Sunday, June 6, 2021

अभी बस चलता रहूंगा

चाहता हूं कि कुछ लिखूं। लेकिन गांव की यादों के बारे में नहीं लिखना चाहता, बचपन की कहानियां नहीं दुहराना चाहता। चाहता हूं आगे देखूं, आगे का लिखूं। अपना ही जीवन याद करना, nostalgia के पाश में बंधे रहना बुढ़ापे का लक्षण है। हमारे जमाने में वाले तकिया कलाम से शुरू होने वाली कहानियों से अभी दूर रहना चाहता हूं। अभी रुक कर कहानियां सुनाने की जगह नई कहानियां बनाना चाहता हूं। यादें याद करने की जगह यादगार पल जीना चाहता हूं। जीवन का एक मोड़ है यह, हां सड़क पर मोड़ आने पर चाल धीमी जरूर होती है, लेकिन इस मोड़ को मंजिल बनाने का दिल नहीं मेरा। मुझे अगले मोड़ से आगे जाना है। इस मोड़ पर हल्का मुड़ना पड़ेगा जरूर, लेकिन पीछे मुड़ कर देखूंगा नहीं। पीछे मुड़कर देखने की बात जंचती नहीं अभी, थक कर सुस्ताने की चाह नहीं अभी, अभी और चलना चाहता हूं।अभी और चलना चाहता हूं। 
बचपन की चुहल भरी कहानियों, जवानी की बेवकूफाना हिम्मत के किस्से और प्यार के उन नर्म पलों की याद में समय बिताना अभी दूर है। यह दूरी तय कर ही जब थक जाऊंगा, तब सुनाऊंगा वो कहानियां। अभी बस चलता जाऊंगा। राहगीर हूं अभी, चलना है तब तक जब तक सूरज चमक रहा है सर पर और आगे दिख रही है राह। शाम के धुंधलके में किस्सागोई का शौक भी पूरा करूंगा। हमारे जमाने में वाली बातें करूंगा, लेकिन अभी बस चलता रहूंगा। बस चलता रहूंगा।

Friday, May 28, 2021

Disaster management lessons from Ants

Ants are one of the most fascinating creatures we have around us. Their hardwork and persistence are stuff of legends. They can teach a lot to us humans when it comes to life lessons.

After a downpour due to Yass cyclone for around 2 days, life went haywire for most of humans in eastern part of India. Imagine what would have happened to the ants. Total destruction of their homes and colonies. It's must have felt like D day for them. What happened to them is not important, it's important how they dealt with it. Within 12 hours, they rebulit their homes, colonies, highways and rescue work is on till business as usual is stored.
I was fascinated with the details with the structure they have bulit. Though my camera might not have captured every minute details, what I could see were structure similar to highways, underpass, bridge, bunkers, makeshift colonies, temporary granaries and what not. All these were built overnight after rains stopped. Around 5 pm yesterday. 

‌We don't need University education to learn these. Mother nature can teach us every thing. Wish we had more time and attention to attend these classes.

Tuesday, May 25, 2021

बौद्ध धर्म और इसके उद्भव के आर्थिक कारक

उत्तर वैदिक काल तक आते आते सभ्यता प्रारंभिक वैदिक काल की उलट कृषि व्यवस्था आधारित हो गई थी। प्रारंभिक काल में जहां कृषि व्यवस्था पशुपालन और गोचारण आधारित थी, लोहे के आविष्कार के बाद गंगा यमुना के मैदान में फैले घने जंगलों को साफ कर कृषि योग्य बनाना आसान हो गया इसीलिए समाज की आर्थिक क्रियाएं कृषि के आसपास केंद्रित हो गई। 

कृषि के विकास के साथ साथ ही सामाजिक ढांचे में परिवर्तन आ रहा था। कृषि में उत्पादन करने वाले वैश्य और शूद्र वर्ग के पास धन का अधिशेष अधिक होने लगा। पुरोहित वर्ग और शासक वर्ग के पास इस अधिशेष को हथियाने के लिए संघर्ष बढ़ा। शासक वर्ग ने जहां करों के रूप में कृषक वर्ग से बाह्य आक्रमण से सुरक्षा के आश्वासन के बदले सशस्त्र सेना का गठन किया, वहीं पुरोहित वर्ग ने पारलौकिक मुक्ति और मोक्ष के बदले शासक और कृषि समुदाय से पूजा और अनुष्ठानों के रूप में अपना कर लेना शुरू किया।

शुरू शुरू में तो यह अनुष्ठान छोटे स्तर पर होते थे लेकिन उत्तरोत्तर अनुष्ठानों के आकार और संख्या में वृद्धि होने लगी। यज्ञ अब सामान्य यज्ञ न होकर अश्वमेध यज्ञ और पुत्रेष्टि यज्ञ और अनंत प्रकार के होने लगे। इन यज्ञों में पशु बलि की प्रथा ने विकराल रूप ले लिया। चूंकि कृषि की समस्त क्रियाएं पशुबल के बिना संभव नहीं थी, अत्यधिक पशुबलि के कारण कृषि क्रियाओं पर प्रभाव पड़ने लगा। एक तो वो पहले ही करों के बोझ से दबी थे, कृषि के लिए उपलब्ध पशुओं की संख्या में कमी ने उनकी समस्या दुगुनी कर दी। ऐसी वक्त में ही अनेक संप्रदायों का उद्भव हुआ जिन्होंने पशुबलि के नाम पर होने वाली हिंसा को अनुचित माना। इस बलि की प्रथा से सर्वाधिक प्रभावित कृषक और उत्पादक वर्ग था, इन संप्रदायों की लोकप्रियता कृषक और वैश्य समाज में बढ़ी। चूंकि यह वर्ग समाज में बहुमत में था, इसपर वर्चस्व बनाए रखने के लिए इन संप्रदायों का पुरोहित वर्ग से संघर्ष प्रारंभ हुआ। आगे चल कर कर शासक वर्गों जैसे मौर्य, हरयंक, नंद और शिशुनाग वंश के शासकों ने इन समुदायों को या तो वैचारिक समर्थन दे सुरक्षा प्रदान की या वे स्वयं इसके अनुयायी बने।

ऐसी मान्यता है कि उस काल में कुल पच्चीस से ज्यादा ऐसे संप्रदाय थे, जिनमें जैन संप्रदाय और बौद्ध संप्रदाय सर्वाधिक लोकप्रिय हुए। यद्यपि बौद्ध धर्म और जैन धर्मों के उदय और प्रसार को आप वैदिक धर्म के विरुद्ध एक आध्यात्मिक आन्दोलन के रूप में देख सकते हैं, लेकिन मूल में इन आंदोलनों के कारण आर्थिक थे। कृषि आधारित अर्थ व्यवस्था और पशुबलि के नकारात्मक आर्थिक प्रभावों ने हमें भगवान बुद्ध और महावीर जैन जैसे संत दिए।

बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनाएं। 

Saturday, May 22, 2021

वैक्सीन बनाने के लिए आम सुझाव

कोविड 19 के बीच मेरी दोपहर वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस में आपका स्वागत है। सुबह वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस में मैने आपको बताया था कि covid से लड़ने के लिए मैंने कितने ट्वीट किए, कितने विज्ञापन दिए ।लेकिन जैसा कि आप जानते हैं कि केवल ट्वीट और विज्ञापन से covid से लड़ना आसान नहीं है, इसलिए एक जिम्मेदार मुख्यमंत्री के तौर पर मैं कुछ सुझाव भी दूंगा। Covid से लड़ने के लिए सबसे जरूरी है वैक्सीन। दिल्ली के हर आदमी के लिए हमें तीन करोड़ वैक्सीन चाहिए, वो भी जल्द से जल्द। हो सके तो मेरी अगली प्रेस कांफ्रेंस से पहले। इसके लिए मेरे चार सुझाव हैं केंद्र सरकार को।

पहला सुझाव : देसी वैक्सीन कोवैक्सीन का फॉर्मूला छीन कर दूसरी बाकी दूसरी कंपनी को दे दिया जाय। अगर सरकार को इसमें दिक्कत आ रही है तो मुझे कहे। मैं सतिंदर जैन को भेज कर भारत बायोटेक के दरवाजे के सामने धरना दिलवा दूंगा। देगा कैसे नहीं। उसके बाप का थोड़े है फॉर्मूला। हां उसी के बाप का है लेकिन उससे फॉर्मूला छीन कर उसको मैं अपने बाप का बना लूंगा। उसके बाद केंद्र सरकार सभी कंपनी को आदेश दे कि युद्ध स्तर पर वैक्सीन बनाना चालू करे। चौबीस घंटे में काम शुरू करे। उनको वैक्सीन बनाने के लिए जितनी जगह चाहिए, दिल्ली सरकार देगी। हमारे एमएलए ताहिर हुसैन की छत वैसे भी आजकल खाली है, राम लीला मैदान है वहां पर टेंट गाड़ कर वैक्सीन बना सकते हैं। मैंने इंटरनल सर्वे किया है कि अगर पूरे रामलीला मैदान में वैक्सीन बनाई जाय तो तीन दिन में हम पूरी दिल्ली के लिए वैक्सीन बना सकते हैं। यह सर्वे उसी कमिटी ने किया है जिसे हमको बताया था कि बुलेट ट्रेन का भाड़ा मुंबई से अहमदाबाद का पच्चतर हजार रुपए होगा।

मेरा दूसरा सुझाव : सारी विदेशी वैक्सीन को भारत में परमिशन दे दी जाय। चाहे कोई भी देश हो, सबको परमिशन दे दी जाय। जिनके पास वैक्सीन नहीं भी है उनको भी परमिशन दे दी जाय। जैसे केवल फाइजर की कंपनी को ही क्यों?  गाज़ा पट्टी वाली  कंपनी को भी परमिशन दी जाय। अरे इतने बड़े बड़े रॉकेट बना सकते हैं तो वैक्सीन भी बना ही लेंगे आज नहीं तो कल। अफगानिस्तान, घाना, क्यूबा सबकी कंपनी को परमिशन दी जाय। अगर परमिशन देने में दिक्कत है तो सरकार हमको कहे। मैं सिसोदिया को परमिशन मिनिस्ट्री में मंत्री बना दूंगा। वो और आतिशी मिल कर चौबीस घंटे में सबको परमिशन दे देंगे। 

मेरा तीसरा सुझाव : जितने भी कंपनी है उनसे केंद्र सरकार बात करे। प्रधानमंत्री खुद बात करे। अगर माननीय प्रधानमंत्री जी बात नहीं कर सकते, तो मुझे प्रधानमंत्री बना दें।वैसे भी मैं खाली ही बैठा हूं, कोई विभाग तो है नहीं मेरे पास। चौबीस घंटे के अंदर में सारी कंपनी वालों से बात कर लूंगा, और कंपनी वाले बाद में अपने बात से पलट ना जाएं इसीलिए मैं उनको बिना बताए मीटिंग लाइव टेलीकास्ट कर दूंगा। बाकी अगर कोई मीडिया  में उसपर डिबेट हुई तो राघव चड्ढा को डिबेट में भेज दूंगा। वो सब कुछ स्मूथ ली संभाल लेगा। 

मेरा चौथा सुझाव:  कुछ देश ऐसे हैं जिनके पास एक्स्ट्रा वैक्सीन है , उनसे वैक्सीन मांगने की जरूरत है। यह काम मेरा सोमनाथ भारती कर सकता है। इतने स्पैम ईमेल भेजेगा कि सब लोग चौबीस घंटे के अंदर अपनी सारी एक्स्ट्रा वैक्सीन हमको भेज देंगे। और किस देश ने कितनी वैक्सीन भेजी उसकी लिस्ट हम अपनी पार्टी की वेबसाइट पर डाल देंगे, क्योंकि ईमानदार सरकार। सिर्फ मांगने से अगर काम नहीं चले तो जितने भी विदेशी कंपनी है उनको भारत में वैक्सीन उत्पादन की छूट दी जाय। कंपनी खोलने के लिए जगह तो हम पहले ही दे चुके हैं, अगर उनको वैक्सीन कंपनी के लिए वैज्ञानिक और सीईओ चाहिए तो मैं अपने पुराने दोस्त योगेंद्र यादव से कंपनी का सीइओ बनने की दरख्वास्त करूंगा। वो सब काम कर सकते हैं, वैसे भी छब्बीस जनवरी की ट्रैक्टर रैली के बाद यादव जी अब कुछ नया करियर ट्राय करना चाहते हैं, किसान नेता वाले करियर से स्विच करने के लिए वो बहुत बेताब हैं। 

बाकी मेरी सुझाव मैं अपनी मैटिनी शो वाले प्रेस कांफ्रेंस में दूंगा। कोई गुस्ताखी हुई हो तो माफ करिएगा। अब हम जन वैक्सीन विधेयक के ड्राफ्ट पर काम करने जा रहे हैं। सीसु, अन्ना को फोन लगाओ तो जरा। 

Saturday, May 8, 2021

सुरंग पर काम जारी रखिए

जेल की सुरंग बनने में समय लगता है। आखिर जेल की दीवारें हैं,मोटी तो होंगी ही। ऊपर से आपके पास औजार भी नहीं होते। छुप छुपा कर ही सारा काम करना होता है। धीरे धीरे,लेकिन अनवरत। बिना शिकायत किए। आप किसी चीज की कमी का रोना नहीं रो सकते। कोई सुनेगा नहीं, अगर किसी ने आपके इरादों को भाप लिया तो आपका आधा अधूरा काम भी खतम। बस एक ही चीज की आशा। खुली हवा में फिर से सांस लेने का मौका। धूप को अपने चेहरे पर महसूस करने का सुख। जेल की चहारदीवारी से बाहर बेबस नहीं आशा भरे चेहरों में अपना एक चेहरा शामिल करने का सपना। हां सुरंग बनाते वक्त आने वाले वक्त को महसूस करना ही सुरंग बनाने के लिए ऊर्जा देता है। 
नब्बे के दशक आते आते पंचम दा को काम मिलना करीब करीब बंद हो चुका था। ना किसी नई फिल्म में काम मिलता था और न ही पुराने किसी दोस्त से कोई खास संपर्क बचा था। ऐसे वक्त में उनके हाथ में एक फिल्म आई, 1942 ए लव स्टोरी। ऐसे बुरे वक्त में उन्होंने "यह सफर बहुत है कठिन मगर " ,कुछ ना कहो" जैसे गीत बनाए। जिंदगी के ऐसे वक्त पर जब उनके लिए सब कुछ करीब करीब समाप्त हो चुका था, उनके लिए बहुत आसान था, हार मान के गुमनामी की मौत मरना। लेकिन उन्होंने अपने आप को इस गुमनामी की जेल से बाहर निकाला और जाते जाते खुद को अमरत्व प्रदान करने वाली धुनें बना कर चले गए।
यह सुरंग किसी भी रूप में हो सकता है। पंचम दा के लिए यह उनके अमर संगीत के रूप में था।
हम में हर कोई कभी न कभी किसी ऐसी स्थिति में होता है जब परिस्थितियों की ऊंची ऊंची दीवारों के बीच आपको लगता है कि अब कोई रास्ता नहीं बचा। ऐसे वक्त पर ही सुरंग बनाने का कार्य आपको लड़ने का साहस देता है । यही अदम्य विश्वास कि सारे रास्ते तब तक बंद नहीं होते जब तक आप रास्ता बनाने का साहस रखते हैं। यही अदम्य विश्वास है जिसने दशरथ मांझी के एक छोटे से हथौड़े से पूरा पहाड़ खोद दिया या एंडी डूफ्रेन ने साशंक की जेल से बाहर निकल कर जीहुतनेहो तक की दुर्गम यात्रा की। पांडव भी अगर लाक्षागृह में सुरंग न बनाते तो महाभारत का निर्णायक युद्ध लड़ने से पहले ही हार गए होते। सौरव गांगुली ने कोच ग्रेग चैपल से अपने मतभेद के बाद टीम में वापसी के लिए जो संघर्ष किया वो भी जेल में सुरंग बनाने जैसा ही है।

मतलब यह कि हिम्मत हारना दुनिया का सबसे आसान विकल्प है। कठिन से कठिन असंभव सी परिस्थितियों में भी यह विश्वास बनाए रखना है कि स्थितियों में अब भी परिवर्तन संभव है। सुरंग पर काम जारी रखना है।

Friday, April 30, 2021

ऐ कौवे, तू हमेशा कांव कांव नहीं करता।

 हमेशा कांव कांव नहीं करता कौवा 
छुपा होता है कभी 
उसी कांव कांव में 
 किसी नर कौवे का प्रणय निवेदन
उसी कांव कांव में
 होता होगा किसी 
प्रेमातुर मादा का 
सहर्ष आमंत्रण।

कोयल हमेशा कुहू कुहू 
कर नहीं गाती
कभी उस कुहू कुहू में 
छुपा होता होगा
किसी बच्चे को बुलाती 
मां कोयल का आर्तनाद
उसी कुहू कुहू में 
शायद छुपा होता है
मां का इंतजार करते 
बच्चों की पुकार।

लेकिन हम कौवे की
 हर आवाज को
कांव कांव का शोर कहते हैं।
और कहते हैं कोयल की आवाज को
 एक मधुर गीत
जबकि कोई कोयल जीवन भर 
खुशी के गीत गा नहीं सकती।


तो क्या हम 
कभी भी सुन पाते हैं 
कोयल और कौवे की 
असली आवाज ??
अगर सुन पाते तो 
मादा कौवे का सस्वर प्रेम निमंत्रण 
हमें शोर नहीं लगता
और ना ही मां कोयल का आर्तनाद
 हमें मधुर गीत सुनाई देता।

हम सच में उनकी आवाज
तो कभी सुनते ही नहीं
हम तो सुनते हैं अपने विश्वास,
अपनी परंपराओं 
अपनी मान्यताओं, 
अपने दृष्टिकोण, 
अपनी विचारधारा 
और अपनी मनःस्थितियों
 के सम्मिलित शोर 
से दबी हुई
 कोयल और कौवे की आवाज।

हम बहरे हैं 
जो उनकी असली आवाज को 
सुन नहीं सकते।
क्योंकि हम सिर्फ 
सुन सकते हैं वोही 
जो हम सुनना चाहते हैं
जो हम सुनते आए हैं
जो हम खुद सोच रहे हैं
जो हम सोचते हैं 
कि हम सुन रहे हैं।

 हमेशा कांव कांव नहीं करता कौवा
कांव कांव करती
 है हमारी सोच
कांव कांव करते हैं हम
कुहू कुहू का गीत 
भी थोपा हुआ है हमने
कोयल की हर आवाज पर।

काश कि कभी सुन पाता
 कौवे को
कांव कांव से परे।
कभी सुन पाता कोयल को
कुहू कुहू के परे।
लेकिन उसके लिए 
मुझे जाना होगा 
अपने दायरे से परे।
जो मैं कर नहीं पाता।
मैं, मैं का गुलाम हूं 
ऐसा गुलाम जो एक
चिड़िया की आवाज तक
सुन नहीं सकता।

ऐ कौवे, तू हमेशा कांव कांव नहीं करता।  






Tuesday, April 20, 2021

Dear innovators and creators..

Marconi invented Radio but he  never listened to FM songs and RJs funny jokes, we did. Mozart created timeless musical notes but he never got royalty, many composers across world who copied him made millions. Shakespeare wrote plays which will last till humans last but he never got an Oscar for original screenplay, many others who simply changed the names and settings have cupboards filled of awards. Lata ji sang songs which are product of pure devotion to art of singing but she never made it to Mirchi chartbusters, Neha Kakkar made to those charts by remixing her songs. Tesla innovated so many things but died a pauper and was called an insane person while alive, and now a company named after him has made its owner world's richest man.

Point is that creaters and innovaters seldom get the financial benefits and fame during their lifetime. Still they do their work so that others which include lesser mortals like us can reap the benfit. If you are among the ones reaping the benefits, be grateful to the ones who sow the seed. And if you are among those who are blessed to have the creativity and innovation spark among themselves, don't wait for applauds and applause to come your way, it won't come either. That's how it has been so far and not going to change any time soon. We only can pay respect to you on world creativity and innovation day.

Wednesday, April 7, 2021

Exam warrier tips from other leaders..

Modi ji is giving exam warrier talks to all students. But there are others who couldn't get the chance to address our students. 

Here is the script of 
Exam warrier tips from some other leaders:

Rahul Gandhi: dekho Bhaiya.. Exam ka tension mat lo, marks and results are anyway state of mind. Even if you fail, don't worry. Jab congress ki sarkaar banegi, aapke saath NYAY hoga.

Arvind Kejriwal : baaki desh walon ka pata nahin, lekin mere dilli ke ladke fail ho hi nahin sakte.Sisodia aur Marlena ne mukhyamantri door to door homework banwao yojna ke tahat khud jaaker sabke homework banaye hain.. woh to agar Dilli poorn rajya hota to Sisodia sabka paper bhi likh aata. Aap tension mat lo, 2024 mein AAP poore desh se chunav ladkar poorn bahumat se sarkar banayegi, phir aap sab pass ho jaoge.
Mamata Banerjee : mera pair toot gaya tab bhi main election lad rahi hoon, to tum exam nahin de sakte. Main sarkar se appeal karti hoon ki exam center per CRPF aur central forces ki jagah West Bengal police ka duty ho. Phir tum sab bina exam diye, exam hall se markssheets ke saath passing certificate, ration card aur aadhar card, sab banwa ke de dete. All the best. Jai Bishnu Mata. Haan paper likhne se pahle chandi path jaroor karna.

Akhilesh yadav: Ramzan ke mukaddas mahine mein exam lena fasisct sarkaar ka kaam hai. Hamari samaazwadi soch ke anusar saare exam Ramzan tak postpone kar dena chahiye. Lekin koi baat nahin.. Aap log paper dene topi laga ke jaroor jaana. Khuda hafiz.

Asaduddin Owaisi: Hamare baap dada yeh pak dharti ko chhod kar Pakistan nahin gaye, kyonki hamein is mulk per yakeen tha. Main sarkaar se darkhwast karunga ki har exam mein sirf 15 minute ke liye invigilator hata lo, phir dekhna hamare bachche kaise marks laate hain.

Yogi Aditya nath: Bachchon aap log chinta na karo, jo bhi invigilator bachchon ke saath kadai karenge, unko UP police roadtrip per ghumane le jaayegi. 

Sanjay Raut: Hindu hriday samrat Bala saheb Thackeray ne kaha tha ki agla topper aap hi logon se hoga. Agar aapko kam number ka chance lag raha ho, to aap aapne aage aur peeche wale milkar ek maha aghadi alliance bana ke exam likhna. Phir dekhna aap kaise top karte hain.

Rakesh Tikait: Sarkar yeh exam ka date wapas le, usse kam per ham nahin maanenge. Agar sarkar nahin maanti hai to aap center per tractor se jaana, baaki sab main dekh lunga.

Tejaswi Yadav: Exam dene ka koi fayda nahin hai.. sach bol raha hoon.. Kasam se.. 





Friday, March 26, 2021

mid life crisis

#बाज_का_पुनर्जन्म 

बाज एक ऐसा पक्षी है जिसकी उम्र लगभग 70 वर्ष होती है। परन्तु अपने जीवन के 40वें वर्ष में आते-आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है। उस अवस्था में उसके शरीर के 3 प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं:- पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है, तथा शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं। चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है, और भोजन में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है। पंख भारी हो जाते हैं, और सीने से चिपकने के कारण पूर्णरूप से खुल नहीं पाते हैं, उड़ान को सीमित कर देते हैं।

अब उसे भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना, और भोजन खाना, तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं। अब उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं, कि वह :-

1. देह त्याग दे !!
2. अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे !!
3. या फिर “स्वयं को पुनर्स्थापित" करे !!

आकाश के निर्द्वन्द एकाधिपति के रूप में जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं, अंत में बचता है तीसरा लम्बा और अत्यन्त पीड़ादायी रास्ता। लेकिन बाज चुनता है तीसरा रास्ता और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है।

वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, एकान्त में अपना घोंसला बनाता है और तब स्वयं को पुनर्स्थापित करने की प्रक्रिया प्रारम्भ करता है।

सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार-मार कर तोड़ देता है, चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक कुछ भी नहीं है पक्षीराज के लिये ! और वह चोंच के पुनः उग आने की प्रतीक्षा करता है। उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है, और पंजों के पुनः उग आने की प्रतीक्षा करता है।




नयी चोंच और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक-एक कर नोंच कर निकालता है! और पंखों के पुनः उग आने की प्रतीक्षा करता है। 150 दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा के बाद उसे मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान पहले जैसी।

इस पुनर्स्थापना के बाद वह 30 साल और जीता है। ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ। इसी प्रकार इच्छा, सक्रियता और कल्पना, तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं हम इंसानों में भी !

हमें भी भूतकाल में जकड़े अस्तित्व के भारीपन को त्याग कर कल्पना की उन्मुक्त उड़ाने भरनी होंगी। 150 दिन न सही, 60 दिन ही बिताया जाये स्वयं को पुनर्स्थापित करने में! जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही। और फिर जब बाज की तरह उड़ानें भरने को तैयार होंगे।

इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी, अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी। हर दिन कुछ चिंतन किया जाए और आप ही वो व्यक्ति हैं जो खुद को दुसरो से बेहतर जानते हैं।

Wednesday, March 24, 2021

दास्तां ए चखना

शराब या दारू की एक खास बात होती है। दारू शायद ही अकेले पी जाती है। दारू के साथ चाहिए होता है चखना। बिना चखने के साथ दारू का मजा नहीं। दारू किसी प्राइवेट कंपनी के मालिक की तरह है और चखना उसी प्राइवेट कंपनी के उस मेहनती और जुगाड़ू बंदे की तरह होता है जिसकी हर साल प्रमोशन होती रहती है। चखने का लेवल समय के साथ बढ़ता जाता है। शुरू में चखना मूंगफली और मसाला पापड़ के लेवल में रहता है। धीरे धीरे चखना तंदूरी चिकन के स्तर पर आ जाता है। लेकिन जैसा कि हमने कहा कि चखने का प्रमोशन बहुत जल्दी जल्दी होता है। जल्दी ही चखना तंदूरी के लेवल से ऊपर उठ कर बैंक बैलेंस की शकल ले लेता है। चखने में बैंक बैलेंस की प्लेट खाते समय आपका स्वास्थ्य एक साइड डिश बन जाता है। स्वास्थ्य का साइड डिश खतम होने के  बाद चखने के अगले प्रमोशन की बारी आ जाती है। दारू चखने को प्रमोशन देकर उसे रिश्तों का रूप दे देता है। अगला प्रमोशन पाते ही चखना जले भुने फ्राइड और टूटे स्क्रैंब्ल्ड रिश्तों के रूप में आता है। भुने टूटे रिश्तों वाला चखना खत्म होने के साथ साथ स्वास्थ्य वाला चखना खत्म हो जाता है। 

फिर तो चखने के प्रमोशन की झड़ी सी लग जाती है। फिर चखना प्रमोशन के लिए साल भर का इंतजार नहीं करता। कभी चखना बच्चों की फीस , कभी जमीन और कभी घर की शकल में भुन कर प्लेट में सज कर दारू का साथ निभाने आ जाता है। और जब उससे भी दारू का मन नहीं भरता तो चखना अपना सबसे बड़ा प्रमोशन लेकर जिंदगी फ्राय के रूप में आकर दारू के अंतिम पेग के साथ हलक में उतर जाता है। जिंदगी में प्रोग्रेस करनी है तो चखने से बड़ा आदर्श मिलना कठिन है।

Sunday, March 21, 2021

प्रतिभा और प्रशिक्षण


सत्तर के दशक की घटना है। वो समय जब कार का मतलब एंबेसडर कार हुआ करती थी और आइएएस का मतलब था लाल बत्ती लगी एंबेसडर । शाम की धुंधलके का वक्त हो रहा था। मधुबनी जिला के कलक्टर साब किसी दूर के ग्रामीण दौरे से मुख्यालय लौट रहे थे। अचानक गाड़ी हिचकोले खा के बंद पड़ गई। ड्राइवर ने कहा कि साब घबराने की बात नहीं है, कार की बैटरी डाउन है, कोई धक्का लगा दे तो गाड़ी स्टार्ट होकर मुख्यालय तक पहुंच जाएगी। अब गाड़ी को धक्का लगाने के लिए आदमी चाहिए, कलक्टर साब ने आस पास देखा तो चार लोग आस पास एक मचान पर बैठे ताश खेल रहे थे। डीएम साब ने ड्राइवर को कहा कि जाकर उन लोगों को कहो कि कलक्टर साब की गाड़ी खराब हो गई है इसलिए धक्का लगाने के लिए साहब बुला रहे हैं। ड्राइवर गाड़ी से उतर कर मचान पर बैठे लोगों के पास गया। फिर भागा भागा घबराया सा कार में बैठे साहब के पास आकर बोला। सर वो लोग बोल रहे हैं कि हम कार में धक्का तो लगा देंगे लेकिन अपने साब से यह पूछ कर आओ कि वो किस बैच के आइएएस हैं ताकि हमें भी पता चले कि वो हमसे सीनियर है या जूनियर। मचान पर बैठे ताश खेलते चारों सीनियर आईएएस ऑफिसर उसी गांव के थे जो किसी पारिवारिक समारोह में शामिल होने अपने गांव आये हुए थे।

साल 1986 में शारजाह में भारत पाकिस्तान का मैच चल रहा था। आखिर गेंद पर छह रनों की दरकार थी। बॉलर चेतन शर्मा की गेंदबाजी पर जावेद मियांदाद के लगाए छक्के की टीस आज तक भारतीय क्रिकेट प्रेमियों को सालती रहती है। यह वो दौर था जब भारत पाकिस्तान के मैच रोमांचक हुआ करते थे, आजकल की तरह एक तरफा नहीं। आंकड़ों की बात मानें तो भारत पाकिस्तान से हारता ज्यादा जीतता कम था। 

चाहे क्रिकेट का मैदान हो या आइएएस में आने वाले बिहारी। ना पाकिस्तान का वो जलवा रहा और ना आजकल आइएएस की परीक्षा में बिहारियों का पुराना दबदबा।आखिर क्या बदल गया हालिया वर्षों में।

पाकिस्तान की बात करें तो धन बल और क्रिकेट की आधारभूत सुविधाओं के मामले में पाकिस्तान अन्य देशों जैसे भारत , ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड से कहीं ज्यादा पिछड़ गया है। आतंकवादी घटनाओं के कारण बाकी देशों की टीमें पाकिस्तान का दौरा नहीं करती, इससे वहां के युवा खिलाड़ियों को न विदेशी खिलाड़ियों के साथ का।अवसर मिलता है और ना ही पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड के पास ऐसा पैसा है कि वो आईपीएल की तरह कोई बड़ा आयोजन करके अपने खिलाड़ियों को कोई अवसर दे सकें। बिहार की बात करें तो बिहार की शिक्षा व्यवस्था का उत्तरोत्तर ह्रास होता गया है वहीं बाकी देश की शिक्षा व्यवस्था का विकास  हुआ है।

 हर परिवार से एक आइएएस देने के लिए जाना जाने वाला बिहार आज कल परीक्षा में होने वाली नकल के लिए खबरों में जगह बनाता रहा है। एक तरफ जहां आइएएस जैसी परीक्षाओं में पब्लिक स्कूलों से पढ़े अंग्रेजी माध्यम के छात्रों का प्रतिशत 99 तक पहुंच चुका है और परीक्षा की तैयारी कराने के लिए महंगे कोचिंग संस्थानों का एक तंत्र तैयार है। स्वाभाविक है कि  बिहार की अधिकतर युवा को न अंग्रेजी स्कूलों की यह पढ़ाई मिलती है और ना कोचिंग संस्थानों का लांचिंग पैड। 

किसी भी क्षेत्र में सफलता में दो चीजों का सम्मिलित परिणाम होती है, पहली प्रतिभा और दूसरा प्रशिक्षण। जिसमें प्रतिभा नहीं उसको प्रशिक्षण देकर सफल नहीं बना सकते और बिना प्रशिक्षण के प्रतिभा अपनी क्षमताओं का पूर्ण दोहन नहीं कर सकती। बिहार के लोगों में क्षमता नैसर्गिक है, वे मेहनती हैं, मिलनसार हैं, सहनशील हैं, मृदुभाषी हैं और तीक्ष्ण बुद्धि उन्हें विरासत में मिली है। ऐसा नहीं है कि  बाकी क्षेत्र के लोगों में वो बात नहीं है, बात बस इतनी है कि बाकी लोगों को लगता है कि बिहार के लोगों में इन गुणों की कमी है। बाहरी क्या कभी कभी खुद बिहारी जनों को भी लगता है कि उनमें ही कुछ कमी है, जबकि यह आभासी कमी सिर्फ आधारभूत संरचना और यथोचित प्रशिक्षण की कमी के कारण है।

इन्ही चीजों की लंबे समय से कमी रुपी द्रोणाचार्य ने बिहारी प्रतिभा रुपी एकलव्य का अंगूठा काट लिया है। एकलव्य को उचित प्रशिक्षण मिले तो वो पार्थ पर भारी पड़ने का माद्दा रखता है। बिना प्रशिक्षण के अभाव में वो प्रतिभाशाली ऑफिसर और वैज्ञानिक न बन कर अकुशल मजदूर बनता है जिसे आप छठ के समय बिहार जाने वाली पैसेंजर ट्रेनों में जानवर की तरह ठूस ठूस कर भरा हुआ देखते हैं। याद रखिए कि  लॉक डाउन के समय दिल्ली और पंजाब से सर पर पोटरी उठाकर धूप में पैदल चलती प्रवासी मजदूरों की फौज चाणक्य, सुश्रुत और आर्यभट की संतान है। यह वो ही लोग हैं जो एक एक गांव से पांच पांच आइएएस ऑफिसर दे सकते थे।

आशा है कि इस छोटी सी समस्या को जल्द ही दूर कर हम अपनी प्रतिभाशाली जन सामान्य को वास्तव में मानव संसाधन का रूप देंगे। हमारे प्रयास इस दिशा में हो तो रहे हैं लेकिन उनमें और भी तेजी लाने की नितांत आवश्यकता है। 

बिहार दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।। 

Saturday, March 13, 2021

दिल्ली ऐसी ही नहीं बसती।

दिल्ली ऐसे ही नहीं बसती

इस शहर के बनते हैं किले
किसी पहाड़ का सीना
चीर कर निकाले गए लाल लाल पत्थरों से,
इसकी इमारतें बनती हैं 
किसी खेत की मिट्टी को भट्ठी में
जला कर बनी ईंटों से,
और इन सब को जोड़ने के लिए,
लगते हैं छोटे शहरों के कारीगर,
दूर गांव के मजदूर,
और उनके बसने के लिए,
बनती हैं गंदी बस्तियां
और फिर साथ ही बनती हैं
बदनाम गलियां।

दिल्ली ऐसी ही नहीं बसती।
इस शहर की प्यास बड़ी है
इसीलिए दूर पहाड़ों में 
उछलती कूदती नदियों
को बांधते हैं गारे से पत्थरों से
फिर उसी बांध के 
पीछे कैद नदी को
लोहे की मोटी पाइपों
से दिल्ली लाया जाता है
ताकि भरे जा सकें स्विमिंग पूल
धोई जा सकें बड़ी बड़ी गाड़ियां
बहाया जा सके मल
और धोए जा सकें लाखों शहरियों
के चमचमाते करोड़ों जोड़ी कपड़े।

दिल्ली ऐसे ही नहीं बसती।
इस शहर को चाहिए चमचमाती सड़कें
सड़कों पर दौड़ती कारें,
और उन सड़कों पर 
काली कोलतार बिछाने के लिए चाहिए
काले गंदले चेहरों वाले सस्ते मजदूर,
उन कारों को चलाने के लिए
उनके दरवाजे खोलने के लिए
चाहिए ड्राइवर जो
 आगे वाली सीट पर बैठ
सीधा सड़क पर देखें
जिनको पता हो लेकिन
 जलन बिल्कुल न हो यह जान 
कि क्या चल रहा है
पिछली सीट पर,
जो सड़क पर की हर आहट सुन लें,
लेकिन पूरी तरह बहरे हों अपने
साहब की गालियों से, उनके राज भरी बातों से
ऐसे ही अनगिनत लोगों के पसीने
खून और आंसुओं से पटी
जमीन पर खिलता है मुगल गार्डेन
और बसती है वो रंगीन शाम।

दिल्ली ऐसे ही नहीं बसती।
सिर्फ गांवो को उजाड़ 
वहां के लोगों को उखाड़
उनका पानी छीन
उनके खेत छीन जब
भर जाता है दिल दिल्ली का,
तो यह खुद को उजाड़ती है।
बार बार कई बार
कहते हैं दिल्ली सात बार उजड़ी
सात बार बनी,
पता नहीं क्या है ज्यादा त्रासद
दिल्ली का उजड़ना
या दिल्ली का बनना ?
दिल्ली के उजड़ने पर 
आंसू बहाने वाले मिल जायेंगे
हजारों दस्तावेज हजारों नज़्म
बीसियों कहानियां,
दिल्ली के बनने पर आंसू 
बहाने वाली एक नज़्म नहीं मिलेगी
यही तो खासियत है दिल्ली की
सबको लूट लुटी सी रहती है
सबको रूला रोती रहती है
सबके घर छीन बेघर रहती है
छीन सबका पानी प्यासी रहती है
जिसका हर कोना भींगा है 
खून से, खून से रंगी है हर दीवार
गजलों में फिर भी इसे कहते
बस इश्क मोहब्बत प्यार।

दिल्ली ऐसे ही नहीं बसती।
कैसा होता अगर कि कभी न बनती दिल्ली
तो शायद बच जाती द्रौपदी की लाज
ना गूंजती निर्भया की चीख
और न जलती कोई तंदूर में
ना मारी जाती प्रियदर्शनी
काश कि एक बार उजड़ फिर ना
बसती दिल्ली
तो बच जाते कई उजड़ने से
लेकिन यह दिल्ली है कि 
सबको उजाड़ उजाड़ बसती रहती है
और खुद उजड़ उजड़ फिर बसती रहती है

यही दास्तां है उजड़ने बसने की
आखिर यह दिल्ली है 
और यह दिल्ली
ऐसे ही नहीं बसती।









Wednesday, March 10, 2021

महाशिवरात्रि २०२१

शिव विरुद्धों का सामंजस्य हैं। शिव आदियोगी भी हैं तो पार्वती के साथ दाम्पत्य में भी हैं। भोलेनाथ हैं तो तांडव भी कर सकते हैं। क्रोधित हो बाल गणेश का सर काट सकते हैं तो हलाहल का पान भी कर सकते हैं। देवों के देव महादेव हैं तो रावण के इष्ट भी। रौद्र रूप धारी रुद्र हैं, काल भैरव हैं तो समस्त आयुर्वेद के ज्ञाता वैद्यनाथ भी हैं। त्रिनेत्र खोल कर संहारक बनते हैं तो महाकाली के क्रोध को शांत भी करते हैं। काल जिसका अर्थ समय, मृत्यु, संकट कुछ भी हो, तो शिव स्वयं महाकाल हैं। शिव से परे कुछ नहीं, शिव के सिवा कुछ नहीं ।

महाशिवरात्रि की बहुत शुभकामनाएं। हर हर महादेव।।