What I think? I will let you know here.. Listen to the voices from my heart
Saturday, November 14, 2020
सांप
Wednesday, November 11, 2020
मदारी, मुर्गियां और जमूरे
Monday, November 9, 2020
चश्मे उतारते रहिए ।।
Thursday, November 5, 2020
Bihar polls are anything but too middleclass
Monday, November 2, 2020
धर्मराज और दुशासन का विमर्श
Saturday, October 31, 2020
Are you skilled enough to be a Pakora Seller?
I find it extremely disturbing when a work or job is demeaned. In Bihar election campaign people are making fun of ' Pakora making' like a job devoid of any dignity. If everyone wants a job but hates an employment, it a dreadful situation.
Till we start respecting every job with equal respect in terms of status and economic remuneration, this 'Saheb' mentality is going to keep us poor and unemployed. If a shikanji seller, juice seller, home made Chyawanprash seller, can become Coca-Cola, T-Series and Patanjali respectively, why can't we simply stop demeaning a Pakora seller and see the dignity and potential in it.
Trust me, our 90% educated youth even lack the skills to make a Pakora for saving their lives.
Illiterate and idiot are different words
Illiterate and idiot are different words. Literate doesn't mean wise. In politics, we need wise , smart , moral and visionary people and these virtues are not guaranteed by education, at least not by our education system. Anyone targeting Mr. Tejaswi Yadav for his educational background reeks of elitism and shallowness. If you value educational degrees so much, let me tell you that he is more qualified than the person every calls The Kingmaker. Mr. K. Kamraj, Bharat Ratna, and former chief minister of Tamilnadu, a person who declined to be the PM, dropped out of school at age of 11. And Mr. Rahul Gandhi may be the most qualified congress president post independence. Ask Tejaswi all grilling questions about his vision, plans, and everything, but rejecting him because he is not that educated is not fair. Makers of our constitution were simply the best educated, visionary and patriotic people ever gathered in Lutyen's Delhi. They would have kept education as a criteria to become PM and CM if it was really that important. #BiharElections #DemocracyNotAristocracy
Friday, October 30, 2020
शमस्या स और श की
Tuesday, October 27, 2020
Some Thoughts on Mirzapur 2
Tuesday, October 20, 2020
रक्तबीज की कथा के मायने और विमर्श
तस्याहतस्य बहुधा शक्तिशूलादिभिर्भुवि।
पपात यो वै रक्तौघस्तेनासञ्छतशोऽसुराः॥ ~ दुर्गासप्तशती अष्टम अध्याय , रक्त बीज वध
अर्थात शक्ति और शूल आदि से,अनेक बार घायल होने पर,जो उसके शरीर से रक्त की धारा धरती पर गिरी, उससे भी निश्चय ही सैकड़ों असुर उत्पन्न हुए।
दुर्गासप्तशती के आठवें अध्याय में रक्तबीज वध का वर्णन आता है। रक्तबीज जिसके रक्त से दूसरा असुर उत्पन्न हो जाता था। देवी दुर्गा ने महा काली का रूप धारण कर रक्तबीज का संहार किया। दुर्गासप्तशती के आठवें अध्याय में वर्णित यह प्रसंग प्रथम दृष्टया काल्पनिक, और अवास्तविक लगता है। किसी के रक्त की एक बूंद से दूसरा असुर पैदा हो रहा है, युद्ध क्षेत्र में असंख्य असुर पैदा होकर देवी पर समवेत प्रहार कर रहे हैं। और फिर देवी अपने विकराल रूप में अपने मुख का आकार बढ़ा कर रक्तबीज के सारे रक्त का पान कर लेती हैं और रक्तबीज क्षीणकाय होकर मर जाता है।
शब्द शक्ति तीन प्रकार की होती है। अभिधा, लक्षणा और व्यंजना। अभिधा का अर्थ होता है जहां शब्दार्थ और भावार्थ समान हो।
लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्ति वह है जहां शब्द प्रतीक रूप में प्रयुक्त होकर अपने शब्दार्थ से भिन्न भाव प्रकट करते हैं। साहित्य उतना ही उच्च कोटि का माना जाता है जो अपने शिल्प की प्रकृति में लाक्षणिक हो या जिसमें अनेक भावों की व्यंजना हुई हो। अभिधात्मक रचनाओं की प्रासंगिकता और उपयोगिता कम समय तक होती है, लक्षणा एवं व्यंजना शब्दशक्ति वाले काव्य सदियों तक प्रासंगिक और प्रचलन में बने रहते हैं। हमारे पौराणिक कथाएं और मिथकीय कहानियां चूंकि सदियों से प्रासंगिक है , जनचेतना का हिस्सा बने हुए हैं, इसीलिए यह मानना स्वाभाविक है कि हमारे पौराणिक ग्रंथों का कथ्य अभिधात्मक न होकर लाक्षणिक है। तो कहीं चंद्रकांता संतति की तरह काल्पनिक और अविश्वनीय लगती इन कहानियों का भावार्थ कुछ और हो सकता है क्या।
रक्तबीज का कथा का भावार्थ कदाचित विचारधारा के संबंध में है। एक व्यक्ति के अनेक प्रतिरूप उत्पन्न होने का अर्थ विचारधारा के प्रसार से है। विचारधारा का प्रसार उर्ध्वाधर दिशा में होता है। कोई एक व्यक्ति जिसके विचारों से उसके अनुगामी प्रभावित होते हैं और विचारधारा का प्रवाह ऊपरी नेतृत्व से मध्यवर्ती और फिर निचले स्तर के नेतृत्व पर होता है। विचारधारा से प्रभावित व्यक्ति स्वयंसेवक बनता है और इसके क्षैतिज विस्तार से संगठन का निर्माण होता है। इस प्रकार किसी भी संगठन को आप एक वृक्ष के रूप में देख सकते हैं। वृक्ष के अंदर शिराओं में प्रवाहित जल और पोषक तत्व विचारधारा के समान है। नई फूटती कोपलें और टहनियां नए स्वयंसेवक हैं और पूरा वृक्ष एक संगठन है। जब तक वृक्ष के अंदर शिराओं में जल रूपी विचारधारा प्रवाहित है, पेड़ जीवित है। उसकी कुछ टहनियां कट जाएं या पत्ते गिर भी जाए तो पेड़ जीवित रहता है। लेकिन जिस प्रकार से शिराओं में जल प्रवाह रुक जाने पर पेड़ मर जाता है, विचारधारा के समाप्त या निष्प्रभावी हो जाने पर संगठन मृतप्राय हो जाता है।
राम का साथ देने वाली वानर सेना पर विचार करें। वह कोई वेतनभोगी सैनिकों की सेना नहीं थी, ना ही राम रावण युद्ध के परिणाम से उनको कोई व्यक्तिगत लाभ होना था। फिर भी वे राम के साथ लड़े। गांधी के एक आव्हान पर पूरे देश में आंदोलन खड़े करने वाली जनता भी उस विचारधारा से प्रभावित थी। राजनैतिक दलों को भी उस कसौटी पर कस कर देखें तो आप देखेंगे कि किसी भी राजनैतिक दल के एक संगठन के रूप में सफलता और दीर्घ जीविता उसकी विचारधारा पर निर्भर करती है।
कोई भी संगठन जो क्षणिक स्वार्थों और लघु लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बना है, उन स्वार्थों को पाने के बाद की सफलता के बाद या तो दिशाहीन हो जाता है या असफलता के बाद निराश होकर टूट जाता है। यह विचारधारा ही है, जो संगठन को निरंतर दिशा और लक्ष्य प्रदान करती रहती है और उसका विकास करती रहती है।
इसलिए एक व्यक्ति के मर जाने, कुछ लक्ष्य में असफलता या मिली सफलता के बाद भी विचारधारा के बल पर संगठन चलता रहता है। विचारधारा इतनी सशक्त होती है कि यह संगठन के बिना भी जीवित रहती है। इस्लामिक एस्टेट को ही लें, यह कोई निश्चित संगठन नहीं है, बस एक सशक्त विचारधारा है जो अपने बल पर पूरी दुनिया में अपने लिए स्वयंसेवक उत्पन्न कर लेती है जिसे आप ' लोन वुल्फ अटैक ' के रूप में देखते हैं। समाजवाद या मार्क्सवाद भले ही संगठन के तौर पर पूरी दुनिया में मृतप्राय हो चुका हो, लेकिन यह इतनी मजबूत विचारधारा है कि हर वैचारिक विमर्श और जीवन दर्शन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। व्यक्ति की हत्या हो सकती है, विचारधारा को समाप्त करना कठिन होता है।
यह एक दोधारी तलवार है, यह रक्तबीज भी बनाती है और स्वतंत्रता आंदोलन भी चलाती है, ' मैं भी अन्ना ' को ट्विटर पर ट्रेंड करा सकती है और पूरे विश्व को शीत युद्ध में धकेल सकती है । फिर भी यह किसी भी संगठन की प्राणवायु है। एक संगठन जिसकी विचारधारा बुरी है, उस संगठन से बेहतर है जिसकी कोई विचारधारा नहीं। रक्तबीज वध प्रसंग सीधे रूप में आपको एक पौराणिक कथा भले लगे, यह लाक्षणिक रूप में विचारधारा की अवधारणा का एक सरलीकरण है।
Sunday, October 11, 2020
बागीचा अब बस एक सूखता ठूंठ तना है
पहले जितने ही हैं लोग गिन के बहत्तर
लेकिन लगता है जैसे युगों का हो अंतर
सब एक दूसरे से खिंचे खिंचे से हैं
मानो किसी बात पर रूठे रूठे से हैं
ना इंतजार है प्लास्टिक ट्रे वाली चाय का
ना मिलेगा जायका दातून जैसे ब्रेड स्टिक
के साथ वाले सूप का
पहले खाना था मानो गपशप की
मीठी गर्म चाशनी में सना है
अब मानो है सन्नाटे वाली
चुप सी बर्फ का बना है
जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा
अब बस एक सूखता ठूंठ तना है
पहले जितने ही हैं लोग गिन के बहत्तर
पर लोगों के दरम्यान दूरियां कई गुणा है।
नजर नहीं आते अब
सहेज कर रखे गए लिहाफ
और वो सलेटी लिफाफे में
झक्क सफेद चादर का जोड़ा
ना मयस्सर है वह
खुरदरा छोटा सा तौलिया
जिसको देख शायद एक बार
हर किसी का दिल
मचल ही जाता था कि
साथ के चलें अपने घर
लालच से नहीं बल्कि शायद प्यार से
शायद कुछ यादगार अपने
साथ रखने की चाह से।
लेकिन अब ना कोई देता दुआएं
चादर समेटने वक़्त
ना चाय नाश्ते की बख्शीश मांगता
दिखता कोई जना है
जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा
अब बस एक सूखता ठूंठ तना है
पूछा जब उससे कि हुए क्या है तुझे
कहा उसने मैं तो हूं वैसा ही
तुम्ही कहते हो कि कोरॉना है।
छोटे बच्चे जो दौड़ते थे पूरे डब्बे में
मचाते धमा चौकड़ी
मानो पुरबा बह रही
हो अरहर के खेतों से
आज बंधे है अपनी अपनी सीटों से
किसी भी दूसरी सीट पर जाना मना है
बगल की सीट पर बैठे बुजुर्ग
गोद में दादा दादा कह
बैठ जाना मना है
चहचहाते पंछी अब ना बैठते डालियों पर
सारे बैठे ऐसे सहम कर
जैसे कबूतरों ने किसी अदृश्य चील
के पंखों को फड़फड़ाते सुना है
जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा
अब बस एक सूखता ठूंठ तना है
पहले जितने ही हैं लोग गिन के बहत्तर
पर लोगों के दरम्यान दूरियां कई गुणा है।
सोचा सफर खत्म होते ही
बदलेंगी ये मायूस सूरतें
लपक कर उतरा स्टेशन पर
पर दिखा कि यह सन्नाटा तो
स्टेशन पर और भी घना है
दिखे वो भी जो उठाते हैं
सारी दुनिया का बोझ
एक कोने में खड़े दुबके से
जैसे कठोर मास्टर जी ने
होमवर्क ना करने की सजा दी हो
लाल कपड़े पहनने वालों की
अखें भी अब हो गई है लाल
मानो किसी ने उनके बोझिल
कंधों पर डाला बोझा तिगुना है
खो गई वह सामान को गिन कर
मोलभाव करने की वह अदा है
जो भी हो दे देना साहिब
क्योंकि अब बेगारी भी लगती भली
' ऐ कुली ' की आवाज़ सुनना भी हो
गई दूभर ,
स्टेशन आज है एक सुनसान गली
कैसे कहूं कई महीनों से घर में ठीक से
खाना तक नहीं बना है
जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा
अब बस एक सूखता ठूंठ तना है
दुनिया का बोझा उठाना था आसान
अब अपनी ज़िन्दगी का वज़न कई गुणा है।
जो रेल डब्बा होता था एक बागीचा
अब बस एक सूखता ठूंठ तना है
पूछा जब उससे कि हुए क्या है तुझे
कहा उसने मैं तो हूं वैसा ही
तुम्ही कहते हो कि कोरॉना है।












