Sunday, December 5, 2021

A Dead horse and MBA

An uneducated person when discovers that he is riding a dead horse, 
the best strategy he follows is to dismount. 

MBA graduate, however, often try other strategies because they are highly educated..
These include...
1. Buying a stronger whip.
2. Changing riders.
3. Saying things like, "This is the way we always have ridden this horse".
4. Appointing a committee to study the horse.
5. Arranging to visit other sites to see how they ride dead horses.
6. Increasing the standards to ride dead horses.
7. Appointing a tiger team to revive the dead horse.
8. Creating a training session to increase our riding ability.
9. Comparing the state of dead horses in today's environment.
10. Change the requirements declaring that, "This horse is not dead".
11. Hire contractors to ride the dead horse.
12. Harnessing several dead horses together for increased speed.
13. Declaring that, "No horse is too dead to beat."
14. Providing additional funding to increase the horse's performance.
15. Do a Cost Analysis Study to see if contractors can ride it cheaper.
16. Purchase a product to make dead horses run faster.
17. Declare the horse is now "better, faster and cheaper."
18. Form a quality circle to find uses for dead horses.
19. Revisit the performance requirements for horses.
20. Say this horse was procured with cost as an independent variable.
21. Promote the dead horse to a supervisory position.
22. Setting up weekly review meeting to see if dead horse is gradually coming back to life.

23. Setting up a war room for aggressive whipping and its proper feedback.

24. Switching to agile mode of whipping instead of waterfall mode of whipping.

25. Telling the dead horse about the incentives if he starts running

26. Annoucing up an IPO to sell the dead horse. 

27. Declaring the horse will come to life if AI, Blockchain and machine learning techniques are used.
28. Allowing the dead horse to work from home so that it can have a better work life balance.
29. Asking dead horse to attend team building activities held by HR team so that he can be motivated.

Which one have you used?

#InspiredPost

Saturday, December 4, 2021

टकराना और प्यार

फिल्मों में दिखाते हैं कि एक कुंवारा लड़का और एक कुंवारी लड़की टकरा जाते हैं। लड़की के हाथ से किताबें, फूल, कागज गिर कर बिखर जाते हैं। लड़का समेटने में उसकी मदद करता है और दोनो एक दूसरे की आंखों में देखते हैं। पीछे वायलिन बजने लगता है और एक मिनट में प्यार हो जाता है। ~ यह है काल्पनिक दुनिया का प्यार।
असल जिंदगी में घर पर अगर पति पत्नी टकरा जाएं और बीवी के हाथ से ऊन का गोला, आटे का बर्तन, फोन या कचरे का डब्बा ही गिर कर बिखर जाय, तो पति अपनी पत्नी की क्या,  किसी की मदद के लायक नहीं रहता। पति की आंखें बंद हो जाती हैं लेकिन अपने कानों को कौन बंद सकता है। आगे पीछे ऊपर नीचे हर तरफ से वीर रस और वीभत्स रस के शब्द बाणों की बारिश होने लगती है जिसमें करुण रस में पहले से डूबा पति जलसमाधि ले लेता है। यह सब एक मिनट में हो जाता है। ~ यह है वास्तविक जीवन की हकीकत।

जोखिम जाने बिना निवेश जुए के बराबर

उदारीकरण की नीति को संसद में पेश करते समय डॉ मनमोहन सिंह ने कहा था कि दुनिया की कोई भी शक्ति उस विचार को नहीं रोक सकती जिसका समय आ चुका है। हालिया समय को देखें तो डिजिटल मुद्रा कुछ ऐसी ही संकल्पना लगती है। आने वाले समय में जीवन के हरेक पक्ष में डिजिटल का समावेश होना ही है, लेकिन क्या डिजिटल मुद्रा का मतलब क्रिप्टो करेंसी से ही है। क्रिप्टो करेंसी और इसमें बढ़ते निवेश और लोगों की उत्सुकता ने इस प्रश्न को और भी गंभीर बना दिया है।

मुद्रा के दो मुख्य कार्य हैं, पहला विनिमय का माध्यम और मूल्य का संचयन। जब तक किसी देश की केंद्रीय बैंकिंग संस्था किसी भी मुद्रा को लीगल टेंडर का दर्जा नहीं से देती, वो उपरोक्त दोनों मानकों पर खरी नहीं उतरती। 

भारतीय मध्यवर्ग जो चिटफंड में अपने पैसे के डूबने और यस बैंक में अपने पैसे फंसे होने पर सरकार का मुंह ताकती है, और यहां तक कि शेयर मार्केट के नीचे जाने पर भी सरकार से यह आशा रखती है कि सरकार कुछ करके सेंसेक्स को ऊपर ले जाए, क्रिप्टो करेंसी से जुड़े जोखिम को लेने को तैयार नहीं दिखता।

जोखिम लेना तो दूर अधिकतर लोग जोखिम को समझने की स्थिति में नहीं हैं। आर्थिक साक्षरता और तकनीकी ज्ञान के अभाव का ही प्रमाण है कि हमारे देश में बैंक से जुड़े इतने ठगी के मामले आते हैं। रही बात क्रिप्टो में बढ़ रहे निवेश को लेकर, तो यह कुछ ऐसा ही है जैसे छत्तीसगढ़ से एक स्कूली बालक के गाने 'बचपन का प्यार' रातों रात सबकी जुबान पर चढ़ गया। इसका अर्थ कतई नहीं है कि इसके गाने को सुनने वाले संगीत के जानकर थे या उस बालक में गाने की कोई नैसर्गिक प्रतिभा थी। यहां तक कि कुछ मीम कोइंस, जैसे कि डॉग कॉइंस, की सफलता यह दिखाती है कि वर्तमान में क्रिप्टो की सफलता का कोई मजबूत आधार नहीं है बल्कि यह भीड़ की बेकाबू भावनाओं के उबाल पर आधारित है जिसका ठोस आधार नहीं है।

हां यह बात अलग है कि हम इस डिजिटल युग में क्रिप्टो मुद्रा से आंख मूंद कर नहीं रह सकते। इसका उपाय यह है भारतीय सरकार अपनी एक डिजिटल मुद्रा जारी कर सकती है और इसके पीछे की ब्लॉकचेन तकनीक पर आधारित सप्लाई चेन, बैंकिंग , प्रशासन सब पर कार्य किया जा सकता है। प्रधानमंत्री वैसे भी औद्योगिक क्रांति 4.0 में भारतीयों के नेतृत्व को अपने विजन का हिस्सा मानते हैं, तो ब्लॉक चेन और उसपर आधारित मुद्रा को नज़रंदाज़ करना बड़ी भूल होगी।

यह सच है कि भविष्य डिजिटल है लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि आधी अधूरी तैयारी के साथ इस मैदान में उतरा जाय क्योंकि इससे जुड़े खतरों और जोखिम को लेने के लिए ना हमारा समाज तैयार दिखता है और ना ही अर्थव्यवस्था। मुहम्मद बिन तुगलक ने तांबे की मुद्रा चलाई तो हर सुनार की दुकान टकसाल बन गई थी। अगर क्रिप्टो करेंसी को निर्बाध छूट दे दी गई तो कमजोर अर्थव्यवस्था , कम जोखिम लेने की क्षमता, आतंकवाद , ब्लैक अर्थव्यवस्था से जूझते देश के सामने कई नई समस्याएं आ सकती हैं। खास कर प्राइवेट करेंसी जहां पारदर्शिता का बिलकुल अभाव है, इन समस्याओं को कई गुना बढ़ा सकती है।


वर्तमान में प्राइवेट क्रिप्टो मुद्रा ड्रग्स का व्यापार करने वालों, फिरौती मांगने और दूसरे अवैध व्यापार करने वालों के लिए वरदान से कम नहीं है। क्योंकि इसमें पैसे भेजने वाले और पैसे पाने वाले दोनो की पहचान गुप्त रहती है। इसपर न कराधान हो सकता है और ना ही करवंचना पर कोई दंड देना संभव है। जिस प्रकार तुगलक काल में हर सुनार की दुकान एक टकसाल बन गया था, उसी प्रकार प्रकार के हालात आज दिखते हैं जहां हजारों क्रिप्टो करेंसी बाजार में आ चुकी है। एक सुझाव यह भी दिया जा रहा है कि क्रिप्टो करेंसी को मुद्रा का नहीं तो कम से कम कमोडिटी का दर्जा दे दिया जाय जिससे इसकी ट्रेडिंग की जा सके। यह सुझाव भी इस मामले में सही नहीं दिखता क्योंकि हर कमोडिटी के मूल्य निर्धारण के लिए हमारे पास जितने पैमाने हैं उनमें से किसी का भी प्रयोग कर हम इनका वास्तविक मूल्य निर्धारण नहीं कर सकते। अगर इसका कोई वास्तविक मूल्य निर्धारित नहीं किया जा सकता तो क्रिप्टो की ट्रेडिग और जुए में कोई खास अंतर नहीं है।

सच्चाई यह भी है कि पूरे विश्व की सरकार इसको लेकर असमंजस में हैं। एकाध छोटे देशों को छोड़कर किसी ने भी इनको मान्यता नहीं दी है। भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था को, जहां मानवता का एक पांचवा हिस्सा निवास करता है और जो भूख और गरीबी से अपनी लड़ाई जारी रखे हुए है, कोई भी कदम सोच समझ कर ही उठाना चाहिए। व्यक्तिगत निवेशकों को भी यह समझना चाहिए कि निवेश और जुआ अलग अलग चीजें हैं। जोखिम को समझे बिना समझे किया गया निवेश जुए के ही बराबर है और जुआ खेल हो सकता है कमाई का का आधार नहीं।

Thursday, December 2, 2021

आप कतार में हैं

इंतजार करिए कि
 आप कतार में हैं।
करिए अपनी बारी का इंतजार
आप कतार में हैं।
हैं सख्त बड़े कानून उसके
आप जिस कतार में हैं
बस सीधा चलते जाना है 
उनके पीछे जो आपसे आगे
खड़े कतार में हैं।

मचाएगी शोर आपके
 पीछे वाली भीड़,
सर पर उठाएंगे आसमान
 आपके आगे वाले,
अगर तोड़ कर आगे जाने की कोशिश,
समवेत स्वर में आपको
 याद दिलाया जायेगा,
अरे भई, हम भी कतार में हैं
आप कतार में हैं।

झेलनी होगी पीछे वालों के ताने
थोड़ा तेज चलो भाई,
सामने वाले सुनाएंगे झल्ला कर
थोड़ा सब्र करो भाई,
गर एक कदम भी चले
कतार की रफ्तार से अलग ,
याद दिलाएगी दुनिया 
समेट लो अपने डैने कि
आप कतार में हैं।
ना आगे वाले को पता
ना पीछे वाले को पता,
कि क्यों खड़े हैं कतार में।
अकेले में वे बताएंगे कि
देखी भीड़ तो सोचा कि
कुछ अच्छा ही होगा।
तभी तो लगी है भीड़
और लंबी लगी कतार है।
बिन पतवार की नाव जैसे 
जाती उधर ही जिधर की बयार है।
लगा हूं जिसके लिए कतार में
 क्या मिल जायेगी खुशी मिल जाने पर
या हम भुलावे के संसार में हैं,
आप कतार में हैं।

अलग सा सुनसान रास्ता
ना भीड़ और न शोर
उधर न कोई कतार है,
ना आगे कोई जिसके
 पीछे चलना हो,
ना पीछे कोई जिसके आगे 
निकलने से डरना हो,
अलग है और बीहड़ है यह रास्ता
सपाट नहीं बिल्कुल ।
कौन जाने, एक कदम सड़क पर 
अगला कदम दरार में है।
भले इस रास्ते पर मेहनत और
किस्मत तकरार में हैं,
पर अनजान रास्तों में चलते
मुकाबला होता खुद से,
दिल सुकून और करार में हैं।
अकेली राह, अकेला सफर
पर कम से कम यह इत्मीनान कि
अब मेरी मेहनत, मंजिल और मंशा
 एक कतार में हैं।

Sunday, November 28, 2021

टेंपू की पिछली सीट के सुख की क्षणभंगुर माया

टेंपू में पीछे बैठे पुरुष का सुख उतना ही क्षणिक होता है जैसे कमल दल पर पड़े तुहिन कणों का जीवन। सूरज की किरणें आई नहीं कि ओस की बूंदें अपने कमलासन को छोड़ने को विवश हो जाती हैं।

टेंपू की पिछली सीट पर बैठे पुरुष को कब कह दिया जाय कि "भैया आप आगे आ जाओ, लेडीच बैठ जाएगी वहां", महादेव भी नहीं बता सकते। 

राही मनवा आगे वाली सीट की चिंता क्यों सताती है, ड्राइवर ही अपना साथी है।
पिछली सीट तो है एक छांव ढलती, आती है जाती है, 
ड्राइवर ही अपना साथी है।

Friday, November 26, 2021

Fly doves but feed hawks too

26/11 is not an ordinary date. While we cherish one of the most treasured achivements of post independence india if not the most treasured achivement, i.e. our constitution, we also remember that biggest terrorist attack on our civilians post independence.

Today is the day to remember that there should be no compromise on internal and external security. Gone are the days of traditional warfare where armed forces used to declare war and fight in open with integrity and dignity. Now warfare has transformed and expanded into cyber, economic, social, political turfs. Society which fails to recognise these threats proactively is doomed to perish and suffer. 

Our threat centers are not very far, it's across the border and inside our homelands. It's all desirable and perfectly fine to fly the peace doves but equally more important to keep feeding our hawks to pick on any potential threat.

We might have hung one Kasab, but Kasab building mechanism is on as usual. May be with higher vigour than ever. 

 These are very important things relevant to everyone. In case you feel that you are happy in your bunglow with a plum job and kids studing in a nearby school, and hence need not worry about these matters. Please remember that this life and it's amenities are available given the guarantee to a safe and stable nation. If nation is not safe, these things vaporise like water on a hot pan once nation falls to barberians. In case you can't visualize it, image yourself as a women University lecturer from Kabul, who has not got her salary in months, her kids are banned from attending School and her big bunglow in Kabul is not worth a hut anymore.

Let we forget. And yes, when any player  says that sportsmanship has won, most likely he has lost the match. I get the same feeling when I hear the often repeated but irritating phrase that terrorists can't beat the Spirit of Mumbai. Any reference to this 'Spirit of Mumbai'  only means that we have suffered another attack and are nonchalant about yet another bastards putting their feet on our land . 

Jai Hind..

Thursday, November 18, 2021

हिंदू ना होने की दुविधा

आज सुबह उठा तो लघुशंका करने के बाद मन में एक शंका बैठ गई। शंका होने लगी कि आखिर मैं हिंदू हूं कि नहीं। अगर हूं भी तो कितना हिंदू हूं। अगर हिंदू हूं तो कैसे प्रमाणित करूंगा? अगर हिंदू हूं भी तो आखिर किस कैटेगरी का?

मेरे पास रामनामी चादर ओढ़े कोई फोटो नही है और ना ही सोशल मीडिया पर किसी गुफा में बैठे ध्यानमग्न मेरी कोई तस्वीर वायरल हुई है आजतक। महीना सावन का है या अगहन का, मुझे पता नहीं। उतनी ही बात हो तो शायद हिंदू बन भी जाऊं, लेकिन मैं तो यह मानता हूं कि आजादी 1947 में मिली। मैंने आजतक ना ही तेजोमहालय वाली पोस्ट किसी को फॉरवर्ड की है और ना ही मेरे फोन पर सुदर्शन न्यूज़ का ऐप इंस्टॉल्ड है। हां, शाखा मैं गया हूं, काफी बार गया हूं, लेकिन पचासों बार नजदीकी स्टेट बैंक की शाखा में जाने के बाद भी कभी सही समय पर नहीं पहुंच पाया। जब सुबह पहुंचा तो पता चला लंच के बाद आना है और लंच के बाद पहुंचा तो पता चला कि बड़े बाबू लंच के पहले ही फॉर्म जमा लेते हैं। एक बार सही समय पर पहुंच कर कतार में लग भी गया तो काउंटर पर पहुंच कर दो बातें पता चली, पहली यह कि मेरा तो काउंटर ही गलत है और दूसरा होम लोन लेने के लिए सारे डॉक्यूमेंट्स के साथ जो मैंने अपने जन्मपत्री लगाई थी उसमें मेरी कुंडली में मांगलिक दोष निकल आया है, अतः मुझे लोन नहीं मिल सकता। खैर, यह बातें फिर कभी। अब जो व्यक्ति आज तक सिर्फ बैंक की शाखा में गया हो, इतने बड़े अपराध बोध वाला व्यक्ति हिंदू कैसे हो सकता है। यही शंका दूर करते करते वापस से लघु शंका लग आई।

बाथरूम में जाकर बैठा तो देखा मेरा तो टॉयलेट तक हिंदू रीति से नहीं बना बल्कि अंग्रेजों के द्वारा बनाया गया है। मैं निराशा के अंधकार में डूबता सा चला गया। आगे खयाल आया कि हनुमान चालीसा के नाम पर "भूत पिशाच निकट नहीं आवै" वाली लाइन के अलावा कुछ खास याद नहीं। एक बार ऑफिस में झल्लाए हुए बॉस को अपनी ओर आते देख कर यह लाइन मुंह से निकल गई थी तो बड़ी आफत आ गई थी। उसके बाद तो सार्वजनिक मंचों या सार्वजनिक सभाओं को छोड़िए, अपने बेडरूम में भी यह लाइन पढ़ने से डरता हूं। हिंदू बनने के लिए एक सांस में हनुमान चालीसा बांच जाने वाले तो कतई मुझे हिंदू नहीं मानेंगे।

इसके बाद शौचालय से निकल कर बाहर आया तो अर्धांगिनी ने पूछा कि ऐसे मुंह क्यों लटकाए हुए हो। मैने कहा कि मैं अपनी पहचान को लेकर परेशान हूं। हिंदू होने के लिए आपको अपना गोत्र न केवल याद होना चाहिए बल्कि आपको सबको बताना भी चाहिए। मुझे तो शादी के वक्त पहली बार मुझे अपना गोत्र का पता चला था, जो अब वापस से भूल भी गया हूं। बचपन में कराए गए उपनयन संस्कार में मिले पवित्र धागे को बाथरूम जाने वक्त ना कान के ऊपर स्थान देना याद रख पाता हूं और ना बाहर आने के बाद अपने जैकेट के ऊपर उसे कभी स्थान दिया। आखिर मैं कैसा हिंदू हूं? 

आखिर कोई निकृष्ट हिंदू ही होगा जिसने आज तक" विष्णु माता की जय का जयकारा " नहीं लगाया। विष्णु माता की जय तो छोड़िए। अब जब ऊपर के सारे प्रकार के हिंदुओं में अपने को शामिल नहीं पाया तो बड़ी आशा से मैंने अपने आप को अगली कैटेगरी में फिट करने की कोशिश की। फिर हाथ में निराशा ही हाथ लगी। ना ही मैंने आजतक I am ashamed as a hindu वाले ट्वीट किए हैं, और ना ही आजतक दिन में कन्या पूजन और रात में छी छी वाला काम किया है। अगर दिन में कन्या पूजन करने लगा तो या तो जोरू का गुलाम कहलाऊंगा या सड़क पर एक और पापा की परी की संख्या बढ़ाऊंगा। दोनों ही स्थिति मुझे नागवार गुजरती है। जिंदगी भर ब्वॉयज स्कूल, बॉयज होस्टल और इंजीनियरिंग कॉलेज की जिंदगी जीने के बाद लड़कियों के सामने मेरा कॉन्फिडेंस तब तक ही रहता है जब तक लड़की 2D में हो। 3D कन्याओं के सामने मेरी ऐसे ही फटी रहती है। इसीलिए इस वाली हिंदू कैटेगरी में भी सम्मिलित होना संभव नहीं लग रहा।

बालकनी में बैठा बैठा सोच ही रहा था कि सामने से एक अर्थी जाती दिखाई दी। बरबस ही हाथ प्रणाम की मुद्रा में चले गए। फिर देखा कि तुलसी पिंडे की मिट्टी सख्त हो गई है , पिछले हफ्ते बाहर रहने के कारण उसमें खुरपी नहीं चला पाया था। जल्दी से घर से खुरपी लेकर आया तुलसी के आस पास की मिट्टी पलट दी। फिर पास ही रखे मिट्टी के बर्तन को पानी से भरा ताकि बालकनी में रहने वाली हमारी सबसे नज़दीकी पड़ोसन गौरेया को पानी की दिक्कत ना हो। इतने में देखा कि मौसम सुहाना हो रहा है। बारिश शुरू हुई, देवी जी को आवाज लगाई कि थोड़े प्याज के पकोड़े बना दो, कितना अच्छा मौसम हो रहा है। अंदर से आवाज आई, पापी कहीं के !! आज एकादशी है तो कोई लहसुन प्याज नहीं बनेगा। और यह पूजाघर का टेबल उठा कर बाहर कर दो, मुझे अल्पना बनानी है। पूजा घर का भारी टेबल और उसपर रखे सामान को उठा के जो पसीना निकला उसके साथ ही नासपीटे न्यूज़ चैनल्स की वजह से पैदा हुई हिंदू ना होने की शंका भी कहीं मुझसे कहीं दूर निकल गई।

Tuesday, November 16, 2021

चोर और उससे जुड़े अन्य विशेषण

‌एक विशेषण है चोर। चोर वो है जो दूसरे का सामान उठा ले वो भी बिना पूछे। दूसरे की कॉपी से नकल कर ले नजर बचा के। रात के अंधेरे में आपकी कार ले उड़े या आपकी साइकिल का ताला तोड़ उठा ले जाय। लेकिन चोर एक अच्छा विशेषण है। चोर सामान्यता तब कहलाता है जब वो या तो चोरी करता हुआ पकड़ा जाय या चोरी किया हुआ सामान उसके यहां बरामद हो। मतलब यह कि चोर प्रकृति से एक रिस्क टेकर होता है। एक गैंबलर, दूसरों का माल़ उड़ा ले जाने के लिए प्लानिंग करता है, हर खतरे को भांपता है और उसके लिए काट ढूंढता है। लेकिन चोर की बुरी हालत होती है उसके पकड़े जाने पर। जब दुनिया जान जाती है कि वो चोर है।
‌
पकड़ा गया चोर दुनिया का सबसे दयनीय इंसान है। उसके चेहरे पर जो भाव आते हैं उसी भाव से एक विशेषण बनता है चोट्टा। चोट्टा मतलब जो देखने में ही पकड़ा गया चोर टाइप दिखे। कहीं जा रहा हो तो लगे कि चोरी करने जा रहा हो। दूसरों के सामान को ऐसे निहारे जैसे उड़ाने की योजना बना रहा हो। चोट्टा चोर जैसा दिखता है , उसका व्यवहार चोर जैसा होता है लेकिन कोई जरूरी नहीं कि वो चोर ही हो। सामान्यतः चोर कुछ चोरियां करने के बाद पकड़ा जाता है, पकड़े जाने के बाद अपने पिछले गुनाह कबूल करता है। अपनी चोरी के कारनामों और नए नवेले तरीकों की वजह से कुछ वाहवाही भी पाता है, चोट्टा ऐसा कुछ नहीं कर पाता। बेचारा सिर्फ गाली खाता है, लेकिन चोर बनने के बाद जो फायदे होते हैं उनसे वंचित रहता है। 
चोट्टा से नीचे भी एक कैटेगरी है। उसको चोरकट कहते हैं। अब चोरकट वो है जो चोर बनने के कोशिश करे लेकिन हर बार पकड़ा जाय। चोट्टा जैसी शक्ल लेकर घूमता फिरे और यह सोचे कि लोग उसको न चोर समझें और न चोट्टा कहें। ऐसे वेवकूफों को ही चोरकट कहा जाता है जो चोरी पकड़े जाने पर भी अपनी सफाई देते रहें और समझें कि सारी दुनिया तो बस उसकी सफाई सुनते ही कहेगी कि बेटा तुम चोर नहीं हो सकते। चोट्टा सब ही है जो तुमको चोर कहता है। बताओ इतना बड़ा आदमी हो तुम, चोर कैसे होगे। 

तो बात ये है कि हर चोरकट चोरी करना चाहता है लेकिन पकड़ा कर चोट्टा वाली शकल बनाकर अपने आप को चोर घोषित होने से बचाने से कोशिश करता है। पर चोरी वाले धंधे में यही तो दिक्कत है कि कब बुरा वक्त आ जाए पता ही नहीं चलता। चाहे पांच करोड़ की घड़ी पहन लो, चोर को चोट्टा बन कर चोरकट वाली हरकत आज ना कल करनी ही पड़ती है। 

Wednesday, November 10, 2021

छठ का महापर्व

याद आता है गंगा किनारे बसा साइंस कॉलेज का होस्टल केवेंडिश। होस्टल से बगल की जगमग सड़क और उससे गुजरता छठ व्रतियों का हुजूम। साउंड सिस्टम पर बजती छठ लोक गीतों का अनवरत सिलसिला। उस समय हम लोग आईआईटी की तैयारी कर रहे थे, इसलिए घर नहीं गए छठ पूजा में। छठ के पास आते ही पता चला कि होस्टल का मेस बंद रहेगा क्योंकि महराज जी छठ के लिए घर गए हुआ हैं। मेस चलाने वाले को हम महराज कहा करते थे। 

दो तीन दिन तक तो हम मैगी खाकर किसी तरह काम चलाते रहे। एक सीनियर से पूछा कि भैया ऐसे मैगी खाकर कैसे काम चलेगा। उसने कहा कि आज शाम की अर्घ्य है, कल सुबह इतनी व्यवस्था हो जाएगी कि पूछो मत। मैं समझ नहीं पाया। अगली सुबह वाली अर्घ्य के साथ ही छठ का समापन होने वाला था। केवेंडिश होस्टल के बगल वाली सड़क पर सुबह से ही रौनक थी। हमने भी उस सुबह एचसी वर्मा और केसी सिन्हा की किताबों को छठ की छुट्टी दी और सड़क पर खड़े होकर वो अनुपम नजारा देखते रहे। 

हमारे सीनियर भी साथ ही खड़े थे। हमने कहा कि भैया कल वाली बात याद है या नहीं। कि आज भी मैगी का ही कलेवा चलेगा। उसने कहा एक मिनट रुको। और वो अंदर जाकर एक साफ बेडशीट ले आया। और चादर को होस्टल के सामने बिछा कर खड़ा हो गया। सुबह की अर्घ्य देकर लौट रहे छठ व्रतियों का हुजूम केवेंडिस होस्टल के सामने से गुजरने लगा। बिना किसी से कुछ कहे हर बांस के सूप और दौरे से छठ का प्रसाद हमारे बिछाए हुए बेडशीट पर हरेक परिवार की तरफ से हमारे लिए छठ का प्रसाद दिया जाने लगा। मिनटों में ही हमारे लिए ठेकुआ , केतारी, सिंघाड़ा, नारियल, मूली का ढेर लग गया। हमने सीनियर की तरफ देखा, सीनियर के चेहरे पर मुस्कान थी। उसकी बात सच हो गई थी। छठ मैया की कृपा से हमें मैगी की एकरस जिंदगी से सीधे ठेकुआ की मीठी बयार मिली थी। 

छठ का महापर्व जिसके प्रसाद के लिए हाथ फैलाने में भी कोई शर्म नहीं, हर कोई मानो एक।बराबर हो जाता है। जिसके दावरे और सूप को सर पर उठा कर चलने में गर्व महसूस हो। छठ का पर्व जिसके लिए छठ व्रतियों के लिए सड़कों पर झाड़ू लगाना पुण्य समझा जाता है। एक अनूठा पर्व जिसकी कोई मिसाल नहीं।

सबको छठ की शुभकामनाएं।। 

Saturday, October 9, 2021

संतुलन की खोज

पुरानी फिल्मों में एक सीन हुआ करता था। ऑपरेशन थिएटर के बाहर जीरो वॉट वाला लाल बल्ब जलता रहता था और उसके आस पास एक परिवार के घबराए लोग बैठे रहते थे। डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर से बाहर निकलता और भारी आवाज में बोलता, मरीज की हालत बहुत नाज़ुक है। हम बच्चे और मां दोनो में किसी एक को ही बचा सकते हैं। आप फैसला करिए। हीरो कहता मां को बचा लो, वो मेरा प्यार है। हीरोइन कहती, बच्चे को बचा लो वो मेरे कुल का चिराग है। बुढ़िया दादी कहती हे भगवान उनकी जान के बदले मेरे बच्चे और बहू की जान बक्श दे। बड़ा जबरदस्त सीन हुआ करता था, लोगों के आंखों से आंसू निकल आते थे। अगर बच्चा बच गया तो बिना मां के बड़ा होता था और हीरो बनता था। अगर मां बच गई तो पागल हो जाती थी जो पूरे फिल्म कपड़े की एक गुड़िया बना के चंदा है तू मेरा सूरज है तू, गाती रहती थी। 
‌

भले ही ऊपरवाले सीन और कथानक से बहुत सारी फिल्में हिट हुई हों, लेकिन वास्तविकता से इसका कोई लेना देना नहीं है। ऐसी कोई बीमारी मेडिकल साइंस आज तक नहीं खोज पाया है, जहां डॉक्टर को आकर भारी आवाज में हम किसी एक को ही बचा सकते हैं वाला डायलॉग मारना पड़े। और अगर कोई ऐसा डायलॉग मारने वाला डाक्टर मिल जाय तो समझ लीजिए कि डाक्टर साब ने पढ़ाई या तो ढंग से नहीं की या बेटे और मां में किसी एक तो वो ऊपर पहुंचा चुके हैं और अपनी गलती छुपाने के लिए भूमिका बांध रहे हैं।

ऐसा ही कुछ हमारे जीवन में भी होता है। अपना स्वास्थ्य, अपना करियर, अपना परिवार और अपनी मन की शांति , अगर इनमें से किसी की भी बलि चढ़ाकर आप बाकी सब या सबकी बलि चढ़ाकर आप किसी एक को बचा रहे हैं जो आप भी पुरानी फिल्मों वाले बुरे डाक्टर जैसे हैं जो मां को मारकर बच्चे को और बच्चे को मारकर मां को बचाने का काम करता था। इन अच्छा डॉक्टर मां और बच्चे दोनो को बचाता है क्योंकि अगर किसी एक को बचाया तो या तो आपको एक अनाथ बच्चा मिलता है या बच्चे को खो चुकी टूटी मां। दोनो ही स्थिति सही नहीं है। उसी प्रकार स्वास्थ्य की बलि चढ़ाकर बने करियर, मन की शांति गंवा कर मिले परिवार, और करियर की बलि चढ़ा कर मिले शांति का मान अधूरा है। 

संतुलित आहार की तरह संतुलित जीवन भी कई चीजों से मिलकर बना है। उसी संतुलन की खोज ही जीवन है, उसी संघर्ष में आनंद है और वही जीवन का ध्येय होना चाहिए। बाकी मरना तो एक दिन है ही।

Tuesday, October 5, 2021

लाल बहादुर बनने की जगह पढ़ाई पर ध्यान दें

एक गांव में आम का एक बड़ा सा बागीचा था। उस आम के बागीचे में एक बूढ़ा सा चौकीदार बैठा रहता। अपने मचान पर बैठ कर बीड़ी फूंकता रहता और अपना समय काटता रहता। पिछले कुछ दिनों से वो देखता कि एक लड़की सुबह सुबह आती और दिन भर सूखे पत्ते बुहार कर जमा करती और शाम में गट्ठर बनाकर ले जाती। अगली दिन फिर आती और दिन भर मेहनत कर पत्ते बुहार कर ले जाती। एक दिन बूढ़े चौकीदार ने पूछा कि बेटी तुम यह सूखे पत्ते बुहार कर ले जाती हो, क्या घर में जलावन नहीं है और तुम अपनी मां की मदद करना चाहती हो। लड़की ने कहा कि बाबा मेरे घर में जलावन की कमी तो नहीं है , वो मां ले आती है, लेकिन मैं पढ़ना चाहती हूं। मैं पढ़कर अपने मां बाप का नाम रोशन करना चाहती हूं, लेकिन मेरे पास लालटेन नहीं है। इसीलिए मैं पत्ते बुहार कर ले जाती हूं, ताकि रात में इनको जला कर इनकी रोशनी में पढ़ सकूं। बूढ़े बाबा को लड़की पर बहुत दया आई, उसने अपने जेब से जितने पैसे थे निकाले और लड़की के हाथ में दे दिए। कहा बेटी, आज तुम अपने लिए एक लालटेन खरीद लेना। लड़की की आंखों में आंसू आ गए, उसने बाबा का धन्यवाद किया और एक लालटेन ख़रीदा। उसी लालटेन की रोशनी में पढ़कर वो एक बहुत बड़ी अधिकारी बनी। 

उपर जैसी कहानी आपने पढ़ी वैसी ढेरों कहानियां आपने सुनी होगी। ऐसी कहानियां प्रेरणादायक कहानियां कहलाती हैं और लोगों को बार बार दोहराई जाती हैं। लेकिन कहानियों का क्या है, कि कितनी सच है कितनी झूठ पता नहीं चलता। उपर वाली कहानी को ही लीजिए। आप कितना भी दिल में चाहें कि कहानी का अंत वैसे ही हो जैसा कि बताया गया है लेकिन सच्चाई उससे अलग है। कहानी का अंत कुछ इस प्रकार का है। बूढ़े बाबा ने लड़की को पैसे नहीं दिए, सिर्फ यह पूछा कि बेटा अगर तुम्हारे पास लालटेन नहीं है तो तुम दिन भर पत्ते बुहारने के बजाय दिन में ही क्यों नहीं पढ़ लेती जब रोशनी रहती है। रात में ही पत्ते जलाकर पढ़ना जरूरी है क्या? यह सुन कर ही लड़की के
 सारे नाटक की पोल खुल गई और वो उल्टे पांव भाग गई।

बहुत सारे ऐसे लोग होते हैं जो अपने विक्टिम कार्ड को दिखाने के लिए कॉमन सेंस तक से समझौता कर डालते हैं। उनको अपनी कहानी में लाल बहादुर शास्त्री के नदी तैर कर स्कूल जाने और सड़क की रोशनी में पढ़कर प्रधानमंत्री बनने जैसा एक नाटकीय पक्ष डालना होता है । अपनी मेहनत और रणनीति की जगह वो इन चीजों पर ज्यादा ध्यान देते हैं ताकि उनकी बेचारी वाली छवि बन सके। दुर्भाग्य से ऐसी चीजों से आपको थोड़ी वाहवाही, थोड़ी दया और थोड़ी सहानुभूति भले मिल जाए, सफलता दूर ही रहती है। हाल में ही सासाराम स्टेशन की एक तस्वीर वायरल हुई जिसमें कई युवक स्टेशन पर बैठकर पढ़ाई कर रहे थे, कारण बताया गया कि गांव में बिजली नहीं रहती इसीलिए वो स्टेशन पर आकर पढ़ते हैं। सच मानिए तो मुझे उन लड़कों का पक्ष पत्ते बुहारने वाली लड़की से ज्यादा सबल नहीं लगा। दिन भर पढ़ने के बाद में अगर उनको रोशनी ही चाहिए तो उनके पास स्टेशन के अलावा भी बहुत विकल्प होंगे। साथी का घर हो सकता है, पंचायत भवन हो सकता है जहां पर स्टेशन से कहीं ज्यादा शांति होगी और कम से कम वहां पर वो एक टेबल तो लगा ही सकते हैं। स्टेशन की भीड़ भाड़, आने जाने वाली गाड़ियों के शोर से भरे स्टेशन एक शांत चित्त होकर पढ़ने वाले विद्यार्थी की पहली पसंद नहीं हो सकते।

जहां तक मैने सुना है यह वायरल तस्वीर वाली बात अब शायद नहीं होती लेकिन अगर यह आज भी जारी है तो मेरी उन छात्रों से विनती है कि पढ़ने के लिए कोई और जगह तलाशें। अगर बिजली नहीं है तो अपने मोबाइल को बेचकर एक चाइनीज लाइट खरीद लें जो दिन में चार्ज हो जाए और रात में आपको घर पर ही रोशनी दे। सौ रुपए में ऐसे लैंप मिल जाते हैं जो एक बार चार्ज हो जाए तो आठ दस घंटे चलते हैं। अगर आपके पास सौ रुपए नहीं हैं तो आप किसी भी भले आदमी से उधार ले लें। मेरा मानना है कि समाज में आज भी ऐसे बहुतेरे हैं जो सहर्ष आपकी मदद करेंगे। वैसे आजकल बिहार में बिजली की हालत इतनी भी बुरी नहीं जितनी लोग सोचते हैं। 

सूखे पत्ते बुहारकर पढ़ने वाली बेवकूफाना हरकत बंद करें और स्टेशन खाली कर दें। यह आपके लिए भी अच्छा होगा और आने जाने वाले यात्रियों के लिए भी। यह विक्टिम कार्ड और ऐसी कहानियां इंडियन आइडल वाले प्रतिभागियों के लिए छोड़ दें, यह उधर ही चलेंगी । आपकी वाली प्रतियोगिता परीक्षाओं पर उसका कोई असर नहीं होगा।

Saturday, October 2, 2021

बड़े अच्छे लगते हैं।

कांग्रेस के बड़े नेता कन्हैया कुमार, जिन्होंने 2019 के बड़े चुनाव के समय बड़े गाजे बाजे वाले चुनाव प्रचार के बावजूद बड़ी हार हासिल की थी, ने कहा है कि कांग्रेस एक बड़ा जहाज है जिसे बचाने का बड़ा काम करने के लिए वो आ गए हैं। कांग्रेस के रणनीतिकार इसे एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक मान रहे हैं क्योंकि जेएनयू में कश्मीर के बड़े मानवतावादी नेता अफजल गुरु की बरसी पर बड़ा कार्यक्रम आयोजित करके बड़ा नाम कमाने वाले कन्हैया कुमार की बड़ी लोकप्रियता से कांग्रेस को बड़ा फायदा होगा। कन्हैया इससे पहले जेएनयू कैंपस की सबसे बड़ी पार्टी सीपीआई के अध्यक्ष भी रह चुके हैं तो इसका बड़ा फायदा पार्टी को होता दिख रहा है। बड़ी बात यह है कि कांग्रेस को बचाने का बड़ा काम करने के लिए कन्हैया अकेले बड़े चेहरेरे नहीं हैं, उनके साथ जिग्नेश मेवानी जैसा बड़ा चेहरा भी है। वास्तव में यह सब कांग्रेस में अध्यक्ष और वर्किंग कमिटी से भी बड़ा ओहदा रखने वाले कांग्रेस की सबसे बड़ी आशा राहुल जी बड़ी राष्ट्रीय स्ट्रेटजी का एक हिस्सा है। इसी के तहत छुटभैये नेताओं जैसे कैप्टन अमरिंदर सिंह को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है और बड़ी शेरोशायरी करने वाले सिद्धू जी को बड़ी जिम्मेदारी दी गई थी। यह अलग बात है सिद्धू जी को बड़ी से बड़ी सबसेे बड़ी वाली  जिम्मेदारी चाहिए थी, इसीलिए उन्होंने छोटी वाली बड़ी जिम्मेदारी के पद से इस्तीफा दे दिया है और बड़ा हंगामा कर दिया है। इतना बड़ा काम करने के बाद भी राहुल जी ने अपनी एक बार भी तारीफ नहीं की क्योंकि बड़े बड़ाई ना करें, बड़े ना बोलें बोल। 
वैसे चिंता को कोई बात नहीं है क्योंकि बड़ी बड़ी पार्टियों में ऐसी बड़ी बड़ी बातें होती रहती है। यह बड़ी रणनीति का ही कमाल है कि न्यूज कवरेज में यूपी जैसे बड़े राज्य को पछाड़ कर पंजाब ने अपना बड़ा नाम किया है । लगता है ऐसी बड़ी खबर राजस्थान से भी आने वाली है जहां बड़े मुख्यमंत्री और छोटे मुख्यमंत्री के बीच बड़ी जंग बड़े समय से हो ही रही है। और आगे क्या लिखूं? जितना मैं समझ पाया लिख दिया, आगे कुछ कहूंगा तो आप ही कहोगे कि छोटा मुंह बड़ी बात। जाते जाते बड़े दिन की शुभकामनाएं एडवांस में क्योंकि दुर्गापूजा पर कोरोना के कारण बैन है, दिवाली पर पॉल्यूशन के वजह से बैन है, छठ पर तो  वैसे भी भीड़ और नदी पॉल्यूशन के कारण बैन है। 

चरखा और आज़ादी

आज़ादी की लड़ाई में चरखा का क्या महत्व था? बंदूक से आज़ादी दुनिया में कई देशों ने पाई, लेकिन गांधी जी के दिमाग में यह चरखा कहां से आया। क्या चरखा सिर्फ इस चीज का प्रतीक था कि भारतीयों की निर्भरता इंग्लैंड के मिलों में बने विदेशी कपड़ों पर कम हो? क्या चरखा का महत्व सिर्फ आर्थिक रूप से था या इसके कुछ और मायने भी थे? चरखा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक चिह्न कैसे बना? क्यों गांधीजी ने चरखे पर इतना बल दिया?

वर्ष 1920, अगस्त माह। कांग्रेस गांधीजी के नेतृत्व में अपना पहला राष्ट्रीय आंदोलन असहयोग आंदोलन शुरू करने के लिए जा रही थी।रंगमंच पर खेले जा रहे किसी नाटकीयता पूर्ण दृश्य की तरह एक अगस्त 1920 को बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया। 1 अगस्त 1920 वो तारीख थी जब देश गांधी जी के नेतृत्व में अपने पहले राष्ट्रीय आंदोलन असहयोग आंदोलन की औपचारिक शुरुआत करने वाला था। गांधी जी के देश लौटे करीब पांच साल हो गए थे और कांग्रेस की संस्था पर उनका प्रभाव सबसे ज्यादा हो चुका था। 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना को तीन दशक से ज्यादा हो चुका था, लेकिन कांग्रेस का प्रभाव अब भी शहरी क्षेत्र के पढ़े लिखे वर्ग तक ही सीमित था। यद्यपि स्थापना से गांधी युग की शुरुआत तक कांग्रेस को दादा भाई नौरोजी, सुरेंद्र नाथ बनर्जी, तिलक, एनी बेसेंट जैसे नेताओं का नेतृत्व मिला था लेकिन कांग्रेस अब तक कोई जन आंदोलन खड़ा करने में असमर्थ ही रही थी। गांधी जी के आने से पहले तक नरमपंथ का चरण 1907 तक समाप्त हो चुका था। अंदरूनी कलह के कारण सूरत अधिवेशन में कांग्रेस विभाजित होकर एक निष्प्राय संस्था बन चुकी थी। गरमपंथ के प्रमुख नेता तिलक काला पानी की सजा काटने के लिए अंडमान भेजा जा चुके थे। बीच में क्रांतिकारी आंदोलन जैसे लाला हरदयाल की गदर पार्टी भी अपने भरपूर प्रयासों के बावजूद सफल ना हो सके थे। 
इस प्रकार गांधी जी ने जब स्वाधीनता आंदोलन की बागडोर संभाली, भारतीय स्वाधीनता आंदोलन नरमपंथ, गरमपन्थ और क्रांतिकारी तीनों प्रकार के प्रयोग करके असफल हो चुका था। गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका से लौट कर पूरे भारत का भ्रमण किया और भारत की तत्कालीन परिस्थितियों का अध्ययन किया। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की असफलता का कारण उन्हें जल्द ही समझ आ गया। 

1920 से पहले जो आंदोलन चल रहा था, उसमें किसान शामिल नहीं थे, मजदूर शामिल नहीं थे, कांग्रेस उनका प्रतिनिधित्व ही नहीं कर रही थी। मुस्लिम लीग का गठन हो चुका था जो मुसलमानों का प्रतिनिधत्व करने का दावा कर रही थी। मतलब कांग्रेस एक किसान विहीन, श्रमिक विहीन, और कतिपय मुस्लिम समाज से रहित अपना आंदोलन चला रही थी। सन 1917 में गांधी जी चंपारण जाकर किसानों को तथा जल्द ही अहमदाबाद में मिल मजदूरों के संघर्ष को अपना साथ देकर किसानों और मजदूरों को जन आंदोलन में जोड़ने का प्रयास कर चुके थे। खिलाफत को साथ लेकर वो मुस्लिमों को भी राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बनाना चाहते थे। 

लेकिन भारत का एक वर्ग था जो इन सब से बड़ा था और कांग्रेस की पहुंच से अब भी सबसे दूर था।  इस वर्ग को आंदोलन से जोड़ना सबसे कठिन भी था। क्योंकि इस वर्ग के लिए परदा और घर की चहारदीवारी को पार करना ही कठिन था तो सड़कों में आकर आंदोलनों में हिस्सा लेने के बात तो असंभव ही थी। गांधी जी के मन में यह स्पष्ट था कि समाज के हर वर्ग, खास कर इस वर्ग का सहयोग मिले बिना स्वाधीनता का कोई भी स्वप्न एक दिवास्वप्न ही था।  यह वर्ग था महिलाओं का। और उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि कैसे महिलाओं को आंदोलन का हिस्सा बनाया जाय।

महिलाओं को आंदोलन से जोड़ने का पहला प्रयास हुआ तिलक स्वराज फंड से रूप में। लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद उनके नाम पर तिलक स्वराज फंड की स्थापना हुई। गांधी जी ने देश की महिलाओं से आग्रह किया कि राष्ट्रीय आंदोलन में सहयोग करने के लिए वो आर्थिक दान तिलक स्वराज फंड में दें। पूरे देश से महिलाओं ने अपने गहने और मंगल सूत्र तक दान देकर एक करोड़ रुपए की राशि फंड में तय समय से पहले ही जमा कर ली। इसके बाद महिलाओं ने अपने आप को स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा हुआ महसूस किया। उनको यह विश्वास दिलाने के लिए 
कि स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए महिलाओं का घर से निकालना आवश्यक नहीं बल्कि  बैठे ही वे राष्ट्र सेवा कर सकती हैं। इस काम में चरखे ने बड़ी भूमिका निभाई। महिलाएं घर पर बैठ ही चरखे के माध्यम से अपना सहयोग आंदोलन को देने में सफल हुई। तिलक स्वराज फंड का एक बड़ा हिस्सा पूरे देश में चरखा वितरण के लिए प्रयोग हुआ और इसी चरखे के कारण देश के आधे हिस्से का राष्ट्रीय यज्ञ में सम्मिलित होना संभव हुआ।
चरखा महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बना, स्वाधीनता आंदोलन के व्यापकीकरण का जरिया बना, महिलाओं के आत्मविश्वास का साधन बना और इंग्लैंड की कपड़ा मिलों पर देश की नारे शक्ति का सबसे शक्तिशाली वार साबित हुआ। चरखा और उससे निकलने वाले कच्चे सूत के धागों ने देश को उस एकता सूत्र में बांधा जिसने गुलामी की मजबूत बेड़ियों तक को तोड़ने में मदद की।

गांधी जी के विचारों को गहराई से समझने के बाद ही लोग यह समझ पाते हैं कि चरखा विश्व के सबसे बड़े साम्राज्य के खिलाफ सबसे शक्तिशाली हथियार कैसे बना।

गांधी जयंती की शुभकामनाएं और बापू को कृतज्ञ राष्ट्र का नमन।