What I think? I will let you know here.. Listen to the voices from my heart
Thursday, February 27, 2020
गलती दोनों की है
Thursday, February 13, 2020
तुम मानोगे नहीं, खा के ही रहोगे
Friday, February 7, 2020
body shaming and us
Thursday, February 6, 2020
कोरॉना वायरस से बचाव
Sunday, February 2, 2020
वाराणसी यात्रा वृतांत
Thursday, January 16, 2020
तिल संक्रांति की शुभकामना
कंबल वितरण
Saturday, January 4, 2020
धर्मनिरपेक्षता के भारतीय संदर्भ में आवश्यकता की पड़ताल
Saturday, December 28, 2019
आवरण में छुपा सत्य
Friday, December 20, 2019
सरकार को झुकाना है
हां सरकार झुकती है। लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है। जनता चाहे तो बार बड़े तख्त को झुकना पड़ता है। लेकिन सरकार को झुकाने के लिए तर्कपूर्ण वादविवाद होना चाहिए ना कि लोगों को बहला फुसला कर आगजनी कराके। सरकार और जनता को इमोस्नली ब्लैकमेल करके अगर तथाकथित जीत मिल भी गई तो भी आगे चल कर ऐसी शिकस्त मिलेगी जिसको बताना कठिन है। सरकार तो झुक जाएगी, नुकसान किसका होगा?
आज से बीस साल पहले भी ऐसा वक़्त आया था। दिसंबर 1999। कंधार में हमारे ic 814को अगवा करके के के जाया गया था। उन्होंने हमारे नागरिकों को बचाने के लिए मसूद अजहर और अन्य आतंकियों को छोड़ने की मांग की। उस समय यही मीडिया थी जिसने उनके अपहृत नागरिकों के परिवारों को के जाकर 7 रेसकोर्स रोड पर बिठा दिया था। उनके आंसू दिखा दिखा कर ऐसा माहौल बनाया कि सरकार कितनी निर्दय है जो अपने नागरिकों की जान की परवाह नहीं कर रही। सरकार झुक गई। छोड़ दिया मसूद अजहर को। आगे क्या हुआ? उसी मसूद अजहर ने संसद पर हमला किया, मुंबई को दहला डाला। सरकार नहीं हारी, हार गया देश।
सड़क पर हजार कंकड़ हों, आज जूते पहन कर आराम से चल सकते हैं। लेकिन एक कंकड़ अगर आपके जूते के अंदर चला जाए तो आप एक कदम भी नहीं चल सकते। बाहरी खतरों से कहीं ज्यादा खतरनाक है अंदरूनी कमजोरी। अपनी तात्कालिक जीत आगे चल कर कितनी महती हार सिद्ध होती है, कंधार प्रकरण उसका जीवंत उदाहरण है। सिर्फ मसूद नहीं छूटा, टूट गया यह भरम भी भारत सख्त कदम उठा सकता है और पागल कुत्तों के सामने समर्पण नहीं करता है।
एक राष्ट्र की परिभाषा के चार तत्वों में शामिल है जनसंख्या, भूभाग, संप्रभुता और सरकार। पहली ही शर्त है जनसंख्या। संविधान की प्रस्तावना आरंभ ही होती है, हम भारत के लोग से। क्या राष्ट्र को इतना अधिकार नहीं कि वह अपने लोगों की पहचान तक कर सके? इस आंदोलन के दौरान एसी आवाज़ें उठी है कि हम अपने राज्य में नागरिकता अधिनियम लागू नहीं करेंगे, संयुक्त राष्ट्र से दखलंदाज़ी तक की बात हो चुकी है। यह देश की संप्रभुता पर हमला है। आइडिया ऑफ इंडिया के नाम पर इंडिया को ही तार तार किया जा रहा है। एनआरसी आ गया तो मेरी विधवा दादी का क्या होगा, मेरे जुम्मन चचा की खाला कहां से कागज दिखाएगी? ऐसे तर्क सुन कर 1999 फिर से याद आ जाता है। भाई जो सरकार, जो देश आपको मुफ्त शिक्षा, मुफ्त निवास, मुफ्त उपचार, मुफ्त भोजन दे रही है, उससे इतनी तो मानवता की आशा तो रखो कि उन सभी मानवों का खयाल रखा गया है और रखा जाएगा। 10 लोगों के आंसू दिखा कर पूरी मुंबई को हम पहले ही रुला चुके हैं। पिछली बार तो सिर्फ एक मसूद छोड़ा था, नागरिकता कानून सख्त नहीं बनाया तो इतने मसूद घर घुस आएंगे कि आंसू तक सूख जाएंगे। नागरिकों की पहचान ना कर पाने की अक्षमता को हम अपनी दयालुता और मानवता का नाम नहीं दे सकते।
वैसे आप चाहे मुझे निराशावादी कह लें अपनी जनता पर भरोसा मुझे कम ही है। अपना ही खून चाट कर जनता अपना प्यास बुझाने का स्वांग भरती है। नागरिकता कानून तो बहुत बड़ी बात है। हमारे यहां प्याज महंगा हो जाए तो हम सरकार गिरा देते हैं। भाई महाराष्ट्र में इस बार बारिश बहुत ज्यादा हुई, प्याज की फसल औसत से कम हुई। प्याज तो महंगा हो गा ही। हमारे पुरखों ने यथेष्ठ संख्या में कोल्ड स्टोरेज नहीं बनाए जिसमें हम प्याज रख सकें। लेकिन हमें क्या? हमें प्याज चाहिए। चाहे सरकार को जाकर तुर्की के सामने हाथ फैलाना पड़े कि हमें प्याज दे दो। उसी तुर्की के सामने जिसे दुनिया के सामने कश्मीर मुद्दे पर हमारा विरोध करने पर हमने फटकार लगाई थी।
1965 की लड़ाई के समय देश में अनाज की कमी थी। शास्त्री जी ने देश से एक शाम का खाना नहीं खाने को कहा, तो क्या हमने जाकर उनके कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन किया? अगर हमने उस समय ऐसा किया होता तो सरकार झुक जाती। पक्का झुक जाती और कहीं से मांग कर अनाज भी ले आती। क्या यह जनता की जीत होती या राष्ट्र की हार? विचार करके देखें।
संविधान की दुहाई देने से पहले और हाथ में मोमबत्ती लेकर "हम भारत के लोग" का समवेत वाचन करने से पहले "भारत के लोग " बनने का कर्त्तव्य तो निभाएं। घर का लड़का पानी टंकी पर चढ़ कर जिद करे कि मैं तो अपनी बकरी से विवाह करूंगा और अगर मना किया तो कूद कर जान दे दूंगा। और उसके घर वाले मान जाएं, तो जीत लड़के की हुई या नहीं। इस प्रश्न का उत्तर में मन सोच लें और निकल पड़ें सड़कों पर जनतंत्र बचाने और सरकार को झुकाने को।
Thursday, December 12, 2019
जेम्स वाट और सोनागाछी
अठारहवीं शताब्दी का पांचवा दशक चल रहा था । अलसाई सी दुपहरी में अपनी मां को खाना बनाते देखता एक बालक की कौतूहल भरी दृष्टि चूल्हे पर चढ़ी पतीले पर पड़ी। उबलते हुए पानी के पतीले का ढक्कन बार बार उठता और गिरता था। बालक के मन में एक विचार आया कि यह जलवाष्प क्या इतना शक्तिशाली है कि पतीले के ढक्कन को उठा सकता है। क्या भाप की इस शक्ति का प्रयोग किसी अन्य कार्य के लिए किया जा सकता है? अगर हां तो कैसे।
इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में भी कोलकाता के शोभाबाजार मेट्रो से उतर कर चहलकदमी करके आप पहुंच सकते हैं सोनागाछी । वही सोनागाछी जिस के मकान की खिड़कियों से झांकती आखें आपको बुलाती हैं इशारे करती हैं और बंद दरवाजों के पीछे चंद रुपयों के लिए मानवता तार तार होती रहती हैं। यह चंद्रमुखियों का इलाका है। फर्क बस इतना है कि उनके देवदास दिन में पच्चीस बार बदल सकते हैं और चुन्नी बाबू चंद्रमुखी के साथ सहानुभूति नहीं रखते बल्कि उसकी कमाई का अधिकतर हिस्सा अपनी जेब में रख लेते हैं। इन चंद्रमुखी की कमाई अंधेरे में होती है और उजाले में यह चंद्रमुखी तभी आती है जब उसे अपने अंधेरे कमरे में लौटने के लिए एक और देवदास की तलाश करनी होती है। यह विश्व की शायद सबसे बड़ी देहमंडी है जहां इंसान की इंसानियत की कसक सिक्कों की खनखनाहट के नीचे दब गई है। क्या कारण है कि जिस कोलकाता शहर को उल्लास का शहर कहा जाता है वहीं पर सिसकियां का स्वर इतना तीव्र है? क्या कारण है कि विद्रूपताओं भरे इस शहर ने छह नोबेल पुरस्कार विजेता दिए हैं? क्या कारण है कि बंगाल पर ही लाल झंडे ने करीब चार दशक का निर्बाध शासन किया?
इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढने के लिए हम वापस चलते है अठारहवीं सदी के उस दुपहरी में पानी के पतीले के ढक्कन को गिरते उठते देख विस्मित होते बालक के पास। इस बालक का नाम है जेम्स वॉट। बालक जेम्स अपने इस कौतूहल को यूं ही नहीं जाने देता। जलवाष्प की उस शक्ति का दोहन वह बड़े पैमाने पर करना चाहता है।
जेम्स वॉट की यह कोशिश सफल होती है और वह भाप इंजन का निर्माण करता है। यह भाप इंजन प्रथम औद्योगिक क्रांति का आधार बनता है और विश्व में आधुनिकता का प्रादुर्भाव होता है। इस भाप इंजन की बदौलत घर पर आधारित कुटीर उद्योगों का स्थान फैक्ट्रियों ने ले लिया है और अहर्निश धूम्र उगलते इंजनों और उनसे चलने वाले मशीनों को चाहिए कच्चे माल की अनवरत आपूर्ति । साथ ही साथ बने माल की मांग के लिए चाहिए एक बड़ा बाज़ार।
कच्चे माल के स्रोतों और उनकी फैक्ट्रियों के बने सामानों के बाज़ार के लिए ब्रितानियों का देश अपर्याप्त सिद्ध होता है और उनकी नजर सात समंदर पार भारत पर पड़ती है।
भारत का राजनीतिक नेतृत्व इन सभी बदलावों से बेखबर रीतिकाल के साहित्य के मांसल सौंदर्य का रसास्वादन करने में व्यस्त है। चारण कवियों की चाटुकारी से उब होने पर मन बहलाने के लिए हरम का रुख किया जाता है और हरम से जी भर जाए तो शिकार करने का बंदोबस्त किया जाता है। मुगलिया साम्राज्य नाम भर का रह गया है और उनके सामंतों में एक मुर्शीद कुली खां बंगाल का नवाब है। बंगाल भारत का सबसे समृद्ध प्रांत है लेकिन राजनीतिक रूप से सबसे सुभेद्य। ढाका के कारीगरों द्वारा बनाई गई रेशमी साड़ी एक अंगूठी से आर पार हो जाती है। बंगाल का नवाब सिरजुद्दौला इससे पहले कि कुछ समझ पाए क्लाइव और जाफर के षडयंत्र का शिकार हो जाता है और अपनी प्रजा के भविष्य को गोरी सरकार के काले मंसूबों के हवाले कर देता है। और गोरों को वह सब मिल जाता है जो उनको , उनकी कंपनी और उनकी ब्रिटेन की फैक्ट्रियों को चाहिए होता है।
अगर जेम्स वॉट के उस पतीले और सिराज की प्लासी में पराजय का संबंध यहां तक आप समझ गए हैं तो आगे की कहानी आसान होगी। ईस्ट इंडिया कम्पनी बंगाल पर स्थायी बंदोबस्त या जमींदारी प्रथा लागू करती है। जिसके तहत किसानों से नकद में लगान वसूला जाने लगा जिसकी न्यनूतम सीमा तो तय थी लेकिन अधिकतम सीमा जमींदार तय करने लगे। आखिर कुल लगान के ग्यारहवें हिस्से पर ही उनका अधिकार था बाकी सारा कंपनी बहादुर को जमा करना होता था। धन कमाने का एक ही मार्ग था अधिकाधिक करों की वसूली। परिणाम यह हुआ कि विश्व का सबसे समृद्ध क्षेत्र दुर्भिक्ष का केंद्र बन गया। बंगाल और अकाल समानार्थी हो गए।
आशा करता हूं आप अब तक मेरे साथ हैं। अगर हां तो अब हम अपने प्रश्नों के उत्तर के अत्यंत समीप हैं। जेम्स वाट के इंजन से बंगाल का दुर्भिक्ष कैसे जुड़ा है आप समझ चुके हैं। कम्पनी का अत्याचार कारीगरों पर भी हुआ। उनके हस्तकौशल का कोई खरीदार ना रहा , मशीनों के पिस्टन से उनकी नाज़ुक उंगलियां कब तक संघर्ष कर पाती। वे भी किसान पहले बने और भूमिहीन मजदूर बाद में। लेकिन जमींदार का लगान सुरसा के मुख की तरह बड़ा ही होता गया। अपनी फसल और ज़मीन बेचने के बाद भी जब किसान लगान ना भर पाते तो अपनी बेटियों तक को बेचने की नौबत तक आ गई। पेट की आग सारी नैतिकता और आदर्शों को जला देती है और उसकी ताकत के आगे मानवता सर झुका देती है। मानव मूल्यों की बात क्षुधापीडितों के पल्ले नहीं पड़ती। जैसे जैसे दुर्भिक्ष का काल बढ़ता गया, बेची गई बेटियों का बाज़ार बढ़ता गया। वही बाज़ार आज सोनागाछी कहलाता है ।
यही सोनागाछी शरत चन्द्र की चंद्रमुखी का निवास है और देवदास उस जमींदार का लड़का है जिसके हाथ में किसानों के खून से भी गाढ़ा मय का प्याला है और जिसे पीकर वह पारो और चंद्रमुखी के बीच डोलता रहता है। जमींदार ही थे जिनके बच्चे लंदन जाकर पढ़ सकते थे। यही कारण है कि जमींदारों के परिवार से आने वाले राजा राम मोहन राय लंदन जाकर पढ़ सके तो सत्येन्द्र नाथ ठाकुर पहले आईसीएस अधिकारी बन सके। गुरुदेव रवींद्रनाथ भी जमींदार थे इसीलिए उनके पास रवीन्द्र संगीत और गीतांजलि रचने के लिए समय था। यही कारण है कि भारत का पहला नोबेल बंगाल में ही आया। जो श्रृंखला जेम्स वॉट के इंजन से शुरू हुई उसकी ही कड़ी है कि दरिद्र नारायणों की सेवा करने की आवश्यकता मैडम टेरेसा को पड़ी। युवा टेरेसा के मदर टेरेसा और और फिर संत टेरेसा बनने के कहानी के बीज भी उस अल्साई सी दुपहरी में बोए गए थे जिसकी चर्चा हमने शुरू में की। मेरा विश्वास है कि अब आप यह भी समझ गए होंगे कि पूरे भारत में बंगाल पर ही वामपन्थ का प्रभाव सर्वाधिक क्यों पड़ा ? गरीब किसानों और शोषित मजदूरों की अस्थियों से बनी खाद पर वामपन्थ की फसल सबसे अच्छी उगती है।
गणित का एक सिद्धांत है जिसे बटर फ़्लाई प्रभाव कहते हैं। यह कहता है कि विश्व के एक कोने में एक तितली के फड़फड़ाने से विश्व के दूसरी तरफ तूफान आ जाता है। भारत और विश्व में आए साम्राज्यवाद की उस सुनामी की जड़ें उस पानी के पतीले में उबलते पानी से सींची गई थी। हर घटना महत्वपूर्ण है और हर घटना का एक कारण है। अगर आप कारण समझते हैं तो दुनिया को समझना कतिपय सरल हो जाता है।
Saturday, December 7, 2019
आक्रोश का नियंत्रण
Wednesday, October 16, 2019
डायर ने गोलियां नहीं चलाई थीं
13 अप्रैल 1919 को हुआ जलियांवाला बाग हत्याकांड भारत के इतिहास का एक रक्तरंजित अध्याय है। सैकड़ों निःशस्त्र भारतीय बिना किसी पूर्व सूचना के मृत्यु के घाट उतार दिए गए। भारतीय स्वंतत्रता संग्राम के इस अध्याय ने नरमपंथी आंदोलन का पूर्ण पटाक्षेप कर दिया और स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा अलग चरमपंथी और उग्रपंथी दिशा में तय कर दी। जैसा कि समकालीन वर्णन बताते हैं कि भगत सिंह के कोमल मानस पर इसका बहुत स्थायी से प्रभाव पड़ा और " बंदूके बो रहा हूँ" वाला बालक भगत पैदा हुआ। इसका बदला शहीद उधम सिंह ने पंजाब के तत्कालीन गवनर ओ"डायर को मार कर लिया। जनरल डायर को ब्रिटिश सरकार ने बिना किसी सजा के छोड़ दिया यद्यपि कई स्रोतों की माने तो डायर ने आत्महत्या कर अपने जीवन का अंत किया।
कमोबेश देखें तो उपरोक्त विवरण इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाये जा रहे विवरण का सार है। चूंकि हम इस बार इसकी सौवीं सालगिरह मना रहे हैं तो इस अध्याय को एक दूसरे नज़रिये से देखना भी आवश्यक हो जाता है। ब्रिटिश सेना में भारतीयों और अंग्रेजों का अनुपात करीब करीब 4: 1 था। निचले स्तर पर यह अनुपात ज्यादा ही रहा होगा। जैसा कि मैंने फिल्मों में देखा है कि डायर एक जीप में बैठ कर आता है और सैनिक उसके पीछे पैदल मार्च करते हुए बाग में प्रवेश करते हैं। यह अनुमान लगाना सरल है कि पैदल सैनिक या सिपोय भारतीय ही रहे होंगे। सरकारी आलेख बताते हैं कि दायर के साथ कुल 90 सैनिक थे जो सिख, गोरखा, बलोच और राजपूत बटालियन से लिये गए थे। इसका वर्णन नहीं मिलता कि डायर ने खुद बंदूक चलाई। हाँ, उसने फायर का वह क्रूर आदेश जरूर दिया, लेकिन खुद गोली नहीं चलाई। तकनीकी रूप से कहें तो जालियां वाला बाग हत्याकांड के पीछे दिमाग और योजना भले की विदेशी हो, उस योजना को अंजाम भारतीय हाथों ने ही दिया था। कुल 1650 राउंड गोलियां चलाईं गई, और तब तब चलाई गई जब तक गोलियां खत्म ना हो गईं। मरने वालेकी संख्या और भी ज्यादा ही सकती थी लेकिन मशीनगनों से लैस 2 जीप संकरे दरवाजे को पार न कर सके और बाहर ही खड़े रहे। गोलियां चलाने वाले भारतीय, मरने वाले भारतीय और एक डायर।
डायर का अपराध अक्षम्य है, लेकिन उन भारतीय सैनिकों का क्या? क्या उनके हाथ निर्दोषो के खून से नहीं सने? चलाई गई 1650 राउंड सारी की सारी गोलियाँ भीड़ ही क्यों चली? किसी भारतीय सैनिक के भी मन में नहीं आया कि अपने संगीन का रुख डायर की तरफ कर दे? क्या ग़ुलामी और अंग्रेजों के प्रति वफादारी के मोतियाबिंद ने किसी सैनिक को मरते बच्चों और महिलाओं की तरफ दयादृष्टि दिखाने से रोक दिया। क्या अंग्रेज़ मालिक के आदेश सुन सुन कर उनके कान इतने अभ्यस्त हो चुके थे कि उन्हें निरपराधों की चीख तक न सुनाई पड़ी। अनाधिकृत सूत्र बताते हैं कि डायर उस रात एक भारतीय जमींदार के यहाँ रात के खाने पर आमंत्रित हुआ और उसने भोजन का आनंद पूरे भारतीय आथित्य के साथ लिया।
मानव जीवन भी कुछ ऐसा ही है। हमारी विनाशकारी गतिविधियों के लिए मुख्यतः हम स्वयं जिम्मेदार होते हैं। यह अलग बात है कि हमारी विनाशलीला का डायर कोई बाह्य व्यक्ति, बाहरी परिस्थिति या कोई अन्य कारण हो सकता है। लेकिन वो डायर भी आपको विनाश के लिए आदेश ही दे सकता है, अपने आप पर गोली आप खुद चलाते हो। आवश्यक है की किसी बाहरी डायर को आप अपने आप पर इतना हावी न होने दें कि आपके आत्मविश्लेषण की क्षमता जाती रहे। किसी भी व्यक्ति या परिस्थिति का आप पर इतना असर न हो कि आपका स्वविवेक कुंद पड़ जाए और आप बाह्य कारकों को रोकने के लिए एक गोली भी न चला सकें। याद रखना चाहिये कि भले ही दुनिया आपके डायर को आपके विनाश के लिए उत्तरदायी ठहराए, लेकिन उसका कोई फायदा नहीं। आपके हृदय के एक कोने में यह टीस हमेशा रहेगी कि स्वविनाश के कार्यवाहक आप स्वयं हैं भले ही उत्प्रेरक बाह्य कारण हों।
किसी विद्वान ने कहा है कि इतिहास से हम यही सीखते हैं कि हम इतिहास से कुछ नहीं सीखते। कदाचित यह सच भी है क्योंकि हर व्यक्ति अपनी कहानी का एक डायर
ढूँढ ही लेता है जिस पर सारी विनाशलीला की जिम्मेदारी मढ़ दी जाती है और अपनी कमजोरियों को एक उत्पीड़ित छवि की मोटी चादर ओढा दी जाती है। आत्मविश्लेषण करें तो शायद निजी जीवन के कई जलियांवाला रोके जा सकते हैं।









