Wednesday, October 12, 2022

गंगा जमुनी तहजीब की पोल

गंगा जमुनी तहजीब का मतलब मुझे समझ में नहीं आता। कारण यह कि प्रयागराज में यमुना आकर गंगा में मिल जाती है और अपना स्वतंत्र अस्तित्व खो देती है और गंगा कहलाने लगती है। गंगा जमुनी तहजीब का मतलब यह कि प्रयाग के आगे सिर्फ गंगा रहेगी, यमुना नहीं। होना तो यह चाहिए कि कोई ऐसा नाम कहा जाय, जहां दोनो का सहअस्तित्व हो ना कि एक को अपने अंदर समेटने और समाहित करने के लिए दूसरा आतुर हो।  

मानव का सौन्दर्य दो अलग अलग आंखों , दो अलग अलग हाथों से ही है। दो आंखों को मिला कर एक बड़ी आंख और दो हाथों को जोड़ कर एक लंबा हाथ ना ही सुन्दर होगा और ना उपयोगी। 

अगली बार कोई गंगा जमुनी तहजीब की दुहाई दे तो पूछिएगा कि आपको जमुना के स्वतंत्र अस्तित्व से इतनी समस्या क्यों है? आप गंगा कावेरी संस्कृति की बात क्यों नहीं करते। उनके तनिक से इशक की कलई खुल जाएगी।

Saturday, October 8, 2022

प्रेमचंद के फटे जूतों के मायने

प्रेमचंद की मृत्यु हमें याद दिलाती है कि कलम तलवार से मजबूत तभी हो सकती है जब कलम चलाने वाला भूखा न रहे। तलवार चाहे कितनी भी तेज क्यों ना हो, जिस सैनिक के हाथों में तलवार है , उस सैनिक के हाथों को उचित पोषण मिलना भी आवश्यक है। तलवार चलाने वाले हाथों के ऊपर अन्य सांसारिक चिंताओं का बोझ नहीं होना चाहिए। बोझिल मानसिकता और कुपोषित हाथों में तेज तलवार भी शत्रु को परास्त नहीं कर सकती। कलम की प्रखर धार भी वैसे लेखक के हाथों में कुंद पड़ जाती है अगर लेखक अपने जीवन में सामान्य भौतिक सुख सुविधाओं के लिए तरसता रहे। 

प्रेमचंद की प्रज्ञा कितनी भी तेज रही है, उनकी क्षुधा की आग हमेशा उनकी प्रज्ञा को सताती रही। आखिर क्षुधित काया में स्वास्थ्य और रचनात्मकता कितने दिन वास कर सकती है। प्रेमचंद हमारे महानतम कलमकार भले ही रहे हों, हमेशा अकिंचन ही बने रहे। उनका प्रेस तो उनका खून पीकर ही चलती रही। उनकी फटे जूते देख कर तो परसाई जी एक निबंध तक लिख दिया। कई संस्मरण तो यह भी बताते हैं कि उनकी आखिरी यात्रा में कुल छह साथ लोग ही शामिल थे। पूरे साहित्य जगत को रोशनी की लौ लिए दिशा देने वाले प्रेमचंद एक गुमनाम लाश की तरह इस दुनिया से विदा हुए।

किसी भी सभ्यता की पहचान इससे होती है कि इस सभ्यता के नायकों चयन जनमानस में कैसे होता है और सभ्यता अपने नायकों के साथ कैसा व्यवहार करती है। हम भले ही मेरा भारत महान के नारे लगा कर अपनी सभ्यता के महान होने का दंभ भरते रहें, हम अपने साहित्य और साहित्यकारों के साथ उचित व्यवहार कभी नहीं कर पाए। निराला भूख से जूझते रहे, तो मुक्तिबोध अपने जीवन काल में अपनी एक कविता प्रकाशित नहीं करवा सके। आज भी कोई गीत सुनकर हम उसके गायक को पहचान ले, उसपर थिरकते अभिनेताओं की भाव भंगिमा तक उतार लें, गीतकार का नाम हमें शायद ही पता भी होता है। अपने साहित्यकारोंं को नायक बना के  सम्मानित करना तो दूर , साहित्यकार होने का अर्थ ही गया है एक निरीह झोला टांगे हुए व्यक्ति से जिसकी जरूरत तो है लेकिन कदर कोई खास नहीं है। स्वाभाविक है इसका असर हमारी पूरी पीढ़ी की रचनात्मकता और रचनाशीलता पर पड़ा है। कब आखिरी बार हमारे बीच से कोई मौलिक रचना निकली है जो विश्व जनमानस पर छा गई हो? कोई मौलिक कहानी, उपन्यास या कोई और साहित्यिक रचना गढ़ने में हमारा हाथ तंग ही दिखता है। अंग्रेजी भाषा में कदाचित कुछ लिखा भी जा रहा है, हमारी भारतीय भाषाओं की स्थिति तो उत्तरोत्तर खराब ही होती जा रही है। मां सरस्वती की वंदना करने वाले देश में सरस्वती पुत्रों की ऐसी दुर्दशा अकल्पनीय और अस्वीकार्य है। 

आज से 86 साल पहले इन्हीं गलतियों के कारण हमने एक हीरा मुंशी प्रेमचंद के रूप में खोया था। आज उनकी पुण्यतिथि पर हमें विचार करना होगा कि हम अपने साहित्यकारों रूपी रत्नों को सहेज कर रखने के लिए क्या कर सकते हैं।

 उपन्यास सम्राट को उनकी पुण्य तिथि पर शत शत नमन।

Tuesday, October 4, 2022

रावण : एक जटिल चरित्र

रावण का चरित्र एक जटिल चरित्र है। इसके चरित्र के विस्तार को विविध विमाओं में देखने की जरूरत है। रावण के चरित्र का एक विस्तार एक शिवभक्त के रूप में है। स्वयं महादेव रावण को अपना सबसे बड़ा भक्त मान चुके हैं।ऐसा भक्त जिसने शिव को अपना सिर तक काट तक चढ़ा दिया। ऐसा भक्त जिसके कहने पर वो अपना कैलाश त्याग कर उसके साथ चल पड़े। रावण वेदों का ज्ञाता और ऋषि विश्रवा का पुत्र और ऋषि पुलस्त्य का पौत्र था। इसके अलावा एक अत्यंत स्नेही भ्राता भी था जिसने अपनी बहन की मान सम्मान की रक्षा के लिए एक युद्ध छेड़ने तक से गुरेज नहीं किया। अपनी राक्षसी माता के कारण वो आधा राक्षस भी था। उसके पास शक्ति, ज्ञान, सैन्य शक्ति, धनबल, भक्तिबल किसी की भी कमी नहीं थी। शायद इतना कुछ पा लेने के बाद अहंकार हो जाना स्वाभाविक ही था। उसी अहंकार के कारण उसने परस्त्री का हरण किया और वोही उसके विनाश का कारण बना। लेकिन विष्णु अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम राम के सामने उनका विरोधी चरित्र कोई साधारण सामान्य का एक दानव नहीं हो सकता। 

रावण का चरित्र रुपहले पर उतारने से पहले इन बारीकियों का ध्यान रखने की आवश्यकता है। उसके चरित्र के सभी पहलुओं में संतुलन बनते हुए उसे भगवान राम के एक योग्य प्रतिद्वंदी के रूप में दिखाना आसान नहीं है। इसके लिए साहित्य, पौराणिक ग्रंथों, उसकी उपलब्ध टीकाओं के गहन अध्ययन के साथ साथ अपनी एक स्वतंत्र राय होनी भी आवश्यक है। आने वाली फिल्म आदिपुरूष में रावण के चित्रण को देख कर इसका अभाव लगना स्वाभाविक है। एक बर्बर, दानव के रूप में रावण का चित्रण ना केवल अधूरा है बल्कि उसके साथ एक अन्याय है। राक्षसराज रावण राक्षस सुबाहु और मारीच की तरह नही है जिसके चरित्र को एकविमीय रूप में दिखाया जा सके। आशा रखता हूं आदिपुरुष फिल्म में रावण के चरित्र के साथ न्याय हुआ होगा। टीजर देखने के बाद उसकी आशा कम ही लगती है। 

दशहरा की छुट्टियां

मुझे दशहरा परिवार के साथ मनाना पसंद है। आखिर हमारा सबसे बड़ा त्योहार है, साल में एक बार मेला देखना और एंजॉय करना तो बनता है। मैं चाहता हूं कि नवरात्रि और दशहरा के बीच पूरे शहर में ट्रैफिक ठीक से काम करे। मेला के दौरान ट्रैफिक जाम मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। सारे ट्रैफिक पुलिस वालों को चाहिए कि हमेशा वो मुस्तैद रहें ताकि कहीं जाम ना लगे। मेला।के आस पास गंदगी भी न फैले तो सारे नगर निगम वाले कर्मचारियों को भी पूजा के दौरान ड्यूटी पर लगा रहना चाहिए ताकि कहीं गंदगी ना फैले। और हां, नवरात्र में मैं उपवास और पूजा पर रहता हूं, इसीलिए मैं चाहता हूं कि सुबह सुबह आकर घर के सभी नौकर चाकर आकर मेरे घर की सफाई कर जाएं। मेरे नाश्ते के लिए फल और दूध चाहिए होगा इसीलिए वो दुकान हमेशा खुली रहनी चाहिए। पिछले बार विसर्जन के समय बिजली कट गई थी, मैं बिजली विभाग वालों को फोन लगाता रहा, सब गायब थे। यह कोई तरीका है!! बिजली विभाग वालों को ड्यूटी पर होना चाहिए। मेला देखने के लिए बड़ी भीड़ हो जाती है, और मुझे भीड़ में ड्राइव करना बिल्कुल पसंद नहीं है। यह त्योहार के समय सारे टैक्सी वाले भी पता नहीं कहां गायब हो जाते हैं, बताइए यह कोई तरीका है। उन सारे टैक्सी वालों का लाइसेंस रद्द कर देना चाहिए जो पर्व के समय गायब रहते हैं। मुझे मेला देखने के लिए टैक्सी ,रिक्शा, ऑटो किसी की दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

पता नहीं, मेरे बच्चों के ट्यूशन टीचर को भी इसी समय छुट्टी क्यों चाहिए। भला, बच्चों को होमवर्क कौन करवाएगा, पूजा के तुरंत बाद उनके एग्जाम भी हैं, उसकी तैयारी भी उसी को करवानी थी। अब मुझे साल में एक बार छुट्टी मिलती है, उस समय बैठ कर बच्चों को होमवर्क कौन करवाए। आने दो ट्यूशन टीचर को वापस, जितने दिन गायब रहा है ,उतने दिन के पैसे काटूंगा। मजाक बना रखा है। छुट्टी का बहाना चाहिए इन लोगों को।

और क्या कहूं! बस आराम से छुट्टी बिताना चाहता हूं। क्या इतना भी हक नहीं बनता मेरा। आप सब को भी त्योहारों की बहुत बहुत शुभकामना।। 



Sunday, October 2, 2022

देश का लाल : लाल बहादुर

सन 1965 के युद्ध के दौरान पाकिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद अयूब खान को लगा कि सन बासठ की हार और पंडित नेहरू की मृत्यु के बाद भारत को हराना आसान होगा। अयूब अतिआत्मविश्वास में बोल गए कि हमारी सेनाएं टहलते हुए दिल्ली तक पहुंच जाएंगी। जाहिर है कि उन्होंने पांच फीट दो इंच ऊंचे भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का आकलन उनकी शारीरिक बनावट पर किया था। आगे जो हुआ वो सर्वविदित है, शास्त्री जी ने ना केवल देश का नेतृत्व किया बल्कि पाकिस्तानी जनरल अयूब खान की दिल्ली तक टहल कर पहुंच जाने की सारी योजना मुंगेरीलाल के सपने साबित हुई। युद्धोपरांत रामलीला मैदान में अपने भाषण में एक विजयी वीर की भांति शास्त्री जी ने कहा: अयूब खान ने कहा था कि वो टहलते हुए दिल्ली तक आएंगे, वो तो नहीं आ पाए, इसीलिए हम टहल कर लाहौर पहुंच गए। जनता ने बहरा कर देने वाली करतल ध्वनि से अपने विजेता प्रधानमंत्री का अभिवादन किया।

यह एक संयोग ही है कि 2 अक्टूबर को ही जन्मे महात्मा गांधी जहां सत्य अहिंसा के लिए जाने जाते हैं, दो अक्टूबर को जन्मे शास्त्री जी जो एक गांधीवादी नेता थे, भारत के इतिहास में एक युद्ध विजेता की तरह याद किए जाएंगे। शास्त्री जी ने एक बार राष्ट्र के नाम अपने संदेश में कहा था कि अगर कोई देश न्यूक्लियर हथियार या तलवार की नोंक पर हमें डराने का प्रयास करेगा तो हम इतना बता दें कि हम झुकने वालों में से नहीं है। इनको मेरा इतना ही जवाब होगा कि हथियारों का जवाब हथियारों से दिया जायेगा। नौ साल बाद भारत ने पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण किया तो उसका पहला सार्वजनिक संकेत शास्त्री जी ने पहले ही दे दिया था।

कृतज्ञ राष्ट्र की तरफ से शास्त्री जी को उनकी 118वी जयंती पर कोटि कोटि नमन।

Wednesday, September 21, 2022

राजू भईया के लिए।

गजोधर भैया,
हंसाते हंसाते अचानक से चल दिए। अब कौन सुनाएगा कि बूढ़ा गब्बर का आगे क्या हुआ? क्या सांबा और कालिया अब भी उसको लाफा देते रहते हैं? कौन फिल्म थिएटर में देख कर उसकी कहानी हमको सुनाएगा। बहुत इच्छा थी कि आप लाल सिंह चड्ढा देख कर आते और उसकी कहानी सुनाते। अब यह इच्छा तो पूरी होगी नहीं। जीजा साली वाली कहानी भी आप अधूरी छोड़ गए। जीजू!! एक रसगुल्ला, खाना पड़ेगा!!! कहने वाली साली कहां है आज कल? बहन की शादी करवाने वाले भाई की शादी हुई कि नहीं, यह भी बिना बताए चल दिए। कभी कभी गुस्सा भी आता है कि शायद आप बड़े आदमी बन गए तो हम लोगों की परवाह करना छोड़ दिया। हां कर लो यह पहले, बड़े आदमी हैं करते होंगे। 

राजू भैया, कितनी बातें थी जो तुमसे सुननी थी। कितनी कहानियां थी जो आपको सुनानी थी।

बड़े शौक से सुन रहा था जमाना, तुम ही सो गए दास्तां कहते-कहते।

जहां रहना, हंसते रहना!! हंसाते रहना।।

Tuesday, September 20, 2022

A peaceful natural death

Queen Elizabeth II has died peacefully of natural causes. Of course, she lived an extraordinary life. She was corronated as queen almost seven decades ago. She saw a lot of water flow down the Thames. But more than her life, it's her death that catches my attention. When I read the news about the queen dying peacefully of natural causes, I thought this kind of death is becoming very very rare. How many of us have seen people around us dying peacefully at home due to natural causes after living a full life. Most of the deaths we see are preceded by prolonged illness, medical procedures, and painful medication. Diabetes in kids, heart attacks in thirties and deaths in 40s don't surprise us anymore. Rarely do people die at home; it's either in hospital or on the way to hospital. Heart attacks, diabetes, hypertension, and other lifestyle diseases have denied most of us a natural, peaceful death. The Queen definitely had a privileged life, and she had a privileged death too. Most of us may wish for a life like her; a death like her is equally desirable, if not more. May her soul rest in peace!

अलार्म घड़ी सुलाने के लिए है

अलार्म घड़ी बजनी चाहिए यह बताने के लिए कि सोने का वक्त हो गया। अलार्म घड़ी इसलिए नहीं बनी कि आपको कच्ची नींद से जगाए । अलार्म घड़ी इसलिए बनी है कि आपको कहे कि थोड़ा सो जाओ, थक गए होगे ना कि सुबह सुबह आपको चिल्ला चिल्ला कर जगाए कि उठ जाओ कब तक सोते रहोगे। अलार्म घड़ी आपका खयाल रखने के लिए बनी है, आपकी एक सेविका है जो आपको सही समय याद दिलाती है। हमने उसको अपनी एक क्रूर गुस्सैल मालकिन बना दिया है जिसकी आवाज तक हम सुनना नहीं चाहते, लेकिन जिसकी बात मानना हमारी मजबूरी बन गई है। क्यों ना हम अलार्म घड़ी को ऐसे अपने जीवन में ऐसे अपनाए कि उसकी आवाज सुन कर हमें खुशी हो न कि हर सुबह उसको बार बार खीझ कर हम चुप कराते रहें। 

भला किसको अपनी जिंदगी में हर सुबह चीख चीख कर नींद तोड़ने वाला दोस्त चाहिए!! 

Tuesday, August 23, 2022

उत्थान और पतन

गुरुत्वाकर्षण का बल हमेशा हर किसी को नीचे खींचता रहता है। कोई वस्तु उपर जा रही है तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसपर गुरुत्व के बल ने काम करना बंद कर दिया है, इसका अर्थ यह है कि वस्तु ने गुरुत्वाकर्षण बल के अधिक बल विपरीत दिशा में लगा कर गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव को अस्थाई रूप से प्रभावहीन बना दिया है। लेकिन यह प्रभाव अस्थाई ही है क्योंकि हर उपर जा रही वस्तु पर भी उसे नीचे खींचने वाला बल सतत रूप से लगा रहता है। गुरुत्व का बल को लगातार हराना पड़ता है, हर पल हराना पड़ता है, क्योंकि हर उपर जा रही वस्तु पर नीचे लाने वाले ताकतें हमेशा लगी रहती हैं।

ऊपर ले जाने वाला बल थक जाता है, नीचे खींचने वाला बल कभी नहीं थकता। ऊपर जाना उद्यम है और नीचे गिरना अंतिम नियति।  उत्थान उद्यम है और पतन नियति। उद्यम से नियति को टाल सकते हैं , बदल नहीं सकते। लेकिन नियति से लड़ना ही पुरुषार्थ है, जीवन है, नियति के आगे विवश हो जाना ही तो मृत्यु है, अंतिम पतन है। ऐसा पतन जिसके बाद कोई उठता नहीं। पतन स्वाभाविक प्रक्रिया है, उसके लिए बल नहीं लगाना पड़ता, उत्थान स्वाभाविक नहीं है, उसके लिए बल लगाना पड़ता है। जिस दिन उत्थान का प्रयास कम हो जाता है, पतन की जीत का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। यह नियम सबके लिए शाश्वत है चाहे व्यक्ति हो, वस्तु हो, कोई संस्था हो , या साम्राज्य हो या नैतिक चरित्र, सबके लिए पतन स्वाभाविक है, शाश्वत नियति है । जग में वोही महान रहा है जिसने अपने उद्यम, संयम, प्रयास से पतनकारी शक्तियों को लगातार पराजित किया है। अपने प्रयास , उद्यम, संयम को बनाए रखें, पतन को पराजित करने की कोई और युक्ति नहीं है।

Saturday, August 20, 2022

छोटी छोटी खुशियां और मैं

बार बार जाता हूं
समंदर के किनारे
देखने कि कैसे बच्चे बनाते हैं
रेत के टीले,
और लहरों को देख खुश होते हैं,
कैसे बीनते हैं सीप के टुकड़े,
और अपनी मुठ्ठी में भर 
लेते हैं लहरों की झाग,
छोटी छोटी खुशियों से
भर जाती है उनकी झोली।

और मैं उनके साथ ही खड़ा
महरूम हूं उन सारी खुशियां से,
वक्त और तजुर्बे की मोटी चादर 
जम गई है मेरे चारों ओर
कि जिसके बाहर ही रह जा
रही हैं ये बच्चों की खुशियां
और अंदर मैं कुछ घुट सा रहा हूं।

करता हूं पुरजोर कोशिश 
कि शामिल हो सकूं उनके साथ
उन छोटी छोटी खुशियों में,
पा सकूं एक टुकड़ा अपने हिस्से की
मुस्कुराहट का।
जैसे कोई अंधा बाप दूसरों से 
सुन कर देखने की कोशिश
रहा हो अपने बेटे
की पहली फिल्म
और धीमे धीमे मुस्कुरा रहा हो
देख अपने बेटे को परदे पर
मन की आंखों से।


Saturday, August 13, 2022

हीरक जयंती पर स्वर्ण जयंती की यादें

स्वतंत्रता की पचासवीं सालगिरह वर्ष 1997, मैं नवोदय विद्यालय कटिहार में छात्र हुआ करता था। अच्छी तरह से याद है, स्टेंसिल्स की मदद की हमारे हॉस्टल में हरेक दीवार पर जय हिंद, तिरंगा, सारे जहां से अच्छा , मेरा भारत महान जैसे नारे उकेरे गए थे। अभी पच्चीस साल बाद पीछे मुड़ के देखता हूं कि देश कितना बदल गया है। एक बानगी तो यही कि उस भव्य समारोह की सिर्फ स्मृतियां हैं हमारे पास फोटो एक भी नहीं। आज के ज़माने से बहुत अलग थी वो दुनिया। हमने आजादी की पचासवीं वर्षगांठ तक पिज्जा नहीं खाया था। पिज्जा छोड़िए, राजमा और छोले भटूरे और आइसक्रीम भी नहीं खाई थी। हम लोग लाल बर्फ को ही आइसक्रीम मानते थे। चॉकलेट के नाम पर चीनी की उबली गोलियां जिसको लेमन चूस बोलते थे वोही खाई थी। किस्मी टॉफी बार और मोर्टन ही हमारे लिए चॉकलेट हुआ करते थे। डियोडरेंट और परफ्यूम का अंतर पता नहीं था। हम बस सेंट जानते थे जो शादियों में दूल्हे और हमारे म्यूजिक सर लगाया करते थे।कंप्यूटर देखा नहीं था हमने। पक्के से याद नहीं शायद सुना भी नहीं था। मोबाइल फोन हमने फिल्मों तक में नहीं देखा था। 

कुछ चीज़ें अभी बेतुकी लग सकती हैं लेकिन एक बात का खयाल रखना भी जरुरी है कि यह बिहार के एक गुमनाम से जिले के एक स्कूल छात्र के निजी अनुभव हैं। आज़ादी की स्वर्ण जयंती तक हमने जींस नहीं पहनी थी, ब्रांडेड कपड़े क्या होते हैं हमें पता नहीं था। बिसलेरी वाला पानी पीना अभी बाकी था और सोडा से कपड़े धोना सुना था, सोडा पिया भी जाता है, यह पता नहीं था। एसी में कभी नहीं बैठे थे, एसी डब्बे में सफर नहीं किया था। अपनी कार का सपना तक देखना बाकी था, सायकिल चलाना सीखना भी उधार की साइकिल से हुआ था। 

बर्थडे का पता था लेकिन बर्थडे में केक काटना और केक चेहरे पर लगाना होता है पता ना था। वेस्टर्न टॉयलेट पर नहीं बैठे थे और बाटा जूता समृद्धि की निशानी समझा जाता था। नेपाली घड़ियां जिसमें चाभी की जगह बैटरी लगती थी, कुछ लोगों के पास हुआ करती थी। चाइनीज घड़ियां, रेडियो और कैमरे नेपाल के रास्ते स्मगलर लोग लाया करते थे। बॉबी देओल स्टाइल आइकन हुआ करते थे जिनकी फिल्म गुप्त की चर्चा हर तरफ थी। अमिताभ बच्चन तब तक भी अपने आप को बूढ़ा मानने को तैयार ना थे और मृत्युदाता जैसी फिल्में कर रहे थे। 

गिनती करते करते थक जाऊंगा लेकिन शायद आज के बच्चों को पच्चीस साल पुरानी दुनिया का अहसास नहीं करवा पाऊंगा। यकीन मानिए, हमारा देश बहुत आगे बढ़ा है स्वर्ण और हीरक जयंती के बीच। सफर बहुत बड़ा है। ईश्वर की दया से अगर स्वस्थ रहा और आज़ादी की सौवी वर्षगाठ देखने का अवसर मिला तो एक सेवानिवृत वृद्ध की तरह आजादी की पचासवीं और पचहत्तरवी वर्षगाठ को याद करूंगा। पक्का यकीन है कि जिस तरह आज बैठकर यह अंदाज लगाना तक कठिन है कि 2047 में दुनिया कैसी होगी, 2047 में यह यकीन करना भी मुश्किल होगा कि 2022 में दुनिया ऐसी थी। 

आप सबको आज़ादी के अमृत महोत्सव की बहुत बहुत शुभकामनाएं। जय हिंद।🙏

Tuesday, August 9, 2022

कोउ नृप होउ हमहि का हानी।

करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा॥
कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी॥3॥

रामचरितमानस के अयोध्या काण्ड के इस दोहे का सामान्यतया एक चौथाई ही प्रसिद्ध है और बोल चाल में प्रयुक्त होता है। कोउ नृप होउ हमहि का हानी , सामान्यतया वैसे लोग बोलते हैं जो अपने आप को राजनीतिक रूप से तटस्थ दिखाना चाहते हैं। यह एक विडंबना ही है क्योंकि यह पंक्ति मूल रूप में दासी मंथरा द्वारा रानी कैकेयी को कही गई थी और इसमें अभिधात्मक नहीं वरना व्यंजना भाव प्रमुख है। सर्वविदित है कि मंथरा की कूटनीति ने ही राम के वनवास की नींव रखी।  यह तथाकथित तटस्थ वक्तव्य हमारे इतिहास का सबसे कूटनीतिक वक्तव्य है। राजनीति ऐसी ही होती है, जो दिखता है वो होता नहीं और जो होता है वो दिखता नहीं।

Saturday, August 6, 2022

happy friendship day to all except

Happy friendship day to all my friends except those jisne kaha ki

1. Maine apne aankhon se dekha, section C wali line de rahi tumko..Pink shirt sahi lagti hai tumper..wohi pahan ke aaj class chalna..

2. Chal na Aaj night show dekh aate hain, kal ka assignment ka fikar mat kar.. bhai hai tu mera..main kar dunga Tera assignment..

3. Tujhe nahin pata nahin.. lekin main jaanta hoon.. sachcha pyar karta hai tu usse . Tu jaaker nahin bolega to main jaaker bol dunga.. de uska number abhi baat karta hoon..

4. Abe Mahatma Gandhi ki aulaad. Ek se kuch nahin hota. Aankh band kar aur gatak jaa..

5. Yeh kya Nandan aur Champak padh raha hai.. asli magazine padhega?

6. Main ek jaruri kaam se bahar nikal raha hoon, Teri bhabhi ne bulaya hoon.. us khadoos teacher ki class mein proxy laga dena .

7. Aaj main wallet Lana bhool gaya.. mera contri tu hi kar de.. ma Kasam.. next time main de dunga tere badle ..

And last but not the least .

8. Bhai engineering kar le.. bahut scope hai.. meri baat maan, life set ho jayegi..