Saturday, May 9, 2020

बोल कि लब आजाद हैं तेरे

ब्रांडिंग क्या होती है इसको आसानी से  समझने के लिए आपको वॉट्सएप फॉरवर्ड की दुनिया में जाना पड़ेगा। मान लीजिए आपके पास कोई सस्ती सी शायरी है, जो ज्यादा से ज्यादा किसी ट्रक के पीछे नंबर प्लेट के उपर और हॉर्न ओके प्लीज के बीच में जगह बना सकती है, लेकिन आप चाहते हो कि आपकी शायरी आज का शुभ विचार बन जाय। गुड मॉर्निंग मेसेज के रूप में हर सुबह चलने वाले लाखों संदेशों के साथ लाखों फोन में जगह बना ले। औकात कम, उम्मीद ज्यादा !! कैसे करोगे आप? 

‌ दूसरा उदाहरण लेते हैं। आपके अंदर का सस्ता ओशो जाग चुका है । किसी ट्रैफिक सिग्नल पर रोते बच्चों को 10 रुपए देने के बाद एक तरफ आप दानवीर कर्ण की तरह महसूस कर रहे हो तो दूसरी तरफ भगवान कृष्ण की तरह जिन्हें गीतोपदेश सुनाने के लिए एक रोता बिलखता अर्जुन चाहिए जो आपके सस्ते दर्शन का दर्शन पाकर आपको दार्शनिक मान बैठे। क्या करेंगे आप? 

या कॉरोना महामारी से बिगड़ी अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए राहुल गांधी और रघुराम राजन का इंटरव्यू सुन आपके दिमाग में भी सोना से आलू और आलू से सोना जैसी कोई तकनीक आ गई है। आप चाहते हैं कि लोग आपकी बात को ऐसे ध्यान लगा कर सुने जैसे भारत मोदी जी के 8 बजे वाले संबोधन को सुनता है। कोई रास्ता है?

एक रास्ता तो यह है कि आप हार मानकर बैठ जाएं और ज़ाकिर हुसैन के स्टैंडअप कॉमेडी के नायक की तरह यह मान लें कि चू तो मैं हूं ही, या दूसरा तरीका है कि आप स्थिति के सामने परास्त ना हों। इफ यूं कैंट मेक इट, फेक इट वाले सिद्धांत पर भरोसा करें। ऊपर बताई गई सभी स्थितियों में आपके पास एक वस्तु है जिसे आप बेचना चाहते हैं। बेचने के लिए चाहिए ब्रांड , आपके प्रोडक्ट की एंट्री होनी चाहिए ग्रांड, और यह सब चाहिए फटाफट।

उपाय है ब्रांडिंग। आप अपनी सस्ती शायरी को एक ग्राफिक बनाओ, पीछे पहाड़ पंछी नदी जानवर जो डालना है डालो। नीचे लिखो गुलज़ार। थोड़ा ज्यादा वक़्त हो तो फोटो में गुलज़ार साब की चश्मे के हैंडल को दांतो में दबाए एक फोटो भी लगा दो।

आपके विश्वकल्याण और अर्थव्यवस्था के सुधार वाले सोना आलू वाले आइडिया को अगर बेचना है तो कुछ अलग करना पड़ेगा। गुलज़ार साब की फोटो की जगह जैक मा की फोटो लगाइए। लेकिन यह कॉविड19 के चक्कर में आजकल लोग चाइनीज का भरोसा कम करते हैं। कोई बात नहीं, अपने रतन टाटा कब काम आएंगे । अपना विचार लिखिए और नीचे नाम डालिए रतन टाटा का। बस हो गया।

आपके सस्ते दर्शन को बेचने के लिए आपकी मदद करेंगे कलाम साब। उनकी एक फोटो निकालिए, ध्यान रखिएगा कि कहीं कलाम साब की फोटो की जगह सलमान खान की तेरे नाम फिल्म वाली फोटो ना लगा दें। गूगल का आजकल भरोसा नहीं। बस आपका दर्शन भी तैयार है पूरी दुनिया पर छा जाने के लिए।

अपना वाट्सएप उठाइए, अपने सारे ग्रुप पर भेज डालिए, अपने स्टेटस पर डाल दीजिए, फेसबुक इंस्टाग्राम सब पर डालिए। लोग आपकी शायरी को गुलज़ार का मान, आपके दर्शन को कलाम का समझ कर और आपके अर्थव्यवस्था वाला आइडिया को रतन टाटा का आइडिया मान कर सर आंखों पर बिठाएंगे। 

आपका विचार पूरी दुनिया में फैल जाएगा। आपका नाम भले ना आए, यह खुशी तो आपके हिस्से  आएगी कि नाम भले दूसरों का हो, शब्द तो हमारे हैं।  कभी गलती से आपके शब्द गुलज़ार, रतन टाटा और गुलज़ार के पास पहुंच भी गए, तो वह भी कंफ्यूज हो जाएंगे कि ऐसा मैंने कब कहा। अगर उन्होंने यह कहा भी कि भैया यह बकवास मैंने ना पेली है, तो सुनेगा कौन। उनके पास ना आपके  तरह ब्रांडिंग वाली तकनीक है ना उनको वाट्सएप चलाना आता है। इसीलिए बेफिक्र होकर बोलिए। बोल कि लब आजाद हैं तेरे और सस्ता है तेरा मोबाइल डाटा । 

Thursday, May 7, 2020

बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर

उत्तर वैदिक काल में वेदों का ज्ञान पुराणों के कर्मकांडी आडंबर के सामने कमजोर पड़ने लगा। जनमानस में पूजापाठ की विस्तृत विधियों और उसके साथ जुड़ी बड़े पैमाने पर प्रचलित बलि की प्रथा से आम जनजीवन विशेषतः   कृषक और वैश्य समाज अत्यंत दुखी था। ऐसे में भारतवर्ष के क्षितिज पर भगवान बुद्ध का आगमन हुआ। ध्यान दें कि भगवान बुद्ध के आगमन के समय वैदिक धर्म अत्यंत शक्तिशाली था। पुरोहित वर्ग को इस धर्म का प्रमुख प्रायोजक और प्रयोक्ता था, शासक वर्ग पर गहरा प्रभाव रखता था। नीति निर्धारण और निर्माण में उनका वर्चस्व अतुलनीय था। ऐसे समय में आकर भगवान बुद्ध ने पुरोहित वर्ग, धार्मिक कर्मकांडो, और प्रथाओं पर करारी चोट की, उनके सिद्धांतों और प्रभुत्व को खुली चुनौती दी। परिणाम यह हुआ कि वैदिक धर्म का प्रभाव घटा और बौद्घ धर्म अत्यंत लोकप्रिय होकर भारत वर्ष की सीमाओं से दूर क्षेत्रों में भी जाकर फैल गया।

इस घटना के 500 साल बाद यूरोप में प्रभु येसुमसीह आते हैं। तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था को चुनौती देते हैं। प्रेम और सद्भाव की बातें करते हैं। कमोबेश वही कार्य जो 5 सदी पूर्व भगवान बुद्ध कर चुके होते हैं।

भगवान बुद्ध और प्रभु यीशु मसीह की कहानी यहां तक मिलती जुलती है। अंतर उसके बाद की कहानी में आता है। भगवान बुद्ध 80 साल की दीर्घ आयु तक अपनी बातों का प्रचार करते हैं, भगवान बुद्ध कहलाते हैं और सामान्य रूप से शांति पूर्वक महापरिनिर्वाण को प्राप्त होते हैं। इसके उलट प्रभु यीशु को दो चोरों के साथ सलीब पर लटका दिया जाता है। 

प्रभु यीशु के जाने के करीब 15 शताब्दियों के बाद के यूरोप में चलते हैं। यूरोप आधुनिक ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में अपनी पलकें खोल रहा है। कोपरनिकस नामक खगोल शास्त्री यह गवेषणा करते हैं कि चर्च की मान्यताओं के उलट पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाती है ना कि सूर्य पृथ्वी के। कुछ वर्षों बाद गैलीलियो गलीली अपने खगोल दर्शक दूरबीन से इसे प्रमाणित भी करने का प्रयास करते हैं। कोपरनिकस और गैलीलियो दोनों समाज के वर्चस्वशाली वर्ग की मान्यताओं पर चोट करते हैं। 

लगभग उसी समय भारत में बौद्ध धर्म के बाद आए सबसे बड़े सामाजिक आंदोलन भक्ति आंदोलन का प्रादुर्भव हो रहा है। इस आंदोलन के प्रणेताओं में सर्व अग्रणी है संत कबीर। उन की वाणी में तेज ऐसा है  कि उनकी अनगढ़ भाषा में कही गई वाणी सीधे जनता के ह्रदय में उतरती है। यही वाणी और साखिया समाज के ठेकेदारों की छाती में शूल बन कर चुभते हैं। हिन्दू समाज की कुरीतियां हो या मुस्लिम समाज की कट्टरता, कबीर के सामने सभी बेबस हो पानी मांगते नजर आते हैं।  समाज के शक्तिशाली वर्ग के झूठ और पाखंड को कबीर उसी तरह बेनकाब करते हैं जैसा उनके समकालीन गैलीलियो और कोपरनिकस कर रहे होते हैं।

बुद्ध और यीशु की तरह इस कहानी में भी बदलाव अंत का है। गैलीलियो को उनके विचारों के लिए माफी मांगने के लिए विवश किया जाता है, अंधे होकर गैलीलियो कारावास में अपनी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। कोपरनिकस भी अपने विचारों के लिए चर्च का कोपभाजन बनते हैं और क्षमा याचना के लिए विवश कर दिए जाते हैं। वहीं उनके समकालीन कबीर जीवन की आखिरी सांस कर ताल ठोक कर अपने विचारों का प्रचार करते हैं और एक सम्मानित जीवन जीकर दुनिया को अपने विचारों की अमूल्य सौगात देकर जाते हैं। 

कल्पना कीजिए कि बुद्ध भारत में नहीं यूरोप में होते, संभवतः किसी सलीब पर लटका दिए गए होते।कबीर यूरोप की किसी जेल में बैठे अपने कहे की बदले प्राणों की भीख मांगते रहते। विश्व को अगर बुद्ध मिले और कबीर मिले, तो इसमें इसमें भारत की सामसिक प्रकृति का योगदान है। हमने हमेशा विपरीत विचारों का सम्मान किया है और हिंसा को कभी भी सम्मान नहीं दिया। भारत में बौद्ध 0.7 प्रतिशत है और बिलकुल सुरक्षित हैं। भारत के संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़ने और भारतीयों को सहिष्णुता का ज्ञान बांचने वाले ना केवल अपना इतिहास नकारते हैं बल्कि भारतीय  जीवन के हर पहलू में सतत प्रवाहित सामासिक धारा के शीतल प्रवाह से अपने आप को वंचित करते हैं।

सभी को, समस्त मानवजाति को बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनाएं।

Sunday, May 3, 2020

निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल

कोरोना संकट भले ही हमारे जीवन में यहां तक कि हमारे माता पिता के जीवन में अब तक आए सभी संकटों में सबसे अलग हो, भयावह हो, पृथ्वी के जीवन काल में ऐसे संकट अनेक बार आए और आकर गए। जिसे हम संकट कह रहे हैं , प्रकृति के लिए एक सामान्य सी चलने वाली सतत प्रक्रिया है जिसे परिवर्तन कहते हैं। परिवर्तन की तीव्र प्रक्रिया जिससे तालमेल बिठाना मानव के लिए कठिन होता है, मानवकोरोना संकट भले ही हमारे जीवन में यहां तक कि हमारे माता पिता के जीवन में अब तक आए सभी संकटों में सबसे अलग हो, भयावह हो, पृथ्वीराज काल में ऐसे संकट अनेक बार आए और आकर गए। जिसे हम संकट कह रहे हैं , प्रकृति के लिए एक सामान्य सी चलने वाली सतत प्रक्रिया है जिसे परिवर्तन कहते हैं। परिवर्तन की तीव्र प्रक्रिया जिससे तालमेल बिठाना मानव के लिए कठिन होता है, मानव उसे संकट कह देता है। अतः यह मानने में कोई हर्ज नहीं कि कोरोना संकट एक तीव्र परिवर्तन का एक दौर मात्र है। 

डार्विन के विकासवाद सिद्धांत के अनुसार वही प्रजाति जीवन का अस्तित्व बचा पाती है, जो प्रकृति में आए बदलावों के अनुसार अपने आप को सबसे अधिक अनुकूलित कर पाती है। परिवर्तन पूर्व स्थिति में आप सर्वश्रेष्ठ हो सकते हैं, लेकिन सर्वश्रेष्ठ होना जीवन में विकास और जीवन रक्षा की शर्त नहीं है। शर्त है अनुकूलित होना। Darvin law states Survival of the fittest, not the best, not the mightiest or the most developed. 

कोरोना संकट का प्रभाव जीवन के हरेक पहलू चाहे वह आर्थिक हो, राजनीतिक हो, सामाजिक हो, वैज्ञानिक हो, सांस्कृतिक हो या मानसिक हो, पड़ना अवश्यंभावी है। यह बदलाव के सिद्धांत मानव के साथ साथ राष्ट्रों के पारस्परिक संबंधों पर भी पड़ेंगे। विश्व पटल पर अपने प्रभुत्व को स्थापित करने की दौड़ में एक वर्तमान समय एक विश्राम काल है। दौड़ का दूसरा चरण शुरू होने ही वाला है, नए नियमों के साथ। यह बिल्कुल नई दौड़ होगी, जहां सभी राष्ट्र कमोबेश शून्य से प्रारंभ करेंगे।

भारत के लिए भी यह सुनहरा अवसर है। यद्यपि बदलाव की आवश्यकता मानव जीवन के हर क्षेत्र में होगी , और एक आलेख में सभी को समेटना संभव नहीं है, आज हम सिर्फ शिक्षा पर चर्चा करते हैं। शिक्षा भी अत्यंत व्यापक विषय है, अतः सिर्फ शिक्षा के माध्यम पर केन्द्रित रहेंगे।

आपने अनुभव किया होगा कि भारतीय गहन अनुसंधान के क्षेत्र में काफी पीछे है। हमारे पास जावा और सी++ में कोडिंग करने वाले युवा बहुतेरे हैं लेकिन भारत में एलोन मस्क जैसा आविष्कारक नहीं है। जेनेरिक दवाएं बनाने में हम उस्ताद हैं लेकिन कोई भी भारतीय कंपनी फाइजर बनने की दौड़ में नहीं दिखती। डॉक्टरेट की उपाधि पाने वाले और उनको प्रदान करने वाले विश्वविद्यालय बहुतेरे हैं लेकिन नोबेल हमें नहीं मिलता। क्या कारण है कि हमारे विकास को सीमित विस्तार ही मिलता है, हम अनुकरण करने में आगे हैं लेकिन अन्वेषक और पथप्रदर्शक की भूमिका भारतीयों के हिस्से कम ही आती है।

ऐसा प्रतीत होता है कि हम चीज़ों को समझते तो हैं लेकिन गहराई से नहीं समझते। इसका क्या कारण है? एक उदाहरण याद आ रहा है। इंजीनियरिंग के दौरान हमारे एक मित्र को हर बात पर शिट ओह शिट कहने की आदत हो गई थी। नए नए कॉलेज में आए थे, शिट शिट कहने को स्टाइल समझते थे। हमारे एक वरिष्ठ प्रोफेसर के सामने भी बोल पड़े। प्रोफेसर साहब ने हस कर कहा, अगर तुम इसका मतलब समझते तो शायद इसका प्रयोग नहीं करते।  उन्होंने कहा कि बेटे जो बात तुम अभी बोल रहे थे उसको हिंदी में बोल कर सुनाओ। पता चला कि भाई साब शिट का मतलब ही नहीं समझते थे। कोई कूल शब्द समझ कर दुहराते रहते थे।

यह विडम्बना हमारे पूरे भारत की है। हमारे बच्चों कि आधी ऊर्जा अनुवाद में गुजर जाती है। पहले अपनी मातृभाषा
 में सोचो, फिर उसका अनुवाद करो, रैन एंड मार्टिन के रटे सूत्रों की कसौटी पर कस कर देखो, अगर सही लगे तो बोलो। बोलने वाले ने इतना संघर्ष करने के बाद जो बोला, उसके श्रोता इसी दुष्चक्र को उल्टी दिशा में दुहराता है। जो सुना उसको सूत्रों के आधार पर अनुवाद करो, फिर उसको समझो। जो समझ में आया उसको वापस से दूसरी भाषा में लिखो। 
कितना आसान हो कि यह अनुवाद का चक्कर ही समाप्त हो जाय। लोग अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करें। हां अनुवादकों की एक विशेषज्ञ टीम हो , जो अनुवादक का ही पूर्णकालिक कार्य करे। पूरी पीढ़ी को आधा अनुवादक आधा वैज्ञानिक बनाने की जगह पूर्ण रूप से वैज्ञानिक साहित्यकार जो भी बनाने की इच्छा हो बनने दिया जाय। फिर देखिए, हमारे यहां अगर वराहमिहिर हो सकते हैं तो अगला एलोन मस्क भी हो सकता है। चेन्नई की गलियों में दूसरा रामानुजन भी आ सकता है अगर उसको तमिल से अंग्रेज़ी अनुवादक बनने के भार से मुक्त कर दिया जाय। केरल से दूसरा शंकराचार्य आएगा, अगर उसके संस्कृत पढ़ने को हीन ना समझा जाय। वाराणसी में कोई तुलसी सा बन सकता है अगर उसकी अवधी की कविता का सम्मान हो। राजस्थान से एक मीरा और चंदबरदाई के स्वर फिर से गूजेंगे , बस वहां के बच्चों पर अंग्रेज़ी ना लादी जाए। एक बार उन्होंने अपनी उत्कृष्टता हासिल कर लें, फिर भाषा की कोई सीमा उन्हें नहीं रोक पाएगी। वैश्विक जनता तक पहुंच वाली समस्या का निराकरण अनुवादकों की टीम करेगी । शायद उसकी आवश्यकता भी ना पड़े, उतना काम तो आजकल गूगल ट्रांसलेट भी कर लेता है।

इस वर्तमान संकट ने हमें कठिन फैसले लेने के लिए एक सुनहरा अवसर दिया है। वैश्वीकरण की असफल अवधारणा के लिए बनी नीतियों को आगे भी चलाए रखना असफलता के मार्ग पर ले जाता है। आत्मलंबन और आत्मविश्वास से भरी शुरुआत करने के लिए मातृभाषा से अच्छी शुरुआत और कहां से हो सकती है। अगर ऐसा नहीं किया तो वही होगा कि ज़िन्दगी भर शिट शिट बोलते पता भी नहीं चलेगा कि कब शिट बन गए। 



 

Monday, April 27, 2020

चीन की एक बच्चे की नीति

एक युवा फोटोग्राफर अपनी तस्वीरों के लिए थीम की तलाश कर रहा होता है। वह फैसला करता है कि वह कचरे के ढेर और शहर की गन्दगी की तस्वीरें लेगा। एक पुराने पुल के नीचे ली गई तस्वीरों को ध्यान से देखने पर उसे कुछ दिखता है। काले प्लास्टिक में लिपटा हुआ एक मृत भ्रूण पड़ा हुआ है। प्लास्टिक पर लिखा हुआ है " मेडिकल वेस्ट"। यह कहानी सुनाते सुनाते वह चुप हो जाता है और एक अजीब सी शांति चुप्पी सी छा जाती है। फिर वह कहता है, आप इस बच्चे को ध्यान से देखो, यह मुस्कुरा रहा है। मरने के बाद भी और कचरे पर फेंक दिए जाने के बावजूद भी क्यों मुस्कुरा रहा है? क्योंकि वह जानता है कि मरने के बाद कम से कम उस इस दुनिया में तो नहीं आना पड़ा। कचरे में पड़ा हुआ उसका मुस्कुराता मृत शरीर यह बताता है कि वह हम मानवों की दुनिया से बेहतर जगह पर है।

वर्ष 2019 में बनी डॉक्यूमेंटरी वन चाइल्ड नेशन जो चीन की एक बच्चे की नीति , उसके अमानवीय क्रियान्वयन और उसके अकल्पनीय दुष्प्रभावों पर प्रकाश डालने वाला एक मार्मिक लेकिन तथ्यपरक दस्तावेज है। डॉक्यूमेंटरी देखने पर आपको पता चलेगा की प्रकृति के खिलाफ किये गए अपराधों की चीन में एक लम्बी परंपरा रही है। 4 पेस्ट पॉलिसी हो या ग्रेट स्टेप फॉरवर्ड या वन चाइल्ड पॉलिसी , चीन की कम्यूनिस्ट सरकार ने जितने अमानवीय कदम उठाए हैं, उसके कीमत शायद पूरी मानवता मिल कर भी ना चुका सके। यह डॉक्यूमेंट्री आपको इसका स्पष्ट इशारा करती है कि चीन कुछ भी करने में सक्षम है। भौतिक समृद्धि और राजनीतिक प्रभुत्व के लिए कोई कदम अनैतिक नहीं और नीति अमानवीय नहीं। प्रकृति के प्रति अपराधों की पराकाष्ठा तब पता चलती है जब एक बूढ़ी नर्स जिसमें50,000 से अधिक बलात गर्भपात कराए होते हैं, अपने पापों के बोझ के तले दबी हुई, अपना अंतिम समय निस्संतान दंपत्तियों के इलाज में बिताती है। बूढ़ी नर्स बताती है कि नियम ना मानने वाले लोगों के घर ढहा देने का आदेश दे दिया जाता था। उसने खुद 8-9 महीने के गर्भ का जबरन गर्भपात कराया हुआ है।
उससे भी दुखद पहलू तब उभर कर आता है जब ऐसे ह्रदय विदारक प्रसंग आप सुनते हो जहां कानून के डर से लोगों ने अपने बच्चों को बाज़ार में छोड़ दिया और दो दिन तक भी कोई उस बच्चे को उठा कर नहीं के गया और मच्छरों के काटने से बच्चे की मृत्यु हो गई। 

ऊपर के प्रसंग उन अनगिनत कहानियों में कुछ हैं जो इस डॉक्यूमेंटरी में दिखाए गए हैं। चीन का पूर्ण बहिष्कार ना सही, उससे सावधान रहने की आवश्यकता तो है ही। 
 अगर चीन वाली विकास गति के साथ अगर यह सब मिले तो अपनी भारत वाली सुस्त ही सही लेकिन मानवीय पहलू को अक्षुण्ण रखने वाली नीतियां ही सही हैं। 

अगर आप कठोर हृदय वाले हो तो ही यह डॉक्यूमेंटरी देखें। वैसे भी कहानी के हमेशा दो पक्ष होते हैं, चीन का पक्ष जाने बिना किसी अंतिम नतीजे पर पहुंचना   भी  शायद जल्दबाजी ही होगी। 

https://www.primevideo.com/detail/0GZ2LE5BY2CRP61ER2IEOTWHEG/ref=atv_sr_def_c_unkc__1_1_1?sr=1-1&pageTypeIdSource=ASIN&pageTypeId=B07ZQRT79S&qid=1588010165

Sunday, April 26, 2020

नूतन वैश्विक व्यवस्था की आहट

जिस दुनिया की व्यवस्था को हम जानते हैं, जिसके अभ्यस्त हो चुके हैं, वह व्यवस्था कमोबेश पिछले 75 सालों से कायम है। करीब 75 साल पहले द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के पश्चात संयुक्त राष्ट्र का गठन हुआ और दुनिया भर के देशों के लिए नीति निर्धारण के लिए एक सर्वमान्य संस्था के रूप में इसकी स्थापना हुई। इसके अन्तर्गत विभिन्न संस्थाओं जैसे सुरक्षा परिषद , यूनेस्को , यूनिसेफ , विश्व स्वास्थ्य संगठन के जरिए संयुक्त राष्ट्र के नयी वैश्विक व्यवस्था को व्यावहारिक रूप देना प्रारंभ किया। लक्ष्य था वैश्विक शांति को बढ़ावा देना और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के  समाधान के लिए एक सर्वमान्य मंच प्रदान करना। चूंकि संयुक्त राष्ट्र का निर्माण ही विश्व युद्ध के परिपेक्ष्य में हुआ था, तो यह स्वाभाविक था कि इस संस्था के निर्माण और नीतियों में विजेता देशों का दखल होगा। जैसा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के गठन को ही लीजिए। पांच देशों के पास वीटो का अधिकार है, जिसका साधारण अर्थ है कि यह पांच देश अगर चाहें को अकेले किसी फैसले को रोकने की असाधारण क्षमता रखते हैं। 

असाधारण शक्तियों का असाधारण कर्तव्यों और असाधारण नैतिकता के साथ मेल होना आवश्यक है। अगर यह मेल टूटा तो विनाश और अराजकता इनके  सामान्य  फलन के रूप में सामने आते हैं। ध्यातव्य है कि वीटो शक्तियों से लैस पंच शक्तियों का व्यवहार नैतिकता के मानदंडों पर खरा नहीं उतरता दिखता। पहले के वर्षों में यह व्यवस्था फिर भी चल गई क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं पांच शक्तियों से आता था। काफी हद तक यह संस्था बड़ी शक्तियों की प्रवक्ता बन कर उनका हित साधन करने में लगी रही। लेकिन 75 साल का अंतराल एक बड़ा अंतराल होता है। विश्व 1945 वाला विश्व नहीं रहा, 2020 वाला विश्व 1945 में स्थापित व्यवस्था को मानने को तैयार नहीं है और कुछ जायज़ और गंभीर प्रश्न उठा रहा है। 

कोवीड 19 से जूझते विश्व के हर राष्ट्र के सामने यह प्रश्न है कि स्थितियां कब सामान्य होंगी।  दूसरा प्रश्न और ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उस क्या विश्व उन सामान्य स्थितियों की ओर लौटना चाहता है जिस के कारण आज ये असामान्य परिस्थितियां उत्पन्न हुई हैं। कोरॉन्ना संकट, जिसमें चीन की संदिग्ध भूमिका, नीतिगत अपारदर्शिता और आपराधिक प्रतीत होती लापरवाही की सजा विश्व भुगत रहा है, ने उन "सामान्य" को पुनर्भाषित करने की आवश्यकता पर बल दिया है। 

भले ही कोरॉना संकट के कारण वैश्विक व्यवस्था को बदलने के सवाल अब मुखर होकर सामने आ गए हैं, इनकी झलक पहले से ही दिखने लगी थी। जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, व्यापार युद्ध, गरीबी उन्मूलन , विश्व स्वास्थ्य और आय की असमानता जैसे ज्वलंत प्रश्नों के समाधान पर हमारी वर्तमान व्यवस्था विफल ही रही है। एक तरफ पेरिस समझौते से जहां अमेरिका खुद को अलग कर चुका है तो बाकी विकसित देश भी जलवायु परिवर्तन को लेकर अपने निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने में रुचि नहीं दिखा रहे। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई भी निज स्वार्थों के टकराव के कारण अधर में झूल रही है। सीरिया, अफ़ग़ानिस्तान, ईरान जैसे देशों में चल रही लड़ाई आतंक के खिलाफ है या तेल भंडारों पर स्वामित्व की जंग, कहना कठिन है। वर्ष 2018 से चल रहे चीन अमरीका व्यापार युद्ध को सुलझाने में विश्व व्यापार संगठन पूर्णतया असफल रहा है। व्यापार युद्ध की इस समस्या ने आर्थिक वैश्वीकरण की अवधारणा को लेकर विकासशील देशों में संशय का वातावरण बना दिया है। अमरीका की अमेरिका फर्स्ट की नीति यह दिखाती है वैश्वीकरण की नीति का प्रसार तब तक ही किया गया जब तक विकसित देशों के अपने हित साधना को संभव किया जा सका। विश्व में गरीबी उन्मूलन को दूर करने के शिथिल प्रयासों और सुरसा के मुख की तरह बढ़ती आर्थिक असमानता यह बताती है कि 7 दशक पुरानी वैश्विक व्यवस्था इक्कीसवीं सदी की समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती।

कोरोंना संकट से निकलने के बाद वैश्विक व्यवस्था बदलेगी , हां कितनी बदलेगी , या किस गति से बदलेगी यह देखने योग्य होगा। अगर सामान्य स्थितियों का अर्थ विश्व समाज का  अपने रोजमर्रा की वस्तुओं के लिए चीन पर निर्भरता था, तो वह सामान्य अब स्वीकार्य नहीं लगता। 
अगर विश्व के सुरक्षा मसलों पर चर्चा के लिए वर्तमान सुरक्षा परिषद सामान्य व्यवस्था है, तो उसके बदलने का समय आ चुका है। विश्व में टूटी पड़ी आपूर्ति श्रृंखलाएं और अन्यायपूर्ण समझौतों को रोकने में विफल विश्व व्यापार संगठन आने वाले विश्व में अपनी जगह शायद ही बना पाएं। कोरोना संकट को रोकने में विफल या उसको फैलाने में संलिप्त विश्व स्वास्थ्य संगठन अपनी आखिरी सांस गिन रहा है। आने वाले विश्व में भारत, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया की भूमिका अब तक के सामान्य विश्व से कहीं अलग और कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होने वाली है। 

विंस्टन चर्चिल ने एक बार कहा था, किसी भी संकट को व्यर्थ ना जाने दो। भारत को भी चाहिए कि इस संकट को व्यर्थ ना जाने दे। नई वैश्विक व्यवस्था के निर्माण का दर्शक ना बन, एक पथप्रदर्शक शक्ति के रूप में अपने आप को स्थापित करे। ऐसा करने के लिए हमारे पास नैसर्गिक संसाधन, मानव संसाधन और अन्य अनुकूल परिस्थितियां मौजूद हैं। बस आवश्यकता है विश्व गुरु के अपने खोए स्थान को प्राप्त करने की दृढ़ इच्छशक्ति को दिखाने की। 
धार्मिक धारावाहिकों में देखता हूं कि ऋषि श्राप देते थे कि जा पत्थर की बन जा, अगला जन्म फलां योनि में ले, और वह सच ही जाता था। कौन जाने भविष्य में भारत भी ऐसी ही शक्तियां पुनः प्राप्त कर ले कि बस एक बार बोलने के साथ सभी समस्या का समाधान हो जाय। जिस गो कोरोना , कोरो ना गो पर अभी हम हंसते है, वह किसी व्याधि को दूर करने का मंत्र बन जाय। शायद इस दिशा में पहला कदम विश्व की "सामान्य" व्यवस्था को बदलने में निर्णायक भूमिका निभाने में छुपा है।

Tuesday, April 21, 2020

पिता होने का अर्थ

उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ के पिता श्री आनन्द सिंह बिष्ट का हाल में निधन हो गया। 89 वर्ष की आयु और अपने खराब स्वास्थ्य से जूझ रहे श्री बिष्ट ने एक भरपूर जीवन जिया। अतः उनका देहावसान दुखद तो है किन्तु इसे सामान्य जीवन का अंत मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। एक घटना जो इस सामान्य सी दिख रही मृत्यु को थोड़ा अलग बनाती है, वह है योगी आदित्य नाथ का अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल ना होने का निर्णय। मुख्यमंत्री कार्यालय से जारी वक्तव्य में योगी जी ने उन्हें अपने पूर्व आश्रम में जन्मदाता बताया। फिर कहीं पढ़ा कि योगी जी ने राजधर्म निभाने के लिए पुत्र धर्म का बलिदान किया। पिता को खोने का दुख सबसे बड़ा नहीं तो उससे कमतर भी नहीं।  तो क्या योगी जी द्वारा अपने पिता के प्रति कर्तव्य  की अवहेलना की गई? या राजधर्म या संन्यास धर्म पितृ ऋण से बढ़कर है? पिता पुत्र संबंध की संकल्पना क्या है ? क्यों ना इस घटना के परिपेक्ष्य में इन वृहद प्रश्नों की सीमित ही सही लेकिन थोड़ी पड़ताल की जाए।

सामान्यतया पिता शब्द जनक के समानार्थी प्रयुक्त होता है। जिसके अंश से आप अपनी माता के गर्भ में आए, वह आपका जनक होता है। अंग्रेज़ी में कहें तो biological father। हिंदी में इसके लिए जनक शब्द का प्रयोग होता है। पिता शब्द का अर्थ जनक से थोड़ा व्यापक है। जनक जब अपनी संतान की रक्षा, भरण पोषण और लालन पालन की जिम्मेदारी निभाता है तो पिता कहलाता है। मोटे अर्थों में जनक और अभिभावक का युग्म रूप पिता है।

शास्त्रों में भी पितृऋण की चर्चा की गई है जो तीन तरह के ऋणों में सबसे भारी माना गया है जिसको चुकाना आवश्यक होता है। यहां तक कि किसी व्यक्ति की प्रगति और समृद्धि का श्रेय भी पिता के कर्मों को दिया गया है। गांव जवार में कहावत भी है कि बाढे पूत पिता के धरमे।  अर्थात आपके जीवन में अगर सुख है तो इसका श्रेय भी पिता के कर्मों को दिया गया है। अपने शास्त्रों में ऐसे प्रसंग आते हैं जहां पिता के आदेश पर पुत्र ने अपने प्राण न्योछावर लिए है। जैसे नचिकेता  अपने पिता का आदेश मानने के लिए मृत्यु का वरण कर यम के द्वार तक जा पहुंचे। मयूर ध्वज ने तो अपने पिता के आदेश पर अपनी माता तक का वध कर दिया। अगर पिता का स्थान इतना उच्च रखा गया है तो सिर्फ जनक होना पिता होने की आवश्यक शर्तों को पूरा करता नहीं लगता।

कर्ण को ही लें। सूर्य के अंश से उत्पन्न हुए, सूतपुत्र कहलाए और कुंती के पुत्र होने के कारण कृष्ण उन्हें पांडव का भाई बताते हैं। तो उनके पिता कौन हुए? सूर्य, सारथि अधिरथ या पांडु? योगी अगर अपने जैविक पिता को पूर्व आश्रम के जन्मदाता कहते हैं तो कहीं ना कहीं उन्हें पिता का स्थान से वंचित करते प्रतीत होते हैं। कारण कुछ भी रहा हो, योगी जी द्वारा अपने पिता की अंत्येष्टि में शामिल ना होना यह दिखाता है कि उनके और उनके दिवंगत जनक के बीच के संबंधों की परिभाषा सामान्य पिता पुत्र की परिभाषा से मेल नहीं खाती। जहां तक स्वर्गीय आनंद सिंह बिष्ट का प्रश्न है तो उन्होंने योगी जी को जन्म भी दिया और उनका लालन पालन भी किया, फिर भी कुछ ऐसा है जिसने योगी को उनके पुत्र धर्म का पालन करने से रोका या पितृऋण चुकाने की आवश्यकता से अपने आप वंचित तक कर दिया।

उत्तर वैदिक काल की एक कथा से इस जटिल प्रश्न पर प्रकाश पड़ता है। अपने पिता के लिए पिंडदान करते एक समय एक  राजकुमार के सामने नदी से तीन हाथ प्रकट होते हैं। एक हाथ एक बंदी का होता है, दूसरा एक ब्राह्मण का और तीसरा राजा का जिसका अंतिम संस्कार राजकुमार कर रहा होता है। तीन हाथों में किसको अपना पिता मानकर वह पिंडदान करे, इस प्रश्न  के उत्तर की तलाश में राजकुमार  के जीवनवृत्त पर प्रकाश पड़ता है। पता चलता है कि एक मरणासन्न बंदी जो सूली पर अपनी आखिरी सांसे गिन रहा होता है, एक स्त्री और उसकी पुत्री से मिलता है। बंदी कहता है कि राज्य के अन्यायी राजा ने उसे निर्दोष होने के बावजूद मृत्युदंड दिया है। वह  चाहता है कि वह इस अन्याय का प्रतिशोध ले। इसके लिए वह बंदी स्त्री की पुत्री से एक संतान मांगता है जो उसका प्रतिशोध ले। स्त्री उसकी बात मान लेती है। स्त्री एक गुणी योग्य ब्राह्मण युवक से अपनी पुत्री का गर्भधारण संस्कार करवाती है और एक पुत्र उत्पन्न होता है। स्त्री उस नवजात को एक निस्संतान राजा के दरवाजे पर छोड़ आती है जहां उसका लालन पालन होता है। वही नवजात बालक आज अपने राजा पिता का पिंडदान कर रहा होता है जहां उसके सामने तीन हाथ निकल कर आते हैं।

इस कथा के द्वारा ना केवल हमारे समाज में पिता की जटिल अवधारणा पर प्रकाश पड़ता है बल्कि जन्म आधारित जाति व्यवस्था पर भी प्रकाश पड़ता है। एक मरणासन्न बंदी जिसकी जाति अज्ञात है, एक वैश्य स्त्री से विवाह करता है। वैश्य स्त्री एक ब्राह्मण के संसर्ग से पुत्र प्राप्त करती है जिसका भरण पोषण एक क्षत्रिय करता है। पिंडदान के प्रश्न के उत्तर में यह बताया जाता है कि वह बंदी ही राजकुमार का पिता कहलाने का अधिकारी है क्यूंकि उसने ही उसके जीवन को लक्ष्य दिया है। और वह लक्ष्य है अन्यायी राजा का अंत।

अतः पिता होने की परिभाषा ना ही पूर्णतया दैहिक है और ना ही पूर्णतया सामाजिक। अतः जैविक पिता होना पर्याप्त नहीं , पालन पोषण करना भी पर्याप्त नहीं, आवश्यक है अपने पुत्र के जीवन को एक लक्ष्य देना।

मैं योगी जी की मनःस्थिति का ज्ञाता नहीं हूं और ना ही यह जानता हूं कि किन समस्त कारणों से उन्होंने अपने जन्मदाता की अंत्येष्टि में शामिल ना होने का निर्णय लिया, किन्तु उनका यह निर्णय हमारी समृद्ध परंपरा के अनुकूल ही प्रतीत होता है।

गोरखनाथ के मठ में आकर ही उनको जीवन लक्ष्य का संज्ञान हुआ। इस हिसाब से उनके गुरु ही उनके पिता होते हैं। इस प्रसंग को पंडित नेहरू ने अपनी पुस्तक भारत एक खोज में भी लिखा है। आप इस कथा को नीचे दिए गए यूट्यूब लिंक पर भी देख सकते हैं। आप चाहें तो पूरा एपिसोड भी देख सकते हैं लेकिन ऊपर उद्धृत कथा 20 मिनट 39 सेकंड से शुरू होती है।
https://youtu.be/lKv7d0vi_sA?t=1239 

भगवान स्वर्गीय बिष्ट जी को अपने चरणों में स्थान दें। ॐ शांति।। 

Thursday, April 16, 2020

फाइल लेकर खडा सफारी सूट वाला बाबू

हमेशा पढ़ा था कि नौकरशाही देश की इमारत का स्टील ढांचा है। इस बात को शायद ही आम जनता महत्व देती हो, लेकिन कोरोना संकट ने इस बात को बहुत अच्छे से महसूस करवाया है। सामान्य दिनों में जनता जिनकी चकाचौंध से प्रभावित होती है, गुण गाती रहती है अभी सभी गौण हो गए हैं। क्रिकेटर हो या बॉलीवुड के सितारे, सब बालकनी से फोटो लेकर और सेल्फी पोस्ट करके खुश हैं। बड़ी बड़ी कंपनियों में काम करने वाले घर पर बैठ कर यह सोच रहे हैं कि मेरा प्रोमोशन का क्या होगा, मेरी हाइक तो गई।अरबपति अपना नुकसान जोड़ रहे हैं तो बाकी बैठ कर यह ज्ञान बांच रहे हैं सरकार ने यह क्यूं नहीं किया वह क्यूं नहीं किया। कुछ तो बस अब तक कितने मरे कितने बीमार पड़े पूछ रहे हैं मानो किसी क्रिकेट मैच का स्कोर पूछ रहे हों। कुछ फेसबुक पर परेशान हैं तो बाकी वॉट्सएप पर फॉरवर्ड मेसेज को रिफॉर्वर्ड कर रहे हैं।


फिर लड़ाई कौन लड़ रहा है? वही नौकरशाही। वही नौकरशाही है जो सबको राशन पहुंचा रही है, यही नौकरशाही है जो भीलवाड़ा मॉडल बना कर पूरे भारत को बचाने की कवायद में लगा है। नेता जी वीडियो कॉन्फ्रेंस करके आदेश फरमा सकते हैं, उसकी तामील नौकरशाही ही करेगी। नेताजी क्या बोलेंगे, क्या करेंगे यह भी उसके पीछे फाइल लेकर खडा सफारी सूट वाला बाबू ही उन्हें बताएगा। वही नौकरशाह। मुनाफा कमाने वाली सारी दुकानें पहली फुरसत में निकल लें, लेकिन नौकर शाह उस जंग को लड़ रहे हैं जहां दुश्मन भी नहीं दिख रहा। वह नौकरशाही भले ही आपको डंडे बरसाती पुलिस के रूप में दिखे, गौर करिए कोई विरोध नहीं कर रहा। नौकरशाही आपको पीट रही है ताकि आप मर ना जाएं।
यह स्टील का ढांचा ही है जिसपर हमारी कोरोना पर जीत की नींव रखी जाएगी। चाहे 130 करोड़ वाले देश में चुनाव करवाना हो या सीमा सुरक्षा हो। देश को जोड़ती रेल चलाने का प्रश्न हो या कानून व्यवस्था बनाए रखने का दुरूह कार्य। आपको नौकरशाही ही काम आएगी। सर्वजन हित का कार्य सार्वजनिक क्षेत्र ही कर सकता है। सीएसआर के नाम पर खानापूर्ति करने वाला निजी क्षेत्र नहीं।
इस युद्ध में लड़ने वाली सरकारी बाबुओं की सेना आपका बस मानसिक सहयोग चाहती है। उनका महत्व समझने के लिए आपका पूर्वाग्रह दूर होना जरूरी है। एक बार घर पर बैठ विचार करिए तो क्या जाने आपके मुख से भी अनायास निकल जाय कि पता नहीं मेले बाबू ने खाना भी खाया होगा कि नहीं।

Thursday, February 27, 2020

गलती दोनों की है

गलती दोनों की है। नुकसान दोनों का हुआ है। मानता हूं कि तुम्हारा सर फूटा , लेकिन तुम्हारे खून के छीटों से उसकी नई कमीज़ जो खराब हुई उसका क्या। तुम्हारा घाव तो आज कल में ठीक हो जाएगा, शर्ट के दाग़ कभी नहीं जाएंगे। सब झूठ दिखाते हैं सर्फ एक्सेल के विज्ञापन में। दाग़ नहीं जाते। उसके नुकसान का भी सोचो। उसने तुम्हें मारा तो तुमने भी तो पुलिस में जाने की धमकी दी। धमकी देना बुरी बात है ना। यही सिखाया गया है तुम्हें कि तुम दूसरों को धमकी देते फिरो। यह तो सहिष्णुता नहीं हुई। सहिष्णु बनो। अपनी गंगा जमनी तहज़ीब का मान रखो। और हां जिस जिस ने कानून तोड़ा है उन सबको सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। 

अरे  तुम्हारे सर से अभी भी खून बह रहा है। चलो भागो यहां से।  मेरे सोफे का कवर भी खराब कर दिया। निकलो, बाद में आना। अभी मुझे अमन-की-आशा के मुशायरे में जाना है। डार्लिंग अगली बार यह लोग आएं तो कह देना कि मैं घर पर नहीं हूं।

Thursday, February 13, 2020

तुम मानोगे नहीं, खा के ही रहोगे

प्यार वाली फिल्में देखो, प्रेम रस वाली कविता पढ़ो तो वही रोमानी दुनिया दिखती है। प्यार में कुछ ऐसा हो जाता है कि रात आंखों में ही कट जाती है। एक एक पल काटना मुश्किल हो जाता है। आप पूरी दुनिया से कट जाना चाहते हैं, किसी निर्जन टापू पर आप हों और आपका प्यार हो। आप गुनगुनाते रहें। हंसते हंसते कट जाएं रास्ते, जिंदगी यूं ही कटती रहे।

प्यार में कटने और काटने का खेल लगा ही रहता है।  प्यार शब्द को ही देख लीजिए। यार से मिलने के चक्कर में प बेचारा पहले कटता है। अगर ना कटे तो पयार हो जाएगा, प्यार थोड़े ना होगा।

समस्या यह है कि जिनको प्यार हुआ सिर्फ उनका कटे तो समझ में भी आये। किसके चक्कर में किसका कट जाए, कहना मुश्किल है। प्यार हुआ शाहजहां को , हाथ कट गए कारीगरों के। गुस्ताखियां भले ही आंखें करें, कट जाती है बेचारी हाथ वाली नस। इंसान तो इंसान, कुदरत की भी खैर नहीं। हमारे मांझी बाबा के प्यार के चक्कर में बेचारा पहाड़ भी नहीं बचा। कट कर रह गया और लोग ताली पीट रहें हैं कि प्यार हो तो ऐसा। भाई, पहाड़ की क्या गलती थी। पर आपको समझ नहीं आएगा।

कंपनियों ने इस प्यार के चक्कर में पचास तो डे बना रखे हैं।  रोज डे, केक डे, चॉकलेट डे। सारे डे मना के आप की हालत हो जाती है हम दिल दे चुके सनम और तड़प तड़प के इस दिल से आह निकलती रही। और उधर सारे गिफ्ट लेने के बाद अभी भी वही हाल है कि सोचेंगे तुम्हें प्यार करें कि नहीं ।डे डे के चक्कर में पैसे दे दे कर जब आपका बैंक बेलेंस कट कर आधा हो जाए तो साला याद आता है कि हग डे तो अभी बाकी ही है। आप घबरा कर अपनी पतलून चेक करते हैं तो पता चलता है कि हो गया हग डे सेलिब्रेट। पतलून से निकला आपका दुबला पर्स जिसकी मोटाई पहले से भी आधी रह गई है, रोता रहता है कि नहीं अब मुझसे कुछ ना निकालो। रोता भी ऐसे है जैसे किसी की दूसरी किडनी निकाली जा रही हो वह भी बिना बेहोश किये। उसको क्या पता कि प्यार के चक्कर सबका कटता है। प्यार मिलने के लिए जरूरी है अच्छी पर्सनालिटी। और ऐसा है कि पर्सनालिटी शुरू ही होता है पर्स से। नो पर्स नो पर्सनालिटी। 

सारे डे मना कर आप सोचते हो कि शायद कोई नाइट भी आयेगी। शास्त्रों में लिखा है कि डे बाद नाइट आती है। लेकिन यह ऐसा कलयुग है कि 100 में 99 डे ही मनाते रह जाते हैं, उनकी किस्मत में नाइट कभी नहीं आती। 

सारे डे वाले खेल में सालों काटने के बाद फिर लौट कर आप अपने मां बाप के पास जाते हैं। मम्मा पप्पा ।। आपने जीवन दिया है अब जीवनसाथी भी दो।  अब जीवन में कोई आशा नहीं। किस्मत बुरी हुई तो पता चलता है कि आप जहां डे प्लेअर रहे , आपका जीवन साथी धुरंधर डे नाइट प्लेअर रह चुका है।आईपीएल और बिग बैश क्या बांग्लादेश प्रीमियर लीग तक के हर टीम के साथ डे नाइट खेल चुका है। गोवा , अंडमान और फुकेट तो उनका पहले से कंप्लीट है, आपसे आशा है कि यूरोप से नीचे कुछ नहीं। दोनों किडनी तो आपकी पहले ही निकल चुकी और अब जो आपके नाम पर बिल फट रहें हैं उसको देख कर आपका बचा खुचा दिल भी निकल जाता है। ज़ालिम दुनिया फिर भी कहेगी उसने तो प्यार के चक्कर में दिलोजान निछावर कर दिया। अब आप को समझ आता है कि प्यार को दिलोजान देना क्यूं कहते हैं।

और क्या लिखूं? लिखने को सारे जहां की बातें हैं लेकिन उसको लिखने और पढ़ने लगे तो आपका डे बर्बाद हो जाएगा। जाइए डे मनाइए, बस नाइट की आशा मत रखिए। भगवान कृष्ण ने भी गीता में यही कहा था कि डे मनाओ और नाइट की इच्छा मत रखो। यही गीता का सार है। 

और अगर आपको यह वाली फीलिंग आ रही है कि क्या बकवास चल रहा है। मेरी कहानी अलग है, मेरा नहीं कटेगा। सॉरी टू ब्रेक योर बबल बट आपका आलरेडी कट चुका है। द ग्रेटेस्ट  ट्रिक डेविल एवर पुल्ड वाज कन्विंसिंग द वर्ल्ड ही डिड नोट एग्जिस्ट।  लेकिन मुझे पता है आप मानोगे नहीं । जी तो चाहता है कि फिल्म छिछोरे का वह डायलॉग कहूं  जब हीरो हॉस्टल 4 में एडमिशन लेने के लिए बेताब  हो रहा है और क्लर्क कहता है कि तुम मानोगे नहीं, खा के ही रहोगे। ठीक है जाओ, हम इधर ही मिलेंगे। यह कोई संयोग नहीं है कि तुम्हारे प्यार की सबसे बड़ी निशानी ताजमहल और सबसे बड़ा पागलखाना एक ही शहर में है।
 लेकिन दिन ही ऐसा है कि ऐसा कह नहीं सकता। इसलिए हैप्पी वैलेंटाइन्स डे।

Friday, February 7, 2020

body shaming and us

We call our god Lambodar which means one with large belly. Our sage were named Ashtavakra means who were deformed in eight organs. Bhagwan Krishna derives his name from his dark skin and his muse was called Kubja. Demon was called Shoorpnakha means the one with large nails. Our superstar is called Lambu ji. Everyone has a friend nicknamed Chasmis, Motu and Chhotu. Lady were named based on their body odour and called matsya-gandha. We called our tormentors Firangi, a name which was again based on their skin colour. Even good names like mrig-nayni, kamal-nayan, karpur-gauran are based on physical appearance. Mahadevi called her cow Gaura, And Chaintnya Mahaprabhu was called Gaurango. 

Examples are numerous. Point is that we have lived with it and it is a part of us. Either you accept it and stay happy as we have been so far. Or call it body shaming like westerners and keep getting offended. Choice is yours.

Thursday, February 6, 2020

कोरॉना वायरस से बचाव

चीन वाले कोरोना वायरस से बचने के लिए मास्क पहनना जरूरी है। चीन से आने वाले हरेक यात्री पर नजर रखी जा रही है। फिर भी आप मास्क पहने बिना बाहर ना निकलें। थोड़ी सी सावधानी और आप अपना बचाव कर सकते हैं। बस समस्या इतनी है कि बचाव वाले मास्क भी चीन से बन कर आते हैं। 

निष्कर्ष यह कि हनुमान चालीसा का सुबह शाम पाठ करें और अपनी पानी पूरी और खोमचे वाले की पापड़ी चाट वाली डायट बनाए रखें।

Sunday, February 2, 2020

वाराणसी यात्रा वृतांत

यह राजा घाट है, घातक सिनेमा में सनी देओल यहीं से नहा के निकलते हैं। आपने देखी है वो फिल्म? नाविक हरेक घाट के बारे में सही गलत ऐतिहासिक कल्पोक कल्पित कथाएं बड़े चाव से सुना रहा है। यह हरिश्चंद्र घाट है। राजा हरिश्चंद्र  इसी घाट पर चांडाल का काम करते समय अपने मृत पुत्र रोहिताश्व के अंतिम संस्कार के लिए भी अपने आदर्शो से नहीं डिगे। पता नहीं यह कहानी नाविक ने कितने लोगों को आज तक सुनाई होगी लेकिन यह मार्मिक कहानी सुनाते समय उसकी आखों के कोनों पर नमी दिखने लगती है। चलिए संध्या आरती का समय हो रहा है, जल्दी से आपको बाकी घाटों की परिक्रमा करवा देता हूं। दशाश्वमेध से शुरू हुई यह नौका यात्रा मणिकर्णिका तक पहुंचती है। जिस नाविक की आखें हरिश्चंद्र की कहानी सुनाते समय गीली हो गई थी, मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताओ को देख उसपर कोई असर नहीं। वाराणसी ही वह शहर हो सकता है जहां मृत्यु पर शोक नहीं बल्कि मोक्ष प्राप्ति का उल्लास होता है। जीवन समाप्त नहीं होता बल्कि इहलीला के बाद के जीवन का प्रारंभ होता है। मणिकर्णिका पर शिव पार्वती ने स्नान किया था अतः यहां के जल से अंतिम स्नान कर बैकुंठ निश्चित है। आस्था और श्रद्धा के आगे नमस्तक हो हम आगे चले।

दशाश्वमेध धाट हमने सुबह भी देखा था, काशी विश्वनाथ के दर्शनों से पहले इसी घाट पर आये। बाबा विश्वनाथ के दर्शनों से पहले पुष्प और प्रसाद खरीदना आवश्यक हो जाता है। आशा यही कि बाबा भोलेनाथ पुष्प और प्रसाद पा खुश हो जाएं और उनका ध्यान हमारे पापों की गठरी पर ना जाए। भोलेनाथ की काशी में हर तरफ बाबा का ही साम्राज्य है। हर चीज पर बाबा का प्रभाव है , धूनी रमाते साधु हों या गांजा के चिलम से काश लगाते विदेशी या ठंडाई छानते काशीवासी। कभी कभी सच ही लगता है कि काशी बाबा के त्रिशूल पर है, जीवन और दुनिया के साधारण नियम यहां लागू नहीं होते। 

घंटे दो घंटे कतार में खड़े रहे और हर हर महादेव का जयकारा लगता रहा। ललाट पर भभूत लगाए जब बाहर निकले तो भूख तेज़ लगी थी। मां अन्नपूर्णा का आशीर्वाद है कि काशी में कोई भूखा नहीं रहता। बनारस की गलियों में हर तरफ बनारसी जायके की सुगंध आपको बताती है कि अन्नपूर्णा का आशीर्वाद विफल ना हो, इसकी कितनी उन्नत व्यवस्था की गई है। आप आराम से जलपान कर सकते है, समय और मात्रा की कोई पाबंदी नहीं। पूरियां बांटने वाला गिन कर पूरियां नहीं बांटता। जितनी सखुवे के दोने में आ गई सब आपकी। गरमागरम पूरी , आलू की मसाले दार सब्जी और चाशनी में डूबी जलेबी छक कर हम आगे बढ़े।

काशी विश्वनाथ की गलियों में हमें एक दुकान मिली लकड़ी की । कारीगरी देख कर सीना चौड़ा हो गया और दुःख भी हुआ कि प्लास्टिक ने हमारे पर्यावरण को जितना नुकसान पहुंचाया है उससे कहीं अधिक लकड़ी और उसकी कारीगरी को पहुंचाया है। कौन खरीदेगा यह महंगी लकड़ी जब प्लास्टिक कहीं ज्यादा सस्ती है। लेकिन बाबा की नगरी में सब कुछ इतना सीधा और सपाट कैसे हो सकता है। चीज़ों के दाम प्लास्टिक से सस्ते और ऐसी कारीगरी की मोम से भी मुश्किल से हो। यादगार की लिए कुछ चीजें खरीदी यह सोच कर कि अगले बार सामान एक अलग थैला इनके सामानों से ही भरूंगा। इसके बाद गंगा आरती का अप्रतिम दृश्य देखा। आरती की उठती पवित्र अग्नि की लौ और उनको चतुर्दिश घुमाते युवा पंडितों के प्रदीप्त चेहरों को देख विश्वास हुआ कि हमारी सनातन संस्कृति को कोई मिटा नहीं सकता। यह ज्योति अखंड रूप से भारतवर्ष की भूमि को प्रकाशित करती रहेगी और मंत्रोच्चार के बीच उठता यह पवित्र धुआं हमारे मनोमस्तिष्क को सुवासित करता रहेगा।

बच्चे थक रहे थे, इसीलिए संध्या आरती के बाद रात को होटल में लौट गए। होटल  भी बिल्कुल घाट किनारे। टैक्सी कुछ दूर ही रुक गई और अपने  रैन बसेरे तक पहुंचने के लिए हम बनारस की उन मशहूर गलियों से गुज़रे जिनसे भौतिक दुनिया की बड़ी कारें नहीं गुजर सकती। मानो भौतिकवाद की नो एंट्री है बनारस की गलियों में। आपके बड़े ईगो का भी गुजरना मुश्किल है बनारस की गलियों से। जहां गर्व से आपने अपना सर ऊंचा किया और ज़मीन से नज़रें हटाई और औंधे मुंह गिरेंगे फिसल कर सांढ़ के गोबर पर। इसलिए आंखें नीचे किए बनारस की तंग गलियों से हम अपने होटल पहुंचे। 

बनारस की सुबह देखने चटपट जा पहुंचा घाट पर। वहीं राजा घाट जहां पर घातक फिल्म की शूटिंग हुई थी। हनुमान मदिर के बाहर गदा घुमाते बनारस के युवा मिले जो अपनी रोजाना वर्जिश कर रहे थे। घातक फिल्म का काशीनाथ कोई काल्पनिक चरित्र नहीं था, इन युवकों को देख यह विश्वास हो गया। गदा के साथ फोटो लेने का लोभ संवरण ना कर पाया। उसके बाद गंगा में डुबकी लगा कर बाहर निकला तो लगा जैसे मनों बोझ उतर गया हो। वरुणा और असी की जलधारा गंगा के पतितपावन वाले भगीरथ कार्य में उनका सहयोग करती हैं। नाम वाराणसी भी वरुणा और असी से मिलकर ही बना है।

काशी के मानस मंदिर और संकट मोचन मंदिर को सुबह देख कर हम चल पड़े सारनाथ की ओर। भगवान बुद्ध की प्रथम शिक्षा वाली पावन धरती का दर्शन करना आवश्यक था। सारनाथ जाकर देखा तो सैकड़ों तिब्बती, थाई और चीनी नागरिक वहां मौजूद थे। मन में विचार आया कि धर्म प्रसार तो बुद्ध ने भी किया और पूरी दुनिया में किया लेकिन बिना तलवार के और बिना किसी  को लोभ दिये। बुद्ध की 90फीट की आजनुबाहु प्रतिमा और बुद्ध की ध्यानमग्न मुद्रा आपको मंत्रमुग्ध कर देगी। जिसकी प्रतिमा इतनी आकर्षक है वह व्यक्ति वास्तव में कैसा रहा होगा, सोचना भी असंभव है।  चौखंडी और धमेक स्तूप के दर्शनों के बाद हमने स्थानीय बुनकरों की दुकान का रुख किया। 
पत्नी जहां साड़ियों के संसार में मग्न हो गई मैं दुकान के पीछे बने उनकी कार्यशाला में गया। बुनकर चाचा ने मेरे बेटे को प्यार से पास में बिठाया और उसे भी अपने कारीगरी के गुण सिखाए। फणीश्वनाथ रेणु के सिरचन याद आ गए। सामने एक मजदूर नहीं एक कलाकार बैठा था। काम में बाधा पहुंचाने वाले बच्चों से कोई इतनी तन्मयता से कोई सहृदय कलाकार ही बात कर सकता है। फोटो लेने की आवश्यक खानापूर्ति समाप्त होने के बाद चुपके से सिरचन चाचा के हाथ में सौ रुपए का एक नोट थमाया और उन्होंने मना किया। मैंने कहा चाचा कुछ खा लेना। कलाकार ह्रदय ने भावना से पूरित हो आशीर्वाद मुद्रा में हाथ उठा दिए। लगा मानो फिर से काशी में गंगा स्नान हो गया।

कलाकार का ह्रदय भले ही कोमल हो समय हमेशा कठोर होता है। घड़ी बताने लगी कि स्वप्न संसार से निकलने का समय आ गया है। ऑटो में बैठ कर हम वाराणसी स्टेशन पहुंचे और वंदे भारत एक्सप्रेस में बैठ कर आध्यात्मिकता, भावुकता के संसार से आधुनिकता और वैज्ञानिकता के अजूबे की सराहना करने लगे। ट्रेन दिल्ली के लिए खुल चुकी थी कि स्टेशन की दीवार पर एक पेंटिंग दिखी।लिखा था स्मार्ट सिटी वाराणसी: अलौकिक आध्यात्मिक आधुनिक। मानो पूरी यात्रा का सार इन्हीं तीन शब्दों में सिमट आया। वाराणसी से प्रयागराज की यात्रा के बीच चटपट यह वृतांत लिख डाला , कौन जाने दिल्ली पहुंच कर यह सुकून का भाव रहे ना रहे , हृदय प्रसन्नचित मन रहे या ना रहे। 

Thursday, January 16, 2020

तिल संक्रांति की शुभकामना

आप सबको तिल संक्रांति की शुभकामनाएं। तिल का ताड़ बनाने वाले शहरी मीडिया वालों को, शहर की भीड़ में गुमनाम चेहरे बन कर तिल तिल कर जी रही जनता को, गांव में मिले अपने गंवईपन को तिलांजलि दे कर शहर आने वालों को, मेट्रो में तिल भर की जगह ना होने के बावजूद चढ़ने की कोशिश करने वालों को, तिलों की जैसे ज़िन्दगी जिनका तेल निकाल रही है उनको, तिल संक्रांति की शुभकामनाएं। आज आपका दिन है।