Sunday, February 5, 2023

Reflections on Pathaan..

Some reflections on Pathaan..

1. Pathan is a sharp critique of our society. Our country is led by politicians well into their 80s, our T20 cricket team is captained by aging players with strike rate of 80, and our movies feature spies portrayed by actors from the 80s. What can the Desh ka Yuva do? They haven't been given much to do besides making reels and TikToks.

2. If John Abraham, with his gym-toned body, rightfully plays a character named "Gym," why can't SRK's character be named "VFX Pathan" or "Photoshop Pathan?"

3. If Pathan is India's top secret spy, it's curious that everyone from Afghanistan, Pakistan, India, and Dubai knows him by his name and face. Everywhere he goes, he is greeted by his first name. Perhaps he should learn the basics of using code names and not referring to himself in the third person.

4. There are also some questions regarding character naming. Deepika plays a lady spy from Pakistan and is curiously named Rubina. Why must every pretty woman from Pakistan be named something similar to Hina Rabbani? The name "Rabbani" could be interchangeable with "Rubina." Potato potahto.

5. Not only the character names, but the naming of a terrorist organization as "Outfit X" also raises concerns. The name sounds more like a fashion outlet for plus size people than a dangerous organization. Furthermore, why it is called an organisation if a single person who is also the boss of the organisation is responsible for everything from street fighting to bombing to stealing weapons to negotiating with Indian and Pakistani officials. It's a classical case like those startups where same person is CEO, Managing Director, CFO and Personal secratary to himself.

6. A serious question about Tiger also arises. Was he assigned to save Pathan from the Russians or just to give him a paracetamol tablet? It seems absurd that Bhai was carrying nothing but a gamchha and crocin while being on such a crucial mission. Come on.. RAW is not that poor.

7. Talking of poverty, credit should be given where it's due. Kudos to the perfect casting of Deepika Padukone as an ISI agent. She truly looks like someone from a country facing poverty and starvation. 

7. In nutshell.. everyone from Pakistan, Afghanistan, Dubai is good and is blessed with golden hearts except a decorated soldier from Indian army and our RAW chief. Self deprecating humor pro Max.. Pathaan script writing has Besharam rang splashed all over it. 




Friday, January 20, 2023

सुख दुख और खिचड़ी

बचपन की हिंदी कक्षाओं में पर्यायवाची शब्दों की श्रृंखला याद करना एक कठिन कार्य होता था। ऐसे में आकाश शब्द के पर्यायवाची शब्दों की सूची में एक पर्यायवाची शब्द होता था ख। सिर्फ एक वर्ण का पर्यायवाची। याद करने में आसान इसलिए हमेशा याद रहता। कभी कभी लगता था कि शायद प्रकाशक द्वारा कोई गलती हो गई है , ख का अर्थ आकाश कैसे हो सकता है, जरूर कोई और शब्द होगा जिसकी जगह एक अधूरा शब्द ख छप गया है। 

बाद में हमारे शिक्षक ने बताया कि ख से तात्पर्य होता है रिक्त स्थान। इसीलिए आकाश या अंतरिक्ष को ख कहा गया है। इसी ख से खेचर शब्द बना है जिसका अर्थ है आकाश में विचरण करने वाला अर्थात् पंछी। बाद में कुछ सोचने पर देखा कि शब्द खाली, खतम भी ख मूल शब्द से बने हैं। जिसका अर्थ रिक्तता से है। 

इसी ख शब्द में उपसर्ग दु या सु लगने से दुख और सुख शब्द बने हैं।दु उपसर्ग बुरा और सु उपसर्ग अच्छा का अर्थ रखते हैं। जैसे सुपुत्र का मतलब हुआ अच्छा बेटा और दुरात्मा का अर्थ हुआ बुरा व्यक्ति। अगर यह सही है तो दुख का शाब्दिक अर्थ हुआ बुरा खाली स्थान और सुख का शाब्दिक अर्थ हुआ अच्छा खाली स्थान। 

आखिर दुख का अर्थ बुरा खाली स्थान से कैसे है? शब्दों की उत्पत्ति का अध्ययन आपको इतिहास , साहित्य, अध्यात्म और आपको न जाने कितने विषयों का आस्वादन करवा पाने में सक्षम है। दुख और सुख शब्द में प्रयुक्त ख का तात्पर्य पहिए के बीच बने खाली स्थान से है, जिससे पहिए की धुरी जुड़ी रहती है। प्राचीन काल में जब बैलगाड़ी ही यात्रा का साधन हुआ करता था और सड़कें कच्ची ऊबड़ खाबड़ हुआ करती थीं तो यात्रा का अनुभव का अनुभव बहुत अच्छा नहीं हुआ करता होगा। एक तो रास्ता खराब उपर से अगर बैलगाड़ी के पहिए ठीक के ना घूमें तो यात्रा और भी कठिन हो जाती थी। अगर गाड़ी की धुरी और पहिए के रिक्त स्थान सही से जुड़ा है तो गाड़ी सही चल सकती थी और गाड़ी में बैठे लोगों को आराम रहता था। हमारे पूर्वजों ने अपनी गाड़ियों की धुरी और पहिए के कारण यात्रा के दौरान हुए अनुभवों के आधार पर सुख और दुख शब्दों की रचना की थी। बाद में दुख और सुख शब्दों के अर्थ में और विस्तार होता गया और यह शब्द हमारे सनातन, बौद्ध और जैन दर्शन में एक महत्वपूर्ण संकल्पना बन गया। 

शब्दों के मूल अर्थ और उनके विस्तारित अर्थ में कितना अंतर हो सकता है इसका एक और उदाहरण है शब्द दूर्वाक्षत। बिहार में खास कर मिथिला समाज में पूजा संपन्न होने के बाद दूर्वाक्षत मंत्र पढ़ा जाता है और सर्व समृद्धि की शुभकामना सहित नौनिहालों पर चावल और हरी दूब या घास छिड़का जाता है। प्राचीन काल में मानव की समृद्धि के दो ही पैमाने थे। एक मानव के लिए पर्याप्त अन्न हो और दूसरा उनकी गायों और पशुधन के लिए पर्याप्त घास उपलब्ध रहे। इसीलिए दूर्वा और अक्षत को समृद्धि का चिह्न माना कर दूर्वाक्षत मंत्र के साथ आशीर्वचन कहे जाते हैं। 


चूंकि बात ख से शूरू हुई थी तो ख से खिचड़ी शब्द की उत्पत्ति के बारे में जान लेते हैं। खिचड़ी शब्द खेचरान्न शब्द का बदला रूप प्रतीत होता है जिसका अर्थ हुआ चिड़िया के लिए अन्न। चूंकि पंछी उड़ते भटकते जो अन्न मिले उनको ग्रहण कर लेते हैं इसीलिए उनके भोजन में चावल दाल सब मिला हुआ हो सकता है। संभवतः खिचड़ी शब्द भी खेचरान्न से ही निकला है।

 ख की खासियतों का खिस्सा अभी खत्म नहीं हुआ है, और भी खुलासे बाकी है, लेकिन फिर कभी। तब तक शब्बा खैर।।

Monday, January 9, 2023

मछली जल की रानी है?

बचपन में सभी गाते हैं "मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है"। वो ही बच्चा बड़ा होकर कहता है कि एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है। साहब, या तो हम बच्चे को गलत सिखाते हैं या बड़े होकर हम गलत बोलने लगते हैं। 

आज तक मैंने किसी मछली को तालाब में पॉलिथीन या कचरा फेंकते नहीं देखा। ना ही किसी तालाब में मछली अपने गंदे कपड़े धोती है। शायद ही किसी मछली का घर का गंदा नाला किसी तालाब में गिरते देखा है। फिर मछली पूरे तालाब को गंदा कब से करने लगी।

बात बस इतनी है कि मछली को बोलना नहीं आता। जो बोल नहीं सकता, उसको कुछ भी कहा जा सकता है। मछली ना जल की रानी है और न ही वो तालाब को गंदा करती है। सब बस कहने की बातें हैं क्योंकि कहने वालों को कुछ कहना होता है । और जिन्हें सिर्फ बोलना और कहना होता है वो अक्सर अपनी पिछली बातें भूल जाते हैं और कुछ भी कह जाते हैं। सोचिए, अगर मछली बोल सकती तो क्या कहती इन बोलने वालों के प्रति। हां अगर अगली बार कोई गंदा तालाब दिखे तो उसको गंदा करने वाली मछली ढूंढने के बदले एक आईना ढूंढिए, शायद आपकी खोज मुकम्मल हो जाय।

Wednesday, January 4, 2023

paanchwa mausam pyar ka


पहले लोग बहुत परेशान थे.. हमारे शहर में बहुत गर्मी थी... हमारे शहर में लू चलती थी.. लोग घरों से बाहर नहीं निकल पाते थे..

उसके बाद हमारे शहर में बरसात आई... लोगों की परेशानियां फिर भी कम नहीं हुई.. मलेरिया और डेंगू हर तरफ फैल  गया.. चारों तरफ कीचड़ और पानी.. लोगों घरों से बाहर नहीं निकल पाते थे।

अब हमारे शहर में सर्दी का मौसम आया है.. लोग फिर भी परेशान हैं.. शीत लहर चल रही है.. लोग घरों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं..

अब सोचता हूं कि जब लोग घर से बाहर निकल ही नहीं पा रहे हैं तो ट्रैफिक जाम सड़क पर क्यों लग रहा है? शॉपिंग करने कौन जा रहा है? पुलिस भीड़ भगाने के लिए आखिरी किस पर लाठी चार्ज कर रही है.. आखिर ट्रेन की स्लीपर क्लास में राजनीति पर तीखी चर्चा कौन कर रहा है? कौन हैं ये लोग? कहाँ से आते हैं?

शायद दो तरह की जनता है अपने शहर में.. एक वो जिसके पास वक्त है मौसम को देखने का और ये वही लोग हैं जिनके पास विकल्प है मौसम का बहाना करके घर से नहीं निकलने का.. बाकी बचे वो लोग उन्हें पता ही नहीं कि क्या मौसम है.. उनको बस समय का पता है कि सात बजे गए, अब काम पर निकलना है..

विडंबना ये है कि हर मौसम से शिकायत वही लोग कर रहे हैं जो घर पर बैठे हैं.. जिनको बाहर जाना है उनको शिकायत करने का वक्त कहां.. शिकायत करें भी तो किस से और शिकायत करके भी क्या ही हो जाएगा..

बहुत साल पहले आनंद बख्शी साहब ने एक गीत लिखा था.. पतझड़ सावन बसंत बहार, एक बरस के मौसम चार, पांचवा मौसम प्यार का इंतजार का..

पहले ये गीत मुझे समझ नहीं आता था.. पहली लाइन में कहा गया कि एक बरस के मौसम चार.. फिर अगली ही लाइन में, ये पांचवा मौसम कहां से आ गया!!

अब समझ में आ रहा है.. असल में "एक बरस के मौसम चार" वाले चार मौसम उनके लिए हैं जिन को घर से बाहर निकलना है रोज रोज.. बाकी जिनको मौसम की शिकायत करके घर से निकलना ही नहीं है उनके लिए तो हमेशा पांचवा मौसम ही चलता रहता है.. प्यार का.. आखिरी घर बैठा आदमी और करे भी तो क्या.. इन्ही पांचवे मौसम में जीने वाले लोगों की वजह से हम चीन तो कम से कम एक चीज में तो टक्कर दे पा रहे हैं और हमारे मैटरनिटी वार्ड हमेशा हाउसफुल रहते हैं ..

  अब और क्या कहूं.. यही पांचवे मौसम में जीने वालों की कारगुजारियों और करामातो को गिनने का काम करने जा रहा हूं.. घर से बाहर जा रहा हूं जनगणना करने.. और हाथ में आज का अखबार है जिस में लिखा है कि सर्दी कि वजह से लोग घर से निकल नहीं पा रहे हैं..



Pahlelog bahut pareshan the.. hamare shahar mein bahut garmi thi... Hamare shahar mein loo chalti thi.. log gharon se bahar nahin nikal paate the..

Uske baad hamare shahar mein barsaat aayi... Logon ki pareshani phir bhi kam nahin hui.. Maleria aur dengue har taraf fail gaya.. Charon taraf keechad aur paani.. log gharon se bahar nahin nikal paate the..

Ab hamare shahar mein Sardi ka mausam aaya hua hai.. log phir bhi pareshan Hain.. sheet lahar chal rahi hai.. log gharon se bahar nahin nikal paa rahe hain..

Ab sochta hoon ki jab log Ghar se bahar nikal hi nahin paa rahe hain to sadkon per traffic jam kyon lag raha hai? Shopping karne kaun Jaa raha hai? Police bheed bhagane ke liye aakhir kis per lathi charge kar rahi hai.. aakhir train ki sleeper class mein raajneeti per teekhi charcha kaun kar Raha hai? Kaun hain yeh log? Kahan se aate hain?
Shayad do tarah ki janta hai apne shahar mein.. ek woh jiske paas waqt hai mausam ko dekhne ka aur wohi log hain jinke paas option hai mausam ka bahana karke ghar se nahin nikalne ka.. baaki bache woh log unko pata hi nahin ki kya mausam hai.. unko bas samay ka pata hai ki saat baje Gaye , ab kaam per nikalna hai.. 

Vidambna yeh hai ki har mausam se shikayat wohi log kar rahe hain jo ghar per baithe hain.. jinko bahar jaana hai unko shikayat karne ka waqt Kahan.. shikayat karein bhi to kis se aur shikayat karke bhi kya ho jayega..

Bahut saal pahle Anand Bakshi saab ne ek geet likha tha.. patjhad sawan basant bahar, ek baras ke mausam char, paanchwa mausam pyar ka intzaar ka..
Pahle yeh geet mujhe samajh nahin aata tha.. pahli line mein kaha gaya ki ek baras ke mausam char.. phir agli hi line mein, paanchwa mausam Kahan se aa gaya!! 

Ab samajh mein aa raha hai.. actually ek baras ke mausam char wale char mausam unke liye hain jinko Ghar se bahar nikalna hai Roz roz.. baaki jinko mausam ki shikayat karke ghar se nikalna hi nahin hai unke liye to hamesha paanchwa mausam hi chalta rahta hai.. pyar ka.. aakhir Ghar baitha aadmi aur kare bhi to kya.. enhi paanchwe mausam mein jeene Wale login ki wajah se hum china to kam se kam ek cheez mein to takkar se paa rahe hain aur hamare maternity ward hamesha housefull rahte hain.. ab aur kya kahun.. enhi paanchwe mausam walon ki kaarguzarion aur karamato ko ginne ka kaam karne jaa raha hoon .. janganna census duty per ghar se bahar Jaa raha hoon.. aur haath mein aaj ka akhbar hai jismein likha hai ki sardi ki wajah se log Ghar se nikal nahin paa rahe hain..




Tuesday, December 27, 2022

happy 57th Birthday Salman bhai

A guy born in 1988 is not eligible to appear in the UPSC 2023 examination as he is three years older than the maximum age limit allowed to appear in the examination.

If we take 1988 as the reference year, Virat Kohli was yet to be born, as were the rest of our cricket team. Messi was a toddler yet to celebrate his first birthday. Disha Patani was four years away from being born, and Bill Gates was just a new billionaire with a net worth of $1.5 billion.

BJP had 2 MPs in Lok Sabha and Congress had 404. The phenomenon of Lalu Ji was yet to happen in Bihar, and Ramanand Sagar's Ramayan was still running its first telecast on Doordarshan. And yes, no 90s kids have been born yet. Sachin still had to play his first international match.

Seems pretty old, na.. that's when "Biwi ho to aisi" was released with Sallu bhai as the leading man. Thanks to the love of the audience and the advance medical technology of surgeons, the world around him has gotten old, but not our Bhai.

Happy birthday, Salman bhai. May you remain young as always and keep hosting Bigg Boss, by which you remain the biggest crusader and individual contributor in mass scale solid waste management efforts in India.

बक्सा और लकड़ी

सीधी लकड़ी फिट नहीं होती
एक छोटे बक्से के भीतर,
चाहे उसे टेढ़ी रखो या आड़ी।
चाहे उसका अधिकतर हिस्सा 
चला जाय बक्से के अंदर,
लेकिन एक सिरा फिर भी
बाहर झांकता रहता है ।
मानो मंजूर नहीं उसको
पूरी तरह बक्से में कैद हो जाना।
जैसे अपने हिस्से की खुली हवा 
के लिए मंजूर है उसको 
अपनी गर्दन फसाना बक्से के ढक्कन के बीच।
सीधी लकड़ी का बाहर झांकता सिरा
फिट नहीं होने देता बक्से के ढक्कन को,
ढंग से बंद नहीं ही पाता बक्सा
लकड़ी की वजह से।
अधखुला बक्सा छुपा नहीं पाता
उसके अंदर पड़ी तुड़ी मुड़ी तारों को।
जो लकड़ी से कहीं ज्यादा महंगी हैं
लेकिन जो मुड़ गई हैं बक्से के अनुसार।
दूसरे तारों से जुड़ने के लिए 
तारें नंगी भी हुई हैं किनारों पर।

तारें जो मुड़ जाती हैं 
बहुत आसानी से 
जुड़ जाती हैं आसानी से दूसरी नंगी तारों से।
और आसानी से ढाल लेती हैं
अपने आप को बक्से के मुताबिक
और बना लेती हैं अपना नेटवर्क।
लेकिन सीधी लकड़ी ना मुड़ती है
और ना जुड़ती हैं आसानी से।
और ना ही बनता है 
सीधी लकड़ी का कोई नेटवर्क।

लकड़ी को जोड़ने के लिए 
बींधना पड़ता है उसे कीलों से।
और जुड़ने के बाद भी उनमें
वो करेंट नहीं दौड़ता।
जो दौड़ जाता है जुड़ी मुड़ी नंगी
 सुचालक तारों से।
सीधी लकड़ी कुचालक कही जाती हैं
जो बिगाड़ देती हैं बक्से की हर कोशिश
उसको अपने अंदर समेटने की।

इसलिए हर बक्सा करता रहता है कोशिश
 सीधी लकड़ी को तोड़ने की
पर लकड़ी है कि अपनी ज़िद पर अड़ी रहती है ।
टूट जाने पर भले पड़ी रहती है
टूटी हुई लकड़ी नंगी तारों के साथ, बक्से के अंदर ।
जब तक टूटे नहीं हर सीधी लकड़ी
बिना मुड़े, बिल्कुल सीधे
छोटे वाले बक्से की गर्दन पर खड़ी रहती है।



Monday, December 19, 2022

दूर के रिश्तों की कथा

रिश्तेदार दो तरह के होते हैं। एक होते हैं रिश्तेदार जैसे बहन, साला। और दूसरे होते हैं दूर के रिश्तेदार।  जैसे दूर की बहन, दूर का साला। रिश्तेदारों की बात क्या करें। रिश्तेदारों की कारनामें अगर जानना हो तो रामायण, महाभारत कुछ भी पढ़ लें, पता चल जायेगा। रामायण और महाभारत पढ़ने का समय ना हो तो पास के किसी वकील के पास कचहरी चले जाएं , नजदीकी रिश्तेदारों की कहानी आपको पता चल जायेगी। आज हम बात करेंगे दूसरे टाइप के रिश्तेदारों की , दूर के रिश्तेदारों की।

पहला रिश्ता है जीवन साथी का। आप कहेंगे पति पत्नी कहां से दूर का रिश्ता हो गया। तो सुनिए, बीवी तो हमेशा ही दूर की अच्छी  लगती है। पति दूर ही रहे तभी सुहाता है, घर पर बैठा पति तो जान की आफत के जैसा है। दूर बैठा पति दो पैसे कमा के भेजता है। घर बैठे पति को सुबह गरम चाय चाहिए और रात में गरम बिस्तर। वैसे ही दूर बैठी बीवी फोन पर प्यार के दो लफ्ज़ सुनाती है, रात में खर्राटों की शिकायत नहीं करती और ना ही दीवाली की सफाई के लिए चिक चिक करती है।  पति या पत्नी में दूरी का गुण मिल जाय तो पति या पत्नी चाहे कैसी भी हो सर्वगुण संपन्न लगने लगती है। शायद शादी के समय मिलाए जाने वाला छत्तीसवां गुण दूरी ही है। 

बाकी के दूर के रिश्तेदारों की बात ही अलग है। हमेशा किसी शादी में मिलेंगे, मीठा मीठा बोलेंगे। अरे यह इतनी बड़ी हो गई, वो इतना बड़ा हो गया।  चाहे आप पूरे मोहल्ले की ताई दिखने लगी हों , दूर वाले रिश्तेदार कहेंगे तुम तो बिल्कुल भी अपने बच्चों की मां नहीं लगती उनकी बहन लगती हो। आप खुश हो जाते हो। हालांकि इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि आपके बच्चे भी पूरे मोहल्ले के ताऊ जैसे दिखते हैं इसी लिए आपके भाई बहन जैसे दिखते हैं। खैर जो भी हो दूर के रिश्तेदार मिल कर क्षणिक ही सही आपको खुशी देते हैं। और उनके बच्चों को देख कर आपको अपने बच्चों के लिए नए जीवन लक्ष्य भी मुफ्त में मिल जाते हैं। जैसे उसका बेटा तो कोटा जाकर पढ़ रहा है, बेटी ने आईएएस की कोचिंग में एडमिशन लिया था, आज एक आईएएस उसका बॉयफ्रेंड है। छोटा बेटा सातवीं में ही आईआईटी के क्वेश्चन सॉल्व करता है। मिल गया आपको मैटेरियल अपने बच्चों को जीवन ज्ञान देने के लिए। और ऐसा नहीं है कि सिर्फ आपको जीवन ज्ञान मिला, आपके बच्चों को भी काफी कुछ मिल जाता है आपसे बात करने लायक। पापा उन्होंने अपने बेटे को आईफोन 14 pro मैक्स दिलाया है और आपने मुझे माइक्रो मैक्स। मम्मी उनकी बेटी शहनाज हुसैन के पार्लर से फेशियल कराती है और आप घर की बची हुई दही और हल्दी से फेशियल करती हो मेरा। फिर तो बैंक पीओ दामाद से काम चलाओ, आईएएस दामाद के लिए इन्वेस्ट करना पड़ता है बेटी में। कुछ सीखो दूर वाले अंकल आंटी से।

रिश्तेदार दूर के बहुत काम भी आते हैं। Oyo होटलों, और पार्कों में आप अक्सर दूर के cousins को एकसाथ देखते हो। अगर दूर के cousins ना हों तो होटलों का आधा धंधा तो ऐसे ही बंद हो जाय। कॉफी शॉप को ताला पड़ जाय और पार्क में सिर्फ वो बूढ़े दिखें जिनको डाक्टर ने सुबह की दवाई खाने से पहले टहलने को कहा है। मतलब यह कि यह दूर के रिश्तेदार के बदौलत ही देश के पार्कों, बाजारों और होटलों की रौनक है ।

दूर के रिश्तेदारों की बात ही अलग है। नजदीक के पड़ोसियों पर धौंस जमाने के लिए दूर के रिश्तेदारों सी अच्छी चीज आज तक नहीं बनी। बैंगलोर में रहने वाले हर बंगाली परिवार की दूर की बुआ ममता दी हैं और दिल्ली के चित्तरंजन पार्क में घूमता हर बंगाली मिथुन दा या सौरव गांगुली का रिश्तेदार है। किसी भी बिहारी से मिल लीजिए। या तो तेजस्वी उनके दूर के मामा होंगे या नीतीश दूर के फूफा। कुछ बूढ़े हुए तो वो लालू जी के साथ बीएन कॉलेज में पढ़े होंगे या सुशील मोदी की चचेरी बहु उनकी मौसेरी बहन लगेगी। असर तो पड़ता ही है। आजमगढ़ का हर लौंडा जब भाई शब्द बोलता है तो वो दुबई और कराची वाले दाऊद भाई की ही बात करता है।

बाकी अपने रिश्तेदार तो गिने चुने ही होते हैं, बाकी दुनिया पर तो दूर के रिश्तेदारों का ही कब्जा है। भगवान की बनाई सबसे नायब चीज है दूर का रिश्ता। खून के रिश्तों को बहुत मेहनत करने की जरूरत है दूर के रिश्तों की तरह बनने के लिए। 

Tuesday, November 15, 2022

कांतारा और रामलीला में गूंजते अनुनाद की ध्वनियां

भौतिकी की एक अवधारणा है जिसे अनुनाद कहते हैं। अंग्रेजी में इसे resonance कहा जाता है। इसके अनुसार हर वस्तु की एक प्राकृतिक आवृति होती है, जब भी कोई बाह्य बल वस्तु पर उसकी प्राकृतिक आवृति के बराबर या उसके आस पास की आवृति से लगता है तो वस्तु में सर्वाधिक दोलन प्रारंभ हो जाता है। सामान्य बोलचाल की भाषा में समझें तो इसे किसी वस्तु के बाह्य बल के प्रति प्रतिक्रिया उस समय सर्वाधिक होती है जब वस्तु बाह्य बल की आवृति या प्रकृति से साम्य का अनुभव करता है। 

हमारे गांवों में शहरों में विदेशों में बसे भारतीय मूल के समाजों में रामलीला या रामायण आधारित कहानियों का मंचन एक सामान्य बात है। दिल्ली जैसे बड़े शहरों में रामलीला को देखने के लिए उमड़ती भीड़ एक सवाल जगा जाती है। आखिर यह भीड़ इतनी उमड़ती क्यों है? सबको पता है कहानी क्या है, यहां तक कि पात्र तक वही रहते हैं। वोही एक आदमी हर साल हनुमान बनता है और वोही एक आदमी रावण। यहां तक कि सीता भी कोई आदमी ही बनता है वो भी हर एक साल। फिर भी हजारों की भीड़ जमा होती है, हरेक संवाद पर ताली बजाती, हरेक दृश्य पर भावुक होती, हरेक युद्ध के दृश्य पर रोमाचित होती। ऐसा दृश्य किसी और भी फिल्म नाटक या कथा को देखते वक्त क्यों नहीं होता, जहां अलग कहानी अलग पात्र अलग संवाद और अलग रोमांच मिलकर भी रामलीला का असर उत्पन्न नहीं कर पाते।
हाल में फिल्म कंतारा देखने का अवसर मिला। बिल्कुल गंवई कहानी है। बीड़ी, गांजा, ताड़ी पीता नायक। पुलिस में सिपाही की छोटी नौकरी करती नायिका। गांव के अनपढ़ लोगों की दकियानूसी वाली बातें जिन्हें कोला नृत्य करने वाले नर्तक को भगवान मानने की आदत है। संगीत भी मुझे कोई खास नहीं लगा, लेकिन जाने क्या बात है कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर और समीक्षकों दोनो की नजर में विजेता बन के उभरी है। ऊपरी सरसरी निगाह से ऐसा कुछ भी नहीं दिखता जिसकी वजह से फिल्म इतनी बड़ी हिट हो जाय। लेकिन फिल्म सिर्फ हिट होने की बात नहीं है, दर्शकों पर यह फिल्म गहरा असर छोड़ती है। थिएटर के अंधेरे कमरे से बाहर निकलने के बाद भी दर्शक अपने साथ कंतारा का एक टुकड़ा साथ लेकर लौटते हैं। 
रामालीला हो, कांतारा हो, रामायण सीरियल का दूरदर्शन पर फिर से दिखाया जाना हो, दर्शकों पर इसकी प्रतिक्रिया सामान्यतया अपेक्षित प्रतिक्रिया से कहीं ज्यादा है। ऐसा कुछ जैसे गैर भौतिक चीजों में अनुनाद या resonance की प्रक्रिया हो रही हो। कांतारा का नायक नशा करता है, भैंसों के साथ दौड़ता है, जंगली सूअर का शिकार करता है, लेकिन फिर भी दर्शकों का प्यारा बना रहता है। शायद इसलिए कि कहीं न कहीं वो शिव के ढांचे में ढाला गया एक चरित्र है। और भगवान शिव तो भारतीय जनमानस में हमेशा से बसे हैं। चाहे वो सिंधू घाटी के मुहरों पर विराजमान पशुपति हों, या हर हर शंभू वाले पॉप सांग की प्रेरणा , या फिर कांतारा के नायक की मूल प्रतिकृति। शिव हमारी संस्कृति के सतत चरित्र के संवाहक रहे हैं। ऐसा ही कुछ राम के चरित्र के साथ भी है। कदाचित इसीलिए राम कथा चिर पुरातन होने के साथ साथ सदैव नव्यता का भाव लिए चिर नूतन भी बनी रहती है।

राम और शिव के चरित्र की आवृति भारतीय जनमानस भारतीय संस्कृति की मूल आवृति के बहुत नजदीक है। इसलिए इन चरित्रों के आसपास गढ़ी गई कथाएं हम पर इतना ज्यादा प्रभाव डालती हैं। यह अनुनाद या रेजोनेंस का एक ही एक और पहलू है जिसे मौतिकी के सूत्रों या सिद्धांतों के आधार पर परिभाषित या व्याख्यायित करना संभव नहीं है। 

Sunday, November 6, 2022

गांव और डस्टबिन

हमारा गांव बहुत पिछड़ा हुआ था। हमारे गांव में किसी के घर में डस्टबिन नहीं था। कचरा के नाम पर सब्जी के छिलके होते थे जिसे गौमाता को खिला दिया जाता था। किचन से मांड़ और चोकर निकलता था जो गौमाता को ही अर्पित हो दूध बन कर वापस आ जाता था। दूध भी गौशाले से सीधे बाल्टी में घर आता था इसीलिए कभी प्लास्टिक के थैलों की जरूरत नहीं थी। सब्जी वाली अपने सर पर ताजी खेतों के तोड़ी हुई सब्जियों को ढोकर घर घर बेच आती थी, बाकी सब्जियां घर के पिछवाड़े बाड़ी से निकल आती थी। पॉलिथीन बैग का नाम नहीं सुना था। 

गेंहू धोकर आंगन में पुरानी साड़ी पर रख कर सुखा लिया जाता था और फिर गांव की चक्की में पीस कर आ जाता।कभी प्लास्टिक के थैलों में आटा रखने की जरूरत नहीं पड़ी। दालान वाला नीम का पेड़ ब्रश दे देता था और बहुत जरूरत पड़ी तो नमक और सरसों का तेल से दांतों की सफाई हो जाती थी। 

कपड़े साल में दो बार थान से कट के आते और पड़ोस से दर्जी से सिल के आते। कभी अमेजन वाली प्लास्टिक की तीन तह वाली पैकिंग की जरूरत नहीं पड़ी। गांव में कोई म्युनिसिपैलिटी वाली गाड़ी, गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल, वाला गाना सुना कर कचरा तक जमा नहीं करता। क्योंकि किसी घर में कोई कचरा था ही नहीं। सत्यनारायण पूजा भी हुई तो प्रसाद केले के पत्ते पर और गांव में भोज हुआ तो सखुए के पत्ते में भोज हो जाता था। 

पानी घड़े में रहता था, उस समय प्लास्टिक की बोतल में पानी अगर कोई बेचता तो लोग उसपर आश्चर्य से हंसते बस। इसीलिए नहीं कि गांव वाले पानी की कोई कीमत नहीं समझते थे बल्कि इसीलिए की वो पानी को अमूल्य समझते थे। इसलिए नदियों को मां कहते और पोखर में किसी न किसी देवता का वास मानते। छठ की पूजा के बाद घाटों पर प्लास्टिक का अंबार नहीं बस केले के थंबों से बनी सजावट शेष रहती थी, जिसे साफ करने के लिए किसी एनजीओ या नगरनिगम की जरूरत नहीं पड़ती थी। 

आज देखता हूं घर घर में प्लास्टिक के कचरे को रखने के लिए प्लास्टिक के डस्टबिन हैं जिनमें प्लास्टिक का एक नया थैला रोज लगता है। अंदर दूध के पैकेट, पुराने टूथ ब्रश, सब्जियों वाली पॉलिथीन, पूजा के बाद प्लास्टिक के दोने और रात की पार्टी के बाद डिस्पोजेबल प्लेट और ग्लास के ढेर लगे होते हैं। कचरा अच्छे से जमा किया जाता है और अच्छे से शहर से दूर एक जगह जमा कर दिया जाता था। धीरे धीरे शहर खिसक कर कचरे के ढेर के पास पहुंच जाता है।  फिर कचरे का वो पहाड़ किसी और जगह दूर चला जाता है और फिर शहर खिसक खिसक कर कचरे के ढेर के पास पहुंच जाता है। कचरे के ढेर का पीछा करता शहर बड़ा होता जाता है। हमारा गांव कभी ऐसे बड़ा नहीं हुआ क्योंकि वोह कचरे के ढेर ना बनाता था और न उसका पीछा करता था। हमारा गांव पिछड़ा ही रह गया क्योंकि हमारे गांव में किसी भी घर में डस्टबिन नहीं था।

Thursday, November 3, 2022

शरीर में बांछे कहां होती हैं?

हिंदी में एक मुहावरा है बांछे खिलना। और इसी के साथ श्रीलाल शुक्ल द्वारा राग दरबारी में लिखा एक मशहूर मजाक है कि मुझे नहीं पता कि शरीर में बांछे कहां होती हैं लेकिन मेरी बांछे खिल गईं। मैने सोचा कि हिंदी में कोई बात ऐसे निरर्थक नहीं होती। अगर मानव शरीर में बांछे जैसा कोई अंग नहीं होता तो बांछे खिलना मुहावरा आया कहां से। बांछे खिलना का अर्थ है अत्यधिक प्रसन्न होना। 

चूंकि प्रसन्नता एक मानसिक अवस्था है तो बांछे खिलना का कोई मतलब मन से होना चाहिए। एक तत्सम शब्द है वांछा, जिसका अर्थ है इच्छा अभिलाषा। इसी शब्द से वांछनीय , अवांछनीय जैसे शब्द बने हैं। कल्पतरु को भी वांछा कल्पद्रूम कहा गया है। संभव है कि बांछे शब्द वांछा का अपभ्रंश है। स्वाभाविक है कि जब व्यक्ति प्रसन्न होता है तो इसमें अनेक सपनों, इच्छाओं, सुखद भविष्य की कल्पनाओं और आशाओं का संचरण होता है। यह सब व्यक्ति के मन में होता है और संभवतः मन और मन से जुड़े कल्पना लोक में आई इसी तीव्रता को बांछे खिलना जैसे मुहावरे द्वारा निरूपित किया जाता है। वैसे बांछा का एक देशज अर्थ होता है होंठो की संधि। मुस्कुराने की वजह से  हमारी चेहरे पर आई मुस्कान के लंबे होने को भी बांछे खिलने से जोड़ा जा सकता है। वैसे बांछे खिलना अगर प्रसन्नता से जुड़ा है तो आवश्यक नहीं कि वो चेहरे पर प्रतिबिंबित हो ही। मिलाजुलाकार इसकी पहली व्याख्या ही ज्यादा सही प्रतीत होती है।

तो अगली बार कोई जब कहे कि उन्हें नहीं पता कि शरीर में बांछे कहां होती हैं, तो आप उनको कह सकते हैं कि बांछे शरीर में नहीं आपके मन में होती हैं। और उन्हें यह भी बताएं कि बांछे ज्यादा खिलना वांछनीय नहीं है। 

Monday, October 31, 2022

छठ की सुबह

सूनी पड़ी हैं बिहार की सड़कें
चंद लोग चल फिर रहे हैं सुस्त कदमों से,
फीके लग रहे हैं तोरण द्वार,
उनसे लटकी उलझी हुईं हैं 
बुझी हुई झालरें।

चौराहे पर बैठ कर ऊंघ रहा है 
रात भर ड्यूटी बजाता सिपाही,
घर से घाट तक छाई है एक नीरवता
थम गया है लोकगीतों का कलरव
और पटाखों का शोर,
बाकी है तो बस हवाओं में
 घुली ठेकुआ खबौनी की खुशबू,
जिसे खाकर तृप्त हो गया है
 मानो पूरा शहर,
कुछ ऐसे निढाल पड़ा है हर कोई
जैसे बेटी ब्याह कर सोया हो कोई बाप,

यह छठ के बाद की सुबह है।
जिसका उल्लास बिहार
 डूब के मनाता है
जिसका उल्लास बिहार
 खूब से मनाता है।


Monday, October 24, 2022

दिल और दिमाग

 बार सुन चुका हूं कि यहां मैं दिल की सुन रहा हूं, दिमाग की नहीं। या वो दिमाग की सुनता है, दिल की कभी नहीं। चलो मान लिया। फिर यह दिल तो पागल है वाले डायलॉग का क्या मतलब हुआ? पागल तो वो हुआ जिसका दिमाग खराब हो गया हो, मतलब यह दिल के पागल होने का मतलब है दिल का दिमाग खराब हो गया है। इसका सीधा मतलब है कि दिल के पास अपना दिमाग है। और जब दिल से पास अपना दिमाग है तो फिर सोचने का काम दिल अपने वाले दिमाग से ही करता होगा। लब्बोलुआब यह कि दिल की दुहाई देने वाले भी अल्टीमेटली दिमाग से ही काम लेते हैं। दिल से सोचने वाली कोई भी बात बकवास ही है। 

आगे सोचिए तो "हम आपके दिल में रहते हैं" वाली बातें तो और भी डरावनी हैं । आप किसी को आपके दिल में बसा लो तो बेचारा अपना दिमाग बाहर छोड़ कर तो आयेगा नहीं। अपना दिमाग लेकर कोई आपके दिल में रहने लगे तो भारी समस्या है। आपके पास ऑलरेडी दो दिमाग है, एक सर वाला दिमाग और दूसरा दिल वाला दिमाग। सामने वाला इंसान भी अपना दो दिमाग लेकर आपके दिल में आ जाय तो आपका तो पूरा सिस्टम हिल जायेगा। टोटल चार दिमाग आपके शरीर के अंदर । आखिर शरीर सुनेगा किसकी? बाकी एक से ज्यादा चार पांच लोगों को दिल में बसा लेने वाले लोगों की हालत का तो आप बस अंदाजा ही लगा सकते हैं। तीन लोगों को अपने दिल में बसाने वाले लोग एक समय में टोटल आठ दिमाग लेकर चल रहे हैं। वैसे यह संख्या आठ ही हो कोई जरूरी नहीं। यह संख्या आठ से कहीं ज्यादा भी हो सकती है। मान लीजिए जिस इंसान को आपने अपने दिल में बसाया, उसने दिल में पहले से ही चार इंसान और बसते हैं, फिर उसी हिसाब से फी इंसान आपने अंदर दिल की संख्या उसी मुताबिक बढ़ती जाएगी। फिर यह भी हो सकता है कि जिसको आपने दिल में बसाया, वो ऑलरेडी अपना दिल किसी और को दे चुके हैं। फिर आपके अन्दर दिमाग की कुल संख्या उसी हिसाब से कम हो जायेगी। 

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनकी खोपड़ी खाली होती है, मतलब उनके शरीर में दिल वाला दिमाग तो होता है लेकिन खोपड़ी वाला दिमाग नहीं। ऐसे लोग अगर आपके दिल में बसे हैं तो आपके शरीर में टोटल दिमाग की संख्या थोड़ी कम हो जायेगी। 
इसलिए तो बड़े बूढ़े कह गए हैं कि दिल लेना खेल है दिलदार का। एक दिल ले लेने के बाद जो शरीर में जो दिमाग का दही बनता है उसकी तो कल्पना करना भी मुश्किल है।  

अब जब दिमाग लगा के सोचता हूं तो समझने की कोशिश करता हूं कि जब लोग कहते हैं कि कोई दिमाग ही काम नहीं कर रहा, तो यह कोई साधारण बात नही है। कोई दिमाग कहने का सीधा अर्थ है कि वो अपने अंदर छुपे कई दिमागों के बारे में बात कर रहे हैं। वरना वो सीधे कहते कि मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा। कोई शब्द लगाने का मतलब हुआ कि दिमाग की संख्या एक से ज्यादा है।

अब यह सारी बात सुना कर दिल हल्का सा लग रहा है। यह भी थोड़ा अजीब ही है। इतनी बकवास करके मैंने जो आपका दिमाग खाया है उसके बाद तो शरीर तो भारी महसूस करना चाहिए, हल्का क्यों महसूस कर रहा है? दिमाग लगा के इस प्रश्न का उत्तर ढूंढिए। बाकी कौन सा वाला दिमाग लगाइएगा, यह मैं आपके दिल पर छोड़ता हूं। दिल दिमाग जो लगाना है, लगाइए बस इतना याद रखिए कि जो भी काम करिए दिल से करिए। समझ नहीं आ रहा कि आगे इस टॉपिक पर लिखूं कि नहीं। दिल ही नहीं कर रहा।
चलिए बाय बाय।

Wednesday, October 12, 2022

गंगा जमुनी तहजीब की पोल

गंगा जमुनी तहजीब का मतलब मुझे समझ में नहीं आता। कारण यह कि प्रयागराज में यमुना आकर गंगा में मिल जाती है और अपना स्वतंत्र अस्तित्व खो देती है और गंगा कहलाने लगती है। गंगा जमुनी तहजीब का मतलब यह कि प्रयाग के आगे सिर्फ गंगा रहेगी, यमुना नहीं। होना तो यह चाहिए कि कोई ऐसा नाम कहा जाय, जहां दोनो का सहअस्तित्व हो ना कि एक को अपने अंदर समेटने और समाहित करने के लिए दूसरा आतुर हो।  

मानव का सौन्दर्य दो अलग अलग आंखों , दो अलग अलग हाथों से ही है। दो आंखों को मिला कर एक बड़ी आंख और दो हाथों को जोड़ कर एक लंबा हाथ ना ही सुन्दर होगा और ना उपयोगी। 

अगली बार कोई गंगा जमुनी तहजीब की दुहाई दे तो पूछिएगा कि आपको जमुना के स्वतंत्र अस्तित्व से इतनी समस्या क्यों है? आप गंगा कावेरी संस्कृति की बात क्यों नहीं करते। उनके तनिक से इशक की कलई खुल जाएगी।