Thursday, July 30, 2020

मुंशी जी के कुछ अनसुने किस्से

गणित उनके लिए हमेशा गौरीशंकर की चोटी थी। उसपर कभी चढ़ ना सके। जैसे तैसे दूसरे दर्जे में मैट्रिक पास किया। आगे की पढ़ाई के लिए वजीफा ना मिल सका और अपने पैसे खर्च कर हिन्दू कॉलेज में दाखिला लेना संभव ना था।

आगे 1905 में ट्रेनिंग कॉलेज में पढ़ाने की डिग्री ली तो भी डिग्री पर लिख दिया गया not qualified to teach mathematics. पैरवी के आधार पर ही शिक्षक और बाद में निरीक्षक बने। लेकिन स्थानांतरण के लिए दिए गए आवेदन की सजा के रूप में बस्ती जिले में भेज दिए गए। स्वास्थ्य खराब रहने लगा तो बस्ती में ही सहायक शिक्षक बने।

प्रेस खोला तो वहां भी प्रेस के रूप में सुरसा ही मिली। अपना सर्वस्व झोंक देने के बाद भी प्रेस उनका खून पीकर ही चलती रही। फिल्मी दुनिया में किस्मत आजमा यी लेकिन वहां भी टिक ना सके।

अनाकर्षक सा व्यक्तित्व था। एक पत्रमित्र उनसे पहली मुलाकात का वर्णन कुछ इस प्रकार करते हैं। जीने के ऊपर झांकने पर जो कुछ ऊपर दिखा उससे मुझे धक्का सा लगा। इतनी दूर से इतनी आशा बांध कर क्या इन्हीं मूर्ति के दर्शन करने आया हूं । एक बार तो जी में आया कि मन में बसी रमणीक छवि को बनाएं  रखूं और यहीं से लौट जाऊं। यह सामने खड़ा व्यक्ति साधारण, इतना स्वल्प इतना देहाती मालूम हुआ कि...

आर्थिक रूप से हमेशा विपन्न यह सरस्वती पुत्र फिर भी कुछ ऐसा लिख गया कि कहते हैं यदि  1910 से लेकर 1936 का इतिहास यदि विलुप्त हो जाय तो इनके साहित्य को पढ़कर पूरी तरह समझा जा सकता है। मैं बात कर रहा हूं कलम के सिपाही मुंशी प्रेमचंद की। और ऊपर उल्लेखित उनके पत्र मित्र हैं कथाकार जैनेन्द्र। जैनेन्द्र उनके चिर सखा बने रहे। अपनी मृत्यु शैय्या पर अपनी आखिरी रात को जब लोग प्रेमचंद से भगवान को याद करने को कहते हैं, तो प्रेमचंद कहते हैं " जैनेन्द्र, लोग ऐसे समय याद करते हैं ईश्वर, मुझे भी याद दिलाई जाती है, पर अभी तक मुझे ईश्वर को कष्ट देने के जरूरत नहीं मालूम नहीं हुई है।" अभाव और कष्ट को जीवन भर झेलता एक मनुष्य इतना आत्मबल रख सकता है, विश्वास के परे है।



उनके साहित्य पर टिप्पणी करने के योग्य अपने आप को नहीं पाता। उनका साहित्य पूरी तरह पढ़ लूं, समझ लूं इसके लिए भी शायद यह जीवन कम पड़े। उसके बाद भी शायद आलोचना ना कर सकूं। भाव विभोर हृदय और चमत्कृत मस्तिष्क आलोचक के गुण नहीं हो सकते। इसलिए उस चीज से परहेज़ ही करता हूं।

1936 में अपने आखिरी भाषण में प्रेमचंद कहते हैं " जिन्हें धन वैभव प्यारा है, साहित्य मंदिर में उनका स्थान नहीं है। यहां उन उपासकों की जरूरत है जिन्होंने सेवा को ही अपना जीवन की सार्थकता मान लिया हो। हम तो समाज का झंडा लेकर चलने वाले सिपाही हैं।

कलम के सिपाही युगपुरुष प्रेमचंद को उनके जन्मदिवस पर कोटिश अभिनंदन।
उनकी लेखनी का छोटा सा नमूना कहानी "बूढ़ी काकी" से, श्रद्धा सुमन के रूप में।

"बूढ़ी काकी ने सिर उठाया, न रोईं न बोलीं। चुपचाप रेंगती हुई अपनी कोठरी में चली गईं। आवाज़ ऐसी कठोर थी कि हृदय और मष्तिष्क की सम्पूर्ण शक्तियाँ, सम्पूर्ण विचार और सम्पूर्ण भार उसी ओर आकर्षित हो गए थे। नदी में जब कगार का कोई वृहद खंड कटकर गिरता है तो आस-पास का जल समूह चारों ओर से उसी स्थान को पूरा करने के लिए दौड़ता है।"

Tuesday, July 28, 2020

God's cruel prank that Dil Bechara is..

Dil Bechara is hard to watch. This would have been just another tearjerker , If Sushant Singh Rajput aka SSR was among us. Whole movie seems like a cruel prank nature played with us. As if nature was preparing us for the bad news before actually giving us the bad news. 

The instances are far too many to ignore which suggests that actually nature was working on this joke to unleash upon us in already terrible year of 2020.

 SSR stars in a movie in the movie which people watch after he dies.  During the entire movie, he seems to be the most lively and jovial character while he was the one nearest to the end.

 The movie is set up in Jamshedpur, which is also named Tata, which means bye.

 His name in the movie is Immanuel, which means ‘God is with us’. This name reminds you of constant irritating presence of God and his cruel prank throughout the movie like Kizie basu's oxygen pipe around her neck.

 Just like in movie SSR became victim of cancer that is nepotism and mafia culture. The cancer which took his life in installments , first they took away his leg in the movie and his projects in real life before taking his life eventually.

 SSR was a big fan of stars and had a deep passion for astronomy. It is just more than a coincidence that his last movie is based on the ‘Fault in our stars’ before he himself left for becoming a star.

Sometimes I feel that why should we bother so much about SSR. He may be just another lad who couldn't cope up with the cruel world and may be that what finished him. If he was that weak, may be his end was acceptable if not fair. But but but... If he was suffocated by a cabal, a gang , or a system, we all should rise against it.


Remember injustice anywhere is a threat to justice everywhere. If this system prevails, you will never get another talented outsider like Big B, another SRK or another Kangna who came from outside but ruled the tinsel town.



In Dil Bechara, SSR attends his own funeral. So, may be like Manny, SSR too had arranged his own funeral before he actually left us. But we will never know that. that’s the cruelest part of God's prank.

If a movie is meant to move you, Dil Bechara is the movie.. Kuch films banayi nahin jaati, ban jaati hai..

 


Thursday, July 23, 2020

हिमालय की नटखट नातिनों का खेल

अरे हम सब मदारीचक र चिकिये, हमरा पानी कि कर तै। मानक हिंदी में कहूं तो अरे हम लोग मदारी चक गांव के हैं, पानी हमारा क्या बिगाड़ लेगी? मेरे दादा हमेशा एक गांव का नाम लेते थे मदारी चक। काफी समृद्ध गांव हुआ करता था, नदी की धारा में समा गया। गांव मिट गया, गांव का नाम नहीं मिटा। बोस्टन में हों या दिल्ली के द्वारका में, उस गांव के लोग आज भी अपने आप को मदारी चक का ही बताते हैं।

बिहार में बाढ़ जीवन का हिस्सा नहीं है, वही हमारा जीवन है। हथेलियों की रेखाओं की तरह नदियां उत्तर बिहार में फैली हुई है। जैसे हाथ की लकीरें बदलती रहती है, बिहार में नदियां भी अपना मार्ग बदलती हैं। किसी नटखट चपल बालिकाओं के समूह की तरह जो गांव में लुका छिपी खेल रही हों। वे बालिकाएं अपनी लुका छिपी के खेल के दौरान कहीं भी छुप सकती हैं। पूरा गांव उनका है, सारे घर उनके लिए खेल और क्रीड़ा कौतुक का प्रांगण है। वह किसी घर में छिपे तो घर का गृहस्थ यह नहीं चिल्लाता कि मेरे घर में चोर घुस आए । बालिकाओं का घर में घुसना अतिक्रमण नहीं है, सारा गांव उनका है, गांव के सारे घर उनके हैं। एक प्रसंग है कि जब महाकवि विद्यापति ने जीवन के अंतिम क्षण में नदी में समाधि लेने की सोची। वृद्धावस्था के कारण वह नदी तक चल कर नहीं जा सकते थे, इसलिए उन्होंने नदी का आह्वान किया कि यदि मैंने साहित्य की कुछ भी सेवा की है तो नदी मुझे मेरे घर से ले कर जाए। कवि की पुकार सुनकर नदी कविवर विद्यापति के घर आई और उनको अपने साथ ले गई।

बिहार की समस्त भूमि नदियों की है। बिहार मानो उनका घर है जिसे बनाने की सारी सामग्री वह अपने ननिहाल नेपाल से अपने नाना हिमालय से मांग कर लाई है। और उन सबके नाना हिमालय उन उदार नाना जैसे हैं जो अपनी प्यारी नातिनों को उनकी जरूरत से ज्यादा उपहार( मिट्टी, बालू, पत्थर) देकर अपने दादा दादी के घर भेजते हैं। ऐसे में यह नटखट बालिकाओं का समूह थोड़ा शैतान और नकचढ़ी तो होगा ही। इनसे अनुशासन की उम्मीद ना केवल अव्याहरिक है बल्कि बालिकाओं पर अत्याचार सा है।



हमारे प्रखंड मनिहारी में आप मछली बाज़ार जाइए। मछुवारे कहेंगे आय लद्दी से ढेर मछली लानल छी। मतलब कि आज नदी से ढेर सारी मछली लाया हूं। आप पता करेंगे तो पता चलेगा कि उसने मछली किसी पोखर से पकड़ी है। फिर हमारे यहां पोखर को नदी क्यों कहते हैं? वो इसलिए कि उस पोखर का पानी नदियों ने भरा है वर्षा ने नहीं। मेरे गांव में हर घर के पीछे एक डोभा हुआ करता था। डोभा मतलब छोटा पोखर। अब सोचता हूं तो लगता है कि मेरे निरक्षर पूर्वज कितने समझदार थे। बाढ़ में आए पानी को रोकने और जमा करने के लिए गांव के बाहर लद्दी और गांव के अंदर डोभा की लड़ी बना रखी थी। यह बाढ़ से निपटने का उनका सुरक्षा कवच था। दादा एक बात और कहते थे कि बेटा हेलना जरूर सीखिहैं। मतलब बेटा तैरना जरूर सीखना। अब सारी कड़ियां मानो जुड़ती सी दिखती हैं कि वह पीढ़ी किस प्रकार प्रकृति के साथ एकसार और तन्मय थी। प्रकृति को स्वीकार कर उससे संघर्ष की जगह प्रकृति के साथ संसर्ग का प्रयास करती थी।

और हम शिक्षित वंशजों ने सारे डोभा भर घर बना लिए। सारे लद्दी को सुखा सुखा कर खेती करने लगे। किस काम की ऐसी शिक्षा जो आपको अपनी धरती को समझने में अक्षम बना दे। अगर मैं कहूं तो बिहार की बाढ़ पूरी तरह से मानव निर्मित समस्या है। नदी हमारे घर में नहीं घुसी, वह तो बस अठखेलिया कर रही है, हमने बस उसके खेल के मैदान की बीच अपने घर बना लिए। हम उनके साथ रहना भूल गए, उनको रास्ते से हटा कर उनको बांधो में बांध कर ढिठाई करने लगे। उसकी सजा तो हमें मिलनी ही थी।

जगजीत साब की एक नज़्म याद आ रही है, रेखाओं का खेल है मुकद्दर, रेखाओं से मात खा रहे हो। उत्तर बिहार की नदियां हमारी मुकद्दर की रेखाएं हैं, उनके साथ रहना सीखना होगा, जैसा हम अब तक करते आये हैं । फिर उनकी चपलता हमें परेशान नहीं करेंगी। बाढ़ की विभीषिका जैसे विशेषण हमारी कारस्तानी है, और कुछ नहीं।
अवसर मिला तो बाढ़ और नदियों के अर्थशास्त्र पक्ष में कभी विस्तार से लिखूंगा।

On Raghav's 4th Birthday

You never got our total undivided attention, Your elder brother was already there to share it with you..

Half of your toys are used, so are your clothes. Old and used..Your elder brother  always got brand new toys and clothes..

Even parents you got, were older as compared to what your elder sibling got ..

Half of the time we call you by your elder sibling name, while we never call your elder brother by your name.

Even if you do something cute, we often compare that to your elder brother thinking how he used to do it..


Even your mother is called as Ojas's mother by elderly ladies in family when she is equally your mother. 

Yet unlike our attention for you, we always get your total undivided attention..

Your love for us is total new , totally unique..

You being the youngest, make us feel even younger..

Even times when we call you by your brother's name, your love towards us remains unchanged.

Like all younger siblings of world, you are happy being son to 'Your elder sibling's mother'.

You may feel all this injustice being done to you, but remember, your elder one never had an elder brother..

Unlike you, he never had company of a person he could call bhaiya.

Unlike you he was a guinea pig in hands of a novice parents, you got a much experienced calmer set of parents.. He handled all the rough edges of an inexperienced parenthood and made it smooth for you..

You complete us like a second eye, a second hand, a second lung.

 You are like our second life god graced us with. 

Dear Raghav, It is impossible to even imagine a second of our lives without you. May be thats why we call you our second son. 

Happy fourth Birthday Raghav. Love you to the second moon situated far in galaxies and back.

Saturday, July 11, 2020

चीन र साथ गोतियौरी झगड़ा


चीन दुश्मन नय चिकै, चीन होलौं कजिया करै वाला गोतिया। वहा गोतिया जे बेटी र बिहा भड़काबै , नयका जमाय क तोराह शिकायत करी का खुश हो जाय। बाराती में जा करी क जन्वासा में तकिया आरो तोशक पर तरकारी र झोर गिरा करी क हो हल्ला करै वाला गोतिया।

खाली बीहा शादी में नय, बाकी दिन भी जेकरs दिमाग म खाली खुराफात हूवा, वहा चि कै चीन। खेत पथार म जा करी क भोरे भोर कोदारी स आड़ काटी का अपना हिस्सा बढ़ाबै म जेकरा स्वर्ग जैनह सुख मिलै, बुझी ला चीन वहा गोतिया । आड़ काट तs पकड़ाबै पर आरो झगड़ा कर थौंह कि ए ज़मीन ता हमरे ची कै । फलां अमीन गड़बड़ कर क़ छैलई, फेरू सा नापी करवा के देखी ले। हम्मा ई बटवारा मानै वाला नाय छी, फेरु स पंचैती करवा ले। 


 
ऐन्हs गोतिया जैन्ह देश स निपटें म गोतियोरी पेंच सा काम करै ल पड़ तय । मार पीट करी का बदनामी सा जादे कुछु नय मिले वाला छै
। दू चार मैन्हा टोका चाली बंद , बेटा र बड्डे में ओकरा नाय बोला बा, सीधा लाइनपर आबी जै तोंह। बाकी दुनिया बदली जाय, तों गोतिया नय बदल स कै छ। एकरे बास्त ओकरा सा झगड़ा बढ़ा करी के कोय फैदा नय। आरो केकरो से पंचैयी करवा का आरो घटा, से बाहरी आदमी स त एक दम बची के रहना छै।

कैसनो चीकै अपने चीकै । ए बात मन म रहs, त सब चीज धीरे धीरे सब अपने आप ठीक हो जै तै। वहा आड़ काटे वाला गोतिया बाराती में सबसे आगे नागिन डांस कर थौंह , बस कनी टा धीरज रखै र काम छै।

 हिंदी चीनी गोतियौरी भाय भाय।। 

Sunday, June 21, 2020

On Father's day

My father visits my hostel at Navodaya school where I am studying in class 6. He meets my friend and starts talking to him. He was way more comfortable talking to other kids than his own kids. There was always some hesitation or you may call it protocol we followed, whatever it was, its hard to explain.

Anyway.. while I am away, he simply asks my friend, does he eat dinner at night or sleeps before that? My friend confirms him that indeed his son sleeps before dinner. In fact he sleeps before everyone in hostel. He is the one who is caught sleeping during study time everyday. My father is informed that his son can sleep within 2 seconds after lying on bed.. sometimes even bed is not required. He can sleep in any position.

My father listens to him with an expressionless face and says... Jab ye so jaaye to kam se kam kerosene lamp bed se hata dena aur dinner time per isko utha kar apne saath le jaana.. baaki sab theek hai..

He did not ask that I should be woken up if caught sleeping during study time. He just wanted to ensure that I don't miss my meals.. that was the level of expectation from me..



Was that his hopelessness or too much confidence in me.. I don't know.. I will never know. I never asked him and now can never ask either. Even if I meet him in other world that damn protocol will come in force anyway.. so the point is that if you have any question about yourself you want to ask and you have your father with you to answer that, you are lucky.. very very lucky.. So me wishing you happy father's day hardly matters.. Happy father's day everyone..


Friday, June 19, 2020

गांधी धुन का रीमिक्स

गांधी जी जब 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत आए, तो उनको उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले जी ने उनको पूरा देश घूमने की सलाह दी ताकि वह भारत को समझ सकें। यद्यपि 23 साल के अपने दक्षिण अफ्रीकी प्रवास के दौरान गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों को अच्छे से जान लिया था और उनके विरूद्ध संघर्ष में एक लंबा अनुभव प्राप्त कर लिया था, फिर भी भारत की विशेष परिस्थितियों को जानना आवश्यक था। एक वर्ष के भीतर ही गांधी जी समझ गए कि उनका सामना कैसी समस्या से पड़ा है। तत्कालीन भारतीय समाज दो वर्गो में विभाजित था। पहला शिक्षित वर्ग जिसने पाश्चात्य शिक्षा में दीक्षित होकर अपने आप को कदाचित अंग्रेजों का पक्षधर बना लिया था। अर्थात् यह वर्ग अंग्रेजों के व्हाइट मेंस बर्डेन वाले सिद्धांत को मानता था और यह सोचता था कि अंग्रेजों का यहां रहना हमारे लिए लाभप्रद है और उनके द्वारा ही भारत का विकास और कल्याण संभव है। दूसरा वर्ग था निरक्षर वर्ग को अंग्रेजों को अजेय मानता था और यह मानता था कि कोई अवतार आकर उनको इस अत्याचारी शासन से मुक्ति दिलाएगा। पहला वर्ग जहां मैकाले की शिक्षा नीति ( जिसके तहत एक ऐसा भारतीय वर्ग तैयार करना था जो देखने में भारतीय और सोच में अंग्रेज़ हो ) की सफलता का प्रत्यक्ष प्रमाण था, वहीं दूसरा वर्ग चिर निद्रा में सोया भीरू समाज था जो दुश्मन को अजेय मानकर पहले ही हथियार डाल चुका था।



‌विरासत में मिली थकी हारी और गुटों में विभाजित कांग्रेस और उपर वर्णित भारतीय जनता के साथ गांधी जी को विश्व की सबसे बड़े साम्राज्यवादी सत्ता से लड़ना था। गांधी जी समझ गए कि भारतीयों की इस मानसिकता से लड़े बिना जीत की आशा रखना व्यर्थ है। और यह भी समझ गए कि यह लड़ाई लम्बी चलेगी क्योंकि अंग्रेजों के साथ साथ भारतीयों की उस  मानसिकता से भी लड़ना है जो अंग्रेजों को अपना हितैषी या उसको अपराजेय मानती है।

‌ असहयोग आंदोलन हो , सविनय अवज्ञा हो या भारत छोड़ो आंदोलन इसके पीछे यही मानसिकता रही। और इन आंदोलनों के बीच गांधी जी का रचनात्मक कार्यक्रम भी चलता रहा। चरखा के जरिए एक तरफ उन्होंने अंग्रेजों के कपास की मिलों पर हमला किया तो दूसरी तरफ अब तब आंदोलन से कटी रही महिलाओं के हाथ में अंग्रेजों की जड़ काटने की एक कुल्हाड़ी चरखे के रूप में दी। छुआछूत उन्मूलन कार्यक्रम और हरिजन बस्तियों के उद्धार कार्यक्रम से उनका सामाजिक सुधार कार्यक्रम तो चल ही रहा था। वर्धा योजना के तहत उनके बेसिक स्कूल खुले और सर्वांगीण शिक्षा पर बल दिया गया। लघु कुटीर उद्योगों की स्थापना और पंचायतों को स्वायत्त बना कर अंग्रेजों की जड़ काट डाली गयी। असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो , इन तीनों जन आंदोलन को देखें तो एक तरफ जहां एक आंदोलनों की आक्रामकता बढ़ती गई, वहीं नेतृत्व क्रमशः जनता के हाथों चला गया। भारत छोड़ो आंदोलन तो पूरी तरह एक जन आंदोलन बना जहां राजनीतिक नेतृत्व करीब करीब अनुपस्थित था। यह सर्वाधिक सफल आंदोलन बना।

‌अब इतनी बड़ी कथा सुनाने के बाद आपको यह ना लगे कि क्या करेंगे कक्षा 9 के इतिहास पढ़ के दुबारा। बात यह है कि कमोबेश आज देश में वही हालात हैं। देश में दो वर्ग हैं, पहला वो को चीन को अपना हितैषी मानता है और दूसरा वह जो यह मानता है कि चीन की बड़ी अर्थव्यवस्था के सामने हमारी अर्थव्यवस्था कुछ भी नहीं और हम उन पर अपनी निर्भरता कतई कम नहीं  कर सकते। हमारे उत्पाद, हमारी फैक्ट्रियां उनके मुकाबले कहीं नहीं ठहरती।

यकीन मानिए, हमारी स्थिति चीन कि अर्थव्यवस्था के सामने कमजोर जरूर है लेकिन उतनी भी नहीं जितनी 1920 में ब्रिटिश अर्थव्यवस्था के सामने थी, जब असहयोग आंदोलन चला रहा था। समय मानो फिर से लौट आया है। उस समय स्पेनिश फ्लू फैला था, आज कोवि़ड फैला है। उस समय सामने ब्रिटेन की बड़ी सेना और उनकी कंपनी थी, आज चीन और उसके सस्ते उत्पाद हैं। उस लड़ाई को असहयोग आंदोलन कहा गया, आज की लड़ाई को आत्मनिर्भर भारत कहा जा रहा है। लड़ाई हम उस समय भी जीते थे, अब भी जीत सकते हैं।

उस समय तो सीमा पर लड़ने के लिए हमारे पास सेना नहीं थी, आज तो वह भी है। काम आधा आसान है। सेना चीन को सीमा पर देख लेगी, जरूरत है कि बाकी जनता अपनी पराजय वादी मानसिकता को त्यागे और लग जाये इस राष्ट्रीय यज्ञ में।

हां लड़ाई लम्बी चलेगी। हमें चीन और अपनी मानसिकता दोनों से लड़ना है, देश का पुनर्निर्माण करना है। ओप्पो के सारे फोन 1 मिनट में बुक हो गए, हार गई देशभक्ति। ऐसे समाचार सुन कर निराश ना हों। उस समय भी विदेशी शराब और कपड़ों की दुकान के सामने पिकेटिंग करनी पड़ती थी। बदलाव में समय लगता है।

सती प्रथा के विरोध में जो ज्ञापन राजा राम मोहन राय ने विलियम बेंटिक को सौंपा था उसमें सिर्फ 700 हस्ताक्षर थे। सती प्रथा के समर्थन में राधाकांत देब ने 30 हजार हस्ताक्षर वाला ज्ञापन गवर्नर जनरल को सौंपा था। जीत राजा राम मोहन राय की हुई क्यूंकि उनके साथ सत्य की शक्ति थी, देश उद्धार का शक्तिशाली स्वप्न था।

यह लड़ाई भी हम जीत सकते हैं। यह काम भारत की संयुक्त जनता ही कर सकती है। हमें सिर्फ नारों पर नहीं एक समेकित कार्यक्रम पर काम करना होगा । इसमें हमारी कृषि, हमारे उद्योग, हमारी शिक्षा, हमारी स्वास्थ्य सुविधाएं और भी बहुत कुछ सब पर कार्य करना होगा। इतना सारा काम बिना जन आंदोलन के संभव नहीं,  एक आदमी से तो बिलकुल भी नहीं।

इसमें वक़्त लगेगा, लेकिन अच्छी बात यह है कि हमारे इस स्वप्न गीत की धुन बापू बना कर गए हैं। हमें सिर्फ उसका रीमिक्स बना ना है, फिर तो हम चीन का वो बैंड बजाएंगे कि दुनिया देखती रह जाएगी।

जय हिन्द। 

Wednesday, June 17, 2020

You had me at Mao

I may sound cynical and anti-national but the fact is  that I have lost faith in our armies and govt in handling China issue. Our best hope now are our Indian communists and Maoists.

Time for Indian armies and MEA to take a step back. Let our communists handle the situation on the border. Let them lead the negotiations talks. I am sure the moment they start the negotiations with phrases like Hail Mao and Hello comrades, 'You complete me',  the hearts of their Chinese counterpart will melt like hot butter.  As happened in Jerry Maguire, Chinese will say 'Shut up.. You had me at Mao'. I am sure once Indian communists delegation come out of that negotiation meeting not only they will return with full Aksai Chin area but they will bring the corona vaccine with them which China has manufactured but not willing to share. 

God forbid, due to RSS conspiracy, if these negotiations fail, our communists are best positioned to handle Chinese armies as well. They have been preparing for war in Baster and Dantewada for decades. Time to put that net practice into real match. Even before Chinese army will realize, all their trucks will go in air after landmine blasts.


 Since we will have a neutral and moral force at our borders, they will give all proofs immediately after the attack is done. Honestly, all people with heart of a closet communist like me, we are expecting a live telecast of these Baster themed attack on Chinese army with proper commentary so that all people in India know, what they deserve to know about the military operations going on. Unfortunately our armies and present government are completely incapable of doing all these. 

‌Desperate times ask for desperate measures. #ModiMustResign #YechuriMustLead #KanhaiyaOnlyHope #TheWireIsTheFire

Message composed on my Xiaomi phone.

Tuesday, June 16, 2020

Stick to the basics ... With Love, from Chankya

Three disclaimer before you read this long post..
a) I am not an international relations expert. These thoughts at best should be taken as that of an amateur enthusiast.
b) I have not read the book referred to here in this article but all the references here are based on publicly available information on blogs and expert interviews.
c) bit odd it may sound, but I am writing this in English just to ensure its reach to a particular section of people who need to read this but aren't very much comfortable in Hindi. I will try to come up with a Hindi translation of this text given the time available. So here we go..

As our ancient texts says there are four aspects of human life.. Dharm, Arth, Kaam and Moksha. People in India are somewhat aware of our Dharm shashtras. They somewhat know what good bad evil traits are, What is permitted as moral behaviour and what is Paap and what is Punya. Since Moksha is not for common men, it is not even expected that a common man will know about Moksha. Thats a niche area and only sages are expected to know that.

Sad part is our ignorance towards shashtras related to Arth and Kaam. Situation is that we learn about Kaamsutra, our text around Kaam, from a semi porn erotic movie and rest of the our public knowledge comes from some pulp magazines hidden in our closets. Most of the our young generation think Of kaamsutra as an erotic text like Playboy. But thats a topic for some other day.. Let us talk about the remaining aspect Arth and our ancient text around it named Arthshastra.

Year 1905, a Tamil brahmin in Tanjavur presents an ancient text written over palm leaves to Mysore orient library. Librarian identifies the text as Arthshastra by Kautilya, assumed lost since Gupta period. It is published in 1907 and its first English translation is published in 1915. There are 17 versions of Arthshastra, most reliable one written by Kautilya, prime minister of Chandragupta Maurya and Bindusara. These scriptures were written by a person who had the idea, created the plan and ensured successful execution to establish the biggest empire known to us with secure borders and happy people. Till this person was alive, no foreign power could put their little toe our land Bharatvarsh.

Today when we are surrounded by hostile neighborhood and at the time of writing this article at least 20 of our finest men have martyred in Ladakh, it is natural to think what is wrong with our foreign policy or international relations.

Though this Arthshastra was discovered 42 years before we got our independence, why it was not referred to while forming our foreign policy. Why Arthshastra is not taught in our universities from where our burocrates come who form our foreign policy. Why do we base our foreign policy on western principles which has given us colonialism, 2 world wars, cold wars and such a divided world. Answer lies in a our own inferiority complex and a western imposed morality. Just because Arthshastra mentions and does not protest Varna system, it was considered to be an medieval text and discarded. Its a classic case of throwing the baby out with the bathwater. We could have easily retained the principles of international relations to form the basis of our foreign policy, and then, may be we wouldn't have faced what we are facing now.

Arthshastra details everything about relationship between states, internal administration, espionage, bureaucracy and even land reforms. Many of these topics are not even mentioned by Machiavelli whom we consider the father of political science. Most of our generation, almost complete political leadership and also writer of this article are unaware of Kautilya and his writings. Whole Arthshastra deals with only two themes ' Yogakshem' and 'Raksham', i.e. welfare and security of people. As shown by Covid and China aggression, it seems we struggle miserably on both fronts.

Atmnirnbhar Bharat cannot happen unless we look deep inside our knowledge treasures and learn from them. Borrowed and copied knowledge and its incompatible application to our state policies has brought us where we stand today.

As we often see in cricket, when any team struggle in a tough match, coach shouts.. stick to the basics.. In case of India also, we need to first learn our basics which we have ignored, forgotten and are somewhat ashamed of and then stick to it. Then only we are worthy of calling ourselves descendants of Chanakya. Once we do that that, it will be the real master-stroke.

Sunday, June 14, 2020

कुंगफू के चक्कर में इनर पीस को ना भूल जाएं

वर्ष 1893, शिकागो। भारत का एक गेरुआ वस्त्र धारी जो अपने आप को विवेकानन्द कहने लगा था, पाश्चात्य विश्व के पटल पर अवतरित हुआ। उसने जो कहा वो तो इतिहास है ही उसके प्रभाव और इस घटना के मायने भी कम नहीं है। औद्योगिक क्रांति और पुनर्जागरण बाद पाश्चात्य विश्व में समृद्धि बहुतायत में थी, सुख नहीं था। विवेकानंद के उस संभाषण ने विश्व को यह बताया कि समृद्धि का मार्ग भले ही पाश्चात्य दर्शन से मिलता हो, शांति और सुख का मार्ग भारत के दर्शन से ही मिल सकता है। उस एक संभाषण ने भारतीय दर्शन को एक झटके में पाश्चात्य दर्शन के समकक्ष लाकर खड़ा किया और हिन्दू जीवन शैली और धर्म का परिचय आधुनिक विश्व  को मिला। 


सुशांत सिंह की आकस्मिक आत्महत्या से स्वामी जी का प्रसंग याद आना दो कारणों से है। पहला भौतिक जीवन की समृद्धि से आंतरिक सुख का मेल आवश्यक है। आंतरिक सुख भौतिक साधनों के सामान्य परिणीति नहीं है, वह एक अलग क्षेत्र है जिसपर भी मेहनत करने की आवश्यकता है। सुशांत के जीवन पर यह उक्ति सटीक बैठती है। यह एक विडम्बना ही है कि सुशांत नाम का व्यक्ति आंतरिक रूप से इतना अशांत था।
‌दूसरा कारण है स्वामी जी के तरह सुशांत का भी कम उम्र में चला जाना। दोनो प्रतिभाशाली थे, दोनो के सामने पूरा जीवन पड़ा था, लेकिन दोनों समय से पहले जीवन को छोड़ चले गए। सुशांत के जीवन की आंतरिक बातों को शायद हम ना जाने, लेकिन इतना तो तय है कि पाश्चात्य दर्शन के अधूरेपन का एक और उदाहरण है उनका जीवन।
‌ हम सब फिल्म कुंगफू पांडा के पो की तरह हैं। कुंग फू सीखना तो सिर्फ पहला कदम है, वास्तविक लक्ष्य तो है इनर पीस यानी मन की शांति। मास्टर उग्वे और शिफू वास्तव में कुंगफू के नहीं इनर पीस के शिक्षक हैं। कुंगफू दिखता है इनर पीस नहीं दिखता। पर कुंगफू सीखते समय हमेशा याद रहे कि कुंगफू एक सीढ़ी भर है मन की शांति तक पहुंचने का। समृद्धि के साथ साथ सुख का आराधन ही जीवन को पूर्णता दे सकता है।
‌ईश्वर सुशांत को अपने श्री चरणों में स्थान दें। ॐ शांति।।

Saturday, June 13, 2020

चीनी आक्रामकता का प्रत्युत्तर

कोविड 19 के संकट से जूझते देशों को देखकर भारत के नीति निर्माताओं को इसके जनस्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर पड़ने  वाले असर का अंदाजा भले ही लग गया हो, सीमा संकट के रूप इसकी परिणीति की आशा शायद ही थी  | गलवान घाटी पर चल रहे विवाद की जड़ें भी कोविड से जुडी हैं | इतिहास में  देखें तो 1962 में चीनी आक्रमण की एक वजह थी, दुर्भिक्ष से त्रस्त चीनी जनता को राष्ट्रवाद का विकर्षण प्रदान करना और  गुटनिरपेक्ष आंदोलन के कारण  भारत के बढ़ते अंतराष्ट्रीय कद को रोकना | आज की तारीख में देखिए तो यही कारण वर्तमान  सीमा संकट के पीछे हैं

 

कोरोना संकट के कारण एक तरफ चीनी अर्थव्यवस्था जहाँ अंतराष्ट्रीय मांग में कमी के कारण  गहरे दवाब  में है ( अनुमानों के अनुसार जीडीपी में चौथी तिमाही में 7% की कमी आयी है), वहीँ कोरोना के सन्दर्भ में अपनाई गयी अलोकतांत्रिक और अपारदर्शी नीतियों ने चीन की अन्तराष्ट्रीय छवि पर अविश्वास का गहरा बट्टा लगाया है | जहाँ चीनी जनता में भारी असंतोष का भाव है वहीँ जापान , अमेरिका समेत कई  देश चीन में स्थापित अपनी विनिर्माण कंपनियों को बाहर निकालने की तैयारी कर रही  हैं | यह  कंपनियाँ अगले पड़ाव के रूप में भारत को देख रही हैं जो डेमोक्रेसी , डेमोग्राफी और डिमांड के मणिकांचन योग के कारण एक सशक्त विकल्प के रूप में उपस्थित  है | चीन की दीर्धकालिक नीतियों के जानकार यह समझते हैं कि  उसकी नीतियाँ हमेशा से भारत को तरह तरह की समस्याओं में उलझा कर एक क्षेत्रीय और वैश्विक शक्ति के रूप उसके उभार को रोकने की रही हैगलवान वैली में चीनी सेना के अतिक्रमण की नीति एक तरफ राष्ट्रवाद के द्वारा अंदरूनी असंतोष का समाधान करती है, वहीँ भारत की  एक वांछित  वैकल्पिक विनिर्माण गंतव्य की छवि को धूमिल कर उसे एक  अस्थिर असुरक्षित राज्य के रूप में प्रस्तुत करती है | यह कोई एकलौता मामला नहीं है बल्कि नेपाल के लिपुलेख मामला , म्यांमार के रखाइन  स्टेट में कलादान प्रोजेक्ट को बाधित करना और भारतीय तेल कंपनियों के दक्षिणी चीन सागर में तेल उत्खनन के वियतनाम  समझौते  में अड़ंगा डालना भी चीन की इसी नीति के फलन  हैं

 समाधान के कदम 

 एक बात तो निश्चित है कि सीमा पर युद्ध चीन चाहता है और भारत | क्या अपने मोबाइल फ़ोन से टिकटोक और ब्यूटीप्लस ऐप को डिलीट कर के चीन का मुकाबला किया जा सकता है? या दीवाली में चीनी फुलझड़ियों का बहिष्कार करके कुछ हासिल हो  सकता हैशायद नहीं | इन क़दमों से आपको कुछ  मानसिक  संतुष्टि भले ही मिले , वास्तविक अर्थों में यह कमल नाल से ड्रैगन को बाँधने की कोशिश मात्र है

 इसका उपाय दीर्घकालिक ही हो सकता है| चीन दक्षिण पूर्व देशों खास कर आसियान देशों को अपना विकल्प बनाना चाहता है, ताकि भले ही कंपनियां  चीन से निकल जाएँ लेकिन वह भारत जाकर वियतनाम और मलेशिया जैसे देशों का रुख करे| आसियान देशों को अपनी सैटेलाइट अर्थव्यवस्था  बना कर चीन अपने वैश्विक पार्थक्य के जोखिम का शमन करना चाहता है, जहां चीनी बहिष्कार की स्थिति में भी इनके माध्यम से उसका व्यापार पूर्ववत रहे।

पहला कदम है देश के अंदर चल रहे सुधारों में तीव्रता लाना | इसके तरह नीतिगत सुधारों जैसे श्रम कानूनों , सरलीकृत  कर प्रणाली और निवेश प्रोत्साहक नीतियों पर अधिक बल  दिया जाना चाहिये | व्यापार सुगमता सूचकाँक में चीन ( 28वां  स्थान ) अभी भी भारत( 63वां  स्थान) से कहीं  आगे है| राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन  कार्यक्रम के तहत  ऊर्जा , रेलवे, सड़क, पत्तन  निर्माण और डिजिटल कनेक्टिविटी  में  वर्ष 2025  तक प्रस्तावित 100 लाख करोड़  निवेश की परियोजनाओं को गंभीरता से समयबद्ध तरीके में पूरा करने की आवश्यकता है|  हमारी  स्थिति उस किसान की तरह हो  जिसकी खेत पर बारिश तो हुई लेकिन उसने  मेड नहीं बना रखी थी|

 

दूसरा कदम है, एक्ट ईस्ट की नीति के तहत चल रहे कनेक्टिवी कार्यक्रमों जैसे भारत - म्यांमार-थाइलैंड त्रिभुजीय सड़क परियोजना, म्यांमार में सिटवे बंदरगाह को भारत-म्यांमार सीमा से जोड़ती कलादान परियोजनाकम्बोडिया  लाओस म्यांमांर और वियतनाम के साथ प्रस्तावित मेकांग - भारत आर्थिक गलियारा परियोजना को वरीयता देकर पूरा करना | दक्षिण एशियाई देश अभी चीन के ज्यादा निकट हैं, हमारी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति और लोकतान्त्रिक व्यवस्था ही उनमें  चीनी आकर्षण को कम करेगी| सुदूर पूर्व जापान के साथ दक्षिण चीन सागर में मुक्त नौवहन और क्षेत्र में सबके लिए सुरक्षा और विकास (SAGAR) पहल के लिए अंतराष्ट्रीय दवाब बना कर तटीय देशों फिलीपींस , ताइवान के सामुद्रिक हितों की रक्षा में हमें मुखर भूमिका निभानी होगी | इन प्रयासों से ना केवल आसियान देशों से हमारे व्यापारिक संबंध प्रगाढ़ होंगे ( 2018-19 व्यापार 97 बिलियन डॉलर मात्र) बल्कि भारत और इनके बीच की हमारी कुंजी  उत्तर पूर्वी राज्यों में लंबित अवसंरचना का विकास होगा। अरुणाचल और सिक्किम में चीनी दख़ल का कारण भारत द्वारा इन क्षेत्रों की अवहेलना भी है।

 तीसरा कदम हैपडोसी-पहले’ की नीति के तहत नेपाल के साथ रिश्तों में आयी हालिया खटास को जल्द दूर करना | भारत-नेपाल के अंतरंग और विशिष्ट संबंधों की रक्षा के लिए उच्चतम स्तर पर बातचीत नेपाल के राजनीतिक गलियारों में भारत के प्रति विश्वास बहाली आवश्यक है| दूसरी तरफ  श्रीलंका , मालदीव को चीन के ऋण जाल से बचाने के लिए वहां भारतीय निवेश बढ़ाना जरूरी होगा |  

 संत तिरुवल्लुवर ने कहा था " धनार्जन करो | अपने दुश्मनों के दर्पदलन के लिए इससे कारगर कोई हथियार नहीं है" | चीनी आक्रामकता का प्रत्युत्तर दीर्घकालिक और धनात्मक आर्थिक नीतियों में छुपा है, न कि कुछ चायनीज ऍप को डिलीट और रेटिंग ख़राब करने  की उथली और नकारात्मक नीतियों में |