Wednesday, July 11, 2018

हावड़ा जमालपुर एक्सप्रेस

हावड़ा से रात पौने दस बजे एक ट्रेन खुलती है, हावड़ा जमालपुर एक्सप्रेस। पर लोग इस ट्रेन को सुपर के नाम से जानते हैं। गाडी खुलने के दस पंद्रह मिनट पहले चौदह नंबर प्लेटफार्म पर अगर आप खड़े हों तो आपको लगेगा कि आप बंगाल में नहीं बल्कि बिहार में खड़े हैं। अरे महराज, रास्ते में खड़े रहियेेगा तो कैसे होगा। थोड़ा सा हटो बाबु। सुपर खुल गया का। थरमस दो, बच्चे के लिए पानी भर लेते हैं। ऐसी आवाज़ें और बोली सुन कर आपको महसूस होता है कि रोजी रोटी की तलाश में आकर कोलकाता शहर में बसे आप अकेले प्रवासी बिहारी नहीं है। बहुतेरे हैं, जो शहर में टैक्सी चलाते हैं, और बदले में कोलकाता उनकी रसोई चलाता है। कुछ हैं जो रिक्शा चलाते हैं, कुछ हैं जो लैपटॉप चलाते हैं, और कोलकाता उनकी गृहस्थी चलाती है।

ट्रेन में बैठिये और राजनीति की बात न हो, संभव ही नहीं है। और आप बिहार जाने वाली ट्रेन में बैठे हैं और राजनीति की बात न हो रही हो, तो आपको तुरंत ही चेन खींच कर उतर जाना चाहिये, क्योंकि निश्चित तौर से आप गलत ट्रेन में बैठे हो। भले ही रात के पौने दस बजे ट्रेन हावड़ा से खुले, एक डेढ़ घंटे तक देश लौटने की खुशी और फिर देश का हाल बयां करना लोग नहीं भूलते। बिहारी लोग गांव को देश बोलते हैं। गांव से दूर कोई भी जगह विदेश जैसी ही तो है। बड़ा दिन से सोच रहे थे कि देश हो आयेंं, मौके नहीं मिल पा रहा था। मेरा मंझला बेटा पुतोहू इधर ही हैं मानिकताला में। वहीँ आये थे भेंट घांट हो गया , अब जा रहे हैं । हमारा सेंटर पड़ा था बालीगंज हाई स्कूल में पीओ के एग्जाम का। पिछले बार,, इंटरव्यू तक गए थे, इस बार रिटेन ही बढ़िया नहीं हुआ। देखिये क्या होता है। जितने सीट, उतनी मानव कहानियां। हर किसी को साथ लिए सुपर चलती है, छुक छुक वाली लोरी भी सुनाती रहती है।


सीट लगा लें थोड़ा, हमको साहेबगंज उतरना है। मैं कहता हूँ, तो विषय वस्तु ही बदल जाती है चर्चा की। लोवर बर्थ लेकर मुझे मिडल बर्थ देने वाले चचा शुरू हो जाते हैं। टाइम तो वैसे साढ़े तीन का ही है, लेकिन आजकल लेट कर दे रहा है। तीनपहाड़ के पास अपर इंडिया से क्रॉसिंग में ही गाड़िया लेट हो जाती है। यही दस दिन पहले गए थे, सात बजा दिया था साहेबगंज पहुँचने में। सुपर की सारी समसामयिकी कथा बांचने के बाद आपको सोने का मौका मिलता है। आराम से सो जाइये, आपको उठा देंगे, हमको भी वहीँ उतरना है, अगर गाडी संकरी में रुकी तो वहीँ उतर लेंगे। जी धन्यवाद चचा कहकर सोने की कोशिश करता हूँ।

आपको बोले ना इ रिजरबेसन बॉगी है, आप उतर के चले जाइये जेनरल में। टीटी की आवाज़ मेरी कच्ची नींद तोड़ती हुई फ़ैल जाती है पूरे बॉगी में। देखिये सर अगर कुछ हो सके तो, साथ में लेडीज है। एक और गुज़ारिश। आप लोगों को समझना चाहिये, बिना रिजर्वेशन के फैमिली लेकर चलना चाहिए क्या? ऐसा करिये, इकहत्तर नंबर पर फिलहाल बैठिये, हम बाकी चेक करके आते हैं। काले कोट वाले की बात सुन दोनों के चेहरे पर चमक आ जाती है। और फिर मैं वापस अपनी नींद पाने को कोशिश करने लगता हूँ।

‌उठिये उठिये, गाडी संकरी इन कर गया है। शायद फरक्का एक्सप्रेस से क्रोसिंग दे दिया है। हम उतर रहे हैं, आप भी उठ जाइये। अगला साहेबगंज ही है। सहयात्री सीट के नीचे अपनी चप्पल ढूंढते ढूंढते आपको भी उठाने का अपना वायदा पूरा करना नहीं भूलते। हवाई जहाज में सौ यात्रियों की मदद के लिए चार एयर हॉस्टेस होती हैं, रेल के डब्बे का हर यात्री दूसरे के लिये एयरहोस्टेस होता है। कुछ खाइएगा, अरे लीजिये थोड़ा, बाजार में नहीं मिलेगा इ चीज़ खाने को आपको, लीजिये बीच वाला पन्ना आप पढ़ लीजिये, फ्रोन्ट पेज हम पढ़ कर दे देते हैं कुछ देर में, एक मिनट रुकिए आपका अटैची हम निकाल के देते हैं, आपको दिक्कत होगा। सुपर के सहयात्री आपको जब यह सारी सुविधाएं दे रहे हैं वह भी बिना कीमत के, तो फिर आप एयरहोस्टेस की कमी क्यों महसूस करेंगे।
‌अपना सामान ले साहेबगंज स्टेशन पर उतरता हूँ, तो चार पांच लोग सामान उठाने को आ जाते हैं। मैं अपना सामन खुद उठाने का पक्षधर रहा हूँ, कभी कभी यह सोच कर भी रुक जाता हूँ कि किसी ईश्वरचंद्र विद्यासागर से सामान उठवाने की भूल न कर बैठूं। वैसे साहेबगंज स्टेशन आपको भले ही छोटा सा दिखे, इतिहास का एक पन्ना वहां भी पड़ा हुआ है। यह साहेबगंज रेलवे डिवीज़न ही था, जिसको पत्र लिख ओखिल चंद्र सेन ने रेलवे डब्बे में शौचालय की व्यवस्था करवाई थी।
‌ सुबह के चार बजने वाले हैं, साढ़े चार तक मनिहारी वाली पहली एल सी टी खुलेगी। सामान हाथ में लिये, स्टेशन से बाहर निकलता हूँ तो सारे रिक्शेवाले इतनी आत्मीयता से आवाज़ लगाते हैं कि आप अनसुना नहीं कर सकते। इ बाबू। घाट चलना है, आइये पहुंचा देंगे। अभी एल सी टी निकलने में देर है, रिक्शा से चलिएगा तो दस मिनट लगेगा। पैदल मत जाइए, राते में एक ठो पगला कुत्ता भमोर ले रहा है आजकल सबको। पैदल भाग भी नहीं पाइयेगा। भय के बिना होत न प्रीति वाले सिद्धांत को इन रिक्शावालो ने अच्छे से जीवन में उतार लिया है। पिछले बारह साल से साहेबगंज उतर कर मनिहारी के लिए एल सी टी पकड़ता हूं, आजतक कोई पागल कुत्ता नहीं दिखा। लेकिन आज भी वही मार्केटिंग तकनीक उतनी ही प्रभावी है, यह देख शायद कोटलर साहब भी शरमा जाएँ। एक मुस्कान के साथ एक को इशारा करता हूँ। घाट पर चलने का कितना लोगे । जो सही बनेगा दे दीजियेगा , आपसे कुछ छिपा थोड़े है। मेहनत के बदले जो बने, छाती के बल पर टान ते हैं रिक्शा। अब इस डायलॉग के बाद आपकी मोलभाव की सारी शक्ति जाती रहती है, और आप बैठ जाते हैं रिक्शे में।
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‌गमछा हमारे सीमांचल इलाके की एक पहचान है। आपने गमछे से ज्यादा बहुपयोगी चीज़ शायद ही देखी हो। गर्मी के दिनों में भींगा गमछा, सर का आवरण बनता है तो छाव में सुस्ताने के लिए तकिया। कभी लेटने के लिये चादर बन जाता है तो नहाने समय अंगवस्त्र। रिक्शे वाले के लिये गमछा एक सत्तु बांधता टिफिन बॉक्स भी है तो सीट साफ़ करने के लिये झाड़न भी। रिक्शेवाले आपको बिना सीट साफ़ किए, बैठने के लिए नहीं कहेंगे। गमछे से साफ़ की गयी सीट पर बैठकर चल पड़ता हूँ साहेबगंज घाट की ओर। रास्ते में वही पुराना आधा बना मंदिर जिसके सामने पड़ा 'मंदिर निर्माण के लिए दान दें' वाला पोस्टर साल में दो बार बदल जाता है। उसका वो पुरोहित जिसे अब पहचानने सा लगा हूँ। रिक्शा वाला हमेशा वहाँ रुक एक बार प्रणाम जरूर करेगा। बोहनी सवारी है ना, मैय्या का आसीरबाद रहा तो दिन बढ़िया जायेगा। रिक्शे वाले के साथ आप भी सर झुकाते हो। मैया के दरबार में सब बराबर।

‌ सिर्फ मैया के दरबार में सब बराबर नहीं होते। साहेबगंज घाट से मनिहारी घाट तक चलने वाले एल सी टी में में इंसान ही नहीं, ट्रक, मोटर साइकिल , गाय, भैंस, बकरी सब बराबर हैं। सबको गंगा पार जाने के लिये एल सी टी ही पकड़नी है।
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‌सबसे पहले ट्रक चढ़ते हैं एल सी टी पर। चाय की एक छोटी दुकान पर बैठा ट्रक को एल सी टी पर लोड होते देखना भी एक अलग ही अनुभव है। एक ट्रक को ऊपर घाट से कच्चे रास्ते बैक गियर में नीचे गंगा में खड़ी एल सी टी पर चढ़ाना कोई आसान काम नहीं है। अकेला ड्राइवर नहीं कर सकता, इसीलिये कम से कम दस लोग मदद करते हैं ।

‌आराम से । आराम से। दायें दाब के चलो, थोड़ा और। हाँ जाने दो जाने दो।
‌अरे बाबू, हट जाओ पीछे से, इतना जल्दी काहे है गंगा मैया से मिलने का।
‌कैसा खलासी है, नया भर्ती हुआ है क्या? देख नहीं रहा है गाडी जा रहा है पानी में। बुड़बक कहीं का।
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‌चाय वाला चाय बनाते बनाते यह सारी कमेंट्री करता रहता है, चाहे ड्राइवर उसकी सुने या ना सुने। उसका काम है बोलना। ट्रक लोड होने के बाद कार जीप और मोटर सायकिल लोड होती हैं। सबसे आखिर में
‌मैं सवार होता हूँ , ताकि जहाज में सबसे आगे खड़ा हो गंगा पार कर सकूं। अपने नियत समय से एल सी टी चल पड़ती है।
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‌सुबह सुबह सूर्योदय से पहले जहाज के डेक पर खड़े ठंडी हवा को अपने चेहरे पर महसूस करने का आनंद शब्दों में बयान करना असंभव है। पानी की आवाज़, नेपथ्य से आती जहाज के मोटर की चीख, लोगों का चलता संवाद , और गाय भैंसों का वार्तालाप सब मिल विविध भारती के पचरंगी कार्यक्रम से ही लगते है। फिर कुछ देर बाद जब आप गंगा की बीच धारा में पहुँचते हो तो आकाश अरुणिम हो जाता है। मानो पिया सूरज के आने की खबर सुन शर्म और खुशी से नवविवाहिता आकाश के गाल सूर्ख हो गये हों। उषाकाल का सौंदर्य आप शहर में शायद ही देख पाते हैं। उषाकाल के किरणों के आने के साथ आपको दिखने लगता है नदी के बीच में बालू वाली ज़मीन के टुकड़े जिनको दियारा कहते हैं। दियारा क्षेत्र खीरा, तरबूज़ और परवल की खेती के लिए उपयुक्त होते हैं । छोटे छोटे नाव और डोंगी सब्जियों से भर मनिहारी और कटिहार बाजार के लिए जाते आपको दिखने लगते हैं। इसे पहले की आप इस सौंदर्य को पूरी तरह आत्मसात कर सकें, आवाज़ सुनाई पड़ती है। सोंस, वह देखो सोंस। मीठे पानी की डॉल्फिन जो गंगा में मिलती है, सोंस कहलाती है। आपके जहाज के साथ कभी होड़ लगाते सोंस का दल आपको हतप्रभ कर देता है। पर यह नज़ारा ज्यादा देर तक नहीं रहता, सोंस शर्मीले स्वभाव के जीव हैं। जल्दी ही छिप जाते है माँ गंगा की गोद में।
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‌अब सूरज भी पूरी तरह निकल चुका होता है और सुदूर क्षितिज पर आपको दिखने लगता है, मनिहारी घाट। गंगा स्नान करते श्रद्धालु, उनको प्रसाद, सामान, गंगा जल का पात्र बेचते छोटे दूकान, अघोरी बाबा, और बालू ढोने वाले मल्लाहों को आप दूर से ही देख सकते हैं। फिर आपको अचानक से लगने लगता है कि यह जहाज़ इतना धीरे क्यों चल रहा है। जल्दी से किनारे क्यों नहीं पहुँचता। जैसे जैसे जहाज़ नज़दीक पहुँचता है आप गंगा किनारे खड़े लोगों की आवाज़ भी सुन सकते हैं।
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‌जैसे ही जहाज मनिहारी घाट पर लगता है, दौड़ कर सबसे पहले उतरता हूँ। और जब रिक्शा वाले, ऑटो वाले मेरा नाम लेकर पुकारते है तो अहसास होता है कि घर आ गया। वैसे ही सुरक्षित महसूस करता हूँ जैसे लूडो की गोटी सारे खतरों को पार कर लंबी दूरी तय कर अपने होम पहुँच गयी हो जहाँ उसे न ही किसी और गोटी से कटने का डर है और ना किसी गोटी को काटने की इच्छा। जहाँ से आगे कहीं नहीं जाना , बस आराम से रहना है। आप घर आ गए हैं।
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होली है।

होली एक अलग ही पर्व है। आप दीवाली मनाते हो लेकिन होली खेलते हो। नवरात्र में 9 दिन उपवास रखते हो, होली में 9 दिन का मालपुआ एक दिन में खा लेते हो। दुर्गापूजा में नए नए कपडे पहन कर उतनी खुशी शायद न मिले, जितनी यहाँ अपना कुरता फाड़ कर मिलती है। ईद में डर रहता है कि कही रंग में भंग न पड़ जाए, होली त्योहार ही है रंग लगाने का और भंग पिलाने का। यही एक पर्व है जिसके आगे शुभ लगाकर शुभ विजयादशमी, शुभ रामनवमी कहने की जरूरत नहीं है, सिर्फ होली है कह दीजिये काफी है। शिवरात्रि का मूहर्त देख पंडित जी को बुलाना पड़ता है, होली में किसी पंडित को बुलाने की जरूरत नहीं। आप ही यजमान, आप ही पुरोहित और आप ही इष्ट।गणेश चतुर्थी में आप विनायक की मूर्ति को विसर्जित करते हो, होली में डूबने की बारी आपकी है। वैलेंटाइन डे पर आपको कोई गिफ्ट न दे, कोई बात नहीं होली पर लट्ठ मार कर आप आराम से बदला ले सकते है, किसी को पता भी नहीं चलेगा। ईद की नमाज पढ़ने के लिये आपको ईदगाह जाना पड़ता है, होली का एक ही मंत्र है 'बुरा न मानो होली है'। यह मंत्र आप सड़क, चौराहे, बरामदे, बाथरूम कहीं भी पढ़ सकते हैं, वही आपका ईदगाह बन जाता है।

अगर आपके पास यह पूरा पढ़ने का वक़्त है, मतलब आपकी होली कुछ ख़ास नहीं जा रही। अगर आप व्हाट्सएप्प पर होली की शुभकामनाएं भेज रहे है, तो इसका मतलब है कि आप भींगे हुए नहीं है। जब खुद होली नहीं मना रहे, तो दूसरों को न कहें। रंगा सियार न बन रंग में डूबा यार बनें। जाइये होली मनाइये, उनके साथ भी जिन्होंने आपको यह कहा था कि अपनी शक्ल मत दिखाना। आज आपको वो पहचान भी नहीं पाएंगे। उनके साथ भी होली मनाएं जो अरेंज मैरिज के नाम पर आपकी संभावित लव मैरिज की होलिका जला गये। आज का दिन तो गोरी के यार का है, बालम के तरसने का दिन है। अपने उस बॉस को जाकर रंग लगा होली मनाएं जो साल भर कहते रहे कि पीपीटी में कलर ज्यादा हैं, थोड़ा सोबर रखो। उस एच आर वाली लड़की को भी रंग लगा कलरफुल कर दें जिसने आपको कहा था कि ऑफिस में इतने कलरफुल कपडे अलावुड नहीं है। उस टीचर को भी रंग लगाएं जिसने नम्बर कम आने पर आपके गोरे गालों को लाल कर दिया था।

जबर्दस्त होली मनाएं, जबर्दस्ती न मनाये। जिनके साथ जबरदस्ती करना पड़े, उनको दूर से ही पिचकारी मार कर भाग जाएँ। जो लोग पानी बचाने वाला प्रवचन आज भी दे रहे है, उनकी टंकी खाली कर दें और उनको कहें कि आज कम पानी से ही काम चलाओ।

होली है।

हवाई जहाज में बीवी

हवाई जहाज में चलने वाले पुरुष यात्री चार तरह के होते है। पहले वो जो एयर हॉस्टेस से ऐसे चिपक चिपक के बात करेंगे जैसे एयर होस्टेस न हुई उनकी बीवी हो गयी । दूसरे वो जो एयर होस्टेस को ऐसे आर्डर और फरमान सुनाएंगे जैसे अपनी बीवी को सुना रहे हों। तीसरे वह जो एयर होस्टेस के सारे विनम्र व्यवहार, सेवा के बावजूद उसको ऐसे इग्नोर करेंगे जैसे उनकी बीवी उनको मना रही हो और वह रूठ कर बैठे हों। चौथे वो जो सारी एयर होस्टेस को ऐसे ताड़ेंगे और आह भरेंगे जैसे उसे अपनी बीवी बना के ही दम लेंगे। #MenWillBeMen #NotApplicableToAirIndia

अपने बैताल से समझौता करें

‌आपका इतिहास, आपका भूत, आपकी पीठ पर बैठा बैताल है। आपको कहानियां सुनाता रहता है। आपको सुननी पड़ती है, सुननी भी चाहिये। कहानियां अच्छी सुनाता है, काफी सीख देता है। समस्या यह है कि बैताल आपकी कुछ नहीं सुनता। आपने अपनी कोई बात उसको समझाने की कोशिश की नहीं कि अगले ही पल आप अपने बैताल के पीछे भागने लगते है। घूम फिर कर बैताल वापस आपको वहीं ले आता है जहाँ आपने शुरुआत की थी। सारा किया धरा बराबर, फिर से बैताल की वही कहानियां।

अपने बैताल रूपी भूत को अपने पीठ पर ढोना आपकी मजबूरी है, उसकी कहानियां सुनना भी आनंददायक है। बस उसकी कहानियां सुने, उससे वार्तालाप न करें। उसको बदलने की कोशिश ना करें, वरना आपका निकट भविष्य अपने भूत का पीछा करने में ही बीतेगा। आपका बैताल आपकी गाडी में लगा पीछे देखने वाला शीशा है, जरूरी है बीच बीच में उसे देखना, पर सिर्फ उसे देख कर आप गाडी नहीं चला सकते।
‌अपने बैताल भूत की सुनें, उसकी सीख को अपनाएं और उसे ऐसा कोई मौका न दें जिससे वह आपको वापस वहां ले जाये, जहाँ वह हमेशा उल्टा दिखता आप पर हँसता है। वहां जाकर आपको महसूस होता है कि यह बैताल न केवल मुझे उल्टा दिख रहा है बल्कि मेरी नादानियों पर हँस भी रहा है। विक्रम का कर्त्तव्य है कि बैताल को सिर्फ अपने पीठ पर हावी होने दे न कि बुद्धि और सोच पर।
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‌अपने बैताल से समझौता करें, उससे लड़कर उसको समझाने और बदलने की सारी कोशिश आपके भविष्य का बलिदान है, और कुछ नहीं। 

अंधकार भी आवश्यक है

आपने कभी बच्चों को जादूगर का कार्यक्रम देखते देखा है? जादूगर का हाथ से सिक्का गायब कर देना, टोपी से कबूतर निकाल कर दिखाना, अपनी छड़ी से फूल को हरा से लाल कर देना, यह सारे बचकाने से करतब भी बच्चों को कौतूहल, विस्मय और आह्लाद के भाव से भर देते हैं। अब आप इन बच्चों के साथ बैठे वयस्कों के चेहरों को देखें। या तो उनके चेहरे पर बोरियत का एक भाव होगा कि कब यह बकवास ख़त्म हो कि वह अपने बच्चों को लेकर घर जा सकें । या अपने बच्चों के साथ घुलने के लिये वह अपने चेहरे पर खुशी का एक नकली नकाब पहन जादूगर के करतबों का आनंद लेने की असफल कोशिश करते दिखते हैं।

किसी ऑपरेशन थिएटर में जाकर देखें, एक मरीज के दिल का इलाज़ चल रहा है। डॉक्टर के एक टीम ने मरीज़ के छाती पर एक बड़ा सा चीरा लगा रखा है। अंदर दीख रहा है लाल खून से सना और उछलता सा दिल और रक्त धमनियां मानो अभी बस फट पड़ेंगी। आप ज्यादा देर देख नहीं पाएंगे। अब आप उस मरीज़ की तरफ देखिये जिसके आधे चीरे शरीर को आप देख तक नहीं पा रहे। मरीज़ शांत बेहोशी की हालत में रहेगा। चेहरे पर दर्द और शिकन का कोई भाव नहीं। शायद आप उसके चेहरे पर मुस्कान की वह लकीर भी देख पाएंगे जो बेहोश होने से पहले उसके चेहरे पर आयी थी जब डॉक्टर ने यह कहा था कि चिंता मत करो, तुम बिलकुल ठीक हो जाओगे।

मानव सभ्यता के प्रारब्ध से अब तक हुए सतत विकास के पीछे मानव की जिज्ञासा का बहुत बड़ा हाथ है। इसी जिज्ञासा ने विज्ञान का विकास किया है, इसी जिज्ञासा ने बुद्ध को जन्म दिया , यही जिज्ञासा अध्यात्म की भी जननी है। परंतु जैसा कि प्रकृति का नियम है हर चीज़ का संतुलन आवश्यक है। जिज्ञासा और ज्ञान का संतुलन भी आवश्यक है। आप सोचेंगे ज्ञान का संतुलन क्या अज्ञानता है? और अगर हाँ तो अज्ञानता अच्छी कैसे ही सकती है। आपको हर चीज़ का ज्ञान हो जाए यह तो किसी की तरह से कोई बुरी बात नहीं ही सकती। अब जरा आप पहले दोनों उदाहरण पर गौर करें? ऐसा क्या अंतर है वयस्कों और बालकों में कि जादूगर का वह मैजिक शो उनमें हर्ष और आनंद का संचार करता है और आपको बोरियत और खीझ के भाव से भर देता है? ऐसा क्या है कि जिस चीरे को आप देख भी नहीं पाते, मरीज़ जिसके शरीर पर वह चीरा पड़ा है वह आराम से पड़ा मुस्कुरा रहा है।

आप जादूगर के करतबों से इसलिए बोर होते हैं क्योंकि आप जानते हैं कि जादूगर ने पहले से ही टोपी में कबूतर छुपा रखा है। आप जानते हैं सिक्का कहीं गायब नहीं हुआ बल्कि जादूगर ने बस उसे अपने लंबी आस्तीनों में छुपा लिया है। आपका यह ज्ञान आपको खीझ दे रहा है और बच्चों की वही अज्ञानता उनको परम आनंद। अगर ज्ञान सदैव अच्छी चीज़ है तो जरा कल्पना करें कि डॉक्टर कि टेबल पर पड़ा वह मरीज़ अपने दर्द को जाने और महसूस कर सके। अगर मरीज़ को अपने छाती पर चलते नश्तर महसूस हों और उनको वह देख सके तो क्या उसका ऑपरेशन संभव होगा? यह मरीज़ का अपने दर्द की अनभिज्ञता ही है जो उसके लिए जीवनदायी सिद्ध हो रहा है।

ईश्वर को सर्वज्ञ कहते हैं। मानव होने का आनंद इसी चीज़ में छुपा है कि हम सर्वज्ञ नहीं है। हमारी अनभिज्ञता कई बार हमें आनंद देती है कई बार दर्द कम करती है। अब अगर कोई ज्ञान मुझे माँ के प्यार का कारण हार्मोन और रासायनिक परिवर्तन बताता है तो मैं ऐसे ज्ञान को त्याग अज्ञानी रहना पसंद करूँगा। सब कुछ जानना बिलकुल जरूरी नहीं है। अंधकार भी आवश्यक है , हमेशा प्रकाश हो तो काम नहीं चलता। आपको आराम की नींद अँधेरे में आती है न कि तेज़ प्रकाश में। अगर बादल देख मोर नाचते हैं और हम छाता खोलते हैं तो शायद इसका एक कारण यह भी है क्योंकि वे वाष्पीकरण और संघनन की प्रक्रिया शायद नहीं समझते। हमारे अंदर का बालक, हमारे मन का वह मोर और दर्द से अनभिज्ञता अगर अज्ञानता से संभव है तो जरूरी है कि हम इसकी भी जरूरत समझें। असतो मा सद्गमय तब तक ही अच्छा है जब तक हम मानव बनें रहे। ईश्वर और सर्वज्ञ बन शायद इतना आनंद न मिले।

पेड़ काट कर वृक्षारोपण

एक आदमी कड़ी धूप में कुल्हाड़ी लिये सड़क किनारे खड़े पेड़ों को काट रहा था। आसपास के लोगों ने उसको पूछा कि भाई यह हरे भरे पेड़ क्यों काट रहे हो। उस आदमी ने कहा कि कल यहाँ पर मंत्री जी आकर पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम के तहत वृक्षारोपण करेंगे , इसीलिये यहाँ पर उसके लिए जगह बना रहा हूँ।

आये दिन आप देखते होंगे मदर्स डे, फादर्स डे, फ़्रेंड शिप डे वाले सन्देश आते रहते हैं। हम भारतीय अगर इन दिनों को मनाना शुरू कर दें तो यह एक विडम्बना ही है। जो सभ्यता माँ और मातृभूमि को स्वर्ग से भी ऊपर मानती है, वहां मदर्स डे मनाने की कोशिश पेड़ काट कर वृक्षारोपण है। फ्रेंडशिप डे पर मुझे व्हाट्सएप्प पर ऐसे मेसेज मिलते हैं कि अगर आपको मेरा यह मैसेज मिला तो मतलब आप मेरे दोस्त हो। आप मुझे यह मैसेज वापस भेजिए तो मैं मानूँगा कि आप भी मुझे दोस्त मानते हो। जहाँ कृष्ण ने सुदामा को राजमहल और दुर्योधन ने कर्ण को राजपाट देने के बाद बदले में कुछ नहीं चाहा, वहां लोग एक फॉरवर्ड वापस ना पाने पर सोचते हैं कि वह तो मेरा दोस्त नहीं।

आखिर यह चीज़ें हमारे यहाँ क्यों हो रही हैं? इसका कारण है कि हम विदेशी परंपराओं को बिना समझे अपना रहे हैं। सिर्फ इसलिए कि हमने विदेशियों ऐसा करते देखा है, हम भी करना चाहते हैं। इन परंपराओं की जरूरत पश्चिमी देशों में ज्यादा है। आपने अगर फ्रेंड्स, हाव आई मेट योर मदर और द बिग बैंग थियोरी जैसे धारावाहिक देखे होंगे तो आपने देखा होगा कि वहाँ पर माँ बाप बच्चों से अलग रहते हैं, बच्चों का माँ बाप के साथ रहना सामान्य नहीं माना जाता। बिग बैंग थ्योरी में तो हॉवर्ड नाम के किरदार का मज़ाक हर एपिसोड में इसलिये उड़ाया जाता है कि वह अपनी माँ के साथ रहता है। मेरा मकसद यह कतई नहीं है कि पाश्चात्य संस्कृति हमसे नीचे है या गलत है। हाँ वह हमसे अलग जरूर है। इसीलिये मदर्स डे मनाना उनको ज्यादा शोभा देता है, शायद उनको ज्यादा जरूरत है। हमको जरूरत है कि हम टाइगर दिवस मनाये क्योंकि टाइगर कम बचे हैं, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी वालों को मदर्स डे मनाने की स्थिति अभी नहीं आयी।

‌अब राजनीतिक परिपेक्ष्य ही लें। पिछले 40 सालों से अगर भारतीय राजनीति किसी एक शब्द के चारों और घूम रही है तो वह शब्द है धर्मनिरपेक्षता। आपको पता होगा कि हमारे संविधान की मूल प्रति या प्रस्तावना में यह शब्द नहीं है। यह शब्द बाद में 1976 में 42वें संविधान संशोधन के तहत जोड़े गये। जिस धर्मनिरपेक्षता को भारत की राजनीति में लाया गया, उसकी अवधारणा मूलतः यूरोपियन है। यूरोप जहाँ का इतिहास चर्च और चर्च के राजनीतिक चरित्र की एक गाथा है। किसी से छुपा नहीं है कि चर्च ने अपने राजनीतिक विरोधियों का दमन किस क्रूरता से किया। चर्च के विरोध का अर्थ था सुनिश्चित और हृदयविदारक मौत। तो जब यूरोप में लोकतंत्र आया तो यह सुनिश्चित करने के लिये कि चर्च और धर्म का हस्तक्षेप राजनीति में न हो, वहां धर्मंनिर्पेक्षता के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इसका मकसद था कि सत्ता और सरकार का कोई धर्म न हो दूसरे शब्दों में कहें तो चर्च को सरकार से दूर रखा जाये। यह धर्मनिरपेक्षता यूरोप की आवश्यता थी और इसने यूरोप में लोकतंत्र स्थापित करने में मदद भी की। लेकिन क्या भारत में इसकी जरूरत थी? क्या भारत के मंदिर चर्च की तरह राजनीतिक केंद्र रहे हैं ? क्या भारत के अशोक और अकबर जैसे शासकों ने जैसे शासन चलाया वह धर्मनिरपेक्ष नहीं था? वसुधैव कुटुम्बकम जैसे सिद्धांत के रहते क्या हमें कहीं और से धर्मनिरपेक्षता सीखने की आवश्यकता है?
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‌यह कुछ ऐसा ही है जैसे किसी स्वस्थ आदमी का ह्रदय निकाल उसको कृत्रिम हृदय प्रत्यारोपित कर दिया जाये। इससे व्यक्ति पहले से बेहतर नहीं हो सकता। ह्रदय प्रत्यारोपण दिल के मरीजों के लिए है, स्वस्थ व्यक्ति के लिए यह जानलेवा तक हो सकता है। मूर्खतापूर्ण और खर्चीला तो यह होगा अलग से । यह किसी से छुपी बात नहीं है कि जब से यह धर्मनिरपेक्षता वाला कृत्रिम ह्रदय हमारे लोकतंत्र को लगाया गया है, हमारे हार्ट अटैक बढ़ ही गये हैं, घटे नहीं। सेकुलरिस्म के नाम पर वह सारी चीज़ें की जा रही हैं जो धर्मनिरपेक्ष कतई नहीं है। अशोक स्वयं बौद्ध थे और अकबर दीन ए इलाही का धर्म चलाते थे। इस हिसाब से इस यूरोपियन धर्मनिरपेक्षता के अनुसार दोनों धर्मांध थे न कि धर्मनिरपेक्ष।
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‌यह बात बहुत आश्चर्यजनक नहीं है कि हमें अपनी चीज़ों और अपनी संस्कृति से पाश्चात्य चीज़ें बेहतर लगती हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने हमपर राजनीतिक और मानसिक रूप से शासन किया है। राजनीतिक शासन तो 1947 में समाप्त हो गया, मानसिक शासन अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। जरूरत है कि हम अपनी चीज़ों के महत्व को समझें और वन काटकर वृक्षारोपण वाला कार्य न करें।

शून्य आपका जीवन सार है

शून्य की एक खास बात है। चाहे कोई भी भाषा हो , कोई भी लिपि हो, शून्य को लिखने का एक ही तरीका है। एक वृताकार आकृति जिसके अंदर खाली है, बाहर खाली है। जिसका कोई ओर छोर नही। संख्या प्रणाली शून्य से शुरू हो बढ़कर अनंत तक जाती है। अनंत का निशान भी दो शून्य से मिलकर बना है। उसका भी कोई ओर छोर नहीं। अगर शून्य और अनंत एक जैसे हैं, तो इसके मायने क्या हैं?

आप किसी चीज़ को उछालो, चीज़ ऊपर जाएगी, फिर नीचे आएगी। आप ज्यादा जोर से उछालोगे तो चीज़ ज्यादा ऊपर जाएगी, पर नीचे आएगी जरूर। उसी रफ्तार से जिस रफ्तार से गई थी। इंसान तप करके ईश्वर बनना चाहता है, ईश्वर अवतार लेकर इंसान बनना चाहता है। कोई भी चीज़ सीधी नही है जिसके सिरे एक दूसरे से अलग हों। सारे सिरे एक दूसरे से मिलते हैं।

‌दुनिया गोल है। यह बात भौगोलिक रूप से और आध्यात्मिक रूप से भी सच है। चीज़ें जहां से शुरू होती हैं, वहीं खत्म होती हैं। यह एक ध्रुव सत्य है। पर मानव इच्छाएं वृताकार नहीं उर्ध्वगामी है। हमेशा सीधी लकीर में ऊंचा से और भी ऊंचा जाना चाहती हैं। गोलाकार दुनिया सीधी मानव आकांक्षाओं को तब तक ही संभाल सकती है जब तक यह उसकी परिधि के परे न जाये। ज्यामिति के अनुसार कोई भी सीधी चीज़ तब तक ही सीधे रूप में एक गोले के अंदर रह सकती है जब तक उसकी लंबाई गोले के व्यास से कम हो। उससे ज्यादा सीधी चीज़ को अगर गोले के अंदर रहना है तो मुड़ना पड़ेगा। मुड़ना पड़ेगा उसी दिशा में जहां से उसकी शुरुआत हुई थी। आपकी प्रगति, इच्छाएं, महत्वाकांक्षाएं एक खास बिंदु से ऊपर जाकर वापस अपने आदि की तरफ लौटेगी। अब यह आप पर निर्भर है कि आप इसको प्रकृति का नैसर्गिक सिद्धांत मान स्वीकार करते हैं या इसके खिलाफ लड़ने का व्यर्थ प्रयास कर विफल और हताश होने का निर्णय लेते हैं। 

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‌संख्या शून्य अपने आप में एक संख्या से कहीं बढ़ कर है। शून्य आपका जीवन सार है। धरती पर खड़े होकर अपनी स्वप्निल आँखों से तारों भरे सुसज्जित आकाश को देख मानव ने उसे अनंत अंतरिक्ष कहा। वो अंतरिक्ष जहां पहुंचना और उसपर आधिपत्य मानव सभ्यता की पराकाष्ठा कही जाए। कालांतर में मानव जाति ने अंतरिक्ष को जानने के बाद उसका एक नाम शून्य ही रखा। अगर उत्पत्ति और पराकाष्ठा दोनों शून्य में ही समाहित हैं तो इसका अर्थ है कि आपकी उर्ध्वगामी सीधी रेखा वाली जीवन की योजनाएं बहुत दूरदर्शी नही है। सिर्फ छोटे समयकाल में आपकी ऐसे योजनाएं तार्किक लगती हैं। ओलिम्पिक में होने वाली दौड़ को ही देखें। 100 मीटर वाली दौड़ सीधी रेखा में होती है और 800 मीटर वाली दौड़ गोलाकार। आप जितनी लंबी दौड़ के धावक होंगे आप जानेंगे कि आपकी शुरुवात और आपकी नियति एक ही जगह होनी है। आप उसी हिसाब से अपनी मानसिकता को ढालेंगे और शून्य से डरेंगे नहीं बल्कि उसे ही सत्य मान स्वीकार करेंगे।

निंदक नियरे राखिए,

एक राजा को महंगे महंगे कपड़े पहनने का बड़ा शौक था। दूर दूर से दर्ज़ी कारीगर आते और अपनी बेशकीमती कपड़े राजा को पहनाते। राजा भी सबको मुंहमांगी कीमत और इनाम दे विदा करता। एक बार दो ठगों ने राजा की इस कमजोरी का फायदा उठाने का सोचा। वो राजा के दरबार पहुंचे और उन्होंने कहा कि वो राजा के लिये सबसे अनूठा लिबास बनायेंगे। उन्होंने राजा से कहा कि उन्हें यह लिबास बनाने में पूरे एक महीने का वक़्त लगेगा। राजा ने दोनों के रुकने की व्यवस्था राजमहल में ही कर दी और उन्हें राजकीय अथिति का सम्मान दे दिया गया। दोनों ठग आराम से ऐशो आराम की ज़िंदगी काटने लगे। लेकिन जो नौकर चाकर उनके कमरे में जाते उन्हें कपड़े के नाम पर लकड़ी पर टंगी सिर्फ दो रंगीन धागे नज़र आते। जब महीना पूरा हुआ तो दोनों ठग वही लकड़ी और दो धागे लेकर राजा के दरबार पहुंचे। उन्होंने कहा कि दुनिया का सबसे अनूठा लिबास तैयार है । यह ऐसा अनूठा लिबास है जो सिर्फ बुद्दिमान जनों को दिखाई देता है। यह देखिये महाराज कपड़े का सुंदर रंग और उसपर की गई कारिगरी। राजा को सिर्फ दो धागे दिखे पर उसने सोचा शायद वो बुद्धिमान नही है इसीलिए उसे लिबास नही दिख रहा। राजा ने प्रधानमंत्री से पूछा कि क्या उन्होंने इतनी अच्छी कारिगरी कभी देखी है। प्रधानमंत्री ने भी अपने आप को बुद्दिमान सिद्ध करने के लिये कह दिया कि वाकई वो लिबास सबसे अनूठा है। फिर क्या सारे दरबार ने हाँ में हाँ मिलाई और लिबास के तारीफ के कसीदे पढ़ने लगे। दोनों ठग ढेर सारा इनाम लेकर निकल पड़े। राजा ने एलान किया कि वो यह अनूठा वस्त्र पहन कर अपनी प्रजा के बीच जायेंगे। इस बीच प्रजा में भी यह बात फैल गई कि राजा एक ऐसा वस्त्र पहन कर प्रजा के बीच आएंगे जो सिर्फ बुद्दिमान को ही दिखाई देगा। राजा दो धागे पहन जब जब अपनी प्रजा के बीच निकला तो सब लोग लिबास को देखने और सराहने का झूठा नाटक करने लगे। पर एक बच्चे ने जब राजा को नग्न देखा तो चिल्ला पड़ा, राजा नंगा है , राजा नंगा है।

हाल में कहीं पढ़ा कि धोनी को हेलीकॉप्टर शॉट सिखाने वाला उनका दोस्त खेल की दुनिया में अपना कोई मुकाम हासिल नही कर पाया। पर धोनी के उसी हेलीकॉप्टर शॉट के मुरीद सारी दुनिया में हैं। भगवान बुद्ध एक हठयोगी बन उपवास कर अपने प्राण त्याग देते अगर सुजाता की खीर और सीख उन्हें न मिली होती। इस तरह से देखें तो एक साधारण गृहिणी सुजाता ने हमें को बुद्ध दिया जो अपने शरीर की वीणा को तोड़ने को तत्पर था । वही वीणा जिससे बाद में ज्ञान का ऐसा मधुर संगीत निकला जिसने सारी मानव जाति को शांति और सन्मार्ग का संदेश दिया।

‌बड़ी बात और काम की बात हमेशा ज्ञानी, प्रबुद्ध तथाकथित जानकार लोग ही कहें ऐसा आवश्यक नही है। निकम्मा से निकम्मा आदमी भी बड़ी से बड़ी बात कह सकता है। जरूरी है कि बात को सुना जाये, बात कहने वाले पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं है। कहावत भी है कि आम खाओ पेड़ मत गिनो।
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‌सोनू निगम ने कोई धर्म के जानकार नही हैं। ना ही उन्होंने धर्म के बारे में कुछ कहा है। मगर जो कहा है वो ज्यादा जरूरी है। हाँ उनके कहने का अंदाज़ गलत हो सकता है पर बात गलत नही कही है। बजाय इसके कि उन्होंने क्या कहा इसपर बात हो, बात यह हो रही है कि सोनू एक फ्लॉप गायक हैं, उनको राज्यसभा सीट चाहिये, वगैरह वगैरह।। ऊपर से बजने वाले भोंपू को धर्म से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। सोनू की हालत उसी बच्चे की तरह है जिसने सिर्फ वो कहा जो हर कोई कहना चाहता था। बस बच्चे ने कहा दिया कि राजा नंगा है । जिसने भी नंगे राजा को नंगा नही कहा वो या तो स्वार्थवश था या भयवश।
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चाहे सुजाता के रूप में वो बुद्ध को मिले, या एक मुहल्ले के खिलाड़ी के रूप में धोनी को, सीख कहीं से भी आ सकती है। व्यक्ति , संस्था या देश की महानता एक आवाज़ों को दबाने या उनका तिरस्कार करने में नही है। आइना तोड़ देने से आपकी सूरत नही सुधर सकती। न ही संदेशवाहक को मार देने से आपका प्रतिद्वंदी पराजित होता है। ऐसा कर आप वस्तुतः अपनी ही खामियों और कमजोरियों को जगजाहिर कर रहे हैं।

कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई बनाय।
ता चढि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय॥
संत कबीर का यह दोहा अगर आपको पसंद नही है तो कम से कम यह दोहा तो जरूर पसंद होगा।

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय।
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।

सोनू पर चर्चा न करें पर उसकी बात पर जरूर गौर करें। अन्यथा एक तो आप सबके सामने उस नंगे राजा की तरह होंगे जिसपर प्रजा मन ही मन हँसेगी और दूसरे आपके खजाने को कोई ठग ले जाएगा।

उड़ान

सच्चाई क्या है? जो दृष्टिगोचर हो रहा है, क्या वह सच है? अंग्रेजी फ़िल्म मैट्रिक्स के एक दृश्य में मॉर्फियस नाम का चरित्र नायक नीओ से पूछता है कि वास्तविकता क्या है? क्या वास्तविकता वो है जो आपको अपनी आँखों से दृष्टिगोचर होता प्रतीत होता है? या वास्तविकता वो है जिसका संज्ञान आप अपनी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा लेते हैं? अगर यह वास्तविकता की यह परिभाषा है तो यह वास्तविकता आपके मस्तिष्क द्वारा महसूस किए गए विद्युत तरंग हैं। अगर इस बात को हम ध्यान से देखें तो हम पाएंगे कि वास्तविकता में आपका एक पुट मौजूद है। वास्तविकता वह है जो आपके मस्तिष्क ने महसूस किया। मतलब अगर मस्तिष्क बदल दिया जाए तो वास्तविकता बदल जाएगी। तारे और चांद आखों को इतने मनभावन और सुंदर प्रतीत होते हैं कि उन्हें हम अपने प्रेमी, प्रेयसी, मामा, हीरे , मोती जाने किस किस की संज्ञा नही दे चुके हैं। नज़दीक जाकर दिखने वाली वास्तविकता यह है कि चांद एक जलरहित, जीवन रहित बंजर है जहां जीवन की कल्पना भी कठिन है। तारे वास्तव में सूर्य भांति जलते अग्निपिण्ड हैं जिसके हज़ारों मील दूर भी खड़े रहना संभव नही।

उन्मुक्त गगन में विचरण करते पंछी समूह प्रागेतिहासिक काल से मानव को उड़ने के लिए प्रेरित करते रहे हैं। करीब एक सदी पूर्व तक जब तक बिल्वर बंधुओं ने अपनी पहली उड़ान नही भरी, उड़ने का स्वप्न एक दिवा स्वप्न ही था। आखिर उड़ना इतना मनभावन है। आप हमारी कहानियों , लोक साहित्य और प्राचीन ग्रंथों को ही देख लें। चाहे रामायण के पुष्पक विमान का वर्णन हो, या अलादीन की जादूई चटाई , पेगासस के रूप में उड़ने वाले घोड़े हों या झीने झीने पंखों वाली परियां, उड़ान को हमेशा से एक सुखद स्वप्निल अनुभव की तरह पेश किया जाता है। विज्ञान और तकनीक की प्रगति ने उड़ान की मानव इच्छा को कल्पना की दुनिया से निकाल वास्तविक जीवन का एक साधारण अंग बना दिया है। जिस तरह दूर से दिखने वाले चाँद और वास्तविक चाँद में अंतर है, क्या यही चीज़ मानव उड़ान पर भी लागू है?

‌ऊंचा उडने के लिये सबसे पहले आपको तेज दौड़ना पड़ता है। इतनी तेज कि आसपास की सारी चीज़ें पीछे भागती नज़र आये। इतनी तेज कि पीछे भागती चीज़ें आप देख भी न पाएं। आप देख भी नही सकते क्यूंकि आपकी नजर सीधी अपने रास्ते पर होनी चाहिये, वरना आप तेज़ दौड़ नही पाएंगे। आप उन लोगों को भी नही देख सकते जो शायद आपकी तेज गति को देख हतप्रभ हो ताली बजा रहे हैं। एक बच्चा जो आपको तेज गति से दूर जाता देख हाथ हिला कर आपको विदा कर रहा है । आपको पता भी नही चलेगा ,उसको वापस से हाथ हिला कर जवाब देना तो दूर की बात है। आखिर यह सब करने से आपकी गति कम होगी , जो आपके उड़ने का सपने में बाधक है। अब इतनी तेज दौड़ने के लिए जरूरी है कि आप भीड़ से दूर हो जाएं । भीड़ में तेज नही दौड़ सकते। सबको साथ लेकर तेज़ नही दौड़ सकते। उड़ने के लिए जितनी तेज आप दौड़ना चाहते है वो भीड़ से दूर खाली जगह पर अकेले ही संभव है। आप दौड़ने के लिए भी आप अपने लिये आप ऐसी जगह चाहते हैं जो बिल्कुल खाली हो। तो आप सबसे पहले भीड़ से अलग होते हैं। हर ऐसी चीज़ जो आपके तेज दौड़ में बाधक है, वो भीड़ है , अवांछित है। यहां तक कि वो पंछी भी आपकी उड़ान के समय अवांछित हो जाता है जिसको देख आपको उड़ने की प्रेरणा मिली थी।

उड़ने के लिये धरातल को छोड़ना आवश्यक है। आप धरातल के नजदीक भी नही उड़ सकते। उड़ना शुरू करते ही, यह जरूरी हो जाता है आप धरातल से दूर हो जायें। जैसे जैसे आप धरातल से दूर होते जाते हो आपको धरती के लोग चीज़ें छोटे दिखने लगते हैं। आपको लगता है कि आप बहुत बड़े हो गए हो जो आसमान में उड़ रहे हो। वस्तुतः आप बड़े नही होते हो, बस बाकी लोगों से दूर हो गए होते हो। इस दूरी को अपना गुरुत्व और बड़प्पन समझने की भूल बहुधा देखी गई है। जैसे जैसे आप और ऊंचाई पर पहुंचते हो आपकी गति काफी तेज हो गई होती है। लेकिन आपको लगता है कि आप या तो स्थिर हो या अत्यंत मंथर गति से आगे चल रहे हो। उपर अकेले उड़ते हुए ऐसा भी आभास होता है कि शायद आप उड़ भी नही रहे वरन स्थिर हैं। यह एक अजीब सी स्थिति है, कि आप
उड़ तो रहे हैं पर स्थिर या जड़ होने की हताशा आपको घेरे हुए है। आप उड़ने का अपना स्वप्न जी रहे हैं लेकिन जड़ता का भाव आपके मानस पटल पर छाया है। आप उन पंछियो से कहीं ऊपर आसमान की सैर कर रहे हैं जिनको देख आपने उड़ने का प्रण लिया था ,पर आपकी उड़ान में पंछियों का वह नाद वह कलरव अनुपस्थित क्यों है।

पंछियों की उड़ान क्या उन्हें वही आनंद, वही उल्लास देती है जो धरती पर खड़े मानव उनको देख महसूस करते हैं? मानव के उड़ने का अनुभव उसके बिल्कुल उलट है। क्या पंछियों का उड़ते समय दिखने वाला आनंद वास्तव में हमारी आँखों का एक भ्रम है और पंछी भी उसी जड़ता और एकाकी भाव से त्रस्त हैं जो मानव उड़ते समय महसूस करते हैं? शायद इस प्रश्न का उत्तर सिर्फ उड़ कर देना संभव नही है, इसके लिए पंछी बन उड़ना पड़ेगा। शायद मानव को ज्ञात उड़ने की वास्तविकता से मानव मस्तिष्क का यह पुट हटाये बिना यह ज्ञात नही हो सकता।

Some myths and facts about Kashmir Issue

Some myths and facts about Kashmir Issue :

Myth: Its a territorial dispute.
Fact : It is a religious issue where Islamists are fighting against whom they call Kafirs.

Myth: Talking to the separatists/Pakistan will give us solution.
Fact : Situation will worsen unless demography of valley changes. Allow people from mainland India to settle there. Start with native Kashmiri Pandits. Article 370 has to go.

Myth : Kashmiri youth want jobs /education .
Fact : Stone pelters are radicalized cunning people who want only perks . They never pelt stones on those who burn schools.

Myth: Kashmir is an integral part of India.
Fact : Islamists have captured Kashmir from us. We need military action to win it back before calling it an integral part of India.

Myth : Battle for kashmir is only in the valley.
Fact : Battle is everywhere. Especially in Delhi power corridors where a nexus of leftists, separatists and media makes sure India always sticks to talks and no firm action is taken. Support system of these separatists in Delhi has to broken for once and all.

Bahubali -2

If Mahesh Bhatt makes Baahubali, Baahubali will be an illicit child of Devasena from her extramarital affair and Bhallaldev will be played by Emraan hashmi who will run a brothel.

If Karan Johar makes Baahubali , Katappa will be a gay warrier who will conduct a pride parade in Mahishmati opposed by gayphobic king Bhallaldev.

‌If Anuraag Kashyap makes Baahubali, Devsena will hurl so many abuses at Bhallaldev and Nawaz will play Baahubali a psychopath serial killer with disturbed childhood who wants to avenge for her mother.
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‌If Sanjay leela Bhansali makes Baahubali, Devsena will sing love songs with Bhallaldeva in a dream sequence.
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‌If Yashraj makes Baahubali, Mahishmati will resemble Zurich and Geneva.
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‌If Congress makes Baahubali, it will be named Bhallaldev, Shivgami will be of foreign origin.. Baahubali will be the villain.
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‌If BJP makes Baahubali, Bhallaldev will be beaten black and blue by gaurakshaks for killing a bull.
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‌If Samajwadi party makes Baahubali, Baahubali will be called Bhau Ali..
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If David Dhawan makes Baahubali, Bhalla and Bahu will be good for nothing spoilt brats who will chase Devsena and her girlfriend singing cheap songs.

If RGV makes Bahubali, not sure what will happen as no one will watch it..

If I make Baahubali, I will get at max. 50 likes on Facebook.. :(

भारतीय रेल में आर ए सी

भारतीय रेल की कई खास खूबियां हैं , उनमें से एक अलग सी खूबी है आर ए सी। आर ए सी का मतलब है रिजर्वेसन अगेंस्ट केंसीलेशन। दूसरे शब्दों में कहें तो इस शब्द की उत्पत्ति इस बात से हुई है कि भारतीय रेल का दिल बहुत बड़ा है, कम से कम यूनाइटेड एयर लाइंस से ज्यादा बड़ा।
सीट से ज्यादा आदमी आ जाने पर भी भारतीय रेल उनको यथासंभव निराश नही करती। उन्हें खींच घसीट कर बाहर नही निकालती, बल्कि अपने साथ जगह देती है कि चलो देखते हैं अगर रास्ते में कुछ हो पाया तो तुम्हारा भी कुछ करेंगे। हमारी रेल और हमारे यात्री को भरोसा रहता है कि कोई न कोई तो ट्रेन मिस करेगा ही। कुछ लोग ट्रैफिक जाम की वजह से ट्रेन मिस करेंगे, तो कुछ किसी बंद हड़ताल की वजह से। अगर यह कारण नहीं भी हुए तो अशुभ महूर्त, हानिकारक यात्रा योग, दिशा शूल और बिल्ली के रास्ता काटने की वजह से कोई न कोई तो नही आएगा और आर ए सी वालों को सीट मिल जाएगी। अब उम्मीद पर दुनिया कायम है, तो फिर आर ए सी वाले उम्मीद का दामन क्यों छोड़ें??

‌आपने कई बार सुना होगा कि हाशिये पर पहुंचा दिए गए लोग। हाशिये पर रहने वाले लोगों की समस्या। अगर इन शब्दों को समझने में आपको दिक्कत आ रही है तो आपने आर ए सी वालों को नहीं देखा है। साइड वाली छोटी लोअर सीट पर दुबके बैठे आर ए सी वाले लोग हाशिये पर बैठे लोगों का जीवंत उदाहरण पेश करते दिखते हैं। वो लोग जिन्हें अब तक वो जगह नही मिल पाई जिसके वो हकदार हैं। पर दबे कुचले लोगों की भांति वो अन्याय के खिलाफ कुछ बोलते नहीं बस आखों में उम्मीद की एक किरण लिये पूरी सीट वालों की तरफ ताकते रहते हैं। 



अब जिनके पास पूरी सीट है वो तो आर ए सी वालों को ऐसे देखते हैं जैसे उनके उपवन में वानर घुस आए हों। जैसे उनके नो एंट्री वाली सोसाइटी में सामान बेचने वाले हॉकर आकर हाज़मे की गोली बेच रहे हों। आर ए सी वालों को ऐसी दुत्कार और तिरस्कार मिलने के कई कारण हैं। आर ए सी वाले रेल की दुनिया के त्रिशंकु हैं। ना इधर ना उधर। रेल में हैं पर पूरे यात्री नहीं, सीट मिली पर पूरी नहीं। यह कुछ ऐसा है कि जैसे रेल वाली महबूबा ने वैलेंटाइन डे के दिन आपको फ़्रेंडजोंन में डाल दिया हो।
देखिये अगर आप आर ए सी में सफर कर रहे हैं तो दो तीन बातें तो साफ है। पहली यह कि हवाई जहाज से चलने की आपकी औकात और मंशा दोनों नहीं है। दूसरी रेल मंत्रालय के किसी अधिकारी से दूर दूर तक आपका कोई नाता नहीं है। किसी नेताजी को आप नही जानते, नेताजी को छोड़िये आप किसी ढंग के ट्रेवल एजेंट तक को नही जानते। वरना आप आर ए सी की जगह कनफर्म टिकट पर चल रहे होते। आपकी कोई पहुंच है नही और आप अपने गन्तव्य पर पहुंचना भी चाहते हैं पूरे आराम से। यह मुंह और मसूर वाली दाल वाली बात हो गई यह तो। आप आम जनता हो यह बात उसी समय सिद्ध हो गई जब आपका नाम आरक्षण तालिका में सबसे नीचे आर ए सी वालों के साथ लिखा गया। उसी के साथ आपके भाग्य में लिख दिया गया वो दुत्कार जो कन्फर्म टिकट वाले यात्री आपके साथ करने वाले हैं।

आर ए सी के साथ बुरा व्यवहार सिर्फ कन्फर्म टिकट वाले करें तो फिर भी समझ सकते हैं। रेल ने मिलाई जोड़ी स्कीम के तहत जो आपके साथ शयनयान में बैठे हैं उनका व्यवहार भी कुछ खास नही रहता। दोनों एक दूसरे की तरफ ऐसे देखते हैं कि तू मर क्यों नही गया जो आज यहां आ गया। हे भगवान इतने लोगों की ट्रेन छूटती है इसकी भी छुड़वा देता। और इतना सामान लेकर आ गया है उतना तो तुग़लक़ भी दिल्ली से दौलताबाद लेकर नही गया था। प्यार का जवाब प्यार से मिले न मिले, यकीन रखिये आपकी इस भावना को आपके शायिका बंधु न सिर्फ समझेंगे बल्कि आपके प्रति भी उतना ही प्रेम भाव रखेंगे जितना आपके मन में उनके लिए है। भले ही फिल्मों में दिखाया जाए कि दो अजनबी मिले और उनकी कहानी बिफोर सनराइज की तरह रोमांटिक हुए पर आर ए सी वाली जनता की किस्मत तो स्लीपिंग विथ द एनिमी वाली ही रहनी है।

मुझे पता है कि अगर आप आम आदमी हैं तो कभी न कभी आर ए सी वाले जरूर रहे हैं। आपको गर्व होना चाहिये कि आपने आर ए सी वाली ज़िन्दगी जी है और समाज के समस्त तिरस्कार को सह भी आप समाज की मुख्यधारा से जुड़े रहे। वरना इतने मानसिक अत्याचार के बाद तो आप नक्सली या पत्थर बाज़ बन जाएं तो कई लोग आपका समर्थन भी करेंगे।

अगर आप कभी आर ए सी वाले नही रहे और आर ए सी वालों के साथ आपका व्यवहार रूखा है तो आपको आत्ममूल्यांकन की नितांत आवश्यकता है। आखिर आर ए सी वाले आपके डब्बे के प्रहरी हैं। आप गहरी नींद सोते हैं पर वो जागते रहते हैं। आपको सोते हुए इतने प्यार से देखते हैं जितने गौर से माँ भी अपने बच्चे को नही देखती। जिस तरह से हनुमान चालीसा सुन भूत पिशाच निकट नही आते, जिस डब्बे में 2-4 आर ए सी वाले हों , चोर और उठाईगीर उस डब्बे से दूर ही रहते हैं। आखिर उन अधजगी आखों से बचकर कौन आपका सामान चुरा सकता है । बेचारे हर एक सीट के बारे में जानते हैं कि कौन सी सीट कब खाली होनी है, किसको कहाँ उतरना है इनको अपने नाम की तरह याद है, उससे पहले कोई सामान लेकर कैसे उतर सकता है।

आर ए सी वाले जैसे आपकी क्रिकेट टीम के 12th मैन हैं। टीम में हैं पर सिर्फ पानी पहुंचाने और तौलिया लाने का काम करते हैं, बिना शिकायत किये। आपका तकिया ऊपर वाले बर्थ से नीचे गिर गया ? आपको उतरने की जरूरत नही। अपने आर ए सी वालों को कहिये आपका तकिया उठा कर आपको देंगे। आपकी चादर गिर गई, आर ए सी वाले आपको न केवल ध्यान दिलाएंगे, चादर उठाकर आपको ओढा भी देंगे। आपको नींद नही आ रही, आर ए सी वालों को बोलिये लाइट ऑन कर देंगे ताकि आप पढ़ सकें। आपका पढ़ना पूरा हो गया, बस उनको एक इशारा करिये और लाइट ऑफ।

आपके पास आई फोन हो न हो, अगर आपके डिब्बे में आर ए सी वाले हैं तो आपके पास साक्षात मानवरूप में सीरी है। कितना बजा है, कौन सा स्टेशन है, गाड़ी समय पर है कि नही, आपके सारे सवालों का जवाब आर ए सी वालों के पास है। आपको बाथरूम जाना है तो किस तरफ वाला बाथरूम साफ है या खाली है, यह सारी रियल टाइम इनफार्मेशन आपको आर ए सी वाले ही दे सकते है। वो भी फ्री में ।

पूरी सीट वालों के लिए टीटी एक परेशान करने वाला चरित्र है। आपको नींद से उठा कर टिकट मांगने वाला और पहचान पत्र को लेकर खिचखिच करने वाला एक अनावश्यक व्यवधान । पर आर ए सी वालों के लिए टीटी का महत्व एक इष्ट की तरह है। टीटी अगर सौरमंडल का सूर्य है तो आर ए सी वाले नवग्रह। एक टीटी अगर खड़ा है तो नौ आर ए सी वाले उनके चारों तरफ घूमते नज़र आएंगे। टीटी के लिए आर ए सी वाले लोग उनके ससुराल वाले जैसे हैं।क्यों न हो इतनी आवभगत तो इनके ससुराल वाले भी नही टीटी की नहीं करते जितने आर ए सी वाले करते हैं। और अब ससुराल वालों से थोड़ा उपहार ले लेने में हर्ज़ क्या है ? इतना तो हक़ बनता है टीटी साहब का।

आधा है चंद्रमा, रात आधी, रह न जाये तेरी मेरी बात आधी वाला गाना अगर किसी पर पूरी तरह लागू है तो वो एक आधे सीट वाले आर ए सी वालों पर ही लागू है। अगर किसी शोषित को आरक्षण सबसे पहले मिलने चाहिए, तो उनमें आर ए सी वाले सबसे पहले नंबर पर हैं। रेल का सफर इन आधे यात्रियों के बिना अधूरा है।

माँ, जननी और मातृत्व

आचार्य विष्णुगुप्त यानि चाणक्य नंदवंश के विरुध्द अपनी सेना को तैयार करने में लगे थे। अगर चंद्रगुप्त को मगध साम्राज्य के सिंहासन पर आसीन होना था तो उसके लिए चाहिये था एक शक्तिशाली सैन्य बल । और सैन्य बल को चाहिए था अत्याधुनिक आयुधों का भंडार । और इन सब के लिए चाहिये था धन। अब एक विपन्न ब्राह्मण चाणक्य और एक दासी पुत्र चंद्रगुप्त के पास इतना धन कहाँ से आये? चाणक्य ने निर्णय लिया कि वो घन नंद से प्रताड़ित जनता से ही धन मांगेंगे और बदले में उन्हें नंद वंश के अत्याचारो से मुक्त करेंगे। चाणक्य ने लोगों से प्रार्थना की कि वे चंद्रगुप्त को अपना पुत्र मान अपनी संपत्ति का एक हिस्सा इस अभियान को समर्पित करें। चाणक्य ने एक दरवाजे पर पहुंच आवाज़ लगाई। माँ, घननंद के अत्याचारों के अंत के लिए हो रहे यज्ञ में हमारी मदद करो माँ। तुम मुझे अपना पुत्र मान एक हिस्सा दो। तुम्हारे इस दान का बदला तुम्हारा पुत्र एक कल्याणकारी शासन देकर चुकायेगा। घर की स्त्री ने कहा कि भंते आपका लक्ष्य सराहनीय है और आपका साहस अद्वितीय। किन्तु मैं आपको पुत्र कैसे मान सकती हूँ। मैंने आपको जन्म तो नहीं दिया। चाणक्य ने कहा : माते मैं आपका पुत्र होने का सारा धर्म वहन कर रहा हूँ। एक पुत्र का धर्म है कि माता पर हो रहे अत्याचार को रोके, आक्रांताओं का दमन करे। यह सारा धर्म निभाने के बाद भी क्या मैं आपका पुत्र सिर्फ इसलिये नही हो सकता क्योंकि मैंने आपको प्रसव पीड़ा नही दी?? स्त्री की आँखों में आंसू आ गए और उन्होंने अपने समस्त धन के साथ अपने बाकी पुत्रों को भी चाणक्य के साथ धर्मयुद्ध में शामिल होने का आदेश दिया।

मदर्स डे के अवसर पर देखता हूँ कि लोग माँ के लिए एक से एक सन्देश लिख रहे हैं। कुछ लोग माँ के बनाये पकवान याद कर रहे हैं तो कोई माँ की ममता के किस्से बयान कर रहा है। कोई अपनी माँ की पुरानी तस्वीर साझा कर अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति कर रहा है तो कोई माँ की कही गयी सीख दुहरा रहा है। सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य मुझे कक्षा चार से ही घर से दूर छात्रावास , हॉस्टल , बोर्डिंग स्कूल, आप चाहे जो नाम कहना चाहें, में रहना पड़ा है। हॉस्टल में रह बचपन बिताने वालों की दुविधा यह है कि उन्हें अपनी माँ के साथ ज्यादा वक़्त नही मिल पाता। लेकिन जैसा कि प्रकृति का नियम है, संतुलन हर जगह बना रहता है। हॉस्टल में रहने वाले बच्चों को अगर अपनी माँ का सानिध्य कम मिलता है तो इसकी पूर्ति कहीं बड़ी तरीके से होती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण तब दिखता है जब महिने का वो दिन आता है जिस दिन अभिभावकों को हॉस्टल आकर बच्चों से मिलने की अनुमति होती है। मतलब पेरेंट्स डे।

हॉस्टल के तीस बच्चे अगर महीने के उनतीस दिन माँ के बिना बिताते हैं तो तीसवें दिन उन्हें तीस माँओं का प्यार एक साथ मिलता है। हॉस्टल में रखने वाले हर बच्चे की माँ जानती है कि उसके बनाये गए पकवान का इंतज़ार सिर्फ उसकी संतान नही कर रही बल्कि उसके साथ रहने वाले सभी बच्चे कर रहे हैं। इसीलिए हर माँ अपने बच्चे की जरूरत से ज्यादा हमेशा कहीं ज्यादा पकवान और संदेश बांध कर देती है। और हॉस्टल का हर बच्चा टूट पड़ता है उस प्यार की गठरी पर उसी हक़ से जैसे एक बच्चा अपनी माँ के पकवान खा रहा हो। हरेक साथी के माँ के पकवान का अलग स्वाद हमें आज भी याद है। हमारे लिये अपनी माँ और अपनी साथी की माँ में कोई फर्क नही था। कोई बच्चा अपने साथी की माँ से मिलने जाता और माँ की नज़र उस बच्चे की कमीज के टूटे बटन पर पड़ जाती, तो माँ अपने बच्चे को छोड़ दूसरे बच्चे की कमीज में बटन टांकने लग जाती। हॉस्टल में कई बार देखा है कि किसी और की माँ अपने बच्चे के बदले उसके बीमार साथी के सर पर गीले रूमाल रख पट्टी कर रही है। आज अगर माँ को याद करने और धन्यवाद करने का दिन है और मैं अपनी उस सारी माँओं को भूल जाऊं तो यह उचित नही जान पड़ता।

माँ शब्द जननी से कहीं बढ़कर है। यह संयोग नही है कि माँ शब्द सुनते ही आपके मन में यशोदा का नाम आता है। यशोदा कृष्ण की जननी नहीं थी, पर माँ अवश्य थी। माँ बनने के लिए मातृत्व का भाव आवश्यक है, जननी होना नहीं। हर किसी की ज़िंदगी में मातृत्व का भाव आपको सिर्फ आपकी जननी से मिले, ऐसा संभव नहीं है। आपकी धाय माँ, मौसी, बड़ी बहन, शिक्षिका, जननी, और आपकी धर्म माँ सब मिलकर आपके लिए माँ की परिभाषा पूरी करते हैं। यह बात अलग है कि जन्म देने वाली माँ का स्थान कोई और नही ले सकता , पर इससे आपकी बाकी माताओं का योगदान कमतर होकर नहीं आंका जा सकता। इनमें में ज्यादातर लोग ऐसे हैं, जिनका योगदान आपको याद भी नही रहता। जननी के प्रेम में तो कदाचित यह भाव भी रहता है कि यह बड़ा होकर मेरा नाम रोशन करेगा, मेरे सपने पूरे करेगा, दूसरी माँओं का प्यार आपका ऐसा कर्ज़ है जो बिना शर्त बिना किसी आशा के मिलता है। चाणक्य के एक बुलावे पर उसको अपना पुत्र स्वीकार करने वाली हर वह स्त्री उसके लिए माँ थी। आज का दिवस उन सबको प्रणाम करने का दिवस है। आज मातृत्व को नमन करने का दिवस है। मातृत्व एक व्यक्ति से परे है। शायद इसलिए एक अफ्रीकी कहावत है कि एक बच्चे को पालने में पूरा गांव लगता है। आज उस गांव को प्रणाम करने का दिन है। हैप्पी मदर्स डे।