Saturday, June 13, 2020

चीनी आक्रामकता का प्रत्युत्तर

कोविड 19 के संकट से जूझते देशों को देखकर भारत के नीति निर्माताओं को इसके जनस्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर पड़ने  वाले असर का अंदाजा भले ही लग गया हो, सीमा संकट के रूप इसकी परिणीति की आशा शायद ही थी  | गलवान घाटी पर चल रहे विवाद की जड़ें भी कोविड से जुडी हैं | इतिहास में  देखें तो 1962 में चीनी आक्रमण की एक वजह थी, दुर्भिक्ष से त्रस्त चीनी जनता को राष्ट्रवाद का विकर्षण प्रदान करना और  गुटनिरपेक्ष आंदोलन के कारण  भारत के बढ़ते अंतराष्ट्रीय कद को रोकना | आज की तारीख में देखिए तो यही कारण वर्तमान  सीमा संकट के पीछे हैं | 

 

कोरोना संकट के कारण एक तरफ चीनी अर्थव्यवस्था जहाँ अंतराष्ट्रीय मांग में कमी के कारण  गहरे दवाब  में है ( अनुमानों के अनुसार जीडीपी में चौथी तिमाही में 7% की कमी आयी है), वहीँ कोरोना के सन्दर्भ में अपनाई गयी अलोकतांत्रिक और अपारदर्शी नीतियों ने चीन की अन्तराष्ट्रीय छवि पर अविश्वास का गहरा बट्टा लगाया है | जहाँ चीनी जनता में भारी असंतोष का भाव है वहीँ जापान , अमेरिका समेत कई  देश चीन में स्थापित अपनी विनिर्माण कंपनियों को बाहर निकालने की तैयारी कर रही  हैं | यह  कंपनियाँ अगले पड़ाव के रूप में भारत को देख रही हैं जो डेमोक्रेसी , डेमोग्राफी और डिमांड के मणिकांचन योग के कारण एक सशक्त विकल्प के रूप में उपस्थित  है | चीन की दीर्धकालिक नीतियों के जानकार यह समझते हैं कि  उसकी नीतियाँ हमेशा से भारत को तरह तरह की समस्याओं में उलझा कर एक क्षेत्रीय और वैश्विक शक्ति के रूप उसके उभार को रोकने की रही है |  गलवान वैली में चीनी सेना के अतिक्रमण की नीति एक तरफ राष्ट्रवाद के द्वारा अंदरूनी असंतोष का समाधान करती है, वहीँ भारत की  एक वांछित  वैकल्पिक विनिर्माण गंतव्य की छवि को धूमिल कर उसे एक  अस्थिर असुरक्षित राज्य के रूप में प्रस्तुत करती है | यह कोई एकलौता मामला नहीं है बल्कि नेपाल के लिपुलेख मामला , म्यांमार के रखाइन  स्टेट में कलादान प्रोजेक्ट को बाधित करना और भारतीय तेल कंपनियों के दक्षिणी चीन सागर में तेल उत्खनन के वियतनाम  समझौते  में अड़ंगा डालना भी चीन की इसी नीति के फलन  हैं | 

 समाधान के कदम 

 एक बात तो निश्चित है कि सीमा पर युद्ध न चीन चाहता है और न भारत | क्या अपने मोबाइल फ़ोन से टिकटोक और ब्यूटीप्लस ऐप को डिलीट कर के चीन का मुकाबला किया जा सकता है? या दीवाली में चीनी फुलझड़ियों का बहिष्कार करके कुछ हासिल हो  सकता है?  शायद नहीं | इन क़दमों से आपको कुछ  मानसिक  संतुष्टि भले ही मिले , वास्तविक अर्थों में यह कमल नाल से ड्रैगन को बाँधने की कोशिश मात्र है | 

 इसका उपाय दीर्घकालिक ही हो सकता है| चीन दक्षिण पूर्व देशों खास कर आसियान देशों को अपना विकल्प बनाना चाहता है, ताकि भले ही कंपनियां  चीन से निकल जाएँ लेकिन वह भारत न जाकर वियतनाम और मलेशिया जैसे देशों का रुख करे| आसियान देशों को अपनी सैटेलाइट अर्थव्यवस्था  बना कर चीन अपने वैश्विक पार्थक्य के जोखिम का शमन करना चाहता है, जहां चीनी बहिष्कार की स्थिति में भी इनके माध्यम से उसका व्यापार पूर्ववत रहे।

पहला कदम है देश के अंदर चल रहे सुधारों में तीव्रता लाना | इसके तरह नीतिगत सुधारों जैसे श्रम कानूनों , सरलीकृत  कर प्रणाली और निवेश प्रोत्साहक नीतियों पर अधिक बल  दिया जाना चाहिये | व्यापार सुगमता सूचकाँक में चीन ( 28वां  स्थान ) अभी भी भारत( 63वां  स्थान) से कहीं  आगे है| राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन  कार्यक्रम के तहत  ऊर्जा , रेलवे, सड़क, पत्तन  निर्माण और डिजिटल कनेक्टिविटी  में  वर्ष 2025  तक प्रस्तावित 100 लाख करोड़  निवेश की परियोजनाओं को गंभीरता से समयबद्ध तरीके में पूरा करने की आवश्यकता है|  हमारी  स्थिति उस किसान की तरह न हो  जिसकी खेत पर बारिश तो हुई लेकिन उसने  मेड नहीं बना रखी थी|

 

दूसरा कदम है, एक्ट ईस्ट की नीति के तहत चल रहे कनेक्टिवी कार्यक्रमों जैसे भारत - म्यांमार-थाइलैंड त्रिभुजीय सड़क परियोजना, म्यांमार में सिटवे बंदरगाह को भारत-म्यांमार सीमा से जोड़ती कलादान परियोजना ,  कम्बोडिया  लाओस म्यांमांर और वियतनाम के साथ प्रस्तावित मेकांग - भारत आर्थिक गलियारा परियोजना को वरीयता देकर पूरा करना | दक्षिण एशियाई देश अभी चीन के ज्यादा निकट हैं, हमारी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति और लोकतान्त्रिक व्यवस्था ही उनमें  चीनी आकर्षण को कम करेगी| सुदूर पूर्व जापान के साथ दक्षिण चीन सागर में मुक्त नौवहन और क्षेत्र में सबके लिए सुरक्षा और विकास (SAGAR) पहल के लिए अंतराष्ट्रीय दवाब बना कर तटीय देशों फिलीपींस , ताइवान के सामुद्रिक हितों की रक्षा में हमें मुखर भूमिका निभानी होगी | इन प्रयासों से ना केवल आसियान देशों से हमारे व्यापारिक संबंध प्रगाढ़ होंगे ( 2018-19 व्यापार 97 बिलियन डॉलर मात्र) बल्कि भारत और इनके बीच की हमारी कुंजी  उत्तर पूर्वी राज्यों में लंबित अवसंरचना का विकास होगा। अरुणाचल और सिक्किम में चीनी दख़ल का कारण भारत द्वारा इन क्षेत्रों की अवहेलना भी है।

 तीसरा कदम है ‘पडोसी-पहले’ की नीति के तहत नेपाल के साथ रिश्तों में आयी हालिया खटास को जल्द दूर करना | भारत-नेपाल के अंतरंग और विशिष्ट संबंधों की रक्षा के लिए उच्चतम स्तर पर बातचीत नेपाल के राजनीतिक गलियारों में भारत के प्रति विश्वास बहाली आवश्यक है| दूसरी तरफ  श्रीलंका , मालदीव को चीन के ऋण जाल से बचाने के लिए वहां भारतीय निवेश बढ़ाना जरूरी होगा |  

 संत तिरुवल्लुवर ने कहा था " धनार्जन करो | अपने दुश्मनों के दर्पदलन के लिए इससे कारगर कोई हथियार नहीं है" | चीनी आक्रामकता का प्रत्युत्तर दीर्घकालिक और धनात्मक आर्थिक नीतियों में छुपा है, न कि कुछ चायनीज ऍप को डिलीट और रेटिंग ख़राब करने  की उथली और नकारात्मक नीतियों में |   

 


Tuesday, June 9, 2020

पलायन समस्या का समाधान

जनसंख्या का  एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में बेहतर अवसरों की तलाश में जाने की सामान्य मानवीय प्रक्रिया समस्या तब बन जाती है  जब इसकी दर इतनी अधिक हो जाय  कि यह सामाजिक आर्थिक अवसंरचना के लिए दुष्कर हो जाए । भारत में पलायन की समस्या कोई नई नहीं है। विभाजन , बांग्लादेश युद्ध के समय भी अत्यधिक पलायन हुआ था, लेकिन वर्तमान कोरोना संकट के दौरान शहरों से गांवों की ओर होता उत्क्रमित पलायन का गंभीर संकट हमारे सामने है। 

वर्तमान पलायन समस्या एतिहासिक दृष्टांतो  से अग्रलिखित संदर्भों में अलग है।
क) पलायन की दिशा : सामान्यता: कृषि के उत्तरोत्तर अलाभकारी होने और जनसंख्या के अत्यधिक दवाब कारण ग्रामीण युवा जनसंख्या का शहरी क्षेत्रों में पलायन निरंतर होता रहा है। इस प्रवासी जनसंख्या के पूर्ण आकार की एकाध झलक हमें हर साल दीवाली और छठ के दौरान पूर्वी भारत की ओर जाती ठसाठस भरी रेलगाड़ियों को देख कर मिलती है लेकिन उस जनसंख्या का पूरा अंदाजा हमें अब लगा है। प्रवासी कामगारों का एक निश्चित डाटाबेस उपलब्ध नहीं है |


ख) पलायन का कारण : विभाजन और 71 के बांग्लादेश युद्ध के दौरान भले ही राजनीतिक कारण प्रमुख रहे हों, अन्तर्देशीय पलायन का कारक मुख्यतः आर्थिक ही रहा है। ऐसा पहली बार हो रहा है कि स्वास्थ्य कारणों और उससे जनित आर्थिक कारणों से पलायन हो रहा है।

ग) पलायन की गति: विभाजन और 1971 के युद्ध को छोड़ दें तो शायद वर्तमान पलायन की गति और मात्रा का कोई सानी हमारे इतिहास में नहीं मिलता। आलेख लिखे जाने तक करीब 8 लाख प्रवासी कामगार बिहार लौट चुके थे। यूपी, ओडिशा, बंगाल और झारखंड को जोड़ लें तो यह संख्या 2 करोड़ से भी ज्यादा हो सकती है। यह एक अभूतपूर्व स्थिति है जिससे निपटने के लिए सारी पुरानी रणनीति अपर्याप्त सिद्ध है।

पलायन के कारण:
यद्यपि लाकडाउन के कारण ठप पड़ी आर्थिक  गतिविधियों के कारण रोजगार छिनने और स्वास्थ्य सम्बन्धी चिंताओं को उपरी रूप से पलायन का मुख्य कारण माना जा सकता है, लेकिन गहरी छानबीन अन्य कारणों को सामने लाती है। पहला कारण है केंद्र और राज्य सरकार की संवाद हीनता : लॉक डाउन के दौरान केंद्र और रांज्य सरकारों का मजदूरों के प्रति संवाद हीनता की स्थिति दिखी है। प्रवासी मजदूरों में यह विश्वास बहाली नहीं हो पाई कि वे जहां है सुरक्षित हैं। धरातल पर कामगारों को राशन मुहैया, किराया माफी, नकद अंतरण तथा वेतन सुनिश्चित करने का कार्य अक्षम तरीके से हुआ। सरकारी आधिकारिक घोषणाओं के अभाव में अफवाहों ने डर का माहौल उत्पन्न किया। कोरोना को प्लेग की तरह जानलेवा महामारी मान बैठने की जनश्रुति सी फैल गई। आनंदविहार, गाजीपुर बॉर्डर और बांद्रा स्टेशन पर जमा भीड़ यही दिखाती है अफवाहों ने कितनी गहरी पैठ बना रखी थी। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत कामगार पहले से ही रोजगार अनिश्चितता से ग्रसित थे, वहीँ कोरोना संकट  जीवन मरण का प्रश्न बन गया । प्रवासी कामगारों की सही संख्या का कोई विश्वसनीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं होने के कारण प्रशासन समस्या के प्रभावी समाधान ढूंढ़ने में विफल रहा। केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के बीच समन्वय के अभाव ने इस विकराल समस्या को जन्म दिया।


पलायन समस्या का समाधान भी समस्या के अनुरूप विस्तृत होना आवश्यक है जिसमें तात्कालिक और दीर्घकालिक उपायों के मेल होना चाहिये|

लघु कालिक उपाय:
रेलवे , राज्य परिवहन निगम , निजी वाहन चालकों तथा स्वयंसेवी संस्थाओं के संयुक्त प्रयास से पैदल चलकर घर जाने को मजबूत कामगारों को सबसे पहले यातायात के साधन उपलब्ध करवाना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए|

विस्थापितों की तात्कालिक सहायता के लिए जन धन खातों में सीधा नकद अंतरण तथा उनके गंतव्य पर क्वारांटाइन की समुचित व्यवस्था करनी होगी । मनरेगा के अन्तर्गत आने वाले कार्यक्षेत्र का विस्तार कर घरेलू कार्यों, आंगनबाड़ी, सेवा क्षेत्र को शामिल करना आवश्यक है। बजट में मनरेगा हेतु आवंटित 60000 करोड़ और अतिरिक्त आवंटित 40000 करोड़ की राशि में और बढ़ोतरी करने की आवश्यकता पड़ेगी। 'एक देश एक राशन कार्ड' के साथ साथ जन वितरण प्राणी द्वारा न्यूनतम खाद्य सुरक्षा प्रदान करने का कार्य त्वरित  गति से पूरा होना चाहिए.

 

दीर्घकालिक उपाय-
पलायन समस्या ने भारत के समावेशी विकास के समस्त दावों को निर्मूल सिद्ध किया है। देश के पूर्वी और पश्चिमी राज्यों के बीच आ चुके गहरे आर्थिक विभाजन की खाई को पाटने के लिए दूरगामी और दीर्घकालिक उपायों की आवश्यकता होगी। जीएसटी  लागू होने के बाद राज्यों के स्वतंत्र कर लगाने की क्षमता में कमी आई है. उत्क्रमित पलायन की मार झेल रहे राज्यों की आर्थिक दशा वैसे  ही बुरी थी , कोरोना संकट में राज्यों की अर्थव्यवस्था पर बोझ काफी बढ़ गया है| आरबीआई और केंद्र सरकार की नीतियों  की तरह  राज्यों को बांड जारी कर अतिरिक्त वित्त मुहैया करवाने की दिशा में कदम उठाये गए हैं| श्रम मंत्रालय के अंतर्गत प्रवासी मज़दूर कल्याण फण्ड बनाने का सुझाव अपनाने के साथ एक व्यापक राष्ट्रीय रोजगार नीति अप्रवासी कामगारों के लिए बनाये जाने की आवश्यकता है।

आत्मनिर्भर भारत कार्यक्रम के तहत श्रम गहन एमएसएमई क्षेत्र को दी गई तीन लाख करोड़ की प्रतिभूति रहित साख  एमएसएमई क्षेत्र को पुनर्जीवित करने में मदद करेगी । श्रम कानूनों में वर्षों से पड़े लंबित सुधारों को लागू करने का इससे बेहतर अवसर शायद ही मिले। उत्तरप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक और मध्य प्रदेश की राज्य सरकारों द्वारा श्रम कानूनों में बदलाव इस दिशा में पहले कदम हैं। श्रम कानूनों में दीर्घकालिक और सुसंगत बदलाव के साथ सुभेद्य महिलाओं कामगारों और सीमांत कामगारों के हितों और छोटे व्यवसायियों के हितों के बीच सूक्ष्म संतुलन एमएसएमई क्षेत्र में साख बहाली कर सकते हैं।


पूर्वी क्षेत्र में आर्थिक अवसंरचना का कार्य त्वरित गति से करना  और इस कार्य में राज्य सरकारों को विश्व बैंक, न्यू डेवलपमेंट बैंक जैसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से भी मदद लेना आवश्यक होगा | जन -धन, आधार और मोबाइल आधारित सुदृढ़ सामाजिक सुरक्षा का तंत्र निर्माण  जिसके तहत कामगारों की सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों में गृह ऋण सहायता , सामूहिक बीमा , मातृत्व लाभ को शामिल करना होगा | भारत कौशल विकास कार्यक्रम, व्यावसायिक शिक्षा कार्यक्रमों को युद्ध स्तर पर लागू करने का सबसे बेहतर समय अब है|

स्पष्टतया यह समस्या अब तक अपनाई गई विकास नीति का साइड इफेक्ट है। हमारी भविष्योन्मुखी नीति ग्राम स्वराज की परिकल्पना, PURA ( ग्रामीण क्षेत्र में शहरी सुविधाओं की उपलब्धता) पर आधारित होनी चाहिए। कृषि के सहायक गतिविधियों का विकास कर कृषि पर जनसंख्या दवाब कम करना आवश्यक है, वहीं शहरी क्षेत्रों में मलिन बस्ती विकास करना होगा। 

 

Thursday, June 4, 2020

कृषि विपणन की समस्या

हमने बचपन में गाय के बंटवारे की कहानी पढ़ी थी। कहानी में बड़ा भाई गाय का पिछला हिस्सा रखता है, छोटा भाई अगला हिस्सा। मतलब गाय को खिलाने पिलाने की जिम्मेदारी छोटे भाई की जबकि दूध पर सारा अधिकार बड़े भाई का। यह कहानी सुनने में भले ही अविश्वसनीय लगती हो कि कोई ऐसे बटवारे पर कैसे राज़ी हो सकता है, लेकिन अगर आप भारतीय कृषि रूपी गाय को गौर से देखें तो हमारे समाज ने किसानों के साथ कुछ ऐसा ही समझौता कर रखा है।  जहां कृषि रूपी गाय को पालने की जिम्मेदारी किसानों की है और सारा दूध बिचौलियों की बाल्टी में ।

आपदा में अवसर के सिद्धांत को अगर मानें तो वर्तमान कोविड संकट ने  सुधारों के अभाव में कराह सी रही भारतीय कृषि को सुधारने के लिए एक बहुमूल्य अवसर प्रदान किया है |


कृषि विपणन की समस्याएं

‌हमने गाय वाली कहानी में देखा था कि दुग्ध उत्पादन वहां समस्या नहीं थी, समस्या थी  अनुचित दुग्ध  वितरण। हरित क्रांति के बाद भारतीय कृषि में भी उत्पादन समस्या नहीं है,  कृषि उत्पादों का विपणन है। आज  भारत " कंट्री विथ ए बेगिंग बावुल" से " कंट्री विथ ब्रेड बास्केट " बना  है, लेकिन किसानों की निवल आय का स्तर अत्यंत निम्न है।  वर्ष 2012 -13 के में भारतीय किसानों की औसत आय मात्र 6426 रुपए मासिक थी। आत्महत्या करने वाले किसानों पर औसत बकाए ऋण की राशि भी मात्र 60000 रुपए के आसपास थी।

हमारी व्यवस्था किसानों को कृषि के हर पहलू के लिए तो अकेला छोड़ दिया है लेकिन कृषि उत्पादों को बाज़ार में बेच कर लाभ कमाने की बात हो, तो बिचौलियों के एक बड़ा तंत्र आगे आ जाता है । यही तंत्र कृषकों के सबसे बड़े शोषक के रूप में उभरा है। जीएसटी की एक देश एक बाज़ार की संकल्पना से किसानअब तक अछूता है। किसान कुछ निर्दिष्ट एपीएमसी बाजारों में ही अपना उत्पाद लेकर कर जा सकते हैं जहां आढ़तियों का कार्टेल उनके शोषण का एक चक्रव्यूह बना कर बैठा है,जिसमें प्रवेश उपरांत अभिमन्यु किसान की निर्मम हत्या तय है।

‌आवश्यक वस्तु अधिनियम के कारण किसान या अन्य व्यापारी कृषि-उत्पादों के भंडारण से डरते हैं। इसका असर  ऑफ सीजन कीमतों में अत्यधिक उतार चढ़ाव के रूप में दिखता है और भंडारण अवसंरचना के निर्माण में उदासीनता को बढ़ावा देता है।

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‌भारतीय कृषि में लघु और सीमांत किसानों की अधिकता भी मुक्त बाजार प्रणाली में उनकी मोलभाव करने की शक्ति को सीमित करती है। लघु और सीमांत किसान बिचौलिए वर्ग के लिए एक सुभेद्य लक्ष्य हैं जिनसे औनेपौने भाव पर उत्पाद खरीद  मनमानी कीमत पर बेच लाभ अर्जित किया जाता है। अंतिम उपभोक्ता को जिस कीमत पर वस्तु उपलब्ध होती है उसका एक तुच्छ हिस्सा ही उत्पादक किसान को मिलता है।

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आत्मनिर्भर किसान : आत्मनिर्भर भारत

आत्मनिर्भर भारत कार्यक्रम के तहत कृषि संबंधी ग्यारह घोषणाओं तीन कृषि विपणन की समस्या को सुलझाने के लिए हैं। पहला है आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में बदलाव। बंगाल दुर्भिक्ष क़ालीन यह कानून वर्तमान परिस्थितियों  में  अनावश्यक है। इसके हटने के बाद कोल्ड स्टोरेज चेन में निजी निवेश बढ़ेगा, सब्जियों और फलों की आपूर्ति श्रृंखला समृद्ध होगी और किसानों को डिस्ट्रेस सेलिंग से राहत मिलेगी। अन्तिम उपभोक्ता के लिए बाज़ार कीमतों में स्थिरता आएगी और बर्बाद हो रहे 30% कृषि उत्पाद बचाया जा सकेगा।

दूसरा प्रमुख परिवर्तन है एपीएमसी एक्ट में बदलाव। एएपीएमसी एक्ट ने किसानों को मुक्त बाज़ार से दूर रख उनको लाभ लक्षित कृषि - उद्यमी ना बना कर सिर्फ जीविकोपार्जन वाली कृषि से बांध रखा है। इ- नाम जैसी योजना को पूरे देश में लागू कर किसान के पास अपने उत्पाद बेचने का अतिरिक्त बाज़ार उपलब्ध करवाना आवश्यक है। “एक देश एक राशन कार्ड” की सदृश  किसानों को “एक देश एक लाइसेंस “ देना आवश्यक है|

तीसरा महत्वपूर्ण कदम है संविदा आधारित कृषि जो खाद्य प्रसंस्करण कंपनियां को सीधे किसानों से जोड़ पाएंगी। छोटे और सीमांत किसान मिलकर अपना एक उत्पादक संघ बना कर सीधे कंपनियों से करार सकते हैं। इससे किसानों को  विदेशी बाजार की पहुंच, अतिरिक्त  जोखिम शमन, लाभ सुनिश्चितता, सस्ती कृषि साख, और भविष्य आधारित मूल्य निर्धारण का लाभ होगा। अमूल के रूप में हमारे पास` सहकारिता आधारित एक सफल मॉडल है जिसे फलों और सब्जियों  के लिये उपयोग किया सकता है।`

मोदी-सीतारमण की जोड़ी के पास कृषि में आधारभूत परिवर्तन करने का वह मौका है जो 1991 में  राव-मनमोहन की जोड़ी के पास उद्योगों और सेवा क्षेत्र के लिए था। प्रश्न यह नहीं है कि भारतीय किसान को उसका उचित लाभांश मिल सकता है या नहीं। प्रश्न यह है कि हम यह करने में और कितना विलंब करने वाले हैं। ऐसा करना किसानों पर हमारा उपकार नहीं बल्कि उनके चिर वंचित अधिकारों की पुनर्स्थापना मात्र है। 

Wednesday, June 3, 2020

Paatal Lok Conversations between writer and producer

Is it now safe to say that Paatal lok is a series full of cliches and borrowed formulae? Or should I wait for the initial euphoria to settle down? Anyway..
Got my hands on authentic verified pre-production time conversation between producer madam and the script writer..
Read on..
Writer: Madam, main hero imandar inspector hai.. per bechare ko office mein koi bhav nahin deta..
Madam: sirf office mein.. kuchh extra daalo..aisa karo ki usko ghar pe bhi koi bhav na de..
Writer: Theek hai madam, dikha dete hain ki uska beta usko bhav nahin deta..
Madam: Theek hai.. lekin hero ko aur tragic banana hai.. tab kuch maza aaye..
Writer : theek hai madam.. flash back mein dikha denge ki uska baap bhi isko bhav nahi deta tha..
Madam: haan.. yeh theek rahega.. daddy issue plus son issue.. so innovative.. almost like foreign web series.. yeh to hua hero.. story mein kya rakhoge..
Writer : bas madam.. ek murder plan hai, jis mein 4 culprit hain, jisko hero investigate karega, thriller type banayenge..
Madam : maine sacred games mein dekha tha ki ek character ladki hoti hai lekin baad mein ladka nikaltaa hai.. mujhe bhi aisa twist chahiye..
Writer: theek hai madam.. ek culprit ko aisa bana denge.. ladki jaisa dikhe lekin hoga ladka.. phir story mein
Conventional sex scene ke saath saath progressive sex scene bhi dikha sakte hain..

Madam: sirf conventional aur traditional wala scene nahin chalega.. logon ko shock karne ke liye kuch aur bhi daalo..
Writer: theek hai madam.. bachchon wala scene daal dete hain.. web series hai . Kaun censorship karega..
Madam: Brilliant.. bachche wala angle theek hai, lekin classic taste walon ke liye maa- behan wala angle bhi hona chahiye..
Writer: theek hai madam.. ek character ki maa wala angle daal denge.. dusre character ki bahan wala.. aur kuchh madam?
Madam: filhaal etna angle theek hai.. ek extra marital affair bhi rakhna.. maine GOT aur breaking bad dono mein dekha tha.. badhiya rahta hai..
Writer: theek hai madam.. jiska murder plan ho raha hai, uska extra marital affair dikha dete hain.. 2-4 scene 
es wali story mein bhi daal denge..

Madam: sirf scene nahin ..thoda dialogue mein bhi dhyaan do.. gaali wali dekar poora real type lagna chahiye..gaali agar bhool gaye ho to wapas kisi engineering college ke hostel se seekh aao.. lekin gaali saari honi chahiye script mein.. tab na log kahenge ki realistic series hai..
Writer: theek hai madam.. saari gaali daal dunga.. aur kuchh??
Madam: dekho.. aisa lag raha hai na ki yeh sab daalne ke chakkar mein sub- standard series na ban jaaye.. kuch aisa daalo ki log bolein ki Idea of India ko upheld kiya hai..
Writer:theek hai madam, beef aur Ballabhgarh wala scene daal denge, rapist ko brahmin dikha denge to Idea of india ko upheld wala angle bhi aa jayega..
Madam: yeh theek hai.. aur kya.. Bruno ko bhi script mein space milna chahiye..
Writer: Bruno kaun madam?
Madam: are mera pyara doggy.. uske bina story nahi banegi..
Writer: sure ma'am.. main murderer ko dog lover dikha dunga.. isse woh animal lover wala angle bhi aa jayega aur criminal ka humanization bhi ho jayega.. media wale isko Burhan formula kahte hain.. wohi lagaunga.. Aur Madam, Langda Tyagi ke jaise is wale character ko haath toota rahega. Langda Tygai ke takkar ka hoga Apna Loola Tyagi.
. 
Madam: brilliant.. chalo aaj ke liye etna input kaafi hai.. script ek hafte mein chahiye..

Writer: Madam.. virat sir ka autograph mil jaata to..
Madam: abhi jao.. sir instagram per post daalne ke liye face bana bana ke selfie le rahe hain.. script likh kar lao..ek autograph bhi dila dungi..
Ab jao.. mujhe PETA walon ka bhi phone aa raha hai,diwali special message record karna hai..

Writer: theek hai madam.. agli baar paatal lok ki script lekar hi aapse milunga.. bye.
Madam : Bye.. Ae Kohli, Pochha laga na pochha..

Monday, June 1, 2020

मियां बीवी राज़ी तो क्या करेगा काजी

मियां बीवी राज़ी तो क्या करेगा काजी। इस मुहावरे का  साधारण अर्थ है तो यह है कि दोनो पक्ष अगर आपस में सहमत हों तो तीसरे पक्ष के दखलंदाज़ी की आवश्यकता नहीं है। यह सामान्य परिभाषा इस प्रश्न का उत्तर देती है कि इसका अर्थ ' क्या ' है? जिज्ञासु मन शायद ही क्या का उत्तर पाकर संतुष्ट होता है। ' क्यों  ' और ' कैसे ' वाले प्रश्न बहुधा विषय की गहराई में आपको ले जाते हैं। एक बार आप गहराई में पहुंच गए तो फिर जिस ज्ञान मोती के लिए आपने डुबकी लगाई है, उसके अलावा भी बहुत कुछ मिल सकता है। चलिए सतह से थोड़ा नीचे चलते हैं।


यहां इस मुहावरे में  मियां बीवी और काजी शब्दों का ही प्रयोग क्यों हुआ ? पति पत्नी और न्यायमूर्ति शब्द का क्यूं नहीं। सवाल बेतुके लग सकते हैं, लेकिन सेव नीचे ही क्यूं गिरा, यह भी तो बेतुका ही सवाल था। बेतुके ही नए तुकों की गवेषणा करते हैं। तो बेतुके सवालों को थोड़ी इज्जत ज्यादा देते हुए उसके उत्तर ढूंढ़ते हैं

।  मियां शब्द संभ्रांत मुस्लिम पुरुष के लिए प्रयोग होता है। बीवी शब्द को मेम साहब का उर्दू फारसी अनुवाद मान सकते हैं। काजी मुस्लिम समाज में शरीयत अदालतों का एक अधिकारी होता है, जो पक्षों की बात सुनकर फैसला देता है। भारत में मुगल काल से ही शरीयत अदालतों की स्थापना हुई। आलमगीर या औरंगज़ेब की किताब फतवा ए आलमगीर मुगल काल के शरिया कानूनों का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। वापस लौटते हैं, अपने मुहावरे पर। तो लगता है कि इस मुहावरे की उत्पत्ति भी शरीयत कानूनों से हुई है। लेकिन यह मियां बीवी राज़ी होने पर काजी साहब की ताकत कम क्यूं हो जा रही है। इसका उत्तर भी शरीयत कानूनों की प्रकृति में मिलता है। शरीयत अदालतों और हमारे यहां प्रचलित ब्रिटिश न्यायव्यवस्था में एक अंतर यह है कि हमारे ब्रिटिश कानूनों में फौजदारी मामलों में एक पक्ष राज्य होता है जबकि दीवानी मामलों को दो गैर-राज्य पक्षों के बीच माना जाता है। दीवानी मामलों में जहां हर्जाना भर कर दोषी मुक्त हो सकता है वहीं फौजदारी मामलों में सजा और हर्जाना दोनों का प्रावधान होता है।  शरीयत न्यायव्यवस्था में फौजदारी मामलों को भी दो गैर राज्य पक्षों के बीच माना जाता है। मतलब यह कि हत्या जैसे मामलों को भी दो गैर राज्य पक्षों के बीच का मामला माना जाता है और राज्य हस्तक्षेप नहीं करता। सामान्य अर्थ यह कि शरीयत में दीवानी (सिविल) और फौजदारी (क्रिमिनल) मुकदमों की प्रकृति एक मानी गई है।


 असली अंतर अब शुरू होता है, ब्रिटिश न्यायव्यवस्था में फौजदारी मामलों में चूंकि राज्य एक पक्ष होता है, इसीलिए किये गए अपराध को राज्य के विरूद्ध अपराध माना जाता है। अब जब अपराध राज्य के विरूद्ध हुआ है, तो माफ़ करने का अधिकार भी राज्य के पास होता है, वादी या प्रतिवादी के पास नहीं। एक पक्ष चाहे भी तो फौजदारी मामलों में दूसरे पक्ष को क्षमादान नहीं दे सकता। यह राज्य का अनन्य अधिकार क्षेत्र है। उदाहरणतया, निर्भया मामले में ऐसी मांग उठी थी कि निर्भया की मां अभियुक्तों को क्षमादान दे दे। वास्तव में कानूनी तौर पर निर्भया की मां का उनको माफ़ करना या ना करना बेमानी था, न्यायपालिका के फैसले पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अगर निर्भया मामले का कानूनी नाम देखिए तो कुछ इस प्रकार का होगा, राम सिंह बनाम भारत संघ, विनय शर्मा बनाम भारत संघ, ना कि राम सिंह बनाम आशा देवी। 


हां अगर यही मामला शरीयत कानून के हिसाब से चलता तो निर्भया का परिवार दोषियों को क्षमादान दे सकता था। ऐसा इसलिए क्योंकि वहां राज्य मामले में पक्षधर नहीं होता।आपने सुना होगा कि सऊदी अरब जैसे देशों में हत्या जैसे मामले में भी धन चुका कर बचा जा सकता है। इसे ही कभी कभी ब्लड मनी कहते हैं। इसका एक बेहद प्रसिद्ध मामला है ईरान का अमीना बहरामी एसिड अटैक मामला।  अमीना बहरामी ने अपने पर एसिड फेंकने वाले को एसिड डाल कर अंधा करने की मांग की जो वहां की शरीयत व्यवस्था के अनुसार एक जायज़ मांग थी। यह बात अलग है कि अमीना ने सजा से ठीक पहले अपने दोषी को माफ कर दिया था, तो उसके अपराधी को छोड़ दिया गया। तो लब्बोलुआब यह कि कोई भी  कितना भी गंभीर अपराध हुआ हो, दोनों पक्ष अगर आपसी समझौते के लिए मान जाएं तो शरीयत अदालतें कुछ नहीं कर सकती। इसी बात को मियां बीवी राज़ी वाले मुहावरे में बताया गया है। 


अब शरीयत अदालतें अच्छी हैं या ब्रिटिश अदालतें, यह बड़ा व्यापक प्रश्न है, जिसकी पड़ताल के लिए काफी समय चाहिए। और कहीं ना कहीं उसका संबंध भारत में वर्षों से चल रहे समान नागरिक संहिता और मुस्लिम पर्सनल लॉ की बहस से भी जुड़ता है। लेकिन उसपर चर्चा फिर कभी। फिलहाल आपके साथ आपसी सहमति से इस आलेख को यहीं रोकता हूं। 


पर जाते जाते एक छोटा सा प्रश्न आपके लिए भी। इस मुहावरे का अर्थ बताइए। हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फारसी क्या!! जवाब देने से पहले बेतुके दृष्टिकोण से अपने उत्तर को परखिएगा अवश्य।