकी खा के देखिए, मजा नहीं आया तो आप बनराकस ही हैं। आपका कुछ नहीं हो सकता।

Friday, May 20, 2022

ऊर्जा सुरक्षा और भारत

कहावत है कि किसी भी समस्या या दुविधा के समय एक आईना देखना सबसे ज्यादा कारगर उपाय है। जब आप आईना देखते हैं तो आपको अपनी समस्या का कारण और समाधान दोनो दिख जाते हैं। अभी भारत के सामने बिजली संकट और भीषण गर्मी की समस्या में यह बात बिलकुल सटीक बैठती है। बिजली संकट जहां हमारी ऊर्जा समस्या या ऊर्जा सुरक्षा के संकट दिखाती है वहीं बेहद गर्मी और सूर्यातप इसका समाधान है। 

करीब बाइस साल हो गए इक्कीसवीं सदी को और इस सदी को भारत की सदी बनाने का सपना अभी अधूरा ही दिखता है। विश्व के तीस सबसे प्रदूषित शहरों में बाइस भारत में हैं। राजधानी दिल्ली की बात करें तो प्रदूषण की वजह से औसतन एक सामान्य दिल्ली निवासी की जीवन प्रत्याशा करीब करीब नौ वर्ष कम हो जाती है। यह हवा लॉक डाउन के दौरान कुछ हद तक साफ हुई थी जब परिवहन, विनिर्माण, औद्योगिक गतिविधियों पर अभूतपूर्व रूप से रोक लग गई थी। लेकिन इस साफ हवा की कीमत थी लाखों का विस्थापन और उनका वापस गरीबी के दुष्चक्र में जा फंसने की गंभीर संकट। यह सच है कि भारत गरीबी और भूख की कीमत पर साफ हवा पाने का कार्य नहीं कर सकता।

इसका अर्थ है कि हमें अपनी समस्त आर्थिक गतिविधियों को जारी रखना है लेकिन हम उन्हें वर्तमान तौर तरीकों से जारी नहीं रख सकते। इसका सीधा सा तात्पर्य है कि हमें अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के माध्यमों में बदलाव की जरूरत है और यह मुद्दा सीधे सीधे रूप से हमारी ऊर्जा सुरक्षा से जा जुड़ता है। हालिया अंतराष्ट्रीय घटनाक्रमों यथा रूस यूक्रेन युद्ध और अंतराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती तेल की अनवरत कीमतों ने हमारी ऊर्जा सुरक्षा को सबसे महत्वपूर्ण विषय बना दिया है। बिना ऊर्जा सुरक्षा के इक्कीसवीं सदी के भारत की सदी बनाने का सपना एक दिवा स्वप्न के सिवा कुछ भी नहीं।
सौभाग्य की बात यह है कि हमारी पेट्रोलियम पर निर्भरता उतनी भी नहीं जितनी हम समझ रहे हैं। कार केवल छः प्रतिशत भारतीयों के पास है। लेकिन यह प्रतिशत तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2050 तक भारत की शहरी जनसंख्या वर्ष 2014 के मुकाबले दुगुनी हो जायेगी। और हमारी ऊर्जा आवश्यकता चार गुनी हो जायेगी। वर्ष 2030 तक आवश्यक अवसंरचना के सत्तर प्रतिशत का निर्माण अभी हुआ ही नहीं है। यह सर्वविदित है कि भारत ने अगर अपनी ऊर्जा स्रोतों में बदलाव नहीं किए और 2050/2030 तक की भारत की यात्रा के परिणाम भारत ही नहीं पूरे विश्व के लिए घातक होंगे, आखिर मानवता के एक चौथाई हिस्से की के ऊर्जा उपभोग के परिणाम प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन के रूप में सबको झेलने होंगे।
ऊर्जा सुरक्षा के लिए 2030 तक हम त्रिस्तरीय लक्ष्यों पर काम कर रहे हैं। पहला सौर और पवन ऊर्जा का अधिकतम उत्पादन और दोहन। दूसरा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उन क्षेत्रों में उपयोग जहां अब तक इनकी खास पहुंच नहीं है जैसे औद्योगिक क्षेत्र और यातायात। तीसरा हमारे उपकरणों का ऊर्जा मितव्ययी और दक्ष करना। 

जहां तक पहले उपाय का प्रश्न है भारत सूर्यातप के मामले में अत्यंत ही सौभाग्यशाली है । प्रतिवर्ष 300 दिन हमें भरपूर सौर ऊर्जा मिलती है। भारत अपनी समस्त ऊर्जा जरूरतों को केवल अपनी 10 प्रतिशत बंजर भूमि पर सौर पैनल लगा कर पूरा कर सकता है। पवन ऊर्जा के मामले में भी कमोबेश यही स्थिति है। पवन ऊर्जा हमें उन दिनों में ज्यादा उपलब्ध हैं जब सौर ऊर्जा कम मिलती है जैसे मानसून के दौरान। आज हम उस स्थिति में पहुंच चुके हैं जब सौर और पवन ऊर्जा की लागत कोयले से उत्पन्न ऊर्जा से कम हो चुकी है और यह उत्तरोत्तर कम होती जायेगी। बैटरियों की लागत में भी लगातार गिरावट आई है और आज सबसे सस्ते सोलर पैनल और बैटरी बनाना भारत में संभव हो चुका है। सौर और पवन ऊर्जा में निवेश करने के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण दशक है। ऊर्जा उत्पादन के।लिए राजस्थान के मरुस्थल और गुजरात के सामुद्रिक किनारों के साथ साथ विकेंद्रित ऊर्जा दोहन के लिए व्यवसायिक, सरकारी और निजी भवनों के ऊपर भी सोलर पैनल लगाने का काम तेजी से किया जा रहा है।

दूसरी बात यह कि हमें नवीकरणीय ऊर्जा को उन क्षेत्रों में पहुंचाना पड़ेगा जहां पारंपरिक रूप से इनका प्रयोग कम होता है। भारत का 80 प्रतिशत यातायात दोपहिया और तीनपहिया वाहनों से होता है। सड़क पर ई-रिक्शा की बढ़ती संख्या एक सुखदाई संकेतक है। यही काम हमें दोपहिया वाहनों के लिए भी करना होगा। सारी रेल को बिजली चालित करने के कार्य में हम तेजी से आगे बढ़ चुके हैं । डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर जैसी योजनाओं के बाद सड़क मार्ग से जाने वाला माल ढुलाई का काम रेल मार्ग के द्वारा साफ ऊर्जा के जरिए किया जा सकता है। भारी उद्योगों के लिए जहां सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा बेहतर विकल्प नहीं हैं वहां हमें हाइड्रोजन आधारित ऊर्जा का प्रयोग करना होगा।

सबसे ज्यादा ऊर्जा उत्पादन और उनको उपभोग के दायरे को विस्तृत करने के बाद भी यह कार्य अधूरा ही रहेगा और हमें ऊर्जा दक्षता और ऊर्जा मितव्ययिता पर काम नहीं किया। अगर हम आज उपलब्ध वातानुकूलन की दक्षता पर काम करें तो सिर्फ घरेलू एसी चलाने के लिए हमें यूरोप की तीन चौथाई ऊर्जा चाहिए होगी। अच्छी बात यह है कि अभी हम वर्क इन प्रोग्रेस नेशन हैं जहां अवसंरचना का निर्माण हो ही रहा है। नवनिर्माण में हम स्मार्ट बिल्डिंग, स्मार्ट लाईटिंग और स्मार्ट वातानुकूलन का प्रयोग कर अपनी ऊर्जा दक्षता बढ़ा रहे हैं। आवश्यक है कि हमारे नए निर्माण और नए शहरीकरण में इन मानकों का पूरी तरह पालन किया जाय। 

इन सबके अलावा हमें ऊर्जा क्षेत्र में वित्त अनुशासन और राजनीतिक समझदारी की घोर आवश्यकता है। मुफ्त में बिजली बांटने की योजनाएं वोट दिला सकती हैं लेकिन हमारे ऊर्जा क्षेत्र में जरूरी विदेशी निवेश इससे हतोत्साहित होता है। आवश्यक है कि हम राजनैतिक इच्छाशक्ति और वित्तीय अनुशासन को अपनी ऊर्जा नीति और क्रियान्वयन का हिस्सा बनाएंगे। इक्कीसवीं सदी को भारत की सदी बनाने का मार्ग ऊर्जा सुरक्षा के जरिए ही जाता है। और बाहर जो कड़ी धूप पड़ रही है ना, वोही हमारी सबसे बड़ी शक्ति भी है। 

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Sunday, May 15, 2022

Buddha : The Yogi

If we notice Bhagwan Buddha's statues or paintings, we can see that he is depicted as a very handsome, well built person, having almost a perfect physique. These are described as the "32 signs of a great man". Apart from this, Buddhist texts describe another 80 characteristics of a perfect man. 
Though the first statue of Bhagwan Buddha was built at least 500–600 years after his death, it is believed that these statues were built based on earlier available texts on his appearance. Buddha is invariably depicted as a healthy, handsome man, regardless of the school of art or source of description of his physical appearance.

If we consider Buddha's lifestyle, he lived a very austere life. surviving on alms, whatever is received during the day. Eating one meal a day Buddhist texts describe how he used to sleep only an hour a day. With this much food and rest, he still used to walk for 30-40 km a day and address his disciples for hours every day. It leaves me wondering how one can remain so healthy with such a hard lifestyle.

 The only possible answer I can think of is that Bhagwan Buddha had reached the pinnacle of yogic practises where he had attained full control of his body functions. This is a stage where a yogi gets full control of their hunger, libido, sleep, and other bodily functions. If you look closely, you'll notice that none of the Buddha statues have a moustache or a beard. It's very hard to imagine that he shaved daily given the ascetic lifestyle he had . If we take the liberty to extend the effects of his yogic prowess, we may imagine that he had so much control over his body that he even controlled the growth of facial /body hair. 

Even Buddhist texts contain accounts of how Buddha announced his own death and was aware of his death time. This can only be possible at the highest level of yoga and meditation. We may believe that Buddha was first a yogi before becoming the Buddha as the world knows him. Look at any of his statues. That mysterious smile and a glow /calmness on his face can only come via Yoga. 

Good wishes on Buddha Purnima. 

वो चीज ही क्या

वो वाणी की मिठास किसी काम की नहीं को कटु सत्य बोलने से रोक दे। वो रूप किसी काम का नहीं जो चरित्रहीन बना दे। वो शस्त्र कैसा जो आत्मसम्मान की रक्षा के समय म्यान में पड़ा रहे। वो शास्त्र ज्ञान किसी काम का नहीं जो कर्म से विमुख कर दे। वो सुख ही क्या जो दुख सहने की क्षमता छीन ले। वो सुस्वादु भोजन ही क्या जो स्वास्थ्यकर ना हो। वो ओहदा ही कैसा जो बचपन के मित्रों से दूर कर दे। वो धन ही क्या जो धर्म के काम न आ सके। वो नीतिपरायणता ही कैसी जो विभीषण बना दे।