Saturday, November 14, 2020

सांप


देखा एक सांप खड़ा फन फैलाए, पुरानी किवाड़ की जंग लगी सांकल से लिपटा, मानो किवाड़ के पटों को खोलने से रोक रहा हो । दीमक खायी काले काठ की चौखट पर रेंगती वह काली सरसराहट , पसीने से भींग गई पेशानी मेरी भय से निकल गई अधघुटी चीख । तो पाया लेटा हूं अपने मुलायम बिछौने पर । ओह! सांप नहीं सपना था व्यर्थ ही भय से मेरा कांपना था ।
देखा एक सांप जब नहीं था कोई सांप !!

बरामदे पर लटका बल्ब अंधेरे से लड़ता लड़ता आखिर हो गया शहीद , लिए झूलता हुआ टूटा फिलामेंट अब बरामदे पर छाया  है अंधेरा । सोचा बदल दूं बल्ब जैसे ही पहुंचा बरामदे , फिर देखा वही सांप लंबा सी काया श्याम उन्मुक्त । फिर से वही सरसराहट, ऊपर से नीचे गया कांप । फिर किसी ने जलाई टॉर्च और हंसने लगा मुझपर । ओह! सांप नहीं रस्सी थी, जिसे देख मेरी घिग्घी बंधी थी ।
देखा एक सांप जब नहीं था कोई सांप ।

गुजरता जंगलों से मिला एक भील बच्चा , (पांच साल का रहा होगा) अकेला प्रकृति से साकार । मां बाप गए थे जंगलों में, महुआ बीनने लकड़ियां चुनने । अकेला बच्चा अपने मचान पर खड़ा फूस की छत में कुछ ढूंढ रहा था । कुछ बुदबुदाता हुआ हंसता हुआ । पास जाकर देखा तो फिर वही सांप लटकता हुआ । और बच्चा उसके साथ खेलता हुआ । और सांप मानो ऊब गया हो बच्चे की चुहल से । जैसे बूढ़े दादा बचकर निकलना चाहते हों नटखटी पोते से ।




देखा एक सांप हां देखा एक सांप इस बार असली सांप था । वही काली सरसराहट , लेकिन बच्चे को क्यों नहीं दिखा सांप ?
सांप नहीं होने पर भी मुझे दिखता । सांप होने पर भी बच्चे को नहीं दिखता । सांप का यह खेल निराला है । सांप बाहर नहीं मन में बैठा है । वह काली सरसराहट मेरे मन की है, वह सांप का खौफ़ मेरे मन का है। उस नन्हे भील का मन और मेरा मन, एक सांप का ही तो अंतर है।

देखा एक सांप तो एक गुदगुदाया एक थर्राया । मन ही है जिसने दिखाया एक सांप जब नहीं था कोई सांप।

सोचता हूँ अब
क्या वाकई होते हैं सांप
क्योंकि देखा एक सांप

जब नहीं था कोई सांप।

Wednesday, November 11, 2020

मदारी, मुर्गियां और जमूरे

आदमी क्या है? एक अंडा देने वाली मुर्गी। वह भी ऐसी मुर्गी जो पांच साल में एक अंडा दे। अब ऐसी मुर्गी को घर बिठा कर कौन खिलाए। ऐसी मुर्गी के नखरे पांच साल कौन सहे। इसीलिए ऐसी मुर्गी को छोड़ दिया जाता है कि गोबर के ढेर के पास कीड़े बीन कर अपना पेट भरते रहे। हां अंडे देने के मौसम में सबको जमा  जरूर करना होता है, पांच साल में एक बार। 

अब मुर्गियों को जमा करना इतना आसान नहीं। कारण यह कि मुर्गी के भाव बढ़ गए हैं। उसके अंदर का पांच साली अंडा बस निकलने ही वाला है। अब उस अंडे के कारण उसकी चाल बदल गई है। मुर्गी के पास ऐसे लोग आ गए हैं जो उसकी बांग को राग मल्हार बताते हैं। उसकी कलगी को लाल सोने का मुकुट। लोगों की चिंता बस इतनी कि मुर्गी अपना अंडा किसी और की टोकरी में ना डाल दे। 

अब मुर्गियों को जमा करने के लिए तमाशा चाहिए। ऐसा तमाशा जिसको देखने के लिए मुर्गी अपना कीड़े बीनने का काम कुछ वक्त के लिए भूल जाय और तमाशा देखने आ जाए। भूल जाय कि उसके पांच साल उसके क्या उसके दादा परदादा सभी उस गोबर के ढेर से ही कीड़े बीनते हैं। अब मुर्गी बेचारी करे क्या? एक तो बाहर का लुभावना तमाशा और एक उसके अंदर वाला मीठा मीठा दर्द। दोनों मिल कर मुर्गी को ले आते हैं तमाशे घर में।




 मुर्गियों की भीड़ तो आ गई तो फिर तमाशा भी वैसा मजेदार होना चाहिए। अब तमाशे को मजेदार बनाने के लिए कभी मुर्गियों को रुलाना पड़ता है, कभी हंसाना पड़ता है, कभी डराना पड़ता है , तो कभी कभी गुदगुदाना पड़ता है। एक तमाशा हर बार नहीं चलता, नए तमाशे इज़ाद करने होते हैं। तमाशा करने वाला मदारी स्टेज पर खेल दिखाता है और उसके ज़मूरे टोकरी  में अंडे जमा करते हैं। सारे खेल उस मदारी और उसके जमूरों पर टिका है। इस तमाशे के बहुत नाम हैं लेकिन एक नाम है सबसे ज्यादा जंचने वाला। जमुरीयत ।। 

खेल खत्म हो गया है । जमुरे अंडे लेकर जा चुके हैं। मुर्गियां वापस से गोबर के ढेर पर कीड़े बीन रही हैं। उसकी बांग का राग मल्हार कहीं खो गया है और उसकी कलगी के शैदाई ढूंढने से भी नहीं मिलते। अब जमुरियत के लिए पांच साल का लंबा इंतजार। अंडों का मौसम जब आएगा तो जमूरा फिर आएगा, जमुरीयत फिर दिखेगी। 

Monday, November 9, 2020

चश्मे उतारते रहिए ।।

चश्मे होते हैं नजर सुधारने के लिए। किसी चीज़ को साफ देखने के लिए। चश्मे होते हैं आंखों को धूप धूल से बचाने के लिये। लेकिन चश्मे हमेशा नहीं पहन सकते। चश्मे उतार कर बीच बीच में पोंछने चाहिए किसी साफ कपड़े से। शायद बीच बीच में यह भी देखना पड़ता है कि चश्मे का पावर बदल तो नहीं गया, फ्रेम टेढ़ा तो नहीं हो गया। चश्मे को कभी कभी बदलना भी पड़ता है। किस्मत अच्छी हुई तो यह भी हो जाता है कि डॉक्टर कहे कि अब आपको चश्मा पहनने की जरूरत ही नहीं।

चश्मे की तासीर होती है कि दुनिया को अपने रंग का बना देता है।लाल  चश्मा पहन लो तो हर चीज़ लाल दिखने लगती है। हरे चश्मे आपको सावन का अंधा बना देते हैं। इसीलिए बीच बीच में चश्मे उतार कर भी देखने चाहिए। चश्मे की आदत होती है कि आपके दोनों कान पकड़ कर रखते हैं जैसे कोई पुराने मास्टर साहब हों। और हां जब अंधेरा छाया हो तब तो चश्मा उतार ही देना चाहिए। अंधेरे में चश्मे का कोई काम नहीं। चश्मा उजाले का मोहताज है, अंधेरे में आपको कोई चश्मा काम नहीं देता। अंधेरे में बिना गिरे चलने के लिए साथी का हाथ काम आता है, चश्मा नहीं। अंधेरे में भी धूप चश्मा पहन कर चले तो गिरोगे जरूर। इसीलिए अंधेरे में चश्मा उतारना जरूरी है।

अंधेरे में ही क्यों किसी के नजदीक जाने में भी चश्मा बीच में आ जाता है। जब किसी के नजदीक जाना हो , किसी और की सांसे अपने चेहरे पर महसूस करने वाली नजदीकी चाहिए हो तो भी चश्मा उतार कर परे रखना चाहिए।चश्मा पहन कर बहुत सारे सुखों का आस्वाद करना मुश्किल हो जाता है। 



चश्मा है ही उतारने के लिए। अपने चेहरे पर चश्मे सिलवाए नहीं जाते। सिले हुए चश्मे वाले चेहरे डरावने दिखते हैं दूसरों को और जिसने पहना है उसकी बात ही क्या। अपने चश्मे के कांच की दरार उसको दुनिया की दरार लगने लगती है। गन्दा कांच होता है , गंदी दुनिया दिखने लगती है। धुंधली नजर और खराब चश्मा मिलकर सूरज को भी धुंधला  कर देते हैं। 

जरूरी है कि आप चश्मे उतारते रहें, साफ करते रहें, उसका पावर चेक करते रहें और जरूरत पड़ने पर बदल भी लें। तो आपने अपना चश्मा आखिरी बार कब साफ किया था और कब देखा था इस दुनिया को बिना चश्मे के? कर के देखिए, अच्छा लगेगा। 

Thursday, November 5, 2020

Bihar polls are anything but too middleclass

There is a joke doing rounds on social media that people are talking about USA elections but not Bihar elections because it is too middle class. It is other way round, Bihar Polls are too complicated for everyone to understand.. Please read on..

Assume yourself as a voter in Bihar and you have to decide whom to vote. You have to consider a lot of factors before you decide.

Sample this .. NDA is fighting against UPA.. NDA is led by Nitish Kumar who leads JD(U), which was founded by Nitish and Sharad Yadav, but Sharad Yadav is not with JD(U) anymore. He is in a separate party Loktantrik Janta Dal which is now not part of NDA or UPA. But his daughter is now a candidate from Congress, which is a part of UPA.

NDA in Bihar is different from NDA in Delhi as Chirag Paswan led Loktantrik Janta Party , (which is different from Loktanatrik Janata Dal led by Sharad Yadav) is part of NDA in Delhi but not part of NDA in Bihar but fighting separately. They will again become part of NDA if NDA wins polls and forms the government. Other party JD(u) which is part of NDA in Bihar and shares cabinet posts in Bihar , is part of NDA in center but not part of cabinet.

There is another party called Plurals which is led by a new lady on the block Ms. Pushpam Priya. Before you think her of an independent variable, You shouls know this.. Her father is a JDU leader who supports Nitish Kumar. Just to add to all these variables, we have Laloo Ji’s daughter in law supporting Nitish kumar as CM. She stayed in ex-CM nivas till very recently yet she but didn’t canvas in assembly seat where her estranged husband Tej Pratap is contesting. Her relationship and political affiliation, both are complicated, which one is more complicated that you have to figure out.

Now lets consider UPA also known as Mahaghbandhan, it is led by Rashtriya Janata Dal and its leader Tejaswi Yadav. Last time Mahagathbandhan included JD(u) ( which is a mother party of HAM led by Jiten Ram Manjhi) but this time JDU is part of NDA. HAM party was initially part of NDA, separated from JDU , became apart of Mahagathbandhan, now back to NDA but did not merge with JDU but still supporting Nitish Kumar.

Mahagathbandhan also includes left parties( let us call left parties just to keep it simple), these left parties fought against both UPA and NDA last time but wanted to support UPA later, however they lost as they didn’t get the unofficial support which was promised to them by RJD. Now they are in alliance with RJD. Another party called VIP was with Mahagathbandhan till the date of seat sharing announcement but left in between the press conference and joined NDA.

People are often simplifying when they are saying that it is an election between 15 years of Laloo Rabri rule Vs 15 years of Nitish Rule. This is as far from truth as it can be. Sample this, Nitish was part of Laloo ji’s cabinet initially but broke away to form his own party called Samata Party. So effectively, Laloo-Rabri rule was Laloo-Rabri- Nitsh rule for the first time. Nitish became chiefminister in 2005, but left NDA in 2013 and in 2014, Nitish left chief ministership too. Jiten Ram Manjhi became chief minister replacing him.. He was supported by RJD at that point of time, so it was effectively Manjhi-Tejaswi Rule.. After that Nitish came back as chief minister with support from RJD and Manjhi formed his own party called HAM . This party later joined BJP.. in 2015, Nitish and Laloo joined hands and formed government. Later Nitish and Tajsawi become chief minister and deputy chief minister. Thus it was a Nitish-Tejaswi Rule. In 2017, Nitish again resigned and became chief minister with help from BJP. It between all these there were three instances of Rashtrapati Shashan too.. So its not straight forward 15 Years vs 15 years..

Now let us talk about castes. For some, the most important factor in Bihar politics. People trivialize caste based voting as you belong to caste x , you vote for candidate from caste x. I wish it was as easy as it seems. For rest of India, castes are generally categorized as General, OBC, SC and ST. In Bihar, there are Forwards and Backwards. Within backwards, you have EBC, OBC, Dalits and Maha-dalits. Maha-dalits are Dalits minus Paswans. Paswans generally are said to be represented by Chirag who is born to a Punjabi Brahmin mother.



Laloo ji is a Yadav who opposed the brahmins most, yet he always had a brahmin as his think tank from Raghunath jha, Shivanand Tiwari to Manoj jha. Nitish ji is also an OBC but always had support of brahmins and Rajputs but not Bhumihars . Bhumihars want to have their own leader like Giriraj Singh but often get confuse as Kanhaiya is also a Bhumihar who is opposing Giriraj Singh.

Muslims don’t vote en bloc as it is generally assumed.. There are shershahvadi, surjapuries, sabji-faroshs, Ansaries and so on.. All these all have different political inclinations.

You may think Biharis cast their vote based on castes yet Bihar is ruled by a Kurmi for last one and half decade which form only 2% of total voters. RJD which claims to have a magic of Muslim and Yadav ( forming 35% of total voters) got zero seats in last general polls.

This is just a very watered down description of Bihar political and electoral scenario. Compare that to US polls.. You are white, like Ivanka and hated Hillary, you vote Trump.. For rest, you have Joe Biden.. Actually, Bihar politics is Game of thrones meets House of cards meets Inception meets Race 3. So did someone say too middleclass? Its freaking beyond your grey cells capacities. Take that..

Monday, November 2, 2020

धर्मराज और दुशासन का विमर्श

वैसे तो महाभारत के समय के आदर्शों और नियमों को आज के मूल्यों की कसौटी पर कसना उचित नहीं है |  पर प्रतीकार्थों में ही सही, स्त्री विमर्श का यह नजरिया भी पुरुष प्रधान ही है | द्रौपदी का वस्त्रहरण बदनाम है क्योंकि उस समय उनके पति , पितामह , द्रोण ने अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं किया| स्त्री का वस्तुकरण हुआ  और नीतिज्ञ पुरुष शांत बैठे रहे | मतलब यह कि स्त्री के वस्त्र हरण पर प्रश्न इसीलिए उठे क्योंकि पुरुष ने कुछ नहीं किया | प्रश्न का दायरा फिर नारी की अस्मिता से इतर पुरुष के गर्व और ज्ञान तक सीमित हो जा रहा  है | 

द्रौपदी का वस्तुकरण  सिर्फ हस्तिनापुर की राजसभा में नहीं हुआ , उस दिन भी हुआ जब उसको किसी रोटी की तरह पांच भाइयों में बांटने का निर्णय लिया गया | वस्त्रहरण से उसका वस्तुकरण  पहले उस समय भी हुआ जब उसको दांव पर लगाया  गया। इतना ही क्यों जन्म के समय ही उसका नामकरण द्रौपदी हुआ, यानी द्रुपद की पुत्री।  स्त्री का अपना एक स्वतंत्र नाम तक नहीं, नाम तक के लिए नारी पुरुष पर आश्रित है। व्यर्थ ही दुर्योधन और दुशासन को खल बनाया गया जबकि पूरा समाज और इसी साझा मानसिकता जन्य पाप में शामिल है।




लेकिन समाज हमेशा एक दुर्योधन खोजता है जिसकी जंघा तोड़ कर भीम वीरता का दंभ भर सके, एक दुशासन खोजता है जिसकी छाती का लहू पूरे समाज का पाप धो सके। दुर्योधन के मरने के बाद पूरा समाज अपने आप को धर्मराज समझता है । वहीं धर्मराज जो स्वर्गारोहण प्रसंग में द्रौपदी के मरने के समय उसको यह ज्ञान दे सके कि तुमने सभी पतियों को समान स्नेह नहीं देकर न्याय नहीं किया, इसलिए तुम स्वर्ग नहीं जा सकती और सबसे पहले मृत्यु की अधिकारिणी हो। द्रौपदी ने न्याय नहीं किया!! उसके साथ कौन सा न्याय हुआ था जब उसका बंटवारा किया गया था। उसको दांव पर लगाने वाले और मरते वक़्त भी नीचा दिखाने वाले उस दुर्योधन से कैसे बेहतर हैं जिसने उसके वस्त्र हरण का आदेश दिया।

  प्रश्न यह कि धर्मराज और दुर्योधन को परिभाषित करने का अधिकार स्त्री को कब मिलेगा? कब तक पुरुष यह निर्धारित करेंगे कि एक स्त्री के सम्मान के लिए युद्ध लड़ा जाए या उसके नाक कान काटने का आदेश देकर भी मर्यादा पुरुषोत्तम की उपाधि बना रहा जाय। कौन धर्मराज है और और कौन मर्यादा पुरुषोत्तम, इसका निर्धारण करने में द्रौपदी और शूर्पणखा का विचार लेना आवश्यक है। रही बात द्रौपदी के सम्मान की, माना कि कृपाचार्य और भीष्म राजसभा में चुप रहे, लेकिन पांडव भी उसके सम्मान के खातिर कुरुक्षेत्र नहीं लड़े। उन्हें आधा राज्य मिल गया होता, तो द्रौपदी का अपमान भी भुला दिया जाता। आधा राज्य क्या, पांडव तो पांच गांव पाकर भी सब भूलने को तैयार थे। महाभारत का युद्ध लड़ा गया था सम्पत्ति के लिए, राज्य के लिए । बाद में भले उसको धर्मयुद्ध कहा जाय या द्रौपदी के सम्मान के लिए लड़ा गया नीति युद्ध, यह इतिहास की विजेता पक्ष द्वारा की गई एक सुविधाजनक व्याख्या से ज्यादा कुछ नहीं।

बाक़ी मेरे चचा पाठक अभिजित जी ने क्या खूब लिखा है, दोनों को साथ में पढ़िए और मंथन करिए। नवाबगंज में आपका स्वागत है।।🙏🙏



पाठक अभिजीत की कविता .......✍️

शस्त्र अस्त्र के साथ
जो हो सकते कहीं भी,
रूद्र का अहर्निश ताँडव।
शर्म और वचन के द्वंद
में हाथ बाँधे, बैठे पाँच पाँडव।

शकुनी की चाल में उलझे
सत्य और धर्म का
युद्धिष्ठिर प्रलाप।
कर्ण के तीखे शब्दबाणों से
छलनी मर्यादा और 
और एक कलंकित अभिशाप।

विदुर  हो रहे पत्यक्षदर्शी,
दुर्योधन का अट्टहास।
द्रोण और कृप की शिक्षा का
नीचे गिरता आकाश।
....…..अभिजित........✍️

शासन से बँधे ,गद्दी के रक्षक,
स्वयं और स्वयं की प्रतिज्ञा 
से लड़ता भीष्म प्राण।
और इन सबके बीच होता है 
शासन के 'दू'षित दंभ से
स्त्री का अपमान।
....…..अभिजित........✍️

अंधे धृतराष्ट्र पर पुत्र मोह का
दोष सबने मढ़ा है।
पर प्रश्न व्यापक है बहुत और
सबके लिए बड़ा है।

नारी का वस्तुकरण था यह,
किस धर्म से मिली प्रज्ञा थी?
जब मर्यादाएँ लाँघी जा रही थी
क्यों हाथ बाँधती  प्रतिज्ञा थी?

मर्यादा की सीमा के पार 
वचन तोड़ देने का आदेश क्यों नहीं?
स्त्री के अपमान के साथ
शस्त्र उठा लेने का  संदेश क्यों नहीं?
....…..अभिजित........✍️

भीष्म को नहीं पूछे गए क्यों?
नारी रक्षा से बड़ा धर्म,प्रतिज्ञा कैसे हो गई ?
जिस सभा में स्वयं भीष्म,नारी कैसे रो गई?

द्रोण, कृप, विदुर धृतराष्ट्र भीष्म और पांडव
सबको द्रोपदी के दो करुण नयन ने निहारा था
पर उस व्यथा पर आंखें झुकाए रही थी सभा 
अबला को हर युग में बस भगवान का सहारा था
....…..अभिजित........✍️

युग ने क्या सीखा ? क्या सिखाया गया है?
बाल पकड घसीट द्रोपदी को कई बार लाया गया है।

द्वापर का दरबार हो या आज का  समाज ,
कितनी बार द्रोपदियों का स्वाभिमान तोड़ेगा?
अपनी प्रतिज्ञाओं में पड़ा प्रबुद्ध और शक्तिशाली
क्या हर बार द्रोपदी को भगवान भरोसे छोड़ेगा?




Saturday, October 31, 2020

Are you skilled enough to be a Pakora Seller?

 I find it extremely disturbing when a work or job is demeaned. In Bihar election campaign people are making fun of ' Pakora making' like a job devoid of any dignity. If everyone wants a job but hates an employment, it a dreadful situation. 

Till we start respecting every job with equal respect in terms of status and economic remuneration, this 'Saheb' mentality is going to keep us poor and unemployed. If a shikanji seller, juice seller, home made Chyawanprash seller, can become Coca-Cola, T-Series and Patanjali respectively, why can't we simply stop demeaning a Pakora seller and see the dignity and potential in it. 



Trust me, our 90% educated youth even lack the skills to make a Pakora for saving their lives.

Illiterate and idiot are different words

Illiterate and idiot are different words. Literate doesn't mean wise. In politics, we need wise , smart , moral and visionary people and these virtues are not guaranteed by education, at least not by our education system. Anyone targeting Mr. Tejaswi Yadav for his educational background reeks of elitism and shallowness. If you value educational degrees so much, let me tell you that he is more qualified than the person every calls The Kingmaker. Mr. K. Kamraj, Bharat Ratna, and former chief minister of Tamilnadu, a person who declined to be the PM, dropped out of school at age of 11. And Mr. Rahul Gandhi may be the most qualified congress president post independence. Ask Tejaswi all grilling questions about his vision, plans, and everything, but rejecting him because he is not that educated is not fair. Makers of our constitution were simply the best educated, visionary and patriotic people ever gathered in Lutyen's Delhi. They would have kept education as a criteria to become PM and CM if it was really that important. #BiharElections #DemocracyNotAristocracy



Friday, October 30, 2020

शमस्या स और श की


बिहारी चाहे दुनिया जीत लें, स श और ष का सही उच्चारण करना उनके लिए गौरीशंकर की चोटी ही है। चुनावी यात्रा में जबसे से सैकड़ों न्यूज चैनल और हजारों यूट्यूब चैनल वाले आम लोगों को पकड़ पकड़ कर  माइक उनके चेहरे पर घुसेड़ रहे हैं, सुद्ध बोलने वालों पर शुद्ध बोलने का प्रेसर बढ़ गया है।

यही दवाब है कि तेजस्वी  ' तेजश्वी' हो जाते हैं तो चिराग पासवान भैया चिराग ' पश्वान ' बन गए हैं। नीतीश कुमार ' नीतिसे कुमार ' से लेकर नितीश और नीतिष  तक बुलाए जा रहे हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत आती है सुशील मोदी का नाम लेने में। माइक नहीं हो सामने तो सुसील हैं, कैमरा के सामने शुशील सुषील शुसील क्या बोला जा रहा है, महादेव भी नहीं बता पा रहे। शामाष्या इतनी बढ़ गई है कि शड़क पर बातचीत सुनें या शमाचार पत्रों में पढ़ें , समझ नहीं आता कि स ष श का गठबंधन है ,  मेल हो गया है कि यह शब एक दूषरे के खिलाफ लड़ रहे हैं।

अब ष श वाली समस्या कम नहीं थी कि दिल्ली वाले पत्रकारों के खड़ी बोली सुनकर लोग अपनी भाषा के लिंग प्रयोग को लेकर सजग हो गए हैं। जो ट्रेन हमेशा लेट आता था , उसको ' ट्रेन लेट आती है ' कहना पड़ रहा है। कहा जाता है कि बिहारी सब जगह पुल्लिंग का प्रयोग करते हैं तो इसकी भरपाई के चक्कर में ' मेरा लड़का बंगलौर में पढ़ती है ' हो जा रहा है। ' आपकी काम हो गई का ' बोल कर भाषा बोली और व्याकरण सबका एक मिक्स वेज बन गया है। मैंने कहा की जगह ' हम कहा ' से लेकर 'मैं कहे ' सब बोले जा रहे हैं।



ऐसे ही कंफ्यूजन इतना ज्यादे है कि नीतीश को भाजपा सपोर्ट कर रही है कि नहीं, चिराग एनडीए में हैं कि नहीं, मुकेश सहनी धर्मनिरपेक्ष हैं कि नहीं , पते नय चल रहा है। तेज प्रताप अगर कृष्ण हैं तो कायदे से उनको तो सोलह हजार पत्नियां संभाल लेना चाहिए, एक नहीं संभल रही उनसे। तेजस्वी अगर उनके अर्जुन हैं तो वे तीर धनुष की जगह भीम बनकर सेल्फी वालों को काहे पटक रहे हैं। कोरोना , चुनाव, छठ पूजा और 10 लाख नौकरी  वाला लड़का मार्केट में आ जाने से  कहीं बेटा का दहेज  घट नहीं जाय, वाला चिंता कम था कि व्याकरण की शुद्धता  बनाये रखने का दवाब एक्स्ट्रा उपर से आ गया है। अब इ सब के बारे में सोचें कि स और श के बीच उलझे रहें। कशम से

Tuesday, October 27, 2020

Some Thoughts on Mirzapur 2

Simple solutions that could have solved all problems Mirzapur season 2  is trying to solve.. Also some insights to the the lives of all protagonists to make it bit easier.. If you haven't seen the season and don't want spoilers, you may postpone reading ahead till you watch the season.

A. Sabse pahle to Bauji ke room ka cable connection katwao, animal planet dekh dekh ke animal ban gaye hain..

B. Kaleen bhaiya ko ek Shilajit aur kesar ki bottle dilawao,patanjali wala rahe to badhiya, .. isse Beena bhabhi aur Desh dono atmnirbhar ho jaayenge. Aur nashte mein kaleen bhaiya ko bhi wohi kheer do, jo Bauji khate rahte hain.

C. Jo ilaaz Munna bhaiya ka ho raha hai, wohi ilaaz Guddu ka bhi karwao.. paanch goli kha ke Munna bhaiya pahle episode mein theek ho gaye, aur keval do goli kha ke Guddu bhaiya poore season langda rahe hain..

D. Beena ke Bachche ka DNA karwao.. mujhe to ab maqbool per shak ho raha hai.. bahut ho gaya loyalty ka nautanki..

E. Lala ko kaho ki jo hair dye baalon mein lagate hain, dadhi mein bhi laga lein.. achcha thode lagta hai chitkabra ban ke ghoomna..

F. Golu madam ka bas ek fantasy session Guddu bhaiya ke saath karwa do, phir waisi ulti seedhi fantasy dubara nahin hogi..

G. Senior pandit ka bhi count wala test karwao.. unki bachcon ke ek bhi lakshan unke jaise hain nahin.. lagta to hai ki Guddu pandit senior Tripathi ke hi bete hain.. 
Mirzapur ki gaddi ka saara maamla bhi settle ho jayega.

H. JP Yadav ko kaho ki woh bhi Bangkok jaaker Baba ki tarah ek mahine ka meditation karein.. chhoti si baat ke liye bhai ko bhi marwaya aur khud ki bhi lagwa li..

I. Dadda Tyagi ko Bihari kahna band karo.. Bihar mein koi second hand gaadi nahin kharidta.. infact koi gaadi kharidta hi nahin hai, sabko dahez mein nayi gaadi milti hai..

J. Robin urf Radheshyam ko finance minister banao UP ka.. faltoo ke uska talent barbaad kar rahe hain chhote mote kaam mein.. Robin ka bhi DNA test karwao... Saala Tripathi, Shukla aur Tyagi sabka kaminapan ek hi aadmi mein kaise aaya, pata chalna chahiye..

K. Guddu pandit ko samjhao ki decide karein ki karna kya chahte hain.. Mr. Mirzapur banna chahte the, phir Bahubali banne lag gaye, ab Beena bhabhi ko promise kar diye ki uska beta raja banega.. apne hone wale bachchon ko kaise bhool gaye Bheeshma pitamah ..




L.  Kaise bhi ho, jaise kaleen bhaiya ko last mein bacha liye, waise hi BHO-Wale chacha ko bacha lo.. Agar mar bhi gaye hon, to Kyonki saas bhi kabhi bahoo thi wale Mihir ke style mein wapas se zinda karo.. Bhale aadmi the, aur achcha dance karte the..

M. Aur ek chhota sa doubt poochhna hai sabse.. Bhaiya jab saare log Mirzapur, Ballia, Siwan se hi ho, sab log bhojpuri bolna kaise bhool gaye . Kam se kam ek aadmi ka accent to bhojpuri hona chahiye..


Baaki sab theek hai.. Banao season 3 bhaukaal type ka, season 2 type taany taany fuss mat kar dena..

Tuesday, October 20, 2020

रक्तबीज की कथा के मायने और विमर्श

तस्याहतस्य बहुधा शक्तिशूलादिभिर्भुवि।

पपात यो वै रक्तौघस्तेनासञ्छतशोऽसुराः॥ ~ दुर्गासप्तशती अष्टम अध्याय , रक्त बीज वध

अर्थात शक्ति और शूल आदि से,अनेक बार घायल होने पर,जो उसके शरीर से रक्त की धारा धरती पर गिरी, उससे भी निश्चय ही सैकड़ों असुर उत्पन्न हुए।


दुर्गासप्तशती के आठवें अध्याय में रक्तबीज वध का वर्णन आता है। रक्तबीज जिसके रक्त से दूसरा असुर उत्पन्न हो जाता था। देवी दुर्गा ने महा काली का रूप धारण कर रक्तबीज का संहार किया। दुर्गासप्तशती के आठवें अध्याय में वर्णित यह प्रसंग प्रथम दृष्टया काल्पनिक, और अवास्तविक लगता है। किसी के रक्त की एक बूंद से दूसरा असुर पैदा हो रहा है, युद्ध क्षेत्र में असंख्य असुर पैदा होकर देवी पर समवेत प्रहार कर रहे हैं। और फिर देवी अपने विकराल रूप में अपने मुख का आकार बढ़ा कर रक्तबीज के सारे रक्त का पान कर लेती हैं और रक्तबीज क्षीणकाय होकर मर जाता है।


शब्द शक्ति तीन प्रकार की होती है। अभिधा, लक्षणा और व्यंजना। अभिधा का अर्थ होता है जहां शब्दार्थ और भावार्थ समान हो। 

‌लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्ति वह है जहां शब्द प्रतीक रूप में प्रयुक्त होकर अपने शब्दार्थ से भिन्न भाव प्रकट करते हैं। साहित्य उतना ही उच्च कोटि का माना जाता है जो अपने शिल्प की प्रकृति में लाक्षणिक हो या जिसमें अनेक भावों की व्यंजना हुई हो। अभिधात्मक रचनाओं की प्रासंगिकता और उपयोगिता कम समय तक होती है, लक्षणा एवं व्यंजना शब्दशक्ति वाले काव्य सदियों तक प्रासंगिक और प्रचलन में बने रहते हैं। हमारे पौराणिक कथाएं और मिथकीय कहानियां चूंकि सदियों से प्रासंगिक है , जनचेतना का हिस्सा बने हुए हैं, इसीलिए यह मानना स्वाभाविक है कि हमारे पौराणिक ग्रंथों का कथ्य अभिधात्मक न होकर लाक्षणिक है। तो कहीं  चंद्रकांता संतति की तरह  काल्पनिक और अविश्वनीय लगती इन कहानियों का भावार्थ कुछ और हो सकता है क्या। 


‌रक्तबीज का कथा का भावार्थ कदाचित विचारधारा के संबंध में है। एक व्यक्ति के अनेक प्रतिरूप उत्पन्न होने का अर्थ विचारधारा के प्रसार से है। विचारधारा का प्रसार उर्ध्वाधर दिशा में होता है। कोई एक व्यक्ति जिसके विचारों से उसके अनुगामी प्रभावित होते हैं और विचारधारा का प्रवाह ऊपरी नेतृत्व से मध्यवर्ती और फिर निचले स्तर के नेतृत्व पर होता है। विचारधारा से प्रभावित व्यक्ति स्वयंसेवक बनता है और इसके क्षैतिज विस्तार से संगठन का निर्माण होता है। इस प्रकार किसी भी संगठन को आप एक वृक्ष के रूप में देख सकते हैं।  वृक्ष के अंदर शिराओं में प्रवाहित जल और पोषक तत्व विचारधारा के समान है। नई फूटती कोपलें और टहनियां नए स्वयंसेवक हैं और पूरा वृक्ष एक संगठन है। जब तक वृक्ष  के अंदर शिराओं में जल रूपी विचारधारा प्रवाहित है, पेड़ जीवित है। उसकी कुछ टहनियां कट जाएं या पत्ते गिर भी जाए तो पेड़ जीवित रहता है। लेकिन जिस प्रकार से शिराओं में जल प्रवाह रुक जाने पर पेड़ मर जाता है, विचारधारा के समाप्त या निष्प्रभावी हो जाने पर संगठन मृतप्राय हो जाता है।


राम का साथ देने वाली वानर सेना पर विचार करें। वह कोई वेतनभोगी सैनिकों की सेना नहीं थी, ना ही राम रावण युद्ध के परिणाम से उनको कोई व्यक्तिगत लाभ होना था। फिर भी वे राम के साथ लड़े। गांधी के एक आव्हान पर पूरे देश में आंदोलन खड़े करने वाली जनता भी उस विचारधारा से प्रभावित थी। राजनैतिक दलों को भी उस कसौटी पर कस कर देखें तो आप देखेंगे कि किसी भी राजनैतिक दल के एक संगठन के रूप में सफलता और दीर्घ जीविता उसकी विचारधारा पर निर्भर करती है।


कोई भी संगठन जो क्षणिक स्वार्थों और लघु लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बना है, उन स्वार्थों को पाने के बाद की सफलता के बाद या तो दिशाहीन हो जाता है या असफलता के बाद निराश होकर टूट जाता है। यह विचारधारा ही है, जो संगठन को निरंतर दिशा और लक्ष्य प्रदान करती रहती है और उसका विकास करती रहती है।


इसलिए एक व्यक्ति के मर जाने, कुछ लक्ष्य में असफलता या मिली सफलता के बाद भी विचारधारा के बल पर संगठन चलता रहता है। विचारधारा इतनी सशक्त होती है कि यह संगठन के बिना भी जीवित रहती है। इस्लामिक एस्टेट को ही लें, यह कोई निश्चित संगठन नहीं है, बस एक सशक्त विचारधारा है जो अपने बल पर पूरी दुनिया में अपने लिए स्वयंसेवक उत्पन्न कर लेती है जिसे आप ' लोन वुल्फ अटैक ' के रूप में देखते हैं।  समाजवाद या मार्क्सवाद भले ही संगठन के तौर पर पूरी दुनिया में मृतप्राय हो चुका हो, लेकिन यह इतनी मजबूत विचारधारा है कि हर वैचारिक विमर्श और जीवन दर्शन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। व्यक्ति की हत्या हो सकती है, विचारधारा को समाप्त करना कठिन होता है।



यह एक दोधारी तलवार है, यह रक्तबीज भी बनाती है और स्वतंत्रता आंदोलन भी चलाती है, ' मैं भी अन्ना ' को ट्विटर पर ट्रेंड करा सकती है और पूरे विश्व को शीत युद्ध में धकेल सकती है । फिर भी यह किसी भी संगठन की प्राणवायु है। एक संगठन जिसकी विचारधारा बुरी है, उस संगठन से बेहतर है जिसकी कोई विचारधारा नहीं। रक्तबीज वध प्रसंग सीधे रूप में आपको एक पौराणिक कथा भले लगे, यह  लाक्षणिक रूप में विचारधारा की अवधारणा का एक सरलीकरण है।

Sunday, October 11, 2020

बागीचा अब बस एक सूखता ठूंठ तना है


पहले जितने ही हैं लोग गिन के बहत्तर

लेकिन लगता है जैसे युगों का हो अंतर

सब एक दूसरे से खिंचे खिंचे से हैं

मानो किसी बात पर रूठे रूठे से हैं

ना इंतजार है प्लास्टिक ट्रे वाली चाय का

ना मिलेगा जायका दातून जैसे ब्रेड स्टिक

के साथ वाले सूप का

पहले खाना था मानो गपशप की

मीठी गर्म चाशनी में सना है

अब मानो है सन्नाटे वाली

चुप सी बर्फ का बना है

जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा

अब बस एक सूखता ठूंठ तना है

पहले जितने ही हैं लोग गिन के बहत्तर

पर लोगों के दरम्यान दूरियां कई गुणा है।


नजर नहीं आते अब

सहेज कर रखे गए लिहाफ

 और वो सलेटी लिफाफे में 

झक्क सफेद चादर का जोड़ा

ना मयस्सर है वह 

खुरदरा छोटा सा तौलिया

जिसको देख शायद एक बार 

हर किसी का दिल 

मचल ही जाता था कि 

साथ के चलें अपने घर

लालच से नहीं बल्कि शायद प्यार से

शायद कुछ यादगार अपने 

साथ रखने की चाह से।

लेकिन अब ना कोई देता दुआएं 

चादर समेटने वक़्त

ना चाय नाश्ते की बख्शीश मांगता 

दिखता कोई जना है

जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा

अब बस एक सूखता ठूंठ तना है

पूछा जब उससे कि हुए क्या है तुझे

कहा उसने मैं तो हूं वैसा ही 

तुम्ही कहते हो कि कोरॉना है।



 




छोटे बच्चे जो दौड़ते थे पूरे डब्बे में

मचाते धमा चौकड़ी 

मानो पुरबा बह रही 

हो अरहर के खेतों से

आज बंधे है अपनी अपनी सीटों से

किसी भी दूसरी सीट पर जाना मना है

बगल की सीट पर बैठे बुजुर्ग 

 गोद में दादा दादा कह 

बैठ जाना मना है

चहचहाते पंछी अब ना बैठते डालियों पर

सारे बैठे ऐसे सहम कर

 जैसे कबूतरों ने किसी अदृश्य चील

के पंखों को फड़फड़ाते सुना है

जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा

अब बस एक सूखता ठूंठ तना है

पहले जितने ही हैं लोग गिन के बहत्तर

पर लोगों के दरम्यान दूरियां कई गुणा है।


सोचा सफर खत्म होते ही 

बदलेंगी ये मायूस सूरतें

लपक कर उतरा स्टेशन पर

पर दिखा कि यह सन्नाटा तो 

स्टेशन पर और भी घना है

दिखे वो भी जो उठाते हैं

सारी दुनिया का बोझ 

एक कोने में खड़े दुबके से

जैसे कठोर मास्टर जी ने

होमवर्क ना करने की सजा दी हो


लाल कपड़े पहनने वालों की

अखें भी अब हो गई है लाल

मानो किसी ने उनके बोझिल

कंधों पर डाला बोझा तिगुना है

खो गई वह सामान को गिन कर

मोलभाव करने की वह अदा है

जो भी हो दे देना साहिब

क्योंकि अब बेगारी भी लगती भली

' ऐ कुली ' की आवाज़ सुनना भी हो

गई दूभर ,

 स्टेशन आज है एक सुनसान गली

कैसे कहूं कई महीनों से घर में ठीक से 

खाना तक नहीं बना है

जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा

अब बस एक सूखता ठूंठ तना है

दुनिया का बोझा उठाना था आसान

अब अपनी ज़िन्दगी का वज़न कई गुणा है।


जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा

अब बस एक सूखता ठूंठ तना है

पूछा जब उससे कि हुए क्या है तुझे

कहा उसने मैं तो हूं वैसा ही 

तुम्ही कहते हो कि कोरॉना है।



Saturday, October 3, 2020

तुक्का तो नहीं है आपका अभिमान

तुक्कों पर घमंड करना छोड़िए। गर्व तो उस बात का होना चाहिए जिसके लिये आपने प्रयास किया हो। जो तीर तुक्के से लग जाय, उसके बल पर अपने को गांडीव धारी अर्जुन समझना बेवकूफी है। 

मैं मर्द हूं। अब इसी बात का घमंड करने वाले शायद यह नहीं जानते कि बस क्रोमोसोम में एक वाई का एक्स हो गया होता तो आज आप डोले दिखाने की जगह पानी पूरी वाले से एक्स्ट्रा तीखा और खट्टा पानी मांग रहे होते। और मैं स्त्री हूं, दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज। अगर ऐसा कोई अल्ट्रा फेमिनिस्ट  भाव आपके मन में आ रहा हो तो ध्यान से सुनिए | अगर आपने अपना सेक्स चेंज ऑपरेशन करवा कर अपने आप को स्त्री बनाया है तो आपका गर्व करना कुछ जायज भी है वरना वही एक्स का वाई हो गया होता तो आपका निक नेम अलीशा की जगह आलसी राम भी हो सकता था। फिर  फेसबुक पर आपकी एक  फोटो को हजार लाइक नहीं, बीस  फोटो के एल्बम पर कुल जमा तेरह  लाइक मिलते, जिसमें पांच लाइक आपकी माँ के होते और तीन लाइक  दूर के चाचा जी के, जो हर चीज़ पर लाइक  बटन दबाना अपना अधिकार और कर्त्तव्य दोनों  समझते हैं | । और आप अकेले में गूगल सर्च करते कि हाउ टू इंप्रेस ए गर्ल : एन इडियट्स गाइड।

लड़का लड़की ही क्यों? मैं गोरी हूं, सुन्दर हूं, लम्बा हूं, मेरी आंखें नीली हैं, मैं छह फीट का हूं और वह तीन  फीट का, वगैरह वगैरह। सब तुक्के हैं, महज तुक्के। और तुक्के का क्या है कि हमेशा नहीं लगता। इस तुक्केवाद को छोड़ दें तो कितनी समस्या का समाधान चुटकी में हो जाय। 

यही बात देश, धर्म, जाति, संप्रदाय, क्षेत्र, भाषा सब पर लागू होती है। आपका अपने देश पर गर्व करना वहीं तक जायज है जब तक आप दूसरे देश का सम्मान करें और इस बात तो मान कर चलें कि आपका आपके देश में जन्म सिर्फ एक रैंडम इवेंट  या तुक्का है | आपका जन्म उस देश में भी हो सकता था जिसे आप निकृष्ट और पिछड़ा मानते हैं। फिर क्या उस देश के प्रति आपके वही विचार होते जो आज हैं। 

यह तुक्कावाद की  कसौटी उन तमाम स्थितियों पर मददगार हो सकती है जहां यह निर्धारित करना हो कि आपके विचारों का आधार सुदृढ़ है या नहीं। भाषा को ही लें। आपको अपनी भाषा पर गर्व हो सकता है लेकिन दूसरी भाषा से अपनी भाषा को श्रेष्ठ मानना  महज तुक्केबाजी है। यकीन मानिए कि संसार का हर जीव अपनी भाषा को श्रेष्ठ मानता है। चाहे आपकी भाषा कितनी ही साहित्यिक ही, माधुर्य रस से सराबोर हो, एक वानर के प्रणय निवेदन के लिए किसी काम नहीं आ सकती । अब जो भाषा एक वानर के काम की नहीं, आप उस पर वानर को गर्व करने और उसकी अपनी भाषा  को आपकी  भाषा से कमतर मानने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। यह महज तुक्का है कि आपने उस क्षेत्र में जन्म लिया जहां आपकी भाषा बोली जाती है। अगर आप वानर होते तो आपको अपनी वानर वाली भाषा अच्छी लगती। अपनी भाषा पर गर्व करते समय यह तुक्का याद रख कर आप अनावश्यक गर्व या अन्य भाषा के प्रति अपमान के भाव से बच सकते हैं। 

बाकी बची वह चीजें जो आपने अपनी योग्यता और मेहनत से प्राप्त की है। उस पर गर्व किया जाय या नहीं। सालों की मेहनत के बाद प्राप्त गुण संपत्ति बहुधा विनम्रता ही लाती है, गर्व नहीं। वाल्मीकि और कालिदास अपने संस्कृत ज्ञान पर गर्वित ना होकर विनम्र होंगे। ना ही अमेज़न के मालिक जेफ बेजोज किसी को अपना बैंक बैलेंस बताते होंगे | अल्बर्ट आइंस्टाइन शायद ही किसी को कहते होंगे कि जानते नहीं हो कि मैं कितना बड़ा वैज्ञानिक हूं। बाद सोच कर भी हंसी आ जाती है। हां उनकी दिए हुए सिद्धांतों को आधा अधूरा समझने के बाद आपमें गर्व जरूर आ सकता है। 

लब्बोलुआब यह कि आपके अंदर का गर्व या तो एक तुक्कावाद है या आपकी अधूरी सफलता का द्योतक। आवश्यक है कि आप दोनों स्थितियों से बचें। नहीं तो आपकी स्थिति उसी व्यक्ति की तरह  होगी जो लूडो के  पासे  में छह आने पर उसैन बोल्ट की तरह खुश हो रहा हो |  




Thursday, October 1, 2020

गांधी के मूल्यांकन की संकीर्ण दृष्टिगत अपंगता

1857 की क्रांति के बाद अंग्रेज़ एक बात समझ गए कि एक एकत्रित हिंदुस्तान पर शासन करने के कहीं आसान होगा एक टूटे और बिखरे हिंदुस्तान पर शासन करना। 1857 की क्रांति में एक तरफ जहां रानी लक्ष्मी बाई थी तो दूसरी तरफ बेगम हज़रत महल। दिल्ली में बख्त खान सेना का नेतृत्व कर रहे थे तो जगदीशपुर में बाबू कुंवर सिंह। बरेली में जहां खान बहादुर रोहिल्ला ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था तो कानपुर में तात्या टोपे ने युद्ध का बिगुल बजा दिया था। हिन्दू मुसलमान की यह एकता का यह प्रदर्शन जहां सिर्फ उत्तर भारत तक सीमित था और वह भी एक  बड़े सामजिक वर्ग से अछूता था,  फिर भी अंग्रेजों को यह याद दिला गया कि भारत में फूट डालो और शासन करो की नीति ही उनको स्थायित्व दे सकती है। 

1857 के बाद सबसे पहले डलहौजी की विस्तारवाद की नीति पर पूर्णविराम लगाया गया ताकि साझा असंतोष के नाम पर अंग्रेज़ भारतीयों के साझा शत्रु ना बनें। उन्होंने इसकी व्यवस्था की कि भारतीय समाज को हमेशा उनका शत्रु अपने समाज में दिखे ना कि ब्रिटिश सरकार के रूप में। 

उनकी इस साजिश के पहले शिकार बने सर सैय्यद अहमद खान। अंग्रेजों ने सर सैयद अहमद खान के जरिए मुसलमानों की यह अहसास दिलाया कि उनका हित अंग्रेजों के साथ है ना कि भारतीय जनता के साथ जहां हिन्दू बहुसंख्यक हैं। इसी का परिणाम आपको कांग्रेस के स्थापना में दिखता है जहां एक अंग्रेज़ ए ओ ह्युम कांग्रेस की संस्थापक बनते हैं तो दूसरी तरफ सर सैय्यद अहमद खान  मोहमडन  एसोसिएशन और 1888 में कांग्रेस के समानांतर यूनाइटेड इंडियन पट्रियोटिक एसोसिएशन की स्थापना करते हैं |   सर सैय्यद अहमद खान ने मुसलमानों को यह विश्वास दिलाया कि कांग्रेस हिन्दुओं की संस्था है और मुसलमानों को उससे दूर रहना चाहिए। सोचिए एक अंग्रेज़ कांग्रेस की स्थापना करवाता है और दूसरी ओर अंग्रेज़ सरकार यह प्रचारित करती है कि यह हिन्दुओं की संस्था है। कांग्रेस की स्थापना के बीस साल बाद  1905 में अंग्रेजों की ही वरदहस्त के साथ मुस्लिम लीग की स्थापना होती है। सांप्रदायिक आधार पर बंगाल का बंटवारा कर दिया जाता है और बंगाल जो राष्ट्रवाद का सबसे उभरता गढ़ था, उसे मुस्लिम बंगाल और हिन्दू बंगाल में तोड़ दिया जाता है। आगे  1909 के मार्ले मिंटो सुधार के तहत मुसलमानों को पृथक निर्वाचन तक दे दिया जाता है।

1920 के असहयोग आंदोलन में गांधी जी ने खिलाफत आंदोलन को असहयोग आंदोलन से जोड़ कर अंग्रेजों के इस विभाजनकारी  नीति के विरूद्ध एक मजबूत मोर्चा तैयार किया। असहयोग आंदोलन के बाद अंग्रेजों को लगा कि मुसलमानों को पृथक करना ही काफी नहीं है, हिन्दुओं को भी कांग्रेस और राष्ट्रीय आंदोलन के पृथक करना आवश्यक है । कांग्रेस के ही नेता रह चुके श्री  केशव बलिराम हेडगेवार के नेतृत्व में 1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मानो अंग्रेजों  को मुंहमांगी चीज दे दी। अब मुस्लिम राष्ट्रवाद का झंडा उठाने वाली एक मुस्लिम लीग थी, हिन्दू राष्ट्र के लिए प्रयासरत आरएसएस थी और एक कांग्रेस का राष्ट्रवाद था।

अंग्रेजों का मन इतने से भी नहीं भरा। उनको तो सोने की चिड़िया पर अपना शासन और भी पक्का करना था। 1932 में  दलितों और तथाकथित नीची जातियों को पृथक निर्वाचन क्षेत्र देने की बात ब्रिटिश प्रधानमंत्री  रामसे मैक्डोनल्ड ने की। इस ही मैक्डोनल्ड अवॉर्ड या सांप्रदायिक अवॉर्ड कहा जाता है।

इसके तहत  व्यवस्था थी कि मुस्लिमों की तरह दलित भी अपने प्रतिनिधि अलग चुनेंगे और वह हिन्दू नहीं माने जाएंगे। इसके खिलाफ गांधी जिन आमरण अनशन शुरू किया और इस बिल को वापस लेने की मांग की। गांधी जी ने 1932 में पुणे के यरवदा जेल में अम्बेडकर जी के साथ पूना समझौता किया और दलितों के नाम पर समाज के एक और विभाजन को रोका। 

अब हमारे हिन्दू भाई जो अपने आप को बहुसंख्यक होने का दंभ भरते हैं और हिन्दू राष्ट्र बनाने का सपना देखते हैं, अगर गांधी जी ने पूना समझौता नहीं किया होता तो हिन्दू हिन्दुस्तान में ही अल्पसंख्यक हो गए होते । 1947 में एक और दलित राष्ट्र बनता पाकिस्तान की तर्ज पर। तो जब भी अपने बहुसंख्यक होने पर गर्व हो, तो स्मरण कर लेना कि यह संख्या किसके बल पर है।

हमारे दलित भाई जिनके नेता बहुधा गांधी को गाली देने में शान समझते हैं एक बार गांधी जीवन चरित स्वयं से पढ़ लें। ध्यातव्य है कि यहां स्वयं से पढ़ने की बात की गई है, दुराग्रह और पूर्वाग्रह से दूर होकर, ना कि किसी नेताजी के भाषणों के आधार पर गांधी के मूल्यांकन करने की। आजकल के नेता बहुत हुआ तो दलित घरों में फाइवस्टार का खाना मंगवा कर खा लेते हैं। गांधी जी ने दलितों के साथ मैला उठाने का कार्य किया लगभग पूरे 30 के दशक के दौरान। दलित उद्धार में गाँधी जी का योगदान आप  इस रूप में देख सकते हैं कि अनुच्छेद 17 के तहत संविधानिक स्तर पर छूआछूत का अंत किया गया | 




और हमारे मुसलमान भाई, जिनको लगता है कि गांधी हिन्दुओं के नेता थे, गांधी जी की भूमिका दंगों के दौरान देख लें। हां वह आपके बीच टोपी पहन कर इफ्तार करने नहीं जाते थे और ना ही आपके उलेमा से मिलकर आपके वोट की मांग करते थे। इसीलिए शायद आपको वह मुसलमानों के हितैषी ना लगे, लेकिन विभाजन के दुख से उन्होंने स्वतंत्रता के उल्लास मनाने से इंकार कर दिया और अगस्त 1947 में नोआखली की दंगा पीड़ित गलियों की खाक छान रहे थे।  अगर गाँधी हिन्दुओं के नेता होते तो जिन्ना की तरह हिन्दुओं  से डायरेक्ट एक्शन की अपील पर आपका क्या होता बस सोच कर देख लें | 

गांधी जैसे व्यक्तित्व हजारों वर्षों में एक बार आते हैं। दुर्भाग्य से हमारे समाज के कपाल पर उनकी हत्या का कलंक है जो शायद ही कभी मिटे। उस कलंक ने विश्व में हमें वही स्थान दिया है जो एक पितृहंता को हम  अपने समाज में देते हैं। गांधी की हत्या बंदूक  से नहीं हुई, उनकी हत्या हुई उस संकीर्णता के कारण जो भारत को सम्पूर्ण रूप में ना देख कर हिन्दू, मुस्लिम और दलित भारत के रूप में देखता है। यह हमारी वैचारिक अपंगता है कि हम गांधी दर्शन और विचार को अभी भी आत्मसात करने में विफल रहे हैं। इस अपंगता से सबको शीघ्र मुक्ति मिले, यही कामना है।

बापू के जन्मदिवस पर उनको शत शत नमन।