Wednesday, July 11, 2018

उड़ान

सच्चाई क्या है? जो दृष्टिगोचर हो रहा है, क्या वह सच है? अंग्रेजी फ़िल्म मैट्रिक्स के एक दृश्य में मॉर्फियस नाम का चरित्र नायक नीओ से पूछता है कि वास्तविकता क्या है? क्या वास्तविकता वो है जो आपको अपनी आँखों से दृष्टिगोचर होता प्रतीत होता है? या वास्तविकता वो है जिसका संज्ञान आप अपनी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा लेते हैं? अगर यह वास्तविकता की यह परिभाषा है तो यह वास्तविकता आपके मस्तिष्क द्वारा महसूस किए गए विद्युत तरंग हैं। अगर इस बात को हम ध्यान से देखें तो हम पाएंगे कि वास्तविकता में आपका एक पुट मौजूद है। वास्तविकता वह है जो आपके मस्तिष्क ने महसूस किया। मतलब अगर मस्तिष्क बदल दिया जाए तो वास्तविकता बदल जाएगी। तारे और चांद आखों को इतने मनभावन और सुंदर प्रतीत होते हैं कि उन्हें हम अपने प्रेमी, प्रेयसी, मामा, हीरे , मोती जाने किस किस की संज्ञा नही दे चुके हैं। नज़दीक जाकर दिखने वाली वास्तविकता यह है कि चांद एक जलरहित, जीवन रहित बंजर है जहां जीवन की कल्पना भी कठिन है। तारे वास्तव में सूर्य भांति जलते अग्निपिण्ड हैं जिसके हज़ारों मील दूर भी खड़े रहना संभव नही।

उन्मुक्त गगन में विचरण करते पंछी समूह प्रागेतिहासिक काल से मानव को उड़ने के लिए प्रेरित करते रहे हैं। करीब एक सदी पूर्व तक जब तक बिल्वर बंधुओं ने अपनी पहली उड़ान नही भरी, उड़ने का स्वप्न एक दिवा स्वप्न ही था। आखिर उड़ना इतना मनभावन है। आप हमारी कहानियों , लोक साहित्य और प्राचीन ग्रंथों को ही देख लें। चाहे रामायण के पुष्पक विमान का वर्णन हो, या अलादीन की जादूई चटाई , पेगासस के रूप में उड़ने वाले घोड़े हों या झीने झीने पंखों वाली परियां, उड़ान को हमेशा से एक सुखद स्वप्निल अनुभव की तरह पेश किया जाता है। विज्ञान और तकनीक की प्रगति ने उड़ान की मानव इच्छा को कल्पना की दुनिया से निकाल वास्तविक जीवन का एक साधारण अंग बना दिया है। जिस तरह दूर से दिखने वाले चाँद और वास्तविक चाँद में अंतर है, क्या यही चीज़ मानव उड़ान पर भी लागू है?

‌ऊंचा उडने के लिये सबसे पहले आपको तेज दौड़ना पड़ता है। इतनी तेज कि आसपास की सारी चीज़ें पीछे भागती नज़र आये। इतनी तेज कि पीछे भागती चीज़ें आप देख भी न पाएं। आप देख भी नही सकते क्यूंकि आपकी नजर सीधी अपने रास्ते पर होनी चाहिये, वरना आप तेज़ दौड़ नही पाएंगे। आप उन लोगों को भी नही देख सकते जो शायद आपकी तेज गति को देख हतप्रभ हो ताली बजा रहे हैं। एक बच्चा जो आपको तेज गति से दूर जाता देख हाथ हिला कर आपको विदा कर रहा है । आपको पता भी नही चलेगा ,उसको वापस से हाथ हिला कर जवाब देना तो दूर की बात है। आखिर यह सब करने से आपकी गति कम होगी , जो आपके उड़ने का सपने में बाधक है। अब इतनी तेज दौड़ने के लिए जरूरी है कि आप भीड़ से दूर हो जाएं । भीड़ में तेज नही दौड़ सकते। सबको साथ लेकर तेज़ नही दौड़ सकते। उड़ने के लिए जितनी तेज आप दौड़ना चाहते है वो भीड़ से दूर खाली जगह पर अकेले ही संभव है। आप दौड़ने के लिए भी आप अपने लिये आप ऐसी जगह चाहते हैं जो बिल्कुल खाली हो। तो आप सबसे पहले भीड़ से अलग होते हैं। हर ऐसी चीज़ जो आपके तेज दौड़ में बाधक है, वो भीड़ है , अवांछित है। यहां तक कि वो पंछी भी आपकी उड़ान के समय अवांछित हो जाता है जिसको देख आपको उड़ने की प्रेरणा मिली थी।

उड़ने के लिये धरातल को छोड़ना आवश्यक है। आप धरातल के नजदीक भी नही उड़ सकते। उड़ना शुरू करते ही, यह जरूरी हो जाता है आप धरातल से दूर हो जायें। जैसे जैसे आप धरातल से दूर होते जाते हो आपको धरती के लोग चीज़ें छोटे दिखने लगते हैं। आपको लगता है कि आप बहुत बड़े हो गए हो जो आसमान में उड़ रहे हो। वस्तुतः आप बड़े नही होते हो, बस बाकी लोगों से दूर हो गए होते हो। इस दूरी को अपना गुरुत्व और बड़प्पन समझने की भूल बहुधा देखी गई है। जैसे जैसे आप और ऊंचाई पर पहुंचते हो आपकी गति काफी तेज हो गई होती है। लेकिन आपको लगता है कि आप या तो स्थिर हो या अत्यंत मंथर गति से आगे चल रहे हो। उपर अकेले उड़ते हुए ऐसा भी आभास होता है कि शायद आप उड़ भी नही रहे वरन स्थिर हैं। यह एक अजीब सी स्थिति है, कि आप
उड़ तो रहे हैं पर स्थिर या जड़ होने की हताशा आपको घेरे हुए है। आप उड़ने का अपना स्वप्न जी रहे हैं लेकिन जड़ता का भाव आपके मानस पटल पर छाया है। आप उन पंछियो से कहीं ऊपर आसमान की सैर कर रहे हैं जिनको देख आपने उड़ने का प्रण लिया था ,पर आपकी उड़ान में पंछियों का वह नाद वह कलरव अनुपस्थित क्यों है।

पंछियों की उड़ान क्या उन्हें वही आनंद, वही उल्लास देती है जो धरती पर खड़े मानव उनको देख महसूस करते हैं? मानव के उड़ने का अनुभव उसके बिल्कुल उलट है। क्या पंछियों का उड़ते समय दिखने वाला आनंद वास्तव में हमारी आँखों का एक भ्रम है और पंछी भी उसी जड़ता और एकाकी भाव से त्रस्त हैं जो मानव उड़ते समय महसूस करते हैं? शायद इस प्रश्न का उत्तर सिर्फ उड़ कर देना संभव नही है, इसके लिए पंछी बन उड़ना पड़ेगा। शायद मानव को ज्ञात उड़ने की वास्तविकता से मानव मस्तिष्क का यह पुट हटाये बिना यह ज्ञात नही हो सकता।

Some myths and facts about Kashmir Issue

Some myths and facts about Kashmir Issue :

Myth: Its a territorial dispute.
Fact : It is a religious issue where Islamists are fighting against whom they call Kafirs.

Myth: Talking to the separatists/Pakistan will give us solution.
Fact : Situation will worsen unless demography of valley changes. Allow people from mainland India to settle there. Start with native Kashmiri Pandits. Article 370 has to go.

Myth : Kashmiri youth want jobs /education .
Fact : Stone pelters are radicalized cunning people who want only perks . They never pelt stones on those who burn schools.

Myth: Kashmir is an integral part of India.
Fact : Islamists have captured Kashmir from us. We need military action to win it back before calling it an integral part of India.

Myth : Battle for kashmir is only in the valley.
Fact : Battle is everywhere. Especially in Delhi power corridors where a nexus of leftists, separatists and media makes sure India always sticks to talks and no firm action is taken. Support system of these separatists in Delhi has to broken for once and all.

Bahubali -2

If Mahesh Bhatt makes Baahubali, Baahubali will be an illicit child of Devasena from her extramarital affair and Bhallaldev will be played by Emraan hashmi who will run a brothel.

If Karan Johar makes Baahubali , Katappa will be a gay warrier who will conduct a pride parade in Mahishmati opposed by gayphobic king Bhallaldev.

‌If Anuraag Kashyap makes Baahubali, Devsena will hurl so many abuses at Bhallaldev and Nawaz will play Baahubali a psychopath serial killer with disturbed childhood who wants to avenge for her mother.
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‌If Sanjay leela Bhansali makes Baahubali, Devsena will sing love songs with Bhallaldeva in a dream sequence.
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‌If Yashraj makes Baahubali, Mahishmati will resemble Zurich and Geneva.
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‌If Congress makes Baahubali, it will be named Bhallaldev, Shivgami will be of foreign origin.. Baahubali will be the villain.
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‌If BJP makes Baahubali, Bhallaldev will be beaten black and blue by gaurakshaks for killing a bull.
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‌If Samajwadi party makes Baahubali, Baahubali will be called Bhau Ali..
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If David Dhawan makes Baahubali, Bhalla and Bahu will be good for nothing spoilt brats who will chase Devsena and her girlfriend singing cheap songs.

If RGV makes Bahubali, not sure what will happen as no one will watch it..

If I make Baahubali, I will get at max. 50 likes on Facebook.. :(

भारतीय रेल में आर ए सी

भारतीय रेल की कई खास खूबियां हैं , उनमें से एक अलग सी खूबी है आर ए सी। आर ए सी का मतलब है रिजर्वेसन अगेंस्ट केंसीलेशन। दूसरे शब्दों में कहें तो इस शब्द की उत्पत्ति इस बात से हुई है कि भारतीय रेल का दिल बहुत बड़ा है, कम से कम यूनाइटेड एयर लाइंस से ज्यादा बड़ा।
सीट से ज्यादा आदमी आ जाने पर भी भारतीय रेल उनको यथासंभव निराश नही करती। उन्हें खींच घसीट कर बाहर नही निकालती, बल्कि अपने साथ जगह देती है कि चलो देखते हैं अगर रास्ते में कुछ हो पाया तो तुम्हारा भी कुछ करेंगे। हमारी रेल और हमारे यात्री को भरोसा रहता है कि कोई न कोई तो ट्रेन मिस करेगा ही। कुछ लोग ट्रैफिक जाम की वजह से ट्रेन मिस करेंगे, तो कुछ किसी बंद हड़ताल की वजह से। अगर यह कारण नहीं भी हुए तो अशुभ महूर्त, हानिकारक यात्रा योग, दिशा शूल और बिल्ली के रास्ता काटने की वजह से कोई न कोई तो नही आएगा और आर ए सी वालों को सीट मिल जाएगी। अब उम्मीद पर दुनिया कायम है, तो फिर आर ए सी वाले उम्मीद का दामन क्यों छोड़ें??

‌आपने कई बार सुना होगा कि हाशिये पर पहुंचा दिए गए लोग। हाशिये पर रहने वाले लोगों की समस्या। अगर इन शब्दों को समझने में आपको दिक्कत आ रही है तो आपने आर ए सी वालों को नहीं देखा है। साइड वाली छोटी लोअर सीट पर दुबके बैठे आर ए सी वाले लोग हाशिये पर बैठे लोगों का जीवंत उदाहरण पेश करते दिखते हैं। वो लोग जिन्हें अब तक वो जगह नही मिल पाई जिसके वो हकदार हैं। पर दबे कुचले लोगों की भांति वो अन्याय के खिलाफ कुछ बोलते नहीं बस आखों में उम्मीद की एक किरण लिये पूरी सीट वालों की तरफ ताकते रहते हैं। 



अब जिनके पास पूरी सीट है वो तो आर ए सी वालों को ऐसे देखते हैं जैसे उनके उपवन में वानर घुस आए हों। जैसे उनके नो एंट्री वाली सोसाइटी में सामान बेचने वाले हॉकर आकर हाज़मे की गोली बेच रहे हों। आर ए सी वालों को ऐसी दुत्कार और तिरस्कार मिलने के कई कारण हैं। आर ए सी वाले रेल की दुनिया के त्रिशंकु हैं। ना इधर ना उधर। रेल में हैं पर पूरे यात्री नहीं, सीट मिली पर पूरी नहीं। यह कुछ ऐसा है कि जैसे रेल वाली महबूबा ने वैलेंटाइन डे के दिन आपको फ़्रेंडजोंन में डाल दिया हो।
देखिये अगर आप आर ए सी में सफर कर रहे हैं तो दो तीन बातें तो साफ है। पहली यह कि हवाई जहाज से चलने की आपकी औकात और मंशा दोनों नहीं है। दूसरी रेल मंत्रालय के किसी अधिकारी से दूर दूर तक आपका कोई नाता नहीं है। किसी नेताजी को आप नही जानते, नेताजी को छोड़िये आप किसी ढंग के ट्रेवल एजेंट तक को नही जानते। वरना आप आर ए सी की जगह कनफर्म टिकट पर चल रहे होते। आपकी कोई पहुंच है नही और आप अपने गन्तव्य पर पहुंचना भी चाहते हैं पूरे आराम से। यह मुंह और मसूर वाली दाल वाली बात हो गई यह तो। आप आम जनता हो यह बात उसी समय सिद्ध हो गई जब आपका नाम आरक्षण तालिका में सबसे नीचे आर ए सी वालों के साथ लिखा गया। उसी के साथ आपके भाग्य में लिख दिया गया वो दुत्कार जो कन्फर्म टिकट वाले यात्री आपके साथ करने वाले हैं।

आर ए सी के साथ बुरा व्यवहार सिर्फ कन्फर्म टिकट वाले करें तो फिर भी समझ सकते हैं। रेल ने मिलाई जोड़ी स्कीम के तहत जो आपके साथ शयनयान में बैठे हैं उनका व्यवहार भी कुछ खास नही रहता। दोनों एक दूसरे की तरफ ऐसे देखते हैं कि तू मर क्यों नही गया जो आज यहां आ गया। हे भगवान इतने लोगों की ट्रेन छूटती है इसकी भी छुड़वा देता। और इतना सामान लेकर आ गया है उतना तो तुग़लक़ भी दिल्ली से दौलताबाद लेकर नही गया था। प्यार का जवाब प्यार से मिले न मिले, यकीन रखिये आपकी इस भावना को आपके शायिका बंधु न सिर्फ समझेंगे बल्कि आपके प्रति भी उतना ही प्रेम भाव रखेंगे जितना आपके मन में उनके लिए है। भले ही फिल्मों में दिखाया जाए कि दो अजनबी मिले और उनकी कहानी बिफोर सनराइज की तरह रोमांटिक हुए पर आर ए सी वाली जनता की किस्मत तो स्लीपिंग विथ द एनिमी वाली ही रहनी है।

मुझे पता है कि अगर आप आम आदमी हैं तो कभी न कभी आर ए सी वाले जरूर रहे हैं। आपको गर्व होना चाहिये कि आपने आर ए सी वाली ज़िन्दगी जी है और समाज के समस्त तिरस्कार को सह भी आप समाज की मुख्यधारा से जुड़े रहे। वरना इतने मानसिक अत्याचार के बाद तो आप नक्सली या पत्थर बाज़ बन जाएं तो कई लोग आपका समर्थन भी करेंगे।

अगर आप कभी आर ए सी वाले नही रहे और आर ए सी वालों के साथ आपका व्यवहार रूखा है तो आपको आत्ममूल्यांकन की नितांत आवश्यकता है। आखिर आर ए सी वाले आपके डब्बे के प्रहरी हैं। आप गहरी नींद सोते हैं पर वो जागते रहते हैं। आपको सोते हुए इतने प्यार से देखते हैं जितने गौर से माँ भी अपने बच्चे को नही देखती। जिस तरह से हनुमान चालीसा सुन भूत पिशाच निकट नही आते, जिस डब्बे में 2-4 आर ए सी वाले हों , चोर और उठाईगीर उस डब्बे से दूर ही रहते हैं। आखिर उन अधजगी आखों से बचकर कौन आपका सामान चुरा सकता है । बेचारे हर एक सीट के बारे में जानते हैं कि कौन सी सीट कब खाली होनी है, किसको कहाँ उतरना है इनको अपने नाम की तरह याद है, उससे पहले कोई सामान लेकर कैसे उतर सकता है।

आर ए सी वाले जैसे आपकी क्रिकेट टीम के 12th मैन हैं। टीम में हैं पर सिर्फ पानी पहुंचाने और तौलिया लाने का काम करते हैं, बिना शिकायत किये। आपका तकिया ऊपर वाले बर्थ से नीचे गिर गया ? आपको उतरने की जरूरत नही। अपने आर ए सी वालों को कहिये आपका तकिया उठा कर आपको देंगे। आपकी चादर गिर गई, आर ए सी वाले आपको न केवल ध्यान दिलाएंगे, चादर उठाकर आपको ओढा भी देंगे। आपको नींद नही आ रही, आर ए सी वालों को बोलिये लाइट ऑन कर देंगे ताकि आप पढ़ सकें। आपका पढ़ना पूरा हो गया, बस उनको एक इशारा करिये और लाइट ऑफ।

आपके पास आई फोन हो न हो, अगर आपके डिब्बे में आर ए सी वाले हैं तो आपके पास साक्षात मानवरूप में सीरी है। कितना बजा है, कौन सा स्टेशन है, गाड़ी समय पर है कि नही, आपके सारे सवालों का जवाब आर ए सी वालों के पास है। आपको बाथरूम जाना है तो किस तरफ वाला बाथरूम साफ है या खाली है, यह सारी रियल टाइम इनफार्मेशन आपको आर ए सी वाले ही दे सकते है। वो भी फ्री में ।

पूरी सीट वालों के लिए टीटी एक परेशान करने वाला चरित्र है। आपको नींद से उठा कर टिकट मांगने वाला और पहचान पत्र को लेकर खिचखिच करने वाला एक अनावश्यक व्यवधान । पर आर ए सी वालों के लिए टीटी का महत्व एक इष्ट की तरह है। टीटी अगर सौरमंडल का सूर्य है तो आर ए सी वाले नवग्रह। एक टीटी अगर खड़ा है तो नौ आर ए सी वाले उनके चारों तरफ घूमते नज़र आएंगे। टीटी के लिए आर ए सी वाले लोग उनके ससुराल वाले जैसे हैं।क्यों न हो इतनी आवभगत तो इनके ससुराल वाले भी नही टीटी की नहीं करते जितने आर ए सी वाले करते हैं। और अब ससुराल वालों से थोड़ा उपहार ले लेने में हर्ज़ क्या है ? इतना तो हक़ बनता है टीटी साहब का।

आधा है चंद्रमा, रात आधी, रह न जाये तेरी मेरी बात आधी वाला गाना अगर किसी पर पूरी तरह लागू है तो वो एक आधे सीट वाले आर ए सी वालों पर ही लागू है। अगर किसी शोषित को आरक्षण सबसे पहले मिलने चाहिए, तो उनमें आर ए सी वाले सबसे पहले नंबर पर हैं। रेल का सफर इन आधे यात्रियों के बिना अधूरा है।

माँ, जननी और मातृत्व

आचार्य विष्णुगुप्त यानि चाणक्य नंदवंश के विरुध्द अपनी सेना को तैयार करने में लगे थे। अगर चंद्रगुप्त को मगध साम्राज्य के सिंहासन पर आसीन होना था तो उसके लिए चाहिये था एक शक्तिशाली सैन्य बल । और सैन्य बल को चाहिए था अत्याधुनिक आयुधों का भंडार । और इन सब के लिए चाहिये था धन। अब एक विपन्न ब्राह्मण चाणक्य और एक दासी पुत्र चंद्रगुप्त के पास इतना धन कहाँ से आये? चाणक्य ने निर्णय लिया कि वो घन नंद से प्रताड़ित जनता से ही धन मांगेंगे और बदले में उन्हें नंद वंश के अत्याचारो से मुक्त करेंगे। चाणक्य ने लोगों से प्रार्थना की कि वे चंद्रगुप्त को अपना पुत्र मान अपनी संपत्ति का एक हिस्सा इस अभियान को समर्पित करें। चाणक्य ने एक दरवाजे पर पहुंच आवाज़ लगाई। माँ, घननंद के अत्याचारों के अंत के लिए हो रहे यज्ञ में हमारी मदद करो माँ। तुम मुझे अपना पुत्र मान एक हिस्सा दो। तुम्हारे इस दान का बदला तुम्हारा पुत्र एक कल्याणकारी शासन देकर चुकायेगा। घर की स्त्री ने कहा कि भंते आपका लक्ष्य सराहनीय है और आपका साहस अद्वितीय। किन्तु मैं आपको पुत्र कैसे मान सकती हूँ। मैंने आपको जन्म तो नहीं दिया। चाणक्य ने कहा : माते मैं आपका पुत्र होने का सारा धर्म वहन कर रहा हूँ। एक पुत्र का धर्म है कि माता पर हो रहे अत्याचार को रोके, आक्रांताओं का दमन करे। यह सारा धर्म निभाने के बाद भी क्या मैं आपका पुत्र सिर्फ इसलिये नही हो सकता क्योंकि मैंने आपको प्रसव पीड़ा नही दी?? स्त्री की आँखों में आंसू आ गए और उन्होंने अपने समस्त धन के साथ अपने बाकी पुत्रों को भी चाणक्य के साथ धर्मयुद्ध में शामिल होने का आदेश दिया।

मदर्स डे के अवसर पर देखता हूँ कि लोग माँ के लिए एक से एक सन्देश लिख रहे हैं। कुछ लोग माँ के बनाये पकवान याद कर रहे हैं तो कोई माँ की ममता के किस्से बयान कर रहा है। कोई अपनी माँ की पुरानी तस्वीर साझा कर अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति कर रहा है तो कोई माँ की कही गयी सीख दुहरा रहा है। सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य मुझे कक्षा चार से ही घर से दूर छात्रावास , हॉस्टल , बोर्डिंग स्कूल, आप चाहे जो नाम कहना चाहें, में रहना पड़ा है। हॉस्टल में रह बचपन बिताने वालों की दुविधा यह है कि उन्हें अपनी माँ के साथ ज्यादा वक़्त नही मिल पाता। लेकिन जैसा कि प्रकृति का नियम है, संतुलन हर जगह बना रहता है। हॉस्टल में रहने वाले बच्चों को अगर अपनी माँ का सानिध्य कम मिलता है तो इसकी पूर्ति कहीं बड़ी तरीके से होती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण तब दिखता है जब महिने का वो दिन आता है जिस दिन अभिभावकों को हॉस्टल आकर बच्चों से मिलने की अनुमति होती है। मतलब पेरेंट्स डे।

हॉस्टल के तीस बच्चे अगर महीने के उनतीस दिन माँ के बिना बिताते हैं तो तीसवें दिन उन्हें तीस माँओं का प्यार एक साथ मिलता है। हॉस्टल में रखने वाले हर बच्चे की माँ जानती है कि उसके बनाये गए पकवान का इंतज़ार सिर्फ उसकी संतान नही कर रही बल्कि उसके साथ रहने वाले सभी बच्चे कर रहे हैं। इसीलिए हर माँ अपने बच्चे की जरूरत से ज्यादा हमेशा कहीं ज्यादा पकवान और संदेश बांध कर देती है। और हॉस्टल का हर बच्चा टूट पड़ता है उस प्यार की गठरी पर उसी हक़ से जैसे एक बच्चा अपनी माँ के पकवान खा रहा हो। हरेक साथी के माँ के पकवान का अलग स्वाद हमें आज भी याद है। हमारे लिये अपनी माँ और अपनी साथी की माँ में कोई फर्क नही था। कोई बच्चा अपने साथी की माँ से मिलने जाता और माँ की नज़र उस बच्चे की कमीज के टूटे बटन पर पड़ जाती, तो माँ अपने बच्चे को छोड़ दूसरे बच्चे की कमीज में बटन टांकने लग जाती। हॉस्टल में कई बार देखा है कि किसी और की माँ अपने बच्चे के बदले उसके बीमार साथी के सर पर गीले रूमाल रख पट्टी कर रही है। आज अगर माँ को याद करने और धन्यवाद करने का दिन है और मैं अपनी उस सारी माँओं को भूल जाऊं तो यह उचित नही जान पड़ता।

माँ शब्द जननी से कहीं बढ़कर है। यह संयोग नही है कि माँ शब्द सुनते ही आपके मन में यशोदा का नाम आता है। यशोदा कृष्ण की जननी नहीं थी, पर माँ अवश्य थी। माँ बनने के लिए मातृत्व का भाव आवश्यक है, जननी होना नहीं। हर किसी की ज़िंदगी में मातृत्व का भाव आपको सिर्फ आपकी जननी से मिले, ऐसा संभव नहीं है। आपकी धाय माँ, मौसी, बड़ी बहन, शिक्षिका, जननी, और आपकी धर्म माँ सब मिलकर आपके लिए माँ की परिभाषा पूरी करते हैं। यह बात अलग है कि जन्म देने वाली माँ का स्थान कोई और नही ले सकता , पर इससे आपकी बाकी माताओं का योगदान कमतर होकर नहीं आंका जा सकता। इनमें में ज्यादातर लोग ऐसे हैं, जिनका योगदान आपको याद भी नही रहता। जननी के प्रेम में तो कदाचित यह भाव भी रहता है कि यह बड़ा होकर मेरा नाम रोशन करेगा, मेरे सपने पूरे करेगा, दूसरी माँओं का प्यार आपका ऐसा कर्ज़ है जो बिना शर्त बिना किसी आशा के मिलता है। चाणक्य के एक बुलावे पर उसको अपना पुत्र स्वीकार करने वाली हर वह स्त्री उसके लिए माँ थी। आज का दिवस उन सबको प्रणाम करने का दिवस है। आज मातृत्व को नमन करने का दिवस है। मातृत्व एक व्यक्ति से परे है। शायद इसलिए एक अफ्रीकी कहावत है कि एक बच्चे को पालने में पूरा गांव लगता है। आज उस गांव को प्रणाम करने का दिन है। हैप्पी मदर्स डे।

घर एक सुकून का नाम है

आप किसी बच्चे को घर की तस्वीर बनाने को कहो । ज्यादातर बच्चे एक अलग सा घर बनाएंगे जो पूरी तस्वीर में सिर्फ एक घर होगा। आस पास एक पतली से सड़क बनी होगी, जो सीधे घर के दरवाजे तक जाएगी। आस पास पहाड़ भी बने हो सकते हैं, एक बगीचा सा होगा । ऊपर आकाश दो तीन पंछी उड़ते दिखाई दे सकते हैं। बच्चे को कुछ और समय दें तो बच्चा घर से बाहर खड़े अपने माँ बाप और अपनी तस्वीर बनायेंगे जो एक दूसरे का हाथ पकड़ कर खड़े होंगे।

बच्चे क्या ज्यादातर बड़ों को भी घर की तस्वीर बनाने को कहो वे भी कुछ मिलता जुलता ही बनाएंगे। शायद ही कोई मिले जो एक बड़ी सी कॉलनी बनाएगा, जिसमें दस बड़ी इमारतें खड़ी होंगी और किसी एक इमारत की एक खिड़की को वो कहेगा कि यह रहा मेरा घर।

यह तस्वीरों वाला घर जो हम बड़े और बच्चे बनाते हैं वास्तविकता से इतना अलग सा क्यों दिखता है? क्यों बच्चे अपना घर प्रकृति के बीच खड़ी एक अकेली शांत आकृति के रूप में बनाते हैं ना कि उस भीड़ और मुहल्ले के रूप में जैसा उनका वास्तविक घर है। एक और खास बात । यह घर का चित्र लगभग हर बच्चा एक सा बनाएगा चाहे वो किसी झोपड़पट्टी वाली अवैध कॉलोनी में रहता हो या किसी बड़ी से पॉश कॉलोनी में। शायद घर की जो तस्वीर हमारे मन में रहती है वो आपके वास्तविक घर से अलग होती है।

कुछ दिनों पहले यूनाइटेड एयरलाइन्स में एक यात्री को जबरदस्ती घसीट कर जहाज से उतारने वाली खबर और उसका वीडियो आया था। यात्री घबराया हुआ दौड़ता हुआ वापस आता है और कहता है मुझे घर जाना है, मुझे घर जाना है। इंसान क्या हमारी कहानियों में दूसरे ग्रह से आये एलियन भी हमेशा घर लौटने की ही कोशिश करते रहते हैं।

चाहे कोई भी मनुष्य हो ,किसी भी उम्र का हो, घर एक जगह से बढ़ कर है। घर एक सुकून का नाम है, घर नाम है शांति का। घर एक ऐसा मुक़ाम है जो पूरी दुनिया से अलग है, शांत है। शायद इसलिये बच्चे घर का चित्र पूरी दुनिया से अलग बनाते हैं। जहाँ पहुँच रास्ते खत्म हो जाते हैं। जहाँ भीड़ नही है। कहीं न कहीं हर कोई घर उसे ही कहता है जहाँ बाकी दुनिया से थक कर आप वापस लौटना चाहते हो। काम बहुत हो गया, अब घर चलते हैं। पार्टी काफी देर हो चुकी, घर जाने का समय आ गया।

एक बात गौर करने की है कि घर पर मिलने वाले सुकून का वहाँ उपलब्ध सुख सुविधाओं से ज्यादा लेना देना नही है। कवि राम नरेश त्रिपाठी लिखते हैं :
विषुवत् रेखा का वासी जो ,
जीता है नित हांफ हाफ कर।
रखता है अनुराग अलौकिक,
वह भी अपनी मातृ भूमि पर।।

ध्रुववासी जो हिम में हम में ,
जी लेता है कांप कांप कर ।
वह भी अपनी मातृ भूमि पर,
कर देता है प्राण निछावार।।

शायद इसलिये आज भी घर से निकाला जाना सबसे बड़ी सज़ा है और घर छोड़ रेफ्यूजी कैंपो में रहना सबसे बड़ी मानव त्रासदी। अपना घर छोड़ महानगरों की फुटपाथ पर पसरे लोग और रैन बसेरों में रात काटते लोग अपने दुख को बयां तक नहीं कर सकते। अंग्रेज़ी फ़िल्म द टर्मिनल में टॉम हैंक्स का किरदार सारी मुसीबतों के बावजूद अपने घर लौटना चाहता है। जरूरत है कि सबको मूलभूत आवश्यकताएं अपने घर के आस पास मुहैया कराई जाएं। कोई मनुष्य मजबूरन अगर अपना घर छोड़ रहा है तो समझिये कि कुछ ऐसा हुआ है जिसको बेहतर ढंग से किया जा सकता था ।

प्राकृतिक आपदाएं जैसे बाढ़, भूस्खलन और सूखा अगर मानव विस्थापन का कारण बनती हैं तो कुछ हद तक समझ सकते हैं लेकिन अगर राजनीतिक कारणों से ऐसा हो रहा है तो उसके राजनीतिक हल अविलंब ढूंढे जाने चाहिये। आर्थिक कारण जैसे रोजगार की कमी मानव विस्थापन की विश्वव्यापी वजह है। कारण जो भी हो अनैच्छिक मानव विस्थापन एक घोर मानव त्रासदी है जिसका निकट भविष्य में कोई स्थायी समाधान मिलना कठिन लगता है।

गाय, गोमांस और गौहत्या

दो बैलों की कथा मुंशी प्रेमचंद की एक लोकप्रिय कहानी है। झूरी नाम के एक किसान और उसके दो बैलों हीरा और मोती की यह मार्मिक और हृदयस्पर्शी कथा शायद सबने पढ़ रखी हो। कहानी काल्पनिक जरूर है लेकिन उसकी पृष्ठभूमि काल्पनिक नही है। उस कहानी में दो बैल मनुष्यो जैसा व्यवहार करते दर्शाए गए हैं। उस कहानी को पढ़ते समय आपको कुछ भी अवास्तविक नही लगेगा । प्रेमचंद की रचनाएं अलिफ लैला और अरेबियन नाइट्स की तरह फतांसी नहीं है, वो भारतीय जीवनशैली का एक जीवंत प्रतिरूप हैं। कहानी में दिखाया गया है कि झूरी के प्रेम और गया की दुत्कार को बैल कितने अच्छे से समझते हैं और उसके अनुकूल ही व्यवहार करते हैं । प्रेमचंद की कालजयी रचना गोदान भी गाय के साथ भारतीय जनमानस के जुड़ाव की एक कथा है। यही दोनो रचनायें ही नहींं प्रेमचंद के पूरे साहित्य में गाय और भारतीय समाज विशेषतः किसानों के साथ गायों के संबंध को खूबसूरती से दर्शाया गया है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि प्रेमचंद की लेखनी से निकली रचनाओं से ज्यादा ज़मीन से जुड़ी रचनाएं शायद ही हैं। 



गोमांस और गौहत्या पर चल रही समसामयिक बहस जहाँ गोहत्या को मूल अधिकार और गोमांस खाने को आज़ादी से जोड़ दिया गया है, कम से कम प्रेमचंद के साहित्य से मेल खाता नही दिखता। जिस प्रकार पूजा घर में जूते पहनकर जाने की मनाही आपके जूते पहनने के अधिकार का हनन नही है। और ना ही मंदिर में शांत रहने की अपील आपके बोलने की आज़ादी का हनन है। उसी प्रकार गोमांस और गोहत्या की मनाही आपकेे खाने पीने की स्वतंत्रता का हनन नही है न ही फासिस्ट ताकतों के आने की आहट। सिनेमाघर में मोबाइल पर बात करना मना इसीलिए नही रहता क्योंकि कोई आपकी बात करने की आज़ादी को छीनने का प्रयास कर रहा है, बल्कि यह नियम यह सुनिश्चित करता है कि आपसे किसी और को व्यवधान न हो। सामाजिक नियम कभी आपकी सुरक्षा के लिए बनाये जाते हैं, तो कभी इसलिए कि आपके हितों का टकराव आम जनकल्याण से न हो। भारतीय समाज के परिपेक्ष्य में गोहत्या और गोमांस से जुड़े कानून उसी तरह के कानून हैं जो भारतीय जनमानस , भारतीय कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था और बहुसंख्यक हिन्दू की आस्था और जनभावना को ध्यान में रख बनाये गए हैं। इन नियमों को तोड़ने के कृत्यों को आज़ादी, स्वतंत्रता और मूल अधिकार जैसी संज्ञा देकर उचित ठहराना एक बचकाना तर्क है।

कुछ लोग गोमांस सेवन को गंगा जमुना तहज़ीब से जुड़ा बता रहे हैं। प्रेमचंद गंगा जमुनी तहजीब के सबसे बड़े पुरोधा थे। उनकी शिक्षा हिंदी, उर्दू और फारसी में हुई। खुद उनकी पहली रचना सोज-ए-वतन उर्दू में प्रकाशित हुई। उनकी रचना में गाय का जैसा वर्णन और चित्रांकन मिलता है वो भारतीय संस्कृति और समाज का ही एक प्रतिबिम्ब है। अगर गोमांस एक भारतीय रहन सहन का अंग होता तो कम से कम एक बार उनके साहित्य में इसका वर्णन जरूर आता।

अपनी बात को सिध्द करने को हिंसा और असंवेदनशील व्यवहार का सहारा लेना आपकी वैचारिक दुर्बलता का ही परिचायक है। सरेआम एक गाय को काट कर एक ऐसा ही प्रयास किया गया है। यह खबर केरल से आई है जिसके बारे में हमने बचपन से पढ़ रखा था कि सबसे ज्यादा शिक्षित लोग वहां हैं। लगता है हमारी शिक्षा में हमारे इतिहास और हमारी संस्कृति सिखाने वाला अध्याय जोड़ना छूट गया है।

अगर गाय आपके लिए सिर्फ मांस का एक स्रोत है, तो आपका गाय से परिचय कक्षा पांच में पढ़े गये निबंध तक ही सीमित है। गोबर से लीपे चूल्हे पर गोबर के उपले की आंच पर उबलते गाय के दूध का स्वाद आपने नही चखा। आपने गाय के नवजात बछड़े के उच्श्रृंखलता का वो दृश्य नही देखा जिसकी चपलता आपके मन को मोहने के लिये काफी है। गाय को माँ का दर्जा दिया जाना और गाय का गर्भधारण काल इंसान की तरह भी नौ महीने होना एक महज संयोग नहीं है। गाय की ममता का असली रूप तब पता चलता है जब किसी नवप्रसूता गाय की बछड़े को कोई खतरा महसूस हो। गाय का महत्व एक परिवार में कुछ ऐसा है कि पहली रोटी हमेशा गाय को खिलाई जाती है। अगर घर में कुछ दुखद घटित हो तो घर की गाय की आंखों में आंसू आ जाते हैं। जिस गाय का दूध आपको जीवनभर पौष्टिकता प्रदान करता है, मृत्युपरांत भी वैतरणी आपको एक गाय ही पार करवा सकती है।

गौरक्षा से जुड़ा एक प्रसंग महाभारत से याद आ रहा है। द्रौपदी पांचों पांडवों की पत्नी थी। जब भी पांचाली किसी एक भाई के संसर्ग में रहती, दूसरे पांडवों का उस कक्ष में जाना मना था। इस नियम का उल्लंघन करने पर दोषी को वनवास पर जा प्रायश्चित करने का प्रावधान रखा गया था। एक बार जब अग्रज युद्धिष्ठर द्रौपदी के साथ कक्ष में अंतरंग थे, एक ब्राह्मण ने अर्जुन से उसकी सहायता करने की प्रार्थना की। ब्राह्मण की गायों को कोई राक्षस छीन कर ले जा रहा था। अर्जुन का गांडीव और बाण उसी कक्ष में रखे थे जहां युद्धिष्ठर और द्रौपदी थे। अर्जुन ने एक साल के बनवास की परवाह न करते हुए भी गौरक्षा के धर्म को निभाने के लिये उस कक्ष में प्रवेश किया और अपने अस्त्र लेकर गायों की रक्षा की।

गोमांस और गौहत्या के बारे में किसी के विचारों को सुनने से पहले में जानना चाहूंगा कि बोलने वाला क्या प्रेमचंद से ज्यादा भारतीय समाज की संवेदनशीलता और इसके व्यावहारिकताओं की समझ रखता है। क्या गोरक्षा के बारे में उसकी समझ अर्जुन से ज्यादा है जिसे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञान दिया था। अगर कोई भी विज्ञान की किताब या अनुसंधान यह कह दे कि गोमांस दूध से ज्यादा स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है तो मैं मान लूँ । कोई भी पर्यावरणविद आपको आसानी से बात सकता है कि शाकाहार को त्याग गोमांस का सेवन हमारे पर्यावरण के लिए कितना घातक है। लेकिन यह तर्क हमारे शिक्षित धर्मनिरपेक्ष बुद्दिजीवी आखिर क्यों सुनेें? बीफ खा कर गंगा जमुनी तहजीब का ज्ञान बांटने वाले ज्ञानियों के पैमाने पर प्रेमचंद उर्फ गुलाब राय और अर्जुन कट्टर और देहाती सिद्ध होंगे। गाय और गोरक्षा की बात करने वाले गंवार जो ठहरे।

गाय जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सरेआम गौहत्या कर गोमांस उत्सव मनाने वाले शायद 1857 का इतिहास भूल गए हैं। एनफील्ड राइफल की कारतूसों पर लगी गाय की चर्बी ने ही ईस्ट इंडिया कंपनी की ताबूत में पहली कील ठोकी थी। हम सब के शांतिपूर्ण साहचर्य के लिये यह आवश्यक है कि हम गाय को सम्मान दें जिसकी वो हकदार आदिकाल से है।

काम करने वाले लोग

किसी भी कंपनी में काम करने वाले लोग तीन तरह के होते हैं।

ज्ञान मार्गी : ज्ञानमार्गी शाखा के लोग अपना ज्ञान बाँटते रहेंगे, चाहे आप उनसे किसी भी विषय पर किसी भी स्थिति में पूछ लो। घर पर आग लगी होने पर वो आपको जल की उपयोगिता , कुआँ खोदने की जरूरत और आग से होने वाले फायदों के बारे में बताएंगे पर तत्काल आग कैसे बुझे इसपर बात या काम नहीं करेंगे।

भक्ति मार्गी : भक्ति मार्गी शाखा वाले कर्मचारी हर बात में ज्ञानमार्गी लोगों की हाँ में हाँ मिला कर अपनी भक्ति का परिचय देंगे। कभी कभी भक्ति विभोर हो ज्ञानमार्गी लोगों के ज्ञान के उदाहरण भी पेश करेंगे जैसे किस तरह घर में आग लगने के बाद उन्होंने जल की उपयोगिता पर एक सेमिनार का आयोजन किया था और कुआँ खोद आग पर काबू पाया था।

कर्ममार्गी : किसी भी कंपनी में पाए जाने वाले सबसे विरल कर्मचारी। विलुप्त होने की कगार पर होने के बावजूद उनका अनवरत अवैध शिकार उसी प्रकार किया जाता है जिस प्रकार विलुप्तप्रायः शेर अब भी अपनी खाल और अस्थि के लिये मारे जाते हैं। काम करने की इनकी योग्यता भी कंपनी के ज्यादा काम नही आ पाती क्योंकि ज्ञानमार्गी और भक्तिमार्गी लोग इनसे आग लगने पर कुआँ खुदवाते हैं और जल की उपयोगिता पर श्वेतपत्र लिखने को बाध्य करते हैं। #कॉरपोरेट-कथाएं

सवाल यह है कि

‌सवाल यह नही होना चाहिये कि मीसा भारती के फार्महाउस पर छापा क्यों पड़ा!! सवाल यह है कि मीसा भारती के पास फार्महाउस कैसे है! सवाल यह नही है कि 10 साल पुराने मामले में तफ्तीश अब क्यों हो रही है! सवाल यह है कि यह तफ्तीश दस साल क्यों नही हुई। सवाल यह नहीं है कि क्या तेज प्रताप और तेजस्वी के खिलाफ आयकर के छापे बदले की भावना से प्रेरित हैं। सवाल यह है कि तेज और तेजस्वी की इतनी आय कहाँ से हुई! सवाल यह नहीं होना चाहिये कि क्या लालू के खिलाफ चल रहे मामले विपक्ष के खिलाफ साजिश हैं। सवाल यह है कि क्या विपक्ष की एकता का आधार और न्यायिक प्रक्रिया परस्पर विरोधी संकल्पनाएं हैं! सवाल यह नहीं है कि महागठबंधन बना रहेगा या नहीं। सवाल यह है कि क्या अपराधी और आरोपियों को सत्ता में बने रहने का हक़ होना चाहिये। सवाल यह नहीं है कि‌ घोटालों की जांच फासीवाद है या नहीं। सवाल यह है कि चोरी और भ्रष्टाचार के कीचड़ में सने राजनेता क्या अपने ऊपर समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का इत्र छिड़क कर पवित्र हो सकते हैं। सवाल यह नही है कि ऊपर के सारे सवालों के जवाब क्यों नहीं दिए जा रहे। सवाल यह है कि सही सवाल पूछने वालों को सवालिया निगाहों से क्यों देखा जा रहा है।

devil lies in the details

There is a saying that devil lies in the details.. thats why people people hate details.. they want conclusions.. they want one gist.. one face.. one person.. whom they can felicitate, condemn, criticise and worship..

kill the villain in the climax of the movie, be happy that all evil is gone.. clap clap.. you got a person, a face to be blamed.. villain killed.. evil gone..

..india wins world cup.. everyone contributed.. from coaching staff, selectors, groundsmen, net bowlers, ten players and a captain.. felicitating everyone is tough.. thats like going into details.. felicitate the captain.. make him a hero.. thats easy and convenient..why bother analyzing all factors for the victory..

Pilgrims gets killed in Amarnath.. there are many factors responsible for it.. from islamic forces, lapse in security, some cross border planning and local facilitators.. how to solve that.. talking about every factor is like going into details.. thats boring.. find a whipping boy.. sometime it may be local DM, DSP or even home minister.. fire him .. transfer him.. roast him on social media.. does it solve any issue.. may be.. may be not.. but you escaped the boring task of going into details.. you have found a face.. get your frustration out..
You have not solved 'the problem' .. you have solved 'your problem'..

Problem is still lying there in details smiling at us.. fully assured that hardly anyone will bother coming to him.. problem knows that people will take the easier route and always find a face to blame instead of finding him. they will take shortcuts and will be smearing one face..because thats easy and convenient.. may be thats the problem..

जीवन ,और मृत्यु

27 फरवरी 1931, स्थान अल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद। हिंदुस्तान रिपब्लिकन असोसिएसन के सदस्य पंडित जी उर्फ चंद्रशेखर आज़ाद और साथी सुखदेवराज पार्क में बैठे अपने दूसरे साथियों का इंतज़ार कर रहे थे। काकोरी कांड और पंजाब के सुपरिंटेंडेंट जॉन सॉन्डर्स की हत्या के बाद आज़ाद और उनके साथी ब्रिटिश सरकार की आंखों का कांटा बने हुए थे। आज़ाद के एक पूर्व साथी की गुप्त सूचना मिलते ही कि आज़ाद अल्फ्रेड पार्क में मौजूद हैं, पुलिस से चारों ओर से पार्क को घेर लिया। फिर क्या? ब्रिटिश पुलिस के आज़ाद को आत्मसमर्पण करवाने का कोई प्रयास नही किया क्योंकि वे भी जानते थे कि आज़ाद और आत्मसमर्पण एक वाक्य में जंचते नहीं। दोनों ओर से गोलियां चलने लगी। आज़ाद के कोल्ट रिवाल्वर से निकली गोलियों ने तीन सिपाहियों को वहीं ढेर कर दिया। ब्रिटिश पुलिस की तरह से चली एक गोली आज़ाद की जांघ में जा लगी, जिससे उनका वहाँ से निकल भाग पाना असंभव हो गया। आज़ाद ने इतना जरूर पक्का किया कि साथी सुखदेव वहां से सुरक्षित निकल सकें। 23 साल का एक युवा जिसने देश को आज़ाद करने का बीड़ा उठा लिया था, अपने पूरे जोश और हिम्मत से एक शेर की तरह लड़ता रहा। चंद्रशेखर के पास जोश और देशप्रेम का भले अक्षय भंडार हो, उनके पास गोलियों का भंडार सीमित ही था। वो वक़्त भी आया जब आज़ाद के पास सिर्फ एक गोली बची। जिसने अपने प्राण माँ भारती को पहले ही समर्पित कर दिये थे, और आज़ाद जिसका सिर्फ नाम नहीं बल्कि जीवन प्रण था, उस बावले ने अपनी आखिरी गोली अपने आप को मार ली। कहते हैं कि आज़ाद के मृत शरीर के पास आने की भी हिम्मत पुलिस में नहीं हुई, और उनके मृत शरीर के पास जाने से पहले उन्हें दुबारा गोली मारी गई यह सुनिश्चित करने के लिए कि वो सचमुच मर गये हैं।

भगत सिंह जब जेल में थे तब उनके साथियों ने उनको संदेश भेजा कि उनको छुड़ाने के पूरे पुख्ता इंतज़ाम हो चुके हैं। भगत सिंह ने कहा कि उनको छुड़ाने का प्रयास न किया जाये क्योंकि एक भगत सिंह की शहादत हज़ारों भगत सिंह को प्रेरित करेगी।

महाभारत के युद्ध से पहले पुत्र मोह के वशीभूत देवराज इंद्र अपने अंश अर्जुन की प्राणरक्षा हेतु याचक ब्राह्मण बन कर्ण के पास जा पहुंचे। उन्होंने कर्ण से उनका कवच कुंडल मांग लिया। यह जानते हुए भी कि कवच कुंडल का दान अपने प्राणों की आहुति देने के समान है, कर्ण ने बिना एक भी पल विलंब किये, अपने कवच कुंडल याचक बने इंद्र को दान में दे दिया।

यह सच है कि जीवन प्रकृति का सबसे अनुपम उपहार है। जीवन है तो समस्त संभावनाएं हैं। लेकिन उपरोक्त के सारे उद्धरणों में नायक अपने जीवन का बलिदान कर निश्चित मृत्यु का संवरण करता है। साधारण शब्दार्थ देखें तो जीवन का स्वयं अंत करना आत्महत्या है, और आत्महत्या बहुधा कायरता का पर्याय मानी जाती है। प्रश्न यह है कि क्या आज़ाद, भगत और कर्ण का जीवन बलिदान आत्महत्या और कायरता मानी जायेगी?

शायद नहीं। चाहे आज़ाद हों, या कर्ण या चाहे भगत सिंह हों, उन्होंने अपने मृत्यु को अंगीकार इसलिए किया क्योंकि वो जानते थे कि अगर वो इस मृत्यु को स्वीकार न करते तो उनका जीवन लक्ष्य शायद अधूरा रह जाता। अंग्रेजों के बंदी बन चंद्रशेखर जीवित तो रहते पर आज़ाद ना कहलाते। कवच कुंडल का दान न देकर कर्ण अवश्य जीवित रहते पर दानवीर का उपाधि उन्हें न मिलती।

समसामयिक काल में रानी पद्मिनी या पद्मावती के जौहर को आत्महत्या, कायरता और पुरुषवादी सोच से जोड़ कर दिखाया जा रहा है। ऐसे तर्क दिए जा रहे हैं कि स्त्री का सम्मान जीवन से ज्यादा बहुमूल्य नहीं है। कुछ तथाकथित उदारवादी लोग पद्मावती को नायिका मानने को सती प्रथा को उचित ठहराने के जैसा मान रहे हैं।

सारे तर्क इस बात पर निर्भर हैं कि जीवन सर्वोपरि है और कोई भी चीज़ जीवन से बहुमूल्य नहीं हो सकती। यह सच है कि जीवन सर्वोपरि है किन्तु जीवन क्या मात्र सांसो का चलना और अपनी जैविक लीला को जारी रखने का नाम है। अगर किसी जीवन का उद्देश्य सिर्फ जीवित रहना है तो वो जीवन, मनुष्य जीवन कहलाने के लायक नही है। जीवन बिना सम्मान ,उद्देश्य या सिद्धांतों के मृत्यु से भी निकृष्ट है।

एक माउथ ऑर्गन बजाने वाले बहुत बड़े कलाकार को गले का कैंसर हो गया। डॉक्टरों ने सलाह दी कि आप अपने गले का ऑपरेशन करवा लें तो शायद बच जाएं, लेकिन आपरेशन के बाद आप माउथ ऑर्गन कभी नही बजा पाएंगे। उस कलाकार ने कहा कि संगीत और माउथ ऑर्गन उनके लिये उनका जीवन है। उसके बिना वो अपने जीवन की कल्पना नही कर सकते, इसलिए वो सब तक जिएंगे अपने वाद्य और संगीत के साथ जिएंगे। क्या आप उस कलाकार को कायर कहेंगे और उसको सम्मान नही देंगे?

यही बात रानी पद्मावती के बारे में भी लागू होती है। खिलजी के हरम में एक बांदी और एक जिस्म बन कर रह जाने को आप जीवन मान सकते हैं, रानी पद्मिनी ने नही माना। इसीलिये आज रानी पद्मिनी नारी सम्मान की प्रतिमूर्ति हैं। झांसी की रानी के सलाहकार आज के उदारवादी लोग होते तो लक्ष्मी बाई अंग्रजों के सामने समर्पण कर जीवित रहती और कभी वीरांगना न कहलाती।

जीवन सिर्फ भौतिक नहीं है और मृत्यु के मायने भी सिर्फ भौतिक नहीं है। जीवन तब तक है जब तक आपके सिद्धान्त जीवित हैं। अगर आपके सिद्धांत जीवित हैं तो दैहिक शरीर का अंत भी आपकी मृत्यु नही हो सकती। जीवन रक्षा अगर सिद्धांतों की रक्षा से ऊपर का सिद्धांत होता तो जटायु एक पक्षी होकर दशानन से युद्ध न कर बैठता। भक्तराज जटायु आज अमर इसलिये हैं क्योंकि उन्होंने अपने सिद्धान्त को अपने जीवन से मूल्यवान समझा। अगर हर हाल में जीवित रहना ही सबसे बड़ा गुण होता तो तिलचट्टे पृथ्वी के सबसे सम्मानित जीव होने चाहिए। तिलचट्टे डायनासोर से भी पुराने समय से धरती पर हैं और परमाणु युद्ध के बाद भी जीवित रहेंगे। हमारे उदारवादी एक तिलचट्टे को पद्मावती से ज्यादा सम्मान देने को तैयार हो सकते हैं पर मेरा मन नही मानता।

फुटबॉल और क्रिकेट

बाइस खिलाड़ी एक गेंद के पीछे भाग रहे हैं तो उसे फुटबॉल कहते हैं। दुनिया का सबसे लोकप्रिय खेल। लेकिन फुटबॉल के संचालक संस्थाओं में रचनात्मक लोगों की सख्त कमी है, वरना आज आपको सिर्फ फुटबॉल नही बहुत तरह के फुटबॉल मैच सुनने को मिलते।

क्रिकेट को देख लीजिये, रचनात्मक्ताओं की पराकाष्ठा है क्रिकेट संचालकों और दर्शकों में। बाईस खिलाड़ी सफेद कपड़ों में खेलें तो उसको कहते है टेस्ट क्रिकेट। खिलाड़ियो को रंगीन पाजामे पहना दो तो बन जायेगा एकदिवसीय क्रिकेट। चीयरगर्ल्स का डांस भी हो रहा हो तो बन जायेगा टीट्वेंटी क्रिकेट। बुड्ढे और रिटायर्ड लोग खेल रहे हों तो वो कहलाता है वेटरन्स क्रिकेट। गेंद गुलाबी हो तो पिंक बॉल क्रिकेट। टेनिस वालों की गेंद चुरा कर खेलो तो टेनिस बाल क्रिकेट। स्टेडियम के ऊपर छत लगी हो तो इनडोर क्रिकेट और अगर छत न तो तो नार्मल क्रिकेट। सुबह से शाम खेलो तो डे क्रिकेट, दोपहर से रात तक खेलो तो डे नाइट क्रिकेट। 24 साल के लड़के अपनी उम्र 19 बता कर खेलें तो अंडर 19 क्रिकेट। लड़कियों को खिलाओ तो वीमेंस क्रिकेट, फ्लॉप फिल्मी कलाकार खेलें तो सेलिब्रिटी क्रिकेट। 2 देश खेलें तो बायलेटेराल क्रिकेट , 3 खेलें तो ट्राईएंगुलर क्रिकेट।

अगर 8 देश खेलें तो यह विश्व कप भी हो सकता है, टीट्वेंटी विश्वकप भी हो सकता है और चैंपियंस ट्रॉफी भी हो सकता है। यह इस बात पर निर्भर है कि कौन सा वाला आखिरी छह महीने में नही हुआ। अगर 6 महीने पहले विश्वकप हुआ हो और वही आठ देश फिर से खेल रहे हो तो उसको विश्वकप नही कहते , उसे चैंपियंस ट्रॉफी कहते हैं। और अगर विश्वकप और चैंपियंस ट्रॉफी दोनों 6 महीने पहले ही खत्म हुई हो और उन 8 देशों को फिर से खेलना हो तो आप उसे नॉक आउट क्रिकेट भी कहते हैं।

बिना आँखों वाले लोग खेल रहे हों तो ब्लाइंड क्रिकेट, आँखों वाले खेल रहे हों तो नैन मटक्का क्रिकेट। अगर खिलाड़ी सिर्फ पैसे के लिए खेल रहे हों तो उसे आईपीएल क्रिकेट कहेंगे। अगर खिलाडी सिर्फ सम्मान के लिए खेल रहे हों आप उसको काउंटी क्रिकेट कहते हैं । अगर खेलने पर खिलाड़ियों को न पैसा मिले और न सम्मान तो समझ लीजिये कि खिलाड़ी बांग्लादेश प्रीमीयर लीग क्रिकेट खेल रहे हैं। अगर खिलाड़ी किसी भी प्रकार के क्रिकेट में अगर पाकिस्तानी आ जाएं तो उसको फिक्स्ड क्रिकेट कहते हैं।

8 देशो में सिर्फ चार भूरी चमड़ी वाले देश वाले खेलने को राजी हों तो आप उसको एशिया कप क्रिकेट कहते हैं, और सिर्फ दो गोरे देश खेलें तो एशेज क्रिकेट। ट्विटर वाली जनता जो किसी चीज़ पर 5 मिनट से ज्यादा ध्यान नही लगा पाती उनके लिए टी-10 क्रिकेट है तो हरेक फ़िल्म के सिर्फ हॉट सीन को फारवर्ड कर कर के देखने वाले उतावले लोगों के लिए है सुपर सिक्सर क्रिकेट। मैदान की जगह गली में खेल रहे हो तो गली क्रिकेट और बिना बल्ले, गेंद के क्रिकेट खेलना हो तो आपके लिये बुक क्रिकेट है।

इतना भी काफी नही है , मेरा अनुमान है आगे हमें और भी तरह की क्रिकेट देखने को मिलेंगे। लड़के लड़कियों की कपड़े पहन के खेलें तो उसको कपिल शर्मा क्रिकेट कहेंगे। बिना वैक्सीन्ग किये मूछों वाली लड़कियों के क्रिकेट को फेमिनिस्ट क्रिकेट कहेंगे। धारा 377 का विरोध करके टीवी न्यूज पर आने वाली जनता अगर अपना क्रिकेट शुरू करें तो उसको एल जी बी टी क्रिकेट कहेंगे। हालांकि अभी यह साफ नही है कि अगर दोनों टीमें बल्ला लेकर मैदान पर उतरेंगी तो बिना गेंद के सिर्फ बल्ले से क्रिकेट कैसे खेली जाएगी।

और हमारा फुटबॉल सिर्फ फुटबॉल ही है। उसे क्रिकेट से सीखने की सख्त जरूरत है।

अन्ना आप लौट जाओ।

अन्ना आप लौट जाओ।

इस शुक्रवार अगर ज़ायेद खान और अमीषा पटेल की कोई फ़िल्म रिलीज होती तो उसमें ज्यादा लोग दिलचस्पी दिखाते जितना आज आप के अनशन में दिखा रहे हैं। अन्ना ना सिर्फ ठगे गये बल्कि उनकी जीवन भर की कमायी गई विश्वसनीयता चंदे के रूप में उनसे छीन ली गई। अन्ना आप रालेगांव सिद्धि लौट जायें अपनी बची खुची इज़्ज़त लेकर। आपका शिकार किया जा चुका है, अभी जो आपके आसपास खड़े हैं वो सिर्फ और सिर्फ गिद्ध और चील हैं जो आपकी बाकी बची साख भी नोच खाएंगे। वो फिर से होते देखना दुखद होगा।

अन्ना आप लौट जाओ।

जहां तक जनता का सवाल है उनकी किस्मत में ईमानदार राजनीति के नाम पर वी पी सिंह और केजरीवाल जैसे नेता ही लिखे हैं। आप वो पेड़ का ठूंठ हो जिसके सीधे पुराने तने की सिल्ली काटकर लोगों ने अपने कुर्सी के पाये और अपने राजमहल के चौखट बना लिये। इसबार लोग आपकी जड़ उखाड़ कर सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी बना लेंगे।

अन्ना आप लौट जाओ।

यह लड़ाई का मैदान नही है जहाँ आपने गोलियां सामने से चलती देखी है, यह रामलीला मैदान है, जहां पुतले जलाकर तालियां बजाने वाली भीड़ जमा होती है। आप पर तीर भी वही लोग चलाएंगे जो आपको सजा संवार कर खड़ा करेंगे। आप एक बार ठगे जाओ तो सामने वाले की गलती, दुबारा ठगे जाओ तो आपकी गलती। आप अपने अनशन के यज्ञ के हवनकुंड में खुद को झोंकने से पहले एक बार यह भी देख लो कि उस हवनकुंड में कोई अपने खिचड़ी का पतीला तो नहीं चढ़ा रहा। आपकी टोपी पहन कर कोई सबको टोपी न पहना जाये। इसबार शायद वो न हो, जनता भेड़िया आया की आवाज़ सुन पर इसबार शायद ना आये।

अन्ना आप लौट जाओ।

आप सच्चे हो, इसमें शायद ही किसी को संदेह हो। पर आपकी राजनीतिक सूझबूझ में बहुत कमी है। आपको दूसरा गांधी कहने वाले आपको यह नहीं बताते होंगे, कि पहले वाले गांधी जितने बड़े महात्मा थे, उतने ही बड़े राजनीतिक भी थे। आप गांधी बनने के चक्कर में मत पड़ो, आप अन्ना ही बने रहो। दिल्ली की मिट्टी और पानी में ही राजनीति है। यह मिट्टी पानी आपके लिए नही बनी है। आपके लिये एक गाना है, कि तेरी गठरी में लागा चोर, मुसाफिर जाग जरा।

अन्ना आप लौट जाओ ।