Thursday, February 27, 2020

गलती दोनों की है

गलती दोनों की है। नुकसान दोनों का हुआ है। मानता हूं कि तुम्हारा सर फूटा , लेकिन तुम्हारे खून के छीटों से उसकी नई कमीज़ जो खराब हुई उसका क्या। तुम्हारा घाव तो आज कल में ठीक हो जाएगा, शर्ट के दाग़ कभी नहीं जाएंगे। सब झूठ दिखाते हैं सर्फ एक्सेल के विज्ञापन में। दाग़ नहीं जाते। उसके नुकसान का भी सोचो। उसने तुम्हें मारा तो तुमने भी तो पुलिस में जाने की धमकी दी। धमकी देना बुरी बात है ना। यही सिखाया गया है तुम्हें कि तुम दूसरों को धमकी देते फिरो। यह तो सहिष्णुता नहीं हुई। सहिष्णु बनो। अपनी गंगा जमनी तहज़ीब का मान रखो। और हां जिस जिस ने कानून तोड़ा है उन सबको सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। 

अरे  तुम्हारे सर से अभी भी खून बह रहा है। चलो भागो यहां से।  मेरे सोफे का कवर भी खराब कर दिया। निकलो, बाद में आना। अभी मुझे अमन-की-आशा के मुशायरे में जाना है। डार्लिंग अगली बार यह लोग आएं तो कह देना कि मैं घर पर नहीं हूं।

Thursday, February 13, 2020

तुम मानोगे नहीं, खा के ही रहोगे

प्यार वाली फिल्में देखो, प्रेम रस वाली कविता पढ़ो तो वही रोमानी दुनिया दिखती है। प्यार में कुछ ऐसा हो जाता है कि रात आंखों में ही कट जाती है। एक एक पल काटना मुश्किल हो जाता है। आप पूरी दुनिया से कट जाना चाहते हैं, किसी निर्जन टापू पर आप हों और आपका प्यार हो। आप गुनगुनाते रहें। हंसते हंसते कट जाएं रास्ते, जिंदगी यूं ही कटती रहे।

प्यार में कटने और काटने का खेल लगा ही रहता है।  प्यार शब्द को ही देख लीजिए। यार से मिलने के चक्कर में प बेचारा पहले कटता है। अगर ना कटे तो पयार हो जाएगा, प्यार थोड़े ना होगा।

समस्या यह है कि जिनको प्यार हुआ सिर्फ उनका कटे तो समझ में भी आये। किसके चक्कर में किसका कट जाए, कहना मुश्किल है। प्यार हुआ शाहजहां को , हाथ कट गए कारीगरों के। गुस्ताखियां भले ही आंखें करें, कट जाती है बेचारी हाथ वाली नस। इंसान तो इंसान, कुदरत की भी खैर नहीं। हमारे मांझी बाबा के प्यार के चक्कर में बेचारा पहाड़ भी नहीं बचा। कट कर रह गया और लोग ताली पीट रहें हैं कि प्यार हो तो ऐसा। भाई, पहाड़ की क्या गलती थी। पर आपको समझ नहीं आएगा।

कंपनियों ने इस प्यार के चक्कर में पचास तो डे बना रखे हैं।  रोज डे, केक डे, चॉकलेट डे। सारे डे मना के आप की हालत हो जाती है हम दिल दे चुके सनम और तड़प तड़प के इस दिल से आह निकलती रही। और उधर सारे गिफ्ट लेने के बाद अभी भी वही हाल है कि सोचेंगे तुम्हें प्यार करें कि नहीं ।डे डे के चक्कर में पैसे दे दे कर जब आपका बैंक बेलेंस कट कर आधा हो जाए तो साला याद आता है कि हग डे तो अभी बाकी ही है। आप घबरा कर अपनी पतलून चेक करते हैं तो पता चलता है कि हो गया हग डे सेलिब्रेट। पतलून से निकला आपका दुबला पर्स जिसकी मोटाई पहले से भी आधी रह गई है, रोता रहता है कि नहीं अब मुझसे कुछ ना निकालो। रोता भी ऐसे है जैसे किसी की दूसरी किडनी निकाली जा रही हो वह भी बिना बेहोश किये। उसको क्या पता कि प्यार के चक्कर सबका कटता है। प्यार मिलने के लिए जरूरी है अच्छी पर्सनालिटी। और ऐसा है कि पर्सनालिटी शुरू ही होता है पर्स से। नो पर्स नो पर्सनालिटी। 

सारे डे मना कर आप सोचते हो कि शायद कोई नाइट भी आयेगी। शास्त्रों में लिखा है कि डे बाद नाइट आती है। लेकिन यह ऐसा कलयुग है कि 100 में 99 डे ही मनाते रह जाते हैं, उनकी किस्मत में नाइट कभी नहीं आती। 

सारे डे वाले खेल में सालों काटने के बाद फिर लौट कर आप अपने मां बाप के पास जाते हैं। मम्मा पप्पा ।। आपने जीवन दिया है अब जीवनसाथी भी दो।  अब जीवन में कोई आशा नहीं। किस्मत बुरी हुई तो पता चलता है कि आप जहां डे प्लेअर रहे , आपका जीवन साथी धुरंधर डे नाइट प्लेअर रह चुका है।आईपीएल और बिग बैश क्या बांग्लादेश प्रीमियर लीग तक के हर टीम के साथ डे नाइट खेल चुका है। गोवा , अंडमान और फुकेट तो उनका पहले से कंप्लीट है, आपसे आशा है कि यूरोप से नीचे कुछ नहीं। दोनों किडनी तो आपकी पहले ही निकल चुकी और अब जो आपके नाम पर बिल फट रहें हैं उसको देख कर आपका बचा खुचा दिल भी निकल जाता है। ज़ालिम दुनिया फिर भी कहेगी उसने तो प्यार के चक्कर में दिलोजान निछावर कर दिया। अब आप को समझ आता है कि प्यार को दिलोजान देना क्यूं कहते हैं।

और क्या लिखूं? लिखने को सारे जहां की बातें हैं लेकिन उसको लिखने और पढ़ने लगे तो आपका डे बर्बाद हो जाएगा। जाइए डे मनाइए, बस नाइट की आशा मत रखिए। भगवान कृष्ण ने भी गीता में यही कहा था कि डे मनाओ और नाइट की इच्छा मत रखो। यही गीता का सार है। 

और अगर आपको यह वाली फीलिंग आ रही है कि क्या बकवास चल रहा है। मेरी कहानी अलग है, मेरा नहीं कटेगा। सॉरी टू ब्रेक योर बबल बट आपका आलरेडी कट चुका है। द ग्रेटेस्ट  ट्रिक डेविल एवर पुल्ड वाज कन्विंसिंग द वर्ल्ड ही डिड नोट एग्जिस्ट।  लेकिन मुझे पता है आप मानोगे नहीं । जी तो चाहता है कि फिल्म छिछोरे का वह डायलॉग कहूं  जब हीरो हॉस्टल 4 में एडमिशन लेने के लिए बेताब  हो रहा है और क्लर्क कहता है कि तुम मानोगे नहीं, खा के ही रहोगे। ठीक है जाओ, हम इधर ही मिलेंगे। यह कोई संयोग नहीं है कि तुम्हारे प्यार की सबसे बड़ी निशानी ताजमहल और सबसे बड़ा पागलखाना एक ही शहर में है।
 लेकिन दिन ही ऐसा है कि ऐसा कह नहीं सकता। इसलिए हैप्पी वैलेंटाइन्स डे।

Friday, February 7, 2020

body shaming and us

We call our god Lambodar which means one with large belly. Our sage were named Ashtavakra means who were deformed in eight organs. Bhagwan Krishna derives his name from his dark skin and his muse was called Kubja. Demon was called Shoorpnakha means the one with large nails. Our superstar is called Lambu ji. Everyone has a friend nicknamed Chasmis, Motu and Chhotu. Lady were named based on their body odour and called matsya-gandha. We called our tormentors Firangi, a name which was again based on their skin colour. Even good names like mrig-nayni, kamal-nayan, karpur-gauran are based on physical appearance. Mahadevi called her cow Gaura, And Chaintnya Mahaprabhu was called Gaurango. 

Examples are numerous. Point is that we have lived with it and it is a part of us. Either you accept it and stay happy as we have been so far. Or call it body shaming like westerners and keep getting offended. Choice is yours.

Thursday, February 6, 2020

कोरॉना वायरस से बचाव

चीन वाले कोरोना वायरस से बचने के लिए मास्क पहनना जरूरी है। चीन से आने वाले हरेक यात्री पर नजर रखी जा रही है। फिर भी आप मास्क पहने बिना बाहर ना निकलें। थोड़ी सी सावधानी और आप अपना बचाव कर सकते हैं। बस समस्या इतनी है कि बचाव वाले मास्क भी चीन से बन कर आते हैं। 

निष्कर्ष यह कि हनुमान चालीसा का सुबह शाम पाठ करें और अपनी पानी पूरी और खोमचे वाले की पापड़ी चाट वाली डायट बनाए रखें।

Sunday, February 2, 2020

वाराणसी यात्रा वृतांत

यह राजा घाट है, घातक सिनेमा में सनी देओल यहीं से नहा के निकलते हैं। आपने देखी है वो फिल्म? नाविक हरेक घाट के बारे में सही गलत ऐतिहासिक कल्पोक कल्पित कथाएं बड़े चाव से सुना रहा है। यह हरिश्चंद्र घाट है। राजा हरिश्चंद्र  इसी घाट पर चांडाल का काम करते समय अपने मृत पुत्र रोहिताश्व के अंतिम संस्कार के लिए भी अपने आदर्शो से नहीं डिगे। पता नहीं यह कहानी नाविक ने कितने लोगों को आज तक सुनाई होगी लेकिन यह मार्मिक कहानी सुनाते समय उसकी आखों के कोनों पर नमी दिखने लगती है। चलिए संध्या आरती का समय हो रहा है, जल्दी से आपको बाकी घाटों की परिक्रमा करवा देता हूं। दशाश्वमेध से शुरू हुई यह नौका यात्रा मणिकर्णिका तक पहुंचती है। जिस नाविक की आखें हरिश्चंद्र की कहानी सुनाते समय गीली हो गई थी, मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताओ को देख उसपर कोई असर नहीं। वाराणसी ही वह शहर हो सकता है जहां मृत्यु पर शोक नहीं बल्कि मोक्ष प्राप्ति का उल्लास होता है। जीवन समाप्त नहीं होता बल्कि इहलीला के बाद के जीवन का प्रारंभ होता है। मणिकर्णिका पर शिव पार्वती ने स्नान किया था अतः यहां के जल से अंतिम स्नान कर बैकुंठ निश्चित है। आस्था और श्रद्धा के आगे नमस्तक हो हम आगे चले।

दशाश्वमेध धाट हमने सुबह भी देखा था, काशी विश्वनाथ के दर्शनों से पहले इसी घाट पर आये। बाबा विश्वनाथ के दर्शनों से पहले पुष्प और प्रसाद खरीदना आवश्यक हो जाता है। आशा यही कि बाबा भोलेनाथ पुष्प और प्रसाद पा खुश हो जाएं और उनका ध्यान हमारे पापों की गठरी पर ना जाए। भोलेनाथ की काशी में हर तरफ बाबा का ही साम्राज्य है। हर चीज पर बाबा का प्रभाव है , धूनी रमाते साधु हों या गांजा के चिलम से काश लगाते विदेशी या ठंडाई छानते काशीवासी। कभी कभी सच ही लगता है कि काशी बाबा के त्रिशूल पर है, जीवन और दुनिया के साधारण नियम यहां लागू नहीं होते। 

घंटे दो घंटे कतार में खड़े रहे और हर हर महादेव का जयकारा लगता रहा। ललाट पर भभूत लगाए जब बाहर निकले तो भूख तेज़ लगी थी। मां अन्नपूर्णा का आशीर्वाद है कि काशी में कोई भूखा नहीं रहता। बनारस की गलियों में हर तरफ बनारसी जायके की सुगंध आपको बताती है कि अन्नपूर्णा का आशीर्वाद विफल ना हो, इसकी कितनी उन्नत व्यवस्था की गई है। आप आराम से जलपान कर सकते है, समय और मात्रा की कोई पाबंदी नहीं। पूरियां बांटने वाला गिन कर पूरियां नहीं बांटता। जितनी सखुवे के दोने में आ गई सब आपकी। गरमागरम पूरी , आलू की मसाले दार सब्जी और चाशनी में डूबी जलेबी छक कर हम आगे बढ़े।

काशी विश्वनाथ की गलियों में हमें एक दुकान मिली लकड़ी की । कारीगरी देख कर सीना चौड़ा हो गया और दुःख भी हुआ कि प्लास्टिक ने हमारे पर्यावरण को जितना नुकसान पहुंचाया है उससे कहीं अधिक लकड़ी और उसकी कारीगरी को पहुंचाया है। कौन खरीदेगा यह महंगी लकड़ी जब प्लास्टिक कहीं ज्यादा सस्ती है। लेकिन बाबा की नगरी में सब कुछ इतना सीधा और सपाट कैसे हो सकता है। चीज़ों के दाम प्लास्टिक से सस्ते और ऐसी कारीगरी की मोम से भी मुश्किल से हो। यादगार की लिए कुछ चीजें खरीदी यह सोच कर कि अगले बार सामान एक अलग थैला इनके सामानों से ही भरूंगा। इसके बाद गंगा आरती का अप्रतिम दृश्य देखा। आरती की उठती पवित्र अग्नि की लौ और उनको चतुर्दिश घुमाते युवा पंडितों के प्रदीप्त चेहरों को देख विश्वास हुआ कि हमारी सनातन संस्कृति को कोई मिटा नहीं सकता। यह ज्योति अखंड रूप से भारतवर्ष की भूमि को प्रकाशित करती रहेगी और मंत्रोच्चार के बीच उठता यह पवित्र धुआं हमारे मनोमस्तिष्क को सुवासित करता रहेगा।

बच्चे थक रहे थे, इसीलिए संध्या आरती के बाद रात को होटल में लौट गए। होटल  भी बिल्कुल घाट किनारे। टैक्सी कुछ दूर ही रुक गई और अपने  रैन बसेरे तक पहुंचने के लिए हम बनारस की उन मशहूर गलियों से गुज़रे जिनसे भौतिक दुनिया की बड़ी कारें नहीं गुजर सकती। मानो भौतिकवाद की नो एंट्री है बनारस की गलियों में। आपके बड़े ईगो का भी गुजरना मुश्किल है बनारस की गलियों से। जहां गर्व से आपने अपना सर ऊंचा किया और ज़मीन से नज़रें हटाई और औंधे मुंह गिरेंगे फिसल कर सांढ़ के गोबर पर। इसलिए आंखें नीचे किए बनारस की तंग गलियों से हम अपने होटल पहुंचे। 

बनारस की सुबह देखने चटपट जा पहुंचा घाट पर। वहीं राजा घाट जहां पर घातक फिल्म की शूटिंग हुई थी। हनुमान मदिर के बाहर गदा घुमाते बनारस के युवा मिले जो अपनी रोजाना वर्जिश कर रहे थे। घातक फिल्म का काशीनाथ कोई काल्पनिक चरित्र नहीं था, इन युवकों को देख यह विश्वास हो गया। गदा के साथ फोटो लेने का लोभ संवरण ना कर पाया। उसके बाद गंगा में डुबकी लगा कर बाहर निकला तो लगा जैसे मनों बोझ उतर गया हो। वरुणा और असी की जलधारा गंगा के पतितपावन वाले भगीरथ कार्य में उनका सहयोग करती हैं। नाम वाराणसी भी वरुणा और असी से मिलकर ही बना है।

काशी के मानस मंदिर और संकट मोचन मंदिर को सुबह देख कर हम चल पड़े सारनाथ की ओर। भगवान बुद्ध की प्रथम शिक्षा वाली पावन धरती का दर्शन करना आवश्यक था। सारनाथ जाकर देखा तो सैकड़ों तिब्बती, थाई और चीनी नागरिक वहां मौजूद थे। मन में विचार आया कि धर्म प्रसार तो बुद्ध ने भी किया और पूरी दुनिया में किया लेकिन बिना तलवार के और बिना किसी  को लोभ दिये। बुद्ध की 90फीट की आजनुबाहु प्रतिमा और बुद्ध की ध्यानमग्न मुद्रा आपको मंत्रमुग्ध कर देगी। जिसकी प्रतिमा इतनी आकर्षक है वह व्यक्ति वास्तव में कैसा रहा होगा, सोचना भी असंभव है।  चौखंडी और धमेक स्तूप के दर्शनों के बाद हमने स्थानीय बुनकरों की दुकान का रुख किया। 
पत्नी जहां साड़ियों के संसार में मग्न हो गई मैं दुकान के पीछे बने उनकी कार्यशाला में गया। बुनकर चाचा ने मेरे बेटे को प्यार से पास में बिठाया और उसे भी अपने कारीगरी के गुण सिखाए। फणीश्वनाथ रेणु के सिरचन याद आ गए। सामने एक मजदूर नहीं एक कलाकार बैठा था। काम में बाधा पहुंचाने वाले बच्चों से कोई इतनी तन्मयता से कोई सहृदय कलाकार ही बात कर सकता है। फोटो लेने की आवश्यक खानापूर्ति समाप्त होने के बाद चुपके से सिरचन चाचा के हाथ में सौ रुपए का एक नोट थमाया और उन्होंने मना किया। मैंने कहा चाचा कुछ खा लेना। कलाकार ह्रदय ने भावना से पूरित हो आशीर्वाद मुद्रा में हाथ उठा दिए। लगा मानो फिर से काशी में गंगा स्नान हो गया।

कलाकार का ह्रदय भले ही कोमल हो समय हमेशा कठोर होता है। घड़ी बताने लगी कि स्वप्न संसार से निकलने का समय आ गया है। ऑटो में बैठ कर हम वाराणसी स्टेशन पहुंचे और वंदे भारत एक्सप्रेस में बैठ कर आध्यात्मिकता, भावुकता के संसार से आधुनिकता और वैज्ञानिकता के अजूबे की सराहना करने लगे। ट्रेन दिल्ली के लिए खुल चुकी थी कि स्टेशन की दीवार पर एक पेंटिंग दिखी।लिखा था स्मार्ट सिटी वाराणसी: अलौकिक आध्यात्मिक आधुनिक। मानो पूरी यात्रा का सार इन्हीं तीन शब्दों में सिमट आया। वाराणसी से प्रयागराज की यात्रा के बीच चटपट यह वृतांत लिख डाला , कौन जाने दिल्ली पहुंच कर यह सुकून का भाव रहे ना रहे , हृदय प्रसन्नचित मन रहे या ना रहे। 

Thursday, January 16, 2020

तिल संक्रांति की शुभकामना

आप सबको तिल संक्रांति की शुभकामनाएं। तिल का ताड़ बनाने वाले शहरी मीडिया वालों को, शहर की भीड़ में गुमनाम चेहरे बन कर तिल तिल कर जी रही जनता को, गांव में मिले अपने गंवईपन को तिलांजलि दे कर शहर आने वालों को, मेट्रो में तिल भर की जगह ना होने के बावजूद चढ़ने की कोशिश करने वालों को, तिलों की जैसे ज़िन्दगी जिनका तेल निकाल रही है उनको, तिल संक्रांति की शुभकामनाएं। आज आपका दिन है।

कंबल वितरण

गरीबों को कंबल बांटने के लिए सबसे पहले होना चाहिए आपके पास अच्छी क्वालिटी का कैमरा वाला फोन, एक तेज़ इंटरनेट कनेक्शन, मीडिया वालों से अच्छा कॉन्टैक्ट, थोड़ा ग्लिसरीन ( आवश्यकता अनुसार) , एक साफ सुथरा गरीब ताकि इंफेक्शन का खतरा ना हो और एक अच्छा सा मोटिवेशनल वाक्य जो फोटो के साथ सोशल मीडिया पर लिखा जाएगा। कंबल तो आपके कबाड़ में होगा ही। फिर मानवसेवा में देर कैसी? निकल पड़िए, हां बढ़िया वाला मॉइस्ट राएजर लगा के ही निकलिएगा। बहुत ठंड है ना!!

Saturday, January 4, 2020

धर्मनिरपेक्षता के भारतीय संदर्भ में आवश्यकता की पड़ताल

आप उस देश पर धर्मनिरपेक्षता की पश्चिमी विचारधारा थोप रहे हैं जहां विज्ञान के आविष्कार टीवी को अपने प्रसार के लिए रामायण और महाभारत का सहारा लेना पड़ा। वहां धर्मनिरपेक्षता की घुट्टी पिलाई जा रही है जहां सुबह उठ कर व्यायाम करने को भी सूर्य नमस्कार कहा जाता है। वहां धर्मनिरेक्षतावादियों का क्या काम जहां के बच्चे कागज के टुकड़े पर पैर पड़ जाए तो उसे विद्या का अपमान समझ कर अपने सर से लगा लेते हैं। सुबह उठ कर करदर्शन से संध्या पूजा तक हमारा जीवन धर्म से ही चालित है। हम राफेल भी उड़ाते हैं तो उसपर ओम लिख कर और हम वीणा भी बजाते हैं तो सरस्वती वंदना के बाद। नीता अंबानी आईपीएल की ट्रॉफी जीत कर पहले उसे खाटू श्याम को भेंट करती है तो धोनी विश्वकप जीत कर अपने सर का मुंडन कर लेता है। हमारी सेना का हर सैनिक हर हर महादेव का हुंकार कर दुश्मनों पर टूट पड़ता है तो देश का प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार खत्म कर केदारनाथ की गुफा में समाधिस्थ हो जाता है। हमारे आदर्श शासन का नाम राम राज्य है तो हर मर्ज की दवा रामबाण कहलाती है। दो भाईयों में प्रेम हो तो उसे भरत  मिलाप की संज्ञा देते हैं तो गद्दार को विभीषण कहते हैं। दुख हो तो मुंह से या अल्लाह निकलता है और गोली भी लग जाए तो हे राम वाले शब्द ही मुंह से निकलते है। जहां शुरुआत श्रीगणेश कहलाती है और अंत भी राम नाम के एक मात्र सत्य होने की घोषणा के साथ होता है। जहां देश के हर व्यक्ति का नाम किसी भगवान के नाम पर है, उनको धर्मनिरपेक्षता का पश्चिमी मुखौटा शोभा नहीं देता, बनावटी लगता है।

‌वसुधैव कुटंबकम् की अवधारणा वाले किसी को अल्पसंख्यक नहीं मानते बल्कि सबको उसी परमात्मा का एक अंश मानते हैं। धर्म हमारे कण कण में है, धर्म ही हमारा  पक्ष है, हम उससे निरपेक्ष कैसे हो सकते हैं। हमारे धर्म ने हमारी सोच, दर्शन, विचार, अनुसंधान सबका ठोस आधार तैयार किया है। हमारी राजनीति भी उससे परे नहीं हो सकती। महान अशोक का धम्म हो या अक़बर का दीन ए इलाही, हमारी राजनीति का उत्कर्ष भी धर्म के साथ ही हुआ है। धर्मनिपेक्षता की संकल्पना उन राष्ट्रों के लिए बनी थी जिनकी नींव  धर्मयुद्धों में बहे खून से गीली थी। हमारा धर्म हमेशा से ही सबको स्वीकार्य रूप में देखता है । अगर सहिष्णुता का अर्थ है दूसरे को सहना, तो यह विचारधारा अपने आप में भारतीय संदर्भों में नकारात्मक है। शैव वैष्णव शाक्त बौद्ध जैन सिक्ख इन सबने एक दूसरे को सहा नहीं है , स्वीकार कर आत्मसात किया है। पाश्चात्य संकल्पनाओं तो सदैव उत्तम मान लेने की इस प्रवृति का यह असर है कि रामचंद्र गुहा नाम वाले जय श्री राम के उदघोष से डरते हैं और राम को मिथ्या बताते हैं।  धर्म और धर्मनिरपेक्षता को लेकर विवाद करने वाले ना धर्म को समझते हैं और ना धर्मनिरपेक्षता को। पहले धर्म को समझ लें, धर्मनिरपेक्षता के अवशिष्ट होने का प्रमाण अपने आप मिल जाएगा।

Saturday, December 28, 2019

आवरण में छुपा सत्य

बच्चों के रोने की आवाज़ें आ रही थी। भूखे प्यासे बच्चों के करुण क्रंदन का अनहद आलाप एक त्रासद वातावरण बना रहा था। लेकिन उस निर्दयी को उसका क्या फर्क पड़ता!! उस तो आग लगाने की पड़ी थी। जिस कमरे से बच्चों के रोने की आवाज़ आ रही थी, उसी के पास वाले कमरे में उसने माचिस निकाली। आग लगाने ही वाली थी, कि कुछ सहसा याद आया और एक पल के लिए वह रुक गई। कुछ सोच कर पास पड़े एक बड़े से चाकू को उठाया। ना इतने बड़े चाकू की जरूरत नहीं है। चाकू छोटा हो और उसकी धार तेज हो तो काम जल्दी हो जाएगा। बच्चों के रोने के आवाज़ें उसको परेशान कर रही थी। इनका कुछ करना पडेगा, यही सोच कर उसने तेज धार वाला एक चाकू निकाला। हां ये वाला ठीक रहेगा। बच्चों को शांत कराना जरूरी था , उसका बाकी काम आसानी से हो उसके लिए जरूरी था कि बच्चों को शोर बंद हो। उसने माचिस निकाली, आग लगाने से पहले फिर रुकी। तेल भी चाहिए, सिर्फ आग लगाने से क्या होगा? तेल का कनस्तर देखा। हां इतने तेल में हो जाएगा, छोटे छोटे बच्चे ही तो हैं, कितना तेल लगेगा। फिर उसने माचिस निकाली और आग लगा दी। बच्चों का स्वर और भी आर्द्र हो उठा। मम्मी मम्मी की आवाज़ गली में गूंज रही थी। कुछ देर तक यह स्वर गूंजता रहा। फिर शायद बच्चे थक गए। आवाज़ आनी बंद हो गई। बाहर अंधेरा और कोहरा और भी घना हो चुका था। घर के बाहर गली से अब आग दिखनी भी बंद हो चुकी थी। बच्चे शांत हो चुके थे। शायद सुला दिए गए थे। लेकिन यह आग फिर नहीं लगेगी इसकी क्या गारंटी है। यह आग कल फिर लगेगी, शायद किसी और घर में। बच्चों का शोर फिर होगा, आग फिर लगेगी और उनकी आवाज़ बंद करा दी जाएगी। उनको फिर सुला दिया जाएगा।  सवाल यह नहीं है कि आग क्यूं लगाई जा रही है, सवाल यह है कि आप चुप क्यूं है! सवाल यह नहीं है कि बच्चे आवाज़ क्यूं उठा रहे थे, सवाल यह है कि क्या उनकी आवाज़ बंद करने का यह तरीका सही है। सवाल यह नहीं है कि आग क्यूं लगी, सवाल यह है कि आग लगाने वाले वह थे जो घर के ही थे, और बच्चों की रखवाली की जिम्मेदारी उनपर थी। सवाल आपके सरोकारों से है , सवाल आपकी चुप्पी से है, सवाल आपकी चुप्पी वाली नपुंसक तटस्थता से है। सवाल आपसे है।

कैसा लगा उपर का आलेख पढ़ कर? गुस्से में भर गए? कुछ ना कर पाने की विवशता से आत्मग्लानि से भर गए? इस समाज का कुछ नहीं हो सकता यह सोच कर विचारमग्न हो गए? या सड़क पर उतर कर क्रांति करने की सोच रहे हैं? 

वास्तव में ऊपर का प्रसंग सिर्फ इतना है कि बच्चे भूख से रो रहे थे, और मां ने रसोई में जाकर चूल्हा जलाया और खाना बना कर बच्चों को खिलाया। फिर बच्चों का रोना बंद हुआ और फिर नर्म नर्म लिहाफ में वे पेट में मां के हाथ का सुस्वादु खाना और आंखों में ढेर  सारे सपने लेकर सो गए। हां चूल्हा कब सुबह फिर जलेगा, बच्चे फिर रोएंगे और फिर बच्चे खाना खाकर सो जायेंगे।

साहित्य , मीडिया या  कोई भी विचार संप्रेषण निहित लक्ष्यों से परे नहीं है। मासूम से मासूम घटना को ऐसे प्रस्तुत किया जा सकता है मानो प्रलय आ चुका है। और प्रलय बरपा देने वालों को ऐसे प्रस्तुत किया जा सकता है मानो कोई देवदूत हों। AK 47 लहराने वाले गरीब हेडमास्टर के बेटे बना दिए जा सकते हैं, और बच्चों का खाना बनाने वाली मां को जल्लाद बना दिया जा सकता है। कोई क्या कह रहा है यह महत्वपूर्ण है लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है कि वह ऐसा क्यूं कह रहा है, अभी ही क्यूं कह रहा है, और कहने का निहित उद्देश्य क्या है? किसी भी बात पर उद्वेलित होने और उसको ब्रह्मसत्य मान लेने से पहले इतनी पड़ताल तो बनती है। सत्यमेव जयते तो सही है लेकिन सत्य क्या है वह जानना उसकी पूर्व शर्त है। सत्य का अन्वेषण करना होता है, जो इतनी आसानी से सतही तौर पर दिखे कदाचित वह सत्य नहीं है। सत्य कहीं नीचे छुपा है, स्वार्थ के धागों से बुने गए शब्दजाल के भीतर। उसको पाने का प्रयास करें, फिर अपनी विचारधारा बनाएं या बदले। बाकी इन्कलाब जिंदाबाद और फासीवाद हाय हाय के नारे लगाने में मज़ा तो आता है, लेकिन अगर फासीवाद का मतलब भी समझ जाएं तो मज़ा ज्यादा हो जाए। किसी के कहने से फासीवाद नहीं आ जाता और किसी के कहने से रामराज्य नहीं आ जाता। हां मीडिया आपको इसका झूठा अहसास जरूर करवा सकता है। सतर्क रहने में कोई हानि नहीं है।

Friday, December 20, 2019

सरकार को झुकाना है

हां सरकार झुकती है। लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है। जनता चाहे तो बार बड़े तख्त को झुकना पड़ता है। लेकिन सरकार को झुकाने के लिए तर्कपूर्ण वादविवाद होना चाहिए ना कि लोगों को बहला फुसला कर आगजनी कराके। सरकार और जनता को इमोस्नली ब्लैकमेल करके अगर तथाकथित जीत मिल भी गई तो भी आगे चल कर ऐसी शिकस्त मिलेगी जिसको बताना कठिन है। सरकार तो झुक जाएगी, नुकसान किसका होगा?

‌आज से बीस साल पहले भी ऐसा वक़्त आया था। दिसंबर 1999। कंधार में हमारे ic 814को अगवा करके के के जाया गया था। उन्होंने हमारे नागरिकों को बचाने के लिए मसूद अजहर और अन्य आतंकियों को छोड़ने की मांग की। उस समय यही मीडिया थी जिसने  उनके अपहृत नागरिकों के परिवारों को के जाकर 7 रेसकोर्स रोड पर बिठा दिया था। उनके आंसू दिखा दिखा कर ऐसा माहौल बनाया कि सरकार कितनी निर्दय है जो अपने नागरिकों की जान की परवाह नहीं कर रही।  सरकार झुक गई। छोड़ दिया मसूद अजहर को। आगे क्या हुआ? उसी मसूद अजहर ने संसद पर हमला किया, मुंबई को दहला डाला। सरकार नहीं हारी, हार गया देश।



‌ सड़क पर हजार कंकड़ हों, आज जूते पहन कर आराम से चल सकते हैं। लेकिन एक कंकड़ अगर आपके जूते के अंदर चला जाए तो आप एक कदम भी नहीं चल सकते। बाहरी खतरों से कहीं ज्यादा खतरनाक है अंदरूनी कमजोरी। अपनी तात्कालिक जीत आगे चल कर कितनी महती हार सिद्ध होती है, कंधार प्रकरण उसका जीवंत उदाहरण है। सिर्फ मसूद नहीं छूटा, टूट गया यह भरम भी भारत सख्त कदम उठा सकता है और पागल कुत्तों के सामने समर्पण नहीं करता है।

‌एक राष्ट्र की परिभाषा के चार तत्वों में शामिल है जनसंख्या, भूभाग, संप्रभुता और सरकार। पहली ही शर्त है जनसंख्या। संविधान की प्रस्तावना आरंभ ही होती है, हम भारत के लोग से। क्या राष्ट्र को इतना अधिकार नहीं कि वह अपने लोगों की पहचान तक कर सके?  इस आंदोलन के दौरान एसी आवाज़ें उठी है कि हम अपने राज्य में नागरिकता अधिनियम लागू नहीं करेंगे, संयुक्त राष्ट्र से दखलंदाज़ी तक की बात हो चुकी है। यह देश की संप्रभुता पर हमला है। आइडिया ऑफ इंडिया के नाम पर इंडिया को ही तार तार किया जा रहा है। एनआरसी आ गया तो मेरी विधवा दादी का क्या होगा, मेरे जुम्मन चचा की खाला कहां से कागज दिखाएगी? ऐसे तर्क सुन कर 1999 फिर से याद आ जाता है। भाई जो सरकार, जो देश आपको मुफ्त शिक्षा, मुफ्त निवास, मुफ्त उपचार, मुफ्त भोजन दे रही है, उससे इतनी तो मानवता की आशा तो रखो कि उन सभी मानवों का खयाल रखा गया है और रखा जाएगा। 10 लोगों के आंसू दिखा कर पूरी मुंबई को हम पहले ही रुला चुके हैं। पिछली बार तो सिर्फ एक मसूद छोड़ा था, नागरिकता कानून सख्त नहीं बनाया तो इतने मसूद घर घुस आएंगे कि आंसू तक सूख जाएंगे। नागरिकों की पहचान ना कर पाने की अक्षमता को हम अपनी दयालुता और मानवता का नाम नहीं दे सकते।

‌वैसे आप चाहे मुझे निराशावादी कह लें अपनी जनता पर भरोसा मुझे कम ही है। अपना ही खून चाट कर जनता अपना प्यास बुझाने का स्वांग भरती है। नागरिकता कानून तो बहुत बड़ी बात है। हमारे यहां प्याज महंगा हो जाए तो हम सरकार गिरा देते हैं। भाई महाराष्ट्र में इस बार बारिश बहुत ज्यादा हुई, प्याज की फसल औसत से कम हुई। प्याज तो महंगा हो गा ही। हमारे पुरखों ने यथेष्ठ संख्या में कोल्ड स्टोरेज नहीं बनाए जिसमें हम प्याज रख सकें। लेकिन हमें क्या? हमें प्याज चाहिए। चाहे सरकार को जाकर तुर्की के सामने हाथ फैलाना पड़े कि हमें प्याज दे दो। उसी तुर्की के सामने जिसे दुनिया के सामने कश्मीर मुद्दे पर हमारा विरोध करने पर हमने फटकार लगाई थी।

‌ 1965 की लड़ाई के समय देश में अनाज की कमी थी। शास्त्री जी ने देश से एक शाम का खाना नहीं खाने को कहा, तो क्या हमने जाकर उनके कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन किया? अगर हमने उस समय ऐसा किया होता तो सरकार झुक जाती। पक्का झुक जाती और कहीं से मांग कर अनाज भी ले आती। क्या यह जनता की जीत होती या राष्ट्र की हार? विचार करके देखें।

‌संविधान की दुहाई देने से पहले और हाथ में मोमबत्ती लेकर "हम भारत के लोग" का समवेत वाचन करने से पहले "भारत के लोग " बनने का कर्त्तव्य तो निभाएं। घर का लड़का पानी टंकी पर चढ़ कर जिद करे कि मैं तो अपनी बकरी से विवाह करूंगा और अगर मना किया तो कूद कर जान दे दूंगा। और उसके घर वाले मान जाएं, तो जीत लड़के की हुई या नहीं। इस प्रश्न का उत्तर में मन सोच लें और निकल पड़ें सड़कों पर जनतंत्र बचाने और सरकार को झुकाने को।

Thursday, December 12, 2019

जेम्स वाट और सोनागाछी

अठारहवीं शताब्दी का  पांचवा दशक चल रहा था । अलसाई सी दुपहरी में अपनी मां को खाना बनाते देखता एक बालक की कौतूहल भरी दृष्टि चूल्हे पर चढ़ी पतीले पर पड़ी। उबलते हुए पानी के पतीले का ढक्कन बार बार उठता और गिरता था। बालक के मन में एक विचार आया कि यह जलवाष्प क्या इतना शक्तिशाली है कि पतीले के ढक्कन को उठा सकता है। क्या भाप की इस शक्ति का प्रयोग किसी अन्य कार्य के लिए किया जा सकता है? अगर हां तो कैसे।


इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में भी कोलकाता के शोभाबाजार मेट्रो से उतर कर चहलकदमी करके आप पहुंच सकते हैं सोनागाछी । वही सोनागाछी जिस के मकान की खिड़कियों से झांकती आखें आपको बुलाती हैं इशारे करती हैं और बंद दरवाजों के पीछे चंद रुपयों के लिए मानवता तार तार होती रहती हैं। यह चंद्रमुखियों का इलाका है। फर्क बस इतना है कि उनके देवदास दिन में पच्चीस बार बदल सकते हैं और चुन्नी बाबू चंद्रमुखी के साथ सहानुभूति नहीं रखते बल्कि उसकी कमाई का अधिकतर हिस्सा अपनी जेब में रख लेते हैं। इन चंद्रमुखी की कमाई अंधेरे में होती है और उजाले में यह चंद्रमुखी तभी आती है जब उसे अपने अंधेरे कमरे में लौटने के लिए एक और देवदास की तलाश करनी होती है। यह विश्व की शायद सबसे बड़ी देहमंडी है जहां इंसान की इंसानियत की कसक सिक्कों की  खनखनाहट के नीचे दब गई है। क्या कारण है कि जिस कोलकाता शहर को उल्लास का शहर कहा जाता है वहीं पर सिसकियां का स्वर इतना तीव्र है? क्या कारण है कि विद्रूपताओं भरे इस शहर ने छह नोबेल पुरस्कार विजेता दिए हैं? क्या कारण है कि बंगाल पर ही लाल झंडे ने करीब चार दशक का निर्बाध शासन किया? 

 

इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढने के लिए हम वापस चलते है अठारहवीं सदी के उस दुपहरी में  पानी के पतीले के ढक्कन को गिरते उठते देख विस्मित होते बालक के पास। इस बालक का नाम है जेम्स वॉट। बालक जेम्स अपने इस कौतूहल को यूं ही नहीं जाने देता। जलवाष्प की उस शक्ति का दोहन वह बड़े पैमाने पर करना चाहता है।


जेम्स वॉट की यह कोशिश सफल होती है और वह भाप इंजन का निर्माण करता है। यह भाप इंजन प्रथम औद्योगिक क्रांति का आधार बनता है और विश्व में आधुनिकता का प्रादुर्भाव होता है। इस भाप इंजन की बदौलत घर पर आधारित कुटीर उद्योगों का स्थान फैक्ट्रियों ने ले लिया है और अहर्निश धूम्र उगलते इंजनों और उनसे चलने वाले मशीनों को चाहिए कच्चे माल की अनवरत आपूर्ति । साथ ही साथ बने माल की मांग के लिए चाहिए एक बड़ा बाज़ार। 

कच्चे माल के स्रोतों और उनकी फैक्ट्रियों के बने सामानों के बाज़ार के लिए ब्रितानियों का देश अपर्याप्त सिद्ध होता है और उनकी नजर सात समंदर पार भारत पर पड़ती है।


भारत का राजनीतिक नेतृत्व इन सभी बदलावों से बेखबर रीतिकाल के साहित्य के मांसल सौंदर्य का रसास्वादन करने में व्यस्त है। चारण कवियों की चाटुकारी से उब होने पर मन बहलाने के लिए हरम का रुख किया जाता है और हरम से जी भर जाए तो शिकार करने का बंदोबस्त किया जाता है। मुगलिया साम्राज्य नाम भर का रह गया है और उनके सामंतों में एक मुर्शीद कुली खां बंगाल का नवाब है। बंगाल भारत का सबसे समृद्ध प्रांत है लेकिन राजनीतिक रूप से सबसे सुभेद्य। ढाका के कारीगरों द्वारा  बनाई गई रेशमी साड़ी एक अंगूठी से आर पार हो जाती है। बंगाल का नवाब सिरजुद्दौला इससे पहले कि कुछ समझ पाए क्लाइव और जाफर के षडयंत्र का शिकार हो जाता है और अपनी प्रजा के भविष्य को गोरी सरकार के काले मंसूबों के हवाले कर देता है। और गोरों को वह सब मिल जाता है जो उनको , उनकी कंपनी और उनकी ब्रिटेन की फैक्ट्रियों को चाहिए होता है।


अगर जेम्स वॉट के उस पतीले और सिराज की प्लासी में पराजय का संबंध यहां तक आप समझ गए हैं तो आगे की कहानी आसान होगी। ईस्ट इंडिया कम्पनी बंगाल पर स्थायी बंदोबस्त या जमींदारी प्रथा लागू करती है। जिसके तहत किसानों से नकद में लगान वसूला जाने लगा जिसकी न्यनूतम सीमा तो तय थी लेकिन अधिकतम सीमा जमींदार तय करने लगे। आखिर कुल लगान के ग्यारहवें हिस्से पर ही उनका अधिकार था बाकी सारा कंपनी बहादुर को जमा करना होता था। धन कमाने का एक ही मार्ग था अधिकाधिक करों की वसूली। परिणाम यह हुआ कि विश्व का सबसे समृद्ध क्षेत्र दुर्भिक्ष का केंद्र बन गया। बंगाल और अकाल समानार्थी हो गए। 


आशा करता हूं आप अब तक मेरे साथ हैं। अगर हां तो अब हम अपने प्रश्नों के उत्तर के अत्यंत समीप हैं। जेम्स वाट के इंजन से बंगाल का दुर्भिक्ष कैसे जुड़ा है आप समझ चुके हैं। कम्पनी का अत्याचार कारीगरों पर भी हुआ। उनके हस्तकौशल का कोई खरीदार ना रहा , मशीनों के पिस्टन से उनकी नाज़ुक उंगलियां कब तक संघर्ष कर पाती। वे भी किसान पहले बने और भूमिहीन मजदूर बाद में। लेकिन जमींदार का लगान सुरसा के मुख की तरह बड़ा ही होता गया। अपनी फसल और ज़मीन बेचने के बाद भी जब किसान लगान ना भर पाते तो अपनी बेटियों तक को बेचने की नौबत तक आ गई। पेट की आग सारी नैतिकता और आदर्शों को जला देती है और उसकी ताकत के आगे मानवता सर झुका देती है। मानव मूल्यों की बात क्षुधापीडितों के पल्ले नहीं पड़ती। जैसे जैसे दुर्भिक्ष का काल बढ़ता गया, बेची गई बेटियों का बाज़ार बढ़ता गया। वही बाज़ार आज सोनागाछी कहलाता है ।


यही सोनागाछी शरत चन्द्र की चंद्रमुखी का निवास है और देवदास उस जमींदार का लड़का है जिसके हाथ में किसानों के खून से भी गाढ़ा मय का प्याला है और जिसे पीकर वह पारो और चंद्रमुखी के बीच डोलता रहता है। जमींदार ही थे जिनके बच्चे लंदन जाकर पढ़ सकते थे। यही कारण है कि जमींदारों के परिवार से आने वाले राजा राम मोहन राय लंदन जाकर पढ़ सके तो सत्येन्द्र नाथ ठाकुर पहले आईसीएस अधिकारी बन सके। गुरुदेव रवींद्रनाथ भी जमींदार थे इसीलिए उनके पास रवीन्द्र संगीत और गीतांजलि रचने के लिए समय था। यही कारण है कि भारत का पहला नोबेल बंगाल में  ही आया। जो श्रृंखला जेम्स वॉट के इंजन से शुरू हुई उसकी ही कड़ी है कि दरिद्र नारायणों की सेवा करने की आवश्यकता मैडम टेरेसा को पड़ी। युवा टेरेसा के मदर टेरेसा और और फिर संत टेरेसा बनने के कहानी के बीज भी उस अल्साई सी दुपहरी में बोए गए थे जिसकी चर्चा हमने शुरू में की। मेरा विश्वास है कि अब आप यह भी समझ गए होंगे कि पूरे  भारत में बंगाल पर ही वामपन्थ का प्रभाव सर्वाधिक क्यों पड़ा ? गरीब किसानों और शोषित मजदूरों की अस्थियों से बनी खाद पर वामपन्थ की फसल सबसे अच्छी उगती है।


गणित का एक सिद्धांत है जिसे बटर फ़्लाई प्रभाव कहते हैं। यह कहता है कि विश्व के एक कोने में एक तितली के फड़फड़ाने से विश्व के दूसरी तरफ तूफान आ जाता है। भारत और विश्व में आए साम्राज्यवाद की उस सुनामी की जड़ें उस पानी के पतीले में उबलते पानी से सींची गई थी। हर घटना महत्वपूर्ण है और हर घटना का एक कारण है। अगर आप कारण समझते हैं  तो दुनिया को समझना कतिपय सरल हो जाता है।

Saturday, December 7, 2019

आक्रोश का नियंत्रण

भारत विविधतापूर्ण संस्कृति है। यहां की मिट्टी में बुद्ध आए तो अंगुलिमाल भी। पृथ्वीराज हमारे अपने हैं तो जयचंद भी पराया नहीं था। भगवान राम को अगर कौशल्या ने गोद उठाया होगा तो संभव है कि मंथरा ने  भी एक बार ही सही उन्हें लाड़ जरूर किया होगा। इसीलिए भारतीय घटनाओं और पात्रों का मूल्यांकन करते वक़्त इसका ध्यान अवश्य रखें कि मात्रा के परिमाण में विसरण काफी ज्यादा हो सकता है । अपने विचार को रखते वक़्त माध्यमिक प्रवृति और विसरण दोनों के परिमाणों को तौल कर देखें। हैदराबाद की घटना के बाद आपका मूल्यांकन कोई आवश्यक नहीं कि आपके मित्रजनों से मेल खाता हो। कल  अगर घटना से जुड़े नए तथ्य प्रकाश में आ जायें तो अपने विचारों में उनको समाहित करने की जगह बचा कर रखें। इससे ही विचारों में संतुलन और नियंत्रण आता है।
 
हैदराबाद में आरोपियों का एनकाउंटर होना उचित नहीं था पर इसका अर्थ यह नहीं है कि आप आरोपियों को सीधे राजगुरु सुखदेव और भगत सिंह बना कर घटना को देखें। हमारी पुलिस की कार्यशैली में हजारों कमियां हो सकती हैं लेकिन उन्हें जनरल डायर घोषित करने से पहले एक पल का चिंतन आवश्यक है। बलात्कार की भर्त्सना जरूर करें, जम कर करें लेकिन आवेश में आकर पूरे भारत को रेपीस्तान कहना भी उचित नहीं है। समाज में कमियां हैं, उनको दूर करने के लिए जनभागीदारी और सर्ववर्ग का सहयोग लगेगा। हमने सती प्रथा को समाप्त किया है लेकिन उसके लिए राजा राम मोहन राय ने कभी भारतीय समाज को नारी हंता नहीं कहा। अस्पृशयता को हमने जीत लिया है, लेकिन उसके लिए ब्राह्मणों और सामंती प्रतिनिधियों का एनकाउंटर नहीं किया। शनै शनै और नियंत्रित जन आंदोलन ही दीर्घकालिक  और स्थायित्व पूर्ण समाधान दे सकता है। 

हमने इतिहास में पढ़ा है कि मानव की आग की खोज की और मानव विकास का चक्र वहीं से प्रारंभ हुआ। सच कहें तो हमने आग की खोज नहीं की। आग तो प्रकृति में हमेशा से थी। मानव ने खोज की थी सिर्फ उसको नियंत्रण करने की कला का। आग की खोज वस्तुतः उसके नियंत्रण की खोज थी।  नियंत्रित आग ही मानव के विकास का आधार बना। जन आक्रोश भी अग्नि की तरह है। उसकी उपयोगिता तब तक ही है जब तक वह नियंत्रित रहे। 

सबको यह बात समझाना संभव भले ही ना हो, हम स्वयं को तो यह अवश्य समझा सकते हैं। बस आगे अपने आक्रोश को चाहे वह समाज की तरफ हो, या व्यवस्था की तरफ या फिर आपराधिक तत्वों की तरफ, उसके उद्घाटन से पहले सुनिश्चित कर लें कि आपने आक्रोश की अग्नि  को नियंत्रित करने का प्रबंध कर रखा है। आप कार चलाना नहीं सीखते, आप कार को रोकना सीखते हैं। कार की गति का रोमांच तब तक ही है जब तक आपको यह पता है कि कार आपके रोकने से इच्छानुसार रुक जाएगी। अगर नहीं तो
 आपकी   गति की मंजिल अस्पताल या शमशान है, आपका इच्छित गंतव्य नहीं। 

अपने विचारों की अग्नि को नियंत्रण में रखें। जिस प्रकार बिना कार को पूरी तरह नियंत्रण में रखने की कला सीखे बगैर आप वाहन लेकर नेशनल हाईवे पर नहीं निकलते, बिना अपने आक्रोश को नियंत्रित किये, उनका प्रचार क्यूं करने लगते हैं।

Wednesday, October 16, 2019

डायर ने गोलियां नहीं चलाई थीं

13 अप्रैल 1919 को हुआ जलियांवाला बाग हत्याकांड भारत के इतिहास का एक रक्तरंजित अध्याय है। सैकड़ों निःशस्त्र भारतीय बिना किसी पूर्व सूचना के मृत्यु के घाट उतार दिए गए। भारतीय स्वंतत्रता संग्राम के इस अध्याय ने नरमपंथी आंदोलन का पूर्ण पटाक्षेप कर दिया और स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा अलग चरमपंथी और उग्रपंथी दिशा में तय कर दी। जैसा कि समकालीन वर्णन बताते हैं कि भगत सिंह के कोमल मानस पर इसका बहुत स्थायी से प्रभाव पड़ा और " बंदूके बो रहा हूँ" वाला बालक भगत पैदा हुआ। इसका बदला शहीद उधम सिंह ने पंजाब के तत्कालीन गवनर ओ"डायर को मार कर लिया। जनरल डायर को ब्रिटिश सरकार ने बिना किसी सजा के छोड़ दिया यद्यपि कई स्रोतों की माने तो डायर ने आत्महत्या कर अपने जीवन का अंत किया।


कमोबेश देखें तो उपरोक्त विवरण इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाये जा रहे विवरण का सार है। चूंकि हम इस बार इसकी सौवीं सालगिरह मना रहे हैं तो इस अध्याय को एक दूसरे नज़रिये से देखना भी आवश्यक हो जाता है। ब्रिटिश सेना में भारतीयों और अंग्रेजों का अनुपात करीब करीब 4: 1 था। निचले स्तर पर यह अनुपात ज्यादा ही रहा होगा। जैसा कि मैंने फिल्मों में देखा है कि डायर एक जीप में बैठ कर आता है और सैनिक उसके पीछे पैदल मार्च करते हुए बाग में प्रवेश करते हैं। यह अनुमान लगाना सरल है कि पैदल सैनिक या सिपोय भारतीय ही रहे होंगे। सरकारी आलेख बताते हैं कि दायर के साथ कुल 90 सैनिक थे जो सिख, गोरखा, बलोच और राजपूत बटालियन से लिये गए थे। इसका वर्णन नहीं मिलता कि डायर ने खुद बंदूक चलाई। हाँ, उसने फायर का वह क्रूर आदेश जरूर दिया, लेकिन खुद गोली नहीं चलाई। तकनीकी रूप से कहें तो जालियां वाला बाग हत्याकांड के पीछे दिमाग और योजना भले की विदेशी हो, उस योजना को अंजाम भारतीय हाथों ने ही दिया था। कुल 1650 राउंड गोलियां चलाईं गई, और तब तब चलाई गई जब तक गोलियां खत्म ना हो गईं। मरने वालेकी संख्या और भी ज्यादा ही सकती थी लेकिन मशीनगनों से लैस 2 जीप संकरे दरवाजे को पार न कर सके और बाहर ही खड़े रहे। गोलियां चलाने वाले  भारतीय, मरने वाले भारतीय और एक डायर।

डायर का अपराध अक्षम्य है, लेकिन उन भारतीय सैनिकों का क्या? क्या उनके हाथ निर्दोषो के खून से नहीं सने? चलाई गई  1650 राउंड सारी की सारी गोलियाँ भीड़ ही क्यों चली? किसी भारतीय सैनिक के भी मन में नहीं आया कि अपने संगीन का रुख डायर की तरफ कर दे? क्या ग़ुलामी और अंग्रेजों के प्रति वफादारी के मोतियाबिंद ने किसी सैनिक को मरते बच्चों और महिलाओं की तरफ दयादृष्टि दिखाने से रोक दिया। क्या अंग्रेज़ मालिक के आदेश सुन सुन कर उनके कान इतने अभ्यस्त हो चुके थे कि उन्हें निरपराधों की चीख तक न सुनाई पड़ी। अनाधिकृत सूत्र बताते हैं कि डायर उस रात एक भारतीय जमींदार के यहाँ रात के खाने पर आमंत्रित हुआ और उसने भोजन का आनंद पूरे भारतीय आथित्य के साथ लिया।

मानव जीवन भी कुछ ऐसा ही है। हमारी विनाशकारी गतिविधियों के लिए मुख्यतः हम स्वयं जिम्मेदार होते हैं। यह अलग बात है कि हमारी विनाशलीला का डायर कोई बाह्य व्यक्ति, बाहरी परिस्थिति या कोई अन्य कारण हो सकता है। लेकिन वो डायर भी आपको विनाश के लिए आदेश ही दे सकता है, अपने आप पर गोली आप खुद चलाते हो। आवश्यक है की किसी बाहरी डायर को आप अपने आप पर इतना हावी न होने दें कि आपके आत्मविश्लेषण की क्षमता जाती रहे। किसी भी व्यक्ति या परिस्थिति का आप पर इतना असर न हो कि आपका स्वविवेक कुंद पड़ जाए और आप बाह्य कारकों को रोकने के लिए एक गोली भी न चला सकें। याद रखना चाहिये कि भले ही दुनिया आपके डायर को आपके विनाश के लिए उत्तरदायी ठहराए, लेकिन उसका कोई फायदा नहीं। आपके हृदय के एक कोने में  यह टीस हमेशा रहेगी कि स्वविनाश के कार्यवाहक आप स्वयं हैं भले ही उत्प्रेरक बाह्य कारण हों।

किसी विद्वान ने कहा है कि इतिहास से हम यही सीखते हैं कि हम इतिहास से कुछ नहीं सीखते। कदाचित यह सच भी है क्योंकि हर व्यक्ति अपनी कहानी का एक डायर
ढूँढ ही लेता है जिस पर सारी विनाशलीला की जिम्मेदारी मढ़ दी जाती है और अपनी कमजोरियों को एक उत्पीड़ित छवि की मोटी चादर ओढा दी जाती है। आत्मविश्लेषण करें तो शायद निजी जीवन के कई जलियांवाला रोके जा सकते हैं।