Saturday, October 25, 2025

जीवन चक्र

यौवन रात्रि है —
नव ओस से भीगी, स्वप्नों से सजी।
यह रात्रि गंध से भरपूर है,
जैसे किसी कमल पर चाँदनी उतर आई हो।
हर तारा कोई अव्यक्त स्वप्न है, दूर से टिमटिमाता सा
अपनी ओर बुलाता सा।
हवा का हर झोंका है
मानो किसी अदृश्य आलिंगन का निमंत्रण।
मन में लहरें हैं — जो शब्द नहीं जानतीं,
केवल गुनगुनाती हैं,
“मैं हूँ, मैं चाहती हूँ, मैं जीना चाहती हूँ…”

यौवन की यह रात है चपल 
स्पंदित तरंगित विचलित
थिरकती है —जैसे कृष्ण बांसुरी की धुन पर झूमती गोपियां।
इसमें ज्ञान का प्रकाश नहीं,
पर अनुभूति की दीप्ति है।
यह रात्रि प्रेम की है, संगीत की है,
मृगतृष्णा की भी है —
पर मृगतृष्णा भी तो एक सौंदर्य ही है।


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फिर पूरब में अरुणिमा जागती है।
रात्रि की कोमल छाँवें सिमट जाती हैं,
और यथार्थ का सूर्य सिर पर आता है।
अब सपने धरती मांगते हैं,
अब भावना श्रम बनती है।
माँग में सिंदूर नहीं, पसीना भरता है।
प्रेम अब शबनम की नाजुक बूंद नहीं,
खेत की मिट्टी की नमी बन जाता है।
दिन में आँखें खुली रहती हैं,
पर दृष्टि थकी हुई।
अब चाँदनी की शीतलता नहीं,
प्रकाश की तीव्रता है —
जो सुंदर नहीं,
पर आवश्यक है।

यह मध्यवय है —
जहाँ आत्मा तपती है,
शरीर पर हावी होने लगती है जरा
निश्छल चेहरे पर आ जाती हैं
लकीरें निशान और भर चुके घाव के निशान
मानों गुजरते वक्त के छोड़ दिए हों अपने हस्ताक्षर
पर भीतर कहीं रात्रि की कोमल याद 
अब भी ठहरी रहती है।


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धीरे-धीरे दिन ढलता है।
धूप की तीखी रेखाएँ नरम पड़ती हैं।
क्षितिज पर जब सूर्य थककर बैठता है,
तो लगता है — जीवन ने एक लंबा अध्याय पूरा किया।

अब मन में कोई अधूरी चाह नहीं,
केवल स्मृतियों की मृदुल गूँज है।
अब आँखों में तारे नहीं,
पर उन तारों की याद है
जिन्होंने कभी यौवन की रात में साथ दिया था।

सांझ की हवा में एक शांति है —
जैसे कोई दीया अपने अंतिम क्षण में
सबसे उजली लौ बन जाए।
यह सांझ यौवन की वापसी नहीं,
उसकी परिपूर्णता है।

यौवन ने जो स्वप्न देखा,
दिन ने जो कर्म से पूरा किया,
सांझ उसी का सार है —
एक गहरी तृप्ति,
एक मौन प्रकाश।

भोर की कोमल मुस्कान से लेकर
रात्रि की निस्तब्ध शांति तक —
जीवन एक ही दिन है।

हर अवस्था —
भोर, रात्रि, दिन, सांझ —
एक-दूसरे में विलीन।
जैसे लहरें समुद्र से निकलकर
फिर उसी में लौट जाती हैं।
यौवन की रात में आत्मा ने जो जाना,
सांझ में वही आत्मा उसे पहचानती है।
और तब समझ आता है —
जीवन बीता नहीं,
केवल संपूर्ण हुआ है।

Saturday, October 18, 2025

नीले निशान का गीत

देखता हूं —
युवा पीढ़ी को उंगली में स्याही लगा के
सेल्फी लेते हुए।
कैमरे के सामने मुस्कुराते हैं,
जैसे कोई युद्ध जीत आए हों
या जैसे लोकतंत्र
उनकी उंगली पर सिमट आया हो।

पर मैं जानता हूं —
यह स्याही यूं ही नहीं लगती।
इसका रंग बना है
असंख्य शिक्षकों के पसीने से,
जो घर-घर जाते हैं,
नाम पुकारते हैं —
“कहीं कोई मतदाता छूट तो नहीं गया?”

उनके जूतों में धूल है,
पर आंखों में उजाला —
कि नाम जुड़ते रहें
तो देश जुड़ता रहेगा।

इस स्याही में मिला है
उन सिपाहियों का त्याग,
जो अपने घरों से दूर
वीरान स्कूलों में ठहरते हैं —
जहां बिजली नहीं,
पर मच्छर जरूर होते हैं।
वे कहते हैं —
“ड्यूटी इज़ ऑन, सर।”
और उस एक वाक्य में
सारा राष्ट्र गूंजता है।

यह स्याही बनी है
उन अधिकारियों की थकी  सूखी आंखों से
जो भूल चुके हैं
अपना घर, अपनी छुट्टियां, अपनी नींद।
फाइलों के बोझे तले
वे खोजते हैं लोकतंत्र का चेहरा —
हर बार नए नाम से, नई सटीकता से।

और जब कोई युवा
अपनी स्याही लगी उंगली
सोशल मीडिया पर दिखाता है —
मुझे लगता है
जैसे किसी नदी ने
अपना जल लौटाया है बादलों को।

यह स्याही का काला टीका
सिर्फ़ निशान नहीं —
एक वादा है,
एक स्मरण है,
कि हम इस सपने को सहेज कर रखेंगे,
और स्नेह भरा एक दबा सा डर
कि अपनी जम्हूरियत पर
कभी किसी की नज़र न लगे।

हर कुछ वर्षों में
यह स्याही फिर लगनी चाहिए —
जैसे दीपावली में दिया जलता है,
वैसे ही चुनाव में लोकतंत्र।

क्योंकि यही तो वह रंग है
जिससे भरी जाती है आशा की मतपेटी।
हर वोट — एक कली है
जो खिलती है विश्वास के मौसम में
और बनाती है अपना लोकतंत्र का बागीचा।

तो जब उंगली पर स्याही लगे —
थोड़ा ठहर कर देखना,
यह सिर्फ़ नीला काला  रंग नहीं है —
यह मेहनत, यह त्याग, यह उम्मीद का रंग है।

और इस रंग को
बीच-बीच में लगाना ज़रूरी है —
कि याद रहे,
हम अब भी ज़िंदा हैं
एक लोकतंत्र में,
जहां स्याही सूखती नहीं,
बस अगली सुबह तक
सम्भाल कर रखी रहती है।

Thursday, September 25, 2025

अंधा कुआं

कभी सोचा है, ये फिकरा कैसे बना होगा
कि गहरे कुएं को कहते हैं अंधा कुआं।
कुआं अंधा नहीं होता,
गिरने वाले भी आंखों से महरूम नहीं होते,
पर भीतर उतरते ही
नज़रें बेकार हो जाती हैं,
रास्ते बंद हो जाते हैं।

नीचे गिरते लोग
बस अपनी ही आवाज़ सुनते रहते हैं,
प्रतिध्वनि की कैद में
और गहरे धँसते जाते हैं।
किसी और की बात
उनके कानों तक पहुँचती ही नहीं,
क्योंकि उनका सारा अस्तित्व
अपने ही शोर में डूबा होता है।

यही तो है असली अंधापन—
न कहीं जाना,
न किसी और को सुनना,
सिर्फ़ गिरते रहना
और अपनी ही आवाज़ में कैद हो जाना।

Wednesday, September 17, 2025

विश्वकर्मा दिवस पर विशेष


इंजीनियरिंग सिर्फ़ पुलों और मशीनों की नहीं, ज़िन्दगी की जुगाड़ों की भी भाषा है।

बचपन से ही, हम सबों में एक इंजीनियर छिपा होता है। चाहे रेनॉल्ड्स वाली बॉल पेन, जिसने लिखना बंद कर दिया हो, उसकी निब को हथेलियों के बीच रगड़ कर चलाने की जुगत लगाना हो — या उसी कलम के ढक्कन को रबड़ के छल्ले से गुलेल बनाना हो। उसी कलम से टेप रिकॉर्डर में फँसी ऑडियो कैसेट को निकालना हो।

वो हमारे अंदर का इंजीनियर ही था, जो चाहे हाथ-पैर, चेहरा और कपड़े सबमें ग्रीस की कालिख भले ही लगा ले, पर साइकिल की उतरी हुई चेन खुद ही चढ़ाना चाहता था। बड़े होने पर अपनी स्कूटर को टेढ़ा करके स्टार्ट करने की जुगत करता अधेड़ पड़ोसी अंकल भी इंजीनियर ही तो हैं।

उसी बालकनी में खड़ा अंकल का बेटा, जो बेडशीट और चादर को जोड़ उसमें गांठें लगाता है ताकि दोस्तों के साथ रात का शो देखने के लिए बालकनी से उतर सके — यह भी तो इंजीनियरिंग ही है। होली के समय किस गुब्बारे में कितना पानी भरा जाए, किस एंगल से फेंका जाए कि सीधे ‘गया-करने’ वाले अंकल को लगे, ऐसी जुगत लगाने वाले भी इंजीनियर ही हैं।

बुढ़ापे में अपने टूटे चश्मे को ठीक करता वृद्ध, और उसके बगल में बैठे उसकी फटे कुर्ते को रफ़ू कर पहनने लायक बनाती उसकी जीवनसंगिनी — ये दोनों भी तो इंजीनियर का ही काम कर रहे हैं।

इंजीनियर का असली काम यही है: सीमित साधनों में सैद्धांतिक ज्ञान का प्रयोग करके, कम ख़र्च में जीवन को सरल बनाना।
हाँ, इंजीनियर का अपना जीवन भले आसान न हो, पर आपके जीवन को आसान बनाने के लिए वह हमेशा तत्पर रहता है।

उन सभी को सलाम, जो अपने हुनर से दुनिया को बेहतर बनाते हैं।

विश्वकर्मा पूजा की शुभकामनाएँ और इंजीनियर्स डे की हार्दिक बधाई!


Thursday, September 11, 2025

सोशल गुरुकुल

लोग सोशल मीडिया का मज़ाक उड़ाते हैं, पर अगर ग़ौर से देखें तो ये प्लेटफ़ॉर्म ही ज़िंदगी के फ़लसफ़े समझा रहे हैं —

व्हाट्सएप कहता है – “भाई, अपने स्टेटस का घमंड मत कर, मेरी तरह 24 घंटे बाद गायब हो जाएगा!”

इंस्टाग्राम समझाता है – “सबकी ज़िंदगी एक शॉर्ट स्टोरी है, रील भी… कोई यहाँ ‘हज़ारों साल जीने’ का कॉन्ट्रैक्ट लेकर नहीं आया।”

फेसबुक फुसफुसाता है – “अच्छी चीज़ों को लोग पसंद नहीं करते, लेकिन कोई बुराई दिख जाय तो लोग टूट पड़ते हैं। अच्छे से अच्छा कपड़ा पहन के फोटो डालो तो कोई लाइक नहीं, लेकिन अगर उसी कपड़े की सिलाई थोड़ी सी उधड़ गई दिखी तो शेयर पर शेयर होंगे!”

ट्विटर याद दिलाता है – “कोई भी ‘ट्रेंड’ हमेशा के लिए नहीं होता, इसलिए अपना गुस्सा भी 280 कैरेक्टर में समेट लो।”

ज़िंदगी भी किसी यूट्यूब वीडियो जैसी है — बीच-बीच में “दुख” नाम के विज्ञापन आ ही जाते हैं।
तुम चाहे कितने ही अच्छे चैनल पर सब्सक्राइब क्यों न किए हो, ये तो होना ही है। गुस्से में स्क्रीन मत तोड़ो, वीडियो देखना मत छोड़ो, धैर्य से 5 सेकंड रुको… फिर “Skip Ad” का बटन अपने-आप दिखने लगेगा।

और ऑरकुट दादा कह गए थे – “बेटा, प्रोफ़ाइल कितनी भी सजाओ, लेकिन आख़िर में ‘डिलीट अकाउंट’ का बटन दबाना ही है।”


Saturday, September 6, 2025

ट्रंप चचा के नाम एक पत्र

चचा ट्रंप,
पाय लागू। 

ई क्या लगा रखे हो। रोज नया टैरिफ हर घंटे नया ट्वीट। चचा हम लोग भारतीय हैं और भारतीय इतनी आसानी से डरने वाले नहीं हैं। बागी 4, हाउसफुल 5, भूल भुलैया 3 और वार 2 देखकर हम भारतीयों को कुछ नहीं हुआ और तुम्हें  लगता है कि हम लोग टैरिफ से डर जायेंगे। मत भूल ट्रंप हम लोग न्यूक्लियर पावर हैं। हमें न्यूक्लियर पावर इस्तेमाल करने के लिए बाध्य नहीं करो। इधर हमने न्यूक्लियर बटन दबाया नहीं कि बॉलीवुड वाले स्टूडेंट्स ऑफ द ईयर 3 और हाउसफुल 6 बना के न्यूयॉर्क में रिलीज़ कर देंगे। तुम्हारे सिनेमा थियेटर से लोग ऐसे घायल होकर निकलेंगे मानो शिंडलर्स लिस्ट 2 की शूटिंग के बाद जूनियर आर्टिस्ट निकल रहे हों। और यह तो सिर्फ नमूना है। तुम्हारी हुड़कचुल्लू वाली आदतें बनी रही तो भारत वाले विपंस ऑफ मास डिस्ट्रक्शन बनाने में पीछे नहीं रहेगा। 

वह तो हम लोगों का दिल बड़ा है कि हम अब तक तुम्हें इग्नोर कर रहे हैं। नहीं तो देशद्रोही 2, राम गोपाल वर्मा की आग रिटर्न्स, और सड़क 3 : महेश भट्ट स्ट्राइक्स अगेन जैसे weapons off mass destruction बना के तुम्हारे देश में रिलीज़ कर देंगे। कोरोना से तो बच गए क्योंकि वह चाइनीज वायरस था और चाइनीज सामान का वैसे भी कोई गारंटी नहीं होता। हमारे हथियार के भंडार में देशद्रोही 2 और सड़क 3 जैसे खांटी देसी हथियार हैं, इनसे  बच नहीं पाओगे। अभी तो बहुत अंग्रेजी में इधर टैरिफ उधर टैक्स लगाते रहते हो , एक बार किसी का भाई किसी की जान का सीक्वल सिर्फ एनाउंस कर दिया न तो तुम्हारी हालत उस मुकेश की तरह हो जाएगी तो हर फिल्म के शुरू  होने से पहले ही ओरल कैंसर से मर जाता है। 

बाकी तुम बूढ़े हो रहे हो और बूढ़े बुजुर्ग का की हम लोग इज्जत करते हैं। लेकिन अपनी इज्जत अपने हाथ में होती है। जो भी तुम्हारी इज्जत बची खुची है, उसको भी बर्बाद करने के लिए विवेक अग्निहोत्री को बोल कर द डोनाल्ड ट्रंप फाइल्स नाम से फिल्म बनाने से कोई हमें रोक नहीं सकता। एक बार द डोनाल्ड ट्रंप फाइल्स वाली फिल्म वाशिंगटन में रिलीज़ हो गई तो तुम्हारी भी उतनी ही इज्जत बचेगी जितनी बोलो जुबां केसरी का विज्ञापन करने के बाद अजय देवगन की बची है। देवगन साब से याद आया सन ऑफ सरदार 3 से अगर बचना है तो सुधर जाओ और यह टैरिफ वाला खेला बंद करो। तुम्हारा  यह टैरिफ वाला खेला उतना ही दिन चलेगा जितने दिन आमिर खान और ट्विंकल खन्ना की फिल्म मेला सिनेमाघरों में चली थी। 

अगर मेला 2 के कहर बचना है , तो ध्यान से सुनो। हम लोग सिर्फ मदर इंडिया और लगान बनाने वाले देश नहीं है, हमारा गुस्सा मत जगाओ। याद रखना हमारे डायरेक्टर्स साजिद खान, कांति शाह ने फिल्म बनाना छोड़ा है , वो फिल्म बनाना भूले नहीं हैं। अब मैं चला अकेले थिएटर में बैठकर बागी 4 देखने। आशा करता हूं कि जिस प्रकार देर से ही सही लेकिन टाइगर श्रॉफ की थोड़ी थोड़ी दाढ़ी आ गई है, तुम्हें भी देर सबेर अकल आ ही जाएगी। 

तुम्हारा शुभचिंतक,
एक साधारण बॉलीवुड फैन

Thursday, September 4, 2025

शिक्षक दिवस पर विशेष

धरती पर सबसे ज्यादा पानी किसके पास है? आप कहेंगे सागर में। क्या आप उसका पानी पी कर अपनी प्यास बुझा सकते हैं? उत्तर होगा नहीं। उसका पानी तो। खरा है और खरा पानी पी नहीं सकते। अच्छा तो आप खारा पानी नहीं पी सकते। पीने के लिए तो मीठा पानी चाहिए। कोई बात नहीं सबसे बड़ा मीठे पानी का स्रोत क्या है? बहुत सारे हैं , भादो का महीना है तो चलिए मान लेते हैं बादल और मानसून। आपको अभी प्यास लगी है , कहिए मानसून को कि आपको एक ग्लास पानी पिला दे। आप कहेंगे कि पागल हो गया है क्या? बादल आपको कहीं एक ग्लास पानी देगा। उसको बोलना भी मत, कहीं फट गया तो तुम और तुम्हारा ग्लास कहीं बह के चल जाएगा, पता भी नहीं चलेगा। मीठे पानी वाला बादल कितना मीठा होता है वो हिमाचल वालों से जाकर पूछ लो।

चलिए गणित की ही बात करते हैं। सबसे बड़े गणितज्ञ कौन हुए हैं? फ्रेडरिक गॉस, पाइथागोरस, आर्यभट ,  रामानुजम ?? तो बताइए कि आपने कितनी बार गणित सीखने के लिए रामानुजम की किताब पढ़ी है या सीधे आर्यभट के लिखे संस्कृत के ग्रंथों का अध्ययन किया है। आप कहेंगे कि आज क्या बेतुके सवाल पूछ रहा है? रामानुजम का तो मैने नाम सुना है बस, गणित तो मैने अपने मैथ्स सर से सीखा है। थोड़ा गुस्सैल थे लेकिन जो भी सीखा उन्हीं से सीखा। वैसे ये गॉस कौन था, नाम सुना सुना लग रहा है।

Exactly.... शिक्षक किसी विषय का सबसे ज्ञानी व्यक्ति नहीं होता। न ही सबसे नामी व्यक्ति होता है। जिस प्रकार भूख मिटाने के लिए मां के हाथ की दो रोटी चाहिए होती है ना कि गीदम में रखे गेहूं के बोरे। वैसे ही प्यास तो घर का छोटा सा नल ही बुझाता है , न कि मानसून और समंदर।

शिक्षक उसी मां के हाथ की बनी रोटी और घर के नल की तरह है जो आपकी भूख और प्यास बुझाता है।
शिक्षक  जीवन ज्ञान और उसके निहित दर्शन को आपके सामने सरलतम रूप में , ग्राह्य रूप में आर सुपाच्य रूप में आपके सामने प्रस्तुत करता है। यही मानव सभ्यता के विकास का आधार है। ज्ञान और जीवन अनुभवों का सतत , सुगम , सरल और सुग्राह्य रूप में प्रवाह।

सभी शिक्षकों को शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं।
 


Sunday, August 31, 2025

अब क्या बेच कर सोएं?















Wednesday, August 27, 2025

1893 : भारतीय आत्मजागरण का वर्ष



पहली कहानी – पीटर मार्टिजबर्ग स्टेशन , दक्षिण अफ्रीका की रात

दक्षिण अफ्रीका की एक ठंडी रात। प्रिटोरिया जाने वाली ट्रेन के डिब्बे में एक नौजवान बैरिस्टर अपने रिज़र्व्ड टिकट के बावजूद धक्का देकर बाहर फेंक दिया जाता है—केवल इसलिए कि उसकी त्वचा सांवली है। प्लेटफॉर्म की सर्द हवा में पड़े मोहनदास करमचंद गांधी के भीतर कुछ टूटता नहीं, बल्कि कुछ नया जन्म लेता है। उसी रात बैरिस्टर गांधी से महात्मा गांधी बनने का बीज फूटता है।
"अन्याय के आगे झुकना भी अन्याय है,
और अन्याय से लड़ना ही सच्चा न्याय है।"

दूसरी कहानी – शिकागो का मंच
उधर, समुद्र पार अमेरिका में शिकागो की Parliament of Religions में एक दुबला-पतला, तेजस्वी संन्यासी नरेंद्र खड़ा है।
“Sisters and Brothers of America…”
यह संबोधन सुनकर हॉल तालियों से गूंज उठता है। यह नरेंद्र अब केवल नरेंद्र नहीं रहता—स्वामी विवेकानंद बन जाता है, जो भारत की आत्मा को पूरी दुनिया के सामने गर्व से प्रस्तुत करता है।
"न स्वयं पतन्ति, न सतां समीपात् पतन्ति —
जो स्वयं ऊँचाई पर होते हैं, वे दूसरों को भी उठाते हैं।"

तीसरी कहानी – पुणे की गलियां
इधर भारत में, पुणे की तंग गलियों में लोकमान्य तिलक गणेश चतुर्थी को घर की पूजा से बाहर निकालकर जन-जन का उत्सव बना रहे हैं। वह लोगों को प्रेरित करते हैं कि घर के छोटे से पूजा घर की जगह गणपति की पूजा बड़े बड़े सार्वजनिक पंडालों में की जाय। उनका मकसद केवल पूजा नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति की मशाल जलाना है। गणपति बप्पा की प्रतिमा के सामने देशभक्ति के गीत गूंजते हैं, व्याख्यान और नाटक होते हैं, लोग संगठित होते हैं। यही वह बीज है जिससे आगे चलकर आज़ादी का विराट वृक्ष पनपता है।
"वन्दे मातरम् के स्वर जहाँ गूँजते हैं,
वहीं से स्वराज्य का सूर्योदय होता है।"

तीन कहानियां, एक ही साल – 1893

1893 कोई साधारण वर्ष नहीं था।

पीटरमार्टिजबर्ग की रात ने हमें सत्याग्रह का संकल्प दिया। “अहिंसा ही सबसे बड़ा शस्त्र है"।

शिकागो के मंच ने हमें आत्मगौरव का संदेश दिया। “उठो, जागो और अपने महान् होने का बोध करो।”

पुणे की गलियां ने हमें संगठित राष्ट्रवाद का मार्ग दिया । “धर्म और संस्कृति से बड़ा प्रेरणा स्रोत कोई नहीं।”

यह वह साल था जब भारत ने महसूस किया कि वह केवल सोने की चिड़िया नहीं, बल्कि जीवित आत्मा है।

"स्वत्व जागरणे राष्ट्रं जागरति।
जब व्यक्ति अपनी शक्ति पहचानता है, तब राष्ट्र भी जाग उठता है।"

आज जब पूरा राष्ट्र गणेश चतुर्थी मना रहा है, तो स्वाभाविक है कि इसके स्वरूप को बदलने वाले बाल गंगाधर तिलक को भी प्रणाम करें। प्रणाम करें स्वामी विवेकानंद को और राष्ट्रपिता को। एक तरह से देखें तो सबका जन्म 1893 में ही हुआ। 
 
गणपति बप्पा मोरया! मंगलमुर्ति मोरया!  

गणेश चतुर्थी की  हार्दिक शुभकामनाएं।।

Saturday, August 23, 2025

परदा है... परदा है परदा...

परदा भी बड़ा दिलचस्प आविष्कार है। किसी ने कपड़ा लिया, डोरी पर टांगा, और अचानक ही ज़िंदगी रहस्यमयी हो गई। नाटक हो या हकीकत — परदा उठते ही अभिनय शुरू, परदा गिरते ही असली चेहरे वापस।

पर्दाफ़ाश करने वालों को बड़ा शौक़ है। उन्हें लगता है कि हर परदे के पीछे कोई गुप्त साज़िश पक रही है — जैसे बिरयानी के भगोने में मसाला। असल में वे चाहते हैं कि सब नाटक करें। जब तक परदा गिरा है, लोग अपनी पुरानी चप्पल पहनकर घूमते हैं; जैसे ही परदा उठता है, वे चमचमाते जूते में सजधजकर बाहर आ जाते हैं।

और फिर हैं पर्दानशी लोग। जो कहते हैं, “हम परदे के पीछे हैं… मगर हमें मत देखो, लेकिन परदे के पीछे से हम आपको जरूर देखेंगे ।” यह वैसा ही है  कि चचा ट्रंप कहें कि हम पुतिन से तेल खरीदेंगे लेकिन अगर तुम खरीदो तो तुम्हारा तेल निकाल देंगे।

फैशन जगत का भी अपना नज़रिया है। Devil Wears Prada जैसी फिल्म साफ़ बताती है — शैतान भी अगर फैशन में आए, तो परदा पहन लेता है। प्राडा का परदा तो ऐसा होता है कि उसमें झाँकने के लिए वीज़ा और आधार दोनों चाहिए। सोचिए, अगर आम घरों में ऐसे परदे लग जाएँ, तो पड़ोसी भी यह तय नहीं कर पाएंगे कि आप चाय पी रहे हैं या दुनिया की अर्थव्यवस्था हिला रहे हैं।
राजनीति में तो परदा कभी छुट्टी पर नहीं जाता। कोई बोले तो कहा जाता है — “देखो, पर्दे के पीछे कुछ है।” कोई चुप रहे तो कहा जाता है — “देखो, पर्दे के पीछे बहुत कुछ पक रहा है।” लोकतंत्र में परदा एक तरह से रिमोट कंट्रोल है — बस चैनल बदलते रहिए, शो चलता रहेगा।

और अब आते हैं उस पुराने गीत पर —
“पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ…”
शायद गीतकार ने जनता को चेतावनी दी थी — “देखो, अगर पर्दा उठाया, तो नाटक शुरू हो जाएगा, और टिकट भी खुद खरीदनी पड़ेगी।”

लेकिन याद आता है एक और गीत कि "पर्दानशी को बेपर्दा न कर दूं तो अकबर मेरा नाम नहीं है"। जहां एक तरफ दूसरे के परदा हटा देने के दंभ भरने वाले अपने आप को अकबर कहते रहे हैं वहीं हालिया सुर्खियां बताती हैं कि अकबर महान के ऊपर भी पड़े परदे को खींच डालने की सारी तैयारी कर ली गई है।

तो जनाब, परदा गिरा रहने दीजिये या उठा दीजिए। कुछ भी करिए, परदा है तो कुछ न कुछ मनोरंजन होता ही रहेगा। क्योंकि परदा है तो जिंदगी गर्दा है। 

Friday, August 8, 2025

नायक मरते नहीं

नायक मरते नहीं।
वे बस… जीते रहते हैं—
एक लंबा, अनथक जीवन,
जिसमें मृत्यु
भी एक विलास है।

भीष्म की तरह
वे उठाए रहते हैं
भाइयों का भार।
अंबा का शाप
उनके भीतर धड़कता है।
अर्जुन के बाण
रक्त से नहीं,
समय से घायल करते हैं।

वे सहते हैं —
वृहन्नला का अपमान,
लक्षगृह की आग,
अभिमन्यु का न लौटना।

धर्म —
उनके हाथ में एक कसक है,
जिससे वे द्रोण को छलते हैं,
और सिर झुकाकर
गांधारी की आँखों में
अपने लिए राख देखते हैं।
नायक राजा नहीं होते।
वे यात्राएँ होते हैं —
लंबी, कठिन,
जिसमें किसी भी मोड़ पर
गंतव्य नहीं।

इच्छा-मृत्यु?
हाँ।
पर इच्छा अधूरी—
और मृत्यु
बस टलती हुई।

Thursday, July 31, 2025

दो अलग यात्राए... ं एक समान लक्ष्य

सुबह 4:10 बजे — वर्ष 2019, नवंबर 24..= दिल्ली एयरपोर्ट।

ऑफिस के काम से तिरुवनंतपुरम जाना था — एक महत्वपूर्ण बैठक थी। वही सुबह उठकर फॉर्मल कपड़े पहनना, अपना लैपटॉप बैग लेना और साथ में एक टाई रख लेना जो मीटिंग से पहले गले में डाल सकूं।
मैं हमेशा की तरह समय से तीन घंटे पहले एयरपोर्ट पहुँच गया, कैपुचीनो के साथ लैपटॉप खोल कर ईमेल खंगाल रहा था और प्रेजेंटेशन में फाइनल टच दे रहा था।
तभी देखा — श्रीनिवासन सर, हमारे डायरेक्टर साहब… पर वो जैसे पहले कभी दिखे ही नहीं थे।
नंगे पाँव।
काले कपड़े।
गले में रुद्राक्ष, माथे पर चंदन। एक पल को लगा, शायद किसी धार्मिक सीरीज़ की शूटिंग कर रहे हैं।
लेकिन नहीं। वे गंभीर थे, शांत थे, और भीतर से बेहद प्रसन्न दिख रहे थे। "सर?" मैंने चौंकते हुए कहा।
उन्होंने मुस्कराकर सिर झुकाया।
"सबरीमाला," उन्होंने धीरे से कहा।
"स्वामी अय्यप्पा का बुलावा आया है। 41 दिन का व्रतम पूरा हुआ, अब यात्रा के अंतिम चरण पर हूँ।"

मैं सन्न रह गया।
एक कॉरपोरेट वर्ल्ड का सख्त, प्रोसेस-ड्रिवन व्यक्ति, जो रोज़ KPI और ROI में उलझा रहता है…
आज एक श्रद्धालु बनकर मेरे सामने खड़ा था — वह भी नंगे पाँव।

मैं पूरी फ्लाइट में सोचता रहा —
कौन सा बल होता है, जो इंसान को इस तरह बदल देता है? उस दिन पहली बार सबरीमाला की कठिन यात्रा के बारे में उनसे सुना और जान कर भक्ति रस में सराबोर हो गया।

सालों बाद आज 31 जुलाई 2025 में— ट्रेन में, पटना से भागलपुर जा रहा हूं। बहुत कुछ बदल गया है इस बीच में। कॉर्पोरेट जीवन को विदा कह चुका हूं। अब बिहार में बस गया हूं। पर बिहार से बाहर रहने के बाद बिहार अब भी चमत्कृत कर जाता है।

सावन भले ही अपने आखिरी चरण में हो, सावन के भक्त गण बोल बम कांवड़िए अपने पूरे उफान पर हैं। पूरी ट्रेन जैसे भगवा में रंग गई हो। "बोल बम" के नारे किसी राग की तरह गूंजते हैं।

मुझे बिहार में जन्मे हुए चार दशक हो चुके हैं।
कांवड़ यात्रा मेरे लिए कोई नई बात नहीं —
पर इस बार कुछ बदल गया है।
शायद नज़रिया।

मेरे सामने एक कांवड़ियों का जत्था बैठा है।
सिर पर गमछा, कंधे पर कांवड़, पैरों में छाले…
फिर भी चेहरों पर थकान नहीं — एक संतोष है, उत्साह है।
तभी मेरी आंखें उस पल से टकराईं, जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता —एक दृष्टिबाधित कांवड़ियों का जत्था।
एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर चलने वाले वो श्रद्धालु —
जिनकी आंखें नहीं थीं, लेकिन आस्था की रोशनी उनमें इतनी थी, कि रास्ता खुद उनके लिए झुककर बन रहा था। मैं देर तक उन्हें देखता रहा।

एक किशोर लड़का एक वृद्ध को थामे चल रहा था।
शायद वही उनका "नेता" था।
उनकी कांवड़ें कपड़े से सजी थीं — किसी ने उनके माथे पर “ॐ नमः शिवाय” का अस्थाई ही सही चंदन वाला टैटू बना रखा था। मुझे अपने बचपन के वो दिन याद आ गए, जब हमारे गांव में भी कांवड़ियों का जत्था रुकता और पूरा गांव उनकी सेवा में लगा रहता।

 हर हर महादेव का स्वर पूरे गांव में गुंजायमान रहता।
मैं उनके साथ गंगाजल भरता, और सोचता —
क्या भगवान सच में इतने दूर हैं कि इतने लंबे सफर की ज़रूरत है?
आज समझ में आया —
सफर भगवान के लिए नहीं होता… अपने भीतर के विश्वास तक पहुँचने के लिए होता है।
आज मन भीतर से भीगा है।
मैंने दो यात्राएं कीं —
एक कॉरपोरेट डायरेक्टर के साथ सबरीमाला की ओर,
और एक गरीब, दृष्टिहीन बालक के साथ देवघर की ओर।

पर दोनों यात्राओं में एक ही बात समान थी —
श्रद्धा, जो न उम्र देखती है,
न भाषा, न शरीर की सीमा।

भारत सिर्फ एक भूगोल नहीं है,
यह भक्ति का एक जीवित नक्शा है —
जहाँ हर रास्ता कहीं न कहीं ईश्वर की ओर ले जाता है।

Sunday, July 20, 2025

ब्लिंकिट जेनरेशन और धैर्य का संकट

वीरता, शक्ति, चातुर्य और बुद्धिमत्ता – ये वे गुण हैं जिनकी चर्चा इतिहास से लेकर आज तक होती रही है। शेर को जंगल का राजा भी इन्हीं खूबियों के कारण कहा जाता है। लेकिन जो बात अक्सर अनदेखी रह जाती है, वह है शेर का धैर्य। एक सफल शिकार के बाद अगला शिकार कब और कैसे मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। शेर घंटों, कभी-कभी दिनों तक घात लगाकर शिकार की प्रतीक्षा करता है – बिना हिले, बिना आवाज किए। यह धैर्य ही उसकी ताकत का सबसे बड़ा प्रमाण है।

इतिहास के पन्नों में महाराणा प्रताप का नाम वीरता के लिए स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है। लेकिन क्या हम यह याद रखते हैं कि हल्दीघाटी की हार के बाद भी वे अकबर के खिलाफ लड़ते रहे? क्या हमें यह याद रहता है कि शिवाजी के हिंदवी स्वराज्य का सपना उनकी मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारियों ने पूरा किया? यह सब केवल पराक्रम या योजना का परिणाम नहीं था, बल्कि गहन और अडिग धैर्य की देन था।

आज की पीढ़ी तकनीक से सम्पन्न है। विज्ञान उन्हें थाल में सजा कर परोसा गया है। सूचना और ज्ञान कभी इतने सहज, इतने सुलभ नहीं रहे। लेकिन इस सहजता ने एक नई प्रवृत्ति को जन्म दिया है – अधीरता की प्रवृत्ति। Blinkit जैसी सेवाएं 10 मिनट में सामान घर पहुंचाती हैं, इंस्टाग्राम हर पल के अपडेट देता है, और व्हाट्सएप की नीली टिक ने प्रतीक्षा को असहज बना दिया है। जो चाहिए, वही चाहिए और अभी चाहिए — यह मानसिकता गहराती जा रही है।

हमारे समय में, दूरदर्शन के 'चित्रहार' और 'रंगोली' जैसे कार्यक्रमों को देखने के लिए लोग पूरे सप्ताह इंतजार करते थे। घरों में पोस्टकार्ड और अंतर्देशीय पत्र आते थे जिनका इंतजार हफ्तों तक किया जाता था। किसी जानकारी के लिए हमें ChatGPT पर एक सेकेंड में उत्तर नहीं मिलता था, बल्कि पुस्तकालयों की धूल भरी आलमारियों को खंगालना पड़ता था। यह इंतजार ही उस ज्ञान, सुख और आनंद को चिरकालीन बना देता था — क्योंकि उस तक पहुँचने की यात्रा में धैर्य, परिश्रम और एक विशेष भावनात्मक जुड़ाव होता था।

रिसर्च बताते हैं कि मोबाइल और इंटरनेट का अत्यधिक प्रयोग किशोरों और युवाओं में त्वरित संतुष्टि (instant gratification) की भावना को जन्म दे रहा है। 2023 में American Psychological Association ने एक रिपोर्ट में उल्लेख किया कि स्मार्टफोन पर बिताया गया अत्यधिक समय युवा मस्तिष्क में डोपामिन सेंसिटिविटी को प्रभावित कर रहा है, जिससे धैर्य और सहनशीलता में गिरावट आ रही है।

इसका प्रभाव केवल मानसिक स्वास्थ्य पर नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना पर भी दिख रहा है। रिश्ते छोटे-छोटे विवादों में टूट जाते हैं, परिवार संवाद की बजाय स्क्रीन पर निर्भर होते जा रहे हैं। WHO की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में भारत में 15-29 आयु वर्ग के युवाओं में आत्महत्या मृत्यु का प्रमुख कारण बन गया। यह केवल मानसिक अवसाद का नहीं, बल्कि असमर्थ धैर्य का भी सूचक है।

शैक्षणिक क्षेत्र में भी इसका प्रभाव दिख रहा है। इस संदर्भ में वेब सीरीज़ Aspirants का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा, जिसमें 'धैर्य' नाम की एक महिला पात्र है। दिलचस्प बात यह है कि 'धैर्य' केवल एक नाम नहीं, बल्कि प्रतीक भी है – प्रतीक उस गुण का, जो किसी भी प्रतियोगी की सफलता की रीढ़ होता है। एक पात्र जो अंततः IAS बन जाता है, लेकिन वह अपने भीतर की अधीरता को कभी त्याग नहीं पाता। नतीजा यह होता है कि 'धैर्य' नाम वाला पात्र उससे अलग हो जाता है। यह रूपक हमें यह समझाने के लिए काफी है कि अगर चरित्र से धैर्य चला जाए, तो सफलता भी अधूरी और अस्थिर हो जाती है।

NEET और JEE जैसी परीक्षाओं में सफलता एक लंबी और चुनौतीपूर्ण यात्रा होती है, जिसमें वर्षों की मेहनत, निरंतरता और आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है। हाल के वर्षों में इन परीक्षाओं की तैयारी कर रहे कई छात्रों द्वारा आत्महत्या की खबरें हमें झकझोर देती हैं। 2023 में कोटा (राजस्थान) में अकेले 25 से अधिक छात्र आत्महत्या कर चुके थे। यह आँकड़ा केवल परीक्षा के दबाव का नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक सहारे की कमी और धैर्य की अनुपस्थिति का भी प्रमाण है। जैसे-जैसे प्रतियोगी परीक्षाएं कठिन होती जा रही हैं, वैसे-वैसे छात्रों का धैर्य भी टूटता जा रहा है। 

सवाल यह है – हम क्या खो रहे हैं?

हम वह धैर्य खो रहे हैं जो किसी विराट लक्ष्य की बुनियाद बनता है। हम वह इंतजार भूल रहे हैं जिसमें चरित्र निर्माण होता है। हम उस सहनशीलता को नजरअंदाज कर रहे हैं जिसने हमारे इतिहास को गौरवशाली बनाया है।

लेकिन अभी सब कुछ नहीं खोया है। नई पीढ़ी जिज्ञासु है, सीखने को तत्पर है और बदलाव के लिए तैयार है। ज़रूरत है कि हम उन्हें धैर्य की कीमत समझाएं – न केवल उपदेशों से, बल्कि उदाहरणों से। शिक्षा प्रणाली में माइंडफुलनेस और मेडिटेशन को शामिल करना, डिजिटल डिटॉक्स की संस्कृति को बढ़ावा देना और धीमी लेकिन स्थायी सफलता की कहानियों को मंच देना आज की आवश्यकता है। कोटा प्रशासन द्वारा 'हेलो कोटा' हेल्पलाइन, दिल्ली के स्कूलों में 'हैप्पीनेस करिकुलम' जैसी पहलें इस दिशा में सकारात्मक संकेत हैं।

अंत में, यह याद रखना ज़रूरी है कि हर सफलता के पीछे धैर्य की लंबी छाया होती है। शेर की तरह, जो हर दहाड़ से पहले घात लगाकर इंतजार करता है — हमारी जीत भी तभी मुखर होती है जब हमने उसे धैर्य के जंगल में खोजा हो।

अगर हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ न केवल स्मार्ट हों, बल्कि स्थिर और सशक्त भी हों, तो हमें उन्हें धैर्य का महत्व सिखाना ही होगा – वरना Blinkit की तर्ज पर जीवन से भी "Delivery Failed" का संदेश आ सकता है। 

सावधान रहें, सजग बनें – लेकिन आशा मत छोड़ें।

धैर्य की यात्रा कठिन जरूर है, लेकिन अंततः वही सबसे स्थायी फल देती है।

जैसे संत कबीर ने कहा है:

"धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।" फिल्म Shawshank redemption में रेड का चरित्र कहता है, Oh, Andy loved geology. I imagine it appealed to his meticulous nature. An ice age here, million years of mountain building there. Geology is the study of pressure and time. That's all it takes, really. Pressure, and time... इस संवाद में धैर्य की ही तो बात की गई है।


यह दोहा केवल खेत या फल की प्रतीक्षा नहीं, बल्कि जीवन की हर सफलता की प्रतीक्षा को दर्शाता है। जब हम समय, धैर्य और निरंतरता के साथ किसी लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं, तभी उसका फल संपूर्णता और स्थायित्व के साथ प्राप्त होता है।