Tuesday, October 16, 2018

नाम में क्या रखा है??

बारहवी शताब्दी अपने अंतिम दशक में थी। भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के छह शताब्दियों के बाद भी उनके द्वारा जलाई गई ज्ञान ज्योत नालंदा विश्वविद्यालय के रूप में अपनी ख्याति के चर्मोत्कर्ष पर था। ज्ञान का यह प्रकाश स्तंभ पूरे विश्व के छात्रों को गणित, विज्ञान, चिकित्सा , संगीत और दर्शन जैसे विषयों पर शोध और अध्ययन का अवसर प्रदान कर रहा था। उधर सुदूर दिल्ली में दिल्ली सल्तनत की शुरुआत हो चुकी थी और इस्लाम का प्रसार करने के लिए कुतुबुद्दीन ऐबक का एक सिपहसालार बख्तियार बिन खिलजी गंगा के मैदानों में पूर्व का रुख कर चुका था। मध्य एशिया का खिलजी भले ही शारीरिक रूप से अत्यंत सबल था, बदली जलवायु की परिस्थितियों के सामने मानव शरीर बहुधा निर्बल ही होता है। वर्तमान पटना शहर के पास से गुजरते वक़्त खिलजी का स्वास्थ्य बिगड़ गया। अब अस्वस्थ शरीर से काफिरों पर फतह का परचम क्या फहराया जाता। बख्तियार का काफिला पटना से कुछ दूर पर रुक गया। काफिले के साथ आये हकीमों की सारी दवा बेअसर साबित हुई। खिलजी उत्तरोत्तर कमजोर होता गया। मृत्यु के समीप आने पर मनुष्य बहुधा धर्मपरायण हो जाता है। ख़िलजी भी दिन रात कुरान का अध्ययन करने लगा। किसी ने कहा कि पास में ही नालंदा विश्वविद्यालय है जहां चिकित्सा विभाग के प्राध्यापक राहुल श्रीभद्र हैं। उनका चिकित्सा ज्ञान अप्रतिम है और उनसे सलाह ले लेनी चाहिये।


राहुल श्रीभद्र को संदेश भेजा गया कि खिलजी के प्राणों की रक्षा में उनसे ही आस बची है। श्रीभद्र संयोग से आस पास ही थे और खिलजी के शिविर में जा पहुंचे। एक चिकित्सक का कर्तव्य निभाने को अपना धर्म मानने वाले श्रीभद्र को सामने वाले का धर्म नहीं सिर्फ उसकी व्याधि ही दिखती थी। उसके उलट खिलजी को सामने एक चिकित्सक नहीं बौद्ध भिक्षु के वस्त्र पहने खड़ा एक काफ़िर दिख रहा था। एक काफ़िर को अपनी नब्ज दिखाने से इंकार करते हुए कहा खिलजी ने कहा कि मैं एक काफ़िर के हाथों से दवा नहीं ले सकता। अगर यह राहुल श्रीभद्र इतना ही बड़ा चिकित्सक है तो मुझे बिना छुए और मुझे बिना कोई दवा पिलाये मुझे स्वस्थ करके दिखाए। इतना कह कर  खिलजी अपने सामने रखे पाक क़ुरान के पन्नो को उलट पर उसे पढ़ने लगा।

ज्ञान अच्छी वस्तु है लेकिन ज्ञानी होने का अहसास कभी कभी गर्व के अज्ञान को जन्म दे देता है। विश्व के सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थान का प्रमुख होने का गर्व कदाचित श्रीभद्र के विवेक पर एक पर्दा डाल गया। वो यह नहीं देख पाए कि जो धर्मांध अपने धर्म को ही उत्तम मानता है और बाकी किसी मनुष्य को घृणा से देखता है वह एक आने वाली विपत्ति है। घृणा में सराबोर मनुष्य मानव कहलाने योग्य नहीं है और मानवता के सिद्धांत अधिकार सिर्फ मानवों के लिए हैं। अपने चिकित्सा ज्ञान को दी गई ललकार ने श्रीभद्र के गर्व पर चोट पहुंचाई।श्रीभद्र ने खिलजी के दिये हुए चुनौती को मन ही मन स्वीकार किया। मंद मंद मुस्कुराते हुए बोले, महाशय जैसी आपकी इच्छा। मैं आपको स्पर्श नहीं करूंगा। लेकिन क्या मैं वो किताब देख सकता हूँ जो आप पढ़ रहे है। खिलजी ने कुरान ए पाक को श्रीभद्र की तरफ
बढ़ा दिया। श्रीभद्र के किताब अपने हाथ में ली और उसे कुछ देर उलट पुलट कर देखते रहे। फिर किताब वापस करते हुए बोले कि आप इस किताब को दिन में तीन बार पढ़ें। ईश्वर ने चाहा तो आप छह दिनों में स्वस्थ हो जाएंगे। यह कहकर श्रीभद्र खिलजी के शिविर से निकल नालन्दा के लिए चल पड़े और खिलजी कुरान के पन्ने वापस से पलट कर पढ़ने लगा।


दो तीन दिन बीते और खिलजी के स्वास्थ्य में चमत्कारिक रूप से सुधार आने लगा और जैसा कि श्रीभद्र ने कहा था छठवें दिन खिलजी पूर्णतः स्वस्थ हो गया। वह अपने जिहाद को आगे बढाने के लिए पूरी तरह तैयार लेकिन एक रहस्य को जानने बिना वह आगे नहीं जा सकता था। आखिर श्रीभद्र ने बिना उसे छुए वो कैसे कर दिखाया जो उसके हकीम न कर सके? ख़िलजी ने अपना एक दूत श्रीभद्र के पास भेजा कि खिलजी अपने ठीक होने का रहस्य जानना चाहता है। श्रीभद्र ने बताया कि उन्होंने देखा कि खिलजी कुरान के पन्नों को पलटने के लिये अपनी उंगली में थूक लगा कर पलटता है। इसीलिए मैंने कुरान के पन्नो के किनारों पर दवा का एक लेप लगा दिया और उन्हें कुरान नियमित पढ़ने के सलाह दी। पन्ने पलटने के दौरान दवा उंगलियो द्वारा खिलजी के शरीर में पहुंची और अपना असर दिखाया।

जिस तरह एक कन्या का सौंदर्य उसके पिता के हृदय में गर्व, उसके प्रेमी के हृदय में प्रेम और एक कामांध के हृदय में वासना का संचार करता है, ज्ञान का प्रदर्शन दूसरे ज्ञानी को जिज्ञासु और उपकृत बनाता है तो एक हठी मूर्ख को ईर्ष्या की अग्नि में जलाता है। खिलजी श्रीभद्र के चिकित्सा कौशल का चमत्कार देख उपकृत नहीं हुआ बल्कि क्रोध से उबल पड़ा। एक काफ़िर के पास वो ज्ञान कैसे हो सकता है जो उसके धर्म को मानने वालों के पास नहीं हो। उसने कहा कि इस ज्ञान के स्रोत को ही समाप्त करना होगा। श्रीभद्र की औषधि  से स्वस्थ हुआ धर्मांध खिलजी आयुर्वेद, बौद्धधर्म के ज्ञान के मूल नालंदा विश्वविद्यालय जा पहुंचा। उसने सभी आचार्यों, छात्रों को मारने का आदेश तो दिया ही, साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में रखी नब्बे लाख पुस्तकें और पांडुलिपि अग्नि के हवाले कर दी जाएं। बौद्ध साहित्य में वर्णन मिलता है कि नालंदा का पुस्तकालय तीन मास तक जलता रहा।

यह कथा यहीं समाप्त नहीं होती अपितु आज भी जारी है। खिलजी का शूल अब भी बिहार की छाती पर गड़ा हुआ है। जहाँ पर ख़िलजी ने अस्वस्थ होकर अपना शिविर लगाया और जहाँ पर श्रीभद्र की दवा ने उसके प्राण बचाये, वो स्थान आज भी बख्तियारपुर के नाम से जाना जाता है। और  राहुल श्री भद्र ? उनका नाम तो नालंदा के पुस्तकालय की राख और हमारे अज्ञान की मोटी परत के नीचे कहीँ दबा पड़ा है। किसी सभ्यता का पतन तब नहीं होता जब कोई दूसरी सभ्यता उसे सामरिक युद्ध में पराजित करे, सभ्यता का पतन तब होता है जब किसी सभ्यता में अपनी संस्कृति पर गर्व होना समाप्त हो जाता है। मानसिक रूप से परास्त सभ्यता  अपने गौरवशाली इतिहास के सत्य के बदले तलवार के बल पर सिखाये गए असत्य को उचित ठहराती है। एक पराजित सभ्यता ही आक्रांताओं के अन्याय को अपनी नियति मान कर हाथ पर हाथ धरे बैठती है और कदाचित अन्याय को न्यायपूर्ण भी ठहराने का प्रयास करती है। बख्तियारपुर नाम अपने आप में मानवता और हमारे स्वाभिमान के साथ भद्दा मजाक है। सत्यमेव जयते के सिद्धांत वाले देश में बख्तियारपुर नाम किसी भी तरीके से स्वीकार्य नहीं है। सहिष्णुता, गंगा जमुनी संस्कृति और साझी विरासत जैसे इत्र छिड़क कर आप बख्तियारपुर जैसे नामों की विष्ठा को ग्राहय नहीं बना सकते। देर से ही सही पर सही कार्य होना अवश्य चाहिये। बख़्तियारपुर का नाम श्रीभद्रपुर होना ही चाहिये। जय भारत।

Monday, October 1, 2018

जीवन में ज्ञान प्राप्ति।।

आपने कई बार पढ़ा होगा कि भगवान बुध्द को बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे बैठे ज्ञान प्राप्त हुआ। मैने भी पढ़ा है लेकिन यह नहीं समझ पाया कि वास्तव में आखिर क्या हुआ होगा। क्या कोई दैवीय चमत्कार हुआ कि गौतम को किसी ने सारा ज्ञान हस्तांतरित कर दिया। या जैसा धार्मिक धारावाहिकों में दिखाया जाता है कि एक प्रकाश पुंज मस्तक के आस पास  आ जाता है। जिस तरह धारावाहिक में दिखाया गया प्रकाश पुंज ज्ञान का एक  काल्पनिक चित्रण भर है जिसका वास्तविक घटित घटनाओं से शायद कोई संबंध नही है। उसी प्रकार ज्ञान प्राप्त होना भी कदाचित किसी और प्रक्रिया का साहित्यिक चित्रण भर है। वास्तव में यह प्रक्रिया कुछ और रही होगी जिसे लोग ज्ञान प्राप्त होना कहते हैं।

बैरिस्टर मोहनदास गांधी अपने मुवक्किल दादा अब्दुल्ला के मुकदमे की पैरवी के लिए रेल से डर्बन से प्रिटोरिया जा रहे थे। मोहनदास ने बैरिस्टरी की पढ़ाई लंदन में की और वहां पूरी तरह अँग्रेजों की तरह रहे। सूट बूट पहन कर काठियावाड़ का यह युवक अपने लंदन प्रवास के दौरान अंग्रेजी संस्कृति में घुलने का प्रयास करता रहा। दूसरे शब्दों में कहें तो शायद सभ्य बनने की कोशिश करता रहा। यहां तक कि उसने पाश्चात्य नृत्य बॉल डांस को सीखने के लिए टयूशन तक ले ली थी। पढ़ाई पूरी कर मुम्बई में वकालत की पर कुछ खास चली नहीं। ऐसे ही एक दिन दादा अब्दुल्ला ने एक मुकदमे की पैरवी के लिए दक्षिण अफ्रीका बुला लिया तो युवा मोहन चल पड़ा नई संभावनाओं की तलाश में दक्षिण अफ्रीका। और बिल्कुल अंग्रेजों की तरह पहली श्रेणी का टिकट लेकर डर्बन से प्रिटोरिया जाने वाली रेल गाड़ी में बैठ गया।  फिर क्या हुआ?  रेल के टिकट निरीक्षक ने उसे बताया कि पहले श्रेणी में बैठने के लिए पहली श्रेणी का टिकट पर्याप्त नहीं है उसके लिए चमड़ी का रंग भी गोरा होंना चाहिये। जिन अंग्रेजों ने उसे बैरिस्टरी की पढ़ाई के दौरान न्याय, कानून और अधिकारों के बारे में सिखाया था वही अंग्रेज अब यह बता रहे थे कि न्याय और अधिकार की बातें सार्वभौमिक नहीं वरन चमड़े के रंग का एक फलन हैं। विनम्रता पूर्वक अनुनय और तर्क करना काम न आया और अंग्रेज़ी कपड़े पहने अंग्रेज़ी शिक्षा प्राप्त और अंग्रेज़ बनने की सुप्त इच्छा रखने वाले मोहन दास को सामान सहित पेटरमारितज़्बेर्ग स्टेशन पर प्लेटफार्म पर फेंक दिया गया। मोहन दास ने अपना सामान उठाने की भी परवाह नही की और रात भर वहीं पड़े सोचते रहे। मोहन दास ने महात्मा बनने की ओर पहला कदम उसी स्टेशन पर उठाया।


मोहन दास को उस दिन क्या नया पता चला। क्या वो अंग्रेजी सरकार के दमन से पूरी तरह नावाक़िफ़ थे? संभव नहीं लगता। क्या उस रात  उन्होंने पहली बार रंगभेद देखा था? कदाचित नही। फिर क्या हुआ? हुआ सिर्फ यह कि मोहन दास को उस दिन उसका जीवन लक्ष्य मिल गया। उसने निर्णय लिया कि आगे का जीवन इस अन्याय के विरुद्ध लड़ते हुए बीतेगा। ऐसा ही कुछ गौतम के साथ हुआ होगा। जीवन, मृत्यु और वृद्धावस्था के रहस्य उनको पहले ही पता रहे होंगे। पर उस दिन बोधिवृक्ष के नीचे उन्होंने यह निर्णय लिया होगा कि शेष जीवन में क्या करना है। एक राजकुमार जो 29 साल तक की आयु तक भोगविलास में डूबा रहा , एक रात अपनी पत्नी और नवजात को छोड़ निकल जाता है। भूखे रह कर मरणासन्न हो जाता है, फिर एक दिन सुजाता की खीर खाकर मध्य मार्ग पर चलने का निर्णय लेता है। शायद जीवन लक्ष्य निर्धारित होने को ही ज्ञान प्राप्त कहा गया है। मुझे बुद्ध का नहीं पता पर अगर कहूँ कि उस रात ट्रैन से फेंके जाने पर मोहन दास को जरूर ज्ञान प्राप्त हुआ तो शायद अतिश्योक्ति न होगी।

अच्छी बात यह है कि ज्ञान प्राप्त होने और करने की कोई उम्र नहीं है। आपका इतिहास आपके भविष्य का द्योतक कतई नहीं है। अगर ऐसा होता तो एक भोगी युवराज भगवान बुद्ध ना बनता और न ही अंग्रेजी नृत्य सीखने का इच्छुक एक युवक पूरे अंग्रेजी साम्राज्य को नचा डालता। बस वह एक पल आने की देर है जब आपका जीवन चरित बदल जाता है। जब आपको ज्ञान प्राप्त होता है। सावधान और सतर्क रहें क्योंकि यह मोड़ किसी भी रूप में आ सकता है। विष्णुगुप्त चाणक्य को यह धनानंद के अपमान के रूप में मिला तो न्यूटन को सर पर गिरे एक सेव के रूप में। किसी के लिए सुजाता की खीर काम कर गयी तो किसी के लिए ट्रेन से फेंका जाना। सबको जीवन तो मिलता है जीवन लक्ष्य बिरले ही प्राप्त कर पाते हैं । ईश्वर से प्रार्थना करें कि आपको जीवन और जीवन लक्ष्य दोनो प्राप्त हों।

बापू के जन्मदिवस की शुभकामनाएं।।

Saturday, September 15, 2018

सिन्धु घाटी की सभ्यता

जब कभी भी सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में पढ़ता हूँ, गौरवान्वित महसूस करता हूँ। क्या हुआ होता अगर यह सभ्यता विलुप्त न होती। मानव सभ्यता आज कम से कम 1000 साल आगे होती। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के नगर नष्ट होने से और वापस महाजनपदों के शहर जैसे पाटलिपुत्र और राजगृह के बसने के बीच करीब 2000 साल का अंतराल है। मोहन जोदड़ो जैसे शहरी व्यवस्था को खोने के बाद मानव को बीस शताब्दी लग गए वैसे नगर दुबारा बसाने में। आपको अचरज होगा कि जल निकास की व्यवस्था में मोहनजोदड़ो का शहर गुडगांव और मुम्बई जैसे आधुनिक शहरों से बेहतर प्रतीत होता है। इन शहरों का भवन निर्माण पकी हुई ईंटों से हुआ है और हम 50 दशकों बाद 2022 तक सबको पक्के मकान देने के लक्ष्य से जूझ रहे हैं। इन शहर का निर्माणकाल गीज़ा के पिरामिडों के समकालीन है। अर्थात ईसा से 3 हज़ार वर्ष पूर्व शहर निर्माण और अभियांत्रिकी का इतना उन्नत विकास हो चुका था पर दुर्भाग्य से यह ज्ञान आने वाली पीढ़ियों को न मिल सका। उनका यह ज्ञान आज भी एक अबूझ भाषा में लिपिबद्ध है। 10 सेंटीमीटर लंबी कांसे की नर्तकी की प्रतिमा को देखिये। खड़े होने की भंगिमा, चेहरे के भाव, शरीर पर आभूषण और विभिन्न अंगों का समानुपातिक गढ़ाव। हमारे पूर्वज धातुओं की उपयोगिता से एक कदम आगे निकल कला और सौंदर्य तक पहुंचे थे। जितने भी साक्ष्य मिले है, प्रतीत होता है कि समाज मातृ सत्तात्मक था। एक स्त्री के गर्भ से निकलती पौधे का चित्र प्राप्त हुआ है जिसे उर्वरता की देवी कहा जा रहा है। शायद स्त्री के सम्मान और उनके अधिकारों को देने में भी हमारा आधुनिक समाज आज भी पीछे है।अगर खेल के मैदान और वृहद स्नानागार मिले हैं, तो लिपिस्टिक और मनके के कारखाने का भी अस्तित्व मिला है। वो जल संरक्षण के भी ज्ञाता थे और व्यापार के लिए पत्तन भी बना सकते थे। जनतंत्र, दाशमिक प्रणाली, गणित, मौसम विज्ञान और नाप तौल जैसे आधुनिक सिद्धांत वो खोज चुके थे और उनका प्रयोग कर रहे थे। जरूर उन्होंने अपने शहर के नाम कुछ सोच कर अच्छे ही रखे होंगे। काश उनकी लिपि हम पढ़ पाते तो शायद ऐसे भव्य शहरों को मुर्दों के टीले (मोहनजोदड़ो) ना कहते।


निश्चय ही उनकी सभ्यता कहीं ज्यादा विकसित रही होगी क्योंकि उनके बारे में हमारा ज्ञान तो सिर्फ साक्ष्यों पर और उनको समझ सकने की हमारी क्षमता पर आधारित है। आज़ादी के बाद हुए बंटवारे में अगर सबसे बड़ा नुकसान हुआ तो यह कि मानवता की यह अमूल्य धरोहर पाकिस्तान में चली गई। एक ऐसे देश में जो मुहम्मद बिन कासिम से पहले के अपने इतिहास को स्वीकारने में शर्म महसूस करता है। वहां इन धरोहरों की क्या देखभाल हो रही होगी, यह सोचना भी व्यर्थ है। डरता हूँ कि कहीं इनका हाल भी बामियान की तरह ना हो। हमें चाहिये कि हम अपने बच्चों को सिर्फ इतिहास के नीरस अध्याय की तरह यह चीज़े ना बतायें बल्कि उसे आधुनिक काल से जोड़ कर सुनाए।

Monday, September 3, 2018

Guess the German

A german who tried to impose his utopian idea on the world. His ideas caused sufferings and deaths to millions of civilians. Sometimes the effects were so drastic that it still shames the humanity. Unfortunate part is that there are  people who still believe in this false ideology and refuse to see and acknowledge the havoc it caused around the world. These remaining followers think themselves to be superior to those who challenge their ideas and methodologies and they often ridicule their opposition than counter them logically. I wish that this toxic philosophy dies the same painful death, which it awarded to humans across the globe.

That's all about Karl Marx. We will talk about Adolph Hitler some other time.


जन्माष्टमी के अवसर पर

क्रूर राजा के आठ बंद दरवाजों वाले कारावास में जन्म,  जन्म से पहले ही हत्या के पूरा प्रबंध, पूतना और कालिया द्वारा हत्या के प्रयास के बावजूद एक ग्वाले का दत्तक पुत्र अगर आगे चल कर भगवान बन सकता है, तो कोई वजह नहीं है कि आप अपनी क्षमताओं और संभावनाओं पर एक पल भी संदेह करें। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन एक संदेश है कि आपकी शुरुआत और वर्तमान परिस्थितियों से आपके भविष्य का कोई भी अनुमान लगा कर निराश होने का कोई कारण नहीं है। अगर कृष्ण विषधर नाग के फन पर खड़े होकर भी वंशी बजा सकते है तो निश्चय ही आपके क्रंदन करने की वजह मामूली है। काले रंग के चरवाहे हो कर भी आप प्रियदर्शी और सर्वप्रिय हो सकते हैं। सार्वजनिक रूप से शिशुपाल द्वारा सौ बार अपमानित होने के बाद भी आपका आत्मसम्मान बना रहना चाहिये। निराशा और विपरीत परिस्थितियों के बीच भी अगर साहस और ज्ञान आपके साथ है तो संख्या बल में बीस गुना ज्यादा शत्रु पर भी आपकी विजय संभव है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं।। जय श्री कृष्ण।।


Saturday, August 25, 2018

मनी बेन को समर्पित।।

बैरिस्टर वल्लभ भाई पटेल एक मुकदमे की पैरवी कर रहे थे। पूरा ध्यान अदालत में चल रही जिरह और कानूनी दांव पेंचों पर लगा हुआ था। सरदार जिरह कर अपनी दलील पेश कर ही रहे थे कि एक सहयोगी ने आकर एक कागज का टुकड़ा हाथ में थमाया और कान में फुसफुसा कर कुछ कहा। सरदार ने कागज़ पर एक नज़र डाली, चेहरा एक पल के लिये विचलित सा हुआ, लेकिन उन्होंने कागज मोड़कर जेब में रख लिया। वापस अपनी जिरह में लग गये। सुनवाई खत्म होने के मुकदमे का फ़ैसला अपने हक़ में आने के बाद अपने सहयोगी से बोले,मेरी धर्मपत्नी झावेरीबा का देहांत हो गया है, मुझे घर जाना पड़ेगा। ज़िरह के दौरान जो तार मुझे मिला ,उसी से यह दुखद समाचार मुझे मिला है।

उपरोक्त कथा बहुतेरे लोगों ने सुनी है। सरदार पटेल को लौह पुरुष वाले व्यक्तित्व को परिभाषित करने वाली यह एक सर्वविदित प्रसंग है। जो बात ज्यादातर लोग नहीं जानते कि यह घटना 1909 की है, उस समय वल्लभ भाई की बेटी मनी छह साल की थी और बेटा दाहया तीन साल का। सामान्य कोई व्यक्ति होता तो शायद कुछ दिन घर पर बिताता , बच्चों की देखभाल के लिये दुबारा विवाह रचाता। लेकिन लौह पुरुष तो ठहरा लौहपुरुष। न शादी की और ना ही देशसेवा में कोई कमी होने दी। मतलब यह कि बच्चों की माँ तो चली ही गयी और अक्खड़ पिता देशप्रेम के मार्ग पर पहले ही निकल चुका था। ऐसे में मनी बेन ने अपने छोटे भाई का खयाल रखना शुरू किया। मनी ने यह फैसला किया कि उन्हें माँ की कमी भले महसूस हो,दाहया को वो माँ की कमी महसूस नही होने देंगी। छह साल की एक बच्ची अपने तीन साल के भाई का खयाल रखे, अगर यह बात अतिशयोक्ति लगती है तो यह प्रसंग सुनिये।



देश की पहली सरकार के गृहमंत्री और उपप्रधानमंत्री सरदार पटेल अपनी मृत्युशैय्या पर पड़े थे। बेटी मनी बेन को धीरे से बुलाया और कहा कि अगर उन्हें कुछ हो जाए तो घर पर रखे एक बक्से और एक बही खाते को जवाहर लाल को दे दिया जाए। पटेल कुछ दिनों बाद अपनी इहलीला समाप्त कर चल बसे। मृत्यु के समय उनके पहने वस्त्र ही उनकी संपत्ति थी। अपनी बेटी और बेटे के लिये वो अगर कुछ छोड़ गये थे तो वो था उनकी यादों और उनके आदर्शों का एक भारी गठ्ठर। वो गठ्ठर जिस उठा कर मनी बेन को चलना था। पिता का आदेश याद आया। बक्से और बही खाते को लेकर जवाहर लाल नेहरू के पास पहुंची। कहा कि पिता जी ने कहा था कि यह बक्सा आपको पहुंचा दिया जाए। नेहरू जी ने बक्सा खोल कर देखा, पैंतीस लाख रुपये की रकम रखी हुई थी, साथ में थी वो बही जिसमें कांग्रेस को चंदे में मिली राशि का पाई पाई का हिसाब था। नेहरू जी ने एक बार मनी की ओर देखा और फिर एक अर्दली को बक्सा अंदर रखने का आदेश दिया। साथ में नेहरू जी भी अंदर चले गये। पिता की मृत्यु एक बहुत बड़ी चोट होती है जो मजबूत से मजबूत व्यक्ति को एक क्षण के लिये मायूस और मजबूर सा कर देती है। त्रासद हृदय सहानुभूति के लिये व्याकुल होता है। मनी बेन कुछ देर वहां बैठीं रही, किसी मदद की आशा में नहीं बल्कि इस लिए कि शायद चाचा शायद सर पर एक बार हाथ रखेंगे और उनसे यह तो पूछेगें कि उनकी ज़िंदगी आगे कैसे चलेगी। पर जिस मनी के भाग्य में न माँ का प्यार था, न बाप की लाड़ , चाचा की सहानुभूति कैसे हो सकती थी। नेहरू जी कमरे से बाहर न आये, कुछ देर बाद मनी बेन उठ कर चली आयी, उनकी गाड़ी का समय हो रहा था। अहमदाबाद जाने वाली रेल गाडी के थर्ड क्लास के डब्बे में बैठी मनी की आँखों में दो कतरे आंसुओं के अलावा अगर कुछ था तो पिता के सेवाव्रत को आगे बढ़ाने का प्रण और पिता के आदर्शों के प्रति समर्पण। मनी बेन वापस आकर साबरमती आश्रम में उसी सेवा भाव से लग गईं जिस सेवा और त्याग को उन्होंने अपने पिता में साक्षात भाव में देखा था।

लोहा वैसे बड़ा कठोर और मजबूत होता है लेकिन बारिश और नम हवाएं उसमें जंग लगा देती हैं। जंग लगा लोहा परत दर परत अपनी मजबूती और चमक खोता जाता है। हाँ लोहे में अगर थोड़ा कार्बन और मैंगनीज़ जैसे तत्व मिला दिये जायें तो लोहा इस्पात बन जाता है। फिर लोहा नमी और जल से मिलकर भी जंग नहीं खाता और मजबूत बना रहता है। एक बात दीगर है कि ये तत्व इस्पात में अलग से नहीं दिखते, अदृश्य होकर भी वे लोहे  का रक्षाकवच बनते हैं। लोहे की ताकत को यह अदृश्य अवयव ही अक्षुण्ण बनाये रखते हैं।

सरदार पटेल भीषण पारिवारिक स्थितियों और निजी विषम परिस्थितियों में भी अपने देशप्रेम के व्रत में अगर निर्बाध भाव से लगे रहे , अगर लोभ और स्वहित की आंधी में भी लौह पुरूष जंग लगकर कमजोर नही हुआ तो इसका कारण मनी का त्याग था जो बहुधा इतिहासकारों और कथाकारों को दृष्टिगत नहीं होता। यह मनी का निःस्वार्थ निष्काम व्यक्तित्व ही था जो अदृश्य बन कर लौहपुरुष को मजबूती प्रदान करता रहा। वल्लभ 'भाई' और मनी  'बेन' का यह गौरवशाली अध्याय हर भारतवासी के लिये एक प्रेरणास्रोत है।

रक्षाबंधन पर मनी बेन को सादर प्रणाम।।

Friday, August 17, 2018

अटल जी को समर्पित

‌एक कवि का कोमल हृदय रखने वाला जो पोखरण जैसे कठोर निर्णय भी ले सकता है। राजनीति में अजातशत्रु कहलाने वाला एक नेता जो करगिल में घुस आए दुश्मनों को पराजित करने वाला सेनापति बन सकता है। कंधार में पीठ पर घोंपे गए खंजर के बावजूद जो मैत्री का संदेश लेकर लाहौर जा सकता है। चार दशक विपक्ष में बैठने के बाद मिली सत्ता को छल द्वारा एक वोट से छीने जाने पर भी जो बिना चेहरे पर शिकन के झेल सकता है। संयुक्त राष्ट्र में अपनी मातृभाषा में बोलने पर गर्व का अनुभव करने वाला जो दिल्ली मेट्रो की परिकल्पना भी कर सकता है। दो सीट वाली सूक्ष्म पार्टी से शुरुआत करने वाला जो स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी दीर्घकालीन और दूरदर्शी परियोजनाओं को धरातल पर उतारने का कार्य कर सकता है। दलगत राजनीति के दौर में भी जो सच में राष्ट्र नेता कहला सकता है। विराम लेकर बोलने वाला जो अपने संगठन और दल के लिये सात दशकों तक अविराम श्रम कर सकता है। धीमी चाल से चलने वाला जो देश को तीव्र आर्थिक विकास दर से आगे ले जा सकता है।

‌वो जो भी हो वो भारत का अनमोल रत्न है जिसकी कीर्ति ध्रुव तारे की तरह अप्रतिम है, अटल है। अश्रुपूरित श्रद्दांजलि।


Wednesday, August 15, 2018

गांव वाला पन्द्रह अगस्त

सुबह के छह बजे सारे बच्चे स्कूल प्रांगण में जमा हैं। सबके कपडे भले ही पुराने हों, झंडा तिरंगा सबका नया है। विद्यालय प्रांगण भी बिल्कुल अलग सा दिख रहा है,सजा संवारा सा। खड़ी और पड़ी ईंटो के डिजाइन से घेरा गया है झंडोतोलन का स्थान । सजावट के लिये प्रयुक्त ये ईंट पास के ज़मीन्दार के अर्धनिर्मित बैठक और बनिये की चहारदीवारी के लिए रखे गए ईंट के ढेर से नज़र बचा कर लाये गए हैं। अगर देश के लिए मरना शहादत और मारना वीरता कहलाती है तो देश के लिए चोरी करना क्या कहलायेगा, इस पचड़े में बच्चे नहीं पड़ते। उन्हें तो बस पंद्रह अगस्त मनाना है। उसके लिए जो करना पड़े, वो करेंगे। अब उस बांस को ही देख लीजिये जो शान से सर उठाये झंडोतोलन के लिए तैयार सावधान मुद्रा में बीच प्रांगण में खड़ा है, इतनी आसानी से नहीं मिला। कल शाम में कम से कम बारह बच्चों की वानर सेना ने इसको तलाशने के लिये खेत खलिहानो में धमाचौकड़ी  मचायी । बीसियों बांसों को देखने के बाद उस बांस की बल्ली को चुना गया जिसपर तिरंगा को आसमान की ऊंचाई तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।

बांस को चुन लेना तो बस उतना ही काम है जितना कि गांधी जी ने कह दिया कि अंग्रेजों भारत छोड़ो। असली लड़ाई तो उसके बाद लड़ी गयी। बांस काँटना भी कुछ वैसा ही है। बांस की झाड़ियां एक दूसरे से वैसे उलझी होती हैं जैसे बोफोर्स और अगुस्ता की डील। बांस को झाड़ियों कर खींच कर निकालने में एकता का जो परिचय बच्चे देते हैं वो परिचय अगर नेहरू और बोस ने दिया होता तो शायद आजादी 5 साल पहले मिल गयी होती। उसके बाद बांस को हंसूए से छील कर साफ और चिकना किया जाता है। आज़ादी सत्य अंहिंसा के बल पर बिना खून बहाये शायद मिली हो, बांस को छीलने में बच्चों का खून जरूर कुर्बान होता है। पर पंद्रह अगस्त के समय पर इसकी परवाह कैसी।परवाह तो है कि जल्दी से यह बांस स्कूल पहुंचे और बाकी की तैयारियां  पूरी की जा सकें।


स्कूल तक पहुंचने का रास्ता कच्चा है इसीलिये पानी और कीचड़ को हटा कर उसमें बालू और मिट्टी डाली गई है जहां पानी ज्यादा है वहां ईंटें लगा दी गईं है बच्चों द्वारा। कभी कभी लगता है आज़ादी दिलाने में मानसून का सहयोग आज तक किसी ने नही माना। अगर फिरंगियों के मन में रहा भी होगा कि अभी आज़ादी दें या कुछ दिन रुक कर जाएं तो सारा शुबहा मॉनसून की बारिश देख कर ही दूर हो गया होगा। इसीलिए अंग्रेज़ बीच बरसात में भारत छोड़ कर भाग गए। स्कूल प्रांगण की सारी घास साफ कर दी गयी है और बाहर डाल दी गई है। बकरियों का एक झुंड कटी घास पर नेवतें उड़ा रहा है।

कुछ बच्चे विद्यालय प्रांगण में बैठे नारियल की रस्सी में आम के पत्ते फंस कर वल्लरी बना रहे हैं जिससे झंडोतोलन वाले बांस को बाकी के प्राँगण को सजाया जाएगा। कुछ बच्चे कागज की तिकोने छोटे छोटे झंडे गोंद से रस्सी में  चिपका कर रहे हैं। इससे  विद्यालय का तोरणद्वार बनाया जाएगा। झंडोत्तोलन के समय जो फूल झंडा खुलने के बाद बरसने हैं, उन्हें भी बच्चे ले आएं हैं। लेकिन इन फूलों को झंडे के कपड़े में बाँधने की जो कला है वो अद्वितीय है। फूल  ऐसे बाँधे जाने चाहिए कि फहराने के समय रस्सियों के एक झटके से खुल जायें सिर्फ रस्सियों के झटके से ही खुलें । अब यह कला तो सिर्फ स्कूल के चपरासी चाचा को आती है। दो बच्चे उनको सुबह सुबह उनके घर उठा ले आये हैं ताकि झंडे में फूल बांध झंडोतोलन की बाकी तैयारियां पूरी की जा सके।

स्कूल सरस्वती पूजा के बाद फिर से सजा संवारा दिख रहा है। अब ऐसी सजावट अगर गाँव वाले न देखें तो फिर क्या मज़ा? इसलिये पंद्रह अगस्त को बच्चे सवेरे सवेरे पूरे गांव में प्रभातफेरी कर आये हैं। इन्कलाब ज़िंदाबाद और महात्मा गांधी अमर रहें का नारा लगाने वालों बच्चों को शायद इसके मायने भी नही पता , लेकिन गांव वालों के लिये इसका एक ही मतलब है। बच्चे हम गांव वालों को न्योता देने आए हैं कि हमारे स्कूल आओ और देखो हमने क्या सजावट की हैं। ज़मीन्दार के बेटे की बारात का निमंत्रण ठुकराया जा सकता है लेकिन इन मासूमों का निमंत्रण ठुकराने वाली कठोरता अभी गांव वालों में नहीं आई।
कै बजे फहरेगा झंडा?? साढ़े आठ बजे ।
पांच बच्चे एक साथ जवाब देते हैं।
ठीक है हम लोग आ जाएंगे। हो गया आमंत्रण स्वीकार।

सवा आठ बजे सारे बच्चे , सारे शिक्षक और सारी शिक्षिकाएं स्कूल पहुंच गए हैं। गणित वाली मैडम भी जिसको देख कर की आधे बच्चों का हलक सूख जाता है आज कितनी प्यारी दिख रही हैं। इतिहास वाले मास्टर साब जिनकी मुस्कान दिखना सिंधु घाटी की भाषा पढ़ने जैसा कठिन है, आज कितना मुस्कुरा रहे हैं। सारे बच्चे कक्षा के हिसाब से कतार में लग गये हैं, और हेडमास्टर साब भी झंडोतोलन के लिए आ चुके हैं। 9वी कक्षा का एक छात्र चिल्लाता है सावधान। आधे बच्चे सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाये हैं, जिनको सावधान की मुद्रा का पता नही बस ठिठक कर खड़े हो जाते हैं।

जिस तरह हेडमास्टर साब का खादी वाला परिधान 15 अगस्त को पहनना पक्का है, झंडा उनसे न खुलना भी पक्का है। चपरासी चाचा आगे बढ़ते है और बताते हैं कि रस्सी के किस सिरे को पकड़ना है और किस सिरे को खींचना है। कितना भी बताओ, हेडमास्टर साब को क्या समझ में आना। चपरासी चाचा आगे बढ़ कर अपने हाथों से रस्सी को झटका देते हैं और वो गाँठ खुलती है जिससे उन्होनें खुद बांधी थी। ऊपर से पुष्वर्षा होती है और राष्ट्रगान शुरू हो जाता है। कभी कभी लगता है कि चपरासी चाचा जान बूझ कर ऐसे गांठ लगाते थे कि झंडा उनकी मदद के बिना फहर ही न सके।

भाषण के बाद शुरू होता है जलेबी , बूंदी और सेव बंटने का दौर। एक चीज़ समझ में नहीं आती, कि भी कुछ देर पहले  सारे जिन बच्चों को देश का भविष्य और नेता बताया जा रहा था को कहा जा रहा था कि राष्ट्र निर्माण की सारी जिम्मेदारी उनपर हैं उन्हें  मिठाई  बांटने जैसी छोटी जिम्मेदारी निभाने लायक भी नही समझा गया । देश बनाना की जिम्मेदारी भले ही बच्चों की हो पर मिठाई तो खंडूस मास्टर साब ही बांटेंगे। खैर जो भी हो, मिठाई कोई भी बांटे, स्वाद तो वही रहेगा। अप्रतिम और अमूल्य। पांच सितारा होटल के कॉन्टिनेंटल डेसर्ट्स में भी वो स्वाद अब मयस्सर नहीं। स्वतंत्रता सेनानियों को आज़ादी पाकर कितनी खुशी मिली होगी इसका अंदाज़ा बच्चों को जलेबी और सेव पाकर मिली खुशी से लगाया जा सकता है। स्कूल आकर भी कक्षा में पढ़ाई नही करनी, मिठाई खा कर चाहो तो दिन भर कबड्डी, खोखो खेलते रहो। कोई रोकने वाला नहीं, कोई टोकने वाला नहीं। आज़ादी और स्वतंत्रता शायद इसको ही कहते हैं।

अब जब 15 अगस्त के मतलब लांग वीकेंड और ड्राई डे हो गया है, याद आता है बचपन वाला गांव का 15 अगस्त। आजकल हर कोई बताता है कि हैप्पी इंडिपेंडेंस डे पर इंडिपेंडेंस का पता नही चलता । पहले कोई बताता नही था पर आजादी का पता चलता था।

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं। जय हिंद।।

Tuesday, July 31, 2018

यह मछली की गंध नही है।

यह मछली की गंध नही है।

यह गंध है उस मौत की जो आपने अपने जाल में फंसा कर उसको बक्शी है। नदी में स्वच्छंद विचरती मछली से बास नहीं आती, बास आती है जब वही स्वच्छन्दता आपकी भूख मिटाने के लिये बिछाये जाल में फंस कर आपके जंग लगे बटखरों के साथ किलो के भाव से बिकने को बाज़ार पहुंच जाती है। यह गंध आपने उसको दी है उसका पानी छीन कर। यह गंध आई है मछली में आपके निष्ठुर हाथों से जब आपके हाथों ने उसके अधमरे गलफड़ों को खोल कर देखा कि मछली की लाश ताज़ी है या बासी हो चली है। नाक पर रुमाल रख कर मछली बाज़ार में घूमने का यह नाटक क्यों जब यह मौत का बाजार आपने ही सजाया है। अगर मछली न मरे तो तुम भूखे मरोगे और यकीन मानो तुम्हारी लाश को कोई दो कौड़ी फी किलो के भाव से भी न खरीदेगा। तुम्हारी कहावतें सुनी थी मैने तुम्हारे जाल में फसने के समय। वो क्या कहते हो तुम कि बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है!! अगर यह मत्स्य न्याय है तो पूरे तालाब को गंदा करने, सारी मछलियों को पकड़ कर खाने और उसी तालाब को मिट्टी भर कर अपने भवन बनाने को क्या आदम न्याय कहना चाहिये।

तुम्हारी गंध जीते जी मरी मछली की गंध से कहीं ज्यादा घृणास्पद है लेकिन वो तुम्हें पता नही चलेगा क्योंकि तुम उसके आदी हो चुके हो। हाँ जब वही गंध तुम्हारे संसर्ग में आने के बाद मछली में आ गयी है तो तुम नाक भौं सिकोड़ रहे हो। अगर मत्स्यगंधा एक गाली है तो मनुष्यगन्धा क्या होगी खुद सोच लो। जब अगली बार मछली बाज़ार की सडांध तुम्हें परेशान करे तो याद रखना कि यह तुम्हारी अपनी गंध है जो तुम्हारी दुनिया में आने पर मुझे मिली है।

यह मछली की गंध नही है।


Friday, July 20, 2018

मैं हिन्दू हूँ।।

मैं हिन्दू हूँ।

उपकृत हूँ मैं प्रकृति का। उसके हर रूप की उपासना की है मैंने। नदियों को माँ कह उसके गोद में खेला हूँ तो उसकी आँचल समान किनारों पर मैंने सनातन सभ्यता बसाई है। सूर्य और चंद्र ही नहीं, समस्त नवग्रह की विशालता और ऐश्वर्य को नमस्कार किया है। सूदूर तारों को सप्तर्षि कह सम्मानित किया है मैंने। और असंख्य तारों अपने बिछड़े पूर्वज और प्रियजन मान कर प्यार से निहारा है। पर्वत को अपने इष्ट का निवास कैलाश मान कर पूजनीय बनाया है तो हिमालय को माता गौरी का पिता कहा है। तुलसी और बरगद मेरे लिए कल्पतरु हैं। हमेशा चरणों के नीचे रहने वाली दूब जब तक मेरी पूजा में ना हो , मेरी पूजा अधूरी रहती है।

समस्त प्राणीजगत मेरे लिए प्रकृति और मेरे पूजा स्थल का एक अनिवार्य भाग है और मेरे लिए सम्मान का पात्र है।
एक बैल मेरे इष्ट का वाहन बन कर मेरा आराध्य है।  जिसके विषदंतो से मेरे प्राण चले जाएं, उसे भी मैंने अपने इष्ट के कंधों पर स्थान दिया है। मेरे फसलों को चुरा कर नष्ट करने वाले मूषक भी मेरे आंगन में मोदक पाते है और गणपति के साथ मेरी प्रथम पूजा में सम्मिलित हैं। नभ में विचरने वाले विशाल गरुड़ मेरी माँ की अस्मिता बचाने वाले रक्षक के रूप में जाने गए हैं तो एक वानर ने संजीवनी बूटी लाकर मेरे इष्ट के प्राण बचाये हैं। वानर भक्त को मैंने भगवान से ऊपर माना है। गौ को मैंने समस्त देवताओं का निवास स्थान माना है तो श्वान मेरे लिए धर्मराज के साथ सशरीर स्वर्ग जाने वाला एक मात्र जीव है। गौ को अगर मैंने माँ कहा है तो बिल्ली को मौसी कह पुकारा है। एक क्रोंच पक्षी युगल को रोते देख मेरे भावुक हृदय ने रामायण की रचना कर डाली है। शेर मेरे लिए शक्ति का वाहन है तो गजराज ऐश्वर्य का। समस्त प्रकृति मेरे लिए सम्मान का पात्र है ना कि भय और घृणा का। वसुधा पर निवास करने वाला हर वासी मेरे लिये परिवार है,सम्मानित है और मैं उसके बिना अपूर्ण हूँ।


सिर्फ प्रियदर्शी प्राणिजगत ही मेरे हृदय में वास करता हो, ऐसा नही है। मेरे हृदय में डरावने और कुरूप भूत पिशाचों के लिए भी स्थान है। उन्हें शिव का गण होने का गौरव प्राप्त है जो बनने के लिए हजारों सालों की तपस्या भी विफल जाती है। आठ अंगों से टेढ़े अष्टावक्र अपने ज्ञान के लिए हमारे पूजनीय हैं तो कुरूप वेद व्यास को महाभारत लिखने का अवसर मैने दिया है।

तुलसी, सूर और रैदास की छन्दों की चाशनी में डूबी मेरी वाणी है। मेरे  तानसेन और बैजू बावरा के राग और रागनियों में गुंजायमान है सरस्वती की वीणा। कृष्ण की सम्मोहण वाली बाँसुरी से लेकर कोकिला लता सब मुझमें ही समाहित है। मैं आर्यभट्ट का शून्य हूँ, तो मैं विंष्णुगुप्त का अर्थशास्त्र भी हूँ। सुश्रुत का चिकित्सा ज्ञान और विश्वकर्मा की अभियांत्रिकी मुझसे निकले हैं। वात्स्यायन का कामसूत्र भी जानता हूँ और रमण की तरह भौतिकी भी ज्ञात है मुझे। तिरुवल्लुवर की कविता हूँ, मण्डन का ज्ञान हूँ, शंकराचार्य की दूरदृष्टि हूँ, शुक्राचार्य की युद्धनीति हूँ और विवेकानंद का ओज हूँ। सुभाष की चपलता हूँ तो गांधी का गाम्भीर्य भी।

उर्मिला की विरह वेदना और भरत मिलाप का उल्लास दोनो मैं हूँ। सावित्री का सतीत्व हूँ तो अनुसूया का पातिव्रत्य भी। कर्ण और दधीचि का दान हूँ तो श्रवण की सेवा भी मैं ही हूँ। परशुराम का क्रोध हूँ तो यशोदा का वात्सल्य भी हूँ। अशोक का साम्राज्य हूँ तो चोल वंश का गौरव भी। बीरबल का हास्य हूँ। गोनू और तेनाली की प्रत्युत्पन्नमति हूँ। हिंदी की सरलता और व्यापकता हूँ, तो बंगाली की मिठास हूँ। तमिल के पद हूँ तो मलयालम के गीत। तेलगु की प्रार्थना हूँ तो गुजराती की रास। गुरमुखी में लिखी पंजाबी का थिरकता भांगड़ा हूँ तो असमिया की बाउल धुन। प्रेमचंद की लेखनी हूँ तो रवींद्र की बहुमुखी प्रतिभा भी।

मैं वो हूँ जो  बुद्ध और महावीर को भी अपने इष्ट का रूप मान कर पूजता है। मैं वो हूँ जो शिव और साईं दोनो के दरबार में नतमस्तक है। मैं अपने पवित्र त्रिवेणी संगम और प्रयागराज को भी अल्लाहाबाद कह पुकारता हूँ। मैं वो हूँ जो सूदूर देश से आई एक नन को मदर मानता है। गुरुद्वारे में सेवा करने में लगे सेवादारों की कतार में सर पर रूमाल बांधे में आपको दिखूंगा तो पुष्कर में ब्रह्म की उपासना के बाद अजमेर में  हर साल चादर चढ़ाने भी जरूर पहुंचता हूँ। मुझे न जानने वाले जब मुझे धर्मनिरपेक्षता की संकीर्ण परिभाषा समझाते हैं तो मन ही मन उन पर मंद मंद मुस्कुराता भी हूँ।

 मैं वो हूँ जो जिसने गौरी, तैमूर और औरंगज़ेब को जज़िया दिया पर अपना धर्म नहीं। मैं अगर मीरा का समर्पण हूँ तो कलिंग का प्रतिरोध भी हूँ। पराजय में भी सहेजा हुआ आत्मसम्मान पुरु हूँ मैं। मैं वो हूँ जो जयचंद की वजह से अगर पराजित  हुआ है तो शिवाजी की शौर्य गाथा का उत्तराधिकारी भी है। मैं सबमें समाहित हूँ,सबसे मिल कर रहा हूँ। रति और मोहिनी का सौंदर्य और लावण्य हूँ तो काली की रक्त से सनी जिह्वा भी हूँ। मैं शिव का डमरू हूँ और तीसरा नेत्र भी हूँ। तांडव भी ज्ञात है मुझे। शिमला की शांतिवार्ता हूँ तो पोखरण की ज्वाला भी मैं ही हूँ। भाई भाई सुन कर अक्साईचिन गंवाने वाला मैं हूँ तो 1971 में ढाका की वीरगाथा भी मैं ही हूँ।

मैं चिर सनातन हूँ । मैं हूँ तो यह धरा और भी सुंदर है।मैं कुछ शब्दों  में परिभाषित नहीं हो सकता। मैं अनन्त हूँ, मेरी कथायें अनन्त है। इस अनंत गौरवशाली कथा का एक पन्ना हूँ मैं। हिमालय से हिन्द तक मैं ही हूँ। मैं वो हूँ जिसका लहू गंगा, कालिंदी, कावेरी और नर्मदा के जल से बना है। मेरी अस्थियां हिमालय के पाषाण की तरह कठोर हैं। गीता और वेद मेरी दो आँखें हैं जो मुझे ज्ञान का मार्ग दिखाती हैं।

मैं वो हूँ जो हिन्दुस्तान का वासी है।

मैं हिन्दू हूँ।

Saturday, July 14, 2018

If BCCI conducts football world cup

Following six things will happen if BCCI conducts football world cup:

1) first 30 min and last 20 mins will be considered power play, when goalkeeper hands and legs will be tied.

2) Defenders and mid fielders will not be allowed to tackle or chase opposite striker more than twice in a match.

3) Yellow and red cards will be eliminated. Players will have to pay only a part of match fees to BCCI.

4) Events will be renamed as per sponsors. Like  in cricket a sixer is called a DLF maximum, a goal will be called Jio mobile Goal.

5) Commentary panel will entertain Bollywood celebrities for their film promotion during break. Actors will analyze the acting skills of Players liie Neymar and Ronaldo.

6) No new hindi commemtators will be hired. Arun lal and Sunil doshi will use their same dialogues like Kuch bhi ho, jeet football ki hui hai aur maine to pahle hi kaha tha, pakdo catch jeeto match.



Wednesday, July 11, 2018

to Ojas .. on 4th bday

I want you to follow your own dreams, yet I wish you fulfill all my dreams I could not achieve.

I want you to be independent and fearless, yet I am worried even when you simply want to walk without holding my finger.

I want you to be a self-made man, yet I cannot stop the urge to provide you with everything beyond my capacity.

I want to spend time with you, yet I often make choices to go away from you so that I can spend time with you.

I want you to value inner qualities like love and compassion over skin deep beauty, yet I feel you are the most beautiful kid in this world.

I want you to be down to earth and modest, yet I am so proud of you.

In future, as a grown up, I am the person with whom your opinions may clash the most, yet I will be your biggest supporter in whatever you decide to do.

I am your old man, yet I am at my youngest when I am with you.

Happy 4th birthday Dear Ojas...


अश्वत्थामा हतो: का चीत्कार

‌कुरुक्षेत्र में महाभारत के युध्द को शुरू हुए चौदह दिन बीत चुके थे। कौरवों की सेना का नेतृत्व अब गुरु द्रोण कर रहे थे। पितामह भीष्म के शरशय्या पर जाने के बाद पांडवों ने युद्ध को आसानी से जीत लेने का जो स्वप्न देखा था, गुरु द्रोण के रहते वो एक दिवास्वप्न से अधिक कुछ नही था। अर्जुन की गांडीव गुरु द्रोण के बाणों के सामने ऐसे निस्तेज थी जैसे सूर्य के सामने दीपक। ऋषि भरद्वाज के पुत्र और परशुराम के शिष्य द्रोण की रणनीति तथा उनकी रचित सेनाओं की अभेद्य व्यूह रचना का पांडव सेनापति धृष्टद्युम्न के पास कोई तोड़ ना था। पांडवों के पास ऐसी कोई विद्या न थी जिससे वह अपने ही गुरु द्रोण को परास्त कर सकें। युध्द कला में पारंगत वो क्रोधित ब्राह्मण महाभारत के युद्ध को मानो एक ही दिन में समाप्त करने का प्रण ले चुका था।
गुरु द्रोण को सीधे नीतिपरक युध्द में हराना असंभव था। परंतु युद्ध सिर्फ अस्त्र शस्त्र और रणकौशल से रणभूमि में नहीं लड़ा जाता। युद्ध लड़ा जाता है बुद्धि और कूटनीति से। युद्ध लड़ा जाता है छल से। पांडवों ने द्रोण को मारने के लिये छल का सहारा लेने का निर्णय लिया। गुरु द्रोण के मन में अपने पुत्र अश्वत्थामा के लिये जो अत्यधिक प्रेम की दुर्बलता थी, उसी दुर्बलता पर वार करने का निर्णय लिया गया। दुष्प्रचार, अर्धसत्य, और कुटिलता में सनी योजना के तहत धर्मराज युद्धिष्ठिर के द्वारा द्रोण को उनके पुत्र के मारे जाने की असत्य सूचना दी गयी । पुत्रवियोग में शोकाकुल और धरती पर पड़े निःशस्त्र पिता को पीछे से वार कर धृष्टद्युम्न द्वारा मार डाला गया।



‌मार्च के महीने में हज़ारों किसान नासिक से मुम्बई नंगे पांव पैदल चल कर पहुंचे। पूरी मीडिया में किसानों के फटे पांवों की बिवावियाँ दिखा दिखा कर खूब सहानुभूति बटोरी गई। जब वे किसान मुम्बई पहुंचे तो उन्हें पता चला कि उनकी सारी मांगे तो पहले ही मानी जा चुकी हैं। अभी सारे भारत में ऐसे माहौल बनाया जा रहा है कि दलितों और अल्पसंख्यकों पर अत्यााचार बढ़ गए हैं। एक बहुत बड़े वर्ग को यह बार बार बताया जा रहा है कि उनका आरक्षण छीन लिया जाएगा और संविधान बदल कर मनुस्मृति लागू कर दी जाएगी। और यह बातें एक खास बुद्धिजीवियों द्वारा निरंतर अखबार, टीवी और मोबाइल के माध्यम से परोसी जा रही है। एक भय और अराजकता का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। कुछ पत्रकार असुरक्षित महसूस होने का दावा कर रहे हैं, कुछ धर्मगुरु लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए प्रार्थना सभाएं आयोजित कर रहे हैं। हर तरफ़ से अश्वत्थामा हतो: सरीखे चीत्कार सुनाई पड़ रहे हैं।
अगर वास्तव में लोकतंत्र खतरे में होता तो यह सारे लोग इतनी खुल कर अपनी बात न रख पाते। अगर आरक्षण वाक़ई छीना जाने वाला होता, तो उसके लिये सरकार किसी शुभ मुहूर्त का इंतज़ार न कर रही होती। दुष्प्रचार और असत्य आज युद्ध के सबसे बड़े शस्त्र हैं। पहले पूरी दुनिया को बताया जाता है कि इराक में जैविक और रासायनिक हथियारों का जखीरा है। जब पूरे विश्व का इसका विश्वास हो जाता है, तो अमरीकी सेनाएँ बग़दाद में घुस सद्दाम हुसैन का तख्त पलट देती है और सद्दाम को फांसी दे दी जाती है। जैविक और रासायनिक हथियार ना वहां कभी थे और ना कभी मिले। वहां पर तेल भरपूर मात्रा में अवश्य था जिसके लिए वास्तविकता में यह युद्ध लड़ा गया था । आये दिन खबरें आती हैं कि महिला को डायन बात कर मार डाला गया। अधिकतर मामलों में अकेली वृद्ध विधवा महिलाओ की संपत्ति हड़पने का यह एक पुराना तरीका है।
‌द्रोण वध की कथा पुरानी अवश्य है लेकिन आज के समय में प्रासंगिक उतनी ही है जितनी पहले थी। जब भी किसी द्रोण को सीधे युध्द में हराना कठिन प्रतीत होता है, उसे हराने के लिए असत्य और दुष्प्रचार का सहारा लिया जाता है। असत्य फैलाने के लिए पहले किसी निर्दोष अश्वस्थामा हाथी को मारा जाता है और फिर उसकी मौत की खबर को असत्य और अर्धसत्य की चाशनी में लपेट कर फैलाया जाता है। द्रोण को उसके पुत्र की मृत्यु का समाचार ऐसे सुनाया गया था जैसे उनके हितैषी उनके दुख में शामिल होना चाहते हों। लक्ष्य तो था गुरु द्रोण को मानसिक रूप से अक्षम करना ताकि वो युद्धभूमि में सही निर्णय न ले सकें और भावुक हो शस्त्र त्याग दें। और उनका वध करना आसान हो जाये।
आसिफा हो या वेमुला, यह सब उस अश्वस्थामा हाथी ही तरह हैं जिन्हें खास राजनीतिक उद्देश्य से मारा गया है और उनकी मृत्यु का अर्धसत्य आपको सुना कर आपको भावुक और निर्बल किया जा रहा है। किसी भी उत्तेजक और भावुक समाचार को सुन तुरंत निर्णय न लें चाहे आपको वो सूचना उस व्यक्ति से मिल रही हो जिसे आप धर्मराज मानते हैं। झूठ फैलाने के लिए धर्मराजों का ही सहारा लिया जाता है। किसी दुष्प्रचार का शिकार होने से बचें। सूचनाओं को सत्य की कसौटी पर कस कर ही आत्मसात करें। जिस दिन आपसे सत्य पहचानने और उचित निर्णय लेने मे भूल हुई, किसी धृष्टद्युम्न की तलवार आपकी गर्दन पर वार करने के लिए उठ चुकी होगी।