Tuesday, November 15, 2022

कांतारा और रामलीला में गूंजते अनुनाद की ध्वनियां

भौतिकी की एक अवधारणा है जिसे अनुनाद कहते हैं। अंग्रेजी में इसे resonance कहा जाता है। इसके अनुसार हर वस्तु की एक प्राकृतिक आवृति होती है, जब भी कोई बाह्य बल वस्तु पर उसकी प्राकृतिक आवृति के बराबर या उसके आस पास की आवृति से लगता है तो वस्तु में सर्वाधिक दोलन प्रारंभ हो जाता है। सामान्य बोलचाल की भाषा में समझें तो इसे किसी वस्तु के बाह्य बल के प्रति प्रतिक्रिया उस समय सर्वाधिक होती है जब वस्तु बाह्य बल की आवृति या प्रकृति से साम्य का अनुभव करता है। 

हमारे गांवों में शहरों में विदेशों में बसे भारतीय मूल के समाजों में रामलीला या रामायण आधारित कहानियों का मंचन एक सामान्य बात है। दिल्ली जैसे बड़े शहरों में रामलीला को देखने के लिए उमड़ती भीड़ एक सवाल जगा जाती है। आखिर यह भीड़ इतनी उमड़ती क्यों है? सबको पता है कहानी क्या है, यहां तक कि पात्र तक वही रहते हैं। वोही एक आदमी हर साल हनुमान बनता है और वोही एक आदमी रावण। यहां तक कि सीता भी कोई आदमी ही बनता है वो भी हर एक साल। फिर भी हजारों की भीड़ जमा होती है, हरेक संवाद पर ताली बजाती, हरेक दृश्य पर भावुक होती, हरेक युद्ध के दृश्य पर रोमाचित होती। ऐसा दृश्य किसी और भी फिल्म नाटक या कथा को देखते वक्त क्यों नहीं होता, जहां अलग कहानी अलग पात्र अलग संवाद और अलग रोमांच मिलकर भी रामलीला का असर उत्पन्न नहीं कर पाते।
हाल में फिल्म कंतारा देखने का अवसर मिला। बिल्कुल गंवई कहानी है। बीड़ी, गांजा, ताड़ी पीता नायक। पुलिस में सिपाही की छोटी नौकरी करती नायिका। गांव के अनपढ़ लोगों की दकियानूसी वाली बातें जिन्हें कोला नृत्य करने वाले नर्तक को भगवान मानने की आदत है। संगीत भी मुझे कोई खास नहीं लगा, लेकिन जाने क्या बात है कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर और समीक्षकों दोनो की नजर में विजेता बन के उभरी है। ऊपरी सरसरी निगाह से ऐसा कुछ भी नहीं दिखता जिसकी वजह से फिल्म इतनी बड़ी हिट हो जाय। लेकिन फिल्म सिर्फ हिट होने की बात नहीं है, दर्शकों पर यह फिल्म गहरा असर छोड़ती है। थिएटर के अंधेरे कमरे से बाहर निकलने के बाद भी दर्शक अपने साथ कंतारा का एक टुकड़ा साथ लेकर लौटते हैं। 
रामालीला हो, कांतारा हो, रामायण सीरियल का दूरदर्शन पर फिर से दिखाया जाना हो, दर्शकों पर इसकी प्रतिक्रिया सामान्यतया अपेक्षित प्रतिक्रिया से कहीं ज्यादा है। ऐसा कुछ जैसे गैर भौतिक चीजों में अनुनाद या resonance की प्रक्रिया हो रही हो। कांतारा का नायक नशा करता है, भैंसों के साथ दौड़ता है, जंगली सूअर का शिकार करता है, लेकिन फिर भी दर्शकों का प्यारा बना रहता है। शायद इसलिए कि कहीं न कहीं वो शिव के ढांचे में ढाला गया एक चरित्र है। और भगवान शिव तो भारतीय जनमानस में हमेशा से बसे हैं। चाहे वो सिंधू घाटी के मुहरों पर विराजमान पशुपति हों, या हर हर शंभू वाले पॉप सांग की प्रेरणा , या फिर कांतारा के नायक की मूल प्रतिकृति। शिव हमारी संस्कृति के सतत चरित्र के संवाहक रहे हैं। ऐसा ही कुछ राम के चरित्र के साथ भी है। कदाचित इसीलिए राम कथा चिर पुरातन होने के साथ साथ सदैव नव्यता का भाव लिए चिर नूतन भी बनी रहती है।

राम और शिव के चरित्र की आवृति भारतीय जनमानस भारतीय संस्कृति की मूल आवृति के बहुत नजदीक है। इसलिए इन चरित्रों के आसपास गढ़ी गई कथाएं हम पर इतना ज्यादा प्रभाव डालती हैं। यह अनुनाद या रेजोनेंस का एक ही एक और पहलू है जिसे मौतिकी के सूत्रों या सिद्धांतों के आधार पर परिभाषित या व्याख्यायित करना संभव नहीं है। 

Sunday, November 6, 2022

गांव और डस्टबिन

हमारा गांव बहुत पिछड़ा हुआ था। हमारे गांव में किसी के घर में डस्टबिन नहीं था। कचरा के नाम पर सब्जी के छिलके होते थे जिसे गौमाता को खिला दिया जाता था। किचन से मांड़ और चोकर निकलता था जो गौमाता को ही अर्पित हो दूध बन कर वापस आ जाता था। दूध भी गौशाले से सीधे बाल्टी में घर आता था इसीलिए कभी प्लास्टिक के थैलों की जरूरत नहीं थी। सब्जी वाली अपने सर पर ताजी खेतों के तोड़ी हुई सब्जियों को ढोकर घर घर बेच आती थी, बाकी सब्जियां घर के पिछवाड़े बाड़ी से निकल आती थी। पॉलिथीन बैग का नाम नहीं सुना था। 

गेंहू धोकर आंगन में पुरानी साड़ी पर रख कर सुखा लिया जाता था और फिर गांव की चक्की में पीस कर आ जाता।कभी प्लास्टिक के थैलों में आटा रखने की जरूरत नहीं पड़ी। दालान वाला नीम का पेड़ ब्रश दे देता था और बहुत जरूरत पड़ी तो नमक और सरसों का तेल से दांतों की सफाई हो जाती थी। 

कपड़े साल में दो बार थान से कट के आते और पड़ोस से दर्जी से सिल के आते। कभी अमेजन वाली प्लास्टिक की तीन तह वाली पैकिंग की जरूरत नहीं पड़ी। गांव में कोई म्युनिसिपैलिटी वाली गाड़ी, गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल, वाला गाना सुना कर कचरा तक जमा नहीं करता। क्योंकि किसी घर में कोई कचरा था ही नहीं। सत्यनारायण पूजा भी हुई तो प्रसाद केले के पत्ते पर और गांव में भोज हुआ तो सखुए के पत्ते में भोज हो जाता था। 

पानी घड़े में रहता था, उस समय प्लास्टिक की बोतल में पानी अगर कोई बेचता तो लोग उसपर आश्चर्य से हंसते बस। इसीलिए नहीं कि गांव वाले पानी की कोई कीमत नहीं समझते थे बल्कि इसीलिए की वो पानी को अमूल्य समझते थे। इसलिए नदियों को मां कहते और पोखर में किसी न किसी देवता का वास मानते। छठ की पूजा के बाद घाटों पर प्लास्टिक का अंबार नहीं बस केले के थंबों से बनी सजावट शेष रहती थी, जिसे साफ करने के लिए किसी एनजीओ या नगरनिगम की जरूरत नहीं पड़ती थी। 

आज देखता हूं घर घर में प्लास्टिक के कचरे को रखने के लिए प्लास्टिक के डस्टबिन हैं जिनमें प्लास्टिक का एक नया थैला रोज लगता है। अंदर दूध के पैकेट, पुराने टूथ ब्रश, सब्जियों वाली पॉलिथीन, पूजा के बाद प्लास्टिक के दोने और रात की पार्टी के बाद डिस्पोजेबल प्लेट और ग्लास के ढेर लगे होते हैं। कचरा अच्छे से जमा किया जाता है और अच्छे से शहर से दूर एक जगह जमा कर दिया जाता था। धीरे धीरे शहर खिसक कर कचरे के ढेर के पास पहुंच जाता है।  फिर कचरे का वो पहाड़ किसी और जगह दूर चला जाता है और फिर शहर खिसक खिसक कर कचरे के ढेर के पास पहुंच जाता है। कचरे के ढेर का पीछा करता शहर बड़ा होता जाता है। हमारा गांव कभी ऐसे बड़ा नहीं हुआ क्योंकि वोह कचरे के ढेर ना बनाता था और न उसका पीछा करता था। हमारा गांव पिछड़ा ही रह गया क्योंकि हमारे गांव में किसी भी घर में डस्टबिन नहीं था।

Thursday, November 3, 2022

शरीर में बांछे कहां होती हैं?

हिंदी में एक मुहावरा है बांछे खिलना। और इसी के साथ श्रीलाल शुक्ल द्वारा राग दरबारी में लिखा एक मशहूर मजाक है कि मुझे नहीं पता कि शरीर में बांछे कहां होती हैं लेकिन मेरी बांछे खिल गईं। मैने सोचा कि हिंदी में कोई बात ऐसे निरर्थक नहीं होती। अगर मानव शरीर में बांछे जैसा कोई अंग नहीं होता तो बांछे खिलना मुहावरा आया कहां से। बांछे खिलना का अर्थ है अत्यधिक प्रसन्न होना। 

चूंकि प्रसन्नता एक मानसिक अवस्था है तो बांछे खिलना का कोई मतलब मन से होना चाहिए। एक तत्सम शब्द है वांछा, जिसका अर्थ है इच्छा अभिलाषा। इसी शब्द से वांछनीय , अवांछनीय जैसे शब्द बने हैं। कल्पतरु को भी वांछा कल्पद्रूम कहा गया है। संभव है कि बांछे शब्द वांछा का अपभ्रंश है। स्वाभाविक है कि जब व्यक्ति प्रसन्न होता है तो इसमें अनेक सपनों, इच्छाओं, सुखद भविष्य की कल्पनाओं और आशाओं का संचरण होता है। यह सब व्यक्ति के मन में होता है और संभवतः मन और मन से जुड़े कल्पना लोक में आई इसी तीव्रता को बांछे खिलना जैसे मुहावरे द्वारा निरूपित किया जाता है। वैसे बांछा का एक देशज अर्थ होता है होंठो की संधि। मुस्कुराने की वजह से  हमारी चेहरे पर आई मुस्कान के लंबे होने को भी बांछे खिलने से जोड़ा जा सकता है। वैसे बांछे खिलना अगर प्रसन्नता से जुड़ा है तो आवश्यक नहीं कि वो चेहरे पर प्रतिबिंबित हो ही। मिलाजुलाकार इसकी पहली व्याख्या ही ज्यादा सही प्रतीत होती है।

तो अगली बार कोई जब कहे कि उन्हें नहीं पता कि शरीर में बांछे कहां होती हैं, तो आप उनको कह सकते हैं कि बांछे शरीर में नहीं आपके मन में होती हैं। और उन्हें यह भी बताएं कि बांछे ज्यादा खिलना वांछनीय नहीं है। 

Monday, October 31, 2022

छठ की सुबह

सूनी पड़ी हैं बिहार की सड़कें
चंद लोग चल फिर रहे हैं सुस्त कदमों से,
फीके लग रहे हैं तोरण द्वार,
उनसे लटकी उलझी हुईं हैं 
बुझी हुई झालरें।

चौराहे पर बैठ कर ऊंघ रहा है 
रात भर ड्यूटी बजाता सिपाही,
घर से घाट तक छाई है एक नीरवता
थम गया है लोकगीतों का कलरव
और पटाखों का शोर,
बाकी है तो बस हवाओं में
 घुली ठेकुआ खबौनी की खुशबू,
जिसे खाकर तृप्त हो गया है
 मानो पूरा शहर,
कुछ ऐसे निढाल पड़ा है हर कोई
जैसे बेटी ब्याह कर सोया हो कोई बाप,

यह छठ के बाद की सुबह है।
जिसका उल्लास बिहार
 डूब के मनाता है
जिसका उल्लास बिहार
 खूब से मनाता है।


Monday, October 24, 2022

दिल और दिमाग

 बार सुन चुका हूं कि यहां मैं दिल की सुन रहा हूं, दिमाग की नहीं। या वो दिमाग की सुनता है, दिल की कभी नहीं। चलो मान लिया। फिर यह दिल तो पागल है वाले डायलॉग का क्या मतलब हुआ? पागल तो वो हुआ जिसका दिमाग खराब हो गया हो, मतलब यह दिल के पागल होने का मतलब है दिल का दिमाग खराब हो गया है। इसका सीधा मतलब है कि दिल के पास अपना दिमाग है। और जब दिल से पास अपना दिमाग है तो फिर सोचने का काम दिल अपने वाले दिमाग से ही करता होगा। लब्बोलुआब यह कि दिल की दुहाई देने वाले भी अल्टीमेटली दिमाग से ही काम लेते हैं। दिल से सोचने वाली कोई भी बात बकवास ही है। 

आगे सोचिए तो "हम आपके दिल में रहते हैं" वाली बातें तो और भी डरावनी हैं । आप किसी को आपके दिल में बसा लो तो बेचारा अपना दिमाग बाहर छोड़ कर तो आयेगा नहीं। अपना दिमाग लेकर कोई आपके दिल में रहने लगे तो भारी समस्या है। आपके पास ऑलरेडी दो दिमाग है, एक सर वाला दिमाग और दूसरा दिल वाला दिमाग। सामने वाला इंसान भी अपना दो दिमाग लेकर आपके दिल में आ जाय तो आपका तो पूरा सिस्टम हिल जायेगा। टोटल चार दिमाग आपके शरीर के अंदर । आखिर शरीर सुनेगा किसकी? बाकी एक से ज्यादा चार पांच लोगों को दिल में बसा लेने वाले लोगों की हालत का तो आप बस अंदाजा ही लगा सकते हैं। तीन लोगों को अपने दिल में बसाने वाले लोग एक समय में टोटल आठ दिमाग लेकर चल रहे हैं। वैसे यह संख्या आठ ही हो कोई जरूरी नहीं। यह संख्या आठ से कहीं ज्यादा भी हो सकती है। मान लीजिए जिस इंसान को आपने अपने दिल में बसाया, उसने दिल में पहले से ही चार इंसान और बसते हैं, फिर उसी हिसाब से फी इंसान आपने अंदर दिल की संख्या उसी मुताबिक बढ़ती जाएगी। फिर यह भी हो सकता है कि जिसको आपने दिल में बसाया, वो ऑलरेडी अपना दिल किसी और को दे चुके हैं। फिर आपके अन्दर दिमाग की कुल संख्या उसी हिसाब से कम हो जायेगी। 

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनकी खोपड़ी खाली होती है, मतलब उनके शरीर में दिल वाला दिमाग तो होता है लेकिन खोपड़ी वाला दिमाग नहीं। ऐसे लोग अगर आपके दिल में बसे हैं तो आपके शरीर में टोटल दिमाग की संख्या थोड़ी कम हो जायेगी। 
इसलिए तो बड़े बूढ़े कह गए हैं कि दिल लेना खेल है दिलदार का। एक दिल ले लेने के बाद जो शरीर में जो दिमाग का दही बनता है उसकी तो कल्पना करना भी मुश्किल है।  

अब जब दिमाग लगा के सोचता हूं तो समझने की कोशिश करता हूं कि जब लोग कहते हैं कि कोई दिमाग ही काम नहीं कर रहा, तो यह कोई साधारण बात नही है। कोई दिमाग कहने का सीधा अर्थ है कि वो अपने अंदर छुपे कई दिमागों के बारे में बात कर रहे हैं। वरना वो सीधे कहते कि मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा। कोई शब्द लगाने का मतलब हुआ कि दिमाग की संख्या एक से ज्यादा है।

अब यह सारी बात सुना कर दिल हल्का सा लग रहा है। यह भी थोड़ा अजीब ही है। इतनी बकवास करके मैंने जो आपका दिमाग खाया है उसके बाद तो शरीर तो भारी महसूस करना चाहिए, हल्का क्यों महसूस कर रहा है? दिमाग लगा के इस प्रश्न का उत्तर ढूंढिए। बाकी कौन सा वाला दिमाग लगाइएगा, यह मैं आपके दिल पर छोड़ता हूं। दिल दिमाग जो लगाना है, लगाइए बस इतना याद रखिए कि जो भी काम करिए दिल से करिए। समझ नहीं आ रहा कि आगे इस टॉपिक पर लिखूं कि नहीं। दिल ही नहीं कर रहा।
चलिए बाय बाय।

Wednesday, October 12, 2022

गंगा जमुनी तहजीब की पोल

गंगा जमुनी तहजीब का मतलब मुझे समझ में नहीं आता। कारण यह कि प्रयागराज में यमुना आकर गंगा में मिल जाती है और अपना स्वतंत्र अस्तित्व खो देती है और गंगा कहलाने लगती है। गंगा जमुनी तहजीब का मतलब यह कि प्रयाग के आगे सिर्फ गंगा रहेगी, यमुना नहीं। होना तो यह चाहिए कि कोई ऐसा नाम कहा जाय, जहां दोनो का सहअस्तित्व हो ना कि एक को अपने अंदर समेटने और समाहित करने के लिए दूसरा आतुर हो।  

मानव का सौन्दर्य दो अलग अलग आंखों , दो अलग अलग हाथों से ही है। दो आंखों को मिला कर एक बड़ी आंख और दो हाथों को जोड़ कर एक लंबा हाथ ना ही सुन्दर होगा और ना उपयोगी। 

अगली बार कोई गंगा जमुनी तहजीब की दुहाई दे तो पूछिएगा कि आपको जमुना के स्वतंत्र अस्तित्व से इतनी समस्या क्यों है? आप गंगा कावेरी संस्कृति की बात क्यों नहीं करते। उनके तनिक से इशक की कलई खुल जाएगी।

Saturday, October 8, 2022

प्रेमचंद के फटे जूतों के मायने

प्रेमचंद की मृत्यु हमें याद दिलाती है कि कलम तलवार से मजबूत तभी हो सकती है जब कलम चलाने वाला भूखा न रहे। तलवार चाहे कितनी भी तेज क्यों ना हो, जिस सैनिक के हाथों में तलवार है , उस सैनिक के हाथों को उचित पोषण मिलना भी आवश्यक है। तलवार चलाने वाले हाथों के ऊपर अन्य सांसारिक चिंताओं का बोझ नहीं होना चाहिए। बोझिल मानसिकता और कुपोषित हाथों में तेज तलवार भी शत्रु को परास्त नहीं कर सकती। कलम की प्रखर धार भी वैसे लेखक के हाथों में कुंद पड़ जाती है अगर लेखक अपने जीवन में सामान्य भौतिक सुख सुविधाओं के लिए तरसता रहे। 

प्रेमचंद की प्रज्ञा कितनी भी तेज रही है, उनकी क्षुधा की आग हमेशा उनकी प्रज्ञा को सताती रही। आखिर क्षुधित काया में स्वास्थ्य और रचनात्मकता कितने दिन वास कर सकती है। प्रेमचंद हमारे महानतम कलमकार भले ही रहे हों, हमेशा अकिंचन ही बने रहे। उनका प्रेस तो उनका खून पीकर ही चलती रही। उनकी फटे जूते देख कर तो परसाई जी एक निबंध तक लिख दिया। कई संस्मरण तो यह भी बताते हैं कि उनकी आखिरी यात्रा में कुल छह साथ लोग ही शामिल थे। पूरे साहित्य जगत को रोशनी की लौ लिए दिशा देने वाले प्रेमचंद एक गुमनाम लाश की तरह इस दुनिया से विदा हुए।

किसी भी सभ्यता की पहचान इससे होती है कि इस सभ्यता के नायकों चयन जनमानस में कैसे होता है और सभ्यता अपने नायकों के साथ कैसा व्यवहार करती है। हम भले ही मेरा भारत महान के नारे लगा कर अपनी सभ्यता के महान होने का दंभ भरते रहें, हम अपने साहित्य और साहित्यकारों के साथ उचित व्यवहार कभी नहीं कर पाए। निराला भूख से जूझते रहे, तो मुक्तिबोध अपने जीवन काल में अपनी एक कविता प्रकाशित नहीं करवा सके। आज भी कोई गीत सुनकर हम उसके गायक को पहचान ले, उसपर थिरकते अभिनेताओं की भाव भंगिमा तक उतार लें, गीतकार का नाम हमें शायद ही पता भी होता है। अपने साहित्यकारोंं को नायक बना के  सम्मानित करना तो दूर , साहित्यकार होने का अर्थ ही गया है एक निरीह झोला टांगे हुए व्यक्ति से जिसकी जरूरत तो है लेकिन कदर कोई खास नहीं है। स्वाभाविक है इसका असर हमारी पूरी पीढ़ी की रचनात्मकता और रचनाशीलता पर पड़ा है। कब आखिरी बार हमारे बीच से कोई मौलिक रचना निकली है जो विश्व जनमानस पर छा गई हो? कोई मौलिक कहानी, उपन्यास या कोई और साहित्यिक रचना गढ़ने में हमारा हाथ तंग ही दिखता है। अंग्रेजी भाषा में कदाचित कुछ लिखा भी जा रहा है, हमारी भारतीय भाषाओं की स्थिति तो उत्तरोत्तर खराब ही होती जा रही है। मां सरस्वती की वंदना करने वाले देश में सरस्वती पुत्रों की ऐसी दुर्दशा अकल्पनीय और अस्वीकार्य है। 

आज से 86 साल पहले इन्हीं गलतियों के कारण हमने एक हीरा मुंशी प्रेमचंद के रूप में खोया था। आज उनकी पुण्यतिथि पर हमें विचार करना होगा कि हम अपने साहित्यकारों रूपी रत्नों को सहेज कर रखने के लिए क्या कर सकते हैं।

 उपन्यास सम्राट को उनकी पुण्य तिथि पर शत शत नमन।

Tuesday, October 4, 2022

रावण : एक जटिल चरित्र

रावण का चरित्र एक जटिल चरित्र है। इसके चरित्र के विस्तार को विविध विमाओं में देखने की जरूरत है। रावण के चरित्र का एक विस्तार एक शिवभक्त के रूप में है। स्वयं महादेव रावण को अपना सबसे बड़ा भक्त मान चुके हैं।ऐसा भक्त जिसने शिव को अपना सिर तक काट तक चढ़ा दिया। ऐसा भक्त जिसके कहने पर वो अपना कैलाश त्याग कर उसके साथ चल पड़े। रावण वेदों का ज्ञाता और ऋषि विश्रवा का पुत्र और ऋषि पुलस्त्य का पौत्र था। इसके अलावा एक अत्यंत स्नेही भ्राता भी था जिसने अपनी बहन की मान सम्मान की रक्षा के लिए एक युद्ध छेड़ने तक से गुरेज नहीं किया। अपनी राक्षसी माता के कारण वो आधा राक्षस भी था। उसके पास शक्ति, ज्ञान, सैन्य शक्ति, धनबल, भक्तिबल किसी की भी कमी नहीं थी। शायद इतना कुछ पा लेने के बाद अहंकार हो जाना स्वाभाविक ही था। उसी अहंकार के कारण उसने परस्त्री का हरण किया और वोही उसके विनाश का कारण बना। लेकिन विष्णु अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम राम के सामने उनका विरोधी चरित्र कोई साधारण सामान्य का एक दानव नहीं हो सकता। 

रावण का चरित्र रुपहले पर उतारने से पहले इन बारीकियों का ध्यान रखने की आवश्यकता है। उसके चरित्र के सभी पहलुओं में संतुलन बनते हुए उसे भगवान राम के एक योग्य प्रतिद्वंदी के रूप में दिखाना आसान नहीं है। इसके लिए साहित्य, पौराणिक ग्रंथों, उसकी उपलब्ध टीकाओं के गहन अध्ययन के साथ साथ अपनी एक स्वतंत्र राय होनी भी आवश्यक है। आने वाली फिल्म आदिपुरूष में रावण के चित्रण को देख कर इसका अभाव लगना स्वाभाविक है। एक बर्बर, दानव के रूप में रावण का चित्रण ना केवल अधूरा है बल्कि उसके साथ एक अन्याय है। राक्षसराज रावण राक्षस सुबाहु और मारीच की तरह नही है जिसके चरित्र को एकविमीय रूप में दिखाया जा सके। आशा रखता हूं आदिपुरुष फिल्म में रावण के चरित्र के साथ न्याय हुआ होगा। टीजर देखने के बाद उसकी आशा कम ही लगती है। 

दशहरा की छुट्टियां

मुझे दशहरा परिवार के साथ मनाना पसंद है। आखिर हमारा सबसे बड़ा त्योहार है, साल में एक बार मेला देखना और एंजॉय करना तो बनता है। मैं चाहता हूं कि नवरात्रि और दशहरा के बीच पूरे शहर में ट्रैफिक ठीक से काम करे। मेला के दौरान ट्रैफिक जाम मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। सारे ट्रैफिक पुलिस वालों को चाहिए कि हमेशा वो मुस्तैद रहें ताकि कहीं जाम ना लगे। मेला।के आस पास गंदगी भी न फैले तो सारे नगर निगम वाले कर्मचारियों को भी पूजा के दौरान ड्यूटी पर लगा रहना चाहिए ताकि कहीं गंदगी ना फैले। और हां, नवरात्र में मैं उपवास और पूजा पर रहता हूं, इसीलिए मैं चाहता हूं कि सुबह सुबह आकर घर के सभी नौकर चाकर आकर मेरे घर की सफाई कर जाएं। मेरे नाश्ते के लिए फल और दूध चाहिए होगा इसीलिए वो दुकान हमेशा खुली रहनी चाहिए। पिछले बार विसर्जन के समय बिजली कट गई थी, मैं बिजली विभाग वालों को फोन लगाता रहा, सब गायब थे। यह कोई तरीका है!! बिजली विभाग वालों को ड्यूटी पर होना चाहिए। मेला देखने के लिए बड़ी भीड़ हो जाती है, और मुझे भीड़ में ड्राइव करना बिल्कुल पसंद नहीं है। यह त्योहार के समय सारे टैक्सी वाले भी पता नहीं कहां गायब हो जाते हैं, बताइए यह कोई तरीका है। उन सारे टैक्सी वालों का लाइसेंस रद्द कर देना चाहिए जो पर्व के समय गायब रहते हैं। मुझे मेला देखने के लिए टैक्सी ,रिक्शा, ऑटो किसी की दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

पता नहीं, मेरे बच्चों के ट्यूशन टीचर को भी इसी समय छुट्टी क्यों चाहिए। भला, बच्चों को होमवर्क कौन करवाएगा, पूजा के तुरंत बाद उनके एग्जाम भी हैं, उसकी तैयारी भी उसी को करवानी थी। अब मुझे साल में एक बार छुट्टी मिलती है, उस समय बैठ कर बच्चों को होमवर्क कौन करवाए। आने दो ट्यूशन टीचर को वापस, जितने दिन गायब रहा है ,उतने दिन के पैसे काटूंगा। मजाक बना रखा है। छुट्टी का बहाना चाहिए इन लोगों को।

और क्या कहूं! बस आराम से छुट्टी बिताना चाहता हूं। क्या इतना भी हक नहीं बनता मेरा। आप सब को भी त्योहारों की बहुत बहुत शुभकामना।। 



Sunday, October 2, 2022

देश का लाल : लाल बहादुर

सन 1965 के युद्ध के दौरान पाकिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद अयूब खान को लगा कि सन बासठ की हार और पंडित नेहरू की मृत्यु के बाद भारत को हराना आसान होगा। अयूब अतिआत्मविश्वास में बोल गए कि हमारी सेनाएं टहलते हुए दिल्ली तक पहुंच जाएंगी। जाहिर है कि उन्होंने पांच फीट दो इंच ऊंचे भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का आकलन उनकी शारीरिक बनावट पर किया था। आगे जो हुआ वो सर्वविदित है, शास्त्री जी ने ना केवल देश का नेतृत्व किया बल्कि पाकिस्तानी जनरल अयूब खान की दिल्ली तक टहल कर पहुंच जाने की सारी योजना मुंगेरीलाल के सपने साबित हुई। युद्धोपरांत रामलीला मैदान में अपने भाषण में एक विजयी वीर की भांति शास्त्री जी ने कहा: अयूब खान ने कहा था कि वो टहलते हुए दिल्ली तक आएंगे, वो तो नहीं आ पाए, इसीलिए हम टहल कर लाहौर पहुंच गए। जनता ने बहरा कर देने वाली करतल ध्वनि से अपने विजेता प्रधानमंत्री का अभिवादन किया।

यह एक संयोग ही है कि 2 अक्टूबर को ही जन्मे महात्मा गांधी जहां सत्य अहिंसा के लिए जाने जाते हैं, दो अक्टूबर को जन्मे शास्त्री जी जो एक गांधीवादी नेता थे, भारत के इतिहास में एक युद्ध विजेता की तरह याद किए जाएंगे। शास्त्री जी ने एक बार राष्ट्र के नाम अपने संदेश में कहा था कि अगर कोई देश न्यूक्लियर हथियार या तलवार की नोंक पर हमें डराने का प्रयास करेगा तो हम इतना बता दें कि हम झुकने वालों में से नहीं है। इनको मेरा इतना ही जवाब होगा कि हथियारों का जवाब हथियारों से दिया जायेगा। नौ साल बाद भारत ने पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण किया तो उसका पहला सार्वजनिक संकेत शास्त्री जी ने पहले ही दे दिया था।

कृतज्ञ राष्ट्र की तरफ से शास्त्री जी को उनकी 118वी जयंती पर कोटि कोटि नमन।

Wednesday, September 21, 2022

राजू भईया के लिए।

गजोधर भैया,
हंसाते हंसाते अचानक से चल दिए। अब कौन सुनाएगा कि बूढ़ा गब्बर का आगे क्या हुआ? क्या सांबा और कालिया अब भी उसको लाफा देते रहते हैं? कौन फिल्म थिएटर में देख कर उसकी कहानी हमको सुनाएगा। बहुत इच्छा थी कि आप लाल सिंह चड्ढा देख कर आते और उसकी कहानी सुनाते। अब यह इच्छा तो पूरी होगी नहीं। जीजा साली वाली कहानी भी आप अधूरी छोड़ गए। जीजू!! एक रसगुल्ला, खाना पड़ेगा!!! कहने वाली साली कहां है आज कल? बहन की शादी करवाने वाले भाई की शादी हुई कि नहीं, यह भी बिना बताए चल दिए। कभी कभी गुस्सा भी आता है कि शायद आप बड़े आदमी बन गए तो हम लोगों की परवाह करना छोड़ दिया। हां कर लो यह पहले, बड़े आदमी हैं करते होंगे। 

राजू भैया, कितनी बातें थी जो तुमसे सुननी थी। कितनी कहानियां थी जो आपको सुनानी थी।

बड़े शौक से सुन रहा था जमाना, तुम ही सो गए दास्तां कहते-कहते।

जहां रहना, हंसते रहना!! हंसाते रहना।।

Tuesday, September 20, 2022

A peaceful natural death

Queen Elizabeth II has died peacefully of natural causes. Of course, she lived an extraordinary life. She was corronated as queen almost seven decades ago. She saw a lot of water flow down the Thames. But more than her life, it's her death that catches my attention. When I read the news about the queen dying peacefully of natural causes, I thought this kind of death is becoming very very rare. How many of us have seen people around us dying peacefully at home due to natural causes after living a full life. Most of the deaths we see are preceded by prolonged illness, medical procedures, and painful medication. Diabetes in kids, heart attacks in thirties and deaths in 40s don't surprise us anymore. Rarely do people die at home; it's either in hospital or on the way to hospital. Heart attacks, diabetes, hypertension, and other lifestyle diseases have denied most of us a natural, peaceful death. The Queen definitely had a privileged life, and she had a privileged death too. Most of us may wish for a life like her; a death like her is equally desirable, if not more. May her soul rest in peace!

अलार्म घड़ी सुलाने के लिए है

अलार्म घड़ी बजनी चाहिए यह बताने के लिए कि सोने का वक्त हो गया। अलार्म घड़ी इसलिए नहीं बनी कि आपको कच्ची नींद से जगाए । अलार्म घड़ी इसलिए बनी है कि आपको कहे कि थोड़ा सो जाओ, थक गए होगे ना कि सुबह सुबह आपको चिल्ला चिल्ला कर जगाए कि उठ जाओ कब तक सोते रहोगे। अलार्म घड़ी आपका खयाल रखने के लिए बनी है, आपकी एक सेविका है जो आपको सही समय याद दिलाती है। हमने उसको अपनी एक क्रूर गुस्सैल मालकिन बना दिया है जिसकी आवाज तक हम सुनना नहीं चाहते, लेकिन जिसकी बात मानना हमारी मजबूरी बन गई है। क्यों ना हम अलार्म घड़ी को ऐसे अपने जीवन में ऐसे अपनाए कि उसकी आवाज सुन कर हमें खुशी हो न कि हर सुबह उसको बार बार खीझ कर हम चुप कराते रहें। 

भला किसको अपनी जिंदगी में हर सुबह चीख चीख कर नींद तोड़ने वाला दोस्त चाहिए!!