Saturday, November 30, 2024

मणि, शास्त्र और शक्ति: उपयोग की मर्यादा का महत्त्व

मणि अगर गजराज के पास हो तो मुक्ता मणि बन जाती है। वही मणि सम्राट के मुकुट में सज कर उसके चक्रवर्ती होने के प्रताप का उदघोष करती है। यही मणि अगर सर्प के पास पहुंच जाय तो सांप इच्छाधारी बन पूरे समाज के लिए विपत्ति उत्पन्न कर देता है। एक ही शास्त्रों का ज्ञान अगर विदुर जैसे सज्जन के पास हो तो एक नीति निपुण मंत्री बनता है, और यही शास्त्रों का ज्ञान एक असुर को रावण बना डालता है। धनुर्विद्या सत्य के लिए लड़ने वाला पार्थ भी बनाती है और कोख में पल रहे बच्चे तक की हत्या करने वाला अश्वत्थामा भी बना डालती है।
सिर्फ शक्ति से शक्ति की उपयोगिता नहीं चलता , शक्ति धारण करने वाला ही शक्ति की उपयोगिता का निर्धारण करता है। वर्षा की वही बूंद जो सीप में पड़ कर मोती बन जाती है जो नाली में गिरकर अपशिष्ट हो जाती है।

इस प्रकार, यह स्पष्ट होता है कि वस्तु, ज्ञान, या शक्ति का मूल्य और प्रभाव उसके धारक के दृष्टिकोण, चरित्र, और उपयोग की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है। हर शक्ति एक साधन मात्र है, जो इसे धारण करने वाले की मंशा के अनुसार या तो समाज के लिए वरदान बन सकती है या अभिशाप।

जीवन का यही दर्शन हमें सिखाता है कि हमें अपनी योग्यता और संसाधनों का सदुपयोग करना चाहिए, ताकि वे मानवता के कल्याण और विकास के लिए उपयोगी सिद्ध हों। हमारा कर्तव्य है कि हम अपने विचारों और कर्मों को सही दिशा दें और अपनी शक्ति का ऐसा उपयोग करें, जो हमें और हमारे समाज को उच्च आदर्शों की ओर अग्रसर करे।

जैसा कि संत कबीर कहते हैं:
"साधन के फल देखिए, साधन जाए न वर्त।
जो साधन संत जानें, सब फल साधन समर्प।"
अतः शक्ति का सही उपयोग ही जीवन का सार है, और यही मानवता के लिए सच्चा उपहार है।

Saturday, November 2, 2024

फिर से पढ़ें बचपन में पढ़ी कहानियां


बाल्यकाल में सुनी जाने वाली कहानियाँ प्रायः अपनी सादगी और प्रत्यक्ष नैतिक उपदेशों के कारण सरल प्रतीत होती हैं। परंतु यदि इन कथाओं का सूक्ष्म अध्ययन करें, तो पाएँगे कि उनमें जीवन-सिद्धांतों की गूढ़ता छिपी हुई है। इन कहानियों में जीवन के अनेक रहस्य, गहरे संदेश, और समय की कसौटी पर खरे उतरे जीवन-सिद्धांत छिपे होते हैं, जो बालकों के मानस में सीधे-सीधे तो नहीं, परंतु अप्रत्यक्ष रूप से संस्कारित होते हैं। अलिफ़ लैला की प्रसिद्ध कथा मछुआरा और जिन्न एक ऐसी ही कथा है, जो मानवीय मनोविज्ञान के साथ-साथ शक्ति के स्वभाव और सीमाओं पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत करती है। आधुनिक युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के क्षेत्र में हो रहे विकास को देखते हुए, यह कथा अत्यधिक प्रासंगिक हो उठी है, जिसमें जिन्न को एक ऐसी शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो मनुष्य के नियंत्रण से बाहर जा सकती है।

मछुआरा और जिन्न की कथा में एक निर्धन मछुआरा अपनी जीवन-चर्या के लिए समुद्र से मछलियाँ पकड़ता है। एक दिन उसकी जाल में मछली नहीं, बल्कि एक पीतल की बोतल आती है, जिसे खोलने पर उसमें से एक प्रचंड जिन्न प्रकट होता है। जिन्न मुक्त होते ही मछुआरे को संहार की धमकी देता है। मछुआरा भय से ग्रस्त हो जाता है और जिन्न से उसका क्रोध पूछता है। तब जिन्न उसे बताता है कि प्रारंभ में वह अपने मुक्तिदाता को असीम सम्पदा का वरदान देने का संकल्प लिए हुए था, किंतु वर्षों तक बंद रहने के कारण उसका हृदय क्रोध और प्रतिशोध से भर गया।

यह कहानी प्रतीकात्मक दृष्टि से उस असीम शक्ति का चित्रण करती है जिसे यदि अज्ञानता में मुक्त कर दिया जाए, तो वह विध्वंस का कारण बन सकती है। जिन्न यहाँ एक ऐसी शक्ति का प्रतीक है, जो नियंत्रित न होने पर विनाश का कारण बन सकती है। मछुआरा अपनी चतुराई से जिन्न को पुनः बोतल में बंद कर देता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि शक्ति का सही नियंत्रण बुद्धि से ही संभव है।

जिन्न की यह कथा आधुनिक युग की कृत्रिम बुद्धिमत्ता से घनिष्ठ साम्य रखती है। जिन्न की तरह AI भी मानव निर्मित शक्ति है, जो यदि उचित नियंत्रण के बिना स्वतंत्र हो जाए, तो अपने अनपेक्षित परिणाम उत्पन्न कर सकती है।

कुछ प्रमुख बिंदु, जिनमें जिन्न और AI के मध्य साम्य देखा जा सकता है, निम्नलिखित हैं:

1. अज्ञात का उद्घाटन: जिस प्रकार मछुआरा अनजाने में जिन्न को मुक्त करता है, उसी प्रकार आधुनिक समाज AI को बिना उसकी समस्त क्षमताओं को समझे उद्घाटित कर रहा है। इसके दीर्घकालिक परिणामों का समाज को अभी तक सम्यक ज्ञान नहीं है।

2. शक्ति और संपदा का प्रलोभन: प्रारंभ में जिन्न मछुआरे को असीम सम्पदा देने की प्रतिज्ञा करता है, वैसे ही AI भी उन्नति और सुख के सपने जगाता है। आज के युग में इसे प्रगति का सबसे बड़ा साधन माना जा रहा है, परंतु इसके अप्रत्याशित परिणामों का भय भी बराबर बना हुआ है।

3. क्रोध और विद्रोह का भय: समय के साथ जिन्न का हृदय आक्रोश से भर गया और वह अपने मुक्तिदाता का संहार करने को आतुर हो उठा। AI की स्थिति भी भिन्न नहीं है; यदि इसके विकास में मानव नैतिकता और सावधानी न बरती जाए, तो यह मानवता के लिए संकट का कारण बन सकता है।

4. मानवीय चतुराई का महत्व: मछुआरे ने अपनी चतुराई से जिन्न को पुनः बोतल में बंद कर दिया। इसी प्रकार आधुनिक समाज को भी AI के प्रति चतुराई और विवेक का परिचय देना होगा, अन्यथा यह एक असंयमित शक्ति के रूप में मानवता के लिए संकट बन सकती है।

परंपरा से आधुनिकता तक: कथा के बदलते अर्थ

मछुआरा और जिन्न की कथा युगों से लोक-मानस में व्याप्त है, और प्रत्येक युग में यह भिन्न अर्थ ग्रहण करती रही है। बालकों के लिए यह अज्ञात शक्तियों से सतर्क रहने की शिक्षा देती है, परंतु बड़ों के लिए यह एक गहन संदेश प्रस्तुत करती है कि अनियंत्रित शक्ति विध्वंसकारी होती है। इसी प्रकार अन्य बाल कहानियाँ भी अपने में गूढ़ सन्देश छिपाए हुए हैं, जो मानव समाज को बदलती चुनौतियों का सामना करने में मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।

जैसे जैक और बीनस्टॉक और कछुआ और खरगोश की कहानियाँ बाहरी दृष्टि से साहस और धैर्य की शिक्षा देती हैं, किंतु इनका वास्तविक संदेश जीवन के संतुलन, धैर्य और सीमाओं का मान रखने के सिद्धांत को पुष्ट करता है। कछुआ और खरगोश न केवल धैर्य की महत्ता, अपितु निरंतर प्रगति और संयम का पाठ पढ़ाती है, जो आज के युग में प्रासंगिक है।

बाल कथाएँ केवल मनोरंजन मात्र नहीं हैं; वे हमारे जीवन को संचालित करने वाले गूढ़ सिद्धांतों का भंडार हैं। मछुआरा और जिन्न जैसी कहानियाँ शक्ति, विवेक और संयम की ओर संकेत करती हैं। युगों के बदलाव के बावजूद इन कथाओं का सार आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि पूर्वकाल में था।

हमारे समाज को इन कथाओं से यह सीख लेनी चाहिए कि अनियंत्रित शक्ति विनाश का कारण बनती है, और विवेक तथा संयम ही मनुष्य का वास्तविक मित्र है। AI और अन्य तकनीकी शक्तियों का उपयोग विवेक और संयम के साथ होना चाहिए ताकि मानवता का भविष्य सुरक्षित रह सके।

Wednesday, October 9, 2024

TATA .. Ratan !!!

 "आपको कार बनाने के व्यवसाय की समझ नहीं है। आपने यह प्रोजेक्ट क्यों शुरू किया? हम आपकी कंपनी का यह डिवीजन खरीदकर आप पर एहसान कर रहे हैं।"

वर्ष था 1999. उदारीकरण का एक दशक पूरा होने जा रहा था। भारतीय उद्योग जगत नए सदी का स्वागत करने को उत्सुक था। इसी समय एक भारतीय उद्योगपति ने अपनी कंपनी को नई सदी में नई ऊंचाइयों पर ले जाने का सपना देखा। उन्होंने सोचा कि भारत में एक ऐसी कार होनी चाहिए जो पूरी तरह से स्वदेशी हो, भारतीय लोगों के लिए बनी हो और भारत की सड़कों पर दौड़ सके। इस सपने को साकार करने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की और अपनी कार लॉन्च की।

लेकिन अनुभव की कमी को सिर्फ सपने और नीयत पाट न सके। यह कार उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। कार की परफॉर्मेंस की आलोचना होने लगी और उसकी बिक्री भी बेहद कम हो रही थी। लोग इसे एक बड़ी असफलता मानने लगे। यहां तक कि कंपनी के अंदर भी कई लोगों ने सलाह दी कि कार डिवीजन को बेच देना चाहिए। चारों तरफ से निराशाजनक माहौल बन चुका था।

उसी दौरान, अमेरिकी कार कंपनी Ford ने इस भारतीय कंपनी की कार डिवीजन खरीदने में रुचि दिखाई। अमेरिकी कंपनी के प्रमुख ने भारतीय उद्योगपति को डेट्रॉइट में अपने मुख्यालय में आमंत्रित किया। वह उद्योगपति अपने कुछ साथियों के साथ वहां पहुंचे। मीटिंग के दौरान, फोर्ड के प्रमुख ने उनसे कहा, कि आपको कार व्यवसाय के बारे में कुछ नहीं आता। आपने यह व्यवसाय क्यों शुरू किया?

यह अपमानजनक टिप्पणी सुनकर भी वह भारतीय उद्योगपति शांत रहे। वह कोई प्रतिक्रिया दिए बिना वापस भारत लौट आए, लेकिन भीतर ही भीतर उन्होंने एक प्रण ले ली थी। उन्होंने अपनी कंपनी को बेचने से इंकार कर दिया और कार के डिज़ाइन को बेहतर बनाने के लिए अपनी पूरी टीम के साथ दिन-रात मेहनत की। धीरे-धीरे कार की बिक्री बढ़ने लगी, और कंपनी का आत्मविश्वास वापस लौट आया।

कुछ सालों बाद, वही भारतीय उद्योगपति न केवल अपने कार डिवीजन को सफल बना चुके थे, असफल घोषित की चुकी कार के 14 लाख से ज्यादा गाडियां बेच चुके थे बल्कि उन्होंने फोर्ड की दो प्रमुख कंपनियाँ, Jaguar और Land Rover, को खरीद लिया। यह घटना उस उद्योगपति के धैर्य, साहस और दूरदृष्टि का प्रतीक बन गई।

कहानी में बताई गई कार थी इंडिया और वह उद्योगपति कोई और नहीं, बल्कि रतन टाटा थे। सफलतम भारतीय उद्योगपति । आपको टाटा कहना बुरा लग रहा है। शायद ईश्वर को भी कोई नया उद्योग शुरू करना हो, इसलिए आपको अपने पास बुला लिया। शुभ विदा और कृतज्ञ राष्ट्र का प्रणाम।

Saturday, October 5, 2024

पत्थरों पर पड़ा हरसिंगार

पत्थरों पर बिखरे हरसिंगार के नाजुक फूल, मानो जीवन की कठोर वास्तविकताओं के बीच किसी स्वप्निल सौंदर्य की झलक हों। सूखे पीले पत्ते, जो कभी हरे-भरे जीवन की सांस लेते थे, अब समय के थपेड़ों से बेजान होकर खोए हुए अवसरों की मौन कथा कहते प्रतीत होते हैं। ये पत्ते उस बीते हुए समय के प्रतीक हैं, जब संभावनाएँ थीं, परंतु अब केवल स्मृतियों के साए शेष हैं। वहीं, जीवन की कठिनाइयों के प्रतीक ये कठोर पत्थर, हमारे पथ पर आई वे बाधाएँ हैं, जो हर कदम पर हमारी परीक्षा लेती हैं, हमारे धैर्य और सहनशीलता को परखती हैं।

लेकिन इन पत्थरों पर उगती हरी काई मानो उन सूने क्षणों में भी आशा की एक नन्ही किरण बुनती हो। यह काई बताती है कि चाहे जीवन कितना भी कठिन क्यों न हो, इंसान की अदम्य इच्छाशक्ति और प्रयास, अंधकार में भी एक हरीतिमा का सृजन कर सकते हैं। यह हरियाली उस संघर्ष का प्रतीक है, जो निराशा की परतों के नीचे छिपी आशा के बीजों को पोषित करती है।

और इन सबके बीच हरसिंगार के ये फूल, अपनी कोमल, शुभ्र पंखुड़ियों से मानो जीवन के सबसे कठिन और स्याह क्षणों में भी सुंदरता और आनंद की अनुभूति कराते हैं। वे कहते हैं कि संघर्षों के बीच भी एक कोमल सौंदर्य छिपा होता है, जो दिल को सुकून देता है, जैसे जीवन की तपती धूप में एक ठंडी बयार। इन फूलों का अस्तित्व मानो इस सत्य को उद्घाटित करता है कि दुःख और कठिनाईयों के बीच भी, कहीं न कहीं, एक अमर सौंदर्य और शाश्वत आशा की कोमल छाया होती है, जो हमें जीने की प्रेरणा देती है।

Wednesday, May 8, 2024

किश्तों का मकान

हमारे पिता ने बनाया था
किश्तों में मकान।
गांव की साझे के बागीचे
में आई थी आम की अच्छी फसल
तो खरीदी गई थी ईंटें।

और खरीदे गए सरिए जब 
वेतन का एरियर सात साल बाद मिला था।
बालू खरीदे नहीं बल्कि उधार पर आए थे।
सीमेंट खरीदने का इंतजार दो साल तक चला
क्योंकि दादी की बरसी के भोज में चुक गए थे पैसे।
दो साल तक बरसात झेलकर 
जंग खाकर जब दुबले हो गए सरिए
तब सीमेंट खरीदने की रकम जमा हुई।

याद है वो दिन जब नींव पड़ी थी
नीव से कहीं ज्यादा गहरी थी उनकी खुशी 
और उससे भी कहीं गहरी थी कुछ की जलन
कि अब यह भी पक्का मकान ठोकेगा।
सुबह शाम आता मजदूरों का रेला
और साथ आते दो राज मिस्त्री।
एक मिडिल क्लास आदमी कब तक 
उठा पाता राज मिस्त्री का खर्चा।
जल्द ही चुक गई बाबूजी की जमा पूंजी
और हमारा मकान कुर्सी तक ही बन खड़ा रहा।

फिर सालों बाद आया बाबूजी का पे कमीशन
और काई लगी दीवारों पर फिर से
जमने लगी ईंटों की क्यारियां।
इस बार बात छत तक पहुंची 
लेकिन छोटी बुआ का लगन आ गया।
आधे मकान पर एस्बेस्टस डाल बुआ की
शादी हुई और फिर छत की बात टल गई।
जब दरकने लगी एस्बेस्टस की वो छत
और झांकने लगी सूरज की किरणे
फिर किसी ने कहा अब तो छत ढाल लो 
बेटी की शादी क्या ऐसे मकान से करोगे।
दीदी की शादी से पहले छत ढाली गई।
लेकिन प्लास्टर के पैसों से दीदी का गौना हो गया।

नंगी ईंटों की दीवारों के साए में गुजारे हमने 
अगले कई साल ।
इस बीच पिता जी हुए रिटायर,
फिर उनके पीएफ के पैसों से 
चढ़ा नंगी दीवारों पर प्लास्टर
हुई उन दीवारों पर हल्दी रंग की पीली पुताई।
बाबूजी की जिंदगी भर की 
कमाई से बना हमारा घर
लेकिन जब बड़े वाले कमरे में सोने की बारी आई
तो अम्मा बोली कि यह कमरा बहू का होगा।
फिर हुई हमारी शादी और ससुराल से आया
पलंग बिछा कमरे में।

बाबूजी फिर बाहर वाले कमरे में बैठे 
मुझे बुलाया और बोले, मेरे पीएफ के पैसे से 
अब बाहर वाला घर बना ही लेते हैं।
कोई मेहमान आएगा तो क्या कहेगा।
और मैं कुछ कह न सका।
उनके किश्तों में बने मकान की कुछ
किश्तें शायद अब भी बाकी थी।

Tuesday, April 16, 2024

कम है तो दम है

कल सम्राट अशोक जयंती थी और आज मुझे उनके सारनाथ स्तंभ के शीर्ष का आधुनिक रूप भी व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम की उर्वर भूमि की खुदाई के बाद प्राप्त हो गया। 

आप इसे सम्राट अशोक को श्रद्धांजलि भी मान सकते हैं या सामान्य रूप से किसी मौके पर चार चांद लगाना भी कह सकते हैं। वैसे सम्राट अशोक के स्तंभ शीर्ष पर चार शेर थे और मुहावरे में भी चांद चार होते हैं। आधुनिक युग की इस मास्टर पीस में एक चांद और एक शेर कम है। टी ट्वेंटी का ज़माना है जहां 223 रन भी कम पड़ जाते हैं तो चार चांद और चार शेर की क्या बिसात। फिलहाल तो मेरे हृदय के उदगार व्यक्त करने के लिए मेरे शब्द कम पड़ रहे हैं। वैसे चुनाव का समय भी है, सब नेताजी परेशान हैं कि वोट कम पड़ रहे हैं, भीड़ कम आ रही है, गरमी कम नहीं हो रही। प्रशासन परेशान है कि चुनाव का खर्च कम रखना है। वोटर परेशान है कि कम से कम उसको बिजली पानी सड़क मिल जाय लेकिन सड़क पर पानी जमा हुआ कम मिले। कम शब्दों में कहूं तो कम में ही असली सौंदर्य है। कम पानी वाली झील आपको चांदनी रात में नौका विहार का आमंत्रण देती है तो वहीं समंदर रात में भयाक्रांत कर डालता है। यह कम ही है जिसे लेकर विदेशों में प्रेमिकाएं अपने प्रेमियों को कहती हैं कम ऑन बेबी। आरसीबी जैसी टीम का प्रशंसक भी कम ऑन कम ऑन चीखता रहता है। हर डिजिटल इनफ्लुएंसर युट्यूबर यही चाहता है कि उसके हर वीडियो पर भर भर के कमेंट हों। जब से भगवान शिव ने कामदेव को जला डाला है, दुनिया मानो कमदेव ही चला रहे हैं। तभी तो सिंघम चिल्ला चिल्ला कर शिकरे से  कहता है कि मेरे में है दम क्योंकि मेरी जरूरत है कम।

जाने दीजिए, यह वाला वीडियो देखिए। वो कहते हैं ना कि खूबसूरती देखने वालों की आंखों में होती है। अपनी आंखों में खूबसूरती की कोई कमी न रखिए, फिर आपको पता चलेगा कि यह आपके आस पास भी दुनिया कोई कम खूबसूरत थोड़े ना है।

https://www.instagram.com/reel/C5FXFnRIu0F/?igsh=M2llc21manM1NjFl







Sunday, March 24, 2024

चंदे की चांदनी

आसमां में खरबों तारे हैं, अरबों ग्रह हैं , असंख्य उल्का पिंड हैं लेकिन मानव है कि उसको पसंद आता है चंदा। कवियों की कल्पना हो, या मां की लोरी, हर जगह चंदा ही छाया रहता है। चंदा चीज ही ऐसी है, दुनिया के जले हुए दिलों को शीतलता प्रदान करता है। दुनिया भर के प्रेमी जानते हैं कि प्रेयसी को दिल देना काफी नहीं होता। हर प्रेयसी चाहती है कि उसको प्रेमी चंदा लाकर दे। बिना चंदा सच्चा प्यार की कल्पना भी असंभव है। लेकिन चंदे का क्या है कि हमेशा एक सा नहीं मिलता। चंदे की कलाएं ही ऐसी हैं कि चंदा घटता बढ़ता रहता है। कभी बढ़ भी गया तो जलने वाले लोग कहने को आ जाते हैं कि चार दिन की चांदनी। और चंदा ना मिले तो कहते हैं कि आ गई ना अंधेरी रात।

 यह चंदा ही है जो अंधियारी रातों को रोशन कर रोमांटिक बनाता है। चंदा ना मिले तो प्रेमिका अमावस की चुड़ैल लगने लगती है, यही चंदा मिल जाए तो चौदहवीं का चांद हो जैसे गीत गुनगुना उठता है आदमी। आदमी को चाहिए चंदा, चाहे कोई भी पर्व हो , बिना चंदे के अंधेरा है। फिर महापर्व में मिलने वाला तो चंदा तो महा चंदा हुआ ना। चंदा है कि जिसको मिल गया वो वो खर्चा करता है और हम जैसों जिसको चंदा ना मिला, वो बस इसकी चर्चा ही कर सकता है।
मतलब यह कि आपको चंदा मिले या न मिले, कम मिले, ज्यादा मिले, फरक नहीं पड़ता, आप चंदे की जद से दूर नहीं जा सकते । 
जिसको चंदा दिख गया, उसकी हो गई ईद और जिसको चंदा ना मिला उसके रोजे जारी रहते हैं। चंदा मिल गया तो दिल का कमल खिल जाता है , जिसको ना मिला वो हाथ मलता रह जाता है। बस इतना ही कहना था चंदा के बारे में। बाकी आप सबको होली की शुभकामनाएं। 

Monday, March 18, 2024

देहाती फूल और कांटे

फूल और कांटे सुन कर आपको भले अजय देवगण का बाइक वाला स्टंट याद आता हो, या अगर बॉलीवुड की मसाला फिल्मों से इतर वाला आपका टेस्ट है तो शायद निराला की अबे सुन बे गुलाब याद आता हो या शायद गुलाब का कोई पौधा याद आ जाता है, मुझे तो यह वाला पौधा याद याता है। 

ये वाला इसीलिए कि इसका नाम मुझे पता नहीं। कभी पूछा नहीं किसी से, शायद किसी से इसका नाम भी नहीं रखा। नामवर यह पौधा कभी नहीं रहा क्योंकि इसने उसने किसी की मंहगी खाद नहीं ली और न ही किसी ने इसको पाइप से पानी पिलाया। किसी के अचकन की जेब में टांक दिए जाने का खूबसूरत ख्वाब भी इसने कभी नहीं देखा।

हां लेकिन गांव के बच्चों ने इसकी फूल की पंखुड़ी को होठों से लगा कर सीटियां खूब बजाई हैं। वसंत में खिलने वाले फूलों में इसका नाम शुमार तक नहीं किया गया है, शुमार भी तब हो जब नाम रखा जाय। लेकिन हमारे बचपन का अभिन्न अंग रहा है यह पौधा। हमारे गिल्ली डंडा के मैदानों का प्रहरी और हमारा दर्शक। पतंग लूटने के लिए बच्चों को आसमान की तरफ निगाह करके दौड़ते देख कर यही उनके पांवों के नीचे आकर उनको सचेत करता कि बच्चे थोड़ा रास्ता देख कर चलो। बहती पछुआ हवाओं के साथ इसके उड़ते पंखुड़ी लोगों को याद दिलाते कि जीवन में वसंत भले ही चला गया हो, गर्म हवाओं में भी खुशबू और नरमी फैलाने का प्रयास रुकना नहीं चाहिए। और इसके फलों के अंदर छिपे अनगिनत बीज सूख करबाइसे बिखरते मानों दादी मां के आंचल में बंधे पैसे बिखर रहे हों। 

आज बहुत दिनों बाद नजर आए तुम। आगे क्या कहूं, क्या पूछूं। आज तक नाम भी तो नहीं बताया तुमने!!! 

Sunday, March 10, 2024

चरैवेति

शिखर पर पहुंच कर नीचे उतरने का क्रम प्रारंभ होता है। मंजिल पर पहुंच वापसी का सफर शुरू होता है। प्रेमी युगल भी अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचने के बाद एक दूसरे से विरक्ति का भाव महसूस करते हैं। चरम के बाद उन्नयन का मार्ग अवरूद्ध हो जाता है। आवश्यक है कि आप कभी चरम को प्राप्त ना करें, किसी ऊंचाई को अपना शिखर मान लें, कोई आखिरी मंजिल ना बनाए। शिखर को एक पड़ाव समझें, मंजिल को सफर का एक सराय और प्रेम को सतत बना कर क्षणिक चरमोत्कर्ष और विरक्ति के ऊपर ले 
जाएं। पतन वापसी और विरक्ति के भाव को विजित करने का यही मूल मंत्र है।
#चरैवेति

Saturday, February 10, 2024

चेतना की उर्वर भूमि

लेखक क्या है? एक कवि क्या है? एक उर्वर जमीन। जिसपर जैसे ही कोई विचार रूपी बीज गिरता है, वो समाहित कर लेता है उसे अपने आप में। अपने दर्शन की खाद, लेखनी की स्याही वाले जल और अपने अनुभवों के सूर्यातप से उस विचार बीज को अंकुरित, पुष्पित और प्रस्फुटित करता है। फिर वो विचार बीज पहले एक छोटा पौधा और बाद में एक वृक्ष बन जाता है। वैसा वृक्ष जो फिर स्वयं फल उत्पन्न करता है जिसका आस्वाद समस्त जीव कर तृप्त होते हैं। फल सिर्फ जीवों को तृप्त नहीं करते बल्कि अपने अंदर एक और बीज संरक्षित करते हैं और कहीं और किसी और उर्वर भूमि को पाकर पल्लवित हो उठता है, एक नए वृक्ष को जन्म देता है और विचारों के अनवरत प्रवाह का यह चक्र चलता रहता है। 

किसी भी सभ्यता के विचारों के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार का यह चक्र अनवरत चलता रहे इसके लिए आवश्यक है कि लेखकों और कवियों की यह उर्वर धरती बनी रहे। उस उर्वर धरा की नमी भौतिक आवश्यकतों के ताप से सूख ना जाए। उस उर्वर भूमि पर बाजारवाद का मॉल ना खोल दिया जाय जहां गिरे बीज की जगह डस्टबिन होती है। ना ही उस उर्वर भूमि पर समाज की गंदगी गिरा गिरा कर उसे नाला बना दिया जाय कि जहां सिर्फ विषैले पादप उत्पन्न हों।

उस उर्वर भूमि को बचाने की जिम्मेदारी पूरे समाज की तो है ही, यह जिम्मेदारी व्यक्तिगत भी है। अपनी चेतना की समस्त भूमि पर भौतिकता की अट्टालिका खड़ी ना करें। कुछ उर्वर भूमि को बचा कर रखें  बाह्य अतिक्रमण से। फिर देखिए आपके अंदर भी वो संवेदनशीलता की नमी रहेगी और आप भी विचारों के प्रसार की वो कड़ी बनेंगे जिसने पूरी मानवता की प्रगति जोड़ रखी है।