Friday, February 20, 2026

भला बुरा

बुरा कौन है ?
पापी कौन है?
गलत कौन है ? 
अच्छा कौन है?
पुण्यात्मा कौन है?
सही कौन है?

नैतिक शिक्षा की किताबों, नीति शास्त्र की पांडुलिपियों और धर्मशास्त्रों की अगर मानें तो विविध उत्तर मिलते हैं। विभिन्न संस्कृतियों और विचारधाराओं ने इस प्रश्न पर पीढिय़ों का गहन विचार किया है और अपने अपने तरीके से इसका उत्तर भी दिया है। उत्तर तो दिया ही है, यह भी बताया है कि गलत करने पर पाप करने पर क्या परिणाम होंगे। 

प्रश्न यह है कि जब सभी को पता है कि सही क्या है गलत क्या है , दुनिया में इतना पाप क्यों है । लोग गलत कार्य क्यों कर रहे हैं ? लोगों को तथाकथित घृणित कार्य करने के लिए प्रेरणा और नैतिक बल कहां से मिला करता है। सालों की नैतिक शिक्षा, समाज का नैतिक बल और नीति शास्त्रों का प्रवचन इतना पंगु क्यों हो जाता है। 

संभवतः इसका उत्तर है कि लोग अपने आप को हमेशा सही मानते हैं। सही मानने के लिए तर्क ढूंढ लेते हैं। कोई भी कार्य करते समय उनके समय में यह खयाल शायद ही आता है कि वो पाप कर रहे हैं । उनके मन में हमेशा यही लगता है कि वो सही कर रहे हैं। उनका पक्ष पुण्य का पक्ष है और सत्य उनके साथ है। निर्भया कांड के दोषियों में एक का साक्षात्कार देख रहा था। वो कह रहा था कि पीड़िता रात में अपने पुरुष मित्र के साथ घूम रही थी जो कि गलत है। हम लड़की को उसकी गलती की सजा दे रहे थे। विश्व युद्ध हों या महाभारत का युद्ध। दोनों पक्ष यही मानते थे कि वो सत्य की विजय और न्याय के लिए लड़ रहे हैं। इजरायल गाजा का युद्ध हो या रूस यूक्रेन युद्ध, कौन सही है , कोई नहीं बता सकता। जिस पक्ष से पूछिये वो विश्वस्त है कि उनकी जीत सत्य की जीत होगी और उनका नैतिक पक्ष दूसरे से ऊपर है।

सिगमंड फ्रायड ने बताया कि मनुष्य का ‘अहं’ (ego) स्वयं को बचाने के लिए तर्क गढ़ता है। अपराधी भी अपने भीतर नैतिक कथा रच लेता है — ताकि वह स्वयं को राक्षस न समझे। इसी को आधुनिक मनोविज्ञान में moral rationalization कहा जाता है — व्यक्ति पहले निर्णय लेता है, फिर उसके समर्थन में नैतिक तर्क खोज लेता है।

तो शुरू में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर है कि जो मैं कर रहा हूं वो पुण्य है, सत्य मेरे साथ है और जो मेरे साथ हुआ है वह अन्याय है। मेरा विपक्षी पाप जनप्रतिनिधित्व करता है और उसकी पराजय से ही अन्याय का विनाश होगा। भौतिकी के गति के नियम संभवतः नैतिक मूल्यों पर भी लागू हैं। क्या सही है क्या गलत है, यह इसपर निर्भर नहीं करता कि क्या हो रहा है या क्या हुआ है, यह इसपर निर्भर करता है कि आप पूछ किससे रहे हैं। किसी भी युद्ध में  अंततः असत्य पराजित नहीं होता, जो पराजित होता है वो असत्य हो जाता है। मनुष्य का संकट यह नहीं कि उसे सही-गलत का ज्ञान नहीं है। संकट यह है कि वह स्वयं को गलत मानने का साहस नहीं जुटा पाता।



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