Thursday, August 20, 2020

युवा वोट बैंक की कहानी

31 साल पहले की बात है। हैंडसम चचा बहुत परेशान थे काहे कि चुनाव सर पर आ गए थे। अपना ही आदमी गली गली में शोर मचा के आरोपों की तोप दाग रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि सरकार बचे तो कैसे, चुनाव में बेड़ा पार कैसे लगे। परेशान चचा ने आइने में देखा। अब भी वह चमक थी चेहरे पर जिसके बदौलत विदेश से डिग्री भले ना ला पाए हों, बहू जरूर ले आए थे। फिर सोचा किस काम की यह खूबसूरती और यह लम्बी नाक जो एक चुनाव ना जितवा सके। 

चचा के चेहरे पर उदासी छाई देख चमचे घबरा गए। ऐसे कैसे चलेगा? गली गली का शोर चमचों को भी परेशान कर रहा था। किसी ने कहा कि सर जी आप बिल्कुल ना घबराएं। आप आज भी बहुत लोकप्रिय हैं। चचा गुस्सा हो के बोले काहे का लोकप्रिय? जो भी पढ़ा लिखा है , जिसकी अक्ल नौकरी खोज के थक चुकी है या बेरोज़गार  बेटे को देख कर परेशान  है या जो भी  अखबार पढ़ रहा है, कोई मुझे खास पसंद नहीं कर रहा। यह सब तो मुझे वोट देने से रहे।  हां बच्चे और जवान जिनकी अक्ल थोड़ी कच्ची है, जिनको अभी आटे दाल का भाव नहीं पता , जो किताब से ज्यादा श्रीदेवी और माधुरी और अनिल कपूर के पोस्टर देखते हैं, वही मुझे देख कर वाह वाह कर रहे हैं। उनको क्या मतलब कि जाफना में क्या हुआ, तोप का क्या मामला है, कश्मीर में क्या चल रहा है और यह अयोध्या में मैंने क्या शुरू कर दिया है!!  बेवकूफ मेरी शक्ल पर मरे जा रहे हैं। अब यह अक्ल के कच्चों की तो उमर भी नहीं हुई है वोट देने की। 

एक चमचे ने कहा, सर आप मत घबराओ। प्रॉब्लम यही है ना कि जो वोट डालने वाले लोग हैं वह आपको पसंद नहीं करते और जो पसंद करते हैं वह वोट नहीं डाल सकते।

चचा ने कहा हां मेरे आइंस्टाइन!! यही प्रॉब्लम है। अब आगे बताओ कि क्या करें।

चमचे ने कहा अरे सर। अपनी ताकत पहचानिए। आपके पास इतने सांसद हैं कि आप चाहें तो दिन को रात और रात को दिन बना दें।

चचा उखड़ गए। बोले मस्का लगाना बंद करो। हद होती है!! इधर नींद नहीं आ रही चुनाव को लेकर और तुम्हें चाटने से फुरसत नहीं।

चमचा संभला। बोला सर, आपकी समस्या का ही सॉल्युशन दे रहा हूं। अरे जो आपको पसंद  करते लेकिन वोट नहीं दे सकते, उनसे वोट लेने की व्यवस्था कर लो ।

चचा के परेशान चेहरे की सिलवटें कुछ कम हुई। बोले 21 साल से नीचे वाले ना वोट डाल सकते, ना शादी कर सकते, दारू पीने के लिए  भी कम से कम 25 साल का होना चाहिए। अब इससे कम क्या उमर करूं? 8  साल के बच्चे को वोटर बना दूँ क्या ? 

8 नहीं सर 18 !! वैसे भी यह 18 से 21 वाले बहुत बड़े फैन हैं आपके। यह सारा वोट आपको ही मिलेगा। बस उनको यह कहना कि देखो मैंने तुमको वोट देने का अधिकार दिया, तुम मुझे वोट दे दो।

वाह मेरे चमचे। क्या फॉर्मूला निकाला है? बताओ क्या करना होगा? अभी रेडियो पर अनाउंस कर दूं? 

नहीं सर, उसके लिए थोड़ा और काम करना होगा। वह हम सब देख लेंगे। आप बस शपथ ग्रहण की तैयारी करो। हम बच्चों से वोट लेने का सारा काम संभाल लेंगे।

अचानक बाहर की गली से तेज़ आवाज़ आई। गली गली में शोर है.. हैंडसम चचा बिल्कुल नहीं घबराए। आइने में फिर से अपने आप को और अपनी लम्बी  नाक को निहारा । खुश हो गए आखिर युवा नेता को युवा वोटर का एक वोट बैंक और उनकी समस्या का हल उनको मिल चुका था। 







Tuesday, August 18, 2020

कभी पैदल गुजर कर देखो तो

गुजरते हो जिन राहों से 
अपनी कार का शीशा  चढ़ाए
अपनी आंखों पर काला चश्मा लगाए
अपने कानो पर हेडफोन लगाए
उन्हीं राहों से कभी पैदल गुजर कर देखो तो।

 जिस पुलिया के नीचे
बारिश से बचने को
हेलमेट उतार कर अपने भीगे रुमाल से
अपना भीगा सर पोछते 
मोटर साइकिल वालों को देखते हो,
उसी पुलिया के एक कोने पर
तुम्हारे गांव का एक परिवार
रहता है चुपचाप
कांच के छोटे गिलास में बेचता है चाय
कभी उसकी दुकान पर फुरसत से
 रुक कर देखो तो।

जिस सड़क के किनारे पेड़ को
देख खीझते हो कि बढ़ गई हैं
कितनी इसकी टहनियां
लगती है खरोंच मेरे कार पर इसकी
बढ़ी बेतरतीब डालियों से
उसी टहनी के उपर मैना ने बनाया है 
एक घोसला, दो चूजे भी हैं
ट्रैफिक के शोर में ना सुनाई देती
कूक भी फैली है उधर
हेडफोन उतार कर मैना परिवार का संवाद 
सुन कर देखो तो।

जिस सब्जी बेचते ठेले वाले से 
कार में बैठे बैठे ही मोल भाव कर,
तुलवा लेते हो ताज़ी हरी सब्जियां
उसी ठेले के नीचे बैठी रहती है,
उसकी छोटी बेटी अपनी स्लेट
पेंसिल के साथ ककहरा सीखते,
बीच बीच में बेटी को पढ़ाता है,
तुम्हारा सब्जी वाला अपनी दुलारी 
का शिक्षक भी तो है,
कभी उसकी दुकान से परे
उसके छोटे स्कूल में
जाकर देखो तो।



खोलता है दौड़कर गेट तुम्हारे लिए
रफू की गई वर्दी पहने सिक्युरिटी गार्ड,
उसकी फटी जेब से झांकता रहता है 
मनीऑर्डर की गंदली रसीदों का बंडल,
एक फूटे स्क्रीन वाले छोटे से 
फोन से किससे बतियाता रहता है,
शायद उसका जन्मदिन हो आज
या बेटा पास हुआ हो मैट्रिक परीक्षा,
शायद पता चल जाय
उसकी मुस्कुराहट का राज,
उसके सलाम का जवाब प्यार से
देकर देखो तो।

कभी कार से उतर कर
धूप धूल की परवाह किए बगैर
गुजरते हो जिन राहों से
उन्हीं राहों से कभी पैदल
 गुजर कर देखो तो।

Monday, August 17, 2020

होना है यह तो तय है, कब होना है पता नहीं

पंडित जसराज नहीं रहे, निशिकांत कामत ने भी अलविदा कह दिया। कामत पचास साल के थे और पंडित जसराज नब्बे वसंत देख चुके थे, फिर भी दोनो की मृत्यु का दुख बराबर है। यद्यपि मृत्यु जीवन का एक मात्र सत्य है, यह एक मात्र घटना है जिसकी पूरी गारंटी है। फिर भी यह जब आता है तो हमें चकित करता है, दुखित करता है। हमेशा दबे पांव आता है और हमारे अपनों को चुरा कर ले जाता है। आदमी इसकी तैयारी कभी नहीं कर पाता। 

जीवन की क्षणभंगुर प्रवृत्ति इसीलिए है क्योंकि भले मृत्यु निश्चित हो, उसका समय भी शायद विधाता ने सबके लिए तय कर रखा हो, लेकिन किसी को वास्तव में यह पता नहीं कि वह समय क्या है। यह परमात्मा का हमारे साथ एक लुका छिपी का खेल सा है, जो सारी मानव सामाजिक संरचना का आधार है।

 यह लोक लाज सम्मान उद्यम प्रेम रूठना मनाना लजाना लड़ना मनुहार करना नखरे अदाएं लाभ हानि यश अपयश आदि सब इसीलिए है क्योंकि मानव को अपनी मृत्यु का समय पता नहीं। जिस व्यक्ति को ज्ञात हो जाय कि उसके पास चंद घंटे बचे हैं वह क्या लोक लाज की बंदिशे मानेगा, वह क्यों किसी का सम्मान करेगा, दुनिया क्या कहेगी इससे उसको कोई मतलब नहीं रहेगा । ऐसा कोई व्यक्ति उद्यमी भी नहीं होगा, ना ही ऐसा व्यक्ति प्रेमी हो सकता है। मृत्यु के भय से आशंकित हृदय में प्रेम के लिए स्थान कहां?  वह ना किसी को नखरे दिखाएगा ना किसी के नखरे सहने का धैर्य उसके पास होगा। वह किसी से लड़ेगा भी नहीं और किसी से मनुहार भी नहीं करेगा। ना लाभ उसको आकर्षित करेगा ना हानि शब्द का कोई अर्थ उसके लिए होगा।यश अपयश उसके लिए बेमानी हो जाएंगे। जिसके नभ में मृत्यु का दीर्घ विवर बन चुका हो वहां यश का सूर्य ना उदित होगा ना अपयश का ग्रहण कोई चिंता का कारण होगा। 




जीवन का हर भाव, हर कार्य और हर रोमांच इसी कारण से है कि मनुष्य को मृत्यु का समय नहीं पता।  अगर मृत्यु का समय पता हो, तो डाक्टर का क्या काम, कोई संभल के सड़क पर क्यों चले, अनुशासन प्रशासन और सुशासन सभी निर्मूल हो जाएं। सोच कर देखिए तो मानव सभ्यता का आधार भी यही है। मृत्यु का समय ज्ञात हो जाय तो सभ्यता की मृत्यु हो जाय, सारा सामाजिक ढांचा ध्वस्त हो जाय। भले  ही हमें आकस्मिक मृत्यु का दुख झेलना पड़े, समस्त सुखों और जीवन के आनंद के मूल में मृत्यु की अनिश्चितता ही है | 


हाल में ही हमको छोड़  कर गए  शायर राहत  इन्दोरी कह गए हैं | 
"ये हादसा तो किसी दिन गुज़रने वाला था
मैं बच भी जाता तो इक रोज़ मरने वाला था"।


Sunday, August 16, 2020

धोनी होने का मतलब

धोनी से पहले भी कीपर हुए थे, लेकिन वह बैट्समैन नहीं कहलाते थे।


धोनी से पहले भी कैप्टन हुए थे, लेकिन वह कैप्टन कूल नहीं कहलाते थे।


धोनी से पहले भी स्टार हुए थे, लेकिन वे रांची जैसे छोटे शहर से नहीं आते थे।


धोनी से पहले भी अच्छे क्रिकेटर थे, लेकिन वे  महान , मेहनती , जीनियस , क्लासिकल, स्टाइलिश कहलाते थे,स्ट्रीट स्मार्ट नहीं कहलाते थे | 


धोनी से पहले भी कैप्टन ट्रॉफी जीतते थे, लेकिन वह ट्रॉफी अपने हाथ में रख कर ही  फोटो खिंचवाते थे।


धोनी से पहले भी मैच आखिर ओवर तक जाते थे, लेकिन कोई जोगिंदर और मोहित शर्मा जैसों को आखिरी ओवर नहीं देते थे।


धोनी से पहले भी छोटे शहर के लड़के बड़े क्रिकेटर बनने के सपने देखते थे, लेकिन वे उन्हें पूरा शायद ही कर पाते थे।


धोनी से पहले भी स्टार क्रिकेटर शादी करते थे, लेकिन कोई स्टार क्रिकेटर आम आदमी की तरह साधारण शादी नहीं करते थे।




धोनी से पहले भी लोग रिटायर होते थे, लेकिन इतना सस्पेंस रख कर शायद ही कोई रिटायर होते थे।


धोनी से पहले भी गेंद हवा में पहुंचाने  वाले शॉट लगते थे, लेकिन वह हेलीकॉप्टर शॉट  नहीं कहलाते थे।


पहले क्रिकेट भी था, क्रिकेटर भी थे, लेकिन कोई माही भाई नहीं कहलाते थे। 

Friday, August 14, 2020

यह अनेकता में एकता किस चिड़िया का नाम है??

हर साल की तरह हमारा स्वतंत्रता पर्व आ गया। 74 वां स्वतंत्रता दिवस जहां हम अपना तिरंगा गर्व से लहराएंगे। स्कूलों में बच्चों को भाषण दिया जाएगा । वही बातें सुनाई जाएगी जो सुन सुन कर हम कुछ अभ्यस्त से हो चुके हैं, जिन बातों के कोई खास अर्थ हमें समझ नहीं आते। हमें लगता है कि यह सब बस कहने की बातें हैं, जिनका वास्तविक जीवन से कोई संबंध शायद ही हो । उनमें से ही एक बात है कि भारत में विविधता में एकता है। कक्षा पांच से लेकर पीएचडी तक के छात्र यह बात लिखते रहते हैं कि भारत में अनेकता में एकता है। आखिर इसका अर्थ क्या है? हम सभी भारत के नागरिक हैं, हमारा एक ही झंडा है, एक ही राष्ट्र गान है, एक ही संसद है और एक ही संविधान है। एक ही सेना के शौर्य की गाथाएं हमें गौरवान्वित करती हैं और एक ही क्रिकेट टीम को लेकर हम इंडिया इंडिया चिल्लाते हैं। क्या यही अनेकता में एकता है जो कारगिल से कन्याकुमारी और सोमनाथ से कामाख्या तक लोगों में फैला है और जिसकी घुट्टी हमें पिलाई जाती रही है ?

अगर हाँ तो 26 जनवरी 1950 से पहले हम सभी एक देश के नागरिक नहीं थे, यह तिरंगा भी 80 साल पहले नहीं था, हमारी सेना तो ब्रिटिश सेना का वह हिस्सा है जो बटवारे के बाद हमारे हिस्से आया, और क्रिकेट टीम को 1983 से पहले शायद ही कोई जानता भी था। तो क्या यह विविधता में एकता कोई हाल की घटना है? या अंग्रेजों को साझा शोषक के रूप में झेलने के बाद हम जिस एकता के सूत्र में बंध गए,यह वही है । अगर ऐसा है तो हमारी अनेकता में एकता उन कैदियों की दोस्ती के जैसी है जो एक साथ सजा काटने के कारण आत्मीय दोस्त बन गए। सब लोग मानेंगे कि यह विविधता में एकता कोई सौ दो सौ साल पुरानी चीजों नहीं है, उससे ज्यादा पुरानी होनी चाहिए।

‌अगर यह एकता हमें अंग्रेज़ नहीं दे गए तो फिर क्या है यह अनेकता में एकता। एक कश्मीरी और एक तमिल की भाषा, खानपान, पहनावा, पूजा पद्धति , विवाह संस्कार में कोई मेल नहीं है। उसी प्रकार एक तेलगू युवक और एक भोजपुरी युवक के संगीत की पसंद में शायद ही कोई साम्य हो!! ऐसे वैषम्य और वैविध्य को देख कर लगता है कि कि हमारी अनेकता में एकता शायद राजनीतिक व्यवस्था के स्तर पर ही है, चूंकि हमारे पासपोर्ट का रंग एक है, इसलिए हम एक हैं। मतलब यह कि यह एकता 70-75 साल पुरानी है और बार बार बच्चों को दुहराई जाती है ताकि एक राजनीतिक प्रभुसत्ता का आवरण जो विविध लोगों को समेटे हुआ है, फट ना जाए। यह अनेकता में एकता की ठंडी जलधारा हमपर उड़ेली जाती है ताकि बार बार होने वाले दंगे, क्षेत्रीय विवादों और अनवरत चलते सामाजिक घर्षण के उत्पन्न उष्मा अग्नि का रूप ना ले ले। मतलब कि हम वास्तव में सौ अलग राष्ट्र हैं जिनको अंग्रेजों ने एक साथ प्रताड़ित किया और जब वे चले गए तो सरदार पटेल जैसे लोगों ने सबको एक साथ कर दिया, और सब लोग 'को नृप होय हमें का हानि' के भाव से एक साथ आ गए। यह अनेकता में एकता कुछ नहीं बस एक साझा झूठ है जो हम अपने आप को दोहराते रहते हैं जैसे किसी बीमार को समय समय पर पेन किलर का इंजेक्शन दिया जाता है ताकि उसका दर्द उसको महसूस ना हो।
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‌फिर दिल कहता है कि अगर यह झूठ है तो कोई झूठ इतना लंबा नहीं चलता, यह झीना आवरण जरूर फटता और पैनकिलर का असर कभी ना कभी हट ही जाता। जरूर कुछ ऐसा है जो हमें उपर से दिखता नहीं।
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‌चलिए थोड़ा गहराई में चलते हैं। मान लें हम उस भारत में खड़े हैं जहां कि हमारे पास ना संविधान है , ना तिरंगा, या कोई क्रिकेट टीम और ना एक ही रंग का पासपोर्ट। बाबाधाम देवघर का एक देहाती किसी तरह मुंबई पहुंच जाता है । उसको ना वहां की भाषा समझ आती है और ना ही बड़ा पाव का एक निवाला उसके गले से उतरता है। मुंबई की अपार भीड़ में एक विशाल जत्था उसको दिखता है जो विनायक लम्बोदर के नारे लगा रहा है। अचानक से उसके चेहरे पर एक मुस्कान फैल जाती है कि अरे इधर के लोग इतने भी अजनबी नहीं हैं, वह बाबा का भक्त है और यह अजनबी लोग बाबा के बेटे गणेश की पूजा करते हैं।उसके बगल में खड़ा मथुरा का एक भैया और एक गुजराती छोरा यह महसूस करता है कि उनका कान्हा और विट्ठल ही इधर गोविंदा कहलाता है। अब झारखंड, गुजरात और मथुरा के तीनों लड़के अपने एक मराठी मित्र के घर जाते हैं । बिना कहे तीनों घर के बाहर ही चप्पल उतार देते हैं। यह तो किसी ने नहीं सिखाया कि चप्पल पहन के घर में नहीं आते। घर में घुसते ही सामने उनके नए बने मराठी दोस्त की मां दिखती है, तो तीनों अपने आप उसके चरण स्पर्श करने को झुक जाते हैं। तीनों को आश्चर्य होता है कि जहां के लोगों की भाषा , खानपान और कपड़े उसे बिल्कुल समझ नहीं आते था, उनके घर में भी एक छोटा सा पूजा स्थान है बिल्कुल वैसा जैसा उनके घर झारखंड, गुजरात और मथुरा में है। घर में पूजा शुरू होने ही वाली है तो दोस्त की आई आकर सबके सर पर चंदन लगाती है, बाहर से गुजरता एक तमिल युवक हतप्रभ हो जाता है कि इधर के लोग ललाट पर वैसे ही चंदन लगाते हैं जैसा कि उसके घर रामेश्वरम में लगाते हैं। पड़ोस में बसा हैदराबाद के मुस्लिम युवक के लिए भी खुशियां सिर्फ ईद तक सिमटी नहीं है, उनकी खुशियां गणेश चतुर्थी भी हैं क्योंकि विनायक की मूर्ति वही बनाते हैं और मेले में दुकानें भी वही लगाते हैं।
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‌इस कहानी को और भी बढ़ाया जा सकता है । देश का हर समुदाय इस कहानी में एक पात्र बन कर आ सकता है जिससे यह सिद्ध होता है कि कोई एक अंतर्धारा है जो इन सबको जोड़ती है।
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‌यह अंतर्धारा संविधान, झंडे और सरकार जैसी स्थूल ना होकर सूक्ष्म है। इसको देखना कठिन है लेकिन महसूस करना आसान है। यह सूक्ष्म अंतर्धारा हमारी नैतिकता, पारिवारिक मूल्यों, आस्था और हमारे जीवन सिद्धांतों में परिलक्षित है। जैसे एक गाना है कि तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई, यूं ही नहीं दिल लुभाता कोई। यह रिश्ता कोई सत्तर साल साल या दो सौ साल पुराना नहीं है, हजारों वर्षों पुराना है।
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‌अशोक ने अफ़ग़ानिस्तान से लेकर उत्कल तक तलवार के बल पर सैन्य विजय हासिल की, लेकिन उसकी सेनाओं ने स्त्रियों का हरण नहीं किया, पराजित राजाओं को अपना दास नहीं बनाया। यह मूल्य अशोक में कहां से आए? थोड़ा पीछे जाने पर हमें उत्तर मिल जाता है कि यही कार्य उससे कहीं पहले राम कर चुके थे। बालि और रावण वध के बाद किष्किंधा और श्रीलंका की स्त्रियों का हरण नहीं किया, उसे अपने राज्य में नहीं मिलाया।
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‌आगे चल कर हम इन्ही मूल्यों को विविध रूप में देख सकते हैं | यही वह मूल्य हैं जिसके बदौलत एक गुजराती बोलने वाला व्यक्ति चंपारण में भोजपुरी बोलने वाले अनपढ़ किसानों से आत्मीय संबंध बना पाता है और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत करता है। वहां पर उनकी विविधता उनके बीच आड़े नहीं आती बल्कि वही अंतर्धारा एक कड़ी बन कर उनको जोड़ लेती है। केरल का एक पंडित पूरे भारत में सनातन धर्म के एकता सूत्र में बांध देता है। राम, बुद्ध, अशोक, अकबर ,शंकर और फिर गांधी के व्यक्तित्व में आपको वही धारा प्रवाहित दिखेगी। ये बड़े नाम बड़ी नदियां हैं और हम साधारण जन उसकी सहायक छोटी असंख्य धाराएं।
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‌एक प्रसंग याद आता है जब लोकसभा में स्पीकर सोमनाथ चटर्जी, विपक्ष की नेत्री सुषमा स्वराज को व्यंग्यात्मक अंदाज में पूछते हैं कि यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद क्या है? सुषमा जी मुस्कुराते हुए जवाब देती हैं कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद वह है जिसके कारण एक बंगाली परिवार अपने बेटे का नाम गुजरात के एक मंदिर के नाम पर रखता है। और पूरा सदन ठहाकों से गूँज उठता है |


बंगाल के गौरांग महाप्रभु मिथिला कोकिल विद्यापति के भजन गाते हैं। एक पंजाबी रवि कपूर की बेटी तिरुपति की पहाड़ियों पर बसे एक देवता के नाम पर अपनी कंपनी का नाम बालाजी टेलीफिलम्स रखती है। कश्मीर के केसर के बिना हैदराबाद की बिरयानी नहीं बनती और एक मराठी शिवाजी राव गायकवाड़ रजनीकांत बन कर तमिल दिलों पर राज करता है। बांग्ला भाषा में शिक्षा पाया सुर्ज कुमार तिवारी हिंदी का निराला बन जाता है तो मराठी भाषी मुक्तिबोध हिंदी भाषा में चांद का मुखड़ा टेढ़ा होने के उद्घोषणा करता है। एक गुजराती हिंदी में सत्यार्थ प्रकाश लिखता है तो एक पांडे परिवार का लड़का बांग्लादेश की फिल्मों का नायक बन जाता है। रांची का एक युवक चेन्नई की क्रिकेट टीम का निर्विवाद लोकप्रिय कप्तान बनता हैऔर रालेगण सिद्धि का एक वृद्ध भ्रष्टाचार के विरुद्ध पूरे देश की युवा पीढ़ी का नेतृत्व कर पाता है।
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‌ हरि अनन्त हरि कथा अनंता। भारत वर्ष की अनेकता में एकता की कहानियां जीवन के हर संदर्भ में महसूस की जा सकती हैं। हम वह राष्ट्र हैं जो राष्ट्रवाद की संकुचित परिभाषा से ऊपर है, हम वह समाज हैं जिसे समाज शास्त्र नहीं समझ सका और हम वह धर्म हैं जहां धर्म जीवन है ना कि जीवन की परिधि निर्धारित करने वाली कृत्रिम बंधनों का एक समुच्चय। शायद यही हमारी विविधता में एकता का एक अर्थ है।

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं।। जय हिन्द। जय मातृभूमि।।

Sunday, August 9, 2020

Three legged chicken

A fella was driving his car at 45 miles an hour down a country road. Suddenly he looked out and beside him there was chicken running alongside the speeding car. Amused he stepped on the gas and reached around 60 miles an hour. Chicken caught up with him and started running along with him on the highway. Bewildered he looks at the chicken and realizes that chicken had three legs. But before he could make up his mind for sure, chicken took off out in front of the car at 60 miles per hour. Suddenly the chicken gets off the road and enters a house beside the highway.

He stops the car and there is a farmer standing outside the house. He asks the farmer; did you see a chicken run past just now. Farmer says ..Yes these are my chicken. Man says, You may call me crazy, but I think that the chicken had three legs. Farmer says You are right, the chicken has three legs. I breed three legged chicken. Man is fascinated. He asks why do you breed three legged chicken? Farmer says .. See.. I like to eat chicken leg piece; My wife likes to eat chicken leg piece and my kid also likes chicken leg piece. I was tired of fighting for the leg piece at the dinner table. So I started breed three legged chickens. Man asks, How does it taste? I mean the leg piece of a three legged chicken.
Farmer Says. I don’t know. I have never been able to catch one.



That’s President Ronald Reagan opening his address in a foreign country during his official visit as POTUS. Like beauty, sense of humor is a gift from God. Unlike beauty it does not fade with age. Just see him addressing at Berlin and during his speech a balloon pops up loud during his address..


https://youtu.be/Krjmr7laKzY

Saturday, August 8, 2020

Are you waiting for your Morpheus

 

What is the recipe of building the safest jails from where escaping is toughest near impossible? Answer is don't let the prisoners know that they are in jail.

Biased and an agenda driven education can do exactly the same. If British government structure was meant for maximum exploitation of resources, British forces was for protecting the British interests, how come the education system they implemented can be for a better future of Indians. Macaulay believed that complete Indian knowledge and philosophy can't complete with a single book in British library. The victims of that mentality live and die by that fact. For them whatever is said by western thinkers is pure gold. For Indian history, they believe a historian who studied Indian history in Oxford University; for understanding Indian current political scenario , they refer to what BBC and Washington post say. Their views on religion, culture, tolerance and secularism are based on books written by people who believe that by colonialism whites made non-whites cultured and blacks should be grateful towards their masters for that.



If you understand what I am trying to say here, then maybe you are the one. You are Neo who is finally out of matrix. If not, keep enjoying the jail term you are not even aware of, in world's safest jail. Hope you meet your Morpheus soon.. I really wish...

 

Friday, August 7, 2020

ताकि सिंघम शिकरे की बजाये न कि उसकी ड्यूटी बजाये


6 दिसंबर 2019। स्कूली छात्राओं की एक बस एक पुलिस नाके से गुजरती है। ड्यूटी पर खड़े पुलिस वाले को एक सुखद  सा आश्चर्य  होता है। स्कूली लड़कियों का वह जत्था पुलिस वालों पर फूल बरसा कर गुजर जाता है। आस पास खड़े लोग तालियों से इसका स्वागत करते हैं। हैदराबाद की एक डॉक्टर के सामूहिक बलात्कार के आरोपियों को तड़के एक एनकाउंटर में मारे जाने को लेकर जनता पुलिस की वाह वाही बटोर रही थी। 

सुशांत सिंह राजपूत के मामले की चल रही जांच के 6 हफ़्ते बीतने के बाद  भी कोई प्रगति होती ना देख उसके पिता पटना में एक प्राथमिकी दर्ज कराते हैं। पुलिस मुंबई पहुंचती है लेकिन स्थानीय पुलिस का कोई सहयोग नहीं मिलता। दिशा सालियान के मामले से जुड़े दस्तावेज डिलीट हो जाते हैं। बिहार की पुलिस एक ऑटो में बैठकर धूल फांकती फिरती है। बिहार के एक आईपीएस आफिसर को मुंबई पहुंचने पर जबरदस्ती नजरबंद कर दिया जाता है।


शायद आपको आश्चर्य हो या शायद ना हो, कि हमारा संसद भवन मात्र  90 साल पुराना है, और हमारी पुलिस व्यवस्था 160 साल पहले बने कानून के आधार पर चलती है। जब यह कानून बन रहा था तो इसकी प्रस्तावना में लिखा है कि यह कानून एक ऐसे पुलिस की स्थापना करेगी जो " राजनीतिक रूप से उपयोगी" हो।  ऊपर की दो घटनाओं में भले ही एक में पुलिस को तालियां मिली और दूसरे में गालियां, इन दोनों घटनाओं के मूल में एक ही बात है। पुलिस बल का राजनीतिक उपयोग।

आजादी के बाद हमने शिक्षा, उद्योग, कृषि हर क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन किये, लेकिन अपनी औपनिवेशिक विरासत में मिले औपनिवेशिक पुलिस व्यवस्था को बदलने की दिशा में शायद ही कोई प्रयास किया। शुरू के कुछ सालों तक इस व्यवस्था की खामी का अहसास हमें इसलिए नहीं हुआ क्योंकि उस समय का राजनीतिक वर्ग देशप्रेम और समाज कल्याण  , नैतिकता के उच्च आदर्शों से चालित था। बाद में जैसे ही हमारी राजनीतिक व्यवस्था में नैतिकता का पतन हुआ, पुलिस की छवि बिगड़ती चली गई। पुलिस के व्यापक राजनीतिक दुरुपयोग का पहला प्रयोग आपातकाल के दौरान हुआ। उसके बाद मोरारजी देसाई की सरकार ने वर्ष 1977 में पुलिस सुधारों के लिए धर्मवीर कमिटी बनाई, जिसने काफी लगन से अपना कार्य किया । दुर्भाग्य से जब तक धर्मवीर कमिटी ने अपनी रिपोर्ट सौंपी, इंदिरा गांधी की सरकार वापस आ चुकी थी। इंदिरा जी की सरकार ने मोरारजी सरकार द्वारा उठाए गए अच्छे कदम को आगे बढ़ाने में कोई रुचि नहीं दिखाई।

हमारी पुलिस की समस्या क्या है? एक की चर्चा हम पहले कर चुके हैं कि पुलिस का ढांचा , उसकी उत्पत्ति ही औपनिवेशिक आकाओं की हित साधना के लिए हुआ है। यह ढांचा अब भी बरकरार है। नाके पर खड़े एक पुलिस कांस्टेबल का उदाहरण लीजिए।  अगर एक उस खबर मिले कि फलां बाज़ार के पास ट्रैफिक लाइट खराब हो गई है और बहुत लंबा जाम लगा है जिससे हटाना बहुत जरूरी है। वो वहां के लिए निकल ही रहा है कि वायरलेस पर मुख्यमंत्री के काफिले के उसके नाके से गुजरने की घोषणा होती है। सोचिए कि वह पुलिस वाला क्या करेगा? वह मुख्यमंत्री के काफिले को पहले पार करायेगा। चाहे वह जाम अगले 3 घंटे तक लगा रहे। यहां हमने ट्रैफिक जाम का उदाहरण लिया , आप कुछ और भी सोच सकते हैं जिसमें हत्या, और दंगा तक शामिल कर सकते हैं। ट्रंप दौरे के दौरान दंगाई सफल क्यों हो गए, इसके एक वजह भी पुलिस की इस संरचना में छुपा है। वर्तमान में पुलिस की कार्य वरीयता में जनता की सेवा का स्थान बहुत या कहें तो सबसे नीचे है, यह इसकी संरचनात्मक खामी है, या यूं कहें कि इसे ऐसा ही बनाया गया है। 

इससे पहले कि आप हमारी पुलिस को पूरी तरह भ्रष्ट, निकम्मी, असंवेदनशील मान लें, आपको पुलिस व्यवस्था पर पड़ रहे चौतरफा राजनीतिक, नौकरशाही , संसाधनों की कमी और काम की अधिकता के असहनीय दबाव के बारे में सोचना होगा। इतने दवाब में हमारी पुलिस कार्य कर रही है कि उसको देख कर आपकी संवेदना उनके साथ जा बैठेगी। तब भी आपका मन ना भरे तो अमरीका की अफ़ग़ानिस्तान में पुलिसिंग, सिंगजियांग और लहासा में चीन की पुलिसिंग , बलोचिस्तान में पाकिस्तान की पुलिसिंग या वापस से मिनियापोलिस में जॉर्ज फ्लोयड की गर्दन दबाते अमेरिकन पुलिस को देख लें, आपका संदेह दूर हो जाएगा। इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी हमारी पुलिस विश्व के सबसे अनुशासित पुलिस बलों में शामिल है।

हां सुधारों की आवश्यकता एक लंबे समय से है। उच्चतम न्यायालय ने इस दिशा में कई दिशा निर्देश जारी किए है, जिनका एक ही लक्ष्य है कि पुलिस जनता की पुलिस बने ना कि शासक वर्ग की हित साधने की एक मशीनरी। हमारे पुलिस बल को यह विश्वास दिलाना जरूरी है कि अगर वह अपना काम यानि जनता की सेवा पूरी लगन से कर रहे हैं तो उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।



एक पुलिस की वर्दी पहने इंस्पेक्टर से यह उम्मीद की जाती है कि वह सिंघम जैसा सख्त हो, शेरलॉक होम्स जैसा अपराध अनुसंधान करे, यहां तक कि सिंबा की तरह आंख मारे पर डांस तक करे लेकिन हाथी राम जैसा ईमानदार भी हो। दिक्कत यह है कि पुलिस का रोल करने वाले को हमारे यहां करोड़ों मिलते हैं,  पुलिस का काम करने वालों का घर तक मुश्किल से चले ऐसी पगार दी जाती है। पुलिस का किरदार निभाने वाले एंग्री यंग मैन बन जाते हैं और ज़िन्दगी भर पुलिस का काम करने वाले ठुल्ले कहलाते रहते हैं। जब तक यह सब नहीं बदलेगा, हमारी पुलिस सबसे  अंत में पहुंच कर यही डायलॉग मारती रहेगी कि अपने आप को पुलिस के हवाले कर दो,कर दो ना प्लीज़। अपराधी यही डायलॉग मारते रहेंगे कि डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। डॉन ऐसा बोल पाता है क्योंकि डॉन को अपनी ताकत से ज्यादा पुलिस की मजबूरियों पर भरोसा है। उसका यही भरोसा तोड़ने जरूरत है। फिर हमारी फिल्मों की तरह हमारा सिंघम भी जयकांत शिकरे की अच्छे से बजाएगा, ना कि रीयल लाइफ में शिकरे की ड्यूटी बजाएगा। 


Thursday, July 30, 2020

मुंशी जी के कुछ अनसुने किस्से

गणित उनके लिए हमेशा गौरीशंकर की चोटी थी। उसपर कभी चढ़ ना सके। जैसे तैसे दूसरे दर्जे में मैट्रिक पास किया। आगे की पढ़ाई के लिए वजीफा ना मिल सका और अपने पैसे खर्च कर हिन्दू कॉलेज में दाखिला लेना संभव ना था।

आगे 1905 में ट्रेनिंग कॉलेज में पढ़ाने की डिग्री ली तो भी डिग्री पर लिख दिया गया not qualified to teach mathematics. पैरवी के आधार पर ही शिक्षक और बाद में निरीक्षक बने। लेकिन स्थानांतरण के लिए दिए गए आवेदन की सजा के रूप में बस्ती जिले में भेज दिए गए। स्वास्थ्य खराब रहने लगा तो बस्ती में ही सहायक शिक्षक बने।

प्रेस खोला तो वहां भी प्रेस के रूप में सुरसा ही मिली। अपना सर्वस्व झोंक देने के बाद भी प्रेस उनका खून पीकर ही चलती रही। फिल्मी दुनिया में किस्मत आजमा यी लेकिन वहां भी टिक ना सके।

अनाकर्षक सा व्यक्तित्व था। एक पत्रमित्र उनसे पहली मुलाकात का वर्णन कुछ इस प्रकार करते हैं। जीने के ऊपर झांकने पर जो कुछ ऊपर दिखा उससे मुझे धक्का सा लगा। इतनी दूर से इतनी आशा बांध कर क्या इन्हीं मूर्ति के दर्शन करने आया हूं । एक बार तो जी में आया कि मन में बसी रमणीक छवि को बनाएं  रखूं और यहीं से लौट जाऊं। यह सामने खड़ा व्यक्ति साधारण, इतना स्वल्प इतना देहाती मालूम हुआ कि...

आर्थिक रूप से हमेशा विपन्न यह सरस्वती पुत्र फिर भी कुछ ऐसा लिख गया कि कहते हैं यदि  1910 से लेकर 1936 का इतिहास यदि विलुप्त हो जाय तो इनके साहित्य को पढ़कर पूरी तरह समझा जा सकता है। मैं बात कर रहा हूं कलम के सिपाही मुंशी प्रेमचंद की। और ऊपर उल्लेखित उनके पत्र मित्र हैं कथाकार जैनेन्द्र। जैनेन्द्र उनके चिर सखा बने रहे। अपनी मृत्यु शैय्या पर अपनी आखिरी रात को जब लोग प्रेमचंद से भगवान को याद करने को कहते हैं, तो प्रेमचंद कहते हैं " जैनेन्द्र, लोग ऐसे समय याद करते हैं ईश्वर, मुझे भी याद दिलाई जाती है, पर अभी तक मुझे ईश्वर को कष्ट देने के जरूरत नहीं मालूम नहीं हुई है।" अभाव और कष्ट को जीवन भर झेलता एक मनुष्य इतना आत्मबल रख सकता है, विश्वास के परे है।



उनके साहित्य पर टिप्पणी करने के योग्य अपने आप को नहीं पाता। उनका साहित्य पूरी तरह पढ़ लूं, समझ लूं इसके लिए भी शायद यह जीवन कम पड़े। उसके बाद भी शायद आलोचना ना कर सकूं। भाव विभोर हृदय और चमत्कृत मस्तिष्क आलोचक के गुण नहीं हो सकते। इसलिए उस चीज से परहेज़ ही करता हूं।

1936 में अपने आखिरी भाषण में प्रेमचंद कहते हैं " जिन्हें धन वैभव प्यारा है, साहित्य मंदिर में उनका स्थान नहीं है। यहां उन उपासकों की जरूरत है जिन्होंने सेवा को ही अपना जीवन की सार्थकता मान लिया हो। हम तो समाज का झंडा लेकर चलने वाले सिपाही हैं।

कलम के सिपाही युगपुरुष प्रेमचंद को उनके जन्मदिवस पर कोटिश अभिनंदन।
उनकी लेखनी का छोटा सा नमूना कहानी "बूढ़ी काकी" से, श्रद्धा सुमन के रूप में।

"बूढ़ी काकी ने सिर उठाया, न रोईं न बोलीं। चुपचाप रेंगती हुई अपनी कोठरी में चली गईं। आवाज़ ऐसी कठोर थी कि हृदय और मष्तिष्क की सम्पूर्ण शक्तियाँ, सम्पूर्ण विचार और सम्पूर्ण भार उसी ओर आकर्षित हो गए थे। नदी में जब कगार का कोई वृहद खंड कटकर गिरता है तो आस-पास का जल समूह चारों ओर से उसी स्थान को पूरा करने के लिए दौड़ता है।"

Tuesday, July 28, 2020

God's cruel prank that Dil Bechara is..

Dil Bechara is hard to watch. This would have been just another tearjerker , If Sushant Singh Rajput aka SSR was among us. Whole movie seems like a cruel prank nature played with us. As if nature was preparing us for the bad news before actually giving us the bad news. 

The instances are far too many to ignore which suggests that actually nature was working on this joke to unleash upon us in already terrible year of 2020.

 SSR stars in a movie in the movie which people watch after he dies.  During the entire movie, he seems to be the most lively and jovial character while he was the one nearest to the end.

 The movie is set up in Jamshedpur, which is also named Tata, which means bye.

 His name in the movie is Immanuel, which means ‘God is with us’. This name reminds you of constant irritating presence of God and his cruel prank throughout the movie like Kizie basu's oxygen pipe around her neck.

 Just like in movie SSR became victim of cancer that is nepotism and mafia culture. The cancer which took his life in installments , first they took away his leg in the movie and his projects in real life before taking his life eventually.

 SSR was a big fan of stars and had a deep passion for astronomy. It is just more than a coincidence that his last movie is based on the ‘Fault in our stars’ before he himself left for becoming a star.

Sometimes I feel that why should we bother so much about SSR. He may be just another lad who couldn't cope up with the cruel world and may be that what finished him. If he was that weak, may be his end was acceptable if not fair. But but but... If he was suffocated by a cabal, a gang , or a system, we all should rise against it.


Remember injustice anywhere is a threat to justice everywhere. If this system prevails, you will never get another talented outsider like Big B, another SRK or another Kangna who came from outside but ruled the tinsel town.



In Dil Bechara, SSR attends his own funeral. So, may be like Manny, SSR too had arranged his own funeral before he actually left us. But we will never know that. that’s the cruelest part of God's prank.

If a movie is meant to move you, Dil Bechara is the movie.. Kuch films banayi nahin jaati, ban jaati hai..

 


Thursday, July 23, 2020

हिमालय की नटखट नातिनों का खेल

अरे हम सब मदारीचक र चिकिये, हमरा पानी कि कर तै। मानक हिंदी में कहूं तो अरे हम लोग मदारी चक गांव के हैं, पानी हमारा क्या बिगाड़ लेगी? मेरे दादा हमेशा एक गांव का नाम लेते थे मदारी चक। काफी समृद्ध गांव हुआ करता था, नदी की धारा में समा गया। गांव मिट गया, गांव का नाम नहीं मिटा। बोस्टन में हों या दिल्ली के द्वारका में, उस गांव के लोग आज भी अपने आप को मदारी चक का ही बताते हैं।

बिहार में बाढ़ जीवन का हिस्सा नहीं है, वही हमारा जीवन है। हथेलियों की रेखाओं की तरह नदियां उत्तर बिहार में फैली हुई है। जैसे हाथ की लकीरें बदलती रहती है, बिहार में नदियां भी अपना मार्ग बदलती हैं। किसी नटखट चपल बालिकाओं के समूह की तरह जो गांव में लुका छिपी खेल रही हों। वे बालिकाएं अपनी लुका छिपी के खेल के दौरान कहीं भी छुप सकती हैं। पूरा गांव उनका है, सारे घर उनके लिए खेल और क्रीड़ा कौतुक का प्रांगण है। वह किसी घर में छिपे तो घर का गृहस्थ यह नहीं चिल्लाता कि मेरे घर में चोर घुस आए । बालिकाओं का घर में घुसना अतिक्रमण नहीं है, सारा गांव उनका है, गांव के सारे घर उनके हैं। एक प्रसंग है कि जब महाकवि विद्यापति ने जीवन के अंतिम क्षण में नदी में समाधि लेने की सोची। वृद्धावस्था के कारण वह नदी तक चल कर नहीं जा सकते थे, इसलिए उन्होंने नदी का आह्वान किया कि यदि मैंने साहित्य की कुछ भी सेवा की है तो नदी मुझे मेरे घर से ले कर जाए। कवि की पुकार सुनकर नदी कविवर विद्यापति के घर आई और उनको अपने साथ ले गई।

बिहार की समस्त भूमि नदियों की है। बिहार मानो उनका घर है जिसे बनाने की सारी सामग्री वह अपने ननिहाल नेपाल से अपने नाना हिमालय से मांग कर लाई है। और उन सबके नाना हिमालय उन उदार नाना जैसे हैं जो अपनी प्यारी नातिनों को उनकी जरूरत से ज्यादा उपहार( मिट्टी, बालू, पत्थर) देकर अपने दादा दादी के घर भेजते हैं। ऐसे में यह नटखट बालिकाओं का समूह थोड़ा शैतान और नकचढ़ी तो होगा ही। इनसे अनुशासन की उम्मीद ना केवल अव्याहरिक है बल्कि बालिकाओं पर अत्याचार सा है।



हमारे प्रखंड मनिहारी में आप मछली बाज़ार जाइए। मछुवारे कहेंगे आय लद्दी से ढेर मछली लानल छी। मतलब कि आज नदी से ढेर सारी मछली लाया हूं। आप पता करेंगे तो पता चलेगा कि उसने मछली किसी पोखर से पकड़ी है। फिर हमारे यहां पोखर को नदी क्यों कहते हैं? वो इसलिए कि उस पोखर का पानी नदियों ने भरा है वर्षा ने नहीं। मेरे गांव में हर घर के पीछे एक डोभा हुआ करता था। डोभा मतलब छोटा पोखर। अब सोचता हूं तो लगता है कि मेरे निरक्षर पूर्वज कितने समझदार थे। बाढ़ में आए पानी को रोकने और जमा करने के लिए गांव के बाहर लद्दी और गांव के अंदर डोभा की लड़ी बना रखी थी। यह बाढ़ से निपटने का उनका सुरक्षा कवच था। दादा एक बात और कहते थे कि बेटा हेलना जरूर सीखिहैं। मतलब बेटा तैरना जरूर सीखना। अब सारी कड़ियां मानो जुड़ती सी दिखती हैं कि वह पीढ़ी किस प्रकार प्रकृति के साथ एकसार और तन्मय थी। प्रकृति को स्वीकार कर उससे संघर्ष की जगह प्रकृति के साथ संसर्ग का प्रयास करती थी।

और हम शिक्षित वंशजों ने सारे डोभा भर घर बना लिए। सारे लद्दी को सुखा सुखा कर खेती करने लगे। किस काम की ऐसी शिक्षा जो आपको अपनी धरती को समझने में अक्षम बना दे। अगर मैं कहूं तो बिहार की बाढ़ पूरी तरह से मानव निर्मित समस्या है। नदी हमारे घर में नहीं घुसी, वह तो बस अठखेलिया कर रही है, हमने बस उसके खेल के मैदान की बीच अपने घर बना लिए। हम उनके साथ रहना भूल गए, उनको रास्ते से हटा कर उनको बांधो में बांध कर ढिठाई करने लगे। उसकी सजा तो हमें मिलनी ही थी।

जगजीत साब की एक नज़्म याद आ रही है, रेखाओं का खेल है मुकद्दर, रेखाओं से मात खा रहे हो। उत्तर बिहार की नदियां हमारी मुकद्दर की रेखाएं हैं, उनके साथ रहना सीखना होगा, जैसा हम अब तक करते आये हैं । फिर उनकी चपलता हमें परेशान नहीं करेंगी। बाढ़ की विभीषिका जैसे विशेषण हमारी कारस्तानी है, और कुछ नहीं।
अवसर मिला तो बाढ़ और नदियों के अर्थशास्त्र पक्ष में कभी विस्तार से लिखूंगा।

On Raghav's 4th Birthday

You never got our total undivided attention, Your elder brother was already there to share it with you..

Half of your toys are used, so are your clothes. Old and used..Your elder brother  always got brand new toys and clothes..

Even parents you got, were older as compared to what your elder sibling got ..

Half of the time we call you by your elder sibling name, while we never call your elder brother by your name.

Even if you do something cute, we often compare that to your elder brother thinking how he used to do it..


Even your mother is called as Ojas's mother by elderly ladies in family when she is equally your mother. 

Yet unlike our attention for you, we always get your total undivided attention..

Your love for us is total new , totally unique..

You being the youngest, make us feel even younger..

Even times when we call you by your brother's name, your love towards us remains unchanged.

Like all younger siblings of world, you are happy being son to 'Your elder sibling's mother'.

You may feel all this injustice being done to you, but remember, your elder one never had an elder brother..

Unlike you, he never had company of a person he could call bhaiya.

Unlike you he was a guinea pig in hands of a novice parents, you got a much experienced calmer set of parents.. He handled all the rough edges of an inexperienced parenthood and made it smooth for you..

You complete us like a second eye, a second hand, a second lung.

 You are like our second life god graced us with. 

Dear Raghav, It is impossible to even imagine a second of our lives without you. May be thats why we call you our second son. 

Happy fourth Birthday Raghav. Love you to the second moon situated far in galaxies and back.

Saturday, July 11, 2020

चीन र साथ गोतियौरी झगड़ा


चीन दुश्मन नय चिकै, चीन होलौं कजिया करै वाला गोतिया। वहा गोतिया जे बेटी र बिहा भड़काबै , नयका जमाय क तोराह शिकायत करी का खुश हो जाय। बाराती में जा करी क जन्वासा में तकिया आरो तोशक पर तरकारी र झोर गिरा करी क हो हल्ला करै वाला गोतिया।

खाली बीहा शादी में नय, बाकी दिन भी जेकरs दिमाग म खाली खुराफात हूवा, वहा चि कै चीन। खेत पथार म जा करी क भोरे भोर कोदारी स आड़ काटी का अपना हिस्सा बढ़ाबै म जेकरा स्वर्ग जैनह सुख मिलै, बुझी ला चीन वहा गोतिया । आड़ काट तs पकड़ाबै पर आरो झगड़ा कर थौंह कि ए ज़मीन ता हमरे ची कै । फलां अमीन गड़बड़ कर क़ छैलई, फेरू सा नापी करवा के देखी ले। हम्मा ई बटवारा मानै वाला नाय छी, फेरु स पंचैती करवा ले। 


 
ऐन्हs गोतिया जैन्ह देश स निपटें म गोतियोरी पेंच सा काम करै ल पड़ तय । मार पीट करी का बदनामी सा जादे कुछु नय मिले वाला छै
। दू चार मैन्हा टोका चाली बंद , बेटा र बड्डे में ओकरा नाय बोला बा, सीधा लाइनपर आबी जै तोंह। बाकी दुनिया बदली जाय, तों गोतिया नय बदल स कै छ। एकरे बास्त ओकरा सा झगड़ा बढ़ा करी के कोय फैदा नय। आरो केकरो से पंचैयी करवा का आरो घटा, से बाहरी आदमी स त एक दम बची के रहना छै।

कैसनो चीकै अपने चीकै । ए बात मन म रहs, त सब चीज धीरे धीरे सब अपने आप ठीक हो जै तै। वहा आड़ काटे वाला गोतिया बाराती में सबसे आगे नागिन डांस कर थौंह , बस कनी टा धीरज रखै र काम छै।

 हिंदी चीनी गोतियौरी भाय भाय।।