Monday, December 7, 2020

उज्जैन इंदौर यात्रा वृतांत

छह महीने हमने घर पर कैसे बिताए यह हम ही जानते है। इस टेंपो में भरकर सब्जी और फल बेचे। क्या बेचे? सब्जी और फल।
मैं तो 3 बजे सुबह उठ जाता था ताकि 8बजे से पहले कि पुलिस वाले सड़क पर दिखे, सब्जी बेचकर घर वापिस जाता था।  महाकाल की दया से जब से मंदिर के पट दर्शन के लिए खुले हैं, हमारी जान में जान आई है। क्या आई है? जान में जान आई है।

हमारे टेंपो चालक सह गाइड सह दार्शनिक के बात करने का अंदाज़ निराला है। लंबे बाल , कानों में बालियां और गहरी काली दाढ़ी के बीच उनकी मुस्कान को ढूंढना कठिन नहीं है। राजस्थान के बूंदी जिले से उज्जैन आकर बसे महेश नागवंशी जी का जीवन संघर्ष कठिन रहा है। आज वे गर्व से बताते हैं कि उनके आज चार ऑटो चलते हैं उज्जैन में।  मैं भी उन्हें बताता हूं कि हम भी काफी परेशान रहे हैं तो नागवंशी जी अपने टेंपो के शीशे से हमें ऐसे देखते हैं कि मुझे जल्द ही अपनी बात के हल्केपन का अहसास हो जाता है और मेरी नजर वापस से उज्जैन की सड़कों पर हो जाती है जहां उज्जैन को सफाई सर्वेक्षण में नंबर एक बनाने की अपील की गई है।

उज्जैन या अवंति शहर प्रारंभ से ही जीवन से संघर्ष करने वालों की कर्मभूमि रहा है।
युवराज अशोक को जब खबर मिली कि उनके पिता बिम्बिसार उनकी जगह सुशीम को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर रहे हैं, तो वे अवंति में ही  थे। अवंति महाजनपद को मगध का एक अंग बनाने और इसपर मगध की प्रभु सत्ता को स्थाई बनाए रखने की अपनी जिम्मेदारी में युवराज अशोक पूर्णतः सफल रहे थे। अवंति से उनके लगाव एक और कारण था कि वेदिशा गिरी या वर्तमान विदिशा की राजकुमारी से ना केवल उनका विवाह हुआ था बल्कि उनके पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा ने भी अवंतिका में भी जन्म लिया था।



उज्जैन की धरा भारत के राजनैतिक और सांस्कृतिक इतिहास की धुरी रहा है। महान अशोक हो या विक्रमादित्य चन्द्रगुप्त द्वितीय, भारतीय इतिहास के दो महानतम विजेता शासकों की कर्मभूमि की मिट्टी में कुछ खास तो होगा ही।  उज्जैन की पावन धरती पर ही महाकवि कालिदास ने मेघदूतम और अभिज्ञान शाकुन्तलम की रचना की है। इसके अलावा भृत्तिहरि, भास या शूद्रक, या फिर ह्वेनसांग  सबों ने उज्जयनी का नाम  अपनी रचनाओं में अत्यंत सम्मानपूर्वक लिया है।

किताबों में जिस अवंतिका , उज्जैन , उज्जयिनी, अवंति का नाम इतना सुन रखा था, कि कोरोना के डर और दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन की चिंता किये बगैर निकल कर अगर कोई जगह जाने की सोचा भी जा सकता है तो वो  भगवान महाकाल की धरती उज्जैन ही हो सकती थी। महाकाल मंदिर में पहुंच कर पता चला कि सुबह की भस्म आरती के दर्शन बंद हैं। क्षिप्रा तट पर सुबह की पहली चिता की राख से महाकाल के श्रृंगार के कितने अर्थ हो सकते हैं इसमें पड़े बगैर मैं सिर्फ यह अद्भुत दृश्य देखना चाहता था। अब महाकाल की इच्छा से परे क्या हो सकता है। पहले दिन सिर्फ सामान्य दर्शन कर लौट आया कि अगले दिन प्रातः महाकाल आरती के दर्शन करूंगा।

मां उज्जयिनी के विस्तृत दर्शन को अगले दिन के लिए रख छोड़ने के बाद सोचा कि अब दिन भर क्या किया जाय। उज्जैन की छोटी बहन है इंदौर। जिस तरह ननिहाल में मां के प्यार से ज्यादा आकर्षक होता है मौसी का लाड़, उसी प्रकार इंदौर के खाने की सुगन्ध के वशीभूत ही इंदौर के लिए निकल पड़ा।

उज्जैन से करीब एक घंटे की दूरी पर बसा है इंदौर। मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा शहर जिसे अपनी प्रतिभा के हिसाब से राजधानी होना चाहिए था लेकिन शायद इंदौर को गद्दी से ज्यादा जायके की पड़ी थी। उसी ज़ायके की तलाश में हमारा पहला पड़ाव था रजवाड़ा पैलेस के पास स्थित सर्राफा बाज़ार रजवाड़ा पैलेस होलकर वंश के शासकों की हवेली है जिसका आजकल जीर्णोद्धार चल रहा है। बस हवेली के मंदिर प्रांगण और म्यूजियम तक ही जाने की अनुमति है। पैलेस के मंदिर प्रांगण में घुसते ही आपकी नजर जाएगी बड़े से तुलसी पिंडे पर। खुले आंगन के बीच में स्थित तुलसी स्थान को नमन कर मुख्य मंदिर तक जाने के लिए एक प्रतिक्षणा पथ बना हुआ है। उस प्रतिक्षणा पथ पर एक से एक दुर्लभ प्रतिमाएं लगी है। दुर्भाग्यवश ना ही भारतीय वास्तु शास्त्र का इतना जानकार हूं और ना इतना समय था कि हरेक कलाकृति को ध्यान से देख उसको समझ सकूं। हां कांसे की बनी नटराज एक  प्रतिमा आपका ध्यान जरूर आकर्षित करेगी।


मंदिर प्रांगण के ऊपर संकरे जीने के जरिए आप अस्थाई से बने संग्रहालय तक पहुंच सकते हैं। भारतीय राजे रजवाड़ों में के संग्रहालयों में सामान्यतः वो दो प्रमुख तत्व सामान्य रूप से दिखते हैं , जिनके कारण उनका पतन हुआ। पहला उनके भोग विलास की सामग्री जैसे बड़ी बड़ी पालकियां , महंगे डिनर सेट , बड़े बिछौने इत्यादि। दूसरा सामान्यतः उनके जंग लगी तलवारें और बाबा आदम के ज़माने की तोपें जिनका उपयोग जंग में कम सलामी बजाने के लिए ज्यादा होता था। मैं ऐसी चीजों से सामान्यता आकर्षित नहीं होता। लेकिन रजवाड़ा पैलेस में रानी अहिल्या रानी होलकर की एक फोटो गैलरी है। रानी अहिल्या बाई , जिन्हें कुछ विचारकों ने आधुनिक भारत के सबसे योग्य महिला प्रशासकों में माना है, के द्वारा किए गए अनेक कल्याणकारी कार्यों तथा उनके जीवन के पहलुओं के चित्र वहां लगे हैं। एक चित्र ने मेरा खास ध्यान खींचा जहां रानी अहिल्या बाई अपने मृत पति के साथ सती होने को तैयार हैं और उनके श्वसुर उनको रोते हुए रोक रहे हैं कि मेरा एक बेटा तो चला गया, अब तुम्हीं मेरे बेटे हो। मुझे निपुत्र ना करो बेटा। एक पुत्र शोक से पीड़ित पिता ने भी अपने ज्ञान और प्रगतिशील विचारों से ना केवल होलकर वंश का कल्याण किया बल्कि समाज को अहिल्या बाई जैसा योग्य शासक दिया।

रजवाड़ा पैलेस के पास ही है कसारा बाज़ार और सराफा बाज़ार। और सड़क पर पसरा है असंख्य फेरी वालों का साम्राज्य। भीड़ इतनी कि कोरोना वायरस तक को पैर रखने की जगह ना मिले। और चीजें इतनी आकर्षक और सस्ती कि चीन के बाज़ार शरमा जाएं। बच्चों के कपड़े, जूते, खिलौने,से लेकर चीनी मिट्टी के बर्तन , बैग आप जितना सोच सकते हैं सब कुछ मिल रहा था वहां। किसी  वालमार्ट और शॉपर्स स्टॉप का शॉपिंग एक्सपीरियंस उस जीवंत बाज़ार के एंबियंस की  बराबरी नहीं कर सकता। कुछ नहीं भी खरीदना हो तो भी बाज़ार ही देखने लायक है। जेब में पैसे हों तो आप बिना  कुछ खरीदे वापस नहीं सकते। अगर गए तो आप अपने आप को सुकरात के सच्चे उत्तराधिकारी मान सकते हैं।

कसारा बाज़ार में सजे बर्तनों को निहारते निहारते हम सर्राफा बाजार पहुंचे। गहनों के दुकानों की लड़ियां और उसके आस पास खड़ी लड़कियां , अगर यह माया नहीं तो और क्या है? शाम हो रही थी, इसीलिए सर्राफा बाज़ार के पास हमने रबड़ी ,मूंग दाल के हलवे को आनंद लिया और पास की दुकान पर गरमागरम गुलाब जामुन भी चखे।

उसके बाद हम ऑटो लेकर छप्पन दुकान पहुंचे। छप्पन दूकान इंदौर का प्रसिद्ध नाइट स्पॉट है जहां खाने पीने की दुकानें एक कतार से है। छप्पन पहुंच कर आपको अहसास हो जाता है कि इंदौर को चटोर शहर की उपाधि देना बहुत ग़लत नहीं है। रबड़ी, हलवा और गुलाब जामुन से भरे पेट के ऊपर भी हमने टिक्की चाट और पोटेटो ट्विंस्टर का लुफ्त उठाया। उसके बाद भारी मन और भारी पेट के साथ हमने उज्जैन की बस पकड़ी। हां कुछ देर के इंदौर प्रवास के दौरान भी शहर की सफाई और स्वच्छता ने हमें अत्यंत प्रभावित किया। इंदौर की जनता और प्रशासन दोनों इसके लिए बधाई के पात्र हैं।



सुबह सुबह हमारे फोन की घंटी घनघनाने लगी तो हमने पाया कि हमारे सारथी महेश नागवंशी साहब हमें सवेरे नींद से जगाने का वादा पूरा कर रहे हैं। हम चटपट तैयार हुए और दिल्ली से अपने साथ ले गई छंटी हुई धोती पहन कर  हम भगवान महाकालेश्वर के दर में जा पहुंचे। मंदिर के सामने टेंपो रोकते समय महेश जी कहते हैं, यहीं पकड़ा गया था विकास दुबे कानपुर वाला। मैंने सोचा कहां मैं महाकाल के बारे में सोच रहा था और कहां विकास दूबे पर ध्यान चला गया। फिर सोचा किबाबा महाकाल की संगत में लोहा भी सोना हो जाता है तो अशोक और विक्रमादित्य की धरती पर आकर विकास दूबे का भी नाम हो गया तो आश्चर्य कैसा।

मंदिर के अंदर जाकर हमने महाकाल की प्रातः आरती के दर्शन किए और एक वहां खड़े एक पुरोहित के सहयोग से परिवार के साथ भगवान शिव की उपासना की। मंदिर प्रांगण में खड़े फोटोग्राफर से अर्जेंट फोटो खिंचवाई और इसका पूरा ध्यान रखा कि पूरे ललाट पर लगे चंदन सिंदूर की भव्यता तस्वीरों में अच्छे से आए।

भगवान की पूजा के पेटपूजा का वक्त हो रहा था। महाकाल प्रांगण के बाहर ही 'अपना स्वीट्स' की दुकान है जहां आप इंदौर वाले पोहा जलेबी का आनंद ले सकते हैं। बिहार में सामान्यतः चूड़ा या तो सीधे धोकर दही के साथ खाया जाता है या भून कर उसका भूजा खाया जाता है। पोहा हमारे लिए एक अलग व्यंजन है जिसका आनंद लिए बगैर इंदौर और उज्जैन की यात्रा अधूरी है। अपना स्वीट्स पर नर्म पोहे और गर्म जलेबी की दो प्लेट छक के हम उज्जैन दर्शन को निकल पड़े



सबसे पहले हम पहुंचे गढ़कालिका देवी मंदिर में। ऐसा कहा जाता है कि महाकवि कालिदास गढ़कालिका देवी के अनन्य भक्त थे और उनकी साहित्यिक क्षमताओं का श्रेय उनकी इष्ट देवी गढ़कालिका को ही है। गढ़कालिका मंदिर का जीर्णोद्धार सम्राट हर्ष ने करवाया था जो भारत वर्ष के अंतिम महान हिन्दू शासक माने जाते हैं। मंदिर के पास लगी पट्टिका पर सम्राट हर्ष का नाम देख कर कक्षा छह की इतिहास पुस्तक में उनके हस्ताक्षर का बरबस स्मरण हो आया। उनके हस्ताक्षर में लिखा होता था, " स्व- हस्तो-मम महराजाधिराज श्री हर्षश्या "


गढ़कालिका मंदिर से आगे  पहुंचे राजा भर्तृहरि की गुफा में। राजा भर्तृहरि यहां मौजूद दो गुफाओं में समाधिस्थ होते थे और उनके साथ ही नाथ संप्रदाय के मत्स्येंद्र नाथ और गोरख नाथ की प्रतिमाएं भी विराजमान हैं। अतः गढ़कालिका मंदिर जहां एक तरफ संस्कृत के गौरव स्तंभ  कालिदास से जुड़ा है तो भर्तृहरि की गुफा हिन्दी भाषा और माता संस्कृत के बीच की कड़ी अपभ्रंश के कवियों मत्स्येंद्र नाथ अथवा मछंदर नाथ और उनके शिष्य गोरखनाथ का प्रतिनिधित्व करती हैं। हठ योग की परम्परा से जुड़े संतों का जीवन कैसा रहा होगा, इन गुफाओं में जाकर सहज ही अनुभव हो जाता है।
भले ही हठयोगी संत सांसारिक सुखों से परे थे लेकिन सेवा का भाव उनमें अत्यंत प्रबल था। 
नौ लख पातरि आगे नाचैं, पीछे सहज अखाड़ा.
ऐसे मन लै जोगी खेलै, तब अंतरि बसै भंडारा.” के जीवन दर्शन का पालन करते हुए भी गौसेवा और गो रक्षा को उन्होंने अपने जीवन चर्या में शामिल किया। पास ही बनी गौशाला में गौ सेवा का सौभाग्य मिला और खास कर बच्चों को बछड़ों को हरी घास खिलाते देख कर खुश होते देख और बछड़ों का बच्चों की चुहल स्नेह पूर्वक स्वीकार करते देख मन को शांति का भाव मिला।



इसके बाद हमारी अगली मंज़िल थी काल भैरव मंदिर। काल भैरव के इष्ट को प्रसाद में मदिरा चढ़ती है। इसीलिए मंदिर के बाहर दुकानों पर फूल, अगरबत्ती और माला के साथ साथ देसी विदेशी शराब की बोतलें सजी हुई देख आश्चर्य भी हुआ तो  हर भारत की विविधता का एक और रूप देख कदाचित गर्व भी हुआ। हां यह विचार भी आया कि अगर काल भैरव का मंदिर बिहार में होता क्या काल भैरव को पार्थिव नियमों से छूट मिलती या नहीं। मंदिर के बाहर ही सोडा शिकंजी की दुकानों पर काल भैरव के प्रसाद का सेवन करते भक्तों की भीड़ ने बता दिया कि शायद भक्त और भगवान दोनों को आबकारी नियम मानने ही  पड़ते। खैर, दिन के तीन बज रहे थे, और मेरा मन मंदिर प्रांगण में बिक रहे बड़े बड़े साबूदाना के पापड़ों पर मोहित हो रहा था। हमने खरीद कर दो तीन पापड़ खाए और आगे चला। वैसे कोरोना के कारण प्रशासन ने किसी भी प्रकार के प्रसाद या माल्यार्पण पर रोक लगा दी है अतः प्रसाद की बोतलें भक्तों के काम रही हैं, भगवान भक्तों की खुशी में ही प्रसन्न हो रहे हैं।



उसके बाद हम उज्जैन दर्शन के अंतिम पड़ाव की ओर अग्रसर थे। महर्षि सांदीपनी आश्रम जहां यह मान्यता है कि बाल कृष्ण, अग्रज बलराम और सखा सुदामा ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुंदर से सजे उद्यान में शुंग वंश  कालीन शिव मंदिर भी है जहां एक दुर्लभ नंदी की प्रतिमा है जो खड़ी मुद्रा में है। प्रायः शिव के वाहन नंदी की प्रतिमा में नंदी बैठे होते हैं, लेकिन यह एकमात्र मंदिर है जहां नंदी की प्रतिमा खड़ी मुद्रा में है। बाक़ी मूर्तियां आधुनिक हैं। सांदीपनी आश्रम के नीरव माहौल में कुछ समय बिताने के बाद हमने लडडू बाफना में खाना खाया और शुद्ध शाकाहारी भोजन से तृप्त हुए।



समय उतनी जल्दी से निकल गया और हम अपने महेश नागवंशी के साथ उज्जैन स्टेशन की तरफ निकल पड़े। रास्ते में नागवंशी जी ने अपने पुराने ग्राहकों को बातें बताई कि कैसे उनके निजी संबंध सालों से बने हुए हैं। स्टेशन पहुंच कर पैसे लेने के बाद मुझे नागवंशी जी ने पूछा कि वापिस कब आना है? मैने कहा सोमवार को सुबह ऑफिस जाना है। वह हंसने लगे। कहा सर आप कब वापस आओगे उज्जैन? मैंने मुस्कुराते हुए कहा यह तो महाकाल की इच्छा पर है। यह कह कर मैं प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ गया।

 


Wednesday, December 2, 2020

राजेंद्र बाबू के प्रति

देशरत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद की पत्नी प्रयागराज की थीं। उनकी जान पहचान महादेवी वर्मा से थी। राजेंद्र बाबू महादेवी को अपनी छोटी बहन मानते थे। एक बार महादेवी वर्मा उनसे मिलने राष्ट्रपति भवन पहुंची। राष्ट्रपति भवन पहुंचने पर उनको पता चला कि राजेंद्र बाबू और उनकी धर्मपत्नी राजवंशी देवी किसी समारोह में हिस्सा लेने गए हुए हैं और शाम तक ही लौटेंगे। राष्ट्रपति भवन के सहायक स्टाफ ने महादेवी को बताया कि  राजेंद्र बाबू ने कहा है कि आपसे पूछ कर आपकी पसंद का खाना बनाया जाय। स्टाफ ने यह भी बताया कि वे खाने पर राष्ट्रपति का इंतजार न करें क्योंकि आज राजेंद्र बाबू और राजवंशी जी का उपवास है और वे शाम में ही एक बार भोजन कर उपवास तोड़ेंगे। यद्यपि महादेवी जी कुछ भूखी थीं, फिर भी उन्होंने संकोचवश कह दिया कि वे भी उपवास पर हैं और शाम में अपने मेजबान दंपत्ति के साथ ही उपवास तोड़ेंगी। 

महादेवी अपने संस्मरण में लिखती हैं कि उनके मन में यह भी आया कि राष्ट्रपति जी का उपवास है तो उपवास तोड़ने के लिए भी फल, दूध , और मेवों की व्यवस्था जरूर होगी। तो वे  मन मसोस  कर शाम और शाम के खाने का इंतज़ार करने लगीं। शाम में खाने की मेज़ पर महादेवी राजेंद्र बाबू और राजवंशी देवी के साथ बैठी तो सामने की थाली में एक उबला आलू रखा था। सिर्फ एक उबला आलू। दिन भर के उपवास के बाद उनका पारण सिर्फ एक उबले  आलू से होना था। महादेवी ने अपना सर पीट लिया। हालांकि वह बाद में इसको हंसी से याद करती हैं और यह वाकया राजेंद्र बाबू की सादगी का एक नमूना भर है।




दूसरा प्रसंग भी उसी प्रसंग से जुड़ा है। महादेवी जब राष्ट्रपति भवन से जब चलने लगीं तो राजवंशी देवी ने महादेवी से कहा कि अगली बार जब आएं तो उन के लिए बांस के बने सूप ज़रूर ले आएं। यहां सूप नहीं है कि अनाज ठीक से फटक कर साफ़ कर सकें। अगली बार जब महादेवी इलाहाबाद से दिल्ली गईं तो राष्ट्रपति भवन सूप ले कर गईं। बाद के दिनों में जब राजेंद्र बाबू का कार्यकाल खत्म हुआ तो अपने निजी सामान में उन की पत्नी ने वह सूप भी रखा ले जाने के लिए। राजेंद्र प्रसाद ने जब उस सूप को देखा तो पत्नी से कहा कि यह उपहार में मिला हुआ है , हम इसे नहीं ले जा सकते। और वह सूप राष्ट्रपति भवन में ही छोड़ दिया। चाणक्य और सरकारी तथा निजी दियों की कथा कितनी सच है पता नहीं लेकिन राजेंद्र बाबू के बारे में यह कथा यह दिखाती है कि सादगी और ईमानदारी का ऐसा दुर्लभ स्वरूप भी हो सकता है।

 राजेंद्र प्रसाद या जैसा कि बिहार में उनको राजेंदर बाबू कहा जाता है, के 136वी जन्मतिथि पर कोटिश नमन। 

Tuesday, December 1, 2020

राजनीति और देशहित

राजनीति और देशहित अलग अलग चीजें हैं। कोई आवश्यक नहीं कि सतही स्तर पर दोनों का सामंजस्य दिखे लेकिन यह कोई बहुत चिंता की बात नहीं है। चलिए इस महीन अंतर को थोड़े उदाहरणों के मदद से समझते हैं।

पिछले दिनों पाकिस्तान की संसद में एक घटना हुई। पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज के सांसद सादिक ने संसद में यह दावा किया कि फ्लाइट कमांडर अभिनंदन को छोड़ने के फैसले के समय वहां के सैन्य प्रमुख बाजवा के पैर कांप रहे थे। सत्ताधारी दल की थू थू हुई और विपक्ष ने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया कि सत्ताधारी दल हिन्दुस्तान से डरता है , भारत का पिछलग्गू है और पाकिस्तान के हितों से समझौता करता है। 

वर्ष 2017 में जीएसटी लगने के बाद से ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इसको गब्बर सिंह टैक्स कहकर प्रचारित करता रहा है। विमुद्रिकरण का विरोध भी लगातार हुआ है। Demonetization के बारे में तो यह कहा जाता है कि इसके अर्थव्यवस्था खासकर असंगठित क्षेत्र की कमर तोड दी।

वर्ष 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने रिजर्व बैंक का सोना गिरवी रखकर आईएमएफ से उधार लिया था। चंद्रशेखर को देश का सोना गिरवी रखने के लिए विपक्षी दलों द्वारा क्या क्या सुनना पड़ा होगा आप इसकी कल्पना कर सकते हैं।

उपर दिए गए उदाहरणों को आप दुबारा सोचने की कोशिश करें। हरेक स्थिति में विपक्ष को सत्ताधारी दल और सत्ता को विपक्ष में मान लें। क्या आपको लगता है कि इमरान खान की जगह अगर नवाज़ शरीफ प्रधानमंत्री होते तो पाकिस्तान अभिनंदन को रिहा करने के जगह भारत पर हमला करने का निर्णय लेता। क्या आपको लगता है कि राजनीतिक दल के रूप में जो कांग्रेस जीएसटी का इतना विरोध करती है, कल सत्ता में आने के बाद जीएसटी खत्म कर देगी या सारे पुराने नोट वापस से बाज़ार में आजाएंगे ।

1991 में चंद्रशेखर अगर विपक्ष में होते तो किसी सरकार द्वारा सोना गिरवी रखे जाने पर उसकी चूलें हिला देते ठीक उसी तरह जिस तरह उनके विपक्षियों ने उस समय किया।

वर्तमान किसान आंदोलन को ही लें, जो कृषि सुधार और कानून वर्तमान सरकार द्वारा लाए गए हैं वह भाजपा और कांग्रेस दोनों के चुनावी घोषणा पत्र का हिस्सा थे। अगर आज कांग्रेस सत्ता में होती तो वह भी यही कानून पास कर रही होती। और हां इसका विरोध भाजपा शासित राज्य कर रहे होते। विरोध का मतलब आप यह ना निकालें कि कल कांग्रेस की सरकार बन गई तो यह कानून वापस हो जाएंगे, धारा 370 फिर से बहाल हो जाएगा या जीएसटी खत्म कर दिया जाएगा।

राज्य और सरकार में अंतर होता है। राज्य हम भारत के लोगों का एक साझा न्यास है, और सरकार उसकी एक अस्थाई संरक्षक मात्र। कानून और नीतियां देशहित और व्यापक जनकल्याण को ध्यान में रख कर बनाई जाती हैं। सरकार के बदलने से उन नीतियों में कोई बदलाव नहीं आता। क्योंकि देशहित उससे उपर होता है। सरकारें किसी रिले रेस में दौड़ते उन धावकों की तरह हैं जिनका काम सिर्फ अलगी सरकार को बेटन पास करना होता है और देश के व्यापक हित को पाने की यह दौड़ अनवरत चलती रहती है | कोई भी धावक उलटी दिशा में नहीं दौड़ता सिर्फ लक्ष्य की और दौड़ता है |





भाजपा कथित रूप से राष्ट्रवादी पार्टी है जो कश्मीर हमारा है के नारे लगाती है, क्या इसका मतलब यह है कि कांग्रेस की सरकार आते ही कश्मीर थाल में परोस कर पाकिस्तान को दे दिया जाएगा। कश्मीर में आतंकवादियों के मुठभेड़ बंद हो जाएंगे और वहां से सेनाएं हटा ली जाएंगी। 

अगर न्यूजचैनल पर होने वाली बहस को आप देखें तो शायद आपको लगे कि ऐसा ही होगा, बल्कि सच्चाई इससे कहीं परे है। ऐसा ही कुछ कृषि सुधारों को लेकर बने नए कानूनों को लेकर है। यह कानून देश के किसानों के व्यापक हितों को लेकर बनाए गए हैं। हरित क्रांति के बाद कृषि क्षेत्र में फायदा सीमित क्षेत्रों और सीमित बड़े किसानों को ही मिला। इसकी एक बानगी यह है कि msp या न्यूनतम समर्थन मूल्य का फायदा सिर्फ छह प्रतिशत किसानों और वह भी बड़े किसानों को मिलता है। देश की नीति अब छोटे और सीमांत किसानों की आय सुरक्षा करने की है और हर सरकार इसी दिशा में कार्य करेगी। देश के सीमांत किसानों की सालाना आय मात्र 20000 रुपए के आसपास है। इसको बदलने की दिशा में यह कदम निर्णायक होंगे। और सत्ता परिवर्तन के बाद भी इन नियमों में कोई परिवर्तन नहीं होगा।

जिस प्रकार 1991 में हमने सेवा क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन किए , यह वक्त प्राथमिक कृषि क्षेत्र में दूरगामी नीतिगत परिवर्तनों का है। राजनीति कुछ भी कहे या करे, देशहित सर्वोपरि है। विपक्ष में बैठकर बोलना आसान है और बोलना भी चाहिए क्योंकि कोई भी दल सत्ता से दूर रहकर बहुत प्रगति नहीं कर सकता। सत्ता के लिए राजनीति होती ही है और होती रहेगी भी। 

भारत जैसे देश में वैसे भी राजनीति का ऐसा घुलामिला रूप है कि कुछ भी  समझना मुश्किल है। कांग्रेस एक धर्मनिरपेक्ष पार्टी है लेकिन उसके नेता मंदिर मंदिर घूमते हैं और दरगाह पर चादर चढ़ाते हैं। भाजपा एक दक्षिणपंथी पार्टी है लेकिन सबसे ज्यादा सब्सिडी देने वाली पोपुलिस्ट नीतियां अपनाती हैं। अरविंद केजरीवाल जो वैचारिक स्तर पर वामपंथ के कहीं करीब हैं चुनाव प्रचार में पूरी हनुमान चालीसा बांच जाते हैं। और लेफ्टिस्ट कम्युनिस्ट पार्टी ममता बैनर्जी की पार्टी से तालमेल करना चाह रही है। तो ऐसी ढुलमुल राजनीतिक मान्यताओं का देशहित पर कोई स्थाई प्रभाव पड़ना  संभव नहीं है। आप निश्चिंत रहें , देश सर्वोपरि है और रहेगा । आप न्यूज चैनल पर डिबेट्स का मज़ा लेते वक्त सुकून से चाय की चुस्कियां लें और निश्चिंत रहें। ज्यादा बोर हो रहे हों तो ऑस्ट्रेलिया में चल रहे भारत का मैच देख लें।  क्या पिटाई हो रही है, मां कसम ।। 


Thursday, November 19, 2020

ठंढा का मौसम और कलम

ठंढा का समय आ गया है | दुनिया को भले अच्छा लगे कि रजाई कंबल में हाथ  गोड़ समेत के घुसियाए हुए हैं, असली दिक्कत हो जाता है हम विद्यार्थी सब को। ठंढा के ही टाइम में सब एग्जाम होता है तो पढ़ना लिखना भी जादे ही करना पड़ता है। भोरे भोर उठ के साइकिल चला के ट्यूशन जाने में हाथ का ओंगरी सब जम जाता है। मास्टर साहब गर्मी भर खाली गर्मी छुट्टी मनाए, अब जाके पूस माघ में बड़का  सिलेबस का उनको चिंता जगता है। 

खाली ट्यूशन पहुंच के काम हो जाय तो क्या बात था। वहां है  माटसाब ढर्रा का ढर्रा लिखाए पड़े हैं। ई  ठंढा में जेब से हाथ निकाल के कलम धरना भी  मुश्किल काम है। कैसो कर के लिखना शुरू भी करिए, तो लीजिए कलम जगिए नय रहा है। लीड  जम जाता है ना इसीलिए  केतनो कोशिश कीजिए  कलम कोपी पर जगिये नय रहा था | कल्हे खरीदे थे रोटमैक वाला नया पेन। दुकानदार कह  के दिया कि ले के जाइए कलम का लीड नय जमेगा। पहले लिखो-फेंको यूज करते थे, तो उसमें में दिक्कत होता था। उसका लीड जम जाने पर उसको हाथ में खूब रगड़ना पड़ता था। केतना बार तो लालटेन के उपर पेन को बरकाते थे, तब लिखाता था।

तब कोई कहा कि लिखो-फेंको वाला ज़माना गया, रोटोमैक वाला पेन ले लो। उसमें फूंकने , गरमाने और बरकाने का झंझट नय रहता है। धकाधक चलता है। उसी के बात में आके रोटोमैक पेन खरीदे, लेकिन सब बात गलत। इसीलिए लोग कहता है कि कलम हमेशा जगा के देख लेना चाहिए , तब कीनना चाहिए। गलती से बिना जगाए ले लिए, अब लिखैये नय रहा है। ऊपर से अब तक तो माट साब दू पन्ना से उपर लिखा दिए होंगे। और इ नबका पेन के चक्कर में पन्ना फट गया लेकिन अभी तक 'जय मां सरस्वती' भी नहीं लिखाया है। 




कोई एक्स्ट्रा पेन भी नहीं लाता है आजकल, अभी किसी से पेन मांगते देख लिए तो माट साब भी गोस्सा जाएंगे। क्या करें, फिर सोचे कि कहीं गोज के देखते हैं। रफ वाला कोपी भी नहीं लाए थे जिसमें गोज के देखें। फेयर कोपी के ही लास्ट वाला पेज उल्टा के गोजना शुरू किए। पांच मिनट गोजने के बाद भी धुक धुक करके चलना शुरू हुआ , लेकिन तब तक मास्टर साब बहुत लिखा चुके थे। क्लास तो छूटबे किया , नया फेयर कॉपी का दू पन्ना भी खराब हुआ। 

क्लास के बाद सब बोला कि इतना ठंढे पड़ रहा है कि कलम क्या भेजा तक जम जाता है।  वैसे रेनॉल्ड्स का जेटर पेन ले लोगे तो ई सब झंझट नय रहेगा। हम बोले कि नय भाय, जेटर वाला पेन पैक होके आता है। उसको जगा के भी नय देख सकते हैं, इसलिए हम तो वापस से लिखो-फेंको ही लेंगे। जमियो गया तो साला लैंप पर बरका के चला लेंगे लेकिन रोटोमैक और जेटर जैसा कलम कीन के पैसा और कोपी दोनों का बर्बादी नय करेंगे।