Wednesday, December 24, 2025

बीस रूपये का फटा नोट

यह बीस रुपये का फटा नोट

पड़ा है मेरी जेब में कई दिनों से

देखता हूँ कि सारे बड़े नोट

निकल गए धीरे-धीरे

पर यह नोट है

जो लगा हुआ है मेरे साथ

मेरे कर्मों की तरह

बीते समय की तरह

परछाई की तरह

दिलजले आशिक़ की तरह।



पीछा छुड़ाना भी चाहूँ तो कैसे—

सामने वाला हर दूसरा नोट ले लेता है

लेकिन इसे लौटा देता है कि

इसे बदल दो,

बाक़ी सब ले लेंगे

इसे नहीं लेंगे।


और मैं हर बार

हँसकर सिर हिला देता हूँ,

जैसे सच में बदल लूँगा,

पर जानता हूँ

कि बदलना मेरे बस की बात नहीं।


यह बीस का फटा नोट

मेरे ही जैसा है—

मैंने भी तो

हर मोड़ पर

अपने आप को पूरा नहीं पाया,

कहीं थोड़ा घिसा,

कहीं से फटा हुआ।

लोग लेते रहे मुझसे

मेहनत, वक़्त, ईमान,

पर जब बात आई

मुझे अपनाने की,

कह दिया—

ठीक है,

पर बदल कर आओ।


मैं नहीं बदल पाया।

मैंने अपनी दरारें

सिलाने की जगह

उन्हें अपनाना सीख लिया।

मैंने समझ लिया

कि फटा होना

नक़ली होने की निशानी नहीं।

फटा निशानी है कि दुश्वार 

डगर का मुसाफिर रहा हूं 

खाई है चोट

टूटा हूं 

लेकिन अब तक बिखरा नहीं।


अब यह नोट

मेरी जेब में नहीं,

मेरी पहचान में है।

यह याद दिलाता है

कि जो आसानी से चल जाए

वह मैं कभी था ही नहीं।

और अगर इस दुनिया में

मेरी क़ीमत

कभी पूरी नहीं लगती,

तो कोई बात नहीं—

इनकार करता हूँ मैं 

खुद को

रद्दी में देने से।


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