Sunday, March 24, 2024

चंदे की चांदनी

आसमां में खरबों तारे हैं, अरबों ग्रह हैं , असंख्य उल्का पिंड हैं लेकिन मानव है कि उसको पसंद आता है चंदा। कवियों की कल्पना हो, या मां की लोरी, हर जगह चंदा ही छाया रहता है। चंदा चीज ही ऐसी है, दुनिया के जले हुए दिलों को शीतलता प्रदान करता है। दुनिया भर के प्रेमी जानते हैं कि प्रेयसी को दिल देना काफी नहीं होता। हर प्रेयसी चाहती है कि उसको प्रेमी चंदा लाकर दे। बिना चंदा सच्चा प्यार की कल्पना भी असंभव है। लेकिन चंदे का क्या है कि हमेशा एक सा नहीं मिलता। चंदे की कलाएं ही ऐसी हैं कि चंदा घटता बढ़ता रहता है। कभी बढ़ भी गया तो जलने वाले लोग कहने को आ जाते हैं कि चार दिन की चांदनी। और चंदा ना मिले तो कहते हैं कि आ गई ना अंधेरी रात।

 यह चंदा ही है जो अंधियारी रातों को रोशन कर रोमांटिक बनाता है। चंदा ना मिले तो प्रेमिका अमावस की चुड़ैल लगने लगती है, यही चंदा मिल जाए तो चौदहवीं का चांद हो जैसे गीत गुनगुना उठता है आदमी। आदमी को चाहिए चंदा, चाहे कोई भी पर्व हो , बिना चंदे के अंधेरा है। फिर महापर्व में मिलने वाला तो चंदा तो महा चंदा हुआ ना। चंदा है कि जिसको मिल गया वो वो खर्चा करता है और हम जैसों जिसको चंदा ना मिला, वो बस इसकी चर्चा ही कर सकता है।
मतलब यह कि आपको चंदा मिले या न मिले, कम मिले, ज्यादा मिले, फरक नहीं पड़ता, आप चंदे की जद से दूर नहीं जा सकते । 
जिसको चंदा दिख गया, उसकी हो गई ईद और जिसको चंदा ना मिला उसके रोजे जारी रहते हैं। चंदा मिल गया तो दिल का कमल खिल जाता है , जिसको ना मिला वो हाथ मलता रह जाता है। बस इतना ही कहना था चंदा के बारे में। बाकी आप सबको होली की शुभकामनाएं। 

Monday, March 18, 2024

देहाती फूल और कांटे

फूल और कांटे सुन कर आपको भले अजय देवगण का बाइक वाला स्टंट याद आता हो, या अगर बॉलीवुड की मसाला फिल्मों से इतर वाला आपका टेस्ट है तो शायद निराला की अबे सुन बे गुलाब याद आता हो या शायद गुलाब का कोई पौधा याद आ जाता है, मुझे तो यह वाला पौधा याद याता है। 

ये वाला इसीलिए कि इसका नाम मुझे पता नहीं। कभी पूछा नहीं किसी से, शायद किसी से इसका नाम भी नहीं रखा। नामवर यह पौधा कभी नहीं रहा क्योंकि इसने उसने किसी की मंहगी खाद नहीं ली और न ही किसी ने इसको पाइप से पानी पिलाया। किसी के अचकन की जेब में टांक दिए जाने का खूबसूरत ख्वाब भी इसने कभी नहीं देखा।

हां लेकिन गांव के बच्चों ने इसकी फूल की पंखुड़ी को होठों से लगा कर सीटियां खूब बजाई हैं। वसंत में खिलने वाले फूलों में इसका नाम शुमार तक नहीं किया गया है, शुमार भी तब हो जब नाम रखा जाय। लेकिन हमारे बचपन का अभिन्न अंग रहा है यह पौधा। हमारे गिल्ली डंडा के मैदानों का प्रहरी और हमारा दर्शक। पतंग लूटने के लिए बच्चों को आसमान की तरफ निगाह करके दौड़ते देख कर यही उनके पांवों के नीचे आकर उनको सचेत करता कि बच्चे थोड़ा रास्ता देख कर चलो। बहती पछुआ हवाओं के साथ इसके उड़ते पंखुड़ी लोगों को याद दिलाते कि जीवन में वसंत भले ही चला गया हो, गर्म हवाओं में भी खुशबू और नरमी फैलाने का प्रयास रुकना नहीं चाहिए। और इसके फलों के अंदर छिपे अनगिनत बीज सूख करबाइसे बिखरते मानों दादी मां के आंचल में बंधे पैसे बिखर रहे हों। 

आज बहुत दिनों बाद नजर आए तुम। आगे क्या कहूं, क्या पूछूं। आज तक नाम भी तो नहीं बताया तुमने!!! 

Sunday, March 10, 2024

चरैवेति

शिखर पर पहुंच कर नीचे उतरने का क्रम प्रारंभ होता है। मंजिल पर पहुंच वापसी का सफर शुरू होता है। प्रेमी युगल भी अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचने के बाद एक दूसरे से विरक्ति का भाव महसूस करते हैं। चरम के बाद उन्नयन का मार्ग अवरूद्ध हो जाता है। आवश्यक है कि आप कभी चरम को प्राप्त ना करें, किसी ऊंचाई को अपना शिखर मान लें, कोई आखिरी मंजिल ना बनाए। शिखर को एक पड़ाव समझें, मंजिल को सफर का एक सराय और प्रेम को सतत बना कर क्षणिक चरमोत्कर्ष और विरक्ति के ऊपर ले 
जाएं। पतन वापसी और विरक्ति के भाव को विजित करने का यही मूल मंत्र है।
#चरैवेति

Saturday, February 10, 2024

चेतना की उर्वर भूमि

लेखक क्या है? एक कवि क्या है? एक उर्वर जमीन। जिसपर जैसे ही कोई विचार रूपी बीज गिरता है, वो समाहित कर लेता है उसे अपने आप में। अपने दर्शन की खाद, लेखनी की स्याही वाले जल और अपने अनुभवों के सूर्यातप से उस विचार बीज को अंकुरित, पुष्पित और प्रस्फुटित करता है। फिर वो विचार बीज पहले एक छोटा पौधा और बाद में एक वृक्ष बन जाता है। वैसा वृक्ष जो फिर स्वयं फल उत्पन्न करता है जिसका आस्वाद समस्त जीव कर तृप्त होते हैं। फल सिर्फ जीवों को तृप्त नहीं करते बल्कि अपने अंदर एक और बीज संरक्षित करते हैं और कहीं और किसी और उर्वर भूमि को पाकर पल्लवित हो उठता है, एक नए वृक्ष को जन्म देता है और विचारों के अनवरत प्रवाह का यह चक्र चलता रहता है। 

किसी भी सभ्यता के विचारों के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार का यह चक्र अनवरत चलता रहे इसके लिए आवश्यक है कि लेखकों और कवियों की यह उर्वर धरती बनी रहे। उस उर्वर धरा की नमी भौतिक आवश्यकतों के ताप से सूख ना जाए। उस उर्वर भूमि पर बाजारवाद का मॉल ना खोल दिया जाय जहां गिरे बीज की जगह डस्टबिन होती है। ना ही उस उर्वर भूमि पर समाज की गंदगी गिरा गिरा कर उसे नाला बना दिया जाय कि जहां सिर्फ विषैले पादप उत्पन्न हों।

उस उर्वर भूमि को बचाने की जिम्मेदारी पूरे समाज की तो है ही, यह जिम्मेदारी व्यक्तिगत भी है। अपनी चेतना की समस्त भूमि पर भौतिकता की अट्टालिका खड़ी ना करें। कुछ उर्वर भूमि को बचा कर रखें  बाह्य अतिक्रमण से। फिर देखिए आपके अंदर भी वो संवेदनशीलता की नमी रहेगी और आप भी विचारों के प्रसार की वो कड़ी बनेंगे जिसने पूरी मानवता की प्रगति जोड़ रखी है।

Sunday, December 10, 2023

JNV alumni meet 2023



As we strolled down the memory lane at our Katihar Navodaya Schools for this grand alumni meet, it was like maneuvering through a maze of nostalgia – dodging the ghosts of bad haircuts we all received by the government barberlr, sidestepping fashion faux pas, and doing our best to erase those cringe-worthy teenage dramas. But hey, we were all in this together, so buckle up for a rollercoaster ride of hilarity!

Strolling through those revered halls felt like stepping into a time warp – a place where hairstyles were questionable, and fashion sense was, well, a bit sketchy. If those walls could talk, they'd probably say, "Remember that time you thought shirts with crease and full pants with plated creases were the epitome of cool?" Yeah, those were the days. The multi purpose hall was really multipurpose but on Sunday in served only one purpose. Running a Bollywood movie of VCR where 400 students watched a 14 inch color television. 

Reconnecting with old buddies was like attending a comedy show where the punchlines were our shared teenage antics. The belly laughs and eye rolls were in abundant supply as we exchanged stories of epic fails, failed live stories and unknown crushes... Talk about a blast from the past!

Entering the classrooms felt like gate-crashing a reunion of dusty textbooks and slightly out-of-date chalkboards. Our teachers, the unsung heroes of our academic escapades, must have been sipping chai somewhere, chuckling at the thought of molding our young minds. Big shoutout to you, dear educators, for enduring the rollercoaster that was us! Seeing our teachers healthy and happy filled our hearts with joy seeing them enjoying their retirement life peacefully.

And let's not forget the hostel rooms – those cramped spaces that bore witness to everything from impromptu dance-offs to failed attempts at making the perfect cup of chai. The walls, if they could talk, would probably say, I am still here, it's you who left.

In that reunion, we weren't just counting the years but also the number of times we collectively embarrassed ourselves. The laugh lines may have been more pronounced, and the metabolism slower, but our ability to find humor in the shared craziness of our youth remained evergreen.

So, here's to 25 years of surviving bad hair days, questionable fashion choices, and desi-style teenage adventures. As we attacked the food plates once again after 25 years, we raised a toast to the hilarity that was our shared past and the comic gold that awaited in the future. ☕ #DesiReunionDelight #Nostalgia #Navodayans

Monday, November 20, 2023

पर्व घर और घाट का


यह पर्व है घर का
यह पर्व है घाट का।

है उगते सूरज का
और डूबते सूरज का।
पर्व है आस्था का
पर्व है जज़्बात का,
यह पर्व है घर का
यह पर्व है घाट का।

शुचिता से जुड़ी हर बात का
ठेकुआ और कसार की सौगात का
ना किसी वर्ग और ना किसी जात का
ना उत्पात का और ना औकात का
यह पर्व है घर का
यह पर्व है घाट का।


है जितना बिहार का
उतना ही गुजरात का
कभी महसूस करो तो लगे
यह पर्व है सारी कायनात का।
यह पर्व है घर का 
यह पर्व का घाट का।





Tuesday, November 14, 2023

खेल और युद्ध

युद्ध, मानव इतिहास का एक स्थाई और सबसे मुखर पहलू है, जिसने सभ्यता की कहानी पर एक अमिट छाप छोड़ी है। मानव इतिहास वास्तव में युद्धों का ही इतिहास है। हालाँकि, जैसे-जैसे समाज आगे बढ़ा, एक उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ: खेल युद्ध की मूल प्रवृत्ति के विकल्प के रूप में उभरे। यह विकास महज़ एक ऐतिहासिक जिज्ञासा नहीं है बल्कि मानवता की अपनी आक्रामक प्रवृत्तियों को पुनर्निर्देशित करने की क्षमता का एक गहरा प्रमाण है। खेल, इस पुनर्निर्देशन की अभिव्यक्ति, अभिव्यक्ति का एक शक्तिशाली साधन बन गया है, जो प्रतिस्पर्धा, कौशल और सौहार्द की भावना का प्रतीक है।

एक महत्वपूर्ण उदाहरण फ़ुटबॉल की जड़ों में छिपा है, एक ऐसा खेल जिसकी वंशावली प्राचीन युद्ध अनुष्ठानों से जुड़ी है। कहा जाता है पराजित सेना के कटे नरमुंडों को लात मारकर खेलने और विजय का उत्सव मनाने से फुटबाल खेल का प्रदूर्भव हुआ। फुटबाल का खेल अपने रणनीतिक तत्वों, टीम वर्क और क्षेत्रीय विजय के साथ, युद्धक्षेत्र युद्धाभ्यास की गतिशीलता को प्रतिबिंबित करता है। फ़ुटबॉल का मूल सार एक सैन्य अभियान की संरचित अराजकता की प्रतिध्वनि करता हुआ प्रतीत होता है, हालांकि वास्तविक युद्ध के मुकाबले बहने वाले रक्त की जगह स्वेद कणों ने ले ली है। या युद्ध का ही एक रूप तो है, भले ही कम गंभीर और अधिक मनोरंजक रूप में। जैसे-जैसे खिलाड़ी मैदान पर जीत के लिए प्रयास करते हैं, वे उन संघर्षों के प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण में संलग्न होते हैं, जिन्होंने मानव इतिहास को आकार दिया है।

क्रिकेट, एक अन्य वैश्विक खेल, अपने ऐतिहासिक संदर्भ की छाप भी रखता है। मध्ययुगीन इंग्लैंड में उत्पन्न, एक देहाती मनोरंजन से एक परिष्कृत खेल तक क्रिकेट का विकास व्यापक सामाजिक परिवर्तनों को दर्शाता है। जटिल नियम, टीम की गतिशीलता और खेल का उतार-चढ़ाव सैन्य रणनीतियों की जटिलता के समानांतर हैं। युद्ध की तरह क्रिकेट भी सावधानीपूर्वक योजना, अनुकूलनशीलता और अवसरों का लाभ उठाने की क्षमता की मांग करता है। यह एक ऐसा मंच बन गया है जहां राष्ट्र सांस्कृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक कारकों की जटिल परस्पर क्रिया को मूर्त रूप देने के लिए केवल एथलेटिक कौशल से आगे बढ़कर प्रतिस्पर्धा करते हैं।

मुक्केबाजी, विशेष रूप से हेवीवेट मैच, युद्ध से खेल में संक्रमण की एक ज्वलंत याद दिलाते हैं। प्राचीन यूनानी ग्लैडीएटर खेलों में समाहित हाथ से हाथ की लड़ाई की मूल प्रकृति, मुक्केबाजी रिंगों में आधुनिक अभिव्यक्ति पाती है। पाशविक बल, व्यक्तिगत कौशल और मुक्केबाजी की गहन प्रतियोगिता वाली आमने-सामने की प्रकृति प्राचीन रोमन काल की ग्लैडिएटर वाली लड़ाई की भावना पैदा करती है। फिर भी, खेल कौशल और नियमों के संदर्भ में, मुक्केबाजी आक्रामकता को एक अनुशासित कला में बदल देती है, जिससे पता चलता है कि मानवता ने अपनी लड़ाकू प्रवृत्ति को नियंत्रित और विनियमित करना कैसे सीख लिया है।

समकालीन परिदृश्य में, ये खेल न केवल मनोरंजन करते हैं बल्कि पहचान और समुदाय की भावना को भी बढ़ावा देते हैं। वे राष्ट्रों को मैत्रीपूर्ण प्रतिस्पर्धा में शामिल होने का अवसर प्रदान करते हैं, युद्धों की विनाशकारी प्रकृति को खेल भावना की रचनात्मक भावना से प्रतिस्थापित करते हैं। जैसे-जैसे स्टेडियम वैश्विक एकता के लिए मैदान बन जाते हैं, भीड़ की दहाड़ विविध मानवता की सामूहिक धड़कन को प्रतिध्वनित करती है।

निष्कर्षतः, युद्ध से खेल तक का प्रक्षेप पथ मानव अनुकूलन क्षमता और लचीलेपन का प्रमाण है। फुटबॉल, क्रिकेट और मुक्केबाजी इस विकास के जीवित अवतार के रूप में खड़े हैं, जो ऐतिहासिक संघर्षों से प्रेरणा लेते हुए प्रतिस्पर्धा और विजय के लिए सहज मानवीय व्यवहार के लिए अधिक रचनात्मक आउटलेट प्रदान करते हैं। जैसे ही हम मैदान पर जीत और हार का जश्न मनाते हैं, हम संघर्ष को कौशल, रणनीति और साझा जुनून के तमाशे में बदलने की मानवता की क्षमता की जीत का भी जश्न मनाते हैं। 
खेल भले ही युद्ध का आधुनिक रक्तरहित रूप हो, लेकिन खेल और युद्ध में मूल अंतर यही है कि जहां युद्ध में इश्क की तरह सब कुछ जायज मान लिया जाता है, वहीं खेल में सिर्फ नीतिपरक चीज़ें ही जायज मानी जाती है। संभवतः लिखित नियमों और अलिखित परंपराओं का सम्मान जिसे संयुक्त रूप से खेल भावना कहा जाता है, युद्ध जैसी विध्वंसकारी मानव गतिविधि को भी एक मनोरंजक खेल में बदल देता है।

Thursday, November 9, 2023

कुदरत का निजाम

कुदरत का निजाम कुदरत का निजाम
बाय बाय पाकिस्तान।

सीआईडी में लाश, सर पर उसके खून का निशान
80 का स्ट्राइक रेट, किंग बाबर सबसे महान
बाय बाय पाकिस्तान।
कुदरत का निजाम, कुदरत का निजाम।

गांव में खेत, खेत में मचान
8 की इकोनॉमी, शाहीन मेरा दिल शाहीन मेरी जान,
बाय बाय पाकिस्तान।
कुदरत का निजाम, कुदरत का निजाम।

हांडी में बिरयानी, बिरयानी पर है ध्यान
हर एक्टर का बाप है हमारा रिजवान।
बाय बाय पाकिस्तान।
कुदरत का निजाम, कुदरत का निजाम।
टेबल पर किताब, किताब में है ज्ञान
कराची में टूटा टीवी और गुस्से में है बलूचिस्तान
बाय बाय पाकिस्तान।
कुदरत का निजाम, कुदरत का निजाम।

स्टेडियम में डीजे, डीजे पर नाचे इरफान
आगे से मारे हिंदुस्तान , पीछे से मारे अफगानिस्तान
बाय बाय पाकिस्तान
कुदरत का निजाम कुदरत का निजाम।



















Sunday, November 5, 2023

विश्व क्रिकेट की दशा और दिशा पर मंथन

90 के दशक में जब हमने क्रिकेट देखना शुरू किया तो पाकिस्तान हम पर हावी हुआ करता था। वकार वसीम आमिर सोहेल सईद अनवर एजाज अहमद यूसुफ योहाना और इंजमाम उल हक के नाम भारतीय प्रशंसकों के दिल में खौफ का पर्याय हुआ करते थे। अरविंद डिसिल्वा रोमेश कालू विठारना चमिंडा वास मुरलीधरन और सनथ जयसूर्या के चेहरे रातों की नींद और दिन का चैन छीन लेते थे। लारा चंद्रपौल कार्ल हूपर एंब्रोस वाल्श जैसे नाम भारतीयों के जीतने का ख्वाब शायद ही कभी सच होने देते थे। ऑस्ट्रेलिया की क्या बात करें, स्टीव वाग मार्क वाग मैक्ग्रा ली गिलेस्पी बेवन और वार्न तो हर बार भारतीय फैंस का दिल तोड़ जाते थे। यह तो बड़ी टीमें हुई, जिम्बाब्वे के ओलंगा एंडी फ्लावर और हीथ स्ट्रीक जैसे खिलाड़ी भारतीयों को कड़ी टक्कर देकर पराजित करने का माद्दा रखते थे। दक्षिण अफ्रीका की बात करें तो विश्व में न किसी भी टीम के पास डोनाल्ड की तरह तेज गेंदबाज था और न कालिस की तरह कोई हरफनमौला, जोंटी रोड्स की तरह न कोई फील्डर था और न हैंसी क्रोन्ये सरीखा कप्तान।

हालिया वर्षों में या तो विश्व क्रिकेट का स्तर निरंतर गिरा है या भारतीय टीम का स्तर सामान्य से अधिक उठ चुका है। जहां श्रीलंका जिम्बाब्वे और बांग्लादेश की टीम भारत के सामने किसी क्लब स्तर की टीम दिखती है वहीं वेस्ट इंडीज क्रिकेट अपने इतिहास का एक बदसूरत कंकाल से ज्यादा कुछ नहीं दिखता। पाकिस्तान में भी वैसे खिलाड़ी नहीं बचे जो शारजाह और चेन्नई वाली जीतों को दोहरा सकें तो इंग्लैंड की टीम भी हतोत्साहित थके लड़ाकों का एक चुका हुआ झुंड मात्र प्रतीत होता है। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड अभी भी एक सशक्त टीम हैं लेकिन ऑस्ट्रेलिया अपने 90 और 2000 वाले दशक वाली टीम की एक धूमिल परछाई से ज्यादा कुछ नहीं है।

लगातार मिल रही एकतरफा जीतों और दूसरे टीम का निरंतर गिरता प्रदर्शन भले भारतीय फैंस के लिए आनंद दायक हो, लेकिन विश्व क्रिकेट के लिए यह सुखद संदेश कतई भी नहीं है। क्रिकेट वैसे भी गिनती से 10 देशों में खेला जाता है और वहां भी अगर साथ टीमें अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही हों, तो क्रिकेट का भविष्य कोई बहुत उज्जवल प्रतीत नहीं होता।
क्रिकेट की नियामक संस्थाओं खेलने वाले देश के बोर्डों और खिलाड़ियों को मिल बैठ कर एक साझी रणनीति बनानी होगी जिससे क्रिकेट अन्य देशों में भी फैले और उसकी लोकप्रियता में इजाफा हो। एशियाड खेलों में नेपाल का बेहतरीन प्रदर्शन इसका गवाह है कि छोटे छोटे देशों में भी एक से एक क्रिकेटिंग प्रतिभा मौजूद है। अगर अफगानिस्तान जैसे समस्याग्रस्त देश से मौजूदा टीम जैसी एक जुनूनी टीम आ सकती है तो कोई कारण नहीं है कि सही दिशा देने पर आने वाले विश्वकप में 10 की जगह 32 टीमें हिस्सा ना लें। सभी क्रिकेट प्रशंसकों और सभी क्रिकेट के शुभचिंतकों को इस दिशा में गंभीर प्रयास करने की आवश्यकता है।

Saturday, October 28, 2023

घबराना नहीं है

सबसे पहले जी हमने घबराना नहीं है। मुश्किलात हैं हमारे लड़कों के साथ , इसलिए हमें बस कुछ तब्दीलियां करनी है। सबसे पहले तो टीम के खानसामे को बदलना है जी। केवल कार्बोहाइड्रेट खिलाता है हमारे बैट्समैन को । इस बंदे को प्रोटीन वाला खाना बनाना आंदा ही नहीं। इसी खानसामे की वजह से हमारे बंदे छक्के नहीं मार पा रहे। यही खानसामा था जिसके हाथ की निहारियां पा पा के हमारा सरफराज विकेट के पीछे जम्हाइयां लिया फिरता था। जो सेंचुरी हमारे किंग बॉबी नू लगानी थी, वो सेंचुरी हारिश रऊफ लगा दे रहा है बॉलिंग में। ऐसे वाहियात खानसामे के रहते 92 वाली परफार्मेस कैसे हो सकती है जी।
दूसरा बदलना है आईसीसी के वाहिद अफसरों को। अजी हमारे माकूल ना पिच दे रहे हैं और ना हमारे माकूल तमाशाई। नामाकूल पिच पर हमारी नंबर वन टीम खेल भी ले, लेकिन नामाकूल टीम के खिलाफ कैसे खेलें। जब हमारी सारी प्रैक्टिस जिम्बाब्वे के खिलाफ थी और आपने जिम्बाब्वे को बुलाया ही नहीं खेलने के लिए। यह तो सरासर हमारे जिमबाबर भाई की odi रैंकिंग छीनने की साजिश भर है।

इसके बाद जरूरी है बदलना हमारे टीम के लास्ट ओवर फेंकने वाले को। नवाज कितने आखिरी ओवर फेंकेगा जी। आखिर फिनिशर का रोल वो अकेला कब तक निभाए। धोनी हो या माइकल बेवन, नवाज से बेहतर फिनिशर पाकिस्तानी क्रिकेट नहीं बल्कि पूरी दुनिया की क्रिकेट की तारीख में मिलना मुश्किल है जी। आखिर हमारी क्रिकेट टीम एक फैमिली है, एक चाचा हैं, एक इंजी भाई के भतीजे हैं, एक दामाद हैं जिनको रिवर्स स्विंग तभी मिलती है जब सामने वाली टीम तीन सौ रन मार के गेंद का हुलिया बिगाड़ दे। कप्तान बॉबी बादशाह हमारे शाहीन को पहले ही बॉलिंग पर ले आता है तो बेचारे शाहीन की क्या गलती। हारिश और शादाब अपना कोटा पूरा कर लें, शाहीन से पहले। बस मिलने लगेगी शाहीन को रिवर्स स्विंग। हारिश तो हमारा हीरो है जी, 150 पर बॉल डालता है, और दूसरों के 300 करवाता है।

लास्ट में बस एक म्यूजिक थेरेपिस्ट चाहिए। अफगान जलेबी वाला गाना सुन के टीम के कई लड़कों को घबराहट के दौरे पड़ने लगे हैं। दिल दिल पाकिस्तान सुना के जैसे तैसे इनको सम्हाला है जी। म्यूजिक से याद आया, हमारे पीसीबी चीफ की कुर्सी के।लिए जो म्यूजिकल चेयर वाला गेम चल रहा है, उसको भी थोड़ा बंद करना पड़ेगा जी। लोग हमारी क्रिकेट से ज्यादा पीसीबी वाली गेम ज्यादा देखते हैं। बाकी तो बॉयज ऑलवेज प्लेड वेल। एक और मैच हैदराबाद में रखवा दो जी। हैदराबाद की बिरयानी और पाया दा शोरबा एक और बार जी भर के खाना है, कराची की फ्लाइट पकड़ने से पहले। 

Wednesday, October 25, 2023

टिक टिक करती रुकी घड़ियां

दीवाल घड़ी अचानक से खराब होकर नहीं रुकती। रुकने से पहले वो कुछ दिन तक टिक टिक करती रहती है। घड़ी टिक टिक करती है , घड़ी की सुइयां हिलती हैं पर आगे नहीं बढ़ती। बस घड़ी एक जगह अटक कर टिक टिक करती रहती है। इंसान भी अचानक से नहीं रुकते, रुकने से पहले टिक टिक करते रहते हैं।

अपने आस पास देखिए, बहुत सारी ऐसी घड़ियां दिख जाएंगी। इनसे बात करिए तो उनका टिक टिक करना भी सुन लेंगे। उनसे पूछिए कि आजकल गाने कौन से सुन रहे हैं, तो वो बताएंगे कि कुमार शानू और अलका याग्निक के बाद उनको कोई पसंद ही नहीं आया। क्रिकेट के बारे में पूछिए तो आपको पता चलेगा कि भाई साब की सुई अब तक जावेद मियांदाद और इमरान खान पर अटकी हुई है। फिल्म में भाई साब अब भी साजन और सनम बेवफा की तारीफ में कसीदे पढ़ते रहते हैं। पूछिए कि अपने परिवार के बारे में कुछ बताइए तो भाई साब अपने दादा जी की जमींदारी के किस्से बांचने लग जायेंगे । समझ लीजिए, कि भाई साब अटकी हुई घड़ी हैं , बस टिक टिक कर रहे है, आगे नहीं बढ़ रहे।

बस टिक टिक करना और आगे ना बढ़ना, रुकने से पहले वाला पायदान है। ऐसे टिक टिक वाली घड़ियां हमेशा गलत समय बताती हैं, हालांकि वो घड़ियां खुद गलत रहती हैं । ऐसी टिक टिक करने वाले घड़ियां जो समय के साथ आगे नहीं बढ़ती, अपने आप को बदल नहीं पाती, अक्सर बदल दी जाती हैं। 

बीच बीच में खुद को भी देखिए कि कहीं आप भी पीछे तो अटके नहीं हुए हैं। या तो अपनी बैटरी बदलिए, या खुद में चाबी भरिए, या अपनी स्प्रिंग बदलिए, और समय के साथ आगे बढिए । नई चीज़ें सीखिए, नए शौक पालिए, नई आदतें डालिए, किसी नई जगह घूम आइए, कोई नई किताब पढ़ डालिए, नए दोस्त बनाइए वरना किसी कबाड़ी की दुकान का एक अंधेरा कोना आपका इंतजार कर रहा है। 

Saturday, October 21, 2023

सर्व सिद्धि दात्री दुर्गा पूजा

दुर्गा पूजा तो सबके लिए है और दुर्गा पूजा में सबके लिए कुछ न कुछ है। दुर्गा पूजा उनके लिए है जो सारा बाजार खंगाल कर अपने लिए नए नए कपड़े खरीदते हैं और रोज रोज नए वस्त्र धारण करते हैं। और दुर्गा पूजा उनके लिए भी है जो एक अधोवस्त्र पहनकर अपनी छाती पर कलश स्थापना कर नौ दिन का कठिन तप करते हैं। मां का आर्शीवाद उनके लिए भी है जो प्रत्येक दिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं और उनके लिए भी है जो मां को बिदाई देने के समय डीजे की तेज धुन पर बस पूरे रास्ते नाचते हैं। शारदीय उत्सव जितना फलाहार पर रहने वालों का है उतना ही प्रत्येक दिन नए नए व्यंजन खाने के लिए रेस्टोरेंट्स जाने वालों का है। नवरात्रि पर उनको भी उतनी ही प्रसन्नता मिलती है जो शहर में स्थापित हर प्रतिमा का दर्शन कर लेना चाहते हैं और उनका भी जिनका झुकाव केवल पंडाल की जगमग रोशनी और कलात्मक सौंदर्य से है। यहां तक कि मां दुर्गा का आशीर्वाद तो उनके लिए भी है जिन्हे न पंडाल देखना और ना दुर्गा प्रतिमा, उन्हें तो बस मेले में लगे झूले, मौत का कुंआ और पापड़ी चाट के ठेले पर भीड़ लगानी है।

दुर्गा पूजा मूर्ति बनाने वाले कुम्हार के लिए है तो नवरात्रि का पाठ करने वाले ब्राह्मण के लिए भी। दुर्गा पूजा मेले में मिठाई की दुकान लगाने वाले हलवाई की है और सजे धजे बाजार में कपड़े की दुकान पर बैठे बनिए की भी है। इस पर्व में पान बेचने वाला पनवाड़ी भी उतना ही शामिल है जितना ढाक की ताल देने वाला ढाक वाला। यह दोनो हाथों में धूपची लेकर नृत्य करते पुरुषों का भी है और सिंदुरखेला करती महिलाओं का भी। यह नवमी को पूजी जाने वाली शक्ति स्वरूपा बच्चियों के लिए भी है और उनके साथ पंगत में बैठ कर खाने वाले उनके छोटे बालक भाइयों के लिए भी है। दुर्गा पूजा नारीवाद का उत्सव है और जननी का महोत्सव है।

यह मां की प्रतिमा को साष्टांग करते भक्तों का भी है और मां की प्रतिमा के साथ सेल्फी लेते gen Z की पीढ़ी का भी है। कोलकाता भी गलियों में गूंजते शंखध्वनि की आवाज के बीच भी दुर्गा पूजा है और न्यू जर्सी में बंगाली एसोसिशन द्वारा सात समंदर पार भी पूजोर आनंद भरपूर है। 

साल भर नौकरी की चक्की में पिसने के बाद परिवार के साथ एक सप्ताह भर भक्ति, उल्लास के बीच गुनगुनाती ठंड के मौसम में समय व्यतीत करना , अगर यह मां का आशीर्वाद नहीं है तो और क्या है। शारदीय पर्व सबका है, सर्व समावेशी है, सर्व रस से सिक्त है और मां के नाम की तरह सर्व सिद्धिदात्री है।

मां आप सबका कल्याण करे। दुर्गा पूजा की शुभकामनाएं।।

Thursday, October 19, 2023

Enough of Yo Mama Jokes !!!



Ladies and gentlemen, let's embark on a cosmic comedy journey to explore why our planet Earth often suffers from an inferiority complex. I mean, come on, Earth! Why so glum when you've got so much going for you?

First of all, have you ever noticed how aliens get all the credit in science fiction? They swoop in with their advanced technology, sleek spaceships, and a penchant for mysterious, interstellar dance-offs. Meanwhile, we Earthlings are left feeling a bit, well, behind the times. It's like we're showing up to a cosmic party in a horse and buggy while they're sporting light-speed sneakers.

But here's the kicker: these aliens don't even exist! Earth is the real deal, baby. Sure, we haven't discovered any extraterrestrial neighbors yet, but we've got it all: lush forests, shimmering oceans, and the undeniable charm of the raccoon digging through your trash at 2 AM.

And speaking of charming, let's dive into the realm of mythological scriptures. Our ancestors had quite the imagination when they decided that heaven was located somewhere above our planet, high up in the clouds. I mean, can you blame them? Clouds are fluffy and white – quite heavenly, one might say. But did anyone ever wonder how we were supposed to get up there? Stairway to heaven, anyone? I bet even escalators in the clouds would have us all huffing and puffing by the time we reached the pearly gates.

Our cosmic complex also sneaks into our everyday language. We describe extraordinary things as "out of this world." But really, isn't everything we know right here on Earth? Are you trying to tell me that chocolate lava cake with a scoop of vanilla ice cream is less mind-blowing than a comet whizzing by? I don't think so! I'd choose that cake over a comet any day.
Now, let's get serious for a moment – well, as serious as this comedy can get. The truth is, Mother Earth is an absolute gem. Just look around! From the jaw-dropping landscapes to the diverse wildlife to the delicious food (chocolate lava cake included), we've got it all. And here's the kicker: scientific discoveries suggest that we might be living on one of the rarest planets with a habitable environment. So, take that, aliens!

And if anyone ever praises "other planets" over our Earth, it's like the cosmic version of a "Yo Mama" joke. You know the ones where you say, "Yo Mama's so awesome that other planets wish they were Earth!" It's a reminder that we don't need to look to the stars for the extraordinary – it's right here on our home planet.

In conclusion, Earth, you don't need to feel inferior to anyone or anything. You've got charm, beauty, and chocolate cake. So, let's celebrate our lovely blue planet and remember that in the grand cosmic comedy, Earth is the real headliner.